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Jun 19, 2017

राष्ट्रपति बनाने की रबर स्टांप परंपरा कायम

मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में....
बिहार के राज्यपाल और कानपुर वासी रामनाथ कोविंद होंगे एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कौन हैं रामनाथ कोविंद, कहां से लाए गए यह रबर स्टांप।
पूर्व आइएएस अधिकारी कोविंद का राष्ट्रपति बनना लगभग तय। राष्ट्रपति पद के लिए कोविंद का नाम आते ही लोग खोजने लगे गूगल पर उनकी कोविंद की जाति।

अगर बने तो कोविंद होंगे देश के दूसरे दलित राष्ट्रपति। इससे पहले दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले के आर नारायणन रह चुके राष्ट्रपति।
उपराष्ट्रपति के नाम पर अभी कोई चर्चा नहीं है। पर संभावना है कि दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद भाजपा उपराष्ट्रपति के लिए महिला सवर्ण नाम को प्राथमिकता देगी। माना जा रहा है दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद मोदी सरकार ने राष्ट्रपति पद के दूसरे दावेदारों के मुंह पर जाबी लगा दी है।
मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में। मीडिया ने मेट्रो मैन श्रीधरण के नाम पर भी लगाई थीं अटकलें।
बीजेपी ने एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का सोमवार को ऐलान कर दिया। दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बिहार के गवर्नर रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया गया है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कोविंद के नाम का ऐलान करते हुए कहा कि कोविंद को हमने इसलिए चुना है कि पार्टी गरीब समाज से ताल्लुक रखने वाले शख्स को राष्ट्रपति बनाने की तैयारी में थी।
कानपुर देहात में पैदा हुए कोविंद बीजेपी दलित मोर्चा के अध्यक्ष रह चुके हैं। यूपी से दो बार राज्यसभा गए हैं। पेशे से वकील कोविंद ऑल इंडिया कोली समाज के अध्यक्ष भी रहे हैं।

भाजपा सरकार ने की कृषि बजट में 17 फीसदी की कटौती

प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद प्रदेश में पहली बार किसी किसान के आत्महत्या की बात सामने आई, सवाल यह कि ऐसे हालात में किसान खुदकुशी न करें तो क्या करें...
देहरादून से अरविंद शेखर की रिपोर्ट
जब तन खटाकर भी खेती फायदे का सौदा न रह गई हो। खेती से अपने बच्चों-परिवार के भले के लिए लिया कर्ज किसान आत्मा पर बोझ बन जा रहा हो। ऋण देने वाली सरकारी संस्थाएं क्रूर सूदखोर महाजन की याद दिलाते हुए नोटिस पर नोटिस भेज रही हों। चुनावी वादे के बावजूद केंद्र और प्रदेश की सरकारें किसानों की कर्ज माफी से इनकार कर चुकी हों। ऐसे अंधेरे हालात में किसी के सामने दो रास्ते होते हैं या तो वह हालात या व्यवस्था से लड़ने का रास्ता चुने या नाउम्मीदी में मौत को गले लगा ले।

