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Feb 10, 2018

अक्सरहां युवा मिलते हैं जो कहते हैं कि हम शाहिद बनना चाहते हैं

सामाजिक कार्यकर्ता मसीहुद्दीन संजरी की नज़र में शाहिद आज़मी
11,फरवरी 2010 को कानून और साम्प्रदयिक सदभाव का खून करने वालों ने शाहिद आज़मी को शहीद कर दिया। शाहिद आतंकवाद के नाम पर फंसाए जा रहे बेकसूर मुस्लिम युवकों के मुकदमें देखते थे और कई बार उन ताकतों के मंसूबों का खाक में मिला दिया था जिनकी साज़िश की वजह से सैकड़ों मुस्लिम नौजवानों को सलाखों के पीछे डाल दिया गया था।


शाहिद ने बेकसूर युवकों की कानूनी लड़ाई को अपनी ज़िन्दगी का मकसद बना लिया था। एलएलएम करने के बाद उनके मामू उन्हें एक मशहूर के वकील के पास लेकर गये ताकि उनका भांजा अच्छा प्रशिक्षण लेकर खूब पैसा कमाए लेकिन आज़मी का इरादा कुछ और था। इस रास्ते पर चलने में आने वाले सम्भावित खतरों से भी शायद वह वाकिफ थे। इसीलिए उनकी मां जब उनसे शादी करने की बात करतीं तो वह मुस्करा कर टाल देते थे।

शाहिद आज़मी मूल रूप से आज़मगढ़ के इब्राहीमपुर गांव का रहने वाले थे। उनके पिता अनीस अहमद पत्नी रेहाना अनीस के साथ मुम्बई के देवनार क्षेत्र में रहकर अपनी अजीविका कमाते थे। बचपन में ही पिता अनीस अहमद का देहान्त हो गया। शाहिद आज़मी ने पंद्रह साल की आयु में दसवीं की परीक्षा दी।

अभी नतीजे भी नहीं आए थे कि कुछ राजनितिज्ञों को कत्ल करने की साजिश के आरोप में उन्हें टाडा के तहत गिरफतार कर लिया गया। जेल में भी अपनी पढ़ाई जारी रखी और कानून की डिगरी हासिल की। उन्हें पांच साल की सजा भी हुई परन्तु बाद में सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए। जेल से रिहा होने के बाद एक साल का पत्रकारिता का कोर्स करने साथ ही एलएलएम भी किया। कुछ समय एडवोकेट मजीद मेमन के साथ रहने के बाद अपनी प्रेक्टिस करने लगे।

शाहिद आज़मी का नाम उस वक्त उभर कर सामने आया जब उन्होंने 2002 के घाटकोपर बस धमाका, मुम्बई के 18 आरोपियों में से 9 को डिस्चार्ज करवा लिया बाद में बाकी 8 आरोपियों को भी अपर्याप्त साक्ष्यों के कारण टाडा अदालत ने बरी कर दिया। इस घटना के एक आरोपी ख्वाजा यूनुस की पुलिस हिरासत में ही हत्या कर दी गई थी।

शाहिद आज़मी 11, जूलाई 2006, मुम्बई लोकल ट्रेन धमाका, मालेगांव कबरस्तान विस्फोट और औरंगाबाद असलेहा केस के आरोपियों के वकील थे। यही वह जमाना था जब देश में एक साम्प्रदाकि-फासावादी शक्तियों द्वारा यह सघन अभियान चलाया जा रहा था कि कोई अधिवक्ता आतंकवादियों का मुकदमा नहीं देखेगा। इस समय तक आतंकवादी होने का अर्थ होता था मुसलमान होना। देश के कई भागों में ऐसे अधिवक्ताओं पर हिंसक हमले भी हुए थे।

बेंगलुरू में सैयद कासिम को शहीद भी कर दिया गया था। ऐसे वातावरण में यह साहसी नौजवान महाराष्ट्र के बाहर बंगाल समेत देश के कई भागों में जाकर अपनी कानूनी मदद देता रहा। अपनी शहादत से कुछ दिनों पहले ही बहुत गम्भीर मुद्रा में अपने परिजनों और मित्रों से शाहिद ने कहा था कि वह एक ऐसी योजना पर काम शुरू करने जा रहा है जिसके नतीजे में बेकसूरों पर हाथ डालने से पहले एजेंसियों को सौ बार सोचना पड़ेगा।

2006 और 2007 के बीच एडवोकेट शाहिद आज़मी को अज्ञात लोगों की तरफ से धमकी के फोन मिले थे। उन्होंने स्थानीय पुलिस में इसकी शिकायत दर्ज करवाई थी। उन्हें सेक्योरिटी भी दी गई थी लेकिन कुछ ही दिनों बाद वापस ले लिया गया। 26, नवम्बर 2008 के मुम्बई पर हुए आतंकी हमले में जब पहले से ही जेल में बन्द फहीम अंसारी और सबीहुद्दीन अंसारी को घसीटा गया तो शाहिद आजमी उनके वकील हुए।

इस हमले के पाकिस्तानी अभियुक्त अजमल कसाब के वकील के पी पवार को ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा दी गई परन्तु इसी मुकदमें से जुडे़ दूसरे अधिवक्ताओं की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की गई। शाहिद आज़मी कमेटी फार प्रोटेक्षन आफ डेमाक्रेटिक राइट्स (सीडीपीआर) सदस्य होने के साथ ही इंडियन असोसिएशन आफ पीपुल्स लाएर से भी जुड़े हुए थे। शाहिद आज़मी खुश मिज़ाज स्वभाव का था।

यही कारण था कि उनके विरोधी भी उनका सम्मान करते थे। मुम्बई की सरकारी वकील रोहिनी जो कई मुकदमों में शाहिद के खिलाफ वकील थीं, ने इसकी कड़े शब्दों में निन्दा करते हुए अपनी संवेदना व्यक्त की थी।

शाहिद नहीं रहा, पर देश में वो युवाओं का एक आइकन है. अक्सरहां युवा मिलते हैं जो कहते हैं की हम शाहिद बनना चाहते हैं.

