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Jun 23, 2017

रेल यात्राओं के भयंकर अनुभवों से अभिभूत एक रेल यात्री


पहले कोहरे में ट्रेनें लेट होती थीं, लेकिन अब ट्रेनें आमतौर पर लेट होने लगी हैं, मानो उनके ड्राईवर रास्तों में गाड़ियों को रोक देशद्रोह और देशप्रेम की खालिस बहसों में उलझ जाते हों...
तारकेश कुमार ओझा
अक्सर न्यूज चैनलों के पर्दे पर दिखाई देता है कि अपनी रेल यात्रियों के लिए रेलवे खास डिजाइन के कोच बनवा रही है, जिसमें फलां-फलां सुविधाएं होंगी। यह भी बताया जाता है कि जल्द ही ये कोच यात्रियों के सेवा में जुट जाएंगे। लेकिन हकीकत में तो ऐसे अत्याधुनिक कोचों से कभी सामना हुआ नहीं, अलबत्ता आम भारतीय की तरह रेल यात्रा का संयोग बन जाने पर साबका उसी रेलवे और ट्रेन से होता है जिसे चार दशक से देखता आ रहा हूं।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान बुलेट ट्रेन की बड़ी चर्चा थी। हालांकि मेरी दिलचस्पी कभी इस ट्रेन के प्रति नहीं रही। लेकिन मोदी सरकार में जब रेल मंत्री का दायित्व काफी सुलझे हुए माने जाने वाले सुरेश प्रभु को मिला तो विश्वास हो गया कि बुलेट ट्रेन मिले न मिले, लेकिन हम भारतीयों को अब ठीक—ठाक रेलवे तो जल्द मिल जाएगी, जिसके सहारे इंसानों की तरह यात्रा करते हुए अपने गंतव्य तक पहुंचना संभव हो सकेगा।
मगर पिछली कुछ रेल यात्राओं के अनुभवों के आधार पर इतना कह सकता हूं कि चंद महीनों में रेलवे की हालत बद से बदतर हुई है। उद्घोषणा के बावजूद ट्रेन का प्लेटफार्म पर न पहुंचना। पहुंच गई तो देर तक न खुलना। किसी छोटे से स्टेशन पर ट्रेन को खड़ी कर धड़ाधड़ मालगाड़ी या राजधानी और दूसरी एक्सप्रेस ट्रेनें पास कराना आदि समस्याएं पिछले कुछ महीनों में विकराल रुप धारण कर चुकी हैं। कहीं पूरी की पूरी खाली दौड़ती ट्रेन तो कहीं ट्रेन में चढ़ने के लिए मारामारी। यह तो काफी पुरानी बीमारी है रेलवे की। जो अब भी कायम है।
इसमें नयी बात यह है कि पहले ट्रेनें आमतौर पर जाड़ों यानी कुहासे के दिनों में लेट होती थीं पर जबसे सुरेश प्रभु मंत्री बने हैं तबसे चमकती धूप में ट्रेनों का 4 से 5 घंटा लेट होना आम बात हो गयी है। लेट होती ट्रेनों को देख ऐसा लगता है मानो उनके ड्राईवर रास्तों में गाड़ियों को रोक देशद्रोह और देशप्रेम की खालिस बहसों में उलझ जाते हों, क्योंकि देश तो आजकल इसी में उलझा हुआ है।