बेरीनाग के सरतोला के किसान सुरेंद्र सिंह ने दूसरा रास्ता चुना। जहर खाकर खुदकुशी कर ली। संभवत: प्रदेश में किसी अन्नदाता की कर्ज के कारण की गई यह पहली आत्महत्या है। सवाल यह है कि सरकार क्या इस घटना से जागेगी और अपनी नीतियों में सुधार करेगी और कृषि बजट में की गई कटौती पर पुनर्विचार करेगी। गौरतलब है कि उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सरकार ने कृषि बजट में 17 फीसदी कटौती की भारी कटौती कर दी है, जबकि प्रदेश के किसान पहले से ही 11 हजार करोड़ के कर्जदार हैं। 
उत्त्तराखंड में भी दूसरे प्रदेशों की तरह किसान खुदकुशी की ओर बढ़े इसके हालात लंबे समय से बन रहे हैं। सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि 2003 से 2013 यानी 10 साल में राज्य के किसानों पर बकाया कर्ज में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है।
2003 में 7.2 फीसद किसान की कर्ज के जाल में थे 2013 तक यह तादाद 38.27 फीसद पहुंच गई। देश के 11 पहाड़ी राज्यों में बकाया कर्ज वाले किसानों के औसत यानी 24.9 फीसद से यह कहीं ज्यादा है। इन हालात में किसान कहां जाएं।
प्रदेश में कुल कृषि क्षेत्र ही नहीं बुवाई वाला क्षेत्रफल भी लगातार घटता जा रहा है, जबकि एनएसएसओ के 70वें चक्र के सव्रेक्षण के मुताबिक राज्य की 59.9 फीसद परिवारों की आय का मुख्य स्रोत खेती है और केवल 0.6 फीसद आबादी ही ऐसी है जिसकी आय का अधिकांश हिस्सा कृषि से जुड़े कामों से नहीं आता।
कृषि वृद्धि दर भी 2013-14 में ऋणात्मक यानी - 2.19 फीसद हो गई थी जो 2015-16 में कुछ सुधरी और 4.19 हो गई। प्रदेश में 74 फीसद किसान सीमांत किसान है। जबकि 17 फीसद लघु, सात फीसद अर्ध मध्यम, दो फीसद मध्यम और बड़े किसान लगभग नगण्य हैं। सवाल यही नहीं है 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रदेश में कुल कर्मकरों में से पहाड़ में 55.46 फीसद तो हरिद्वार व ऊधमसिंह नगर यानी मैदान में 51.23 फीसद कृषि कर्मकर हैं।
पहाड़ की तो 93 फीसद किसान छोटी या बिखरी जोतों वाले हैं। 2005 और 2013 के यानी पांचवें व छठे आर्थिक सर्वेक्षण पर नजर डालें तो जहां कृषि से मिलने वाले रोजगार में 34.25 फीसद कमी आई है। वहीं कृषि विभाग के ही आंकड़े बताते हैं कि राज्य स्थापना के समय कृषि क्षेत्र 7.70 लाख हेक्टेयर था लेकिन 2015-16 में यह 0.72 हेक्टेयर घटकर 6.98 लाख हेक्टेयर ही रह गया। इतना ही नहीं प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में भी कृषि के योगदान में लगातार कमी आ रही है।
2004-05 के स्थिर मूल्यों पर राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का अंश जहां 16.60 फीसद था वह 2013-14 में घटकर करीब आधा यानी 8.94 फीसद ही रह गया। राज्य की आर्थिकी में भी कृषि व उससे जुड़े क्षेत्रों का योगदान को भी देखें तो पिछले दस बरस में करीब 23 फीसद से घटकर महज 14 फीसद ही रह गया है।
पहाड़ में तो कुल कृषि क्षेत्र के महज नौ फीसद में ही खेती हो रही है और वह भी जंगली जानवरों के हमलों और सिंचाई की व्यवस्था न होने के चलते दिक्कत में है। ये ही वजहें है कि खेती किसानी को अलाभकारी सौदा मानते हुए किसान खेती छोड़ बेहतर जिंदगी की तलाश में कहीं और चले जा रहे हैं। एनएसएसओ के ही आंकड़े बताते हैं कि 2003 में जहां प्रदेश की 74.94 फीसद आबादी खेती पर निर्भर थी वहीं दस साल यानी 2013 तक वह घटकर 64.3 फीसद ही रह गई।
17 फीसद घटाया कृषि का बजट
कृषि संकट से जूझ रहे उत्तराखंड में प्रदेश सरकार ने कृषि का बजट 17 फीसद से अधिक घटा दिया है। 2016-17 में कृषि बजट 37476.89 लाख रुपये रखा गया था। मौजूदा सरकार ने 2017-18 के लिए 30971.46 लाख रुपये का प्राविधान रखा है। जो कि पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में लगभग 17.35 फीसद कम है। इस मसले पर जब कृषिमंत्री सुबोध उनियाल से संपर्क किया गया तो पहले को कहा गया कि कृषि मंत्री बैठक में व्यस्त हैं बाद में बात करा दी जाएगी मगर बाद में संपर्क करने पर फोन स्विच ऑफ मिला।
किसानों पर 10968 करोड़ का कर्ज
राज्य विधानसभा में वित्त व संसदीय कार्य मंत्री प्रकाश पंत की ओर से पेश आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 699094 किसानों ने 10968 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है। इस कर्ज का एक वर्ष का ब्याज ही 934. 32 करोड़ है। यह तो वह कर्ज है जो किसानों ने सरकारी बैंकों या सहकारी संस्थाओं से लिया है। सूदखोरों से लिए कर्ज के आंकड़े तो न जाने कितने होंगे। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली कह ही चुके हैं कि किसानों की कर्ज माफी में केंद्र मदद नहीं कर सकता।

