May 31, 2017

पत्नी दलित है इसलिए आत्महत्या कर रहा हूं....

क्या वाकई हमारे समाज में जातीय अहं इतने भीतर तक समाया हुआ है कि इस तरह से सवर्ण होने के सामाजिक दंभ और अहसास में आई गिरावट से कोई ख़ुदकुशी भी कर सकता है.....

तैश पोठवारी

"मैं मनप्रीत सिंह बरार हूं। बिचौलिए गुरतेज सिंह बाबा के माध्यम से मेरी शादी तय हुई थी। मैं एक जट लड़का हूं और मेरे ससुर भी जट हैं, लेकिन उनकी पत्नी रामदासिया हैं... पहले मुझे और मेरे परिवार को बताया गया था कि वे (उनकी पत्नी और सास) भी जट हैं।"

मनप्रीत सिंह  बरार  की फाइल फोटो 
यह सुसाइड नोट है एक जट सिख लड़के का, जो सिर्फ इसलिए आत्महत्या कर लेता है, क्योंंकि उसकी पत्नी जट नहीं बल्कि दलित है। एक तरफ हमारी युवा पीढ़ी जहां जाति—पाति से उपर उठने की बात करती है, वहीं जाति की जड़ें उसमें कितनी गहरे तक पैठी हुई हैं उसका एक उदाहरण है पंजाब का यह जट सिख नौजवान। 22 वर्षीय मनप्रीत सिंह जिसकी हाल ही में शादी हुई थी, ने मात्र इसलिए जहरीला पदार्थ खा लिया, क्योंकि उसकी पत्नी जिसे उसने जट सिख समझा था वह दलित जाति से ताल्लुक रखती है।

यह घटना पंजाब के लहरिगागा स्थित खाई गांव की है। यह शादी एक बिचौलिये गुरतेज सिंह निवासी भुटाल कलां के माध्यम से ​हुई थी, जिसने 45000 हजार रुपए लेकर यह शादी करवाई थी। 22 वर्षीय मनप्रीत सिंह बरार की शादी 21 मई को संगरूर निवासी रेणु कौर से हुई थी। 

जैसे ही शादी के बाद मनप्रीत ने यह जाना कि उसकी सास रासदासिया है, और चूंकि उसने उस लड़की से शादी की है जो उसकी कोख से पैदा हुई है तो उसने आत्महत्या कर ली। क्योंकि पत्नी का एक रामदासिया के पेट से पैदा होने से उसके जातीय अहं को चोट पहुंची थी। हालांकि यहां भी सवाल उठता है कि जहां हमारा भारतीय समाज पितृसत्तात्मक है, और पिता के वंश से ही बच्चों की पहचान होती है तो रेणु दलित कैसे हो गयी। आखिर उसकी मां का पति जट सिख है। चाहे फिर उसका अतीत जो रहा हो। क्या वाकई हमारे समाज में जातीय अहं इतने भीतर तक समा चुका है कि इस तरह से सवर्ण होने के सामाजिक दंभ और अहसास में आई गिरावट से कोई ख़ुदकुशी भी कर सकता है। 

मृतक के पिता बघेल सिंह बेटे की मौत के बाद कहते हैं कि सारी गलती बिचौलिए की है, जिसने हमारे साथ धोखा किया। बिचौलिए ने यह कहकर और पैसे लेकर शादी करवाई थी कि रेणु कौर जटों की लड़की है, पर गरीब है। शादी के बाद जब मनप्रीत अपनी मां के साथ रेणु के घर फेरा पाने गया तब उसे पता चला कि वास्तव में रेणु की मां रामदासिया है। रेणु की मां अपने पति की मौत के बाद एक जट सिख के साथ अपने घर में रहती है। 

इसी से परेशान और दुखी मनप्रीत ने लहिरागागा वापिस आकर खेतों में जा सल्फास खाकर आत्महत्या कर ली। मरने से पहले लिखे पत्र में उसने व्यथित होकर लिखा भी है कि 45000 रुपए लेकर उसकी शादी यह कहकर करवाई थी कि वो जट सिख परिवार से है, जबकि हकीकत में वो रविदासी जाती की है, जिस वजह से वो आत्महत्या कर रहा है। 

घटना के बाद लहिरागागा पुलिस के एसएचओ जंगबीर सिंह ने कहा कि उन्होंने आईपीसी की धारा 306 के तहत बिचौलिए गुरतेज सिंह पर केस दर्ज कर लिया है।  

रिश्तों को गालियों से नहीं नजदीकियों से आंकिए !

अगर भक्तों को यह सुनना अच्छा लगता है कि भाजपा देश की नई कांग्रेस है तो उन्हें यह सुनकर भी आह्लादित होना चाहिए कि मोदी देश के नए नेहरु हैं। फिर कांग्रेस तो नेहरु की संस्कृति​ ही बनाएगी जिसमें प्रियंका चोपड़ा का भी एक रोल होगा...


जनज्वार। प्रधानमंत्री मोदी विदेश यात्रा के दौरान बर्लिन में प्रियंका चोपड़ा से भी मिले। मोदी के समक्ष प्रियंका के बैठने के अंदाज से प्रधानमंत्री के भारतीय समर्थक आहत हैं। वह हताशा में प्रियंका को गालियां बक रहे हैं और उन्हें भारतीय संस्कृति की याद दिला रहे हैं। 

मोदी भक्त और समर्थक संस्कार, संस्कृति, लाज, लिहाज और बाप—बेटी के रिश्ते जैसी बातें कर अपने पंरपरावादी नेता का बचाव कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि इससे मोदी की छवि को छति पहुंचेगी। बर्लिन में प्रियंका और मोदी के मिलने—मिलाने के प्रकरण में वह लगातार प्रियंका को दोषी मान रहे हैं। 

उनकी बातों और ट्वीटर—फेसबुक पर आ रही टिप्पणियों से लग रहा है मानो प्रियंका ने मोदी जैसे वृहत्तम व्यक्तित्व को अपनी दो टांगों के करीब ला पटका है। भक्तों की यह चिंता इसलिए भी दिख रही है कि प्रियंका से उनका मुख्य ऐतराज प्रियंका की दिखती टांगों और बैठने के आत्मविश्वासी अंदाज पर है। 

पर भक्तों और परंपरावादी कट्टरपंथियों को समझना चाहिए कि मोदी जी खुली टांगों को नैतिकता को मानक मानने की राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के बुद्धिकौशल से उपर उठ चुके हैं, जबकि संघी अभी भी नाभी, जांघ, नितंब, उरोज के उभार, उसके दिखने और न दिखने को नैतिकता की चरम स्थिति मानते हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत समेत कई नेता इस संदर्भ में बयान भी दे चुके हैं।   

इसीलिए वह प्रियंका के लिबास पर अकबक बोलकर जी को शांत कर रहे हैं। पर भक्त इस मामूली बात को नहीं मान रहे कि प्रियंका का यही अंदाज मोदी को आकर्षित करता है जिसकी वजह से वह विदेश यात्रा में भी उनके लिए अलग से समय निकालते हैं। रही बात कपड़े की तो भारतीय महिला फिल्म कलाकारों का यह सामान्य ड्रेस है जो किसी से मिलते-जुलते वक्त पहनती हैं। फिर प्रियंका किसी खाप की गिरफ्त में हैं तो हैं नहीं जो ड्रेस कोड माने।

प्रियंका के प्रति प्रधानमंत्री की आत्मीयता, लगाव और स्नेह एक कलाकार से बढ़कर होगा तभी तो वह मिलें हैं। जैसे प्रियंका प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा के इस बार के महत्वपूर्ण और व्यस्ततम कार्यक्रमों का हिस्सा हों, उनके बिना विदेश यात्रा अधूरी रह जाती हो। 

और एक बात आखिर में ! 

मोदी के सामने प्रियंका के बैठने का अंदाज बहुत कुछ कहता है। और इतना स्पष्ट रूप से कहता है कि मोदी प्रियंका को यह अधिकार देते हैं और जिससे वह एक शक्तिशाली महिला के रूप में उनके सामने पेश हो पा रही हैं। नहीं तो उनके कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्री भी मोदी के समक्ष हाथ पीछे किए ऐसे खड़े रहते हैं जैसे अर्दली खड़ा होता है। 

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रियंका ने मोदी से मुलाकात की तस्वीर ट्वीटर पर प्रधानमंत्री की इजाजत के बगैर शेयर की होगी?

या अंदाज भारतीय पूंजीपति मुकेश अंबानी वाला रहा होगा कि अंबानी ने अपने नेटवर्क 'जियो' के प्रचार का ब्रांडआइकॉन बनाकर मीडिया में मोदी को पेश कर दिया था जिसपर ऐतराज होने पर पीएमओ ने एक फर्जी सफाई दे दी थी और अंबानी पर एक हवाई जुर्माना लगा दिया था। 

May 29, 2017

तुम इतने कट्टर क्यों हो भक्तो!

कौन हैं ये भक्त और क्या वे रातोंरात कट्टर भक्ति लिये पैदा हो गए? अमेरिका के नस्ली गोरे और भारत के सवर्ण दावेदार! वे जो इतिहास को नकारना चाहते हैं और क्रमशः ट्रम्प और मोदी में अपने मुक्तिदाता को देखते हैं...

अमेरिका से जनज्वार के लिए विकास नारायण राय 

अमेरिका और भारत दुनिया में लोकतंत्र के मानक कहे जाते हैं। प्रधानमत्रंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के पूर्ववर्तियों, मनमोहन सिंह और बराक ओबामा को सारी दुनिया सार्वजनिक जीवन में शिष्टता का प्रतीक मानती रही है। इस सन्दर्भ में मोदी का पिछले वर्ष का अमेरिकी दौरा याद कीजिये। सैन फ्रांसिस्को में फेसबुक मुख्यालय पर भारतीयों से मुलाकात के दौरान स्वयं होस्ट मार्क जुकरबर्ग को मोदी ने कैमरे की जद से धक्का मारकर किनारे कर दिया था। 

ऐसी ही सड़कछाप उजड्डता ट्रम्प ने भी हालिया पहले विदेशी दौरे में सहयोगी नाटो राष्ट्राध्यक्षों के जमावड़े में दिखायी, जब वे मोंटेनीग्रो के प्रधानमंत्री को धकियाते हुए कैमरे के केंद्र में पहुँच गए। क्या दोनों भक्त समूहों के लिए यह विचलन की घड़ी हो सकती थी? नहीं, जरा भी नहीं। उनके लिए तो यह उनके नायकों की सहज चेष्टा ही रही।

उत्तर पश्चिमी अमेरिका के बारिश भरे प्रान्त ऑरेगोन की सबवे ट्रेन में नस्ली गुरूर में डूबे एक व्हाइट अमेरिकी ने हिजाब पहनी हुयी दो अमेरिकी मुस्लिम औरतों को अनाप-शनाप दुत्कारना शुरू कर दिया। टोकने पर उसने एक के बाद एक तीन व्हाइट सहयात्रियों को चाकू मार दिया, जिनमें दो की मृत्यु हो गयी। 

उत्तर पश्चिमी भारत के पशु बहुल राजस्थान प्रान्त में मुस्लिम गाय व्यापारियों के एक समूह पर स्वयंभू गौ-रक्षक को सरेआम लाठियों से ताबड़तोड़ हमला कर हत्या करने में रत्ती भर भी संकोच नहीं हुआ। अमेरिका का राष्ट्रपति संभावित आतंकवाद रोकने के नाम पर अपने ही देश के मुस्लिम नागरिकों को देश में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा देता है। भारत का सेनाध्यक्ष पत्थर फेंकते कश्मीरी मुस्लिम युवकों को देश के ‘दुश्मन’ की संज्ञा से संबोधित करता है। ट्रम्प और मोदी समर्थकों के लिए यह सब राष्ट्रीय शर्म का नहीं, अपने नायकों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने का अवसर सरीखा है।

कौन हैं ये भक्त और क्या वे रातोंरात कट्टर भक्ति लिये पैदा हो गए? अमेरिका के नस्ली गोरे और भारत के सवर्ण दावेदार! वे जो इतिहास को नकारना चाहते हैं और क्रमशः ट्रम्प और मोदी में अपने मुक्तिदाता को देखते हैं। इसे विसंगति मत समझिये कि अमेरिकी गृहयुद्ध के नायक और दास प्रथा को समाप्त करने वाले अब्राहम लिंकन नहीं, कॉर्पोरेट एनपीए में अमेरिका को डुबाने वाले रोनाल्ड रीगन हैं ट्रम्प के आदर्श।।

नस्ली गोरों का एजेंडा रहा है काले और लातीनी समुदाय को अमेरिका से खदेड़ना, जो उनके हिसाब से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बोझ हैं। उन्हें भावी अप्रवासियों को भी अमेरिका में आने से रोकना है जो उनके ख्याल से उनका रोजगार खा रहे हैं। आखिर ट्रम्प की राजनीति भी इसी तरह अमेरिका को महान बनाने की ही तो है।

भक्तों के लिए उस मोदी में भी कोई विसंगति नहीं है जो गाँधी को तो राष्ट्रपिता कहता है पर गाँधी के घोषित उत्तराधिकारी और आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू को कोसने और गाँधी के वैचारिक हत्यारे सावरकर को महिमामंडित करने में पूरी ऊर्जा लगा देता है। सोचिये, स्वतंत्र भारत में सवर्ण सपने क्या रहे हैं? मुसलमानों और ईसाइयों का दमन, पाकिस्तान की पिटाई, दलित शोषण, आरक्षण की समाप्ति, कम्युनिस्ट दमन, मर्द अधीन स्त्री, मनुवाद और परलोकवाद की स्थापना! उसके हिसाब से भारत की सनातनी श्रेष्ठता के लिए आवश्यक तत्व यही हैं। क्या मोदी शासन उसके सपनों को ही हवा नहीं देता! 