Jun 16, 2017

2 महीने बाद मीडिया तक पहुंची 15 दलितों पर देशद्रोह के मुकदमें की सूचना

राजपूतों के दबाव में की जा रही हरियाणा के दलितों की बेजा गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे छात्र—नौजवान, 24 अप्रैल की दोपहर में सीएम खट्टर से अंबाला में मिले थे युवक और शाम को देशद्रोह समेत कई अन्य धाराओं में उनपर कर दिया गया था मुकदमा दर्ज।  

कैथल से राजेश कापरो की रिपोर्ट 

जी हां। यह सही समाचार है। ​हरियाणा के करनाल जिले के सिविल लाईन पुलिस थाना में 24 अप्रैल को यह मुकदमा दर्ज किया गया है। इस मुकदमा के अनुसार इन 15 नामजद दलित छात्रों—नौजवानों ने देशद्रोह का अपराध किया है । इन 15 आरोपियों में मोनिका नाम की एक दलित छात्रा का नाम भी है जो कुरूक्षेत्र युनीवर्सिटी में पढ़ती है।

 मैंने इस मुकदमे की एफआईआर की कॉपी के साथ पूरी जानकारी 5 जून को अपने फेसबुक शेयर कर दी थी। प्रदर्शनकारियों पर क्या मुकदमा दर्ज हुआ है यह पता करने में ही दसियों दिन लग गए। फिर थाने से कॉपी लेने में समय मुझे समय लगा और मैंने 5 जून को एक पोस्ट जरिए खुलासा किया कि 15 दलित छात्रों—नौजवानों पर हरियाणा पुलिस ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया है। छात्रों—नौजवानों समेत सैकड़ों की संख्या में दलित अंबाला जिला के गांव पतरेहड़ी के दलितों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ राज्य के कई जिलों में प्रदर्शन कर रहे थे। 

कुछ लोगों ने खबर को शेयर भी किया पर देश ने आज तब संज्ञान में लिया, जब अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने मेरे प्रयासों के बाद छाप दिया। हिंदी अखबारों, संपादकों और बुद्धिजीवियों ने तो कोई संज्ञान ही नहीं लिया। शायद हिंदी वालों को हिंदी में लिखने वालों की दी सूचनाओं पर भरोसा नहीं होता या फिर वह अंग्रेजी को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। 

खैर, जो भी हो। दिलचस्प यह है कि 24 अप्रैल को दर्ज हुए इस मुकदमें में पुलिस ने ​अबतक एक भी गिरफ्तारी नहीं की है। पुलिस से जब पीड़ितों के परिजनों ने जानकारी चाही तो उनका कहना था कि अभी गिरफ्तार नहीं करेंगे लेकिन जब यह दूसरी बार प्रदर्शन या किसी आंदोलन में शामिल होंगे तब इन्हें भीतर करेंगे। 

पुलिस के बयान से सवाल यह उठता है कि हरियाणा की पुलिस ने छात्रों—नौजवानों पर देशद्रोह जैसा मुकदमा सिर्फ धमकाने और तफरी लेने के लिए दर्ज कर लिया है या ऐसे गंभीर और रेयर मुकदमें दर्ज कर पुलिस कुछ और संदेश देना चाहती है। एक वकील होने के नाते मैं जानता हूं कि देशद्रोह का मुकदमें में गिरफ्तारी और जमानत ज्यादा बेहतर होती है, बजाय कि आप आरोपियों को यूं ही छोड़ दें। इसका एक ही मकसद हो सकता है कि पुलिस ऐसे आरोपियों को 'न जीने देगी और न मरने देगी' वाली हालत में बनाकर रखना चा​हती है। 

और यही वजह है कि देशद्रोह के मुकदमें से खौफ में हैं सभी दलित छात्र—नौजवान, बयान तक देने से डर रहे हैं कि पुलिस कहीं उन्हें गिरफ्तार न कर ले। 

ऐसे हुई आंदोलन की शुरुआत 
अंबाला जिला के गांव पतरेहड़ी के दलितों ने विभिन्न दलित संगठनों के नेतृत्व में अप्रैल 19 से 26 तक कर्ण पार्क करनाल में धरना किया था। प्रदर्शनकारी दलितों की मांग थी कि अंबाला पुलिस दलित नौजवानों को हत्या के एक फर्जी मुकदमे में फंसा रही है उस पर रोक लगाई जाए। सीएम मनोहर लाल खट्टर को अपना दर्द बताने दलित अंबाला से यहां आए थे। मुख्यमंत्री से मिल के जाने के बाद ही पुलिस ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया। जाहिर है पुलिस अमले का यह रवैया बगैर मुख्यमंत्री के इशारे के संभव नहीं रहा होगा। 

हरियाणा के इतिहास में शायद यह पहला मामला है जहां पर इतनी बडी संख्या में दलित समाज के लोगों को नामजद किया गया है। हालांकि इससे पहले भी दलित समाज के अधिकारों की आवाज बुलंद करने वालों पर देशद्रोह के मुकदमे दर्ज किये गए थे। 

देशद्रोह का यह मुकदमा दलित नेता अशोक कुमार, कृष्ण कुटेल, मलखान नंबरदार, राकेश, रवि कुमार इंद्री, अमर मुनक, अमर सगा, मोनिका, मुलखराज, राजकुमार पतरेहड़ी, धर्मसिहं व रविंद्र कुरूक्षेत्र अनिल, संजू ,नरेश पतरेहड़ी पर दर्ज किया गया है।

जिनपर दर्ज हुए मुकदमें 
बावेला यहाँ से खड़ा हुआ  
अंबाला पुलिस के लापरवाही भरे रवैए के कारण मार्च में दलित समुदाय और राजपूतों के बीच तनाव चल रहा था । राजपूत जाति के कुछ बदमाश बार बार दलित समाज के लोगों पर हमला कर रहे थे । पुलिस ने शिकायत के बावजूद दबंग जाति के बदमाशों पर कारवाई नहीं की । दलितों को दबंगों का मूहतोड़ जवाब देने के लिए मजबूर किया गया और दलित अपनी जानमाल की सुरक्षा करने के लिए एकजुट हुए । इस प्रकार से झगड़े की इस घटना में दोनों पक्षों के लोग घायल हुए । पुलिस ने उसी समय दलितों पर 323 आईपीसी तथा दबंग जाति के बदमाशों के खिलाफ एससी एसटी एक्ट सहित 323 आईपीसी आदि धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया।

