Aug 12, 2011

बच्चा चुराने वाले आठ सौ गैंग सक्रिय

देश के पैमाने पर औसतन हर घंटे में एक बच्चा गायब होता है।  देशभर में चौबीस घंटे में कुल 24 लोगों के जिगर के टूकड़ों को छिन कर जिंदगी के अंधेरे में ढकेल दिया जाता है...

संजय स्वदेश

अपने बच्चे को चहकते देख हर मां-बाप का मन गदगद हो जाता है। जरा सोचिये, जब यही मासूम दुनिया समझने की होश संभालने से पहले ही लापता हो जाए। क्या बीतती होगी ऐसे लोगों पर। जिस जिगर के टुकड़े को हर मुसीबत से बचाने के लिए लोग दु:खों का पहाड़ झेल लेते हैं, वह एक दिन अचानक गुम होकर नर्क की दुनिया में चला जाता है।

देश लंबा-चौड़ा है। आबादी बड़ी है। संभव हो आपके आसपास कोई ऐसा नहीं मिले, जिसके बच्चे होश दुनिया समझने से पहले गायब हो चुके हो। पर आपको जानकार यह आश्चर्य होगा, लेकिन एक हकीकत यह है कि आज देशभर में करीब आठ सौ गैंग सक्रिय होकर छोटे-छोटे बच्चों को गायब करने के धंधे में लगे हैं। यह रिकार्ड सीबीआई का है। मां-बाप का जिगर का जो टुकड़ा दु:खों की हर छांव से बचता रहता है, वह इस गैंग में चंगुल में आने के बाद एक ऐसी दुनिया में गुम हो जाता है, जहां से न बाप का लाड़ रहता है और मां के ममता का आंचल।

किसी के अंग को निकाल कर दूसरे में प्रत्यारोपित कर दिया जात है, तो किसी को देह के धंधे में झोंक दिया जाता है। कुछ मजदूरी की भेंट चढ़ जाते हैं।  जब देश में करीब 800 गिरोह सक्रिय है कि तो जाहिर है बड़ी संख्या में बच्चे भी गायब होते होंगे। जरा गायब बच्चों का आंकड़ा देखिये। देश के पैमाने पर औसतन हर घंटे में एक बच्चा गायब होता है। मतलब देशभर में चौबीस घंटे में कुल 24 लोगों के जिगर के टूकड़ों को छिन कर जिंदगी के अंधेरे में ढकेल दिया जाता है। तेज रफ्तार जिंदगी में जब संवेदना से सरोकार दूर होते जा रहे हों,  तक यह पढ़ते हुए शायद ही किसी को आश्चर्य हो कि देश की जो राजधानी अपनी सौवीं वर्षगांठ मना रही हैं, वहीं रोज सात बच्चे लापता हो जाते हैं। भयावह स्थिति यह है कि इनमें से आधे से कम ही बच्चों का पता लग पाता है।

खबरों कहती हैं कि लापता होने वाले बच्चों का इस्तेमाल अंग प्रतिरोपण व्यापार, देह व्यापार और बाल मजदूरी के लिए होता है। उच्चतम न्यायालय ने लापता बच्चों का पता लगाने के लिए विशेष दल का गठन करने की बात कही थी, लेकिन इस बारे में हमारी असंवेदनशील सरकार ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाये। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 44,000 बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं और उनमें से करीब 11,000 का ही पता लग पाता है।

लापता होने वाले अधिकतर बच्चे गरीब परिवार के होते है । ऐसे परिवार के लोग जब थाने में रिपोर्ट लिखवाने जाते हैं तो पहले उन्हें टरकाया जाता है। यदि रिपोर्ट लिख भी ली जाए तो उन्हें ढूंढ़ने में पुलिस भी लापरवाही बरतती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस घृणित अपराध को रोकने के लिए कई सुझाव दिये। पर सुझाव तो सुझाव होते हैं, आदेश नहीं। जब उच्चतम न्यायालय के आदेश पर अभी तक ठोस कदम नहीं उठे तक भला सरकार इतनी असानी से ऐसे सुझावों को क्यों माननें लगे।

कुछ वर्ष पहले स्लम डॉग मिलेनियर आई थी, तब इस तरह गायब बच्चों की एक दर्दनाक हकीकत से रूपहले परदे पर दिखी। देश में ढेरों-चर्चाएं हुई। मगर कहीं से कोई संवदेना की ऐसी मजबूत आंधी नहीं चली जो एक आंदोलन बन कर सरकार को कटघरे में खड़ी करती।

आपको मजेदार बात बताये, हर दिन हर घंटे गायब होने वाले बच्चों का यह आंकड़ा 11 अगस्त को संसद में शून्य काल के दौरान भाजपा और कांग्रेस के संवेदनशील सदस्यों ने शुन्यकाल में उठाया गया। सदस्य ने सवाल पूछा। सरकार ने जवाब दिया कि वह इसको लेकर गंभीर है। सरकार के जवाब में कहीं नहीं लगा कि मामूसों की तबाह होती जिंदगी में उसका दिल पसीजता भी है। चर्चा दूसरे विषय पर चल पड़ी। न उम्मीद की किरण दिखी न ऐसे मासूमों की रक्षा के लिए सरकार की दृढ़ता। भाजपा के मनसुखभाई वासवा और एस एस रामासुब्बू ऐसे गंभीर सवाल को उठाने के लिए बधाई के पात्र है।

Aug 11, 2011

पुस्तिका बाँट फारिग हुए

एक आयोजन कर दलित मुद्दे पर स्टैंड लिया और सार्वजनिक पुस्तक वितरण किया. अब उस पर सवाल उठ रहे हैं तो उनका जवाब क्यों नहीं दे रहे? मुद्दा सार्वजनिक है तो उसका जवाब सार्वजनिक रूप से देना चाहिए...

