Jun 30, 2017

पहली बार हिंदी की राजनीतिक कविता सोशल मीडिया पर वायरल

इससे पहले सेक्स, प्रेम और समाज के दमित तबकों के व्यक्तिगत अनुभवों पर लिखी कविताएं सोशल मीडिया पर वायरल होती रही हैं, मगर यह पहली बार है कि राजनीतिक कविता सोशल मीडिया पर वायरल हुई है। वरिष्ठ कवि मदन कश्यप की लिखी कविता 'क्योंकि वह जुनैद था' हाल ही में दिल्ली से पलवल जाती ट्रेन में मारे गए जुनैद पर आधारित है। साम्प्रदायिक कारणों से हुई जुनैद की हत्या का मसला इतना बड़ा हो गया है कि प्रधानमंत्री तक को इस पर बयान देना पड़ा है और देशभर में लोग गौरक्षकों की गुंडागर्दी के खिलाफ लामबंद होने लगे हैं। ऐसे में इस कविता का वायरल होना बताता है कि समाज में हिंदूवादी कट्टरपंथ के खिलाफ लोग व्यापक स्तर पर खड़े हो रहे हैं।
ट्रेन में मारे गए जुनैद की मां

क्योंकि वह जुनैद था
मदन कश्यप, वरिष्ठ कवि और लेखक
चलती ट्रेन के खचाखच भरे डिब्बे में
चाकुओं से गोद-गोद कर मार दिया गया
क्योंकि वह जुनैद था
झगड़ा भले ही हुआ बैठने की जगह के लिए
लेकिन वह मारा गया
क्योंकि वह जुनैद था
न उसके पास कोई गाय थी
न ही फ़्रिज में माँस का कोई टुकड़ा
फिर भी मारा गया क्योंकि वह जुनैद था
सारे तमाशबीन डरे हुए नहीं थे
लेकिन चुप सब थे क्योंकि वह जुनैद था
डेढ़ करोड़ लोगों की रोजी छिन गयी थी
पर लोग नौकरी नहीं जुनैद को तलाश रहे थे
जितने नये नोट छापने पर खर्च हुए
उतने का भी काला धन नहीं आया था
पर लोग गुम हो गये पैसे नहीं 
जुनैद को खोज रहे थे
सबको समझा दिया गया था
बस तुम जुनैद को मारो
नौकरी नहीं मिली जुनैद को मारो
खाना नहीं खाया जुनैद को मारो
वायदा झूठा निकला जुनैद को मारो
माल्या भाग गया जुनैद को मारो
अडाणी ने शांतिग्राम बसाया जुनैद को मारो
जुनैद को मारो
जुनैद को मारो
सारी समस्याओं का रामबान समाधान था
जुनैद को मारो
ज्ञान के सारे दरवाजों को बंद करने पर भी
जब मनुष्य का विवेक नहीं मरा
तो उन्होंने उन्माद के दरवाजे को और चौड़ा किया 
जुनैद को मारो!!
ईद की ख़रीदारी कर हँसी-ख़ुशी घर लौट रहा
पंद्रह साल का एक बच्चा 
कितना आसान शिकार था
चाकुओं से गोद-गोद कर धीरे-धीरे मारा गया
शायद हत्यारों को भी गुमान न था
कि वे ही पहुँचाएंगे मिशन को अंजाम तक
कि इतनीआसानी से मारा जाएगा जुनैद
चाकू मारने के हार्डवर्क से पराजित हो गया
अंततः मनुष्यता का हावर्ड

अश्लील नहीं, खूबसूरत है ये बॉडी

इन तस्वीरों में अश्लीलता नहीं, बल्कि स्पोर्ट्स स्पिरिट झलकती है....

'बॉडी इश्यू में छपी खिलाड़ियों की नग्न तस्वीरों के जरिए एथलीटों की कड़ी मेहनत, अनुशासन और फोकस को प्रदर्शित करना हमारा मकसद है। पत्रिका के बॉडी इश्यू में अपने चाहने वाले खिलाड़ियों की खूबसूरत तस्वीरों को देखकर इनके चाहने वाले खुश होंगे। इन तस्वीरों में अश्लीलता नहीं, बल्कि स्पोर्ट्स स्पिरिट झलकती है।' ये कहना है दुनियाभर में स्पोर्टस की बेहतरीन पत्रिकाओं में शुमार ईएसपीएन का।
ईएसपीएन का इस बार का वार्षिक बॉडी अंक जुलाई में आयेगा। 2017 के बॉडी इश्यू वार्षिकांक के लिए टेनिस स्टार कैरोलीन वोज़्नियाकी ने फोटोशूट करवाया है। मिक्सड मार्शल आर्ट्रस खिलाड़ी वाटरसन भी इस अंक में अपनी विशेष अंदाज में नजर आएंगी। वह कहती भी हैं, मुझे अपने शरीर पर गर्व है, और अपने खूबसूरत शरीर को बॉडी मैगजीन के लिए फोटोशूट करवाना मुझे अच्छा लगा। इन खिलाड़ियों के अलावा विभिन्न खेलों के अनेक खिलाड़ियों ने अपने निर्वस्त्र फोटोशूट इस अंक के लिए करवाये हैं।
गौरतलब है कि ईएसपीएन की बॉडी मैगजीन के लिए अब तक दुनियाभर के मशहूर एथलीट न्यूड और सेमी न्यूड फोटोशूट करवा चुके हैं। इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें खेल जगत के हर क्षेत्र के खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। जिनमें नाथन एड्रियन, जेक अर्रिटा, एंटोनियो ब्राउन, एम्मा कोबर्न, कोर्टनी कोनॉग्यू, ऐलेना डेल डोन, रयान डन्जेगी, एडलाइन ग्रे, ग्रेग लौगनीस, कॉनर मैकग्रेगर, वॉन मिलर, क्रिस मॉसियर, नजिंगा प्रेस्कोड, क्रिस्टन प्रेस, अप्रैल रॉस, अलिसा सेली, क्लाएरा शील्ड्स, विन्स विल्फोर्क समेत न जाने कितने दिग्गज एथलीटों के नाम शामिल हैं।
स्विट्जरलैंड के टेनिस स्टार स्टानिस्लास वावरिंका और अमेरिकी महिला फुटबॉल खिलाड़ी अली क्रीगर भी स्पोर्ट्स चैनल ईएसपीएन की मैग्जीन ‘द बॉडी’ के 2015 के अंक के लिए न्यूड फोटोशूट करवा चुके हैं। पत्रिका के लिए क्रीगर ने न्यूड अवस्था में सुनहरी गेंद पैरों के नीचे दबाये हुए पोज दिया था।
2015 में अमेरिकी बास्केटबॉल खिलाड़ी केविन वीजली लव, डिआंद्रे जॉर्डन, अमेरिकी जिमनास्ट एली रेजमैन, स्विमर नताली, अमेरिकी हेप्टएथलीट कैंट मैकमिलन समेत 24 एथलीटों ने पत्रिका के लिए न्यूड फोटोशूट करवाया था। टेनिस स्टार ईएसपीएन के इस वार्षिकांक के लिए अमेरिकी स्टार वीनस विलियम्स और टॉमस बर्डिख भी न्यूड फोटोशूट करवा चुके हैं।
स्पोर्टस चैनल की मैगजीन ईएसपीएन ने आर्थिक संकट से उबरने के लिए 2009 में बॉडी मैगजीन शुरू करने की योजना बनाई थी। 2009 में टेनिस सुपरस्टार सेरेना विलियम्स की कवर फोटो वाला 'बॉडी इश्यू' जब प्रकाशित होकर आया तो इसने खेल प्रेमियों के बीच तहलका मचा दिया था।
खिलाड़ियों की जब नग्न फोटोशूट को लेकर कई बार आलोचना का सामना करना पड़ा, तो वे कहते हैं कि बॉडी मैगजीन ने न्यूड फोटोशूट को अलग पहचान दी है और इसे जिस तरीके से लोगों के सामने पेश किया जा रहा है, उससे नग्न काया के प्रति लोगों की धारणा को बदलने का काम भी किया है।
जहां तक खिलाड़ियों की निर्वस्त्र फोटोशूट का सवाल है तो टेनिस की दिग्गज खिलाड़ी गर्भवती सेरेना विलियम्स ने भी एक दूसरी पत्रिका वेनिटी फेयर के मुखपृष्ठ के लिए निर्वस्त्र फोटोशूट करवाया है। इस बारे में सेरेना विलियम्स कहती हैं, मेरी देह छवि नकारात्मक है,' मगर इस बात को दरकिनार कर उन्होंने फोटोशूट करवाया है। साथ ही वह महिलाओं को यह संदेश देना नहीं भूलतीं कि, मैं महिलाओं को यह बताना चाहती हूँ कि यह ठीक है, आपकी काया जैसी भी हो, आप आंतरिक और बाहरी रूप से खूबसूरत हो सकते हैं।

नोट कर लीजिए नोटबंदी जैसा ही बेमतलब साबित होगा जीएसटी

जीएसटी लागू करने के पीछे आम उपभोक्ता को राहत पहुँचाने की मंशा उतनी नहीं है जितना बड़े कारोबारियों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट घरानों का दबाव.....