पिछले साल अगस्त में जबलपुर यात्रा का संयोग बना था। इस दौरान काफी जिल्लतें झेलनी पड़ीं। लौटते ही अपनी आपबीती रेल मंत्री से लेकर तमाम अधिकारियों को लिख भेजी। इसका कोई असर हुआ या नहीं, कहना मुश्किल है। क्योंकि किसी ने भी कार्रवाई तो दूर प्राप्ति स्वीकृति की सूचना तक नहीं दी। इस साल मार्च में होली के दौरान उत्तर प्रदेश जाने का अवसर मिला। संयोग से इसी दौरान प्रदेश में चुनावी बुखार चरम पर था। वाराणसी से इलाहाबाद जाने के लिए ट्रेन को करीब पांच घंटे इंतजार करना पड़ा।
वाराणसी से ही खुलने वाली कामायिनी एक्सप्रेस इस सीमित दूरी की यात्रा में करीब घंटेभर विलंबित हो गई। वापसी में भी कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ। प्लेटफार्मों पर किसी ट्रेन की बार-बार उद्घोषणा हो रही थी, तो कुछ ट्रेनों के मामलों में उद्घोषणा कक्ष की अजीब खामोशी थी। वापसी बीकानेर-कोलकाता साप्ताहिक सुपर फास्ट एक्सप्रेस से करनी थी, जो करीब पांच घंटे विलंब से प्लेटफार्म पर पहुंची।
इस बीच स्टेशन के प्लेटफार्म पर एक खाकी वर्दी जवान को नशे की हालत में उपद्रव करते देखा। जीआरपी के व्हाट्सअप पर इस आशय का संदेश दिया। लेकिन आज तक कोई जवाब नहीं मिला। मध्य रात्रि ट्रेन इलाहाबाद से रवाना तो हो गई, लेकिन इसे मुगलसराय पहुंचने में करीब पांच घंटे लग गए। बहरहाल ट्रेन हावड़ा पहुंचा तो खड़गपुर की अगली यात्रा के लिए फिर टिकट लेने काउंटर पहुंचा। यहां मौजूद एक बुकिंग क्लर्क ने सीधे-साधे बिहारी युवक को दिए गए रेल टिकट के एवज में 60 रुपए अधिक झटक लिए। युवक के काफी मिन्नत करने के बाद क्लर्क ने पैसे लौटाए।
वापसी के बाद अपने ही क्षेत्र में फिर छोटी यात्रा करने की नौबत आई। लेकिन पता चला कि दो घंटे की दूरी तय करने वाली ट्रेन इससे भी ज्यादा समय विलंब से चल रही है। न ट्रेन के आने का समय न चलने का। यात्री बताने लगे कि ट्रेन रवानगी स्टेशन से ही लेट छूटी है।
यह सब देख लगा कि क्या रेलवे में अब भी जवाबदेही नाम की कोई चीज है। क्योंकि यह सब तो चार दशक से देखता आ रहा हूं, फिर रेलवे में आखिर क्या बदला है। अंत में यही सोच कर संतोष कर लेना पड़ा कि इस देश में यदि सबसे सस्ता कुछ है तो वह आम नागरिकों का समय।
कुछ साल पहले केंद्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु चुनाव प्रचार के सिलसिले में मेरे शहर आए थे। अपने संभाषण में उन्होंने रेलवे की हालत पर गंभीर चिंता व्यक्त की। हाल की यात्राओं के अनुभव के मद्देनजर इतना कहा जा सकता है कि रेलवे की हालत वाकई चिंताजनक है।
(तारकेश कुमार ओझा पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
रेलवे भारत की सबसे बड़ी यात्री नेटवर्क है। आपके पास भी कोई अनुभव हो तो editorjanjwar@gmail पर मेल करें।