Jun 17, 2017

भाजपा को वध से प्रेम है, फिर वह अस्वच्छता ही क्यों न हो

वध की क्रिया को उत्सव की तरह हत्यारे ही देख सकते हैं। अस्वच्छता दूर करना उत्सवता की भावना पैदा करता है, पर वध उसके उलट भावना है......... 

कुमार

पिछले साल अक्तूबर में गांधी मार्ग चौराहा, जयपुर पर एक बड़े से बोर्ड पर लिखा था 'आइए अस्वच्छता का वध करें।' इस स्लोगन को पढ़ते हुए तब कई विचार आये थे। 


जैसे -
—क्या यह वधिकों की सरकार है।
—वध से बहे खून से क्या खुशबू फैलेगी।
—तीर-धनुष से अस्वच्छता का वध कैसे होता है।
—अस्वच्छता का मतलब गंदगी में जीने को मजबूर गरीबों से तो नहीं।
—क्या यह हिमालयी मूर्खताओं का समय है।

यूं भी वध शब्द का प्रयोग अस्वच्छता के साथ गलत है। यह खुद एक अस्वच्छ भाषा है। वध की क्रिया को उत्सव की तरह हत्यारे ही देख सकते हैं। अस्वच्छता दूर करना उत्सवता की भावना पैदा करता है, पर वध उसके उलट भावना है।

अब आज की तारीख में 'अस्‍वच्‍छता का वध' के निहितार्थ सामने आने लगे हैं और वो भी राजस्‍थान में ही। पिछले शुक्रवार 9 जून को प्रतापगढ़ की कच्ची बस्ती में महिलाएं शौच करने जा रही थीं। तब नगर परिषद के लोगों ने उनकी तस्‍वीर लेने की कोशिश की। श्रमिक संगठन के एक नेता ने इस तरह तस्‍वीर लेने का विरोध किया। इससे नाराज लोगों ने उन महोदय की जमकर पिटाई की जिससे उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। अब कच्ची बस्तियों के लोग अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए धरने पर हैं।

इसी तरह हरियाणा के एक अधिकारी अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में स्वच्छता अभियान की आड़ में अरे-तरे पर उतारू हैं। लोगों ने जब उनकी पोस्‍ट पर आपत्ति जतायी तो उनका जवाब है - आपत्ति करने वालों ने मेरी भाषा अभी सुनी ही कहां है। मेरी भाषा में दस शब्दों वाले वाक्य में आठ शब्द गाली ही होते हैं। वही मेरी ऑरिजनल भाषा है और मुझे अपनी भाषा से बहुत प्यार है। आप लोगों को जाकर UPSC में शिकायत अवश्य करनी चाहिए, जिन्होंने एक बार नहीं, दो बार नहीं; बल्कि तीन बार मुझे IAS सिलेक्ट किया और वह भी बिना किसी रिज़र्वेशन के।"

आखिर क्‍या कारण हैं कि जि‍स स्‍वच्‍छता अभियान की गांधी ने एक मिसाल खड़ी कर दी थी उसी के नाम पर चला मोदी जी का अभियान मानसिक गंदगी का पर्याय हो जा रहा।