पीयूष पंत, वरिष्ठ पत्रकार 
आज रात बारह बजते ही प्रधानमंत्री मोदी संसद भवन के सेन्ट्रल हाल में घंटा बजवाएंगे और एक ऐप के माध्यम से देश के अब तक के सबसे बड़े कर सम्बन्धी सुधार का आगाज़ करेंगे। पूरे देश में समान कर व्यवस्था को लागू करने वाले जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर को भारतीय अर्थव्यवस्था और धंधा करने के तरीके में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाले कदम के रूप में पेश किया जा रहा है।

ये कितना क्रांतिकारी होगा यह तो आगामी वर्षों (दिनों में नहीं) में ही पता चलेगा, लेकिन जितने गाजे-बाजे के साथ इसकी शुरुआत की जा रही है उसके पीछे छिपा राजनीतिक मन्तव्य साफ़ नज़र आ रहा है। नोटबंदी की ही तरह जीएसटी को भी प्रधानमंत्री मोदी का एक ऐतिहासिक और साहसी निर्णय बताया जा रहा है।
कोशिश एक बार फिर मोदी की छवि को चमकाने की ही हो रही है। नोटबंदी के समय उत्तर प्रदेश का चुनाव सामने था और अब गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश के चुनाव और 2019 का आम चुनाव सामने हैं। सच्चाई तो ये है कि जीएसटी का निर्णय अकेले मोदी का निर्णय नहीं है। जीएसटी लाने की कवायद तो 2003 से ही चालू है और विभिन्न सरकारों के कार्यकाल के दौरान इसे लाये जाने के प्रयास और घोषणाएं होती रही हैं, फिर चाहे वो वाजपेयी की एनडीए सरकार हो या मनमोहन सिंह की दोनों यूपीए सरकारें।
यह भी आम जानकारी है कि इस नई कर व्यवस्था को लागू करने के पीछे आम उपभोक्ता को राहत पहुँचाने की मंशा उतनी नहीं है जितना कि बड़े कारोबारियों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट घरानों का दबाव।
चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा उठाये गए हर एक महत्वपूर्ण कदम को अपने प्रशस्ति गान में तब्दील करवा लेने में महारथ रखते हैं, इसीलिये मूलतः विज्ञान भवन में संपन्न होने वाले इस कार्यक्रम के स्थल को बदलवा कर उन्होंने इसे संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में स्थानांतरित करवा दिया, ताकि कार्यक्रम के साथ-साथ मोदी को भी अतिरिक्त महत्व मिल सके।
गौरतलब है कि संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में अभी तक केवल तीन कार्यक्रम हुए हैं. जब देश आजाद हुआ तब उस आजादी का उत्सव मनाया गया था। फिर 1972 में जब आजादी की सिल्वर जुबली मनाई गई थी। इसके बाद 1997 में आजादी की गोल्डन जुबली पर आधी रात को कार्यक्रम हुआ था। निसंदेह उन तीनों महान आयोजनों की तुलना कर व्यवस्था में सुधार की योजना से नहीं की जा सकती है। कांग्रेस पार्टी की भी यही आपत्ति है।
कुछ लोग इसे मोदी की नासमझी कह सकते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि यह सब सप्रयास किया जा रहा है। दरअसल मोदी खुद को भारत का सबसे सफ़ल और लोकप्रिय प्रधानमंत्री साबित करने पर तुले हैं। यही कारण है कि वे अक्सर भारत के प्रथम व लोकप्रिय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समकक्ष खड़ा होने की जद्दोजहद में दिखाई देते हैं, बल्कि उनकी नक़ल करने की असफल कोशिश करते हुए भी दिखते हैं।
कोई ताज्जुब नहीं होगा कि आज आधी रात प्रधानमंत्री मोदी संसद से सम्बोधन करते हुए पंडित नेहरू के आज़ादी के बाद दिए गए 'ट्रिस्ट विथ डेस्टनी' वाले भाषण की नक़ल उतारते नज़र आएं। आपको शायद याद हो कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जी ने नेहरू स्टाइल में एक-दो बार अपने कोट की जेब में गुलाब का फूल लगाने का प्रयास किया था, लेकिन बाद में उन्हें कोट की जेब में कमल का फूल कढ़वा कर ही काम चलाना पड़ा।
इसी तरह अक्सर मोदी देश विदेश में बच्चों को दुलारने का विशेष ध्यान रखते हैं ताकि केवल पंडित नेहरू को ही बच्चों के चाचा के रूप में न याद किया जाय। वैसे प्रधानमंत्री मोदी की ये खूबी तो है कि वे सफल लोगों की खूबियों को आत्मसात करने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं।
आपको याद होगा कि 2014 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के जुमले 'येस वी कैन' का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते दिखाई दिए थे। याद रहे कि किसी भी प्रधानमंत्री की लोकप्रियता और सफलता इतिहास खुद दर्ज़ करता है, न कि प्यादे और चाटुकार।
जहां तक जीएसटी से होने वाले फायदे की बात है तो वो तो कई वर्षों बाद ही पता चल पायेगा। फिलहाल तो स्तिथि लखनऊ की भूलभुलैय्या जैसी है। हर कोई इसके नफे- नुक़सान को समझने की कोशिश कर रहा है। खुद सरकार के वित्त मंत्री जेटली और शहरी विकास मंत्री वेंकैय्या नायडू यह कह चुके हैं कि जीएसटी के फायदे दीर्घ काल में ही पता चलेंगे, अल्पकाल में तो इससे महंगाई बढ़ने और जीडीपी कम होने की ही संभावना है।
यानी मोदी जी जब तक अति प्रचारित आपके इस कदम से अर्थव्यवस्था को फायदे मिलने शुरू होंगे तब तक छोटे और मझोले व्यापारी कुछ उसी तरह दम तोड़ चुके होंगे जैसे नोटबंदी के बाद छोटे और मझोले किसान।
खबर है कि कल मोदी जी जीएसटी को लेकर दिल्ली में एक रैली निकालेंगे। उम्मीद है अब आपको मेरी बात समझ में आ रही होगी।

Jun 27, 2017

मोदी की तारीफ में एक शब्द नहीं बोले अमेरिकी राष्ट्रपति



मोदी की अमेरिका यात्रा पर पढ़िये पूर्व आईपीएस वीएन राय का लेख, जिन्होंने भारत के कई प्रधानमंत्रियों के साथ अमेरिका यात्रा की है। संयोग से अब की वह प्रधानमंत्री की यात्रा में तो नहीं पर अमेरिका में मौजूद थे...

मोदी के अमेरिका पहुँचने पर हवाई अड्डे पर उनके स्वागत के लिए बमुश्किल एक मेयर का पहुंचना बताता है कि अमेरिका में हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी की क्या कद्र और कितना महत्व है। भारत में मोदी के चाहने वालों के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं है, क्योंकि चाहने वालों को सरकार पोषित मीडिया ने बता रखा है कि मोदी की अमेरिका में धाकड़ छवि है
पर यहां सबकुछ उल्टा देखने को ही मिला। बड़ी बात तो यह है कि अमेरिका के वाशिंगटन स्थित व्हाइट हाउस में भारतीय प्रधानमंत्री मोदी का पारम्परिक रूप से लॉन पर मीडिया के सामने रस्मी स्वागत करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने मोदी की व्यक्तिगत तारीफ में एक शब्द भी नहीं कहा।
इससे जाहिर होता है कि मोदी को ट्रम्प ने कोई भाव नहीं दिया, जबकि मोदी की ट्रम्प से पहली मुलाकात थी। पहली मुलाकात में यह रवैया आश्चर्य में डालने वाला है। यह आश्चर्य इसलिए भी है कि सरकार पोषित मीडिया ने देश को बहुप्रचारित स्तर पर बता रखा है कि मोदी की पूछ अमेरिकी शासकों में दूसरे किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के मुकाबले बहुत ज्यादा है।
जानकारों को पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी, नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की तारीफ में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपतियों के कसीदे याद हैं। ओबामा ने तो मनमोहन सिंह को विश्व के श्रेष्ठतम अर्थशास्त्रियों में शामिल बताया था। यह वही मनमोहन सिंह हैं जिनकी छवि भारतीय समाज में अब एक मौनी बाबा की बना के रख दी गयी है।
ऐसे 'मौनी बाबा' के मुकाबले मोदी का स्वागत टांय-टांय फिस्स होना, मोदी की वैश्विक छवि पर एक सवालिया निशान खड़ा करता है?
हालांकि कुछ का कहना है कि जिस ट्रम्प को बस अपनी तारीफ़ की ही आदत है, वह मोदी की तारीफ कैसे करता? एक अन्य विचार है कि मोदी में तारीफ लायक है भी क्या? कुछ भी हो, इसी ट्रम्प ने इसी व्हाइट हाउस लॉन पर कुछ ही दिन पहले रूमानिया जैसे अदने से देश के राष्ट्रपति की तारीफ़ के बिंदु भी ढूंढ लिए थे।
मोदी का व्यक्तिगत अपमान इसलिए भी हुए चुभने वाला हो जाता है कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत ने अमेरिकी युद्ध इंडस्ट्री से रिकार्ड तोड़ युद्ध का सामान खरीद कर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को जम कर सहारा दिया है।
भारत ने 2009 में अमेरिका से 200 मिलियन डॉलर की जंगी खरीद, 2016 में नौ बिलियन डॉलर तक पहुँच गयी है। स्वयं ट्रम्प ने अपने स्वागत भाषण में इसक जिक्र किया, विशेषकर भारत द्वारा 100 जहाज खरीदने के समझौते का।
दूसरे शब्दों में, जो पैसा देश के विकास में लगाना चाहिए था, वह अमेरिकी रोजगारों को पैदा करने में मोदी सरकार लगा रही है। जबकि इसके बदले में अमेरिका कोई ऐसा आश्वासन भी नहीं दे रहा कि भारतीय कंप्यूटर प्रोफेशनल पर आ रहे प्रतिबंध कुछ ढीले किये जाएंगे। नारायण मूर्ति की इनफ़ोसिस पर तो अभी-अभी एक भारी भरकम जुर्माना भी ठोका गया है।
हालाँकि ट्रम्प ने भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अवश्य कहा, और यह भी कि दोनों देशों के संविधान के पहले तीन शब्द एक समान 'वी द पीपल' हैं। शायद लोकतंत्र की इस कसौटी पर जोर देने के बाद ट्रम्प को लगा हो कि इस सन्दर्भ में मोदी का अपना ट्रैक रिकॉर्ड इस योग्य नहीं कि उनकी तारीफ की जा सके। उन्होंने सरकारी काम-काज में मोदी सरकार के भ्रष्टाचार विरोधी दावों का जिक्र अवश्य किया, शायद इसलिए की अमेरिकी कंपनियों को भारत में घूस देने से छूट मिल जाय।
भारत में बिका हुआ मीडिया मोदी की अमेरिका यात्रा को जैसा भी बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहा हो, अमेरिकी मीडिया में बहुत कम और वह भी नेगेटिव बातें ही आ रही हैं। भारतीय दूतावास ने डॉलर शक्ति से एक दोयम श्रेणी के अख़बार में मोदी के हस्ताक्षरों का लेख छपवाया, जिसकी अमेरिकी मीडिया में कोई चर्चा नहीं हुयी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के 'इकनॉमिस्ट' ने लिखा है कि मोदी की शोहरत पूंजीपतियों को धड़ाधड़ जमीन दिलाने की तो है पर व्यापक औद्योगिक विज़न की नहीं।
ट्रम्प के हाथों मोदी की उपेक्षा, ट्रम्प की जीत पर दीवाली मनाने वाले मोदी भक्तों को निराश तो करेगी ही।