मुश्किल बनी यह घटना
घटना के चार पांच दिन बाद दबंग जाति के एक घायल की मौत घाव में संक्रमण के कारण हो गई । पुलिस ने दलित समाज के नौजवानों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया । छात्र जवानों को जेलों में ठूंस दिया । झगड़े की जड़ गांव के सरपंच जिस पर एससी एसटी में मुकदमा दर्ज है अभी तक नहीं पकड़ा गया है । पुलिस दलित छात्र नौजवानों को केवल इसी आधार पर उठा रही थी कि वह अंबेडकर संगठन के सदस्य है और दलित उत्पीड़न की घटनाओं का विरोध करता है । करनाल के कर्ण पार्क में पतरेहड़ी के दलित मुख्यमंत्री का ध्यान अंबाला पुलिस की इसी मनमर्जी की तरफ दिलाने आए थे।

इन धाराओं के तहत हुआ है मुकदमा 
इस संबंध में एफआईआर संख्या 298 दिनांक 26/04/2017 धारा 124ए/147/149/186/283/332/341/353 आईपीसी पुलिस थाना सिविल लाईन में दर्ज की गई है।  

कौन हैं जिन पर देशद्राह का मुकदमा हुआ है दर्ज 
15 दलित छात्र नौजवानों पर यह मुकदमा दर्ज किया गया है वे सभी उस प्रतिनिधी मंडल का हिस्सा थे जो 24 अप्रैल  के रोष प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री से मिले थे । यह प्रतिनिधी मंडल मुख्यमंत्री के आश्वासन से सहमत नहीं हुआ और कर्ण पार्क में अपना रोश प्रदर्शन जारी रखने की बात बोलकर वार्ता से उठकर आ गया । 26 अप्रैल को पुलिस ने आंदोलनकारी दलितों को कर्ण पार्क से जबरन खदेड़ दिया । सारा दिन सैंकड़ो दलितों को पुलिस बसों में भरकर घूमाती रही और बाद में अलग अलग स्थानों पर फेंक दिया । पार्क में पानी भर दिया गया । 26 तारीख को गिरफ्तार किए गए इन लोगों में ये सभी 15 लोग भी थे उनको भी बाकि पब्लिक के साथ छोड़ दिया । हालांकि इन सब के खिलाफ 26 अप्रैल को ही देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जा चुका था । यदि उसी समय पुलिस इनको गिरफ्तार कर लेती तो आंदोलन और ज्यादा भड़क उठता, इसलिए पुलिस ने गिरफ्तारी नहीं की । 

दलितों पर बढ़ रहे हैं हमले 
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अत्याचारों के रूप में 2016 में दलितों पर हमलों के 47000 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए । इन आंकड़ो के अनुसार रोजाना 2 दलित मारे जाते हैं और पांच दलित औरतों के साथ बलात्कार की घटना होती है । एक अन्य अनुमान के अनुसार प्रत्येक 18वें मिनट में दलित के खिलाफ एक अपराध होता है हर सप्ताह 13 दलितों को मौत की नींद सूला दिया जाता है हर सप्ताह 6 दलितों का आपराधिक अपहरण किया जाता है हररोज दलित उत्पीड़न की 27 घटनाएं दर्ज होती है । उतर प्रदेश के सहारनपुर की घटनाओं में भाजपा की योगी सरकार ने जो रवैया अपनाया हुआ है हरियाणा की खट्टर सरकार भी उसी राह पर है । ऐसे में दलित समाज के सामने संघर्ष की राह पर अग्रसर होने के अलावा कोई चारा नहीं है ।

पहले भी हुए दलितों पर देशद्रोह के मुकदमें दर्ज 
भगाना के दलितों पर कांग्रेस की हुड्डा सरकार ने देशद्रोह बनाया था। उससे पहले 2007 में हरियाणा सरकार ने प्राईवेट युनीवर्सिटी बिल का विरोध करने वाले जागरूक छात्र मोर्चा के छात्रों पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था। इनमें भी ज्यादातर छात्र दलित या पिछड़ी जातियों संबंधित थे। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के ईस्मालईबाद इलाके में भी पुलिस ने आवासीय प्लाटों की मांग करने वाले दलितों पर देशद्रोह का केस दर्ज किया था। 

May 28, 2017

मोदी देंगे देश को पहला आदिवासी राष्ट्रपति?

तो एक आदिवासी महिला देश की राष्ट्रपति बनेंगी, खबरें तो इसी तरफ इशारा करती हैं। अगर प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से सच में द्रौपदी मूर्मू के नाम पर मोहर लग चुकी है तो वह वह देश की राष्ट्रपति बनने वाली पहली आदिवासी बन जाएंगी.....


राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 25 जुलाई, 2017 को पूरा हो रहा है। इसी महीने नये राष्ट्रपति का चुनाव होगा और वह अपना पदभार ग्रहण करेंगे। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम ने भाजपा को बहुमत के करीब ला दिया है। अपनी पसंद का राष्ट्रपति बनाने के लिए भाजपा को 10,98,882 मतों में से 5.49 लाख वोट चाहिए। भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास 4.57 लाख वोट हैं। अगर तीसरा मोर्चा एकजुट हो जाये, तो भी भाजपा के बराबर वोट नहीं ला पायेगा। इसलिए तय है कि भाजपा अपनी पसंद का अगला राष्ट्रपति बनायेगी।

राष्ट्रपति पद की दौड़ में भाजपा की तरफ से पहले कई नाम शामिल थे, जिनमें भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और यहां तक ​​कि रजनीकांत का नाम भी शामिल था। ऐसे में वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर द्रौपदी मूर्मू के नाम पर नरेंद्र मोदी का मोहर लगाना ​थोड़ा आश्चर्यचकित भी करता है। एक कारण यह भी रहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी पर फिर से केस चलाये जाने की सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद आडवाणी और जोशी के बाद वो लोग राष्ट्रपति पद की रेस से बाहर हो गए थे। 

महिला और स्वच्छ छवि के चलते विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी दौड़ में रहींं, लेकिन उनकी सेहत ठीक नहीं होने की वजह से उनकी दावेदारी कमजोर पड़ गयी। दक्षिण के पिछड़ी जाति के नेता और केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू को भी दौड़ में शामिल माना जा रहा है, लेकिन उनके नाम पर विपक्ष सहमत होगा, इस पर भाजपा को संदेह है। इन परिस्थितियों में द्रौपदी मुर्मू की दावेदारी अधिक मजबूत और तार्किक बतायी जा रही है। 


द्रौपदी मूर्मू वर्तमान में झारखंड की राज्यपाल हैं और पिछले दो दशकों से वह राजनीति में सक्रिय हैं। विपक्ष के लिए भी उनकी उम्मीदवारी को खारिज करना मुश्किल होगा। द्रौपदी मूर्मू राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार होंगी। द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी से झारखंड की मुख्य विपक्षी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का भी समर्थन भाजपा को हासिल हो सकता है। झारखंड विधानसभा में झामुमो मुख्य विपक्षी पार्टी है। 