May 17, 2017

अभियुक्त शिवराज को होना था लेकिन फंस रहे दिग्विजय सिंह

एमपी अजब है, एमपी गजब है। घोटाला और कोई करता है और फंसता कोई और नजर आता है। मध्य प्रदेश के भाजपाई पिछले ​कुछ दिनों से ऐसे पेश आ रहे हैं मानो व्यापमं घोटाला भाजपा सरकार में नहीं कांग्रेस सरकार में हुआ है और उसके जिम्मेदार 'बेचारे' दिग्विजय सिंह हैं...
जावेद अनीस

मई का महीना मुख्यमंत्री शिवराज के लिए राहत भरी खबर लाया है। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह व्यापम घोटाले में शिवराज सिंह चौहान के सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप लगाते आ रहे हैं, लेकिन इस मामले में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर करके कहा है कि सबूत के तौर पर जिस सीडी और पेन ड्राइव को पेश किया गया था वे फर्जी पाए गये हैं। 


सीबीआई का कहना है कि इसमें याचिकाकर्ताओं द्वारा  छेड़छाड़ की गयी है, जिसके बाद भाजपा इसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को क्लीनचिट दिए जाने के तौर पर पेश कर रही है। सीबीआई के हलफनामे के बाद सूबे में सियासत गर्माई हुई है और व्यापम घोटाले ने एक बार फिर नया मोड़ लेता जा रहा है। एक तरफ भाजपा कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग कर रही है, वहीं कांग्रेस का कहना है कि क्लीनचिट देने का काम अदालत का है सीबीआई का नहीं।


सूत्रों के मुताबिक व्यापमं घोटाले को लेकर सीबीआई की जांच का ट्रेक बदल सकता है, इससे याचिकाकर्ता दिग्विजय सिंह की मुश्किल में पड़ सकते हैं क्योंकि सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है वह इस मामले में दिग्विजय सिंह और दूसरों के खिलाफ कार्यवाही कर सकती है. 

व्यापमं घोटाले में भाजपा पहली बार इतनी आक्रमक नजर आ रही है। मप्र सरकार के तीन वरिष्ठ  मंत्रियों द्वारा बाकायदा सीबीआई को ज्ञापन सौंपकर दिग्विजिय सिंह और दो व्हिसल ब्लोअर के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की गयी है। कांग्रेस की तरफ से इस मुद्दे पर  पलटवार भी किया गया है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा है कि व्यापम के मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह कभी क्लीन नहीं हो सकते, क्योंकि इस दौरान वही मुख्यमंत्री रहे हैं। जब इस दौरान की सभी उपलब्धियां उनके खाते में हैं, तो व्यापम घोटाले की कालिख से वे कैसे बच सकते हैं? 

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री खुद विधानसभा में 1000 प्रकरणों में गड़बड़ी होना स्वीकार चुके हैं, जिसमें 2500 से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें से 21 सौ से ज्यादा को गिरफ्तार किया गया, वहीं चार सौ से ज्यादा अब भी फरार हैं। इस  मामले से जुड़े 50 से ज्यादा लोगों की मौत भी हो चुकी है,आज भी सैकडों लोग जेल में नही हैं। अजय सिंह ने मांग की है कि  अगर सीबीआई वाकई में सच्चाई सामने लाना चाहती है तो उसे मुख्यमंत्री, उनकी पत्नी और जेल से छूटे पूर्व मंत्रियों का नार्को टेस्ट कराना चाहिए। ज्योतिरादत्यि सिंधिया ने भी उनका बचाव करते हुए कहा है कि, व्यापमं एक बहुत बड़ा घोटाला है सीबीआई ने अपने हलफनामे में शिवराज सिंह को क्लीनचिट दे दी हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना अभी बाकी है।