मनुस्मृति से ज्यादा अन्यायपूर्ण शास्त्र ​खोजना कठिन

कहा जाता है कि मनुस्मृति हिंदुओं का आधार है--उनके सारे कानून,समाज-व्यवस्था का
ओशो, विश्वप्रसिद्ध भारतीय चिंतक और दार्शनिक

अगर एक ब्राह्मण एक शूद्र की लड़की को भगाकर ले जाये तो कुछ भी पाप नहीं है। यह तो सौभाग्य है शूद्र की लड़की का। लेकिन अगर एक शूद्र, ब्राह्मण की लड़की को भगाकर ले जाये तो महापाप है। और हत्या से कम, इस शूद्र की हत्या से कम दंड नहीं। यह न्याय है! और इसको हजारों साल तक लोगों ने माना है।
जरूर मनाने वाले ने बड़ी कुशलता की होगी। कुशलता इतनी गहरी रही होगी, जितनी कि फिर दुनिया में पृथ्वी पर दुबारा कहीं नहीं हुई। ब्राह्मणों ने जैसी व्यवस्था निर्मित की भारत में, ऐसी व्यवस्था पृथ्वी पर कहीं कोई निर्मित नहीं कर पाया, क्योंकि ब्राह्मणों से ज्यादा बुद्धिमान आदमी खोजने कठिन हैं। बुद्धिमानी उनकी परंपरागत वसीयत थी।
इसलिये ब्राह्मण शूद्रों को पढ़ने नहीं देते थे क्योंकि तुमने पढ़ा कि बगावत आई।
स्त्रियों को पढ़ने की मनाही रखी क्योंकि स्त्रियों ने पढ़ा कि बगावत आई।

स्त्रियों को ब्राह्मणों ने समझा रखा था, पति परमात्मा है। लेकिन पत्नी परमात्मा नहीं है! यह किस भांति का प्रेम का ढंग है?कैसा ढांचा है? इसलिये पति मर जाये तो पत्नी को सती होना चाहिये, तो ही वह पतिव्रता थी।
लेकिन कोई शास्त्र नहीं कहता कि पत्नी मर जाये तो पति को उसके साथ मर जाना चाहिये, तो ही वहपत्नीव्रती था। ना, इसका कोई सवाल ही नहीं।
पुरुष के लिये शास्त्र कहता है कि जैसे ही पत्नी मर जाये,जल्दी से दूसरी व्यवस्था विवाह की करें।
उसमें देर न करें। लेकिन स्त्री के लिये विवाह की व्यवस्था नहीं है। इसलिये करोड़ों स्त्रियां या तो जल गईं और या विधवा रहकर उन्होंने जीवन भर कष्ट पाया। और यह बड़े मजे की बात है, एक स्त्री विधवा रहे, पुरुष तो कोई विधुर रहे नहीं; क्योंकि कोई शास्त्र में नियम नहीं है उसके विधुर रहने का।
तो भी विधवा स्त्री सम्मानित नहीं थी, अपमानित थी। होना तो चाहिये सम्मान, क्योंकि अपने पति के मर जाने के बाद उसने अपने जीवन की सारी वासना पति के साथ समाप्त कर दी। और वह संन्यासी की तरह जी रही है। लेकिन वह सम्मानित नहीं थी। घर में अगर कोई उत्सव-पर्व हो तो विधवा को बैठने का हक नहीं था। विवाह हो तो विधवा आगे नहीं आ सकती।
बड़े मजे की बात है; कि जैसे विधवा ने ही पति को मार डाला है! इसका पाप उसके ऊपर है। जब पत्नी मरे तो पाप पति पर नहीं है, लेकिन पति मरे तो पाप पत्नी पर है! अरबों स्त्रियों को यह बात समझा दी गई और उन्होंने मान लिया। लेकिन मानने में एक तरकीब रखनी जरूरी थी कि जिसका भी शोषण करना हो, उसे अनुभव से गुजरने देना खतरनाक है और शिक्षित नहीं होना चाहिये। इसलिये शूद्रों को,स्त्रियों को शिक्षा का कोई अधिकार नहीं।
तुलसी जैसे विचारशील आदमी ने कहा है कि 'शूद्र, पशु, नारी,ये सब ताड़न के अधकारी।' इनको अच्छी तरह दंड देना चाहिये। इनको जितना सताओ, उतना ही ठीक रहते हैं।
'शूद्र, ढोल, पशु,नारी...' ढोल का भी उसी के साथ--जैसे ढोल को जितना पीटो,उतना ही अच्छा बजता है; ऐसे जितना ही उनको पीटो, जितना ही उनको सताओ उतने ही ये ठीक रहते हैं। यही धारा थी। इनको शिक्षित मत करो, इनके मन में बुद्धि न आये, विचार न उठे। अन्यथा विचार आया, बगावत आई। शिक्षा आई, विद्रोह आया।
विद्रोह का अर्थ क्या है? विद्रोह का अर्थ है, कि अब तुम जिसका शोषण करते हो उसके पास भी उतनी ही बुद्धि है, जितनी तुम्हारे पास। इसलिये उसे वंचित रखो।

गन्ना की कीमतें नहीं बढ़ाएंगे योगी, कहा दाम बढ़ाने से मिल मालिकों की टूटती है कमर

जनज्वार, लखनऊ। आपातकाल के 42 साल पूरे होने के मौके कल 25 जून को देश के कई हिस्सों में जब बहुतेरे राजनीतिज्ञ आपातकाल के काले दिनों को याद कर रहे थे, तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ के आम महोत्सव में अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे।

लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में लगे आम महोत्सव का दर्शन लाभ लेते हुए मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि हमारे राज्य में अच्छे आमों की उत्पादकता और बढ़ाई जानी चाहिए। उन्होंने यूपी से आमों के कम निर्यात पर भी चिंता जाहिर की। उन्होंने कई मंत्रियों की गरिमामयी उपस्थिति के बीच महाराष्ट्र के अल्फांसो आम का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे आमों का अभी निर्यात बढ़ाना यानी बहुराष्ट्रीयकरण होना बाकि है।
योगी ने इसी बीच किसानों के प्रति सरोकार जाहिर करते हुए कहा कि गन्ने की कीमत बढ़ाने से मिल मालिकों की कमर टूट जाती है, इसलिए सरकार गन्ने की कीमत बढ़ाने की बजाय किसानों के फसल की उत्पादकता 3 से 4 गुना बढ़ाने पर जोर देगी। योगी के मुताबिक गन्ने की कीमतें बढ़ाना समस्या का समाधान नहीं है।
हालांकि योगी ने अपनी बातों में यह नहीं बताया कि उत्पादकता में 3 से 4 गुना बढ़ोतरी का रहस्य कैसे पूरा होगा? कौन सा बीज, खाद, पानी और नस्लें यह राष्ट्रवादी सरकार किसानों को उपलब्ध कराएगी जिससे किसान एकाएक उत्पादन बढ़ा लेंगे।
गन्ना का कटोरा कहे जाने वाले लखीमपुर खीरी के सपा उपाध्यक्ष क्रांति कुमार सिंह कहते हैं, 'योगी सरकार मिल मालिकों की गोद में बैठकर किसानों को पुचकारने का नाटक कर रही है। सरकार केवल गन्ना के बदले निकलने वाली चीनी की कीमत के आधार पर मिल मालिकों का मुनाफा देखती है पर उससे निकलने वाला सीरा जिससे शराब बनती है, चेपुआ जिससे कागज और बिजनी बनती है, अगर इस मुनाफे को जोड़ दिया जाए तो पता चलेगा कि किसकी कमर टूट रही है और किसका पेट खाली रह जा रहा है।'
अलबत्ता योगी यह बताना नहीं भूले कि प्रदेश सरकार का खजाना खाली होने के बावजूद उनकी सरकार ने किसानों के लिए 36 हजार करोड़ रुपए कि कर्जमाफी की घोषणा की, जिसको मीडिया ने इस रूप में प्रचारित किया था कि किसानों की कर्जमाफी हो गयी है।
जबकि असलियत खुद मुख्यमंत्री जानते हैं कि किसानों की कर्जमाफी की घोषणा के 3 महीने बाद भी बजट का 1 रुपया सरकार ने बैंकों को जारी नहीं किया है और न ही अब तक किसी किसान का एक टका भी माफ हुआ है।
रही बात गन्ना किसानों की चिंता की तो चुनाव में ही भाजपा ने वादा किया था कि किसानों का बकाया 14 दिनों में दे दिया जाएगा, जबकि अभी 30 फीसदी किसानों को सरकार भुगतान नहीं करा सकी है। इसके अलावा सपा सरकार में भाजपा ने कहा था, हमारी सरकार आएगी तब हम गन्ना से कीमत 306 और 315 की बजाए कम से कम 350 कर देंगे।
पर अब सरकार बनने के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ किसानों को समृद्धि और विकास की नयी परिभाषा समझाने लगे हैं। उन्हें अब किसानों के पेट की नहीं पूंजीपतियों की कमर की चिंता सताने लगी है।
और योगी ने आम महोत्सव में दशहरी का स्वाद लेते हुए दो टूक गन्ना किसानों को बता दिया है कि वह गन्ना की कीमतों को नहीं बढ़ाने वाले  हैं।

आखिर आपातकाल की संभावनाओं से इनकार क्यों नहीं कर पाए आडवाणी

देश में बढ़ती हिंसा और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग की बढ़ती खबरों के बीच फिर से एक बार यह बहस चल पड़ी है कि देश क्या अघोषित आपातकाल की नाकाबंदी के दौर में ढकेला जा रहा है...
वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन का विश्लेषण
कल की रात 25 जून, 1975 आजाद भारत के इतिहास की वह तारीख है जब तत्कालीन हुकूमत ने देश में आपातकाल लागू कर लोकतंत्र और नागरिक आजादी को बंधक बना लिया था। पूरे बयालीस साल हो गए हैं उस दौर को, लेकिन उसकी काली यादें अब भी लोगों के जेहन में अक्सर ताजा हो उठती हैं। उन यादों को जिंदा रखने का काफी कुछ श्रेय उन लोगों को जाता है जो आज देश की हुकूमत चला रहे हैं। उनका अंदाज-ए-हुकूमत लोगों में आशंका पैदा करता रहता है कि देश एक बार फिर आपातकाल की ओर बढ रहा है।