Jun 19, 2017

राष्ट्रपति बनाने की रबर स्टांप परंपरा कायम

मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में....
बिहार के राज्यपाल और कानपुर वासी रामनाथ कोविंद होंगे एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कौन हैं रामनाथ कोविंद, कहां से लाए गए यह रबर स्टांप।
पूर्व आइएएस अधिकारी कोविंद का राष्ट्रपति बनना लगभग तय। राष्ट्रपति पद के लिए कोविंद का नाम आते ही लोग खोजने लगे गूगल पर उनकी कोविंद की जाति।

अगर बने तो कोविंद होंगे देश के दूसरे दलित राष्ट्रपति। इससे पहले दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले के आर नारायणन रह चुके राष्ट्रपति।
उपराष्ट्रपति के नाम पर अभी कोई चर्चा नहीं है। पर संभावना है कि दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद भाजपा उपराष्ट्रपति के लिए महिला सवर्ण नाम को प्राथमिकता देगी। माना जा रहा है दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद मोदी सरकार ने राष्ट्रपति पद के दूसरे दावेदारों के मुंह पर जाबी लगा दी है।
मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में। मीडिया ने मेट्रो मैन श्रीधरण के नाम पर भी लगाई थीं अटकलें।
बीजेपी ने एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का सोमवार को ऐलान कर दिया। दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बिहार के गवर्नर रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया गया है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कोविंद के नाम का ऐलान करते हुए कहा कि कोविंद को हमने इसलिए चुना है कि पार्टी गरीब समाज से ताल्लुक रखने वाले शख्स को राष्ट्रपति बनाने की तैयारी में थी।
कानपुर देहात में पैदा हुए कोविंद बीजेपी दलित मोर्चा के अध्यक्ष रह चुके हैं। यूपी से दो बार राज्यसभा गए हैं। पेशे से वकील कोविंद ऑल इंडिया कोली समाज के अध्यक्ष भी रहे हैं।

Jun 17, 2017

भाजपा को वध से प्रेम है, फिर वह अस्वच्छता ही क्यों न हो

वध की क्रिया को उत्सव की तरह हत्यारे ही देख सकते हैं। अस्वच्छता दूर करना उत्सवता की भावना पैदा करता है, पर वध उसके उलट भावना है......... 

कुमार

पिछले साल अक्तूबर में गांधी मार्ग चौराहा, जयपुर पर एक बड़े से बोर्ड पर लिखा था 'आइए अस्वच्छता का वध करें।' इस स्लोगन को पढ़ते हुए तब कई विचार आये थे। 


जैसे -
—क्या यह वधिकों की सरकार है।
—वध से बहे खून से क्या खुशबू फैलेगी।
—तीर-धनुष से अस्वच्छता का वध कैसे होता है।
—अस्वच्छता का मतलब गंदगी में जीने को मजबूर गरीबों से तो नहीं।
—क्या यह हिमालयी मूर्खताओं का समय है।

यूं भी वध शब्द का प्रयोग अस्वच्छता के साथ गलत है। यह खुद एक अस्वच्छ भाषा है। वध की क्रिया को उत्सव की तरह हत्यारे ही देख सकते हैं। अस्वच्छता दूर करना उत्सवता की भावना पैदा करता है, पर वध उसके उलट भावना है।

अब आज की तारीख में 'अस्‍वच्‍छता का वध' के निहितार्थ सामने आने लगे हैं और वो भी राजस्‍थान में ही। पिछले शुक्रवार 9 जून को प्रतापगढ़ की कच्ची बस्ती में महिलाएं शौच करने जा रही थीं। तब नगर परिषद के लोगों ने उनकी तस्‍वीर लेने की कोशिश की। श्रमिक संगठन के एक नेता ने इस तरह तस्‍वीर लेने का विरोध किया। इससे नाराज लोगों ने उन महोदय की जमकर पिटाई की जिससे उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। अब कच्ची बस्तियों के लोग अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए धरने पर हैं।

इसी तरह हरियाणा के एक अधिकारी अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में स्वच्छता अभियान की आड़ में अरे-तरे पर उतारू हैं। लोगों ने जब उनकी पोस्‍ट पर आपत्ति जतायी तो उनका जवाब है - आपत्ति करने वालों ने मेरी भाषा अभी सुनी ही कहां है। मेरी भाषा में दस शब्दों वाले वाक्य में आठ शब्द गाली ही होते हैं। वही मेरी ऑरिजनल भाषा है और मुझे अपनी भाषा से बहुत प्यार है। आप लोगों को जाकर UPSC में शिकायत अवश्य करनी चाहिए, जिन्होंने एक बार नहीं, दो बार नहीं; बल्कि तीन बार मुझे IAS सिलेक्ट किया और वह भी बिना किसी रिज़र्वेशन के।"

आखिर क्‍या कारण हैं कि जि‍स स्‍वच्‍छता अभियान की गांधी ने एक मिसाल खड़ी कर दी थी उसी के नाम पर चला मोदी जी का अभियान मानसिक गंदगी का पर्याय हो जा रहा।