इससे पूर्व इस साल मार्च के आखिरी दिनों में विधानसभा में कैग की रिपोर्ट सामने आयी थी जिसमें व्यापमं को लेकर शिवराज सिंह की सरकार पर कई गंभीर सवाल उठाये गये थे। इस रिपोर्ट में 2004 से 2014 के बीच के दस सालों की व्यापमं की कार्यप्रणाली को लेकर सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए बताया गया था कि कैसे इसकी पूरी प्रक्रिया अपारदर्शी थी और बहुत ही सुनियोजित तरीके से नियमों को ताक पर रख दिया था।

रिपोर्ट के अनुसार व्यापमं का काम केवल प्रवेश परीक्षाएं आयोजित कराना था, लेकिन वर्ष 2004 के बाद वो भर्ती परीक्षाएं आयोजित करने लगा, इसके लिये व्यापमं के पास ना तो कोई विशेषज्ञता थी और ना ही इसके लिए म.प्र. लोकसेवा आयोग या किसी अन्य एजेंसी से परामर्श लिया गया। यहाँ तक कि इसकी जानकारी तकनीकी शिक्षा विभाग को भी नहीं दी गई और इस तरह से राज्य कर्मचारी चयन आयोग की अनदेखी करके राज्य सरकार ने व्यापमं को सभी सरकारी नियुक्तियों का काम दे दिया और राज्य सेवा में से इसमें शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गयी। 

रिपोर्ट के अनुसार व्यापमं घोटाला सामने आने के बाद भी व्यावसायिक परीक्षा मंडल में परीक्षा लेने के लिए कोई नियामक ढांचा नहीं था। रिपोर्ट में जो सबसे खतरनाक बात बतायी गयी है वो यह है कि प्रदेश सरकार ने कैग को व्यापमं से सम्बंधित दस्तावेजों की जांच की मंजूरी देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि व्यापमं सरकारी संस्था नहीं है, जबकि व्यापमं पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में काम करने वाली संस्था थी।

‘कैग’ की रिपोर्ट ने कांग्रेस को हमलावर होने का मौका दे दिया था विपक्ष के नेता अजय सिंह ने शिवराज सिंह का इस्तीफ़ा मांगते हुए कहा था कि, अब यह सवाल नहीं है कि मुख्यमंत्री व्यापमं घोटाले में दोषी हैं या नहीं, लेकिन यह तो स्पष्ट हो चुका है कि यह घोटाला उनके 13 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ है, उनके एक मंत्री सहित भाजपा के पदाधिकारी जेल जा चुके हैं और उनके बड़े नेताओं से लेकर संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी सब जाँच के घेरे में हैं। इसलिए अब उन्हें मुख्यमंत्री चौहान के इस्तीफे से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। 

दूसरी तरफ  भाजपा ने उलटे 'कैग' जैसी संवैधानिक संस्था पर निशाना साधा था और कैग द्वारा मीडिया को जानकारी दिए जाने को ‘सनसनी फैलाने वाला कदम बताते हुए उस पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का आरोप लगाया था। 

व्यापमं घोटाले ने मध्य प्रदेश को देश ही नहीं, पूरी दुनिया में बदनाम किया है। यह भारत के सबसे बड़े और अमानवीय घोटालों में से एक है, जिसने सूबे के लाखों युवाओं के अरमानों और कैरियर के साथ खिलवाड़ करने का काम किया है। इस घोटाले की चपेट में आये ज्यादातर युवा गरीब, किसान, मजदूर और मध्यम वर्गीय परिवारों से हैं जो तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपना पेट काटकर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं जिससे उनके बच्चे अच्छी उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन में स्थायित्व ला सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें।

बहुत ही सुनियोजित तरिके से चलाये गये इस गोरखधंधे में मंत्री से लेकर आला अफसर तक शामिल पाए गये। इसके छीटें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक भी गए। व्यापमं घोटाले की परतें खुलने के बाद इस घोटाले से जुड़े लोगों की असामयिक मौतों का सिलसिला सा चल पड़ा। लेकिन इन सबका शिवराज सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। शुरुआत में तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस घोटाले की जांच एसआईटी से ही कराने पर अड़े रहे, लेकिन एक के बाद एक मौतों और राष्ट्रीय -अंतराष्ट्रीय मीडिया ने जब इस मुद्दे की परतें खोलनी शुरू की तो उन्हें सीबीआई जाँच की अनुशंसा के लिए मजबूर होना पड़ा।