राम प्रकाश अनंत

अपनी व्यक्तिगत परेशानियों के चलते और मेरे मोबाइल पर google doc के न खुल पाने के कारण मैं क्रालोस द्वारा प्रकाशित पुस्तिका नहीं पढ़ पाया हूँ, जल्दी ही पढ़ने की कोशिश करूँगा.जनज्वार ने अच्छी बहस शुरू की है. फ़िलहाल मैं सुधीर के लेख 'प्रयोगशाला के क्रांतिवीरो को आरक्षण लगे रोड़ा' पर अपनी कुछ राय रखना चाहता हूँ.

सुधीर का कहना है कि पुस्तिका की 90%बातें सामान्य मार्क्सवादी बातें हैं जिन्हें हर बुद्धिजीवी जानता समझता है. शेष अहमक गाली गलौज जो हर हारा बुद्धिजीवी करता है'.इस पुस्तिका की क्या, मार्क्सवाद पर आज जो तमाम बातें होती हैं उन्हें बुद्धिजीवी जानते समझते हैं फिर भी हमेशा से ये बातें होती रही हैं और आगे होती रहेंगी . 90%बातें सामान्य मार्क्सवादी बातें हैं और आप मार्क्सवाद को मानते हैं तो वे सही ही होंगी.

दलितों के सवाल पर मार्क्सवाद का एक ही स्टैंड हो सकता है. ऐसा नहीं हो सकता कि सामान्य मार्क्सवादी की  बातें सही हों और विशिष्ट मार्क्सवादी की बातें गलत हों. अगर सामान्य मार्क्सवाद के अनुसार 90% बातें सही हों और आपके विशिष्ट मार्क्सवाद के अनुसार वे ग़लत हों तो उसे स्पष्ट कीजिए. या फिर आप सामान्य मार्क्सवाद की ऐसी कोई सूची दीजिए जिस पर बात करना गुनाह है और अपने विशिष्ट मार्क्सवाद को बताइए जिस पर बात होनी चाहिए.

आपने लिखा है कि अकर्मण्य मार्क्सवादी जो राजेंद्र यादव के  साहित्यिक  क़द तक पहुँचना चाहता है...इस चुनौती की स्वीकारोक्ति मात्र ही उसे हिंदी साहित्य जगत की मुख्य धारा तक पहुँचा देती. जय पराजय बाद की बात है'- अगर हंस के पुराने अंक उठाकर देखे जाएं तो पता चलता है कि राजेंद्र यादव ने तमाम लोगों के सावालों को स्वीकारोक्ति दी है, पर वे सामान्य पत्र लेखक या जैसे लेखक हैं वैसे ही लेखक बन पाए.

सुधीर ने कहा है- 'इन संगठनों के शत- प्रतिशत सक्रिय कार्यकर्ता संगठन से सजातीय जीवन साथी तलाशने का अनुरोध करते हैं.' सक्रिय कार्यकर्ताओं की ऐसी माँग कोई संगठन तभी पूरी कर सकता है जब वह एक मैरिज़ ब्यूरो चलाता हो. यह बात इसलिए वाहियात लगती है कि संगठन के जितने लोगों को मैं जानता हूँ उनमें से अधिकांश ने विजातीय शादियां की हैं.

बावजूद इसके मैं मानता हूँ कि किसी संगठन में कुछ खास तरह की जातिवादी प्रवृत्तियां मौजूद हो सकती हैं. दूसरी बात यह है कि यह कोई मामूली बात नहीं है. जब सुधीर संगठन के नेतृत्व करने वालों में खुद थे जिसकी आज वे खुलकर आलोचना कर रहे हैं, तो क्या तब उन्होने यह बात उठाई थी? अगर वह इन मसलों को अपने जिरह में लाये होते तो बेहतर होता.

कुछ समय पहले जनज्वार ने एक अन्य क्रांतिकारी संगठन के बारे में कुछ सवाल उठाए थे. सवाल उठाने वाले ज्यादातर लोग  कैडर स्तर के लोग थे और वे शीर्ष नेतृत्व पर आरोप लगा रहे थे, जो सही था. लेकिन  यहाँ वह (सुधीर) व्यक्ति संगठन पर आरोप लगा रहा है जो स्वयं शीर्ष नेतृत्व में शामिल रहा है. आरोप भी ऐसे जो प्रथम दृष्टया निकृष्ट लगते हैं.

मैं क्रालोस और इंकलाबी मजदूर केंद्र  के नेताओं से भी यह पूछना चाहता हूँ कि उन्होंने एक आयोजन कर दलित मुद्दे पर स्टैंड लिया और सार्वजनिक पुस्तक वितरण किया. अब उस पर सवाल उठ रहे हैं तो उनका जवाब क्यों नहीं दे रहे? मुद्दा सार्वजनिक है तो उसका जवाब सार्वजनिक रूप से देना चाहिए. अगर यह मंच उन्हें जवाब के लायक नहीं लगता तो जहाँ उचित लगे वहाँ जवाब देना चाहिए. या आपने  यह मान लिया कि  पुस्तिका बाँट दी और बात फाइनल.

मैं यह भी कहना चहता हूँ कि क्रांति के लिए वस्तुगत परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण होती हैं परंतु संगठन के शीर्ष नेतृत्व की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. इस बात को यह कह कर टाल देना भी ठीक नहीं होगा कि परिस्थितियां स्वयं नेतृत्व पैदा कर लेती हैं. इसलिए संगठनों को आत्मचिंतन करने की ज़रूरत है.