समीकरण सीधा है, लोकतंत्र में हर विचारधारा को अपना राजनीतिक प्रतिनिधि चाहिए। नस्ली और सवर्ण श्रेष्ठता के पैरोकारों को भी। अन्यथा,अमेरिका में नस्ली-धार्मिक और भारत में सांप्रदायिक-जातीय घृणा के जब-तब फूटने वाले हालिया उभार में नया कुछ नहीं है, सिवाय इसके कि आज इन दोनों लोकतांत्रिक देशों के शासन पर जो काबिज हैं, ट्रम्प और मोदी, उन्होंने अपनी विजय यात्रा इसी घृणा की लहर पर सवार होकर तय की है।

यानी स्वाभाविक है, जनसंख्या के एक प्रबल हिस्से का घोषित एजेंडा और शासन में बने रहने का ट्रम्प-मोदी का अघोषित एजेंडा परस्पर गड्मड् होकर दोनों देशों की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय धरोहर को बेशक आशंकित करते रहें, भक्तों को तो आश्वस्त ही रखेंगे। स्पष्टतः न मोदी भक्ति 2014 और न ट्रम्प भक्ति 2016 अचानक या जल्दबाजी में संपन्न हुयी परिघटना हैं|

मोदी और ट्रम्प भक्तों में अद्भुत समानता है। मोदी और ट्रम्प कितना भी फिसलें, उनके भक्तों की कट्टर निष्ठा अडिग रहेगी। बेशक ट्रम्प से चिपके तमाम लैंगिक और नस्ली कलंक उदाहरणों में अब राष्ट्रपति चुनाव अभियान में रूस से मिलीभगत के गंभीर आरोप भी शामिल हो गए हों। बेशक,मोदी के सांप्रदायिक और कॉर्पोरेट-यारी वाले चेहरे को इतिहास के सबसे बड़े फेकू होने का दर्जा मिल रहा हो। 

ये सब बातें भक्तों के लिए बेमानी हैं। मजबूत तर्क और अकाट्य तथ्य उनकी भक्ति को हिला नहीं सकते। दरअसल, मोदी और ट्रम्प अपने इन कट्टर समर्थकों के क्रमशः सोलह आना खरे राजनीतिक प्रतिनिधि सिद्ध हुए हैं। इस हद तक और इतने इंतजार के बाद कि उनके लिए वे एकमात्र विकल्प जैसे हैं।

दोनों के भक्तों के अडिग आचरण को समझने के लिए यहाँ एक और पर्दाफाश जरूरी है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी अभियान में माना जाता था कि ट्रम्प ने बड़े आक्रामक अंदाज में रिपब्लिकन पार्टी का नामांकन हथियाया है। लेकिन अब पार्टी का केंद्र और उसका समर्थक मीडिया,ओबामा केयर समाप्त करने और अमीरों को टैक्स छूट देने में ही नहीं, चिर-दुश्मन रूससे मिलीभगत की छानबीन में भी जिस अंदाज में ट्रम्प के साथ खड़े नजर आते हैं, उनके एक दूसरे का पूरक होने में कोई शक नहीं।  

मोदी ने संघ के आशीर्वाद से भाजपा का नेतृत्व हथियाया था। तब भी,उनके कैंप की ओर से,खरीदी मीडिया के माध्यम से, लगातार‘विकास’ के एजेंडे पर इस तरह जोर दिखाया जाता रहा है मानो संघ की हिंदुत्व ध्रुवीकरण की विभाजक पैंतरेबाजियों से मोदी का लेना-देना न हो। जाहिर है,संघ के दलित और मुस्लिम विरोधी एजेंडे पर ही नहीं, किसान और मजदूर की कीमत पर व्यापारियों और पूंजीशाहों के बेशर्म पोषण पर भी, संघ और मोदी की प्रशासनिक एकता इस छद्म प्रचार को अब और अधिक चलने नहीं दे पा रही।

इस आलोक में ट्रम्प और मोदी की चुनावी सफलतायें उतनी आकस्मिक नहीं रह जाती हैं, जितना उनके विरोधी विश्वास करना चाहेंगे। न ही उनके अंधसमर्थकों को ऐसे बरगलाये लोगों का समूह मानना सही होगा, जिन्हें राष्ट्रीय विरासत, लोकतांत्रिक परम्पराओं और संवैधानिक दबावों के रास्ते पर लाने की बात जब-तब बौद्धिक आकलनों में उठाई जाती है। 

दरअसल,समर्थकों की तिरस्कृत पड़ी आकांक्षाओं को मोदी और ट्रम्प ने राष्ट्रीय राजनीति में जैसे प्रतिष्ठित किया है, वे चिर ऋणी क्यों न रहें? समझे, भला भक्त इतने कट्टर क्यों?

May 28, 2017

मोदी देंगे देश को पहला आदिवासी राष्ट्रपति?

तो एक आदिवासी महिला देश की राष्ट्रपति बनेंगी, खबरें तो इसी तरफ इशारा करती हैं। अगर प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से सच में द्रौपदी मूर्मू के नाम पर मोहर लग चुकी है तो वह वह देश की राष्ट्रपति बनने वाली पहली आदिवासी बन जाएंगी.....


राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 25 जुलाई, 2017 को पूरा हो रहा है। इसी महीने नये राष्ट्रपति का चुनाव होगा और वह अपना पदभार ग्रहण करेंगे। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम ने भाजपा को बहुमत के करीब ला दिया है। अपनी पसंद का राष्ट्रपति बनाने के लिए भाजपा को 10,98,882 मतों में से 5.49 लाख वोट चाहिए। भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास 4.57 लाख वोट हैं। अगर तीसरा मोर्चा एकजुट हो जाये, तो भी भाजपा के बराबर वोट नहीं ला पायेगा। इसलिए तय है कि भाजपा अपनी पसंद का अगला राष्ट्रपति बनायेगी।

राष्ट्रपति पद की दौड़ में भाजपा की तरफ से पहले कई नाम शामिल थे, जिनमें भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और यहां तक ​​कि रजनीकांत का नाम भी शामिल था। ऐसे में वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर द्रौपदी मूर्मू के नाम पर नरेंद्र मोदी का मोहर लगाना ​थोड़ा आश्चर्यचकित भी करता है। एक कारण यह भी रहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी पर फिर से केस चलाये जाने की सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद आडवाणी और जोशी के बाद वो लोग राष्ट्रपति पद की रेस से बाहर हो गए थे। 

महिला और स्वच्छ छवि के चलते विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी दौड़ में रहींं, लेकिन उनकी सेहत ठीक नहीं होने की वजह से उनकी दावेदारी कमजोर पड़ गयी। दक्षिण के पिछड़ी जाति के नेता और केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू को भी दौड़ में शामिल माना जा रहा है, लेकिन उनके नाम पर विपक्ष सहमत होगा, इस पर भाजपा को संदेह है। इन परिस्थितियों में द्रौपदी मुर्मू की दावेदारी अधिक मजबूत और तार्किक बतायी जा रही है। 


द्रौपदी मूर्मू वर्तमान में झारखंड की राज्यपाल हैं और पिछले दो दशकों से वह राजनीति में सक्रिय हैं। विपक्ष के लिए भी उनकी उम्मीदवारी को खारिज करना मुश्किल होगा। द्रौपदी मूर्मू राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार होंगी। द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी से झारखंड की मुख्य विपक्षी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का भी समर्थन भाजपा को हासिल हो सकता है। झारखंड विधानसभा में झामुमो मुख्य विपक्षी पार्टी है। 

इसे भी संयोग ही कहा जाएगा कि द्रौपदी झारखंड और देश की पहली आदिवासी महिला राज्यपाल हैं। द्रौपदी को प्रत्याशी बनाकर भाजपा और सरकार देश को अलग संदेश दे सकती है। 

ओड़िशा के आदिवासी परिवार में 20 जून, 1958 को ओड़िशा के एक आदिवासी परिवार में जन्मी द्रौपदी मूर्मू रामा देवी वीमेंस कॉलेज से बीए की डिग्री लेने के बाद ओड़िशा के राज्य सचिवालय में नौकरी करने लगीं। 1997 में नगर पंचायत का चुनाव जीतकर राजनीति में कदम रखा। पहली बार स्थानीय पार्षद (लोकल काउंसिलर) बनीं. 

पार्षद से राष्ट्रपति उम्मीदवार बनने तक का उनका सफर देश की सभी आदिवासी महिलाओं के लिए एक आदर्श होगा। वह ऐसे राज्य से ताल्लुक रखती हैं, जहां 2014 के मोदी लहर में भी भाजपा का सिर्फ खाता ही खुला था। राज्य में लोकसभा की 21 सीटें हैं, 20 सीटें बीजद ने जीती थीं। 

साफ-सुथरी राजनीतिक छवि के कारण द्रौपदी को भाजपा आलाकमान ने हमेशा तरजीह दी। वह भाजपा के सामाजिक जनजाति (सोशल ट्राइब) मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य के तौर पर काम करती रहीं और वर्ष 2015 में उनको झारखंड का राज्यपाल बना दिया गया। 

द्रौपदी मूर्मू 18 मई, 2015 से झारखंड की राज्यपाल हैं -2000 से 2004 तक ओड़िशा विधानसभा में रायरंगपुर से विधायक और राज्य सरकार में मंत्री रहीं। वह पहली ओड़िया नेता हैं, जिन्हें राज्यपाल बनाया गया -छह मार्च, 2000 से छह अगस्त, 2002 तक वह भाजपा और बीजू जनता दल की गठबंधन सरकार में वाणिज्य और परिवहन के लिए स्वतंत्र प्रभार मंत्री रहीं। छह अगस्त, 2002 से 16 मई, 2004 तक मत्स्य पालन और पशु संसाधन विकास राज्य मंत्री रहीं।

editorjanjwar@gmail.com

गिल के मरने पर गम नहीं गालियों से विदाई दे रही पंजाब की जनता

मीडिया का बहुतायत जहां पंजाब के पूर्व डीजी और खालिस्तानियों के सफाए के लिए चर्चित रहे केपीएस गिल की मौत को 'एक महानायक' की विदाई बता रहा है, वहीं पंजाब के आम लोग सोशल मीडिया पर गालियों, ​फब्तियों से तंज कस रहे हैं और गिल को 'कसाई' की संज्ञा देते नहीं अघा रहे हैं। 

तैश पोठवारी 

(केपीएस गिल की मौत पर सिखों ने बांटे लडडू, पहली बार बंट रहे मरने की खुशी में - ऊपर लिखे का अनुवाद)

इसे आप त्रासदी कह सकते हैं या त्रासदीपूर्ण सच। पर ऐसा ही है। और यह कोई नया नहीं बल्कि हमेशा होता रहा है कि आतंकवाद झेलती और आतंकवाद खत्म होते देखती सत्ता की निगाहों में बड़ा फर्क होता है। भारत में पारंपरिक तौर पर जिस तरह से सरकार आतंकवाद खत्म करती है, उसमें आतंकवादियों से अधिक नुकसान, हत्याएं और मुश्किलें आम जनता को झेलनी पडती हैं। वही फर्क गिल की मौत के मामले में भी दिखाई दे रहा है। 

पंजाब में 1988 से 1995 तक डीजीपी रहे और पद्मश्री से सम्मानित केपीएस गिल की 26 मई को दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गयी। वह 1996 में एक महिला आइपीएस के यौन उत्पीड़न के लिए सजायाफ्ता भी रह चुके थे। 26 मई को उनकी मौत होने के बाद नेताओं, नौकरशाहों और मीडिया के बड़े हिस्से ने गिल को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा कि देश ने अपना एक महत्वपूर्ण अधिकारी खो दिया है, जिसकी दूरद्रष्टा गंवाया है। 

एक तरफ देश भर के ज्यादातर मीडिया घराने अलगाववाद के दौर में गिल की सरकारी छवि को राष्ट्रीय व आमजमानस की छवि बनाकर पेश कर रहे हैं, वहीं गिल के जुल्मों की भुक्तभोगी जनता  गिल की मौत पर उनको एक अलग तरह से याद कर रही है।  

(जालिम जुल्म कमाकर चला गया, घर घर आग लगाकर चला गया, उनके सीन  ठंढे होंगे, जिनके डीप बुझाके चला गया - फोटो में लगी कविता का अनुवाद)

पंजाब और देश के अन्य हिस्सों में रहे सिख समुदाय और दूसरे समुदायों के लोग भी सोशल मीडिया पर गिल की मौत पर ख़ुशी जताकर अंतिम विदाई दे रहे हैं। फेसबुक पर हर कोई अपने तरीके से उन्हें गिल को जलील कर रहा है। कोई उनकी मौत को बर्बरता के साथ झूठी मुठभेड़ों में पंजाब की जवानी को मारने वाला कसाई की मौत कह रहा है तो कोई अपनी कविता, नारों और पोस्ट के जरिए व्यंग्य कस रहा है। 

यह पहली बार है किसी अधिकारी की मौत पर जनता इस ​तरह प्रतिक्रिया दे रही है। बहुत से लोग गालियां दे रहे हैं। यह विरोध इतने बड़े पैमाने पर और निर्विरोध है कि उनके समर्थन में पंजाब में फेसबुक पर कहीं कोई एक पोस्ट या कमेंट नहीं है। छात्र ,बूढ़े ,लेखक ,कलाकार ,पत्रकार, महिलाएं व हर वर्ग के लोग बिना लाग लपेट,संकोच के उनके प्रति अपनी नफरत और गुस्से का इजहार कर रहे हैं।  

यही नहीं उनकी मौत से जुड़े सभी कार्यकर्मों के सामाजिक बहिष्कार की भी अपील की गई है। यहां तक कि किसी भी ग्रंथी को उनके अंतिम धार्मिक क्रियाकलापों को न करने और किरतपुर साहिब में उनकी अस्थियों को विसर्जित न करने देने की अपील भी की गई है। 

(जिन सिख सम्पादकों ने केपीएस गिल कसाई के संस्कार और भोग के विज्ञापन छापे हैं क्या उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होनी चाहिए ?)