मामला सीबीआई के हाथों में जाने के बाद व्यापमं का मुद्दा शांत पड़ने लगा था, मीडिया द्वारा भी इसकी रिपोर्टिंग लगभग छोड़ दी गयी। उधर एक के बाद एक चुनाव/ उपचुनाव जीतकर शिवराज सिंह चौहान अपनी स्थिति मजबूत करते जा रहे थे। मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा यह दावा किया जाने लगा था कि व्यापमं घोटाले का शिवराज की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं हुआ है। कुल मिलकर मामला लगभग ठंडा पड़ चुका था, विपक्ष थक चुका था और सरकार से लेकर संगठन तक सभी राहत मना रहे थे।

इसे केवल एक घोटाले के रूप में नहीं, बल्कि राज्य समर्थित नकल उद्योग के रूप में देखा जात है, जिसने हजारों नौजवानों का कैरियर खराब कर दिया। व्यापमं घोटाले का खुलासा 2013 में तब हुआ, जब पुलिस ने एमबीबीएस की भर्ती परीक्षा में बैठे कुछ फर्जी छात्रों को गिरफ्तार किया। ये छात्र दूसरे छात्रों के नाम पर परीक्षा दे रहे थे। बाद में पता चला कि प्रदेश में सालों से एक बड़ा रैकेट चल रहा है, जिसके अंतर्गत फर्जीवाड़ा करके सरकारी नौकरियों रेवड़ियों की तरह बांटी गयीं हैं। 

मामला उजागर होने के बाद व्यापमं मामले से जुड़े 50 से ज्यादा अभियुक्तों और गवाहों की रहस्यमय ढंग से मौत हो चुकी है जो इसकी भयावहता को दर्शाता है। इस मामले में 21 सौ से ज्यादा को गिरफ्तारियाँ हुई हैं, लेकिन जो गिरफ्तारियां हुई हैं, उनमें ज्यादातर या तो छात्र शामिल हैं या उनके अभिभावक या बिचौलिये। बड़ी मछलियाँ तो बची ही रह गयी हैं। हालांकि 2014 में मध्य प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा जरूर गिरफ्तार हुए थे जिन पर व्यापमं के मुखिया के तौर पर इस पूरे खेल में सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप था, लेकिन दिसम्बर 2015 में वे रिहा भी हो गये थे. पहले पुलिस फिर विशेष जांच दल और अब सीबीआई द्वारा इस मामले की जांच की जा रही है, लेकिन अभी तक इस महाघोटाले के पीछे के असली ताकतों के बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका है. 

2017 व्यापम के लिए बहुत नाटकीय साबित हो रहा है। पहले तो कैग रिपोर्ट में सीधे तौर पर शिवराज सरकार की मंशा पर सवाल उठाये गये थे, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई का हलफनामा आया है जिसमें आरोप लगाने वाले ही घेरे में नजर आ रहे हैं, ऐसा लगता है पूरा मामला गोल पहिये पर सवार हो चुका है। जाहिर है इस महाघोटाले के पीड़ितों के लिए इंसाफ के दिन अभी दूर हैं।   
edtorjanjwar@gmail.com

Apr 12, 2017

दलित लड़कियों का किया घर में घुसकर बलात्कार, 30 घंटे बाद दर्ज हुआ मुकदमा

ख़ामोशी तोड़ो दलितो, यह चुप्पी भयानक है...

आखिर राजस्थान में दो दलित छात्राओं से बलात्कार व आत्महत्या की नृशंस घटना पर इस देश में कोई मोमबत्ती क्यों नहीं जली.... 