इसे भी संयोग ही कहा जाएगा कि द्रौपदी झारखंड और देश की पहली आदिवासी महिला राज्यपाल हैं। द्रौपदी को प्रत्याशी बनाकर भाजपा और सरकार देश को अलग संदेश दे सकती है। 

ओड़िशा के आदिवासी परिवार में 20 जून, 1958 को ओड़िशा के एक आदिवासी परिवार में जन्मी द्रौपदी मूर्मू रामा देवी वीमेंस कॉलेज से बीए की डिग्री लेने के बाद ओड़िशा के राज्य सचिवालय में नौकरी करने लगीं। 1997 में नगर पंचायत का चुनाव जीतकर राजनीति में कदम रखा। पहली बार स्थानीय पार्षद (लोकल काउंसिलर) बनीं. 

पार्षद से राष्ट्रपति उम्मीदवार बनने तक का उनका सफर देश की सभी आदिवासी महिलाओं के लिए एक आदर्श होगा। वह ऐसे राज्य से ताल्लुक रखती हैं, जहां 2014 के मोदी लहर में भी भाजपा का सिर्फ खाता ही खुला था। राज्य में लोकसभा की 21 सीटें हैं, 20 सीटें बीजद ने जीती थीं। 

साफ-सुथरी राजनीतिक छवि के कारण द्रौपदी को भाजपा आलाकमान ने हमेशा तरजीह दी। वह भाजपा के सामाजिक जनजाति (सोशल ट्राइब) मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य के तौर पर काम करती रहीं और वर्ष 2015 में उनको झारखंड का राज्यपाल बना दिया गया। 

द्रौपदी मूर्मू 18 मई, 2015 से झारखंड की राज्यपाल हैं -2000 से 2004 तक ओड़िशा विधानसभा में रायरंगपुर से विधायक और राज्य सरकार में मंत्री रहीं। वह पहली ओड़िया नेता हैं, जिन्हें राज्यपाल बनाया गया -छह मार्च, 2000 से छह अगस्त, 2002 तक वह भाजपा और बीजू जनता दल की गठबंधन सरकार में वाणिज्य और परिवहन के लिए स्वतंत्र प्रभार मंत्री रहीं। छह अगस्त, 2002 से 16 मई, 2004 तक मत्स्य पालन और पशु संसाधन विकास राज्य मंत्री रहीं।

editorjanjwar@gmail.com

May 1, 2017

जाटों ने किया दलित बस्ती पर हमला, किसी हाथ का तोड़ा तो किसी का पैर

दलितों पर हमले  के लिए चर्चित हरियाणा फिर  एक बार सुर्ख़ियों में है. लाठी—डंडों और धारदार हथियारों से लैस 100 से ज्यादा जाट हमलावर दलितों पर टूट पड़, महिलाओं,  ल​ड़कियों के साथ की बदसलूकी।

बालू गांव  से लौटकर राजेश कापड़ो
हरियाणा के जिला कैथल के गांव बालू में मई दिवस की सुबह गुस्साए जाटों ने बाल्मीकि बस्ती पर हमला कर दिया। लाठी, डंडों व तेजधार हथियारों से लैश 100 से ज्यादा हमलावर दलित बस्ती पर टूट पड़े और बस्ती के बाहर खड़े दलित युवकों को ताबड़तोड़ पीटना शुरू कर दिया। घरों के दरवाजे तोड़ डाले, जमकर पथराव किया और म​हिलाओं—लड़कियों के साथ बदसलूकी की।

हमलावर गाड़ी ही ईंट—पत्थर डालकर लाए थे। इस हमले में दर्जनभर से ज्यादा दलित युवकों को चोट लगी है। दलितों के 20-25 घरों में तोड़फोड़ की गई है। मकानों के दरवाजे तोड़ डाले। घरों से निकाल—निकालकर दलितों को पीटा गया। हमलावर एक मोटरसाईकिल भी उठा कर ले गए। 

चार-पांच दलित युवकों को कलायत सरकारी अस्पताल में स्थानीय पुलिस ने भर्ती करवाया था, जिन्हें बाद में हालत गम्भीर होने के कारण कैथल शहर के अस्पताल में रैफर कर दिया गया। हमले में घायल संजीव व संदीप दोनों का इलाज फिलहाल यहीं चल रहा है। गांव में दहशत का वातावरण व्याप्त है। लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे। कैथल में दाखिल घायलों ने बताया कि कई घायल लोग अभी भी गांव में ही हैं जो डर के मारे नहीं आ पा रहे। उन्हें भी डाक्टरी सहायता की आवश्यकता है।

क्या कहते हैं घायल

घायलों ने बताया कि हमला सुबह आठ बजे ही हो गया था, लेकिन पुलिस साढे नौ बजे गांव में पहुंची और फिर भी हमलावरों की तरफ ही बैठी रही। बड़ी मुश्किल से चार-पांच घायलों को अस्पताल में दाखिल करवाया और अभी तक कोई मुकदमा पुलिस ने दर्ज नहीं किया । एस एच ओ कलायत  से जब यह पूछा कि इस वारदात में अब तक कितने हमलावरों को गिरफ्तार किया गया है तो उनका जवाब था कि अभी तक इस घटना के संबंध में उनके पास कोई शिकायत नहीं आई है इसलिए कोई केस अभी तक दर्ज नहीं किया गया है। जबकि पूरे घटनाक्रम की जानकारी पुलिस को सुबह से ही है ।

पुलिस खुद घायलों को उठाकर अस्पताल लाई थी। जिला पुलिस कप्तान के रीडर के अनुसार एक डीएसपी रैंक का अधिकारी भारी पुलिस बल के साथ गांव में डटा हुआ है। रात नौ बजे तक भी कोई पुलिस अधिकारी घायलों के ब्यान दर्ज करने कैथल के सरकारी अस्पताल नहीं पहुंचा था।

यह जानना महत्वपूर्ण है कि तीन महीने पहले भी दलित समाज के युवकों ने एससी/एसटी आयोग को एक लिखित शिकायत दी थी कि जाट जाति के कुछ बदमाश किस्म के लोग दलित बस्ती में आकर रौब जमाते है और दलित महिलाओं पर बूरी नियत रखते हैं । यह शिकायत पुलिस थाना कलायत ने यह कह कर वापस करवा दी कि तकनीकी आधार पर यह एक कमजोर शिकायत है । दलितों ने पुलिस के दबाव में उक्त शिकायत वापस ले ली ।