May 27, 2017

बागी विरासत को याद करते हुए चंबल में लगी जनसंसद

पचनदा में बहता पानी भले ही शांत, ठहरा और साफ़-सुथरा दिखता हो, लेकिन हक़ीक़त में बीहड़ों में ज़िंदगी उतनी ही उथल-पुथल भरी है। एक साज़िश के तहत हमेशा ही चम्बल क्षेत्र को ‘डार्क ज़ोन’ बनाकर उपेक्षित रखा गया......

जनज्वार, चंबल। 1857 की 160वीं वर्षगाँठ पर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित पाँच नदियों के संगम ‘पचनदा’ पर, "ज़ंगे आज़ादी और चम्बल" विषय पर  एक विशाल ‘जनसंसद’ का आयोजन किया गया। 1857 में जब सारा देश ब्रितानिया हुकूमत के अत्याचारों से सुलग उठा था, तब 25 मई 1857 को इसी ‘पचनद घाट’ पर चम्बल के तमाम क्रांतिकारी इकट्ठा हुए थे और यहीं से उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को नेस्तनाबूंद करने की कसमें खाईं और कूद पड़े थे 1857 के महासमर में। 


जब 1857 में जब पूरे देश में क्रांति के केंद्र ध्वस्त कर दिए गए, हजारों शहादतें हुईं, हजारों महानायकों को कालापानी भेज दिया गया, उस वक्त देशभर के क्रांतिकारी चम्बल के आगोश में खिंचे चले आये। इसलिए तब यह धरती उस महान स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों का ट्रेनिंग सेंटर बन गई थी। 

जन नायक गंगा सिंह, रूप सिंह सेंगर, निरंजन सिंह चौहान, जंगली-मंगली बाल्मीकि, पीतम सिंह, बंकट सिंह कुशवाह, मारुंन सिंह, चौधरी रामप्रसाद पाठक, गंधर्व सिंह, भैरवी, तेजाबाई, मुराद अली खां, काशीबाई, शेर अंदाज़ अली, चिमना जी, दौलत सिंह कछवाह, बरजोर सिंह, खलक सिंह दौआ इत्यादि हर वर्ग, जाति, लिंग और सम्प्रदाय के लोगों ने चम्बल में 1857 के 10-12 वर्ष बाद भी इस अंचल में आज़ादी की मशाल जलाये रखा था।

पचनदा में बहता पानी भले ही शांत, ठहरा और साफ़-सुथरा दिखता हो, लेकिन हक़ीक़त में बीहड़ों में ज़िंदगी उतनी ही उथल-पुथल भरी है। एक साज़िश के तहत हमेशा ही चम्बल क्षेत्र को ‘डार्क ज़ोन’ बनाकर उपेक्षित रखा गया, जबकि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक फैला यह विशाल बीहड़ क्रांतिकारियों की शरण स्थली के रूप में मशहूर रहा है। 

आज भी आज़ादी के 70 वर्ष बाद क्रांतिकारियों के वारिसों को सत्ता के हाथों उपेक्षा और अपमान के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगा।  यह ‘जन संसद’ चम्बल के इन्हीं गौरव और अपमानों के लेखा-जोखा के निमित्त आयोजित की गई थी। 

जन संसद के इस आयोजन की पृष्ठभूमि तैयार की जुझारू और संघर्षशील युवा सिनेमाकर्मी ‘शाह आलम’ ने, जो अपनी साइकिल से निकले तो थे चम्बल ही नहीं सम्पूर्ण उत्तर भारत के क्रांतिकारियों के पितामह रहे गेंदालाल दीक्षित द्वारा 1916 में स्थापित ‘मातृवेदी संगठन’ के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में उसकी स्मृतियों के दस्तावेज़ी करण को लेकर, पर अपनी 2300 कि.मी. की यात्रा में उन्होंने केवल ‘मातृवेदी’ ही नहीं उससे सुदूर 1857 और उससे पहले भी यह दुर्गम अंचल क्रांतिकारियों और जाबांज़ देश भक्तों की खान के रूप में दिखाई पड़ा। 

शाह आलम बाकी के छोड़ चम्बल के इतिहास उत्खनन में जुट गए, किन्तु यह इतिहास उत्खनन मात्र इकहरा न था। उसमें चम्बल के दुरूह जीवन और कष्टकारी स्थितियों की पड़ताल भी शामिल थी। इसलिए जब इस जन संसद का आयोजन हुआ और इसमें स्थानीय इतिहासकार, पत्रकार, समाजसेवी व आम नागरिक शामिल हुए, तब यह मात्र एक रस्म अदायगी तक सीमित रह जाने वाला कार्यक्रम न होकर, जन संवाद के माध्यम से जन समस्याओं की गहन पड़ताल और उनके निवारण की तह तक विस्तार को प्राप्त हुआ। 

‘इंक़लाब जिन्दाबाद’ और ‘आवाज़ दो हम एक हैं’ के गगनभेदी नारों के साथ वरिष्ठ पत्रकार के. पी. सिंह, शाह आलम और तमाम वरिष्ठजनों की अगुवाई में कोई दो सौ-सवा दो सौ लोगों का हुज़ूम पचनदा की रेती में गढ़े उन्नत तिरंगे के नीचे 1857 के चम्बल के तमाम शहीदों को पुष्पों के द्वारा श्रद्धासुमन अर्पित करता राष्ट्रगान के उपरांत वहाँ से चलकर प्राचीन बाबा साहब प्रांगण में आकर आम और नीम की सघन छाया में संसद की वृत्ताकार शैली में दरी पर आकर बैठ गए। कार्यक्रम का संचालन सम्हाला उरई के युवा समाज सेवी कुलदीप कुमार बौद्ध ने और मुख्य वक्ता बने पत्रकार के.पी. सिंह। 

कार्यक्रम के प्रारंभ में बीज वक्तव्य शाह आलम ने दिया, उसके बाद अपने विचार प्रकट करने आये कवि डॉ गोविन्द द्विवेदी ने कहा-"चम्बल वीर प्रसूता भूमि है और इसका वास्तविक स्वरूप हमें देश के सामने लाना ही होगा।  तदुपरांत राज त्रिपाठी ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कहा, ‘हमें शाह आलम का शुक्रगुज़ार होना चाहिए, जिन्होंने अपने अदम्य साहस और लगन से हमें हमारे लड़ाका पुरखों के शौर्य और साहस से परिचित कराया कि राष्ट्र की बलिदानी परम्परा में हमारा भी कोई अमिट स्थान है।'

उसके बाद औरैया से आये डॉ.अजय शुक्ला ‘अंजाम’ ने मैनपुरी में स्थित शहीद मंदिर और उस पर आयोजित होने तथा सबसे अधिक लम्बा (19 दिन) चलने वाले मेले के बारे में जानकारी देने के बाद बताया कि 1857 में इटावा के तत्कालीन कलेक्टर ए.ओ. ह्यूम ने एक तोंपो और बंदूकों से लैस एक जंगी बेड़ा भेजा था। उस समय साधनहीन हमारे दादा-परदादों ने अपने हँसिया, दरांती, और बरछी-भालों से पहले डभोली घाट फिर भरेह पर उनका कड़ा मुकाबला किया था। हम बहादुर और बाग़ी कौम हैं।

पर देश ने आज़ादी के बाद हमारे साथ छल किया। चम्बल के विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया। चम्बल का युवा बेरोजगारी के चलते पलायन को मजबूर है। त्योहारों पर उनकी घर में प्रतीक्षा होती रहती है पर अपने बूढ़े माँ-बाप और जवान बहनों के ब्याह की चिंता में यह आना टालते रहते हैं। 

बंगलौर, अहमदाबाद सूरत और अन्य स्थानों पर जोख़िम भरे काम करके यह युवा जब अपने देश लौटते हैं तो कई बीमारियों के साथ और जो पैसा उन्हें घर के खर्च में देना होता है, वो उनके इलाज़ में स्वाहा हो जाता है। हमारा चम्बल आज बहुत बड़े संकट की कगार पर है और इसका यदि कोई जिम्मेवार है तो वे इस देश और प्रदेश के हुक्मरान।'

भिण्ड, मध्य प्रदेश से आये युवा साहित्यकार-इतिहासकार डॉ. जितेन्द्र  विसारिया ने कहा कि पचनद और चम्बल घाटी की अपनी एक साझा संस्कृति और इतिहास है। जब तत्कालीन सयुंक्त प्रान्त स्थित ‘पचनदा’ के क्रांतिकारी अंग्रेजों के दमन के शिकार हुए तब तत्कालीन सिंधिया रियासत के अंतर्गत आने वाले कछवाह घार (भिण्ड) में शरण पाई थी। 

कछवाह घार में पृथ्वी सिंह, चिमनाजी और दौलत सिंह-बरजोर सिंह द्वारा गठित ‘स्वराज मंडल’ में शामिल होकर चम्बल और पचनदा के वीरों ने ग्वालियर तक रानी झाँसी और तात्या टोपे की मदद की और 18 जून 1858 के 10-12 साल बाद तक ब्रिटिश हुकूमत को टक्कर देते रहे थे। पर एक साज़िश के तहत अंग्रेजों की मनोकामना फलीभूत हुई और इस अंचल की बग़ावती परंपरा को लूट-खसोट की डाकू परंपरा से नत्थी कर उसे बदनामी और उपेक्षा के ऐसे दलदल में धकेल दिया कि आज भी देश के अन्य हिस्सों में चम्बल के युवाओं को किराए पर मांगे कमरे नहीं मिलते! हमें चम्बल को इस बदनाम छवि से निकलना ही होगा और विकास के मार्ग पर प्रशस्त करना ही होगा।

 इसके बाद धर्मेंद्र सिंह ने भी आज़ादी के बाद चम्बल के क्रांतिकारियों के साथ हुए छलावे पर अपना आक्रोश प्रकट करते हुए उनकी कुर्बानियों के व्यर्थ न जाने की बात कही। 

 कार्यक्रम में बड़ी संख्या में उपस्थित हुई ग्रामीण महिलाओं ने भी घूँघट की ओट से अपनी और अपने अंचल की दुर्दशा पर गुस्सा प्रकट किया। कंजौसा की मीरा बाई निषाद ने कहा, ‘हियाँ मजूरी है नईं है और सरकार से जो थोरी भौत योजनाएं आती हैं, वे बड़ी जाति के खाये-अघाये लोगन के पेट मेंईं समाय जाती हैं...हमाये मुहल्ला में एक हू हेण्डपंम्प नईं और उनके हियाँ दुइ-दुइ, तीन-तीन।... नरेगा में टाइम से मजूरी नईं मिलत। ....बेहड़ से लकड़ियाँ बीन-बीन लड़िकन कों पढ़ाओ, पर हिया कोई धंधों-रोजगार न होवे और नौकरी न मिलिबे से हमाये लड़िका मजूरी पे जान लगे, तो गाँव के लोग हँसी उड़ाउत कि पढ़ें फ़ारसी बेंचे तेल....तो साब! जि है हमाई दशा? न जीवे में न मरिवे में!!!’ 

एक अन्य महिला जयदेवी ने वर्षों से प्रस्तावित ‘पचनद डैम’ के बनने पर विस्थापित होने वाले 184 गांवों के लोगों के पुनर्वास पर अपनी चिंता प्रकट की-“ साब! पचनदा पर जो बाँध बनाओ गओ तो हम गरीब कहाँ बसाए जैहें? पूरो इलाका बेहड़ है। जो भी खेती हैं, व नदी की तीर में है। बाँध बनो तो सब डूब जैहै, तब हम का खाएँगे, काँ रहेंगे???’ 

स्थानीय प्रौढ़ भग्गूलाल जी ने पचनदा के दलितों की बदहाली पर प्रकाश डालते हुए बताया, ‘अब से पूर्व के मुख्यमंत्री जी सारी योजनाएं अपने गृहनगर सैंफई ले गए। सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में जालौन जिला सबसे अधिक पिछड़ा है। यहाँ के दलित आज भी मैला ढोने को मज़बूर हैं। 

पिछले दिनों कस्बा उमरी के स्वच्छकारों ने जब यह घृणित कार्य छोड़ना चाहा, तो गाँव के दबंगों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। उन्हें परचून की दुकान से सामान, आटा चक्की पर आटा और बस में सवारी करने से मना किया गया। यहाँ तक कि उनका खेतों में शौच और श्मशान पर मुर्दा जलाने की भी मनाही झेलनी पड़ी। 

प्रशासन ने आनन फानन में 32 हजार की मशीन मँगवाई। रात में राम तलैया के कुछ बाल्मीकि लड़के ले गए, जिसमें चैंबर का ढक्कन खुलते ही ज़हरीली गैस से दो बाल्मीकि युवक मारे गए। उनकी पुलिस में एफआईआर तक नहीं हुई और मामला दबा दिया गया।...दलित वर्ग की यहाँ स्थिति बहुत दयनीय है।

एक अन्य ग्रामीण सन्तोष ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, ‘इस जन संसद में जो बात उठी है वो सच्चे मन से उठाई जाएगी तो अवश्य सुनी जाएँगी। ...इतनी सारी नदियां होते हुए भी यहाँ भयंकर पानी की किल्लत पड़ती है। किसान की ज़मीन असिंचित है, क्योंकि गहरी नदियों से लिफ्टिंग कर पानी ऊपर लाने हेतु न कोई बाँध है, न अन्य व्यवस्था। किसानों की स्थिति पानी बिच मीन प्यासी वाली है। बेरोज़गार युवाओं जा पलायन और अपहरण और फिरौती जैसे अपराध पनपने का एक कारण यह भी है।