भंवर मेघवंशी


राजस्थान के सीकर जिले के नीम का थाना क्षेत्र के भगेगा गाँव के एक दलित बलाई परिवार की बीए प्रथम वर्ष में पढ़ने वाली दो सगी बहनों के साथ तीन सवर्ण युवाओं बजरंग सिंह, पिंकू सिंह और एक अन्य ने घर में घुसकर  बलात्कार किया। बजरंग सिंह और पिंकू सिंह जहां जाति के राजपूत हैं, वहीं तीसरा बलात्कारी ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखता है।

पुलिस कर रही मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार

पीड़िताओं के छोटे भाई के आ जाने के बाद बलात्कारी घटनास्थल से भाग गए। 17 व 18 साल की इन दोनों दलित छात्राओं ने घटना के एक घंटे के बाद पास के रेलवे लाइन पर रेवाड़ी से फुलैया जाने वाली ट्रेन के सामने दिन में 11:30 बजे कूदकर जान दे दी। इस मामले में पुलिस अब तक किसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकी है। नीमथाना के डीवाईएसपी कुशाल सिंह का कहना है कि पुलिस आरोपियों को तब तक गिरफ्तार नहीं करेगी, जब तक पीड़िताओं की मेडिकल रिपोर्ट जयपुर से आ नहीं जाती।

ये दर्दनाक और शर्मनाक घटना 5 अप्रैल, 2017 को दिन में 11 बजे घटी। घर में उस वक्त इन दो बहनों के अलावा कोई नहीं था। बड़ी बहन एमए की परीक्षा देने शहर गई थी, जबकि मां खेती के काम से बाहर गई थी और पिता लालचंद वर्मा भट्टे पर मजदूरी करने। छोटा भाई भी घर पर नहीं था।

सामाजिक कार्यकर्ता और एनएपीएम से जुड़े कैलाश मीणा के मुताबिक बड़ी जोर—जबर्दस्ती और प्रयासों के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ वारदात के लगभग 30 घंटे बाद 6 अप्रैल की शाम 5 बजे मुकदमा दर्ज किया।

मामला बलात्कार, दलित अत्याचार,नाबालिग के लैंगिक शोषण का होने के बावजूद भी जान-बूझकर सिर्फ आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण की धारा 306 में दर्ज किया गया। इस मामले में डीवाईएसपी कुशाल सिंह खुद जाति से राजपूत हैं और परिजनों का मानना है कि उनके रहते जांच सही दिशा में आगे नहीं बढ़ सकती। इतना ही नहीं इलाके के सरपंच और विधायक भी आरोपियों की जाति के हैं।

इस मामले में महिला दलित तथा मानव अधिकार संगठनों का संयुक्त दल भगेगा पहुंचा तथा पीड़ित परिवार, जाँच अधिकारी तथा ग्रामीणों से मुलाकात कर मामले की जानकारी ली। यह दल 15 अप्रैल तक अपनी रिपोर्ट जारी करेगा।

Mar 27, 2017

मन की बात में पहले भोजन बर्बादी पर भाषण दिया और फिर भोजन बर्बादी के कार्यक्रम के मेहमान बन गए

मोदी जी 'मन की बात' किस रिश्तेदार को सुनाते हैं, जब खुद वही करते हैं जो दूसरे पैसे वाले मंत्री, विधायक और पूंजीपति करते हैं। क्या उनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं कि ऐसे कार्यक्रमों का बहिष्कार कर अपने रईस मंत्रियों को सबसे पहले भोजन बर्बादी करने से रोकें.....

जनज्वार। मोदी जी ने जब कल मन की बात में खाने की बर्बादी पर भाषण दिया और बचाने की की अपील की तो देश को बहुत अच्छा लगा। देश के आम नागरिकों को लगा कि जिस देश की 80 फीसदी आबादी को ठीक से दो समय का भोजन नहीं मिलता, वहां इस तरह की बर्बादी रोकने पर पहल एक सकारात्मक और जरूरी प्रयास है।  
वैंकेया  नायडू  द्वारा ट्विटर पर शेयर की गई एक फोटो
पर थोड़ी ही देर में उनके बाकि बयानों की तरह यह भी खालिस ड्रामा साबित हुआ। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के शब्दों में कहें तो 'जुमला।' आपको याद होगा कि मोदी जी के हर खाते में पंद्रह लाख के बयान को अमित शाह ने मोदी जी का चुनावी जुमला बता दिया था। तब भाजपा और प्रधानमंत्री की बहुत किरकिरी हुई थी। 