Mar 21, 2017

भाजपा का एक छोटा सा साक्षात्कार

भाजपा की विकास यात्रा पर वरिष्ठ लेखक राजकिशोर ने लिया व्यंग्यात्मक साक्षात्कार 

प्रश्न : तुम्हारा नाम क्या है?
उत्तर : भाजपा कुमारी
प्रश्न : किस की बेटी हो?
उत्तर : आर एस एस पांडे की
प्रश्न : तुम्हारी उम्र?
उत्तर : यही कोई सैंतीस साल।
प्रश्न : उम्र के हिसाब से तो काफी फैल गयी हो।
उत्तर : मत पूछिए। एक बार ऐसी बीमार पड़ी थी कि मेरा वजन बस दो किलो रह गया था।
प्रश्न : उस के बाद सेहत कैसे बनी?
उत्तर : मैं नियमित रूप से वर्जिश करती हूँ। सुबह छह से सात। लाठी भाँजने में कई बार फर्स्ट आ चुकी हूँ। कुछ घरानों से टॉनिक भी आ जाता है।
प्रश्न : फिर भी इतनी जल्दी, इतना विकास?
उत्तर : अंकल, इस में मेरा दोष नहीं है। मेरी फ्रेंड्स सिकुड़ती गयीं और उन की जगह मुझे मिलती गयी। अब तो मैं ही मैं हूँ।
प्रश्न : तब तो तुम्हारी अभिलाषा पूरी हो चुकी होगी।
उत्तर : अभी कहाँ। इतनी उम्र हो गयी, पर शादी नहीं हुई। कुँवारी हूँ।
प्रश्न : क्या किसी खास लड़के का इंतजार कर रही हो?
उत्तर : हाँ, भारत कुमार।
प्रश्न : पर उस के पीछे तो और भी लड़कियाँ पड़ी हैं - रेशमा है, कावेरी है, उज्ज्वला है, ललिता है, गुलनार है, नालंदा है...
उत्तर : यही तो चुनौती है। पर पापा कहते हैं, लगी रहो, एक न एक दिन सफलता जरूर मिलेगी।
प्रश्न : आजकल भारत कुमार बहुत बीमार है। कुपोषित है। उस का पूरा शरीर दर्द करता है। उसका स्वास्थ्य लौटाओगी, तभी तो उसे पाओगी।
उत्तर : जितना होता है, करती ही हूँ। पर मेरा लक्ष्य कुछ और है।
प्रश्न : तुम्हारा लक्ष्य क्या है?
उत्तर : पकड़ुआ विवाह करना। पर और लोग भी इसी फिराक में हैं। किसी के हिस्से में हाथ आते हैं, किसी के हिस्से में पैर। पूरा किसी के हाथ में नहीं आता।
प्रश्न : ऐसे हाथ नहीं आने वाला। उसे सर्वांग सुंदरी चाहिए।
उत्तर : इस समय मुझ से सुंदर कौन है?
प्रश्न : सो तो है। पर तुम्हारी हथेली में यह खून कैसे लगा? कहाँ से आ रही हो?
उत्तर : चुप कीजिए। आप जैसे देशद्रोहियों का जवाब मैं नहीं देती।

Feb 28, 2017

गुरमेहर कौर से डरने लगे हैं अमित शाह

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को अंदाजा नहीं था कि एक अकेली लड़की गुरमेहर कौर भाजपा के लिए इतनी बड़ी चुनौती बन जायेगी। अन्यथा वह विद्यार्थी परिषद वालों को चूं तक नहीं करने देते। लेकिन अब मामला हाथ से बाहर जा चुका है और उनको उत्तर प्रदेश के शहरी मतदाताओं के छिटकने का डर सता रहा है....