आप दहेज और कर्मकाण्ड का विरोध करते हैं तो इस बात पर भी गहरी नज़र रखें कि कार्यकर्ता सचेतन शादी विवाह के मामले में जातिवादी तो नहीं हैं. नेतृत्व से जुड़े लोगों पर तो विशेष रूप से नज़र रखी जानी चाहिए.जो भी निष्कर्ष निकालें उसके बारे में अच्छी तरह व्यवहारिक तरीके से सोच लें. मैं कोई नसीहत नहीं दे रहा हूँ एक सुझाव मात्र रख रहा हूँ.

प्रधानमंत्री धृतराष्ट्र तो नहीं



सरकार पर दवाब बनाया जाता है तो प्रधानमंत्री महोदय को जनता की मांग गैर-संवैधानिक नज़र आने लगती है और जनता का प्रयास समानांतर सरकार चलाने की उद्दंडता...

पीयूष पन्त
 

हमारे प्रधानमंत्री महोदय को सवालिया संस्कृति नहीं भाती. तभी तो जब भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी यूपीए सरकार के मंत्रियों के भ्रष्ट  आचरण को लेकर मीडिया में सवाल उठाये जाते हैं या फिर नागरिक समाज द्वारा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने  के लिए जनता के सरोकारों को समाहित करने वाले जन लोकपाल विधेयक को संसद द्वारा शीघ्र पास कराने की खातिर सरकार पर दवाब बनाया जाता है तो प्रधानमंत्री महोदय को जनता की मांग गैर-संवैधानिक नज़र आने  लगती है और जनता का प्रयास समानांतर सरकार चलाने की उद्दंडता .

जब सरकार शासन चला पाने में असमर्थ दिखाई दे रही हो तो मीडिया और जनता द्वारा उसकी खिंचाई करना और सरकार पर सुसाशन का दबाव डालना पूरी तरह से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है. अब प्रधानमंत्रीजी की समझ का क्या किया जाये कि उन्हें लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ पुलिसिया राज का आगाज़ करती दिखाई देती हैं. जबकि सच तो यह है की उनकी अपनी सरकार की यूआईडी कार्ड बनाना, जनता से धरना-प्रदर्शन स्थलों को लगातार छीनते चले जाना, आदिवासी-किसानों द्वारा अपने जंगल-ज़मीन बचाने की खातिर आन्दोलन करने को देशद्रोह बता उन पर लाठी-गोली बरसाना और उनके मुद्दों को उठाने वाले पत्रकारों को माओवादी करार दे फर्जी मुठभेड़ में मार देना सरीखी कारगुजारियां देश को पुलिस राज में तब्दील कर चुकी हैं. 

धृतराष्ट्र तो वाकई अंधे थे, लेकिन हमारे  प्रधान मंत्री जान-बूझ कर अंधे होने का नाटक क्यों कर रहे हैं, या फिर देशी-विदेशी कर्पोरेटेस  ने उन्हें ऐसा चश्मा पहना दिया है जिसके चलते उन्हें कोर्पोरेट हितों के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं देता है. जन कवि बाबा नागार्जुन की निम्न पंक्तियाँ आज रह-रह कर याद आती हैं...

 
                        खड़ी हो गयी चांपकर कंकालों की हूक  
                        नभ में विपुल विराट-सी शासन की बन्दूक 
                        उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
                        जिसमें कानी हो गयी शासन की बन्दूक
                        बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक
                        धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बन्दूक
                        सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक 
                        जहां तहां दगने लगी शासन की बन्दूक
                        जली ठूंठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक
                        बाल न बांका कर सकी शासन की बन्दूक                                                           

राजा बैठे हैं सिंहासन पर !


 कवि गोपाल सिंह नेपाली की जन्मशती पर आज विशेष  

हिंदी में कई ऐसे ओजस्वी कवि हैं जिनकी कालजयी रचनाओं के बावजूद कालांतर में उन्हें भूला दिया गया। गोपाल सिंह नेपाली भी उन्हीं में से एक हैं, जिनकी आज ११ अगस्त को जन्मशती है.
महज 23वर्ष की आयु में अपनी प्रखर काव्य रचना से लोहा मनवाने वाले नेपाली ने जब काशी नगर प्रचारिणी सभा की ओर से आयोजित द्विवेदी अभिनंदन समारोह में कविता पाठ किया तो रातों रात उनका नाम चर्चित हो गया।

गोपाल सिंह नेपाली राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन, अज्ञेय, नागार्जुन और महादेवी वर्मा जैसे बड़े  हिंदी साहित्यकारों  और कवियों के समकालीन थे। आजादी के आंदोलन को लेकर उन्होंने कई रचनाएं कीं। नेपाली का जन्म 11 अगस्त 1911 को पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया में कालीबाग दरबार में हुआ था। वह अपनी रचनाओं के कारण गीतों के राजकुमार के रूप में लोकप्रिय हुए। कवि की भतीजी और साहित्यकार सविता सिंह नेपाली ने बताया कि उनकी  उपेक्षा का आलम यह है कि डैनी बोयेल निर्देशित आठ आस्कर पुरस्कारों की झड़ी लगाने वाली 2009की फिल्म स्लमडाग मिलेनियर के गीत ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ मेरे...’ नेपाली की रचना थी, लेकिन श्रेय किसी और को गया। 

सविता ने बताया कि कुछ समकालीन कवियों की तरह सत्ता पक्ष का गुणगान नहीं करने के कारण यथार्थवादी कवि के लिए उस समय का साहित्यिक माहौल अनुकूल नहीं रहा।