स्थानीय युवा अवधेश यादव उर्फ पिंकू ने अपना गुस्सा व्यक्त करते हुए कहा कि, पचनद डैम और फोरलेन के लिए यहाँ के स्थानीय नेता सुदामा दीक्षित और मनोज पांडेय से अनुनय विनय की, पर उन्होंने एक बात कान न दी। इंदिरा जी हों या उमा भारती सबसे इस क्षेत्र में पर्यटन क्षेत्र बनाने की विनती की गईं पर कभी कोई सुनाई नहीं हुई। पचनदा का बीहड़ ‘लाइन सफ़ारी’ के लिए सबसे मुफ़ीद था, पर अखिलेश यादव उसे इटावा के समीप ले गए! कुल मिलाकर पचनदा आज भी सत्ता और प्रशासन की गहरी उपेक्षा का शिकार है। विश्व प्रसिद्ध यमुनापारी बकरी और भदावरी भैंस को लेकर कुछ नहीं किया गया।

कार्यक्रम के अंत में मुख्य वक्ता के रूप में के.पी. सिंह जी ने कहा कि, ‘जन संसद के सरोकार स्थानीय मुद्दों से बड़े हैं। शाह आलम ने मातृवेदी को गुमनामी में से खींचकर बाहर नहीं निकाला, अपितु 1857 के चम्बल और पचनदा के वीरों को इतिहास और देश के फ़लक पर प्रतिष्ठित किया है। आज जब सम्पूर्ण समाज का धुर्वीकरण हो रहा है ऐसे में 1857 हमें इसलिए भी याद रखना चाहिए कि वो देश के सामूहिक मुद्दों को लेकर देश के सम्पूर्ण वर्ग द्वारा मिलकर लड़ा गया संग्राम था। इसके दस्तावेज़ इलाहाबाद, दिल्ली और लंदन के अभिलेखागारों में उपलब्ध हैं।' 

अंत में सभी का आभार सदन के स्पीकर अवधेश सिंह चौहान जी ने किया और पुनः अगले साल फरवरी माह में फिर दूसरी जनसंसद में आने का आह्वान कर कार्यक्रम के समापन की औपचारिक घोषणा की गयी।  

editorjanjwar@gmail.com           

May 25, 2017

पुलिस अधिकारियों से पत्रकार पहले लेते हैं डिक्टेशन, फिर करते हैं सहारनपुर हिंसा की रिपोर्टिंग

शब्बीरपुर में घटित जातीय हिंसा की रिपोर्टिंग चाहे प्रिंट हो या इलैक्ट्रॉनिक या फिर डिजिटल मीडिया में ऐसे की गई, जैसे यह जातीय संहार नहीं बल्कि व्यक्तिगत रंजिश में की गई हत्याएं हों.....

जनज्वार सहारनपुर। सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में 5 मई, 2017 को दलितों पर हुए हमले की पहली रिपोर्टिंग जब जनज्वार में छपी तो लोगों को लगा कि क्या ऐसा भी हो सकता है? यह सिर्फ इसलिए नहीं लगा कि सबसे पहले जनज्वार में वीडियो, फोटो और सिलसिलेवार घटनाक्रम में यह रिपोर्ट छपी थी, बल्कि इसलिए भी लगा कि जब शब्बीरपुर गांव में दलितों के घर जलाए जा रहे थे और राजपूत जातियों के लपंट तत्व पूरे गांव में हाहाकार मचाए हुए थे, उस वक्त मौके पर जिले के सभी उच्चाधिकारी मौजूद थे। 


उच्चाधिकारियों डीएम, एसपी, एसएसपी की मौजूदगी में दलितों के घर फूंके गए, उन पर हमले हुए, उनकी गाड़ियां, मोटरसाइकिलें, साइकिलें स्वाहा कर दी गयीं और अनाज के ढेर जला दिए गए। कई मीडियाकर्मियोंं ने इन घटनाओं को अपने कैमरे में कैद भी किया और उच्चाधिकारियों के साथ खड़े रहकर घटनाक्रम के साक्षी भी रहे, पर 5 मई की इस घटना का अगले 5 दिनों तक ठीक से तब तक मीडिया कवरेज नहीं आया, जब तक कि जनज्वार जैसी तमाम दूसरी जनपक्षधर वेबसाइटस और सोशल मीडिया ने इसे एक बड़ा और राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बना लिया।

इसी तरह बसपा प्रमुख मायावती के शब्बीरपुर जाने से पहले और उनके जाने के बाद शब्बीरपुर समेत दूसरे तमाम गांवों में हिंसक वारदातें हुईंं, दलितों और राजपूतों में टकराहट हुई, दर्जन भर दलित गंंभीर रूप से घायल हुए, जिसमें से तीन की अब तक मौत हो चुकी है, मगर इस बड़ी घटना की भी रिपोर्टिंग चाहे प्रिंट हो या इलैक्ट्रॉनिक या फिर डिजिटल मीडिया में ऐसे की गई, जैसे यह जातीय संहार नहीं बल्कि व्यक्तिगत रंजिश में की गई हत्याएं हों। शब्बीरपुर में अब तक आधा दर्जन लोग इस जातीय नरसंहार की भेंट चढ़ चुके हैं।

इन दोनों घटनाओं और सहारनपुर में लगातार बने हुए तनाव के बीच जिस तरह की रिपोर्टिंग की जा रही है, उसको समझने के लिए पत्रकार, पत्रकार और अधिकारियों के रिश्ते, स्थानीय स्तर पर पत्रकारों और माफियाओ के रिश्ते और पत्रका​रों की जातीय संरचना को समझना बहुत जरूरी है। बगैर इन चारों चीजों को समझे देश को यह नहीं समझ में आ सकता कि मीडिया चाहे वह राष्ट्रीय हो या स्थानीय, इस खबर को प्राथमिकता और घटनाक्रम की बारीकियों के साथ क्यों नहीं पेश कर रहा।

एक बात और कि जिस तरह मुजफ्फरनगर दंगे की घटना को वृहत रूप देने में ठीक से रिपोर्टिंग न होना भी एक बड़ा कारण रहा, अब ऐसा ही कुछ शब्बीरपुर में हो रहा है। एक दूसरा कारण यह भी माना जा रहा है कि मुजफ्फरपुर दंगे में आजम खां जिस तरह से पहुंचे और शब्बीरपुर में मायावती, उसने दंगे को भड़काने और जातीय हिंसा को बढ़ाने का ही काम किया है। 

5 मई को जब शब्बीरपुर गांव जब रहा था, दलितों पर हमले हो रहे थे तो इस घटनाक्रम की रिपोर्टिंग करने से पहले डीएम, एसएसपी, एसपी ने गांव में पत्रकारों को डिक्टेशन दी। मौके पर आज तक, न्यूज नेशन, जीटीवी, ईटीवी, न्यूज 24, टीवी 100 समेत तमाम न्यूज चैनलों और सभी दैनिकों के पत्रकार डिक्टेशन लेने वालों में मौजूद थे। 


एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे, डीएम एनपी सिंह और एसपी देहात ने पत्रकारों को निर्देशित किया कि फलां फलां फुटेज दिखाइये और फलां फलां फुटेज मत दिखाइये। पत्रकार भी उच्चाधिकारियों की बात से सहमत थे इसलिए फुटेज और फैक्ट होने के बावजूद खबर सामने नहीं आई। कुछेक ईमानदार पत्रकारों ने आॅनलाइन मीडिया का सहारा लिया, जिसकी वजह से इस घटनाकम का सच सबके सामने आ पाया। इन्ही पत्रकारों में कुछेक ने जब आपस में कहा कि यह तो गलत है हमें खबर दिखानी चाहिए, कुछेक ने दिल्ली में अपने हैडआॅफिस वीडियो फुटेज भेजी भी, मगर खबर वहां से भी प्रसारित नहीं हो पायी।

गौरतलब है कि सहारनपुर जिले में छोटे—बड़े मीडिया घरानों के तकरीबन 210 पत्रकार काम करते हैं। इन पत्रकारों का बहुतायत बाह्मण, राजपूत और जाट है। 10 प्रतिशत के करीब पत्रकार मुस्लिम भी हैं। ऐसे में घटना मुजफ्फरपुर की हो या शब्बीरपुर की, पत्रकार आमतौर पर अपनी जातिवादी और साम्प्रदायिक समझदारी को ही पत्रकारिता का मूल्य बना लेते हैं। और ये तब और भी आसान हो जाता है जब ​तमाम उच्चाधिकारी भी साम्प्रदायिक और जातिवादी हों। ऐसे में अधिकारियों और पत्रकारों दोनों का गठजोड़ यह मान लेता है कि मुसलमानों और दलितों पर जो जातिवादी और साम्प्रदायिक अत्याचार हुआ है, वह वाजिब है और इसको लेकर खामखां का हल्ला मचाने की कोई जरूरत नहीं है। 

शब्बीरपुर मामले में भी हू—ब—हू यही हुआ। ज्यादातर स्थानीय पत्रकार किसान हैं और उन्होंने शब्बीरपुर और आसपास के दूसरे गांवों में दलितों पर हुए हमलों और अत्याचार को इसलिए वाजिब ठहरा दिया कि दलितों की महिलाएं उनके खेतों में जाने वाले पाइपों पर दरारी/​हसुआ मार देती हैं।

सहारनपुर से दूर बैठे और यहां की सामाजिकी, आर्थिकी से अनभिज्ञ व्यक्ति को पत्रकारों और पत्रकारिता के संदर्भ में यह बात मजाकिया लग सकती है, मगर सच यही है। दलित महिलाओं का खेत में जा रही पाइपों पर दराती मार देना, दलितों का राजपूतों के आगे पहले की तरह दंंडवत न होना, कुछेक दलितों की आर्थिक स्थिति मजबूत होना और उनका पढ़ा—लिखा होना भी उन पत्रकारों को गड़ता है या उन्हें सही रिपोर्टिंग नहीं करने देता, जो सहारनपुर की स्थानीय पत्रकारिता के टायकून हैं। 

अधिकारियों की डिक्टेशन और पत्रकारों की जातीय और सामाजिक हैसियत से इतर एक सच और भी है, जहां माफियाओं के आगे पत्रकार जाति—धर्म से परे हटकर सरेंडर किए हुए हैं। सहारनपुर के खनन माफिया मोहम्मद इकबाल जोकि बसपा के पूर्व एमएलसी भी रह चुके हैं और बसपा से ही तत्कालीन एमएलसी और उनके छोटे भाई महमूद अली सहारनपुर की पत्रकारिता को पालते—पोसते हैं। यहां के लोगों में यह सामान्य जानकारी है कि अवैध खनन पर रिपोर्टिंग न करने के बदले कुछेक पत्रकारों को छोड़ दें तो बहुतायत को एमएलसी परिवार से मासिक भत्ता जाता है। हालांकि अब सरकार ने औपचारिक तौर पर खनन बंद करवा दिया है, फिर भी यह जारी है।

देखें वीडियो :



May 23, 2017

आइये! यह गोपाल सर की क्लास है

सड़क दुर्घटना में कमर के नीचे का पूरा हिस्सा खोया, जज्बा नहीं, 18 साल से पढ़ा रहे गरीब बच्चों को, नहीं मिली कोई सरकारी सहायता

गोपाल अपनी कक्षा में गरीब—बेसहारा बच्चों को पढ़ाते हुए
वह मेरे जीवन का बहुत ही भयानक हादसा था बेहतर है कि मैं उसे भूल जाऊं. उसकी यादें व्यग्रता बढ़ाती हैं, हासिल कुछ नहीं होता. वैसे भी वह दौर उस हाथी की तरह था, जो कुछ अंधों से टकराता है। जिसके हाथ में हाथी की पूछ आती रस्सी समझ लेता. जिसके हाथ में पैर वह खंबा. जो टटोलकर पेट तक पहुंच जाता था वह उसे ढोल समझ बैठता था, ऐसा ही जीवन था. लोग अंधों की तरह टटोल रहे थे.'

यह कहानी है नोवल शिक्षा संस्थान चलाने वाले गोपाल सर जी की, जिनका एक सड़क दुर्घटना में कमर से नीचे का हिस्सा बेकार हो चुका है। 19 नवंबर 1996 को हुई एक सड़क दुर्घटना में गोपाल के कमर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह से सुन्न हो गया. उस दिन से वह हमेशा के लिए बिस्तर पर आ गया। उसके बाद मेरे कदम जमीन पर नहीं पडे, मगर यह दुर्घटना उनके जज्बे को सुन्न नहीं कर पायी। 

एक दोस्त के सहयोग से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर स्थित एक कस्बे कछवां के पत्ती के पुरा गांव में आकर रहने लगे और वहीं उन्होंने ​निर्धन बच्चों को शिक्षित करना अपना उद्देश्य बना लिया। करीब 18 साल पहले एक गरीब बच्चे को पढाने से उन्होंने इस सिलसिले की शुरुआत की और यह यात्रा निरंतर जारी है। 

गोपाल इस दुर्घटना के बाद बेहद तनाव में रहे। उनके परिवार की दो पीढ़ियां बिरला परिवार में कार्यरत रहीं और नाते—रिश्तेदार भी उच्च वर्ग से ताल्लुक रखते थे, बावजूद इसके वो एक भयानक तंगहाली के दौर से गुजरे। इस घटना ने उन्हें अपने—पराए का एहसास जरूर कराया। गोपाल कहते हैं, 'तंगहाली से उपजे तिरस्कार और उपेक्षा को उस समय भी बर्दाश्त किया है. और आज भी अपने लोगों द्वारा बोले गए शब्दों से आहत होने के बाद भी मुस्कुराकर जीना पड़ता है. मैंने वैभव के साथ विपन्नता को भी बहुत नजदीक से देखा है, जो जीवन को समझने में बहुत कारगार सिद्ध हो रहा है.'

