Saturday

चीलों का गांव

चीलों का गांव
अजय प्रकाश




यह चौंकाने वाला दृश्य है। हरे-भरे खेतों में चील, बाज, कौए और कुत्ते। इधर से गुजरने वाले लोग चकित रह जाते हैं। लाषों पर मंडराने वाली इन प्रजातियों को फसलों में कुछ टूंगते हुए देखकर। एकबारगी लगता है कि कहीं तेजी से बदल रही पारिस्थितिकी में इन्होंने अपना स्वाद तो नहीं बदल दिया। आलू के खेतों में निराई कर रही मजदूरिन बताती है कि 'ये मांस खा रहे हैं।' बताती है- 'वह जो सामने फैक्ट्रियां दिख रही हैं चील वहीं से मांस ले आती हैं।' तभी तमाम सवालों का एक साथ जवाब लेकर बदबू का एक भभका आता है। गावों की तरफ रूख करने पर पता चलता है कि हड्डी फैक्ट्रियों की वजह से उठ रही बदबू और सड़ांध ने प्रदुशण्ा तो फैलाया ही, पारिवारिक जीवन में भी इस कदर हस्तक्षेप किया कि रामपुर के ग्रामीण समाज का जीवन संकट में है।

हापुड़ की हड्डी मिलें देश में अपनी तरह की अजूबा उद्योग हैं जिनकी वजह से परिवार टूट रहे हैं, बहुएं गांव छोड़कर जा रही हैं। षादी के इंतजार में साल दर साल गुजार रहे बिनब्याहे लड़के-लड़कियां हर लगन के मौसम में सेहरा-मंडप के न्योते की राह तकते हैं। लेकिन कोई रिष्ता लेकर रामपुर गांव की दहलीज पर जल्दी दस्तक नहीं देता। क्योंकि गांव के आसपास उठने वाली मितला देने वाली दुर्गंध को कोई बाहरी व्यक्ति सहन नहीं कर पाता। गांव के मुंहाने से ही रिष्ते के लिए आने वाले यह कहते हुए लौट जाते हैं कि बदबू के इस दमघोटूं माहौल में कोई यहां अपने दुष्मन को ही भेज सकता है, षादी करके अपने जिगर के टुकड़ों को नहीं।
पिछले दो दशक से इस इलाके में चल रही इन फैक्ट्रियों से मांस की पैकिंग, चर्बी निकालने का व्यवसाय और क्राकरी इस्तेमाल के लिए हड़डी जलाने का काम होता रहा है। खुर, चर्बी ,लाद आदि को उबालकर जहां चर्बी बनायी जाती रही है वहीं हड़डी जलाकर सौंदर्यप्रसाधन व क्राकरी के उत्पाद बनाये जाते रहे हैं। मांस उबालने और हड़डी जलाने से, जानवरों की लाशें सड़ने से बदबू पैदा होती है। जिले सिंह अपने बेटे की षादी और उसके बाद जो घटित हुआ उसके बारे में कहते हैं कि 'बेटे की षादी यह कह कर की, कि बहू गांव में नहीं षहर में रहेगी। षादी के बाद अजीब लगा कि सिर्फ यहां से चार किलोमीटर दूर हापुड़ में बेटा-बहू रहें और हम गांव में। पर बहू ने चंद दिनों बाद ही ऐलान कर दिया कि यहां रहना उसे एक दिन भी गंवारा नहीं।'

दूसरे गांव वालों ने इन्हीं वजहों से इस गांव के तमाम उपनाम रख छोड़े हैं। कोई इसे चीलों का गांव कहता है तो कोई हड्डी फैक्ट्री वाला गांव। रामपरु के बाषिंदों के दिल में टीस तो तब उठती है जब उनके हरे भरे गांव को बदबूपुर कहा जाता है। खेती-बाड़ी, जमीन-जायदाद हर मामले में किसी आम गांव के मुकाबले संपन्न रामपुर को एक ऐसी पीड़ा से लगभग दो दषकों से गुजरना पड़ रहा है जिसके लिए वे गुनहगार नहीं है। यहां तक कि रामपुर का एक भी ग्रामीण कभी फैक्ट्रियों कार्यरत नहीं रहा। बताया जाता है कि जब यह फक्ट्रियां खुले आम चला करतीं थी तो स्थानीय गरीब मुसलमान और गरीब जाटव काम पर जाया करते थे। लेकिन बुजुर्ग हीरालाल जाटव को इन कंपनियों से नफरत है। वे कहते है,ं 'हम लोगों को ये हड्डी मिलें बूढ़ा, रोगी और असहाय बना रही हैं।'