सविता ने बताया कि गोपाल सिंह आत्मसम्मान के लिए जीते थे और उन्हें पद की लोलुपता नहीं थी। वह किसी के कृपापात्र नहीं बनना चाहते थे जो भी लिखा देश के लिए लिखा। अपनी कलम की स्वाधीनता तथा आत्मसम्मान पर कवि ने लिखा है,जिससे पता चलता है कि तुच्छ लाभ के लिए उन्होंने कभी समझौता नहीं किया।

उन्होंने लिखा-

राजा बैठे हैं सिंहासन पर

ताजों पर है आसीन कलम

मेरा धन है स्वाधीन कलम

तुझसा लहरों में बह लेता

तो मैं भी सत्ता गह लेता

ईमान बेचता चलता तो

मैं भी महलों में रह लेता

नेपाली की रग-रग में देश प्रेम और बिहार की जनता के प्रति समर्पण भरा था। वह बिहारवासियों की तकलीफ को शब्दों में पिरो देते थे। वर्ष 1934 में बिहार में आये भीषण भूकंप की भयावहता को अपनी कलम के माध्यम से नेपाली ने कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है-

सुन हिली धरा डोली दुनिया,

भवसागर में डगमग बिहार

वैशाली, मिथिला, जब उजड़ी

तब उजड़ गया लगभग बिहार

है यह व्यर्थ प्रश्न यह कौन मरा

जब बालू ही से कुआं भरा

गिर पड़े भवन, उलटी नगरी

फट गयी हमारी वसुंधरा

नेपाली ने 1932में आजादी के जोशो जुनून में हिंदी में प्रभात तथा अंग्रेजी में मुरली नामक हस्तलिखित पत्रिकाएं चलाई। उनकी प्रमुख कृतियां उमंग (1933), पंछी (1934), रागिनी (1935), पंचमी (1942), नवीन (1944), नीलिमा (1945) हैं।

गोपाल सिंह समसामयिक माहौल पर बहुत पकड़ रखते थे। दिसंबर 1931में लंदन में गांधी जी के गोलमेज सम्मेलन वार्ता पर उन्होंने लिखा।

उजलों के काले दिल पर

तूने सच्चा नक्शा खींचा

उजड़ा लंकासायर अपने

गीले आंसू से सींचा

गोपाल सिंह नेपाली प्रेम, प्रकृति, व्रिदोह, राग, आग, भक्ति और सौंदर्य के प्रखर गीतकार रहे हैं। साहित्य के तथाकथित ठेकेदारों ने उन्हें फिल्म गीतकार कहकर साहित्य के मंदिर से बाहर रखने की कोशिश की। इसका एक खामियाजा यह हुआ कि सर्वसुलभ कवि की कृतियां अब व्यापक पैमाने पर सुलभ नहीं हैं।

भागलपुर स्टेशन पर 17 अप्रैल 1963 में गोपालसिंह नेपाली का असामयिक निधन हो गया। सविता बताती हैं कि उन्हें जहर देकर मारा गया था क्योंकि पूरा शरीर नीला पड़ गया था। कवि का पोस्टमार्टम तक नहीं होने दिया गया जबकि परिजनों ने पुरजोर मांग की थी।

कवि के शब्दों में

तलवार उठा लो तो बदल जाए नजारा, 40 करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।’’

सेना के जवानों का हौंसला बढाने के लिए उन्होंने लिखा।

आज चलो मर्दानों भारत की लाज रखो

लद्दाखी वीरों के मस्तक पर ताज रखो।

उन्होंने कहा कि बिहार की धरती के लाल की सौवीं जयंती सरकार को मनानी चाहिए थी,लेकिन महकमे को याद भी नहीं कि 100 वर्ष पहले कोई लेखनी का वीर यहां अवतरित हुआ था।

Aug 10, 2011

नए फॉर्म में जनज्वार डॉट कॉम


दोस्तो,    

आपके प्यार और लगाव ने हमें बढ़ते रहने का साहस दिया है और चुनौतियों से लड़ते रहने का जज्बा भी. उसी साहस का नतीजा है कि  जनज्वार, ब्लॉग से वेबसाइट के पड़ाव पर  अगले कुछ  दिनों में पहुँचने जा रहा है.  ब्लॉग से वेबसाइट तक पहुंचने के इस  चार साल के सफ़र में हम जनज्वार के पाठकों का तहेदिल से शुक्रिया करना चाहते हैं जिन्होंने इसे इस मुकाम तक पहुंचाया.

दोस्तो !  हम केवल अपना  फार्म बदल रहे हैं, तेवर नहीं. जनज्वार अब तक जिस तेवर के साथ आपके सामने रहा है, हम उसे न केवल बनाए रखेंगे बल्कि और धारदार बनाने की कोशिश करेंगे. नए रूप में हमारी कोशिश रहेगी  कि जनज्वार लगातार आपके बीच उन ख़बरों को भी लाता रहे, जिन्हें अखबार और टीवी चैनल ‘आउट ऑफ फैशन’ मानते है.

पत्रकारिता का हमारा उद्देश्य पाठकों को प्रभावित करना नहीं है, बल्कि उन्हें अपना फैसला लेने में सहयोग करना है. हमें पूरी उम्मीद है कि आपने हमें जो प्यार और खुलूस  बख्शा है वह बदस्तूर जारी रहेगा. इसी  उम्मीद के साथ....

सादर
जनज्वार टीम

Aug 9, 2011

जमीन के सवाल को उलझाने की राजनीति


अधिग्रहीत की जाने वाली जमीन के लिए मुआवजे की राशि  को थोड़ा ज्यादा बढ़ाकर उसे बाजार की मौजूदा दरों पर आधारित ‘उचित मुआवजा’कह देने भर से यह समस्या हल नहीं होने वाली...