प्रतिदिन गांव के सैकड़ों बच्चे गोपाल ​सर की कक्षा में निशुल्क ज्ञान प्राप्त करते हैं. इनमें से कुछ तो इतने गरीब परिवारों से ताल्लुक रखते हैं कि उनके पास कापी—पेंसिल—पेन के लिए तक पैसे नहीं होते। ऐसे में उन्हें अध्ययन सामग्री दिलवाने का काम भी गोपाल सर ही करते हैं। 

गोपाल सर से यह पूछने पर कि वह यह व्यवस्था कहां से करते हैं, वह कहते हैं, 'लोगों से जो थोड़ी—बहुत मदद मुझे मिलती है, उन पैसों से मैं इन गरीब बच्चों को पढ़ने की सामग्री दिला देता हूं।'

'क्या सरकार से आज तक आपको किसी तरह की कोई मदद मिली है?' के जवाब में गोपाल सर थोड़ा निराश हो जाते हैं और कहते हैं, सत्ता में चाहे कोई दल आया हो, किसी की भी सरकार रही हो, मुझे कभी किसी तरह की सहायता नहीं मिली। इतना अच्छा कार्य करने के बावजूद ना तो मुझे आज तक पेंशन मिली, ना ही कोई और सरकारी सहायता.' 

उनके पास पढ़ने आने वाले बच्चों के लिए पानी पीने तक की व्यवस्था नहींं है। उन्हें  पानी पीने के लिए करीब 200 मीटर दूर जाना पड़ता है।। गोपाल चाहते हैं कि सरकार और समाज के सहयोग से इन गरीब बच्चों के लिए एक हैंड पंप लगना चाहिए। इसके लिए उन्होंने सोशल ​मीडिया के माध्यम से एक अपील भी जारी की है, और ताकि इन बच्चों का भविष्य बनाने और इनके लिए जरूरी सुविधाएं जुटाने में मदद मिल सके। अपील में उन्होंने अकाउंट नंबर 3637 8382 277, IFSC code 0012303, कछवा मिर्ज़ापुर ब्रांच, उत्तर प्रदेश का विवरण दिया है। 

May 17, 2017

स्वतंत्रता सेनानी की जमीन पर कलक्टर ने कराया कब्ज़ा

जिस स्थल पर बजाज इलेक्ट्रिकल जबरन टावर लगाना चाह रही है, वह भूमि मेरे दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी रामखेलावन शास्त्री  की है और उस स्थल पर उनकी अंतिम इच्छा को मूर्त रूप देने के लिए एक शोध संस्थान प्रस्तावित है.....

जनज्वार, पटना। चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में बापू गांधी के साथ वर्धा प्रवास करने वाले प्रसिद्ध गाँधीवादी एवं स्वतंत्रता सेनानी रामखेलावन शास्त्री की मंझौल स्थित विरासत पर बेगूसराय के जिलाधिकारी ने जबरन कब्जा जमा लिया है। 

दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी की विरासत पर जबरन लगा टावर
7 मई को 100 से ज्यादा पुलिस बल की ताकत से उन्होंने इस कार्रवाई को अंजाम दिया और स्वतंत्रता सेनानी के उत्तराधिकारियों के विरोध के बावजूद वहां पर जबरन 1 लाख 32 हजार का ट्रांसमीशन टावर खड़ा करवाया।

दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी के पौत्र पुष्पराज के मुताबिक जिस स्थल पर जिलाधिकारी ने बंदूक की ताकत से जबरन कब्ज़ा किया, वह बापू गांधी के सहकर्मी रहे जनपद के एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी की भूमि थी और उनकी विरासत को कायम रखने के लिए उस स्थल पर "रामखेलावन शास्त्री स्मृति गरीबी एवं समाज अध्ययन शोध संस्थान" प्रस्तावित था। पुष्पराज चर्चित पुस्तक नंदीग्राम डायरी के लेखक हैं और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहते हैं।

इस मामले में जिला प्रशासन को 21 मार्च 2017 को उन्होंने लिखित आवेदन देकर सूचित किया था कि जिस स्थल पर बजाज इलेक्ट्रिकल जबरन टावर लगाना चाह रही है, वह भूमि मेरे दिवंगत दादा स्वतंत्रता सेनानी की है और उस स्थल पर उनकी अंतिम इच्छा को मूर्त रूप देने के लिए एक शोध संस्थान प्रस्तावित है।

वहीं ट्रांसमीशन टावर के निर्माण में लगी बजाज इलेक्ट्रिकल के विरूद्ध शिकायतों की लंबी फेहरिस्त है। इसी मार्च और अप्रैल माह में बजाज इलेक्ट्रिकल के द्वारा किसानों की जमीन पर जबरन अतिक्रमण के मामले में जिला लोक शिकायत प्राधिकरण ने कंपनी से जुर्माना कर कुछ किसानों को 1 लाख 20 हजार का मुआवजा दिलवाया था। 

पुष्पराज कहते हैं, जिला प्रशासन ने सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में गांधी के एक सहकर्मी स्वतंत्रता सेनानी के परिवार के साथ जिस तरह अपराधियों की तरह के बर्ताव किया है, यह अकल्पनीय था। बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री ने रामखेलावन शास्त्री की मृत्यु से पूर्व स्वतः संज्ञान लेते हुए राजकीय सम्मान के साथ उनकी चिकित्सा का निर्देश स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों को दिया था औऱ 2008 के मार्च माह में स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारी पटना से मंझौल पहुँचे थे। 

रामखेलावन शास्त्री बापू-गाँधी के साथ वर्धा प्रवास करने वाले बिहार के अंतिम स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने नैतिकता के आधार पर स्वतंत्रता सेनानी पेंशन को अस्वीकार किया था। वर्धा प्रवास से लौटकर उन्होंने तत्कालीन मुंगेर जिला में "टीक जनेऊ आंदोलन" का सूत्रपात किया था और हजारों लोगों ने उस आंदोलन के प्रभाव में अपने टीक -जनेऊ हटाए थे। उन्हें कुछ वर्षों तक धार्मिक बहिष्कार भी झेलना पड़ा था। 

मंझौल में दलितों को शिक्षित करने, स्त्रियों को शिक्षित करने और मुसहर समाज को जमीदारों के कोप से बचाने की उनकी ऐतिहासिक भूमिका अविस्मरणीय है। मंझौल के सभी शिक्षण संस्थानों की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके समाज सुधार आंदोलन से खफा जमींदारों ने उन्हें "टीककट्टा मुसलमन्ना" घोषित किया था।आजादी से पूर्व अस्पृश्यता निवारण के राष्ट्रीय कांग्रेस के अभियान के तहत शास्त्री जी को हरिजन सेवक संघ और मुसहर सेवक संघ की जिम्मेवारी दी गयी थी।

गौरतलब है कि जिलाधिकारी बेगूसराय को 21 मार्च 2017 को दिए गए आवेदन की प्रति की एक प्रतिलिपि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी दी गई थी, मगर मामले में कोई संज्ञान नहीं लिया गया।

अभियुक्त शिवराज को होना था लेकिन फंस रहे दिग्विजय सिंह

एमपी अजब है, एमपी गजब है। घोटाला और कोई करता है और फंसता कोई और नजर आता है। मध्य प्रदेश के भाजपाई पिछले ​कुछ दिनों से ऐसे पेश आ रहे हैं मानो व्यापमं घोटाला भाजपा सरकार में नहीं कांग्रेस सरकार में हुआ है और उसके जिम्मेदार 'बेचारे' दिग्विजय सिंह हैं...
जावेद अनीस

मई का महीना मुख्यमंत्री शिवराज के लिए राहत भरी खबर लाया है। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह व्यापम घोटाले में शिवराज सिंह चौहान के सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप लगाते आ रहे हैं, लेकिन इस मामले में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर करके कहा है कि सबूत के तौर पर जिस सीडी और पेन ड्राइव को पेश किया गया था वे फर्जी पाए गये हैं। 


सीबीआई का कहना है कि इसमें याचिकाकर्ताओं द्वारा  छेड़छाड़ की गयी है, जिसके बाद भाजपा इसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को क्लीनचिट दिए जाने के तौर पर पेश कर रही है। सीबीआई के हलफनामे के बाद सूबे में सियासत गर्माई हुई है और व्यापम घोटाले ने एक बार फिर नया मोड़ लेता जा रहा है। एक तरफ भाजपा कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग कर रही है, वहीं कांग्रेस का कहना है कि क्लीनचिट देने का काम अदालत का है सीबीआई का नहीं।


सूत्रों के मुताबिक व्यापमं घोटाले को लेकर सीबीआई की जांच का ट्रेक बदल सकता है, इससे याचिकाकर्ता दिग्विजय सिंह की मुश्किल में पड़ सकते हैं क्योंकि सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है वह इस मामले में दिग्विजय सिंह और दूसरों के खिलाफ कार्यवाही कर सकती है. 

व्यापमं घोटाले में भाजपा पहली बार इतनी आक्रमक नजर आ रही है। मप्र सरकार के तीन वरिष्ठ  मंत्रियों द्वारा बाकायदा सीबीआई को ज्ञापन सौंपकर दिग्विजिय सिंह और दो व्हिसल ब्लोअर के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की गयी है। कांग्रेस की तरफ से इस मुद्दे पर  पलटवार भी किया गया है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा है कि व्यापम के मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह कभी क्लीन नहीं हो सकते, क्योंकि इस दौरान वही मुख्यमंत्री रहे हैं। जब इस दौरान की सभी उपलब्धियां उनके खाते में हैं, तो व्यापम घोटाले की कालिख से वे कैसे बच सकते हैं? 

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री खुद विधानसभा में 1000 प्रकरणों में गड़बड़ी होना स्वीकार चुके हैं, जिसमें 2500 से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें से 21 सौ से ज्यादा को गिरफ्तार किया गया, वहीं चार सौ से ज्यादा अब भी फरार हैं। इस  मामले से जुड़े 50 से ज्यादा लोगों की मौत भी हो चुकी है,आज भी सैकडों लोग जेल में नही हैं। अजय सिंह ने मांग की है कि  अगर सीबीआई वाकई में सच्चाई सामने लाना चाहती है तो उसे मुख्यमंत्री, उनकी पत्नी और जेल से छूटे पूर्व मंत्रियों का नार्को टेस्ट कराना चाहिए। ज्योतिरादत्यि सिंधिया ने भी उनका बचाव करते हुए कहा है कि, व्यापमं एक बहुत बड़ा घोटाला है सीबीआई ने अपने हलफनामे में शिवराज सिंह को क्लीनचिट दे दी हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना अभी बाकी है।

इससे पूर्व इस साल मार्च के आखिरी दिनों में विधानसभा में कैग की रिपोर्ट सामने आयी थी जिसमें व्यापमं को लेकर शिवराज सिंह की सरकार पर कई गंभीर सवाल उठाये गये थे। इस रिपोर्ट में 2004 से 2014 के बीच के दस सालों की व्यापमं की कार्यप्रणाली को लेकर सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए बताया गया था कि कैसे इसकी पूरी प्रक्रिया अपारदर्शी थी और बहुत ही सुनियोजित तरीके से नियमों को ताक पर रख दिया था।

रिपोर्ट के अनुसार व्यापमं का काम केवल प्रवेश परीक्षाएं आयोजित कराना था, लेकिन वर्ष 2004 के बाद वो भर्ती परीक्षाएं आयोजित करने लगा, इसके लिये व्यापमं के पास ना तो कोई विशेषज्ञता थी और ना ही इसके लिए म.प्र. लोकसेवा आयोग या किसी अन्य एजेंसी से परामर्श लिया गया। यहाँ तक कि इसकी जानकारी तकनीकी शिक्षा विभाग को भी नहीं दी गई और इस तरह से राज्य कर्मचारी चयन आयोग की अनदेखी करके राज्य सरकार ने व्यापमं को सभी सरकारी नियुक्तियों का काम दे दिया और राज्य सेवा में से इसमें शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गयी। 

रिपोर्ट के अनुसार व्यापमं घोटाला सामने आने के बाद भी व्यावसायिक परीक्षा मंडल में परीक्षा लेने के लिए कोई नियामक ढांचा नहीं था। रिपोर्ट में जो सबसे खतरनाक बात बतायी गयी है वो यह है कि प्रदेश सरकार ने कैग को व्यापमं से सम्बंधित दस्तावेजों की जांच की मंजूरी देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि व्यापमं सरकारी संस्था नहीं है, जबकि व्यापमं पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में काम करने वाली संस्था थी।

‘कैग’ की रिपोर्ट ने कांग्रेस को हमलावर होने का मौका दे दिया था विपक्ष के नेता अजय सिंह ने शिवराज सिंह का इस्तीफ़ा मांगते हुए कहा था कि, अब यह सवाल नहीं है कि मुख्यमंत्री व्यापमं घोटाले में दोषी हैं या नहीं, लेकिन यह तो स्पष्ट हो चुका है कि यह घोटाला उनके 13 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ है, उनके एक मंत्री सहित भाजपा के पदाधिकारी जेल जा चुके हैं और उनके बड़े नेताओं से लेकर संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी सब जाँच के घेरे में हैं। इसलिए अब उन्हें मुख्यमंत्री चौहान के इस्तीफे से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। 

दूसरी तरफ  भाजपा ने उलटे 'कैग' जैसी संवैधानिक संस्था पर निशाना साधा था और कैग द्वारा मीडिया को जानकारी दिए जाने को ‘सनसनी फैलाने वाला कदम बताते हुए उस पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का आरोप लगाया था। 

व्यापमं घोटाले ने मध्य प्रदेश को देश ही नहीं, पूरी दुनिया में बदनाम किया है। यह भारत के सबसे बड़े और अमानवीय घोटालों में से एक है, जिसने सूबे के लाखों युवाओं के अरमानों और कैरियर के साथ खिलवाड़ करने का काम किया है। इस घोटाले की चपेट में आये ज्यादातर युवा गरीब, किसान, मजदूर और मध्यम वर्गीय परिवारों से हैं जो तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपना पेट काटकर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं जिससे उनके बच्चे अच्छी उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन में स्थायित्व ला सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें।