दरअसल, भाजपा को लगा था कि पार्टी को उत्तर प्रदेश के पश्चिम में जाटों के विरोध के कारण वोट का जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई पूर्वी उत्तर प्रदेश कर देगा। पर 15, 23 और 27 फरवरी के चुनाव में भाजपा कुछ खास नहीं कर पाई। आरएसएस ने कहा है हम सत्ता में नहीं आ रहे।

आखिरी बाजी के तौर पर अध्यक्ष अमित शाह ने 4 और 8 मार्च के चुनाव को माना। इसी के मद्देनजर अमित शाह ने अपना और सहयोगियों का लखनऊ से बोरिया बिस्तर समेटवाकर बनारस पहुंचवा दिया।

पर पार्टी सूत्र बता रहे हैं, अब अमित शाह का सपना पूरा होने का चांस कम लग रहा है। शहरी वोटरों में कारगिल शहीद की बेटी की चर्चा है। दूसरी पार्टियों के समर्थक हर तरफ शहीद की बेटी का माहौल बना रहे हैं। कारगिल शहीद की बेटी होने की वजह से भाजपा प्रचारक मुश्किल में हैं क्योंकि यह शहीद, सेना, शहादत, बॉर्डर इनके लिए हॉट केक होते हैं।

प्रांत की जिम्मेदारी निभा रहे एक आरएसएस से जुड़े जानकार का कहना है, अमित शाह और उत्तर प्रदेश की टीम दिल्ली में फोन पर फोन किये जा रही है कि लड़की के मामले को समेटो। इसी के तहत एबीवीपी ने अपनी ओर से कारगिल शहीद की बेटी को गाली और बलात्कार की धमकी देने वालों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराने की कोशिश की है। पर बवाल और सामूहिक और व्यापक होता जा रहा है। गृहराज्य मंत्री ने उल्टा बोलकर बड़ी मुश्किल खड़ी हो गयी है। यह हमारे लिए बहुत बड़ी चुनौती है।

मैंने उनसे पूछा, आप ऐसा कैसे मान रहे हैं? और बीजेपी ने उल्टा बोला ही क्यों? उन्होंने कहा, 'भाजपा की सामान्य रणनीति चढ़ बैठने की है। जब न संभले फिर नरम होना है। भाजपा ने यह आरएसएस से उधार लिया है। पर आज हमेशा नहीं चल सकता।

उन्होंने आगे कहा, 'आज ही बीएचयू की महिला शाखा बनारस शहर में प्रचार करने गयी थी। लोगों ने कारगिल की बेटी पर सवाल पूछ-पूछ कर मुश्किल कर दिया। बनारस के रविन्द्रपुरी के एक महिला होस्टल से लड़कियों ने भाजपा प्रचारकों को भगा ही दिया।'

Sep 26, 2016

अब ये लोग करेंगे पाकिस्तान को नेस्तनाबूद

पाकिस्तान की ओर मार्च कर चुकी सेना की पहली टुकड़ी। माना जा रहा है कि देशभक्तों की पहली टुकड़ी ही पाकिस्तान के नक्शे को मटियामेट कर देगी।

फिर भी अगर उस नापाक देश का नामोनिशान बचा रह गया तो आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के नेृतत्व वाली नब्बे के उम्र वालों की जाबांज टोली रवाना होगी।

बताया जा रहा है कि बुजुर्गों ने यह कदम मोदी के 'मनमोहिनी' अवतार के बाद उठाया है। बुजुर्ग स्वंय सेवकों को कहना है कि हम वीर कूंवर सिंह की धरती पर माटी पुत्र हैं जो 90 वर्ष की उम्र में दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे।

जय श्रीराम नारे के साथ आकाश को गुंजायमान कर डंडा लेकर बॉर्डर की ओर बढ़ रहे संघ के स्वंयसेवकों से जब पत्रकारों ने पूछा कि डंडे से कैसे करेंगे जटिल हथियारों का मुकाबला तो उनका जवाब था, 'दुश्मनों को नेस्तनाबूद करने के लिए हथियार नहीं हौसला चाहिए होता है और वह हमारे में कूट—कूट के भरा है। हथियार तो कायरों को सुशोभित होता है।'

इस जवाब पर एक अन्य पत्रकार ने पूछा, 'तो डंडा किसलिए लिए जा रहे हो ताउ'

इस सवाल पर संघ का स्वंय सेवक तपाक से बोला, 'बेट्टा जी, हौसले से चढ़ाई तो नहीं होती। बाकि का क्या वह तो हो ही जाएगी।'  फोटो — डॉ योगेन्द्र 

Sep 24, 2016

जिनको हिंदुत्ववादियों ने कूटा अब वही संघ के सिपाही बनने को तैयार?