एस. पी. शुक्ला

भारत की राजनीति पर इस वक्त जमीन का सवाल छाया हुआ है। इसे धुँधला करने,वाग्जाल में उलझा कर अस्पष्ट करने और इससे पीछा छुड़ाने की केन्द्र और राज्य की हर कोशिश बेकार साबित हुई है। देश में अनेक जगहों पर और ठेठ राजधानी की सरहदों पर ये सवाल बा-बार सिर उठा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जमीन के सवाल पर होने वाले हिंसक विरोध भी तेजी से फैल रहे हैं।

भट्टा में तैनात रही पुलिस                               फोटो -जनज्वार   

विभिन्न परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन के अनुचित मुआवजे का मसला; एसईजेड के खिलाफ जमे हुए मोर्चे और विभिन्न राज्यों में बड़ी औद्योगिक   या खनन या ऊर्जा परियोजनाओं के खिलाफ एकजुट लोग; छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल में बड़े पूँजीपतियों द्वारा किए जा रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ उबलता जनविरोध;सारे देष में गरीब ग्रामीणों की एकमात्र आजीविका के साधन,जमीन से बड़े पैमाने पर की जा रही उनकी बेदखली और उसके खिलाफ जमा होता उनका असंतोष;ग्रामीण इलाकों से आजीविका छीन लिए जाने के बाद शहरों की झुग्गियों में जमा हो रहे गरीबों का गुस्सा; लंबे वक्त से खेती के क्षेत्र में जारी ठहराव की वजह से विस्थापन के लिए मजबूर और इन स्थितियों के खिलाफ एकजुट होते लोग; और बड़े पैमाने पर हुई किसानों की आत्महत्या व हर तरफ फैला कुपोषण-खासतौर से बच्चों और माँओं में -ये सारी चीजें जमीन के बुनियादी सवाल से जुड़ी हुई हैं और उसी सवाल को विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त करती हैं।

इतने बड़े पैमाने पर लोग असंतुष्ट हैं और सरकार की प्रतिक्रिया इन मसलों पर न के बराबर रही है। जिन पहलुओं पर सरकार ने काफी देर बाद कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की भी,तब भी जमीन के व्यापक सवाल के आंशिक हिस्से से वो आगे नहीं बढ़ी। इसका सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण 1894 के बने हुए भूमि अधिग्रहण कानून पर सरकार का प्रस्तावित संषोधन का कदम है। इस बारे में कोई दो राय नहीं कि यह कानून सिर्फ और सिर्फ हमारे गुलाम अतीत की एक धरोहर है।

अधिग्रहीत की जाने वाली जमीन के लिए मुआवजे की राशि  को थोड़ा ज्यादा बढ़ाकर उसे बाजार की मौजूदा दरों पर आधारित ‘उचित मुआवजा’ कह देने भर से यह समस्या हल नहीं होने वाली, न ही कॉरपोरेट सेक्टर के लिए अधिग्रहीत की जाने वाली जमीन पर 30:70 का फॉर्मूला कामयाब होने वाला है। इस पूरे मसले की जड़ ’सार्वजनिक उद्देष्य‘ की ढीली-ढाली परिभाषा में छिपी है। इस ’सार्वजनिक उद्देष्य‘ को बहुत ही अस्पष्ट रखा गया है, जैसे कि ’देश  की अधोसंरचना के विकास‘ को रखा गया था। इस सार्वजनिक उद्देष्य का दायरा इतना व्यापक है कि इसमें भूमि अधिग्रहण के तमाम प्रस्ताव वैधता पा सकते हैं।

वो भी इसलिए, क्योंकि इन प्रस्तावों को सुनियोजित तरीके से पब्लिक प्राइवेट पार्टिसिपेषन के तहत आगे बढ़ाया गया है। इससे गरीब किसानों की आजीविका का जो नुकसान होगा,उसे मुआवजे की कितनी भी ऊँची रकम या पुनर्वास के कितने भी कानूनी प्रावधान से पूरा नहीं किया जा सकता। इन छोटे और गरीब किसानों की आजीविका का एकमात्र सहारा जमीन ही रही है। ऐसा ही हाल ग्रामीण भारत के उन तबकों का भी है,जिनकी आजीविका का मुख्य जरिया या तो खेती है,या चरनोई की जमीन है, जिन पर बाजार की गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी है।

पूरे देष में जोत की जमीन 1992-93 से लेकर 2002-03तक 12.5करोड़ हैक्टेयर से 10.7 करोड़ हैक्टेयर रह गई है। सबको याद होगा कि यह दौर नवउदारवादी आर्थिक सुधारों का पहला चरण था। यह अपने आप में सरकार द्वारा अपनाई जाने वाली किसान विरोधी नीति की एक सच्ची तस्वीर थी। और यह भी कि इसी दौर में सरकार ने किसानों के हितों के खिलाफ नीतियाँ बनाने और लागू करने की शुरुआत की थी। यह स्वीकार करने में दुःख होता है कि देष में लोगों को बेदखल करके अपना घर भरने की इस कारुणिक कहानी को लिखने और खेलने वाले हमारी अपने देष की सरकार और बाजार की ताकतें हैं। यह छोटे किसानों के दृष्य से गायब हो जाने की प्रक्रिया ही नहीं थी,बल्कि खाद्य सुरक्षा के मसले पर चेतावनी का उतना ही बड़ा संकेत भी थी।

जमीन के सवाल को असल में इसकी सारी पेचीदगियों के साथ हल करने के लिए हमारी अर्थव्यवस्था में कुछ बुनियादी बदलाव जरूरी हैं। यह जरूरी है कि 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून से उठे सवालों और उसमें प्रस्तावित संषोधन के कुछ पहलुओं पर विचार किया जाए,ताकि इस मसले पर एक ठोस और सही समझ कायम की जा सके। उसी समझ के आधार पर तात्कालिक कार्रवाई के पक्ष में जनसमर्थन जुटाया जा सकता है। ऐसी ठोस और सही समझ के जो बुनियादी बिंदु हमारी समझ से हो सकते हैं, वे निम्नलिखित हैं-