पब्लिक एजेंडा से साभार

Thursday

मुंतदिर अल जैदी को सलाम


तानाशाह और जूते

मदन कश्यप

उसके जूते की चमक इतनी तेज थी
कि सूरज उसमें अपनी झाइयां देख सकता था
वह दो कदम में नाप लेता था दुनिया
और मानता था कि पूरी पृथ्वी उसके जूतों के नीचे है
चलते वक्त वह चलता नहीं था
जूतों से रौंदता था धरती को

उसे अपने जूतों पर बहुत गुमान था
वह सोच भी नहीं सकता था
कि एक बार रौंदे जाने के बाद
कोई फिर से उठा सकता है अपना सिर
कि अचानक ही हुआ यह सब

एक जोड़े साधारण पांव से निकला एक जोड़ा जूता
और उछल पड़ा उसकी ओर
उसने एक को हाथ में थामना चाहा
और दूसरे से बचने के लिए सिर मेज पर झुका लिया
ताकत का खेल खेलने वाले तमाम मदारी
हतप्रभ होकर देखते रहे
और जूते चल पड़े
दुनिया के सबसे चमकदार सिर की तरफ
नौवों दिशाओं में तनी रह गयीं मिसाइलें
अपनी आखिरी गणना में गड़बड़ा गया
मंगलग्रह पर जीवन के आंकड़े ढूंढने वाला कम्प्यूटर
सेनाएं देखती रह गयीं
कमांडों लपक कर रोक भी न पाये
और उछल पड़े जूते

वह खुश हुआ कि आखिरकार उसके सिर पर नहीं पड़े जूते
शर्म होती तब तो पानी पानी होता
मगर यह क्या कि एक जोड़े जूते के उछलते ही
खिसक गयी उसके पांव के नीचे दबी दुनिया
चारो तरफ से फेंके जाने लगे जूते
और देखते देखते
फटे पुराने, गंदे गंधाये जूतों के ढेर के नीचे
दब गया दुनिया का सबसे ताकतवर तानाशाह

संपादकों जवाब दो

किसके प्रति जवाबदेह हो
पुलिस या पब्लिक


भारत में खबरों को प्रसारित करने वाली एक चर्चित न्यूज एजेंसी आइएएनएस ने 18 अक्टूबर को इलाहाबाद से 67 लोगों की गिरफ्तारी के मुतल्लिक एक खबर जारी की। यह खबर टाइम्स आफ इंडिया समेत देश के कई अखबारों और टीवी चैनलों पर आई थी। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के हवाले से खबर को पुष्ट भी किया गया था । बताया गया कि गिरफ्तार सभी संधिग्धों पर आतंकवादी होने की आशंका थी। मगर आश्चर्यजनक ये रहा कि यह खबर स्थानीय मीडिया में नदारद रही। आखिरकार इस मामले से जुड़ा सच उजागर हुआ। खबर फर्जी साबित हुई। पर आइएएनएस के संपादक की ऐंठ तो देखिये कहते हैं 'हम सफाई देने के लिए मजबूर नहीं हैं। आइये पढ़ते हैं इस पर पत्रकार राजीव यादव की संक्षिप्त रिपोर्ट