दो साल पहले आपातकाल के चार दशक पूरे होने के मौके पर उस पूरे कालखंड को शिद्दत से याद करते हुए भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी देश में फिर से आपातकाल जैसे हालात पैदा होने का अंदेशा जताया था।
आडवाणी ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में देश को आगाह किया था कि लोकतंत्र को कुचलने में सक्षम ताकतें आज पहले से अधिक ताकतवर है और पूरे विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि आपातकाल जैसी घटना फिर दोहराई नहीं जा सकतीं। बकौल आडवाणी, 'भारत का राजनीतिक तंत्र अभी भी आपातकाल की घटना के मायने पूरी तरह से समझ नहीं सका है और मैं इस बात की संभावना से इनकार नहीं करता कि भविष्य में भी इसी तरह से आपातकालीन परिस्थितियां पैदा कर नागरिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है।
आज मीडिया पहले से अधिक सतर्क है, लेकिन क्या वह लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध भी है? कहा नहीं जा सकता। सिविल सोसायटी ने भी जो उम्मीदें जगाई थीं, उन्हें वह पूरी नहीं कर सकी हैं। लोकतंत्र के सुचारु संचालन में जिन संस्थाओं की भूमिका होती है, आज भारत में उनमें से केवल न्यायपालिका को ही अन्य संस्थाओं से अधिक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।' 

आपातकाल कैसा था और उसके मायने क्या हैं? दरअसल यह उस पीढी को नहीं मालूम जो सत्तर के दशक में या उसके बाद पैदा हुई है और आज या तो जवान है या प्रौढ हो चुकी है। लेकिन उस पीढी को यह जानना जरूरी है और उसे जानना ही चाहिए कि आपातकाल क्या था?
साठ और सत्तर के दशक में विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं खासकर समाजवादियों के बीच सरकार विरोधी दो नारे खूब प्रचलित थे। एक था- 'लाठी-गोली-सेंट्रल जेल, जालिमों का अंतिम खेल' और दूसरा था- 'दम है कितना दमन में तेरे, देखा है और देखेंगे-कितनी ऊंची जेल तुम्हारी, देखी है और देखेंगे।' दोनों ही नारे आपातकाल के दौर में खूब चरितार्थ हुए। विपक्षी दलों के तमाम नेता-कार्यकर्ता, सरकार से असहमति रखने वाले बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार, पत्रकार आदि जेलों में ठूंस दिए गए थे। यही नहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की रीति-नीति का विरोध करने वाले सत्तारूढ़ कांग्रेस के भी कुछ दिग्गज नेता जेल के सींखचों के पीछे भेज दिए गए थे।
दरअसल, बिहार और गुजरात के छात्र आंदोलनों ने इंदिरा गांधी की हुकूमत की चूलें हिला दी थीं और उसी दौरान समाजवादी नेता राजनारायण की चुनाव याचिका पर आए इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले ने आग में घी काम किया था। इसी सबसे घबराकर इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए देश पर आपातकाल थोपा था। इंदिरा गांधी इतनी सशंकित और भयाक्रांत हो चुकी थी कि आपातकाल लागू करने से कुछ घंटे पहले ही उन्होंने अपने विश्वस्त और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर रे से मंत्रणा के दौरान आशंका जताई थी कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की 'हेट लिस्ट' में हैं और कहीं ऐसा तो नहीं कि निक्सन उनकी सरकार का भी उसी तरह तख्ता पलट करवा दे, जैसा कि उन्होंने चिली के राष्ट्रपति सल्वादोर अलेंदे का किया है।
उन्हें इस बात की भी शंका थी कि उनके मंत्रिमंडल में शामिल कुछ लोग सीआईए के एजेंट हो सकते हैं। उनके शक और डर का आलम यह था कि उन्होंने उस समय के उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बंगले पर भी जासूसी के लिए आईबी का डीएसपी रैंक का अधिकारी तैनात कर दिया था।
आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। अभिव्यक्ति का ही नहीं, लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं रह गया। 25 जून की रात से ही देश भर में विपक्षी नेताओं-कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का दौर शुरू हो गया। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरणसिंह, मधु लिमए, अटलबिहारी वाजपेयी, बीजू पटनायक, लालकृष्ण आडवाणी, मधु दंडवते आदि तमाम विपक्षी नेता मीसा यानी आंतरिक सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर लिए। जो लोग पुलिस से बचकर भूमिगत हो गए, पुलिस ने उनके परिजनों को परेशान करना शुरू कर दिया। किसी के पिता को, तो किसी की पत्नी या भाई को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी का आधार तैयार करने के लिए तरह-तरह के मनगढ़ंत और अविश्सनीय हास्यास्पद आरोप लगाए गए।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रघुवंश को रेल की पटरियां उखाड़ने का आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया। जबकि हकीकत यह थी कि उनके दोनों हाथ भी ठीक से काम नहीं करते थे। इसी तरह मध्य प्रदेश के एक बुजुर्ग समाजवादी कार्यकर्ता पर आरोप लगाया गया कि वे टेलीफोन के खंभे पर चढ़कर तार काट रहे थे। प्रख्यात कवयित्री महादेवी वर्मा को उनकी लिखी बहुत पुरानी एक कविता का मनमाना अर्थ लगाकर गिरफ्तार करने की तैयारी इलाहबाद के जिला प्रशासन ने कर ली थी। लेकिन जब श्रीमती गांधी को उनके करीबी एक पत्रकार ने यह जानकारी देने के साथ ही याद दिलाया कि महादेवी जी पंडित नेहरू को अपने भाई समान मानती थीं, तब कहीं जाकर श्रीमती गांधी के हस्तक्षेप से उनकी गिरफ्तारी रुकी। 

बात गिरफ्तारी तक ही सीमित नहीं थी, जेलों में बंद कार्यकर्ताओं को तरह-तरह से शारीरिक और मानसिक यातनाएं देने का सिलसिला भी शुरू हो गया। कहीं-कहीं तो निर्वस्त्र कर पिटाई करने, पेशाब पिलाने, उन्हें खूंखार अपराधी और मानसिक रुप से विक्षिप्त कैदियों के साथ रखने और उनकी बैरकों सांप-बिच्छू और पागल कुत्ते छोड़ने जैसे हथकंडे भी अपनाए गए। ऐसी ही यातनाओं के परिणामस्वरुप कई लोगों की जेलों में ही मौत हो गई, तो कई लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हो गए।
सोशलिस्ट पार्टी की कार्यकर्ता रहीं कन्नड़ फिल्मों की अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी का नाम ऐसे ही लोगों में शुमार है, जिनकी मौत जेल में हो गई थी। समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडिस आपातकाल की घोषणा होते ही भूमिगत हो गए थे और उन्होंने अपने कुछ अन्य भूमिगत सहयोगियों की मदद से तानाशाही का मुकाबला करने का कार्यक्रम बनाया था। सरकार उनके इस अभियान को लेकर बुरी तरह आतंकित थी, लिहाजा जार्ज की गिरफ्तारी के लिए दबाव बनाने के मकसद से उनके भाई लॉरेंस और माइकल फर्नांडिस को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उनसे जार्ज का सुराग लगाने के लिए उन्हें जेल में बुरी तरह से यातनाएं दी गईं।
कई मीसा बंदियों ने अपने-अपने राज्यों के हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी, लेकिन सभी स्थानों पर सरकार ने एक जैसा जवाब दिया कि आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निलंबित है और इसलिए किसी भी बंदी को ऐसी याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है। जिन हाईकोर्टों ने सरकारी आपत्ति को रद्द करते हुए याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय दिए, सरकार ने उनके विरुद्ध न केवल सुप्रीम कोर्ट में अपील की बल्कि उसने इन याचिकाओं के पक्ष में फैसला देने वाले न्यायाधीशों को दंडित भी किया।
असुरक्षा बोध से बुरी तरह ग्रस्त श्रीमती गांधी को उस दौर में अगर सर्वाधिक विश्वास किसी पर था तो वह थे उनके छोटे बेटे संजय गांधी। संविधानेत्तर सत्ता केंद्र के तौर उभरे संजय गांधी आपातकाल के पूरे दौर में सरकारी आतंक के पर्याय बन गए थे। सबसे पहले उन्होंने दिल्ली को सुंदर बनाने का बीड़ा उठाया। इस सिलसिले में उनके बदमिजाज आवारा दोस्तों की सलाह पर दिल्ली को सुंदर बनाने के नाम पर लालकिला और जामा मस्जिद के नजदीक तुर्कमान गेट के आसपास की बस्तियों को बुलडोजरों की मदद से उजाड़ दिया गया, जिससे बड़ी तादाद में लोग बेघर हो गए। कुछ लोगों ने प्रतिरोध करने की कोशिश की तो उन्हें गोलियों से भून दिया गया।
अपनी प्रगतिशील छवि बनाने के लिए संजय गांधी ने उस दौर में इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय कार्यक्रम से इतर पांच सूत्रीय कार्यक्रम पेश किया था, जिसके प्रचार-प्रसार में पूरी सरकारी मशीनरी झोंक दी गई थी। उस बहुचर्चित पांच सूत्रीय कार्यक्रम में सबसे ज्यादा जोर परिवार नियोजन पर था। इस कार्यक्रम पर अमल के लिए पुरुषों और महिलाओं की नसबंदी के लिए पूरा सरकारी अमला झोंक दिया गया था अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए जिला कलेक्टरों और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों पर ज्यादा से ज्यादा लोगों की नसबंदी करने का ऐसा जुनून सवार हुआ कि वे पुलिस की मदद से रात में गांव के गांव घिरवाकर लोगों की बलात नसबंदी कराने लगे। आंकड़े बढ़ाने की होड़ के चलते इस सिलसिले में बूढ़ों-बच्चों, अविवाहित युवक-युवतियों तक की जबरन नसबंदी करा दी गई। सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई थी, लेकिन कहीं से भी प्रतिरोध की कोई आवाज नहीं उठ रही थी।
उस कालखंड की ऐसी हजारों दारुण कथाएं हैं। कुल मिलाकर उस दौर में हर तरफ आतंक, अत्याचार और दमन का बोलबाला था। सर्वाधिक परेशानी का सामना उन परिवारों की महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को करना पड़ा, जिनके घर के कमाने वाले सदस्य बगैर किसी अपराध के जेलों मे ठूंस दिए गए थे। आखिरकार पूरे 21 महीने बाद जब चुनाव हुए तो जनता ने अपने मताधिकार के जरिए इस तानाशाही के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से ऐतिहासिक बगावत की और देश को आपातकाल के अभिशाप से मुक्ति मिली। लेकिन उन 21 महीनों में जो जख्म देश के लोकतंत्र को मिले उनमें से कई जख्म आज भी हरे हैं।
यह सच है कि आपातकाल के बाद से अब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था तो चली आ रही है। हालांकि सरकारों की जनविरोधी विरोधी नीतियों के प्रतिरोध का दमन करने की प्रवृत्ति अभी भी कायम है, लेकिन किसी भी सरकार ने नागरिक अधिकारों के हनन का वैसा दुस्साहस नहीं किया है, जैसा आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी और उनकी सरकार ने किया था।