सन् 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून और उसी जैसे अन्य कानून इसलिए गलत हैं, क्योंकि उनकी बुनियाद राज्य के संपूर्ण स्वामित्व यानी एमिनेंट डोमेन पर आधारित है;क्योंकि उनमें उल्लेखित सार्वजनिक उद्देष्य की परिभाषा बेहद ढीली-ढाली हैं; और इसलिए इन कानूनों की वजह से सरकार की वह भूमिका सवालों से परे हो जाती है, जब वह निजी कंपनियों और व्यापारिक हितों के लिए एजेंट का काम करने लगती है; क्योंकि यह कानून आदिवासियों और वन-भूमि पर आश्रित लोगों के लिए की गई संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा का उल्लंघन करते हैं और उन प्रावधानों के आड़े आते हैं, जिससे आदिवासियों को अपनी जमीन ओर जीवन का हक मिलता है; क्योंकि यह कानून ग्राम सभा की उस सहमति की भी कोई अहमियत नहीं रखते, जो जमीन के हस्तांतरण या अधिग्रहण की एक बुनियादी शर्त बनाई गई है;और यह कानून उन लोगों की बेहतर जिंदगी और आजीविका के लिए किए गए उन प्रावधानों का भी कोई ध्यान नहीं रखते, जिनकी आजीविका जमीन के अधिग्रहण या हस्तांतरण से खतरे में पड़ सकती है। इसलिए होना ये चाहिए कि -

- 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून और उस जैसे अन्य कानूनों को पूरी तरह खत्म किया जाए
- खेती, जंगल, खनन और सामुदायिक जमीनों के कॉरपोरेट क्षेत्र को हस्तांतरण पर पूरी तरह रोक घोषित की जाए।
- कृषि भूमि के गैर कृषि उपयोग पर रोक लगाई जाए और कृषि भूमि का हस्तांतरण विदेषियों तथा अप्रवासी भारतीयों के लिए भी निषिद्ध किया जाए।

साथ ही यह भी कि एक मुकम्मल, जनकेंद्रित, पर्यावरणहितैषी और क्षेत्र विशेष  के लिए उपयुक्त भूमि उपयोग का निर्धारण करने के लिए वैज्ञानिक आधारों वाली भूमि उपयोग नीति बनाने के लिए एक राष्ट्रीय भूमि उपयोग आयोग का गठन किया जाए। यह समिति जमीन को बाजार के खरीद-फरोख्त के दायरे से बाहर लाने के मकसद से काम करे। ऐसा करके ही उन सभी के लिए खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता और बेहतर जिंदगी सुनिष्चित की जा सकती है, जिनकी आजीविका जमीन है।

(लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी एनालिसिस के अध्यक्ष, भारत सरकार के पूर्व वित्त सचिव व वाणिज्य सचिव तथा योजना आयोग के पूर्व सदस्य हैं)

अनुवाद-विनीत तिवारी

Aug 8, 2011

‘रोडीज़’ के तीन नालायक़


रोडी बनने के लिए माँ-बहन की गालियाँ सुनाना ज़रूरी है। जैसे कि वे हर दूसरे मिनट में प्रतियोगियों की माँ और बहन के लिए निकालते हैं और बीप-बीप करके हमें उन गालियों का अहसास कराया जाता है...

इन्द्रजीत आजाद  

रघु, राजीव और रणविजय। सुने हैं आपने ये तीन नाम? चैनल बदलते वक़्त यदि दो टकलों के बीच में एक बालों वाला इन्सान आपको दिख जाए, तो समझिए यही हैं वे तीन नालायक़। बहुत सोचा कि इतने छिछोरे लोगों के बारे में लिखकर समय बर्बाद करूँ या नहीं।


फिर देखा, आजकल के युवाओं को उनके शो में जाने के लिए गिड़गिड़ाते हुए तो सोचा चलो, एक छोटा सा प्रयास करूँ। जो इन महानुभावों को नहीं जानते हैं, उनके लिए बता दूँ कि इनके नाम पर न जाएँ। ये बिलकुल भी रघु, रणविजय या राजीव जैसे व्यक्तित्व नहीं रखते हैं। ये एक रियलिटी शो का आठवाँ संस्करण बना रहें है, MTV रोडीज़ आठ।

रोडी बनने की पात्रताएँ है...
  • रोडी बनने के लिए माँ-बहन की गालियाँ सुनाना ज़रूरी है। जैसे कि वे हर दूसरे मिनट में प्रतियोगियों की माँ और बहन के लिए निकालते हैं और बीप-बीप करके हमें उन गालियों का अहसास कराया जाता है।
  • आपको समलैंगिकता (गे) को मान्यता देनी होगी। ऐसा ये टकले कई बार कहते सुने गए हैं कि समलैंगिकता सही है और प्रतियोगी द्वारा विरोध करने पर उन्हें गालियाँ मिलती हैं।
  • आपको भारतीय संस्कृति के बारे में कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं है, क्योंकि अगर आपने भारत या भारत की संस्कृति की बात की, तो आप संस्कृति के ठेकेदार कहकर बाहर निकाल दिए जाएँगे।
ज़्यादा लम्बी लिस्ट नहीं लिखूँगा, सिर्फ़ इन्ही पंक्तियों को आधार बनाता हूँ। आज तक हमने अपनी इज़्ज़त व देश की ख़ातिर गोलियाँ खाना सीखा है। अब रोडी बनिए और अपनी माँ-बहन की गालियाँ सुनिए। मतलब, अब हमारे यहाँ बेहया बनाए जाएँगे, जिनकी माँ-बहनों की इज़्ज़त MTV के ये टकले स्टूडियो में नीलाम करेंगे और हमारे देश के कर्णधार सर झुकाकर अपनी माँ-बहनों को इनके सामने रख देंगे, क्योंकि उन्हें  रोडी जो बनना है।