नरेन्द्र देव सिंह उना में दलितों के साथ सड़क पर हुयी बर्बरता के बाद गुजरात सहित पूरे देश में दलित आंदोलन का उभार हुआ था. गुजरात जो भाजपा का गढ़ है वहां भाजपा को सीएम पद पर नेतृत्व परिवर्तन तक करना पड़ा. लेकिन अब नाटकीय अंदाज में उन्हीं दलित पीडि़तों के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की एक रैली में शामिल होने की संभावना जतायी जा रही है. जबकि उक्त घटना के विरोध में जो प्रदर्शन हुये थे उसमें आरएसएस भी निशाने पर थी.

रणनीतिकार हालांकि इसे भाजपा की एक बड़ी जीत बता रहे हैं. भाजपा ने हाल के दिनों में पार्टी के हिंदुत्व दर्शन राजनीति के विरोधी तीन बड़े दलित नेता रामदास अठावले, रामबिलास पासवान और उदित राज को भाजपा के संग कर लिया था. इसके बाद संघ और भाजपा की तरफ से उना के दलित पीडि़तों को अपने खेमे में लाना पूरी तरह से यह दर्शाता है कि संघ और भाजपा दलित आंदोलन को दबाने के लिये राजनीतिक प्रलोभन और दबाव दोनों का ही सहारा ले रही है.


इसके बाद भी भाजपा की हिंदुत्व विचारधारा के लाखों काडर स्वयंसेवकों को गौरक्षा के नाम पर फिर से इस तरह के उत्पात मचाने की छूट तो मिल ही जायेगी, क्योंकि संघ-भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी इस तरह के घटनाओं का अपने हित में पटाक्षेप करने लगा है. टीओआई की एक खबर के मुताबिक दलित नेता जिग्नेश मेवानी भी इस खबर पर अपना दुख जता चुके हैं.

Jan 29, 2016

मुसलमानों का नंबर होने के कारण बताया आइएसआइएस का एजेंट, संघ के कार्यालय में बनाया बंधक

लखनऊ 29 जनवरी 2016। रिहाई मंच ने संघ के गुण्ड़ों द्वारा मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पर शोध कर रहे छात्र अनिल यादव को जबरन संघ कार्यालय में बंधक बनाने की घटना को संघ द्वारा अपने घिनौने कृत्यों को छुपाने का एक और हिंसक उदाहरण बताया। मंच ने शोधार्थी अनिल यादव की सुरक्षा की गारंटी की मांग करते हुए इस पूरी घटना में संघ से जुड़े नीरज शर्मा, रामवीर सिंह, आशुतोष और अनुभव शर्मा समेत अन्य लोगों पर कार्यवाई की मांग की। मंच ने मुजफ्फरनगर आरएसएस कार्यालय को आतंकी कारवाईयों का सेंटर बताया।

रिहाई मंच प्रवक्ता राजीव यादव ने बताया कि गिरि विकास संस्थान लखनऊ के पोजेक्ट रिसर्च एसोसिएट अनिल यादव जो की मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पर शोध के लिए मुजफ्फरनगर गए थे को 27 जनवरी को रात 8 बजे से 10 बजे तक मुजफ्फरनगर अंसारी रोड स्थित आरएसएस कार्यालय में बंधक बनाकर रखा गया। जहां आपराधिक तरीके से आरएसएस के लोग 3 घंटे तक अनिल को अपने कार्यालय मे बंदकर पूछताछ करते रहे और आईएसआई का एजेंट बोलकर जान से मारने की धमकी देते रहे। उन्होंने बताया कि अनिल के बार-बार बताने के बावजूद की मैं रिसर्चर हूं के बाद भी लाठी डंडे दिखाकर जान से माने की धमकी देते रहे।