डीएसपी से मिले दलित,  सरपंच सहित 90 से ज्यादा के खिलाफ एफआई दर्ज
आज सुबह ही गांव बालू के 50 से ज्यादा दलित समाज के बुजुर्ग व नौजवान जिला मुख्यालय पर आए । 1 मई को हुई दलित उत्पीड़न की घटना में जिला पुलिस ने आज सुबह तक कोई गिरफ्रतारी नहीं की थी । दलित समाज के लोगों ने डीएसपी सतीश गौतम से मिल कर अपनी समस्या बताई । डीएसपी ने बताया कि 90 से ज्यादा लोगों के खिलाफ एस सी/एस टी अधिनियम तथा 148/149 आईपीसी आदि धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है । यह डीएसपी इस मुकदमें का जांच अधिकारी भी हैं । घायलों के बयान पुलिस ने लिख लिए है । घायल संजीव और संदीप के एक्स-रे आज सुबह ही हो पाए हैं । इनको लगी चोटों पर डाक्टरों की राय अभी नही आई है ।

सरपंच की फर्जी डिग्री से उठा विवाद
हाल ही में दो दलित युवकों संजीव व मोहन लाल ने वर्तमान सरपंच के खिलाफ एक लिखित शिकायत सीएम विन्डो के माध्यम से मुख्यमंत्री कार्यालय को दी जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि ग्राम सरपंच रमेश कुमार का दसवीं का प्रमाण-पत्र फर्जी है । इसकी जांच का जिम्मा जिला शिक्षा अधिकारी कैथल को सौंपा गया। जांच अभी चल रही है । 27 अप्रैल के पंजाब केसरी के स्थानीय संस्करण में इसी शिकायत के संबंध में एक समाचार छपा जिसमें सरपंच के दसवीं के प्रमाण-पत्र पर उंगली उठाई गई थी । दलित युवकों की यह हिम्मत जाट सरपंच बरदाश्त नही कर सका । इसलिए अल सुबह लाठी,डंडों व तेजधार हथियारों से लैश उन्मादी बदमासों को लेकर दलित बस्ती पर टूट पड़ा । दो गंभीर रूप से घायलों में एक शिकायत कर्ता संजीव है जिसकी दोनों बाजूओं की हड्डियां तोड़ डाली गई है । घायलों ने बताया कि हमलावर उसको मरा हुआ समझकर छोड़ कर गए हैं ।

गांव में अभी भी दहशत का माहौल
कई दलित परिवार गांव छोड़कर सुरक्षित जगहों पर चले गए हैं । दलित समुदाय के रमेश, हरिकेश पुत्र महाली तथा रामपाल पुत्र धूला राम का परिवार कल हुए हमले से भयभीत होकर गांव छोड़कर चले गए हैं । कल हुए हमले में हुए नुकसान की जानकारी भी दलित संमाज के लोगों ने दी । एक युवक नरेश ने बताया कि हमलावरों कुर्सी, मेज, दरवाजे, खिड़कियां सब कुछ तहस नहस कर दिया । रमेश पुत्र महालि राम के चौबारे की खिड़की उखाड़ दी । बलराज के घर का लोहे का मेन गेट तोड़ दिया । 6-7 साईकिल भी तोड़ डाले । बालू गांव की इस बस्ती के ज्यादातर बाल्मीकि दलित साईकिलों पर पंजाब में फेरी लगा कर बाल खरीदते हैं । इस कार्य में साईकिल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है,  इसलिए सोच समझ कर साईकिलों को निशाना बनाया गया।

Nov 4, 2016

एनडीटीवी को लेकर वायरल हो रहा है यह प्रस्ताव, सहमत हों तो कीजिए शेयर


हम देशवासी एनडीटीवी पर थोपे गए 9 नवंबर के प्रतिबंध के खिलाफ हैं और इस बात से सहमत हैं कि एनडीटीवी अन्य सामाचार चैनलों से बेहतर, तार्किक और सही खबरें देता है। हम करोड़ों दर्शकों की मांग है कि सरकार अपने इस तानाशाही पूर्ण फैसले को तत्काल वापस ले और ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्ट्री को सख्त हिदायत दे कि वह पूर्वग्रह​ ग्रसित और राजनीति परस्त कार्रवाही से भ​विष्य में बाज आए। 
सरकार अगर ऐसा नहीं करती है तो 
हम करोड़ो देशवासी आज फैसला लेते हैं कि एनडीटीवी को प्रतिबंधित किए जाने के दिन 9 नवंबर को देश का कोर्इ चैनल नहीं देखेंगे, अपनी टीवी नहीं खोलेंगे।  

दोस्तो, ध्यान रखिए आज आप नहीं खड़े होंगे तो कल कोई डटकर मुकाबला करने वाला नहीं बचेगा।   

Jul 11, 2011

पीत पत्रकारिता के एक युग का अंत


यह अखबार भले ही ज्यादा बिकता था,लेकिन पाठकों के मन में उसकी कोई इज्जत नहीं थी। लोग उसे चटखारे लेने के लिए ही पढ़ते थे। उसमें रसूखदार लोगों की निजी जिंदगी के चर्चे,अपराध और सेक्स के किस्सों को नमक-मिर्च लगाकर परोसा जाता था...

गोविंद सिंह

ब्रिटेन का सबसे ज्यादा प्रसारित साप्ताहिक टैब्लॉयड अखबार न्यूज ऑफ द वर्ल्ड 168साल की उम्र के बाद बंद हो गया। रविवार को उसका अंतिम अंक निकला। आज भी उसका प्रसार 28लाख था,जो उसे दुनिया के सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबारों की कतार में ला खड़ा करता है। लेकिन अपने प्रसार को बढ़ाए रखने के लिए इस अखबार ने जिस तरह के हथकंडे अपनाए,अंतत:  वे ही उसकी अकाल मृत्यु का कारण बने। जब तक वह ऊंचे रसूखदार लोगों की निजी जिंदगी में थोड़ी-बहुत ताक-झांक करता रहा, तब तक पाठक उसे सिर-आंखों पर बिठाए रहे।