आगे भी वो जो कुछ बनेंगे वो होगा समलैंगिक बनना, क्योंकि समलैंगिकता को मान्यता तो रोडीज़ के जज ही दे रहें है। रोडीज़ स्कूल के बच्चे तो उनका अनुसरण ही करेंगे और भारतीय संस्कृति को तो MTV के कूड़ेदान में ही डाल देंगे।


 वैसे भी भारतीय संस्कृति विवेकानंद, रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह और समर्थ रामदास पैदा करती है, बेहया माँ-बहनों की इज़्ज़त नीलाम करने वाले रोडीज़ नहीं। दुःख ये है कि  हमारी नयी युवा पीढ़ी के कुछ लोग क़तारबद्ध होकर कातर दृष्टि से इनके सामने दुम हिलाते रहते हैं। अब रोडी टाइप युवाओं से एक अपील है, ''मेरे बंधुओ! बेहयाई छोड़ो, देश के लिए गोली खाने का माद्दा रखो, गली नहीं । इन टकलों से माँ बहन की गाली खाने का नहीं। विवेकानंद बनो, भगत सिंह बनो, रामदास बनो। और अगर ये नहीं बन सकते तो इन्सान बनो,  बीमार नहीं।'

भारत में रैगिंग का इतिहास पुराना

रैगिंग का सबसे भयावह रूप हॉस्टल रैगिंग में दिखाई देता है। हॉस्टल रैगिंग के दौरान छात्रों को नंगे बदन नाचने से लेकर अपना पेशाब पीने तक के लिए मजबूर किया जाता है... 

 आशीष वशिष्ठ 


देशभर में हर वर्ष बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे निकलते ही शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए नए छात्र-छा़त्राओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। स्कूल के अनुशासित माहौल से निकलकर इन छात्रों में जहां एक ओर कालेजों में आने की ख़ुशी  होती है, वहीं दूसरी तरफ एक अपरिचित वातावरण से ये भयभीत भी रहते हैं। पिछले कुछ वर्षों में रैगिंग नाम का हव्वा सभी छोटे-बड़े शिक्षण संस्थानों को अपने जाल में जकड़ चुका है।

प्रोफेशनल पाठयक्रम वाले संस्थानों मेडिकल, इंजीनियरिंग, तकनीकी शिक्षा एवं मैनजमेंट कालेज में रैगिंग की घटनाएं अधिक होती हैं। सीनियर छात्र नये छात्रों को तंग करना अपना संवैधानिक अधिकार समझते हैं। ड्रेस कोड, अश्लील-फूहड़ मजाक, दिअर्थी शब्दावली का प्रयोग और वार्तालाप, ऊटपटांग हरकतें, किसी अनजान लडकी को प्रोपोज करना, नशे की हालत में ड्राइविंग के लिए मजबूर करना, हास्टल रैगिंग आदि रैगिंग के घिनौने रूप हैं। नया सत्र शुरू होते ही अगर आपको कालेज जाने का अवसर मिले तो सीनियर और जूनियर को पहचानने में  ज्यादा मशक्कत नहीं करनी होगी।

रैगिंग का सबसे भयावह रूप हॉस्टल रैगिंग में दिखाई देता है। हॉस्टल रैगिंग के दौरान छात्रों को नंगे बदन नाचने से लेकर अपना पेशाब पीने तक के लिए मजबूर किया जाता है। इन प्रताड़नाओं से बचने के लिए अक्सर छात्रों को मजबूरन हास्टल छोड़ने पड़ता है। कड़ी मेहनत और अभिभावकों के अथक प्रयासों के बाद ही किसी अच्छे संस्थान में दाखिला मिल पाता है, लेकिन सारे प्रयासों और मेहनत पर तब पानी फिर जाता है जब रैगिंग रूपी दानव से घबराकर छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं या फिर रैगिंग के चलते अपनी जान गंवा देते हैं।

गौरतलब है कि रैगिंग के ज्यादातर मामले प्रोफेशनल कोर्सेज वाले शिक्षा संस्थानों के होते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि दूसरे शिक्षण संस्थान इस बीमारी से मुक्त है। देश के लगभग हर छोटे-बड़े कालेज औरशिक्षा संस्थान में किसी न किसी रूप में रैगिंग देखने को मिल ही जाती है। अपवादस्वरूप कुछ संस्थानों में रैगिंग न के बराबर है, लेकिन ऐसे संस्थानों की गिनती नाममात्र की है। रैगिंग का डरावना रूप ये सोचने को मजबूर करता है कि आखिरकर छात्र शिक्षा के मंदिरों में पढ़ने के लिए आते है या फिर शारीरिक व मानसिक शोषण और प्रताडना के लिए?