'फखरूद्दीन' जैसा राष्ट्रपति चाहते हैं मोदी, जिसमें न कैबिनेट का हो झामा न अधिका​रियों का हस्तक्षेप

25 जून 1975 को देश पर आपातकाल थोपने वाली कांग्रेसी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दूसरे रूप माने जाने वाले मोदी कई मामलों में उनकी राह पर आगे बढ़ रहे हैं....

संविधान के नियमों को ताक पर रख इमरजेंसी लगाने के लिए इंदिरा ने एक ऐसे रबर स्टांप राष्ट्रपति फखरूद्दीन अहमद का इस्तेमाल किया था, जो देश पर बेवजह आपातकाल थोपते वक्त राष्ट्रपति कम, प्रधानमंत्री के भक्त अधिक नजर आए थे। मोदी के समक्ष सार्वजनिक तस्वीरों में झुके नजर आ रहे आगामी राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार रामनाथ कोविंद को देख विश्लेषकों और राजनीतिक टिप्पणीकारों की आम समझदारी बन रही है कि आने वाले समय में मोदी के लिए कोविंद, 'फखरूद्दीन' साबित होंगे।
आपातकाल की पूर्व संध्या पर पढ़िए, समकालीन तीसरी दुनिया के जून 2011 अंक से राष्ट्रपति के नाम प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का अत्यंत गोपनीय पत्र जो राष्ट्रपति कार्यालय की फाइल में मिला था। यह गोपनीय पत्र और शाह आयोग की रिपोर्ट आपको समझने में मदद देगी कि कहीं मोदी के नेतृत्व में चल रही राजनीति और देश को आतापकाल के काले रास्तों की ओर तो नहीं ले जाया जा रहा है?
आदरणीय राष्ट्रपति जी,
जैसा कि कुछ देर पहले आपको बताया गया है कि हमारे पास जो सूचना आयी है उससे संकेत मिलता है कि आंतरिक गड़बड़ी की वजह से भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है। यह मामला बेहद जरूरी है। 
मैं निश्चय ही इस मसले को कैबिनेट के समक्ष ले जाती लेकिन दुर्भाग्यवश यह आज रात में संभव नहीं है। इसलिए मैं आप से इस बात की अनुमति चाहती हूं कि भारत सरकार (कार्य संपादन) अधिनियम 1961 संशोधित नियम 12 के अंतर्गत कैबिनेट तक मामले को ले जाने की व्यवस्था से छूट मिल जाय। सुबह होते ही कल मैं इस मामले को सबसे पहले कैबिनेट में ले जाऊंगी। 
इन परिस्थितियों में और अगर आप इससे संतुष्ट हों तो धारा 352-1 के अंतर्गत एक घोषणा किया जाना बहुत जरूरी हो गया है। मैं उस घोषणा का मसौदा आपके पास भेज रही हूं। जैसा कि आपको पता है धरा-353 (3) के अंतर्गत इस तरह के खतरे के संभावित रूप लेने की स्थिति में, जिसका मैंने उल्लेख किया है, धारा-352 (1) के अंतर्गत आवश्यक घोषणा जारी की जा सकती है। 
मैं इस बात की संस्तुति करती हूं कि यह घोषणा आज रात में ही की जानी चाहिए भले ही कितनी भी देर क्यों न हो गयी हो और इस बात की सारी व्यवस्था की जाएगी कि इसे जितनी जल्दी संभव हो सार्वजनिक किया जाएगा। 
आदर सहित
भवदीय
(इंदिरा गांधी)
प्रधानमंत्री, भारत सरकार 
नयी दिल्ली, 25 जून 1975
राष्ट्रपति अहमद द्वारा आपातकाल की घोषणा
संविधान के अनुच्छेद 352 के खंड 1 के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए मैं, फखरूद्दीन अली अहमद, भारत का राष्ट्रपति इस घोषणा के जरिए ऐलान करता हूँ कि गंभीर संकट की स्थिति पैदा हो गयी है जिसमें आंतरिक गड़बड़ी की वजह से भारत की सुरक्षा के सामने खतरा पैदा हो गया है। 
नयी दिल्ली, राष्ट्रपति / 25 जून 1975
कैबिनेट से कोई सलाह नहीं, खुफिया विभाग का खुला दुरुपयोग किया था इंदिरा ने 
कैबिनेट सचिव बी.डी. पांडेय को 25-26 जून की रात में लगभग साढ़े चार बजे प्रधानमंत्री निवास से फोन आया जिसमें कहा गया कि सवेरे छह बजे मंत्रिमंडल की एक बैठक होनी है। उन्हें इस बात की हैरानी थी कि 25 और 26 की रात में इतने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी का आदेश किसने और कैसे जारी किया। सामान्य तौर पर इस तरह के सभी निर्देश गृहमंत्रालय के जरिए जारी होते थे और उनके संचार के अपने चैनल थे। 
बी.डी.पांडेय के अनुसार 26 जनवरी 1975 से पहले कैबिनेट की किसी भी बैठक में इसका जिक्र नहीं हुआ था कि देश के हालात इस कदर खराब हो गए हैं कि इमरजेंसी लगाने की जरूरत पड़ रही है। 
इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर आत्मा जयराम ने अपने बयान में बताया कि देश में इमरजेंसी लगा दी गयी है। इसकी जानकारी उन्हें 26 जून को अपने दफ्तर जाने के बाद ही हुई। 
भारत सरकार के गृह सचिव एस.एल.खुराना को इसकी जानकारी 26 जून को सवेरे छह बजे उस समय हुई जब उन्हें कैबिनेट मीटिंग की सूचना मिली। वह लगभग साढ़े छह बजे पहुंचे तो उन्होंने देखा कि कैबिनेट की बैठक चल रही थी। 
पूर्व कानून और न्यायमंत्री एच.आर.गोखले को इमरजेंसी लगने की जानकारी पहली बार तब हुई जब 26 जून 1975 को सबेरे वह मंत्रिमंडल की बैठक में भाग लेने पहुंचे। आपातकाल की घोषणा के बारे में न तो उनसे और न उनके मंत्रालय से किसी तरह का सलाह मशविरा किया गया। 
शाह कमीशन की रिपोर्ट ने पाया कि भारत में उस समय कहीं भी ऐसी कोई असाधारण स्थिति नहीं पैदा हुई थी जिसकी वजह से सामाजिक, आर्थिक अथवा कानून की ऐसी समस्या पैदा हुई हो जो आंतरिक इमरजेंसी की घोषणा के लिए बाध्य करे। सरकारी दस्तावेजों से आयोग ने निम्नांकित तथ्यों को जुटाया, 
1. आर्थिक मोर्चे पर किसी भी तरह का खतरा नहीं था। 
2. कानून और व्यवस्था के बारे में हर पखवाड़े आने वाली रपटों से पता चलता है कि सारे देश में स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में थी। 
3. इमरजेंसी की घोषणा से एकदम पहले की अवधि पर ध्यान दें तो राज्य सरकारों की ओर से गृहमंत्रालय को कोई भी ऐसी रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई थी जिसमें कानून और व्यवस्था के बिगड़ने का संकेत मिलता हो। 
4. आंतरिक इमरजेंसी लगाने के सिलसिले में 25 जून 1975 से पूर्व गृहमंत्रालय ने किसी भी तरह की योजना नहीं तैयार की थी। 
5. इंटेलिजेंस ब्यूरो ने 12 जून 1975 से लेकर 25 जून 1975 के बीच की अवधि की कोई भी ऐसी रिपोर्ट गृहमंत्रालय को नहीं दी थी जिससे यह आभास हो कि देश की आंतरिक स्थिति इमरजेंसी लगाने की मांग करती है। 
6. गृहमंत्रालय ने प्रधानमंत्री के पास ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं दी जिसमें उसने देश की आंतरिक स्थिति पर चिंता प्रकट की हो। 
7. गृह सचिव, कैबिनेट सचिव और प्रधानमंत्री के सचिव जैसे वरिष्ठ अधिकारियों को इमरजेंसी की घोषणा के मुद्दे पर विश्वास में नहीं लिया गया लेकिन प्रधानमंत्री के तत्कालीन अतिरिक्त निजी सचिव आर.के.धवन शुरू से ही इमरजेंसी की घोषणा की तैयारियों में लगे रहे। 
8. गृहमंत्री ब्रह्मानंद रेड्डी की बजाय गृह राज्यमंत्री ओम मेहता को काफी पहले से इस मुद्दे पर विश्वास में लिया गया। केवल कुछ मुख्यमंत्रियों और दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर को इमरजेंसी लगाने के बारे में विश्वास में लिया गया। 
9. दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर और हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री द्वारा आंतरिक आपातकाल के अंतर्गत संभावित कार्रवाई की अग्रिम जानकारी दी गयी लेकिन इस तरह की कोई अग्रिम जानकारी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, जम्मू कश्मीर, त्रिपुरा, उड़ीसा, केरल, मेघालय और केन्द्र शासित प्रदेशों की सरकारों को नहीं दी गयी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने बताया कि आपातकाल की घोषणा के बारे में उनको 26 जून की सुबह उस समय जानकारी मिली जब वह केंद्रीय मंत्रियों उमाशंकर दीक्षित और केशव देव मालवीय के साथ नाश्ते की मेज पर थे और इस खबर से उन लोगों को भी उतनी ही हैरानी हुई। 
इमरजेंसी का आदेश गृहमंत्रालय से और मंत्रिमंडल सचिवालय के जरिए आना चाहिए 
जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति को भेजे गए अपने ‘अत्यंत गोपनीय’ पत्र में बताया था कि भारत सरकार (कार्य निष्पादन) अधिनियम 1961 के नियम 12 के अंतर्गत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने इस निर्णय की सूचना कैबिनेट को नहीं दी है और वह इसका उल्लेख सुबह होते ही सबसे पहले कैबिनेट में करेंगी।
शाह आयोग की सिफारिशें 
खुफिया विभाग का दुरुपयोग
आयोग ने सिफारिश की कि इस बात की पूरी सावधानी बरती जाय और हर तरह के उपाय किए जाएं ताकि खुफिया विभाग को सरकार अथवा सरकार में शामिल किसी व्यक्ति द्वारा अपने निजी हित के लिए राजनीतिक जासूसी के उपकरण के रूप में इस्तेमाल न किया जा सके। इस मुद्दे पर अगर जरूरी हो तो सार्वजनिक बहस चलायी जाए।