लेकिन जबसे उसने पत्रकारीय नैतिकता को ताक पर रखकर इसी को अपना धर्म मान लिया,तभी से उसके पतन की शुरुआत हो गई। जब 7 जुलाई, 2005 को लंदन के बम धमाकों में मरे लोगों के परिजनों के संवादों को भी गुप्त रूप से टैप करना शुरू कर दिया,तो पाठकों की रही-सही सहानुभूति भी जाती रही। देश भर में उसकी भर्त्सना होने लगी। विज्ञापनदाता अपना हाथ खींचने लगे और गले में कानून का शिकंजा कसने लगा। लिहाजा विवश होकर अखबार के मालिक जेम्स मडरेक को उसे बंद करने की घोषणा करनी पड़ी।

यह अखबार भले ही ज्यादा बिकता था,लेकिन पाठकों के मन में उसकी कोई इज्जत नहीं थी। लोग उसे चटखारे लेने के लिए ही पढ़ते थे। उसमें रसूखदार लोगों की निजी जिंदगी के चर्चे,अपराध और सेक्स के किस्सों को नमक-मिर्च लगाकर परोसा जाता था। स्टिंग ऑपरेशन के जरिये ऑडियो-वीडियो सुबूत इकट्ठे किए जाते और गाहे-बगाहे प्रभावित लोगों को ब्लैकमेल भी किया जाता। इसी क्रम में अखबार के संपादकों ने फोन हैकिंग का हथकंडा अपनाया था। जिन्होंने इस कृत्य को अंजाम दिया,वे तो अखबार छोड़ गए, बंदी का संकट ङोलना पड़ा दूसरों को।

एक अक्टूबर,1843को जब लंदन से यह अखबार शुरू हुआ था,तब इसका पाठक वर्ग नवसाक्षर मजदूर वर्ग था। कम पढ़े-लिखे लोगों की दिलचस्पी वाली हर तरह की खबरें इसमें छपा करती थीं। चटखारे लेने वाली पीत पत्रकारिता तब इसका मकसद नहीं था। तब इसका प्रसार 12,000था। यह एक भरा-पूरा अखबार था, जिसमें हर तरह की सामग्री छपा करती थी। वर्ष 1891 में यह बिका। इसे लोकप्रिय बनाने की कोशिशें और तेज हुईं। मैथ्यू एंजेल ने अपनी पुस्तक-पॉपुलर प्रेस के सौ साल में इसे अपने समय का बहुत सुंदर अखबार कहा है।

 
इसकी देखा देखी कई और अखबार चालू हुए और आज तक चल रहे हैं। 1950 तक आते-आते इसका प्रसार 90 लाख तक पहुंच गया। यह एक बेमिसाल छलांग थी। 1969 में इसे रूपर्ट मडरेक ने खरीद लिया। यहीं से मडरेक ने मीडिया की दुनिया में प्रवेश किया। मडरेक ने भी इसे सुधारने की बजाय पीत पत्रकारिता की ओर ही धकेला और आज यह साबित हो गया कि महज सर्कुलेशन या धन की ताकत ही किसी अखबार के लिए पर्याप्त नहीं होती, जनता की नजर में सम्मान सबसे बड़ी चीज है।


(लेखक हिंदुस्तान अख़बार के कार्यकारी संपादक हैं.यह लेख वहीं से साभार प्रकाशित किया जा रहा है. )


Jul 6, 2011

असहमति अन्ना से हो भ्रष्टाचार से नहीं


हमारे यहाँ ऐसे बुद्धिजीवियों की कमी नहीं जो  आन्दोलनों से रहते तो दूर हैं, पर सूँघने की इनकी नाक बड़ी लम्बी होती है। हर ओर इन्हें साजिश ही नजर आती है..

कौशल किशोर

आज अन्ना हजारे और उनके भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को लेकर कई सवाल उठाये जा रहे हैं। साहित्यकार मुद्राराक्षस ने हाल ही में आरोप लगाया है कि अन्ना भाजपा व राष्ट्रीय सेवक संघ का मुखौटा हैं और अन्ना के रूप में इन्हें ‘आसान झंडा’मिल गया है। जन लोकपाल समिति में ऐसे लोग शामिल हैं,जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। अन्ना हजारे की यह माँग कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में ले आया जाय, संविधान के विरुद्ध है।

मुद्राराक्षस ने यहाँ तक सवाल उठाया है कि अन्ना और उनकी सिविल सोसायटी पर संसद और संविधान की अवमानना का मुकदमा क्यों न दर्ज किया जाय?  ऐसे में अन्ना हजारे और भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन की पड़ताल जरूरी है क्योंकि आज यह आन्दोलन अपने अगले चरण की ओर अग्रसर है और जन आंदोलन की शक्तियाँ वैचारिक और सांगठनिक तैयारी में जुटी हैं।

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने देश की मुख्यधारा के राजनीतिक दलों को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है। हमारे संसदीय जनतंत्र में पक्ष और प्रतिपक्ष मिलकर मुख्य राजनीति का निर्माण करते हैं, लेकिन इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि तमाम पार्टियाँ सत्ता की राजनीतिक पार्टिर्यों में बदल गई हैं। उसके अर्थतंत्र का हिस्सा बनकर रह गई हैं aur अन्ना हजारे इसी यथार्थ की उपज हैं।

अन्ना हजारे के व्यक्तित्व और विचार में कमियाँ और कमजोरियाँ मिल सकती हैं। वे गाँधीवादी हैं। खुद गाँधीजी अपने तमाम अन्तर्विरोधों के बावजूद स्वाधीनता आन्दोलन के बड़े नेता रहे हैं। इसी तरह अन्ना हजारे के विचारों और काम करने के तरीकों में अन्तर्विरोध संभव है,लेकिन इसकी वजह से उनके आन्दोलन के महत्व को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता है।

 इस आन्दोलन का सबसे बड़ा महत्व यही है कि इनके द्वारा उठाया गया भ्रष्टाचार का मुद्दा आज केन्दीय मुद्दा बन गया है जिसने समाज के हर तबके को काफी गहरे संवेदित किया है और इसे खत्म करने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे हैं। अन्ना हजारे और उनके आंदोलन की इस उपलब्धि को क्या अनदेखा किया जा सकता है कि 42सालों से सरकार के ठंढ़े बस्ते में पड़ा लोकपाल विधेयक बाहर आया,उसे मजबूत और प्रभावकारी बनाने की चर्चा हो रही है,और इस पर सर्वदलीय बैठक आयोजित हुई।