बहुत ही सुनियोजित तरिके से चलाये गये इस गोरखधंधे में मंत्री से लेकर आला अफसर तक शामिल पाए गये। इसके छीटें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक भी गए। व्यापमं घोटाले की परतें खुलने के बाद इस घोटाले से जुड़े लोगों की असामयिक मौतों का सिलसिला सा चल पड़ा। लेकिन इन सबका शिवराज सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। शुरुआत में तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस घोटाले की जांच एसआईटी से ही कराने पर अड़े रहे, लेकिन एक के बाद एक मौतों और राष्ट्रीय -अंतराष्ट्रीय मीडिया ने जब इस मुद्दे की परतें खोलनी शुरू की तो उन्हें सीबीआई जाँच की अनुशंसा के लिए मजबूर होना पड़ा।

मामला सीबीआई के हाथों में जाने के बाद व्यापमं का मुद्दा शांत पड़ने लगा था, मीडिया द्वारा भी इसकी रिपोर्टिंग लगभग छोड़ दी गयी। उधर एक के बाद एक चुनाव/ उपचुनाव जीतकर शिवराज सिंह चौहान अपनी स्थिति मजबूत करते जा रहे थे। मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा यह दावा किया जाने लगा था कि व्यापमं घोटाले का शिवराज की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं हुआ है। कुल मिलकर मामला लगभग ठंडा पड़ चुका था, विपक्ष थक चुका था और सरकार से लेकर संगठन तक सभी राहत मना रहे थे।

इसे केवल एक घोटाले के रूप में नहीं, बल्कि राज्य समर्थित नकल उद्योग के रूप में देखा जात है, जिसने हजारों नौजवानों का कैरियर खराब कर दिया। व्यापमं घोटाले का खुलासा 2013 में तब हुआ, जब पुलिस ने एमबीबीएस की भर्ती परीक्षा में बैठे कुछ फर्जी छात्रों को गिरफ्तार किया। ये छात्र दूसरे छात्रों के नाम पर परीक्षा दे रहे थे। बाद में पता चला कि प्रदेश में सालों से एक बड़ा रैकेट चल रहा है, जिसके अंतर्गत फर्जीवाड़ा करके सरकारी नौकरियों रेवड़ियों की तरह बांटी गयीं हैं। 

मामला उजागर होने के बाद व्यापमं मामले से जुड़े 50 से ज्यादा अभियुक्तों और गवाहों की रहस्यमय ढंग से मौत हो चुकी है जो इसकी भयावहता को दर्शाता है। इस मामले में 21 सौ से ज्यादा को गिरफ्तारियाँ हुई हैं, लेकिन जो गिरफ्तारियां हुई हैं, उनमें ज्यादातर या तो छात्र शामिल हैं या उनके अभिभावक या बिचौलिये। बड़ी मछलियाँ तो बची ही रह गयी हैं। हालांकि 2014 में मध्य प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा जरूर गिरफ्तार हुए थे जिन पर व्यापमं के मुखिया के तौर पर इस पूरे खेल में सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप था, लेकिन दिसम्बर 2015 में वे रिहा भी हो गये थे. पहले पुलिस फिर विशेष जांच दल और अब सीबीआई द्वारा इस मामले की जांच की जा रही है, लेकिन अभी तक इस महाघोटाले के पीछे के असली ताकतों के बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका है. 

2017 व्यापम के लिए बहुत नाटकीय साबित हो रहा है। पहले तो कैग रिपोर्ट में सीधे तौर पर शिवराज सरकार की मंशा पर सवाल उठाये गये थे, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई का हलफनामा आया है जिसमें आरोप लगाने वाले ही घेरे में नजर आ रहे हैं, ऐसा लगता है पूरा मामला गोल पहिये पर सवार हो चुका है। जाहिर है इस महाघोटाले के पीड़ितों के लिए इंसाफ के दिन अभी दूर हैं।   
edtorjanjwar@gmail.com

May 13, 2017

4 हजार सैनिक, 18 घंटे का सर्च आॅपरेशन पर नहीं मिला एक भी आतंकवादी

1989 के बाद पहली बार चला ऐसा आॅपरेशन, लोग खौफ के साये में
खतरनाक बात यह है कि बंदूकों के मुकाबले पत्थर फेंक रही 12 से 18 वर्ष के कश्मीरी युवाओं की इस नई पीढ़ी में सबसे ज्यादा विद्यार्थी हैं और भाड़े के पत्थरबाज अब पुरानी कहानी बन चुकी है... 

जम्मू—कश्मीर से आई.डी. खजूरिया की रिपोर्ट 

जम्मू के अखनूर में तैनात लेफ्टिनेंट उमर फैयाज की 10 मई को कश्मीर के शोपियां में आतंकियों ने हत्या कर दी थी। फैयाज की 10 मई को उस समय हत्या कर दी गयी थी जब वह एक शादी में शामिल होने अपने शोपियां गए थे। लेफ्टिनेंट फैयाज कुलगाम के रहने वाले थे।

लेफ्टिनेंट की हत्या के बाद से फिर एक बार जवाबी कार्रवाई और आतंकियों को मटियामेट कर देने की कसमें भारतीय सरकारी मशीनरियां खाने लगी हैं। अगर आप कश्मीर की थोड़ी जानकारी रखते हैं और आतंकी घटनाओं और पीड़ित कश्मीरी अवाम के प्रदर्शनों से वाकिफ हैं तो जवाबी कार्रवाई की कसमें बहुत मामूली किस्म का चुटकुला जान पड़ेंगी जिसको सुनकर न हंसना आता है न रोना। 


जैसे कि अब और नहीं, ईंट से ईंट बजा देंगे, पाकिस्तान के दस सिर लाएंगे, एक—एक आतंकियों का सफाया होकर रहेगा, आदि—इत्यादि।

पर किसी भी सरकारी मशीनरी को इस बात की चिंता नहीं है कि जम्मू—कश्मीर में पिछले 27 वर्षों से चल रही लाशों की खेती कब बंद होगी, कब जनाजे उठने थमेंगे और कब वहां के नागरिक अमन और चैन की जिंदगी से बावस्ता हो पाएंगे? 

क्या इस सवाल के बारे में सोचे बिना सरकार जवानों की हत्या और प्रतिहत्या का सिलसिला रोक पाएगी? कैसे वह देश की सुरक्षा में तैनात जवानों को गलत राजनीतिक रणनीति और सांप्रदायिक संतुष्टता के दोजख से बचाएगी? पहली फिक्र अवाम की किए बगैर कोई हल निकल पाएगा? 

मेरा मानना है, नहीं। पर सरकार ऐसा नहीं सोच पाती। सेना प्रमुख बिपिन रावत बयान देते हैं कि हथियार आतंकियों से निपट लेंगे। मानो हथियार आकाश में चलेंगे और आतंकवाद पर कोई हवाई निशाना होगा। बिपिन रावत की उसी जिद का नतीजा था कि शोपियां के 25 गांवों में 4 मई को 4 हजार सेना के जवानों ने सर्च आॅ​परेशन किया। इसके अलावा हेलीकॉप्टर भी गांव के ऊपर दिन भर मंडराते रहे। 

दिनभर चले 4 हजार सैनिकों के आॅपेरशन में पूरे दिन और देर रात तक घर के लोग बाहर सड़कों पर पड़े रहे। उनके अनाजों, कपड़ों और सामानों को सेना ने तहस—नहस कर दिया। आप इसे सर्च आॅपरेशन की सामान्य प्रक्रिया भी कह सकते हैं? पर कश्मीर की आवाम नहीं कह सकती। 

बाजारू मीडिया में इस सर्च आॅपेरशन के बारे में ऐसे प्रचारित किया गया मानो किसी दुश्मन देश पर हमला हुआ हो। मीडिया विजय गीत गाती रही पर एक पंक्ति का सच आपको नहीं बताया। 

आइए हम यहां बता देते हैं... 

मीडिया ने यह नहीं बताया कि जिस सर्च आॅ​परेशन ने 1990 के बाद जैसे हालात मानने को कश्मीरी जनता को बाध्य कर दिया है, उस 4000 सैनिकों वाले आॅ​परेशन में एक आतंकी नहीं मिला। हजारों सैनिकों की फौज फाटा, कुत्तों का रेला और हेलीकॉप्टर मिलकर एक आतंकवादी नहीं पकड़ सके पर महीनों और वर्षों में खरीदे—बनाए सामानों और घरों को सेना ने जरूर तोड़—फोड़ कर दिया, अनाज और भोजन सामग्री को लगभग बर्बाद कर दिया।

इसकी भरपाई देश को किस रूप में करनी पड़ती है? जनता के असहयोग के रूप में। उदाहरण आपके सामने है। एक कश्मीरी नौजवान मर जाए तो सड़कों पर कश्मीर उमड़ पड़ता है, लेकिन उसी कश्मीर का एक सैनिक, वह भी मुसमलान उमर फैयाज मारा गया तो नजदीकी रिश्तेदारों, कुछ ग्रामीणों और मीडिया वालों को छोड़ आम लोग नहीं आए? 

न आना अपने आप में संदेश है, विग्रह है, सत्याग्रह है और साथ ही सबसे बढ़कर असहयोग है। इस जन असहयोग से सेना की बंदूक कैसे निपट पाएगी। अक्टूबर 2016 में बुरहान बानी के मारे जाने से पहले तक इतने व्यापक विरोध प्रदर्शन होने बंद हो गए थे। पर सरकार नहीं चेती। उसने शांति और वार्ता की सभी संभावनाओं को एक तरफ से नकार दिया। 

उसी नकार का घातक परिणाम हमारे सामने आ रहा है। कश्मीर के प्रदर्शनकारियों में सबसे बड़ी तादाद 12—13 साल से लेकर 17—18 वर्ष के बच्चों की है, जिनके अंदर यह भावना नए सिरे से भर रही है कि भारत हमारा देश नहीं है। ये सेना हमारी नहीं है। पुलिस और फौज भारत के लिए काम करती है और हमारे निर्दोष लोगों को मारती है। ये युवाओं की ऐसी नई पीढ़ी है जिसको मौत से कोई डर नहीं, गोलियों का कोई भय नहीं। 

आप ठंडे दिल से सोचिए कि इन भावनाओं को निकालने और भारत के प्रति प्रेम व भरोसा पनपाने के काम बंदूकें आएंगी या वार्ताएं और शांति का पथ। 

​पर सरकार को शांतिपथ पर बढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। सरकारों की एकतरफा सैद्धांतिक समझ और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने आज जम्मू—कश्मीर को बर्बादी के कगार पर लाकर रख दिया है। यहां लाखों कब्रें बन चुकी हैं। पिछले 27 सालों में हजारों गुमशुदा नौजवानों की तलाश, हजारों बेवा औरतों की दर्द भरी कहानियॉं जन्नत-ए-कश्मीर के लिए मौलिक सवाल बन चुका है। 

अमूमन देखा गया है कि हमारे राजनेता हमेशा की तरह सिद्धांत को व्यवहार में उतारने की बात करते रहे, मगर बातचीत के बजाय दबाव व वोटों की राजनीति पर कश्मीर की बली चढाई जाती रही। चुनाव जीतने वाले कहते रहे कि एक सिर के बजाये 10 सिर लाने होंगे। बातचीत आतंकी से नहीं होनी चाहिए। सत्ता में बैठे हुए लोग डरते रहे और बंदूक की तादाद बढ़ाते रहे। 

मगर इस तरफ कोई ध्यान ही नहीं  दिया  कि  काले कानूनों व सुरक्षा बलों का दबाव एक नई नस्ल बना चुका है, जिसको मौत से कोई डर नहीं है। पिछले साल जुलाई माह से लगातार नौजवान कुर्बानियां देते जा रहे हैं और भारतीय सेनाओं के जवान भी शहीद हो रहे हैं।

बॉर्डर पर रोज़ गोलीबारी से आम जनता त्रस्त है और उनके जानमाल का नुकसान हो रही है, फसलें तबाह हो रही हैं। दूसरी तरफ कश्मीरी जनता का रुख देखकर लगता है कि इन सब कार्रवाइयों से वह उनका हौसला पस्त होने वाला नहीं है, न ही वे इस दबाव की नीति के आगे घुटने टेकेंगे।
editorjanjwar@gmail.com

मौत का खौफ और गोलियों का डर नहीं कश्मीर की नई पीढ़ी में

खतरनाक बात यह है कि बंदूकों के मुकाबले पत्थर फेंक रही 12 से 18 वर्ष के कश्मीरी युवाओं की इस नई पीढ़ी में सबसे ज्यादा विद्यार्थी हैं और भाड़े के पत्थरबाज अब पुरानी कहानी बन चुकी है... 

जम्मू—कश्मीर से आई.डी. खजूरिया की रिपोर्ट 

जम्मू के अखनूर में तैनात लेफ्टिनेंट उमर फैयाज की 10 मई को कश्मीर के शोपियां में आतंकियों ने हत्या कर दी थी। फैयाज की 10 मई को उस समय हत्या कर दी गयी थी जब वह एक शादी में शामिल होने अपने शोपियां गए थे। लेफ्टिनेंट फैयाज कुलगाम के रहने वाले थे।

लेफ्टिनेंट की हत्या के बाद से फिर एक बार जवाबी कार्रवाई और आतंकियों को मटियामेट कर देने की कसमें भारतीय सरकारी मशीनरियां खाने लगी हैं। अगर आप कश्मीर की थोड़ी जानकारी रखते हैं और आतंकी घटनाओं और पीड़ित कश्मीरी अवाम के प्रदर्शनों से वाकिफ हैं तो जवाबी कार्रवाई की कसमें बहुत मामूली किस्म का चुटकुला जान पड़ेंगी जिसको सुनकर न हंसना आता है न रोना। 


जैसे कि अब और नहीं, ईंट से ईंट बजा देंगे, पाकिस्तान के दस सिर लाएंगे, एक—एक आतंकियों का सफाया होकर रहेगा, आदि—इत्यादि।

पर किसी भी सरकारी मशीनरी को इस बात की चिंता नहीं है कि जम्मू—कश्मीर में पिछले 27 वर्षों से चल रही लाशों की खेती कब बंद होगी, कब जनाजे उठने थमेंगे और कब वहां के नागरिक अमन और चैन की जिंदगी से बावस्ता हो पाएंगे? 