आतंकवाद को लेकर एक समुदाय विशेष के प्रति लोगों में नफरत के बीज बो रही मीडिया और उसकी रिपोर्टिंग का एक नमूना है यह रिपोर्ट. हाल की कुछ घट्नाओं के माध्यम से मीडिया ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ को लगातार आतंकवादियों को प्रश्रय देने वाले जिले के रूप में प्रचारित किया है. इसके लिए तमाम टीवी चैनलों और अख़बारों ने झूठ का जमकर सहारा लिया. यह रिपोर्ट भी इसी की एक बानगी है. १८ अक्तूबर को न्यूज एजंसी आईएएनएस से जारी यह ख़बर पुरी तरह से फर्जी है। ख़बर में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद से ६७ लोगों के गिरफ्तार होने की बात कही गई है. यह भी बताया गया है की इसमे ज्यादातर लोग आजमगढ़ के हैं. ये लोगा कई विस्फोटों में लिप्त रहें हैं ध्यान दे किसी एक विस्फोट का नाम नही है. ख़बर में इलाहाबाद मंडल के पुलिस महानिरीक्षक एम के बसाल के हवाले से बताया गया है की इन सभी संदिग्धों की सूचना उन्हें उनके मकान मालिकों से मिली.
इस सम्बन्ध में सबसे दिलचस्प बात ये रही की ऐसी कोई भी ख़बर इलाहाबाद या स्थानीय किसी भी समाचर माध्यम ने नहीं दी. पुलिस अधिकारीयों ने भी ऐसी किसी गिरफ्तारी से इंकार किया है.
सवाल ये उठता है की ये खबरे कैसे टाइम्स आफ इंडिया और कई अन्य समाचार माध्यमों तक पहुची. इस सम्बन्ध में आईएएनएस के संपादक दर्शन देसाई से जानकारी चाही तो उनका दो टूक जवाब था - 'मै जानकारी दे के लिए बाध्य नहीं हूँ.'
दर्शन देसाई यह जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है, यह सही बात है. लेकिन क्या लोगों को उनके इस झूठ पर सवाल उठाने का भी अधिकार नहीं है? हमें यह नहीं भुलाना चाहिए की कि कुछ ऐसे ही झूठी खबरें ने गुजरात दंगों में घी का काम किया था. उस समय भी हत्या और बलात्कार कि झूठी ख़बरों ने दंगे पर उतारू भीड़ को दुसरे समुदाय के लोगों के साथ एसा सुलूक करने का नैतिक सहारा दिया.
आप भी आईएएनएस और उसके संपादक इस ख़बर कि सच्चाई के बारे में प्रश्न कर सकते हैं. नंबर है -9307727033

Saturday

जेल से पत्र

उन्होंने जेलों से पत्र भेजा है

अजय प्रकाश

उत्तर प्रदेष कचहरी बम विस्फोट के दो मुख्य आरोपी मोहम्मद हकीम तारिक कासमी और मोहम्मद खालिद मोजाहिद पर से हाल ही में अदालत ने देषद्रोह का मुकदमा खारिज कर दिया। ये दोनों आरोपी बाराबंकी जेल में बंद हैं। इसी केस में कोलकाता से गिरफ्तार आफताब अंसारी पहले ही बाइज्जत रिहा हो चुके हैं। एसटीएफ ने गिरफ्तारी के वक्त आफताब को इंडियन मुजाहिद्दीन का कमांडर बताया था जबकि तारिक और खालिद को मास्टर माइंड कहा।
गिरफ्तारी के बाद पुलिस और एसटीएफ ने आरोपियों के साथ कैसा व्यवहार किया इस बारे में तारिक और खालिद ने जज और जेल अधीक्षक के नाम जेल से पत्र लिखे। पत्र की मूल प्रतियां उर्दू में हैं। जेलों में गुजारे गये दिनों के बारे में उन पत्रों में विस्तार से चर्चा की गयी है। उसके एक छोटे से हिस्से का अनुवाद हम हिंदी में छाप रहे हैं।