Jun 23, 2017

डीएसपी को मार डाला युवाओं की उन्मादी भीड़ ने


डीएसपी की हत्या के आद आखिरी यात्रा में हजारों वह कश्मीरी नहीं गए जो आतंकियों के जनाजों में जाते हैं। मुख्यमंत्री तक नहीं गयीं। स्थानीय पत्रकारों ने किनारा कसा। केवल वर्दी पहने चंद अधिकारी शामिल हुए...
जनज्वार, दिल्ली। श्रीनगर के नोहट्टा इलाके में 22 जून की रात उन्मादी भीड़ ने जिस अनजान की शख्स को मार—मार के मौत के घाट उतार दिया था, उसकी पहचान एक पुलिस अधिकारी के रूप में हुई है। पुलिस अधिकारी डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को उन्मादी भीड़ द्वारा उस वक्त मार डाला गया जब वह नोहट्टा इलाके में जामिया मस्जिद के पास ड्यूटी पर तैनात थे।
वारदात के वक्त जामिया मस्जिद में शब-ए-क़दर की प्रार्थना चल रही थी और उस समय मस्जिद में कश्मीर के अलगाववादी नेता मीरवाइज फारूक जामिया मस्जिद में मौजूद थे। मस्जिद वारदात से मात्र 3 सौ मीटर की दूरी पर है।
कश्मीर रीडर में छपी खबर में प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से कहा गया है कि युवाओं के समूह ने नोहट्टा में जामिया मस्जिद के बाहर ड्यूटी पर तैनात डीआईएसपी अयूब पंडित को पकड़ा और उन्हें पीटने लगा। हाथापाई के दौरान डीवाईएसपी ने अपने बचाव में गोलियां चलाई, जिसमें तीन युवा घायल हो गए। डीवाईएसपी के गोली चलाए जाने से वहशी युवाओं की भीड़ और बौखला गयी, उनकी पिस्तौल छीन ली और उन्होंने पुलिस अधिकारी को मार—मार के मौत के घाट उतार दिया।
पुलिस अधिकारी अयूब पंडित की गोली से घायल हुए युवाओं की पहचान दानिश मीर, मुदासिर अहमद और सजाद अहमद भट्ट के रूप में हुई है, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
कश्मीर मामलों के जानकार और खुद कश्मीरी आतंकवाद के भुक्तभोगी रहे पत्रकार और लेखक राहुल पंडिता कहते हैं, 'आखिर क्या मिला मोहम्मद अयूब पंडित को। उन्मादी भीड़ ने मार डाला उस अधिकारी को जो भारत के संविधान और उसके झंडे की रखवाली कर रहा था।'
वह आगे पूछते हैं, 'उसकी आखिरी यात्रा में हजारों वह कश्मीरी नहीं गए तो आतंकियों के जनाजों में जाते हैं। मुख्यमंत्री तक नहीं गयीं। स्थानीय पत्रकारों ने किनारा कसा। केवल वर्दी पहने चंद अधिकारी शामिल हुए।'
यह सवाल बड़ा है क्योंकि भारतीय आर्मी के मुखिया जनरल रावत लगातार सैन्य तरीकों से कश्मीर समस्या के समाधान की ओर ताकत से बढ़ रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि आम नौजवानों में आतंकियों के लिए बढ़ते प्रेम को कैसे खत्म किया जाएगा?
क्या गोलियों में इतनी ताकत है कि समझ और बुद्धि से वहशी होती किशोरों—युवाओं की भीड़ को नियतंत्रित किया जा सके ???

छात्र संघ के सवाल पर शिक्षा मंत्री का यू—टर्न

धन सिंह रावत ने जब देखा कि उनका बयान छात्रों के गले नहीं उतरा तो वह अपने बयान से पलटी मार गये.....
जनज्वार, देहरादून। 'उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव कराये जाने की पद्धति को बदला जायेगा और यहां भाषण प्रतियोगिता के जरिये छात्र संघ नेताओं का चुनाव होगा।'

यह अजीबोगरीब बयान है उत्तराखंड के उच्च शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. धन सिंह रावत का। उनके इस बयान का यहां पुरजोर तरीके से विरोध हुआ, जिसके बाद वह अपने बयान से पलट गये और अपनी ही कही बात का खंडन करने लगे।
एक दैनिक में छपी खबर के अनुसार मंत्री धन सिंह ने कहा, 'सरकार ने निर्णय लिया है कि महाविद्यालय में छात्र संघ चुनाव में निर्वाचन के स्थान पर उम्मीदवार के छात्र-छात्राओं के सम्मुख 15 मिनट का भाषण होगा। भाषण के आधार पर ही छात्र संघ के पदाधिकारियों का चुनाव होगा।’
यह खबर जैसे ही सामने आयी राज्य में हर तरफ मंत्री रावत के इस बयान का पुरजोर विरोध होने लगा। हल्द्वानी में एनएसयूआई नेता हर्षित जोशी के नेतृत्व में डॉ. रावत का पुतला फूंका गया। हर्षित ने कहा कि उच्च शिक्षा मंत्री अपनी तानाशाही थोप रहे हैं।
जब मंत्री रावत ने देखा कि उनका बयान उनके गले की फांस बनता जा रहा है, तो उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने बयान का खंडन किया। हालांकि जानकारों का कहना है कि मंत्री ने जब देखा कि उनका बयान छात्रों के गले नहीं उतरा है तो वह अपने बयान से पलटी मार गये हैं।
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सवा सौ करोड़ की आबादी में सिर्फ 40 लाख लोगों की पहुंच महंगे सिनेमा हालों तक

याद नहीं पड़ता कि पिछली ऐसी कौन—सी फिल्म थी, जिसने बिना भारी भरकम मार्केटिंग के बस अपनी कहानी के दम पर दर्शकों को सिनेमा की खिड़की की तरफ खींचा हो। महीनों उस फिल्म की गली—मोहल्लों, स्कूल—कॉलेजों में चर्चा रही हो.....
तैश पोठवारी

पिछले एक दशक में सिनेमा उद्योग में बहुत भारी अंतर आया है। एक तरफ सस्ते परम्परागत सिनेमाहाल जहां देश की आम मेहनतकश जनता फ़िल्में देखने जाती थी, टूटकर माल या ब्रांडेड मल्टीप्लेक्स सिनेमा हाल में बदल गया, वहीँ दूसरी तरफ आम आदमी व उसका जीवन सिनेमा की कहानी से पूरी तरह गायब हो गया और हर फिल्म की कहानी धनाढ्य युवा वर्ग की अराजक जीवनशैली के इर्द गिर्द घूमने लगी।
फिल्म का कथानक मैनेजमेंट और मार्केटिंग विशेषज्ञ तय करते हैं कि कैसे एक निश्चित वर्ग को टारगेट करके बस 2—4 दिन के लिए सिनेमा तक खींच लिया जाएं। कुछ एक अपवाद को छोड़कर याद नहीं पड़ता कि पिछली ऐसी कौन—सी फिल्म थी, जिसने बिना भारी भरकम मार्केटिंग के बस अपनी कहानी के दम पर दर्शकों को सिनेमा की खिड़की की तरफ खींचा हो। महीनों उस फिल्म की गली—मोहल्लों, स्कूल—कॉलेजों में चर्चा रही हो।
हो भी कैसे सिनेमा के बाजार के लिए देश की 80 फीसदी जनता जो 250 रुपए का टिकट नहीं खरीद सकती, न बाजार उसे अपना ग्राहक मानता है और न ही उसके लिए सिनेमा बनाता है। आजकल फिल्म के सुपरहिट होने का मतलब उसकी आम जनता में लोकप्रियता नहीं, बल्कि मल्टीप्लेक्स में हुआ कलेक्शन है।
अगर किसी फिल्म का टिकट 250 रुपए है और 125 करोड़ की आबादी वाले देश में सिर्फ 40 लाख लोग ही सिनेमा में किसी फिल्म को देखते हैं, तो उसका कलेक्शन 100 करोड़ हो जाता है। उस पर कई फिल्म निर्माता फिल्मों के टिकट इससे कहीं ज्यादा दुगने, तिगुने दामों पर भी रखने लगे हैं।
देश के उच्च मध्यम वर्ग को सिनेमा तक खींचने के लिए भारी भरकम मार्केटिंग की जाती है। मीडिया खरीदा जाता है। उसके नायक—नायिकाएं टीवी के तमाम लोकप्रिय कार्यक्रमों में जा पहुंचते हैं।
औपनिवेशिक संस्कृति के खुमार में डूबे तमाम युवा रिपोर्टर बिना फिल्म देखे फिल्म की रिलीज से पहले एक ऐसा कृत्रिम माहौल तैयार करते हैं कि दर्शक सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि चलो फिल्म को देख लिया जाए और दूसरे दिन ही पेड मीडिया जो सिनेमा के लिए एक सेल्समैन बन चुका है उसके कलेक्शन के रिकॉर्ड के साथ फिल्म के सुपरहिट होने की घोषणा कर देता है।
देश की बहुसंख्यक जनता को बाजार ने देखते ही देखते सिनेमा से बाहर कर दिया और भांड मीडिया इसकी आलोचना करने की बजाए उसका भोंपू बना हुआ है। फिल्मों का सिनेमाघरों में बस 2—4 दिन चलना और उस पर सिर्फ 2—4 लोगों का इसके निर्माण और वितरण पर अधिकार क्या यह दर्शकों का संकट है या सिनेमा का। न तो यह सिनेमा का संकट है, न ही दर्शकों का, असल में यह पूंजीवाद का संकट है। जहां फ़िल्में और हीरो हीरोइनें एक सीमित वर्ग के लिए खाली पड़े मल्टीप्लेक्स में बाजार में अन्य चीजों की तरह जबरदस्ती बिकने वाले प्रोडक्ट हैं।
भूमंडलीकरण के बाद हर देश में पूंजी का सकेंद्रीयकरण हुआ है और इस पूंजी ने सिनेमा के साथ हर छोटे बड़े व्यवसाय पर अपने ब्रांड के साथ एकाधिकार कर लिया है, जिसमें बड़े निवेश के साथ बने मल्टीप्लेक्स को मुनाफे में रखने के लिए बस एलीट सिनेमा बन रहा है, वहीँ फिल्म का अराजक, बाजारू खाओ—पियो ऐश करो का कथानक दिन—ब—दिन संकट में जा रहे कृत्रिम बाजार के लिए खरीदारी का माहौल तैयार कर रहा है।