क्या इस सवाल के बारे में सोचे बिना सरकार जवानों की हत्या और प्रतिहत्या का सिलसिला रोक पाएगी? कैसे वह देश की सुरक्षा में तैनात जवानों को गलत राजनीतिक रणनीति और सांप्रदायिक संतुष्टता की दोजख से बचाएगी? पहली फिक्र अवाम की किए बगैर कोई हल निकल पाएगा? 

मेरा मानना है, नहीं। पर सरकार ऐसा नहीं सोच पाती। सेना प्रमुख बिपिन रावत बयान देते हैं कि हथियार आतंकियों से निपट लेंगे। मानो हथियार आकाश में चलेंगे और आतंकवाद पर कोई हवाई निशाना होगा। बिपिन रावत की उसी जिद का नतीजा था कि शोपियां के 25 गांवों में 4 मई को 4 हजार सेना के जवानों ने सर्च आॅ​परेशन किया। इसके अलावा हेलीकॉप्टर भी गांव के उपर दिनभर मंडराते रहे। 

दिनभर चले 4 हजार सैनिकों के आॅपेरशन में पूरे दिन और देर रात तक घर के लोग बाहर सड़कों पर पड़े रहे। उनके अनाजों, कपड़ों और सामानों को सेना ने तहस—नहस कर दिया। आप इसे सर्च आॅपरेशन की सामान्य प्रक्रिया भी कह सकते हैं? पर कश्मीर की आवाम नहीं कह सकती। 

बाजारू मीडिया में इस सर्च आॅपेरशन के बारे में ऐसे छापा गया मानो किसी दुश्मन देश पर हमला हुआ हो। मीडिया विजय गीत गाती रही पर एक पंक्ति का सच आपको नहीं बताया। 

आइए हम यहां बता देते हैं... 

मीडिया ने यह नहीं बताया कि जिस सर्च आॅ​परेशन ने 1990 के बाद जैसे हालात मानने को कश्मीरी जनता को बाध्य कर दिया है, उस 4000 सैनिकों वाले आॅ​परेशन में एक आतंकी नहीं मिला। हजारों सैनिकों की फौज फाटा, कुत्तों का रेला और हेलकॉप्टर मिलकर एक आतंकवादी नहीं पकड़ सके पर महीनों और वर्षों में खरीदे—बनाए सामानों और घरों को सेना ने जरूर तोड़—फोड़ कर दिया, अनाज और भोजन सामग्री लगभग बर्बाद कर दिया।
इसकी भरपाई देश को किस रूप में करनी पड़ती है? जनता के असहयोग के रूप में। उदाहरण आपके सामने है। एक कश्मीरी नौजवान मर जाए तो सड़कों पर कश्मीर उमड़ पड़ता है लेकिन उसी कश्मीर का एक सैनिक, वह भी मुसमलान उमर फैयाज मारा गया तो नजदीकी रिश्तेदारों, कुछ ग्रामीणों और मीडिया वालों को छोड़ आम लोग नहीं आए? 

न आना अपने आप में संदेश है, विग्रह है, सत्याग्रह है और साथ ही सबसे बढ़कर असहयोग है। इस जन असहयोग से सेना की बंदूक कैसे निपट पाएगी। अक्टूबर 2016 में बुरहान बानी के मारे जाने से पहले तक इतने व्यापक विरोध प्रदर्शन होने बंद हो गए थे। पर सरकार नहीं चेती। उसने शांति और वार्ता की सभी संभावनाओं को एक तरफ से नकार दिया। 

उसी नकार का घातक परिणाम हमारे सामने आ रहा है। कश्मीर के प्रदर्शनकारियों में सबसे बड़ी तादाद 12—13 साल से लेकर 17—18 वर्ष के बच्चों की है जिनके अंदर यह भावना नए सिरे से भर रही है कि भारत हमारा देश नहीं है। ये सेना हमारी नहीं है। पुलिस और फौज भारत के लिए काम करती है और हमारे निर्दोष लोगों को मारती है। ये युवाओं की ऐसी नई पीढ़ी है जिसको मौत से कोई डर नहीं, गोलियों का कोई भय नहीं। 

आप ठंडे दिल से सोचिए कि इन भावनाओं को निकालने और भारत के प्रति प्रेम व भरोसा पनपाने के काम बंदूकें आएंगी या वार्ताएं और शांति का पथ। 

​पर सरकार को शांतिपथ पर बढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। सरकारों के एकतरफा सैद्धांतिक समझ और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने आज जम्मू—कश्मीर को बर्बादी के कगार पर लाकर रख दिया है। यहां लाखों कब्रें बन चुकी हैं। पिछले 27 सालों में हजारों गुमशुदा नौजवानों की तलाश, हजारों बेवा औरतों की दर्द भरी कहानियॉं जन्नत-ए-कश्मीर के लिए मौलिक सवाल बन चुका है। 

अमूमन देखा गया है कि हमारे राजनेता हमेशा की तरह सिद्धांत को व्यवहार में उतारने की बात करते रहे, मगर बातचीत के बजाय दबाव व वोटों की राजनीति पर कश्मीर की बली चढाई जाती रही। चुनाव जीतने वाले कहते रहे कि एक सिर के बजाये 10 सिर लाने होंगे। बातचीत आतंकी से नहीं होनी चाहिए। सत्ता में बैठे हुए लोग डरते रहे और बंदूक की तादाद बढ़ाते रहे। 

मगर इस तरफ कोई ध्यान ही नहीं  दिया  कि  काले कानूनों व सुरक्षा बलों का दबाव एक नई नस्ल बना चुका है, जिसको मौत से कोई डर नहीं है। पिछले साल जुलाई माह से लगातार नौजवान कुर्बानियां देते जा रहे हैं और भारतीय सेनाओं के जवान भी शहीद हो रहे हैं।

बॉर्डर पर रोज़ गोलीबारी से आम जनता त्रस्त है और उनके जानमाल का नुकसान हो रही है, फसलें तबाह हो रही हैं। दूसरी तरफ कश्मीरी जनता का रुख देखकर लगता है कि इन सब कार्रवाइयों से वह उनका हौसला पस्त होने वाला नहीं है, न ही वे इस दबाव की नीति के आगे घुटने टेकेंगे।

May 10, 2017

जुड़वा दिमाग जैसे हैं मोदी और ट्रंप

पूर्व आइपीएस विकास नारायण राय इन दिनों अमेरिका में हैं। वे लगातार भारतीय समाज, सुरक्षा और राजनीति पर लिखते रहते हैं। अबकी उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी की अचंभित करने वाली समानताओं, मसखरेपन, इतिहास ज्ञान और समाजदृष्टि पर बहुत ही तथ्यात्मक और दिलचस्प टिप्पणी की है,  पढ़िए पूरा लेख विस्तार से...

अमेरिका से जनज्वार के लिए  विकास नारायण राय 

 
रूरी नहीं जो राष्ट्र नेता इतिहास बनाने निकलते हैं, उन्हें इतिहास की समझ भी हो| ऐसे में उनके हाथों घोर अनर्थ होने या भारी भ्रान्ति फ़ैलने की संभावना बनी रहती है| नेपोलियन, हिटलर, मुसोलिनी, तोजो, याह्या खान, सद्दाम हुसैन जैसों के आत्मघाती उदाहरण साक्षात हैं|

मोदी और ट्रम्प फिलहाल उन्हीं पद चिन्हों पर न भी चलते दिख रहे हों पर उनकी इतिहास शून्यता गंभीर राजनीतिक आशंकाओं को हवा दे रही है और साथ ही उन्हें मखौल का पात्र भी बना रही है| लगता है, जैसे राजनीतिक शिखर छूने की जल्दी में ये दोनों महानुभाव इतिहास बनाने नहीं स्वयं इतिहास बनने के कगार पर हों|

मोदी और ट्रम्प को एक खाने में रखने वालों को भी आज शायद ही उनके समर्थकों की एक जैसी हताशा भरी नियति से हैरानी हो| फ़िलहाल दोनों के भक्त उनके चुनाव प्रचार के दौर का थूका हुआ चाटने को मजबूर नजर आते हैं| ट्रम्प में रूस की सामरिक दिलचस्पी की छाया उनके राष्ट्रपति अभियान पर लगातार बनी रही थी, और अब अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करते पहलुओं की छानबीन अमेरिकी सेनेट की न्यायिक समिति कर रही है|

स प्रकरण का आपराधिक पक्ष एफबीआई की जाँच का विषय है| चुनाव के दौरान रूस में अपनी व्यावसायिक स्थिति को लेकर ट्रम्प ने जो झूठे-सच्चे पैंतरे बदले, उन्हें सही ठहरा पाना उत्तरोत्तर कठिन होता जा रहा है| यहाँ तक कि ट्रम्प ने, अमेरिकी इतिहास में पहली बार, राष्ट्रपति की जांच कर रही एफबीआई के डायरेक्टर को ही बरखास्त कर दिया|

मोदी ने अपने चुनाव अभियान में पाकिस्तान के विरुद्ध युद्धोन्माद खड़ा करने में ‘छप्पन इंच के सीने’ से लेकर ‘एक के बदले सौ सर’ जैसी अव्यावहारिक डींगें जम कर हांकी थीं| तीन वर्षों के उनके इतिहास-दृष्टि रहित शासन में काश्मीर की उत्तरोत्तर बिगड़ती स्थित ने उनके समर्थकों की बोलती बंद कर दी है|

वे समझ नहीं पा रहे हैं कि अपने ‘नरेंद्रबली’ की पिलपिलाती छवि को कैसे फ़िल्मी ‘महाबली’ के रूप में दुरुस्त करें| मोदी का रास्ता सीमित होते-होते एकमात्र पाकिस्तान से युद्ध के विकल्प की ओर बढ़ रहा है| दो परमाणु शक्तियों के बीच यह एक मिलीभगत का युद्ध ही होगा, जिसके लिए अमेरिका का रजामंद होना जरूरी है| लगता नहीं कि ट्रम्प के अमेरिका के पास इसके लिए अभी समय है|

क्या वे अपने कार्य भार में इतिहास बोध के महत्व को कभी समझ पायेंगे- मोदी और ट्रम्प? डेढ़ दशक भी नहीं हुये, मोदी की साख इतनी कम होती थी कि उनको प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के हेलिकॉप्टर में घुसने नहीं दिया जाता था| आज वे स्वयं धाकड़ प्रधानमन्त्री बने बैठे हैं|

ट्रम्प को भी शायद ही किसी ने गंभीरता से लिया हो जब वे अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार बनने की दौड़ में उतरे| न सिर्फ वे भारी बहुमत से उम्मीदवार बने बल्कि उन्होंने बेहद करीबी मुकाबले में हिलेरी क्लिंटन को हराकर राष्ट्रपति पद भी हथिया लिया|

दोनों, ट्रम्प और मोदी, अपनी-अपनी तरह से अनुभव के धनी कहे जायेंगे और ट्रम्प के शब्दों में ‘डील’ करने में माहिर भी| तब भी, उनकी अभूतपूर्व राजनीतिक सफलताओं के बावजूद, उनकी राष्ट्रीय स्वीकार्यता पर बढ़ते प्रश्न चिन्ह की मुख्य वजह रही है उनकी कार्यशैली से ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का नदारद होना|

ट्रम्प को अपने नव-नियुक्त एनएसए जनरल फ्लिन को उनके रूस से संबंधों के सार्वजनिक होने पर बरखास्त करना पड़ा| जबकि मोदी की हालिया चुनावी सफलताओं पर इवीएम जालसाजी के आरोप चिपकने लगे हैं| ट्रम्प के सत्ता संभालते ही अमेरिका में मुस्लिम प्रवेश पर रोक वहां की अदालतों में एक दिन भी नहीं ठहर सकी| भारत में नियमित मुस्लिम वर्जना मोदी की विकास यात्रा में असहनीय बोझ हो चली है| जाहिर है, ऐतिहासिकता से मुंह मोड़ कर राष्ट्रीय नेतृत्व देने के अपने खतरे हैं|
  
किसी को बताने की जरूरत नहीं कि ‘पप्पू’ कहने पर भारतीय राजनीति का कौन सा चेहरा याद आता है| अमेरिकी राजनीति में लगता है ट्रम्प भी उसी स्थिति की ओर बढ़ रहे है| और मोदी? याद कीजिये, बिहार चुनाव में मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान से लगे तक्षशिला को बिहार का हिस्सा घोषित कर डाला था| यहाँ तक कि विज्ञान कांग्रेस में, गणेश के धड़ से हाथी का सर जोड़ने की दन्त कथा को उन्होंने प्राचीन भारत में अति विकसित सर्जरी के ‘इतिहास’ से जोड़ दिया| खासी किरकिरी के बाद अब वे अपना इतिहास बोध सुरक्षित स्तरों पर ही व्यक्त करते हैं|

सलन, ‘साठ साल बनाम साठ महीनों’ जैसी प्रचार चर्चाओं में| या विदेशी दौरों में शेखी मारकर कि उनसे कितने दशक पहले तक कोई भारतीय प्रधानमन्त्री उस देश में नहीं पहुंचा| मानना पड़ेगा, इन सब के लिए भारतीय मीडिया की मेहरबानी कैसे हासिल करनी है, मोदी बखूबी समझते हैं| ट्रम्प ने अमेरिका में ‘फेक मीडिया’ शब्द ईजाद किया जबकि मोदी ने उसे भारत में कार्यान्वित भी कर दिखाया|