भारत में रैगिंग का इतिहास डेढ़ सौ से दो सौ वर्ष पुराना है। रैगिंग का जन्म यूरोपीय देशों में हुआ था। अमेरिकी अंग्रेजी में इसका अर्थ 'मजाक' है। रैगिंग मुख्यतः सेना में की जाती थी, जहां जूनियर को सीनियर की दासता, अंधभक्ति सिखाने के लिए ऐसा करना पड़ता था। रैगिंग के जरिए सीनियर के गलत कार्यों पर भी जूनियर द्वारा प्रश्न विरोध करने की क्षमता को समाप्त किया जाता था, ताकि वे अंग्रेज राज के अंधभक्त, सोच-समझ और विद्रोही स्वभाव न रखने वाला एक आज्ञाकारी गुलाम सैनिक बन सके। सेना से ये प्रथा पब्लिक स्कूलों, विश्वविद्यालयों, मेडिकल, इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षण संस्थानों में घुसपैठ कर गई। सातवें दशक में विश्वविद्यालयों की धड़ाघड़ स्थापना होते वक्त ही रैगिंग भारत में प्रचलित हुई। गौरतलब यह है कि विश्व में भारत और श्रीलंका को छोड़कर किसी दूसरे देश में रैगिंग की प्रथा चलन में नहीं है।

शिक्षा संस्थानों तथा हॉस्टलों के बाहर 'रैगिंग प्रतिबंधित है' के बोर्ड लगे रहते हैं। कालेज प्रशासन अनेक बार रैगिंग करने वाले छात्रों को दंडित भी करता है, लेकिन कानून को ताकपर रखकर ये ‘मजाक’ या ‘बदसलूकी’ जारी है। मानसिक एवं  शारीरिक कष्ट का दौर हर नया सत्र शुरू होते ही जारी रहती है। नये छात्र डर के मारे किसी से शिकायत भी नहीं करते हैं। अधिक मजबूर होने पर वह पढ़ाई ही छोड़ देते हैं।  
होता तो यह है कि आज जो छात्र ये ‘मजाक’ अपमान और बदसलूकी सह रहे हैं, वह भी अपना गुस्सा अगली बार निकालने की सोचते हैं, जिससे ये बीमारी रूक नहीं पाती है। सीनियर छात्रों को तो अपने अनुभव, ज्ञान के आधार पर नये छात्रों की हरसंभव सहायता करनी चाहिए। जूनियरों को उचित दिशा-निर्देश और मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए, पर हो बिल्कुल उलटा ही रहा है। अगर सीनियर उनकी उनकी सहायता के स्थान पर उनकी समस्याओं ही बढाएंगे तो वह जूनियरों के घृणा के पात्र ही बनेंगे। कई शिक्षा संस्थानों ने समितियों, कार्यदलों तथा सामाजिक संगठन बनाकर इसका विरोध किया, लेकिन वांछित परिणाम नहीं मिल पाये। आज के सीनियर जूनियर की नजर में भक्षक, जालिम, अत्याचारी, और बिगड़े हुए वे युवा हैं जो किसी अन्य को कष्ट में पड़ा देखकर ही प्रसन्न होते हैं।

रैगिंग रोकने लिये सुझाव देने के लिये सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। राघवन समिति की सिफारिशों के आधार पर रैगिंग की रोकथाम के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 10 फरवरी 2009 को सभी शिक्षा संस्थानों को दिशा-निर्देश जारी किये थे। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का ध्यान में रखते हुए यूजीसी ने भी रैगिंग को रेाकने के लिए ताजा मसौदा तैयार किये हैं। यूजीसी के इस प्रयास में एआईसीटीई, आईआईटी, आईआईएम और अन्य शिक्षा संस्थान एवं परिषदें भी शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत विभिन्न राज्यों ने भी रैगिंग की रोकथाम के लिए एक्ट बनाये हैं। केरल में रैगिंग एक्ट के तहत हुई कार्रवाई में स्पेशल कोर्ट ने रैगिंग के आरोपी मेडिकल कालेज के दो छात्रों को दस साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। सरकारी प्रयासों के अलावा कर्इ्र गैर सरकारी संगठन भी रैगिंग रूपी बीमारी को मिटाने की दिशा में प्रयासरत है। ऐसे ही एक गैर सरकारी संगठन ‘कोईलेशन टू अपरूट रैगिंग फ्रॉम एजुकेशन’ (सीयूआरई) ने रैगिंग के विरोध में अलख जगाई है। हजारों छात्र इस संगठन के सदस्य हैं और संगठन की वेबसाइट पर रैगिंग से संबंधित हर छोटी बड़ी जानकारी और प्रमुख हादसों का ब्यौरा उपलब्ध है।

इस दिशा में अभिभावकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। कालेज स्तर पर परिचय के नाम पर होने वाली रैगिंग को रोकने के लिए परिचय मिलन समारोह आयोजित किये जाने चाहिए। इस कार्य में सीनियर छात्रों और छात्र संगठनों का सहयोग भी लिया जा सकता है। स्वयं छात्रों को भी आगे आकर इस संबंध में ठोस और कारगर कदम उठाने होंगे। ये बीमारी या क्रूर प्रथा तभी समाप्त होगी जब तथाकथित परिचय के नाम पर होने वाली रैगिंग में छात्र खुद भाग लेना बंद करेंगे तथा रैगिंग में शामिल होने वाले छात्रों का सामाजिक बहिष्कार एवं विरोध करेंगे।

वहीं यूजीसी और मान्यता प्रदान करने वाली दूसरी संस्थाओं को भी उन शिक्षण संस्थानों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, जो अपने यहां रैगिंग रोकने में नाकाम रहे हों। असल में यहां सवाल केवल एक मासूम जिंदगी का न होकर देश के स्वर्णिम भविष्य का भी है। छात्र रूपी भविष्य को सुरक्षित रखना हम सब की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है। वरना कल-आज-कल की परंपरा की सजीव संस्थाएं शिक्षा और ज्ञान के केंद्रों के स्थान पर कसाईघर बन जायेंगे, जहां घुसने से पूर्व नये छात्र कई बार सोचा करेंगे।


स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक- सामाजिक मसलों के टिप्पणीकार.