रेल यात्राओं के भयंकर अनुभवों से अभिभूत एक रेल यात्री


पहले कोहरे में ट्रेनें लेट होती थीं, लेकिन अब ट्रेनें आमतौर पर लेट होने लगी हैं, मानो उनके ड्राईवर रास्तों में गाड़ियों को रोक देशद्रोह और देशप्रेम की खालिस बहसों में उलझ जाते हों...
तारकेश कुमार ओझा
अक्सर न्यूज चैनलों के पर्दे पर दिखाई देता है कि अपनी रेल यात्रियों के लिए रेलवे खास डिजाइन के कोच बनवा रही है, जिसमें फलां-फलां सुविधाएं होंगी। यह भी बताया जाता है कि जल्द ही ये कोच यात्रियों के सेवा में जुट जाएंगे। लेकिन हकीकत में तो ऐसे अत्याधुनिक कोचों से कभी सामना हुआ नहीं, अलबत्ता आम भारतीय की तरह रेल यात्रा का संयोग बन जाने पर साबका उसी रेलवे और ट्रेन से होता है जिसे चार दशक से देखता आ रहा हूं।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान बुलेट ट्रेन की बड़ी चर्चा थी। हालांकि मेरी दिलचस्पी कभी इस ट्रेन के प्रति नहीं रही। लेकिन मोदी सरकार में जब रेल मंत्री का दायित्व काफी सुलझे हुए माने जाने वाले सुरेश प्रभु को मिला तो विश्वास हो गया कि बुलेट ट्रेन मिले न मिले, लेकिन हम भारतीयों को अब ठीक—ठाक रेलवे तो जल्द मिल जाएगी, जिसके सहारे इंसानों की तरह यात्रा करते हुए अपने गंतव्य तक पहुंचना संभव हो सकेगा।
मगर पिछली कुछ रेल यात्राओं के अनुभवों के आधार पर इतना कह सकता हूं कि चंद महीनों में रेलवे की हालत बद से बदतर हुई है। उद्घोषणा के बावजूद ट्रेन का प्लेटफार्म पर न पहुंचना। पहुंच गई तो देर तक न खुलना। किसी छोटे से स्टेशन पर ट्रेन को खड़ी कर धड़ाधड़ मालगाड़ी या राजधानी और दूसरी एक्सप्रेस ट्रेनें पास कराना आदि समस्याएं पिछले कुछ महीनों में विकराल रुप धारण कर चुकी हैं। कहीं पूरी की पूरी खाली दौड़ती ट्रेन तो कहीं ट्रेन में चढ़ने के लिए मारामारी। यह तो काफी पुरानी बीमारी है रेलवे की। जो अब भी कायम है।
इसमें नयी बात यह है कि पहले ट्रेनें आमतौर पर जाड़ों यानी कुहासे के दिनों में लेट होती थीं पर जबसे सुरेश प्रभु मंत्री बने हैं तबसे चमकती धूप में ट्रेनों का 4 से 5 घंटा लेट होना आम बात हो गयी है। लेट होती ट्रेनों को देख ऐसा लगता है मानो उनके ड्राईवर रास्तों में गाड़ियों को रोक देशद्रोह और देशप्रेम की खालिस बहसों में उलझ जाते हों, क्योंकि देश तो आजकल इसी में उलझा हुआ है।
पिछले साल अगस्त में जबलपुर यात्रा का संयोग बना था। इस दौरान काफी जिल्लतें झेलनी पड़ीं। लौटते ही अपनी आपबीती रेल मंत्री से लेकर तमाम अधिकारियों को लिख भेजी। इसका कोई असर हुआ या नहीं, कहना मुश्किल है। क्योंकि किसी ने भी कार्रवाई तो दूर प्राप्ति स्वीकृति की सूचना तक नहीं दी। इस साल मार्च में होली के दौरान उत्तर प्रदेश जाने का अवसर मिला। संयोग से इसी दौरान प्रदेश में चुनावी बुखार चरम पर था। वाराणसी से इलाहाबाद जाने के लिए ट्रेन को करीब पांच घंटे इंतजार करना पड़ा।
वाराणसी से ही खुलने वाली कामायिनी एक्सप्रेस इस सीमित दूरी की यात्रा में करीब घंटेभर विलंबित हो गई। वापसी में भी कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ। प्लेटफार्मों पर किसी ट्रेन की बार-बार उद्घोषणा हो रही थी, तो कुछ ट्रेनों के मामलों में उद्घोषणा कक्ष की अजीब खामोशी थी। वापसी बीकानेर-कोलकाता साप्ताहिक सुपर फास्ट एक्सप्रेस से करनी थी, जो करीब पांच घंटे विलंब से प्लेटफार्म पर पहुंची।
इस बीच स्टेशन के प्लेटफार्म पर एक खाकी वर्दी जवान को नशे की हालत में उपद्रव करते देखा। जीआरपी के व्हाट्सअप पर इस आशय का संदेश दिया। लेकिन आज तक कोई जवाब नहीं मिला। मध्य रात्रि ट्रेन इलाहाबाद से रवाना तो हो गई, लेकिन इसे मुगलसराय पहुंचने में करीब पांच घंटे लग गए। बहरहाल ट्रेन हावड़ा पहुंचा तो खड़गपुर की अगली यात्रा के लिए फिर टिकट लेने काउंटर पहुंचा। यहां मौजूद एक बुकिंग क्लर्क ने सीधे-साधे बिहारी युवक को दिए गए रेल टिकट के एवज में 60 रुपए अधिक झटक लिए। युवक के काफी मिन्नत करने के बाद क्लर्क ने पैसे लौटाए।
वापसी के बाद अपने ही क्षेत्र में फिर छोटी यात्रा करने की नौबत आई। लेकिन पता चला कि दो घंटे की दूरी तय करने वाली ट्रेन इससे भी ज्यादा समय विलंब से चल रही है। न ट्रेन के आने का समय न चलने का। यात्री बताने लगे कि ट्रेन रवानगी स्टेशन से ही लेट छूटी है।
यह सब देख लगा कि क्या रेलवे में अब भी जवाबदेही नाम की कोई चीज है। क्योंकि यह सब तो चार दशक से देखता आ रहा हूं, फिर रेलवे में आखिर क्या बदला है। अंत में यही सोच कर संतोष कर लेना पड़ा कि इस देश में यदि सबसे सस्ता कुछ है तो वह आम नागरिकों का समय।
कुछ साल पहले केंद्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु चुनाव प्रचार के सिलसिले में मेरे शहर आए थे। अपने संभाषण में उन्होंने रेलवे की हालत पर गंभीर चिंता व्यक्त की। हाल की यात्राओं के अनुभव के मद्देनजर इतना कहा जा सकता है कि रेलवे की हालत वाकई चिंताजनक है।
(तारकेश कुमार ओझा पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
रेलवे भारत की सबसे बड़ी यात्री नेटवर्क है। आपके पास भी कोई अनुभव हो तो editorjanjwar@gmail पर मेल करें।

गोरखालैण्ड की मांग को नेपाल में स​मर्थन

गोरखा भारतीय सेना में आए दिन शहीद होकर भारत की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। ऐसे में गोरखाओं के खिलाफ प्रायोजित कुप्रचार बंद होना चाहिए...
जनज्वार, दिल्ली। दार्जिलिंग में पृथक गोरखालैण्ड की मांग को लेकर गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के अनिश्चितकालीन बंद का आज 11वां दिन है। क्षेत्र में आम जनजीवन अस्त-व्यस्त है। सरकार ने इंटरनेट सेवाओं को स्थगित कर दिया है। दवा दुकानों को छोड़कर अन्य सभी प्रकार की दुकानें, होटल और रेस्त्रां भी बंद हैं। अब तक इस आंदोलन में मरने वालों की संख्या तीन पहुंच चुकी है।