इस दौरान अनिल का फोन भी ले लिया और उसमें डायल नंबरों के बारे में यह पूछा गया कि किस आतंकवादी का नंबर है। इतने मुल्लाओं का नंबर तुम्हारे पर कैसे है। परिचय पत्र दिखाने के बाद भी मुसलमान कहकर प्रताडि़त करते रहे और आईएसआई, आईएसआईएस का एजेंट कहकर गांलियां देते रहे। घंटों प्रताड़ना के बाद मोबाइल वापस किया। मंच के प्रवक्ता ने बताया कि इस पूरी घटना में संघ से जुड़े नीरज शर्मा, रामवीर सिंह, आशुतोष और अनुभव शर्मा समेत दो और लोग शामिल थे।

रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने गिरि विकास संस्थान लखनऊ के पोजेक्ट रिसर्च एसोसिएट अनिल यादव को बंधक बनाने की घटना को अकादमिक जगत के शोधों पर आरएसएस का हमला बताया। उन्होंने कहा कि रोहित वेमुला, दाभोलकर, पंसारे को मार देने या फिर मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित संदीप पाण्डेय को बीएचयू से और मोदी गो बैक का नारा लगाने वालों को बीबीएयू से निकालने और अब अनिल यादव को बंधक बनाने से सवालों को नहीं दबाया जा सकता। जो लोग कहते हैं कि देश में असहिष्णुता नहीं है उन्हें अनिल यादव से पूछना चाहिए की मुसलमान का नंबर रखने भर से जो उनके साथ किया गया उससे उनपर क्या गुजरी। जो यह सोचने पर विवस करता है कि मुसलमान होना कितना गुनाह हो गया है।

रिहाई मंच के अध्यक्ष ने कहा कि जिस तरह से देश की राजधानी के करीब गाजियाबाद के डासना में पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदू स्वाभिमान संगठन के लोग मुसलमानों के खिलाफ भड़काकर पिस्तौल, राइफल, बंदूक जैसे हथियार चलाने का प्रशिक्षण आठ-आठ साल के हिंदू बच्चों को दे रहे हैं उस पर खुफिया-सुरक्षा एजेंसियां और सरकार क्यों चुप है। आखिर इस संगठन के प्रमुख नसिहांनंद मुसलमानों और हिंदुओ की बीच युद्ध में पश्चिम उत्तर प्रदेश को आतंक की एक प्रयोगशाला बना रहे हैं उनके खिलाफ सपा सरकार सिर्फ इसलिए चुप है कि स्वामीजी उर्फ दीपक त्यागी कभी सपा के यूथ विंग के प्रमुख सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने कहा की ठीक इसी प्रकार मुजफ्फरनगर साप्रदायिक हिंसा के दोषी संगीत सोम सपा से चुनाव तक लड़ चुके हैं।
मुलायम सिंह को जो यह अफसोस हो रहा है कि उन्होंने बाबरी मस्जिद के सवाल पर गोली चलवा दी उन्हें और उन जैसे नेताओं को इस बात पर भी अफसोस होना चाहिए कि उन जैसे लोगों की छद्म धर्म निरपेक्षता के चलते हिंदुत्वादी संगठन कैसे छोटे-छोटे बच्चों को आतंकवादी बना रहे हैं और वह चुप हैं। जिस तरह से आतंकी हिंदू स्वाभिमान संगठन के महासचिव राज्य स्तरीय पहलवान अनिल यादव कहते हैं कि पहलवानों को योजनाबद्ध तरीके से कट्रपंथ की शिक्षा के जरिए तैयार कर सड़कों पर खुला छोड़ दिया जाए तो बड़ा हंगामा कर सकते हैं। ऐसे में यह हिंदू समाज के लिए भी सोचने का वक्त है कि एक अनिल यादव जो अपने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की वजह से प्रताडि़त होता है उसके साथ उसे खड़ा होना है या फिर वो जो इनके बच्चों को हिंदू स्वाभिमान के नाम पर आतंकी बना रहे हैं उनके साथ।

मुहम्मद शुऐब ने कहा कि अकादमी जगत के लोगों पर हो रहे हमले यह साफ करते है कि संघ तार्किक विचारों से कितना डरता है। उन्होंने कहा कि यह हमला देश के लोकतांत्रिक ढांचे को तहस-नहस करने का है इसे कत्तई बर्दास्त नहीं किया जाएगा।