हमारे यहाँ ऐसे बुद्धिजीवियों की कमी नहीं जो हर आन्दोलनों से रहते तो दूर हैं, पर सूँघने की इनकी नाक बड़ी लम्बी होती है। हर ओर इन्हें साजिश ही नजर आती है। ये अन्ना द्वारा नरेन्द्र मोदी की तारीफ पर तो खूब शोर मचाते हैं,लेकिन इस सम्बन्ध में अन्ना ने जो सफाई दी, ह इन्हें सुनाई नहीं देता है। किसानों की आत्म हत्या,बहुराष्ट्रीय निगमों का शोषण,चालीस करोड़ से ज्यादा लोगों का गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन के लिए बाध्य किया जाना जैसे मुद्दे तो इन्हें संवेदित करते हैं लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जब प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात आती है तो वह उन्हें देश में आजादी के बाद पहली बार अल्पसंख्यक सिख समुदाय के प्रधानमंत्री को अपमानित करने का षडयंत्र नजर आता है।

अपनी बौखलाहट में ये अन्ना और सिविल सोसाइटी पर जाँच बैठा कर मुकदमा चलाने की माँग करते हैं। ये इस सच्चाई को भुला बैठते हैं कि प्रधानमंत्री किसी समुदाय विशेष का न होकर वह सरकार का प्रतिनिधि होता है। हमारे इन बौद्धिकों को अन्ना द्वारा किसान आत्महत्याओं पर भूख हड़ताल न करने पर शिकायत है लेकिन किसान आंदोलनों पर सरकार के दमन पर ये चुप्पी साध लेते हैं।

कहा जा रहा है कि अन्ना हजारे जिस लोकपाल को लाना चाहते हैं,वह संसद और सविधान की अवमानना है। पर सच्चाई क्या है ?हमारी सरकार कहती है कि यहाँ कानून का राज है। लेकिन विडम्बना यह है कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए हमारे यहाँ कोई मजबूत कानून की व्यवस्था नहीं है। मामला चाहे बोफोर्स घोटाले का हो या भोपाल गैस काँड का या पिछले दिनों के तमाम घोटालों का हो,इसने हमारे कानून की सीमाएँ उजागर कर दी हैं। तब तो एक ऐसी संस्था का होना हमारे लोकतंत्र के बने रहने के लिए जरूरी है। यह संस्था जनता का लोकपाल ही हो सकती है जिसके पास पूरा अधिकार व क्षमता हो और वह सरकार के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त व स्वतंत्र हो तथा जिसके दायरे में प्रधानमंत्री से लेकर सारे लोगों को शामिल किया जाय।

प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात को लेकर मतभेद है लेकिन अतीत में प्रधानमंत्री जैसे पद पर जब अंगुली उठती रही है तब तो यह और भी जरूरी हो जाता है। सर्वदलीय बैठक में कई दलों के प्रवक्ता ने प्रधानमंत्री को इस दायरे में लाने की बात कही है और स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी उनसे मिलने गये सम्पादकों से कहा कि वे लोकपाल के दायरे में आने को तैयार हैं। फिर समस्या क्या है ?

अन्त में,भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लम्बी है। मजबूत और प्रभावकारी लोकपाल का गठन इसका पहला चरण हो सकता है। हम अन्ना हजारे से सहमत हो सकते है, असहमत हो सकते हैं या उनके विरोधी हो सकते है लेकिन यदि हम समझते है कि भ्रष्टाचार हमारे राष्ट्र,समाज,जीवन,राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति को दीमक की तरह चाट रहा है तो समय की माँग है कि इस संघर्ष को अन्ना हजारे और उनके चन्द साथियों पर न छोड़कर देश के जगरूक नागरिक,देशभक्त,बुद्धिजीवी, ईमानदार राजनीतिज्ञ लोकतांत्रिक संस्थाएँ,जन संगठन आगे आयें और इसे व्यापक जन आंदोलन का रूप दें।
 
 
जनसंस्कृति मंच लखनऊ के संयोजक और सामाजिक संघर्षों में सक्रिय.


 
 
 
 

Jun 26, 2011

मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन पर पुलिसिया हमला


जनज्वार.छिंदवाड़ा जिले के अदानी पेंच पावर प्रोजेक्ट द्वारा की गयी मनमानी के खिलाफ आज 26 जून को आयोजित किसान महापंचायत पर पुलिस दमन का कहर बरपा हुआ है। पुलिस ने आंदोलनकारियों पर बर्बर लाठी चार्ज किये और आंसू गैर के गोले छोड़े। पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति के बगैर हुए अवैध निर्माण कार्यो को ध्वस्त करने और जमीनें वापस लौटाने की मांग को लेकर किसान संघर्ष समिति की ओर से आज किसानों ने महापंचायत का आयोजन किया था।

किसान महापंचायत में भाग लेने जा रहे किसानों को पुलिस ने धमकाया तथा अलग अलग गांव से गिरफ्तार किया। विरोध में भाग लेने पहुंचे पूर्व विधायक और किसान नेता सुलीलम् को तड़के छिन्दवाडा पुलिस ने रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर शाम को नागपुर रेलवे स्टेशन पर रिहा किया। वहीं किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आराधना भार्गव को पुलिस ने भूलामोहगांव से जबरदस्ती घसीटकर गिरफ्तार किया। उनके साथ मौके पर पूर्व विधायक महेशदत्त मिश्रा भी मौजूद थे।

प्रशासन पर दबाव न बने इसके लिए पुलिस ने 12किसानों को अमरवाडा उपजेल भेज दिया है तो 44 किसान छिन्दवाड़ा जेल में बंद हैं। सुनीलम ने  राज्य सरकार की दमनकारी भूमिका पर आक्रोश  व्यक्त करते हुए कहा है कि 22मई के जानलेवा हमले के बाद किसान संघर्ष  समिति की और से शांतिपूर्ण तरीके से पदयात्रा की गई थी तथा 10हजार किसानों ने छिन्दवाडा पहुंचकर अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से मुख्यमंत्री तक पहुंचाने के लिए जिलाधीश महोदय को ज्ञापन सौंपा था। किसानों का कहना है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन अदानी कम्पनी के एजेन्ट के तौर पर कार्य कर रहा है। जिन लोगों ने किसानों की जमीनों पर अवैधानिक निर्माण कार्य किया है उनकी गिरफ्तारी करने की बजाय किसानों को गिरफ्तार किया जा रहा है।