कल 'मन की बात' करने के बाद मोदी जी अपनी सरकार के वरिष्ठ मंत्री वैंकेया नायडू के यहां एक भव्य कार्यक्रम में पहुंचे। वैंकेया नायडू मोदी सरकार में शहरी विकास के साथ शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री हैं। मंत्री ने अपने आवास पर 'उगादि' का आयोजन रखा था जिसमें सैकड़ों की सख्या में मेहमान पहुंचे, जिसमें बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी भी थे। उगादि दक्षिण भारत में नववर्ष का दिन होता है। मंत्री का ताल्लुक दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश से इसलिए उन्होंने अपने यहां कार्यक्रम रखा था। 

प्रधानमंत्री मन की बात करने के बाद जब इस कार्यक्रम में पहुंचे तो वहां मेहमानों को भोजन में बारहों तरह का व्यंजन परोसा गया। मंत्री जी खुद ही खुशी—खुशी दर्जनों व्यंजनों की फोटो लगाते रहे। उपर लगी तस्वीर भी मंत्री जी द्वारा शेयर की गयी तस्वीरों में से एक है। गौरतलब है कि हमारे देश में हर साल भंडारण के अभाव में ही 50,000 करोड़ रुपए यानी कुल खाद्यान्न उत्पादन का 40 फीसदी बर्बाद हो जाता है। यह बर्बादी केंद्र सरकार के मुताबिक ब्रिटेन के सालाना अनाज उत्पाद के बराबर है।  

ऐसे में सवाल बस यह कि फिर मोदी जी 'मन की बात' किस रिश्तेदार को सुनाते हैं, जब खुद वही करते हैं जो दूसरे पैसे वाले मंत्री, विधायक और पूंजीपति करते हैं। क्या उनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं कि ऐसे कार्यक्रमों का बहिष्कार करें और अपने रईस मंत्रियों को सबसे पहले भोजन बर्बादी करने से रोकें। ऐसे कार्यक्रमों में छप्पन भोग क्यों जरूरी हैं, जबकि 3—4 तरह के व्यंजनों से काम चल सकता है। 

हालांकि भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए कई प्रदेशों ने स्वाग्तयोग्य कदम भी उठाए हैं। जम्मू कश्मीर सरकार ने तो शादियों में भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए कानून तक बनाया है कि हर शादी में मीनू और खाने की मात्रा पहले ही तय कर ली जाए, ताकि खाना बर्बाद न जाए। वहीं सांसद रंजीत रंजन खाने की बर्बादी रोकने के लिए संसद में बिल पेश कर चुके हैं। 

मोदी अपने शहंशाह मानसिकता वाले मंत्रियों को बताएं कि देश का नब्बे फीसदी आमजन आज भी अपने बच्चे को रोज एक गिलास दूध नहीं दे पाता, बुंदेलखंड और विदर्भ रोज अपने बच्चे को दाल नहीं दे पाता और बंगाल, मध्यप्रदेश और उड़ीसा से लेकर उत्तर प्रदेश तक कुपोषित बच्चों वाले राज्यों में आज भी टॉप में आते हैं।

क्या दिखावे की बजाए मोदी को जीवन में उतारने वाली मन की बात नहीं करनी चाहिए। सवाल यह इसलिए भी बड़ा है कि खाने का यह भव्य आयोजन वह मंत्री कर रहा है जो शहरी व गरीबी उन्मूलन के लिए जिम्मेदार है और उन्मूलन की हालत यह है कि आज की तारीख में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बहुतायत शहरी आबादी गरीब है और उसे दो जून का संतुलित भोजन तो छोड़िए, भरपेट भोजन उपलब्ध नहीं है।