गोरखालैण्ड आंदोलन की आंच अब नेपाल में भी महसूस होने लगी है। नेपाल के विभिन्न दलों और संगठनों ने गोरखा लोगों के आंदोलन को समर्थन की घोषणा की है। साथ ही भारत में प्रवासी नेपालियों के बीच काम करने वाले संगठनों भी गोरखाओं के आंदोलन पर अपना समर्थन जता रहे हैं।
प्रवासी नेपाली जन समाज भारत के अध्यक्ष आजाद सेन थापा ने एक विज्ञप्ति जारी कर राज्य सरकार द्वारा आंदोलनकारियों के दमक की निंदा की है। गोरखा जनता पर जबरन बंगाली भाषा थोपे जाने का विरोध करते हुए थापा ने कहा है कि दार्जिलिंग में रहने वाले नेपाली भाषी लोग भारतीय नागरिक हैं और अपनी भाषायी पहचान और संस्कृति की रक्षा के लिए अलग राष्ट्र की मांग कर रहे है जो संविधान सम्मत है।
प्रवासी नेपालियों के एक दूसरे संगठन नेपाली एकता समाज भारत ने भी गोरखालैण्ड आंदोलन के प्रति अपने समर्थन की घोषणा की है। एकता समाज के अध्यक्ष आनंद थापा ने कहा है कि भाषा का अधिकारा नैसर्गिक है और दूसरी राष्ट्रीयताओं पर बलपूर्वक बहुसंख्यक समुदाय की भाषा और संस्कृति को थोपना लोकतंत्र की मान्यताओं के विपरीत बात है। आनंद थापा ने माग की है कि पश्चिम बंगाल को तुरत भाषा संबंधी अपने फैसले को वापस लेकर आंदोलनरत पक्ष के साथ वार्ता करनी चाहिए।
साथ ही आनंद थापा ने गोरखा जनता को आतंकवादी या उपद्रवी कह कर बदनाम करने को भी निंदनीय बताया और कहा गोरखा जनता ने पिछले 200 सालों से अपनी जान देकर इस देश की सीमाओं की रक्षा की है। आज भी दर्जिंलिंग, धर्मशाला, असम और अन्य स्थानों में रहने वाले गोरखा भारतीय सेना में आए दिन शहीद होकर भारत की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। ऐसे में गोरखाओं के खिलाफ प्रायोजित कुप्रचार बंद होना चाहिए।
उधर नेपाल में मोहन वैद्य किरण के नेतृत्व वाली नेपाल की कम्युनिष्ट पार्टी (क्रान्तिकारी माओवादी) ने गोरखालैण्ड आंदोलन का समर्थन किया है। काठमाण्डू से जारी एक विज्ञप्ति ने पार्टी के अध्यक्ष मोहन वैद्य किरण ने गोरखा आंदोलनकारियों पर पुलिस दमन की घोर निंदा की है। पार्टी ने पश्चिम बंगाल सरकार और केन्द्र सरकार से नेपाली भाषी भारतीय जनता की मांगों को संबोधित करने की अपील की है। साथ ही पार्टी ने आंदोलन के दौरान मरने वालों को शहीद घोषणा करने की भी मांग राज्य सरकार से की है।
इस बीच पुलिस ने हत्या और आपराधिक षड्यंत्र के आरोप में गोरखा जन मुक्ति मोर्चा अध्यक्ष बिमल गुरूंग के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। मोर्चा के तीन समर्थकों की मौत को लेकर ये आरोप लगाये गये हैं। गोरखा मुक्ति मोर्चा ने दावा किया है कि मोर्चा समर्थक पुलिस गोलीबारी में ही मारे गये थे, लेकिन राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने इस बात से इंकार किया है।
दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अनिश्चितकालीन बंद के कारण वहां के मशहूर चाय उद्योग के साथ चाय बागान मालिकों को भारी नुकसान हो रहा है। बंद के कारण दो लाख से ज्यादा बागानकर्मियों की जीविका पर बुरा असर पड़ा है।

Jun 22, 2017

एक क्लिक में जानिए आपके गांव में किस वर्ष किस मद में कितना हुआ खर्च

गौहत्या, दंगा—फसाद, हिंदू—मुसलमान, जाति—धर्म की नकारात्मक खबरों के बीच मोदी सरकार की इस महत्वपूर्ण पहल की की जानी चाहिए तारीफ, लेकिन कई ग्राम पंचायतों का डाटा अभी पूरी तरह नहीं है अपलोड.....


हर सरकार अपनी तमाम खामियों के बीच कुछ महत्वपूर्ण कर जाती है। पिछली मनमोहन सिंह की सरकार ने भी आरटीआई, खाद्य सुरक्षा और नरेगा जैसे कई महत्वपूर्ण काम किये थे। उसी कड़ी में मोदी सरकार ने भी विकास का पैसे का हिसाब जन-जन को देकर बहुत ही महत्वपूर्ण काम किया है। इसे आरटीआई का एक्सटेंशन भी कहा जा सकता है, क्योंकि एक आरटीआई से जानकारी लेने में महीनों से वर्षों लग जाते हैं, जबकि अब आप एक क्लिक से अपने गांव या ग्राम पंचायतों के खर्चों को आसानी से देख सकते हैं।
कहा जा रहा है कि भारत सरकार यह वेबसाइट http://www.planningonline.gov.in/ReportData.do?ReportMethod=getAnnualPlanReport भारत के हर नागरिक को अधिकार सम्पन्न बनाने का काम करेगी। इससे हर वोटर जान सकेगा कि उसके गांव में नाली, खड़ंजा, नल, सफाई, अस्पताल, स्कूल, बीमारी आदि जैसे किसी भी मद में कितना पैसा आया है। वह वेबसाइट क्लिक कर एक-एक डिटेल देख सकता है। अनुभव के लिए आप भी एक बार क्लिक कीजिए, आपको अद्भुत अनुभव होगा।
इस लिंक पर जाकर पहले आप योजना का साल और राज्य का नाम टाइप करें, फिर ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और ग्राम पंचायत में से किसी एक को क्लिक करें। अगर आप ग्राम पंचायत को क्लिक करेंगे तो, उसके बाद जिले पर क्लिक करें, जिला क्लिक करने के बाद, अपने ब्लॉक और ब्लॉक में अपने गांव का नाम देख क्लिक करेंगे तो आपको फिर ब्लॉक या विकास पंचायत और फिर अपने गांव पर क्लिक करके सरकार द्वारा कराये जा रहे विकास कार्यों के मद में मिले बजट को देख सकते हैं।
आपको लगेगा कि जिस अधिकार के लिए भारत की जनता 70 साल से संघर्षरत थी वह पहली बार जाकर हासिल हुआ है।
माना जा रहा है कि मोदी सरकार की यह पहल भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के काम आएगी और लोकतंत्र को मजबूत करेगी। यह जानकारी जनता के हाथ में वह हथियार है, जिसको सामने रख वोटर पूछ और मौके पर सबूत के तौर पर वेबसाइट के आंकड़े दिख सकेगा कि जो यह पैसा आया है, वह कहां खर्च हुआ है।

पतंजलि के 6 उत्पादों पर लगा प्रतिबंध, रामदेव नहीं कर पाए मीडिया मैनेज

मेडिकल जांच में फेल होने पर लगा प्रतिबंध, पहले भी 4 दवाएं हो चुकी हैं प्रतिबंधित। सवाल यह कि जो दवा नेपाल के लोगों के लिए नुकसानदायक, वह भारत में लाभदायक कैसे...

काठमांडू, जनज्वार। नेपाल सरकार ने मेडिकल जांच में गडबड़ी पाए जाने पर बाबा रामदेव और योगी बालकृष्ण के मालिकाने वाले पतंजलि के 6 उत्पादों को 21 जून से नेपाल में प्रतिबंधित कर दिया है। नेपाल के मीडिया के मुताबिक इससे पहले पतंजलि के 4 और उत्पाद माइक्रोबॉलॉजिकल जांच में असफल पाए जाने पर प्रतिबंधित हो चुके हैं।


ये सभी उत्पाद पतंजलि आयूर्वेद लिमिटेड और आयूर्वेदिक मेडिसिन कंपनी द्वारा नेपाल में उपलब्ध कराए जा रहे थे। पतंजलि के जिन उत्पादों को सरकार ने प्रतिबंधित किया है, वे हैं आमला चूर्ण, दिव्य गशर चूर्ण, बकूची चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, अश्वंगंधा चूर्ण और अदिवा चूर्ण।

नेपाल सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए जांच में अधिकारियों ने पाया कि दवा के तौर प्रचारित ये उत्पाद तय मानकों से बहुत अलग हैं और इनके इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। ये सभी उत्पाद माइक्रोबॉयलॉजिकल टेस्ट में फेल हुए हैं।

इसी के मद्देजनर कल 21 जून को प्रतिबंधित किए जाने बाद विभाग ने तत्काल उत्पादों को बाजार से वापस मंगाने का आदेश संबंधित अधिकारियों को दे दिया है।

पतंजलि के खिलाफ नेपाल सरकार ने यह कार्यवाही '1978 ड्रग एक्ट की धारा 14' के तहत किया है।

वहीं भारत में इन दवाओं की धूम मची हुई है। रामदेव इन दवाओं के प्रचार पर हर महीने करोड़ों रुपए विज्ञापन पर खर्च कर रहे हैं। मीडिया का बड़ा हिस्सा इनके सही—गलत दावों को खूब प्रचारित कर रहा है, क्योंकि विज्ञापन का दबाव है।

यही कारण है कि रामदेव के अपनी कंपनी के उत्पादों से संबंधित तमाम अविश्वनीय दावों पर भी मीडिया समवेत स्वर में कोई सवाल नहीं उठा पाता। भारत में वह मीडिया मैनेज कर लेते हैं।

भारत में हाल ही सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी से पता चला है कि आयूर्वेद के 40 फीसदी उत्पाद मानकों से नीचे हैं, जिसमें पतंजलि के उत्पाद भी है।

भारत में वर्ष 2013 से 2016 के बीच 82 आयूर्वेदिक उत्पादों की जांच हुई, जिसमें मानकों की जांच में 32 फेल हुए। फेल होने वालों में पतंजलि दिव्य आंवला जूस और शिवलिंगी बीज दोनों ही शामिल थे।

पर भारत में असल समस्या सरकार की है। सरकार योग गुरु रामदेव की अंधसमर्थन करती है। वह उनका इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में करती है, जबकि रामदेव अपने सही—गलत दावों पर सरकार का इस्तेमाल उसकी चुप्पी के रूप में करते हैं। खुद प्रधानमंत्री मोदी और पूरा मंत्रिमंडल रामदेव के योग, दवाओं और उनके आर्थिक उभार के आगे नमस्तक है।

ऐसे में सवाल ये है कि जो दवा नेपाल के लोगों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है, वह भारत के लोगों को स्वास्थ्य लाभ कैसे दे सकती है।

एक बार जांच की मांग तो की ही जानी चाहिए क्योंकि मुनाफे की हवस न किसी सरकार की वफादार होती है न जनता की।