काश! उन्हें भारत-पाक के बीच बार-बार असफल रही क्रिकेट डिप्लोमेसी या वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा को व्यर्थ करने वाली पाकिस्तानी फ़ौज की कारगिल पैंतरेबाजी में निहित ऐतिहासिक सन्देश की समझ भी होती| तो वे नवाज शरीफ के जन्म दिन पर लाहौर बिना बुलाये धमकने जैसे सतही कूटनीति में भारत-पाक तनावों का हल ढूंढने के बजाय, कश्मीर में कोई सार्थक राजनीतिक-सामरिक पहल कर रहे मिलते|

काश! नक्सल आयाम के आर्थिक-सामाजिक पहलू का इतिहास भी मोदी के सामरिक परिप्रेक्ष्य का हिस्सा हो सकता! तब वे इस समस्या का महज सैनिक हल हासिल करने की एक आयामी जिद में देश का समय और ऊर्जा न गँवा रहे होते| इतिहास बोध से संपन्न मोदी ने, उत्तर-पूर्व में शांति लाने के कांग्रेसी मॉडल की असफलता को ही दोहराते रहने के बजाय, दशकों तक अशांत रहे त्रिपुरा राज्य की, कम्युनिस्ट शासन में हासिल, ऐतिहासिक स्थिरता से सबक लिया होता|

तिहास किसी को माफ़ नहीं करता| देश के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू तो स्वयं किसी प्रबुद्ध इतिहासकार से कम न थे| उनकी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’, जो उन्होंने 1942-46 में ‘भारत छोड़ो’ के दौरान अहमदनगर किले में बंदी रहते हुये लिखी थी, को इतिहास क्रम में भारत की उदार संस्कृति और दर्शन से परिचय की खान कहा जा सकता है|

ह नेहरू के इतिहास बोध का ही करिश्मा था कि उन्होंने विश्व युद्धों से जर्जर दो ध्रुवीय विश्व में भारत के नेतृत्व में एक तीसरे तटस्थ ध्रुव की नींव रखी, और दो सदी की औपनिवेशिक दासता से बाहर निकले गरीब देश को आधुनिकता के प्रकाश से आलोकित रखा| पर चीन के महाशक्ति मंसूबों की ऐतिहासिक समझ की चूक ने उनसे भारी सामरिक भूल कराई, जिसकी कीमत देश को 1962 के युद्ध में मनोबल तोड़ने वाली पराजय के रूप में चुकानी पड़ी| 
     
मेरिका में 1961 के क्यूबा मिसाइल संकट को टालने का श्रेय आसानी से राष्ट्रपति केनेडी की इतिहास मर्मज्ञता को दिया जाता रहा है| वही अमेरिका आज अपने पैंतालीसवें राष्ट्रपति ट्रम्प को इतिहास का अनिच्छुक पाठ पढ़ते देखना चाहता है| हुआ यूँ कि ‘डील’ में माहिर ट्रम्प ने एक साक्षात्कार में खुद की तुलना अमेरिका के सातवें राष्ट्रपति एंड्रू जैक्सन से कर डाली| यहाँ तक भी गनीमत थी क्योंकि इतने भर से उनका जाना-पहचाना बड़बोलापन ही झलकता|

शर्ते, उसी झोंक में आगे वे यह न जोड़ देते कि एंड्रू जैक्सन होते तो अमेरिका का गृह युद्ध न हुआ होता, उसका समाधान निकाल लिया जाता| अमेरिका के इस सातवें राष्ट्रपति (1829-37) का निधन दास प्रथा को लेकर हुए गृह युद्ध से सोलह वर्ष पूर्व हो गया था और इतिहास में उन जैसे दास मालिक को गृह युद्ध से कभी जोड़ा भी नहीं गया|

जैक्सन को 1812 में न्यू ओरलेंस के युद्ध में ब्रिटिश फ़ौज को हराने वाली सेना का नेतृत्व करने पर राष्ट्रीय नायक की ख्याति मिली थी| 1824 में उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की और राजनीतिक जीवन में धनाढ्य वर्ग के विपरीत सामान्य लोगों के लिए काम किया| उनके कार्यकाल में अमेरिकी आदिवासियों का नियत बस्तियों में दारुण विस्थापन उनके नाम पर एक काला धब्बा माना जाता है|

ट्रम्प ने जैक्सन को एक दृढ़ व्यक्ति और बड़े दिलवाला कहा| 1830 के दशक में साउथ कैरोलिना अमेरिका से अलग होना चाहता था और तब जैक्सन ने उसे युद्ध की धमकी देकर यह इरादा छोड़ने पर बाध्य किया| उस समय समीकरण था एक राज्य बनाम शेष राष्ट्र का| दो दशक बाद, दक्षिण के ग्यारह राज्य एक साथ अलग होने को बजिद थे| उनके साथ युद्ध का मतलब गृह युद्ध ही था|

तिहासकार एकमत हैं कि जिस युद्ध को अब्राहम लिंकन जैसा दूरदर्शी राष्ट्रपति नहीं रोक सका, उसे जैक्सन की सैन्यवादी रणनीति कैसे भी नहीं रोक सकती थी| हाँ, इतिहास शून्य ट्रम्प को जरूर लगता है कि जैक्सन से तुलना कर वे स्वयं को एक दृढ़ और बड़े दिलवाला राष्ट्रपति कहलवा लेंगे, और आम व्हाइट अमेरिकी का हितैषी भी|
  
मोदी के एंड्रू जैक्सन सरदार पटेल हैं, ट्रम्प की तर्ज पर बिना उनके ऐतिहासिक अवदान को समझे ही| पटेल रियासतों के भारत में विलय के लिए जाते हैं, जबकि मोदी के राजनीतिक नेतृत्व में, देश के आधा दर्जन प्रांतों में सशस्त्र अराजकता बद से बदतर होती गयी है| पटेल ने लोकतांत्रिक संविधान और नौकरशाही के इस्पाती ढांचे को मजबूत किया, मोदी ने संविधान में पलीता लगाने और नौकरशाही को पिछलग्गू बनाने का काम किया है|

से में मोदी की इस समझ को क्या कहें कि पटेल की विश्व में सबसे ऊंची लौह मूर्ति लगाकर वे स्वयं को सरदार कहलवा लेंगे| देश का मुख्य राजनीतिक कार्यकारी इतिहास की समझ से शून्य हो तो उस देश को कब अपमान के दौर से गुजरना पड़ जाये, कहना मुश्किल है| ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की गंभीर कमी को वह ‘जोश’ से पूरी करता है और नाजुक भूलें करता है|

मने मोदी को, नोटबंदी से काला धन, आतंकवाद और भ्रष्टाचार ख़त्म करने का दावा करते देखा| हमने ट्रम्प को, मेक्सिको सीमा पर दीवार से अमेरिकियों के आर्थिक संकट के हल का सपना बेचते देखा| क्या हम उनमें इतिहास बुद्धि की कामना कर सकते हैं!  

May 8, 2017

केजरीवाल यानी...मैं, मैं और बस मैं

उन शर्तों की आंखों देखी जो केजरीवाल की राजनीति के असल सिद्धांत बने 

केजरीवाल ने दो टूक सबको बता दिया था —  मुझे ऐसी राजनीति नहीं करनी, जहां पार्टी बनाने के बाद 10-15 साल सत्ता के लिए संघर्ष करना पड़े। सत्ता के लिए लम्बा इंतजार और स्ट्रगल, मेरे बस का नहीं, इससे बढ़िया मैं राजनीति छोड़ दूं और अपना एनजीओ चलाऊँ...

तरुण शर्मा की रिपोर्ट 


बात 2011 के बसंत के ​दिनों की है जब मैं स्वामी अग्निवेश का निजी सहयोगी हुआ करता था। दिल्ली के 7 जंतर मंतर का दफ्तर जो अन्ना आंदोलन के साथ—साथ न जाने कितने राष्ट्रीय आन्दोलनों का कैंप ऑफिस रहा। अन्ना आंदोलन का पहला फेज अभी—अभी खत्म हुआ था। केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान नहीं किया था, पर माहौल में आंदोलन को राजनीतिक पहचान देने और व्यवस्था परिवर्तन के लिए एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने की चर्चा चारो ओर थी। 

स्वामी अग्निवेश का दफ्तर और उसका बरामदा हमेशा ऐसे आंदोलनों से जुड़े लोगों के लिए धरने के बाद थोड़ा—बहुत सुस्ताने और बहस—मुबाहिशों का केंद्र रहा है जहां एनजीओ, सामाजिक आंदोलनों और वैकल्पिक राजनीति के चाहने वाले कार्यकर्ता और छोटे, बड़े नेता अक्सर डेरा डाले रहते थे।  

अन्ना आंदोलन जिसने राष्ट्रीय स्तर पर तमाम सामाजिक संगठनों, युवाओं और जन आंदोलन के अलग—अलग संघर्षशील नेताओं को एक मंच पर लामबंद किया था। अन्ना के रालेगण सिद्धि वापिस चले जाने के बाद नई राजनीतिक पार्टी के लिए इसके नेताओं में आपसी बातचीत, सलाह मशविरा शुरू हो गया। जिसमें मोटे तौर पर ये बात सामने आई कि बिना किसी नेता के चेहरे को सामने किए पूरे भारत में  जन आंदोलन  के अगुवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस मुद्दे को जनता के बीच लेकर जाना चाहिए और सत्ता के विकेन्द्रीकरण के आधार पर एक नेता के बजाए स्थानीय नेतृत्व के जरिए एक सामूहिक राष्ट्रीय नेतृत्व खड़ा किया जाए। 

जाहिर तौर पर इस प्रक्रिया से पार्टी बनाने में थोड़ा वक़्त लगता। पर इन सबके बीच अन्ना आंदोलन का एक ऐसा नेता था जो यह तय कर चुका था उसे हर हाल में एक ऐसी राजनीतिक पार्टी बनानी है जिसमें सिर्फ और सिर्फ वे नेता हों और पूरी पार्टी में उनके कद का कोई और नेता न हो। 

इसी को ध्यान में रखते हुए अरविंद केजरीवाल ने बड़ी चालाकी से अपने एक सत्याग्रह और अनशन का अंत अपनी खुद की एक राजनीतिक पार्टी बनाने के ऐलान के साथ किया। मैंने जंतर— मंतर पर उस समय इनकी पार्टी में शामिल होने के इच्छुक इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कई नेताओं को आपस में बात करते हुए सुना,देखा और गवाह रहा है कि कैसे केजरीवाल सिर्फ अपने करीबी लोगों को पार्टी के नेतृत्व में चाहते हैं और जब तक वे पार्टी का मनमाफिक ऊपरी संगठन और उसके ऊपर अपनी पकड़ नहीं बना लेते किसी भी अन्य बड़े नेता को पार्टी में शामिल नहीं होने देंगे। 

मैं, मैं और बस मैं... मेरे अलावा पार्टी में कोई और नेता ना उभरे, पार्टी बनाने के समय से लेकर अब तक केजरीवाल अपना आधा दिमाग और ऊर्जा इसी पर खर्च करते हैं। खुद को लेकर इतना बड़ा मोह और उससे उपजा डर यही केजरीवाल की सबसे बड़ी कमजोरी है, जिसके चलते उन्होंने पार्टी में एक के बाद बड़ी गलतियां की हैं। 

आम आदमी पार्टी हरियाणा के एक पूर्व नेता जिनके पास हरियाणा की एक बड़ी जिम्मेवारी थी, ने खुद बताया था कि जब योगेन्द्र यादव ने आम आदमी पार्टी को अपना समर्थन दिया और पार्टी में शामिल होने की घोषणा की, उसी समय केजरीवाल ने योगेन्द्र यादव बड़ा नेता न बन पाएं उनके खिलाफ साजिशें शुरू कर दीं। योगेंद्र यादव पार्टी में आने के तुरंत बाद समान मानसिकता के ईमानदार और संघर्षशील लोगों को पार्टी से जोड़ने के लिए पूरे भारत का दौरा करना चाहते थे, जिसकी इजाजत केजरीवाल ने नहीं दी। 

योगेंद्र यादव हरियाणा में काम कर रहे थे, तब पार्टी की हरियाणा चुनाव लड़ने की योजना थी। बाकायदा एक रणनीति के तहत हरियाणा में केजरीवाल ने अपने एक करीबी नवीन जयहिंद को योगेंद्र यादव को निपटाने के लिए लगा दिया। जिन्होंने हर शहर में कांग्रेस और दूसरी पार्टियों से सिर्फ टिकट के चाहने वाले नेताओं को पार्टी में शामिल किया और उनके जरिए एक बहस भी हरियाणा में चलाई कि हरियाणा का मुख्यमंत्री कौन हो, नवीन जयहिंद या योगेंद्र यादव। 

मेरे हरियाणा के उन्हीं मित्र ने बताया कि जब उन्होंने हरियाणा की मीटिंग में योगेंद्र यादव से पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली से नाराजगी जताते हुए सत्ता के लिए सिद्धांतों से समझौता करने की बात कही तो जवाब में योगेंद्र यादव ने कहा क्या करें केजरीवाल ने सीधे उनको जवाब दे दिया है कि मेरे को पहली ही बार चुनाव जीतकर सरकार बनानी है, उसके लिए जो भी जरूरी होगा मैं करूँगा। 

केजरीवाल ने पार्टी के सभी आदर्शवादियों, ईमानदारी व सुचिता की राजनीति के आग्रहियों को पार्टी बनाने के कुछ महीनों के भीतर ही साफ कर दिया था कि मुझे ऐसी राजनीति नहीं करनी, जहां पार्टी बनाने के बाद 10 -15 साल सत्ता के लिए संघर्ष करना पड़े। इतना लम्बा इंतजार और स्ट्रगल, मेरे बस का नहीं। इससे बढ़िया है कि मैं राजनीति ही छोड़ दूं और अपना एनजीओ चलाऊं। फिर आप अकेले करते रहना खाली सिद्धांतों की राजनीति।