श्रीमान श्रीमान अधीक्षक साहब
सीजेएम साहब जिला कारागार लखनउ
फैजाबाद
मैं मुहम्मद खालिद महतवाना (मुहल्ला) मड़ियाहूं जिला जौनपुर का रहने वाला हूं। 16-12-07 की षाम एसटीएफ वाले मड़ियाहूं बाजार के दुकान से लोगों की मौजूदगी में मुझे उठाये और नामालुम जगह पर ले गये। जहां जबरदस्त तषद्दुद किया। मुख्तलिफ तरीके से मारा पिटा। दाढ़ी के बाल जगह जगह से उखाड़े गये। दोनों पैरों का चीरकर उस पर खड़े होकर अजू-ए-तनासुल (लिंग) को मुंह में डालकर चुसवाया गया। पखाना के रास्ते पेट्रोल डालना, षर्मगाह को धागे से बांधकर दूसरे किनारे पर पत्थर बांधकर खड़ा कर देना और षर्मगाह पर सिगरेट दागना आम बात थी। षराब पिलाना और सुअर का गोष्त खिलाना, पेषाब पिलाना जारी रहा। साथ ही बर्फ लगाना, मूंह और नाक के रास्ते जबरदस्ती पानी पिलाया जाता रहा,जिससे दम घुटने लगता था। इलेक्ट्रिकल षोला मारते हुए आला के जरिये से जिस्म जलाना, करंट चार्ज का देना आम बात थी। यह सिर्फ इसलिए किया जाता रहा कि हम मान लें कि गुनहगार हैं।




श्रीमान श्रीमान अधीक्षक साहब
सीजेएम साहब जिला कारागार लखनउ
फैजाबाद

तारिक कासमी

निवेदन इस प्रकार है कि मैं मुहम्मद तारिक पुत्र श्री रियाज अहमद साकिन सम्मुपुर रानी की सराय आजमगढ़ का रहने वाला हूं। 12 दिसंबर को मेरी अपनी दवाई की दुकान के आगे के रास्ते से राह चलते हुए एसटीएफ के जरिये उठाया गया और 10 दिन तक गैर इंसानी सुलूक और तषद्दुद करके झुठी कहांनियां गढ़कर विडियो बनवाई गयी। 22 दिसंबर को अपनी गाड़ी से एसटीएफ वाले बाराबंकी ले गये और आरडीएक्स और दिगर सामान के साथ हमारी गिरफ्तारी दिखाई गयी। जबकि हम 10 दिनों से इन्हीं के कब्जे में थे। हमारे पास आरडीएक्स या कोई भी सामान नहीं था। 24 दिसंबर से दो जनवरी तक रिमाण्ड पर एसटीएफ ने आफिस में ही रखा था। दूसरी रिमाण्ड सीओ फैजाबाद के जरिये 9 जनवरी को को षुरू हुई । दिन रात तषद्दुद के जरिये अपनी मकसद की बात करवाते रहे। 17 जनवरी 2008 की रात में सीओ सीटी फैजाबाद श्री राजेष पाण्डेय और एसटीएफ दरोगा ओपी पाण्डेय ने एक छोटी लाल रंग की बैटरी (जिस पर षक्ति लिखा हुआ था और उसपर कोई ऐसी चीज लगी हुई थी जो चिपक रही थी) को पकड़वाया था। इसके बाद डाबर केवड़ा की बोतलें पकड़वायी गयी और फिर आखों पर पट्टी बांधकर दूसरे कमरे में ले गये। मालुम नहीं हाथों में क्या क्या चीजें पकड़वायीं। पट्टी बंधी होने की वजह से मालुम नहीं हो पाया। हां इतना अंदाजा हुआ कि डिब्बा और बैग है। मुझे डर इस बात का है कि इन्होंने हमारे फिंगर प्रिंट मुख्तलिफ तरीकों से लिए और इस चीज की कोषिष की, हम समझने न पायें। अत: आपसे निवेदन है कि ये लोग हमको फंसाना चाहते हैं। सुबूत में ये फिंगर प्रिंट पेष करें तो आप हमारी इन बातों का जरूर ध्यान रखें, आपकी अतिकृपा होगी। मैं एक अमन पसंद, मुहिब्बे वतन षहरी हूं, मैंने कभी कोई अपराध नहीं किया है और ना ही ऐसी तबयत का हूं।