डॉ0सुनीलम् ने राज्य सरकार द्वारा की गई कार्यवाही को लोकतंत्र की हत्या बताते हुए कहा कि हर नागरीक को संविधान में स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार दिया,लेकिन सरकार संविधान पर कुठाराघात करने पर आमदा है। डॉ0सुनीलम् ने कहा कि जानलेवा हमले,पुलिस की लाठी और गिरफ्तार ने किसानों को आक्रोषित करने का काम किया है। जिसके गंभीर परिणाम सरकार को भुगतने पड सकते हैं, जिसकी पूरी जिम्मेदारी स्थानिय पुलिस प्रशासन की होगी।

आंदोलनकारियों की अगली रणनीति के मुताबिक 27जून को जनसंगठनों का प्रतिनिधि मण्डल राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से मुलाकात करेगा और वे 30जून को भोपाल में मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष से मुलाकात कर किसानों के मानव अधिकार बहाल कराने की मांग करेंगे।



Jun 19, 2011

मानवाधिकार उल्लंघन में सर्वोपरि होता पाकिस्तान

आतंकवादियों, कट्टरपंथी ताकतों, बाहुबलियों,पंचायतों द्वारा पाकिस्तान में सरेआम मानवाधिकारों का उल्लंघन किया ही जा रहा है,अब सुरक्षाकर्मियों,सैनिकों,आईएसआई व रेंजर्स द्वारा भी उसी मानवता विरोधी नक्शेकदम पर चलने का प्रयास, आखिरकार पाकिस्तान को किस मोड़ पर ले जाएगा...

तनवीर जाफरी

स्वतंत्र इस्लामी राज्य के गठन की अवधारणा को लेकर 14 अगस्त 1947 को संयुक्त भारत से विभाजित होकर अस्तित्व में आया पाकिस्तान आज मूल इस्लामी सिद्धांतों व शिक्षाओं की भी धज्जियां उड़ाता दिखाई दे रहा है। कुरान शरीफ द्वारा निर्देशित इस्लामी शिक्षा साफतौर पर मुसलमानों को यह हिदायत देती है कि ‘किसी बेगुनाह के साथ कोई ज़्यादती हरगिज़ मत करो। और यदि तुमने किसी एक बेगुनाह का कत्ल किया तो गोया तुमने पूरी इंसानियत का कत्ल कर डाला’। परंतु मानवाधिकारों की रक्षा की बात ही क्या करनी पाकिस्तान तो आज उस इस्लाम के सिद्धांतों से भी दूर होता जा रहा है जिसके नाम पर इस भू-भाग को भारतवर्ष से अलग कराया गया था।

पाकिस्तान में इन दिनों रोज़मर्रा के हालात तो यही बता रहे हैं कि वहां तकरीबन रोज़ाना एक-दो नहीं बल्कि कई-कई बेगुनाह मारे जा रहे हैं। कभी कट्टरपंथी तालिबानी आतंकवादियों के हाथों, कभी किसी आत्मघाती हमले के द्वारा, कभी सेना के जवानों की गोलियों से तो कभी पुलिस या पाक रेंजर्स के हाथों। और कई रहस्यमयी हत्याओं की खबरें तो ऐसी भी सामने आ रही हैं जिनमें सीधेतौर पर आईएसआई तथा सेना की भी साजि़श होने का इल्ज़ाम है।

अभी पाकिस्तान के एक 40 वर्षीय पत्रकार को अपनी पत्रकारिता के दायित्वों का पालन करते हुए अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। इसी वर्ष  31 मई को सैय्यद सलीम शहज़ाद नामक यह पत्रकार सिर्फ इसलिए कत्ल कर दिया गया था क्योंकि उसने पाकिस्तान की नवसेना तथा अलकायदा के मध्य सांठगांठ होने के नापाक नेटवर्क का पर्दाफाश किया था। गौरतलब है कि सलीम शहज़ाद की हत्या के पीछे आईएसआई की साजि़श बताई जा रही है।



अभी इस घटना को बीते मात्र एक सप्ताह ही बीता था कि  9 जून को पाकिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन की एक और सनसनीखेज़ घटना सामने आई। सरफराज़ नामक एक 19वर्षीय युवक जो कि कराची के बोट बेसिन क्षेत्र में स्थित बेनज़ीर भुट्टो पार्क में सैर कर रहा था उसे पाक रेंजर्स ने दबोच लिया। उसके पश्चात उसे पार्क से बाहर लाकर चारों ओर से 6-7 सशस्त्र रेंजर्स ने घेर लिया और सभी रेंजर्स ने उस निहत्थे युवक सरफराज़ पर बंदूक व पिस्टल तान ली। दहशत का मारा वह युवक अपनी जान की भीख मांगता हुआ उन रेंजर्स के समक्ष हाथ जोडक़र गिड़गिड़ाता रहा। परंतु उसके जवाब में ज़ालिम रेंजर्स ‘गोली मार दो’ व ‘इसे मार डालो’ जैसी दहशतनाक आवाज़ें बुलंद करते रहे। इतना ही नहीं एक रेंजर ने तो युवक के बाल पकडक़र कैमरे के समक्ष उसका मुंह भी साफतौर पर दिखाने की कोशिश की। और उसके बाद  पाक रेंजर्स ने भरी दोपहर में सार्वजनिक स्थल पर ही बिल्कुल करीब से गोली मार कर निहत्थे सरफराज़ को कत्ल कर दिया।

इस पूरे घटनाक्रम की वीडियो भी एक पत्रकार द्वारा बनाई गई। घटना के तुरंत बाद यह दहशतनाक वीडियो पाकिस्तान सहित पूरी दुनिया के कई टीवी चैनल्स द्वारा प्रसारित कर दी गई। पूरी दुनिया ने मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाने वाली पाकिस्तान रेंजर्स की इस वहशियाना कार्रवाई को बड़ी हैरत से देखा। पाक रेंजर्स को इस मामले पर अपनी फज़ीहत होते देख अच्छा नहीं लगा। इनके गुर्गों द्वारा अब उस पत्रकार को भी धमकी दी गई है जिसने दिन-दहाड़े रेंजर्स द्वारा सरफराज़ के कत्ल की वीडियोग्राफी की थी। यानी  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने का फिर  घिनौना प्रयास।

हालाँकि पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी ने इस घटना पर स्वयं संज्ञान लेते हुए पाकिस्तान रेंजर्स के निदेशक मेजर जनरल एजाज़ चौधरी तथा पुलिस महानिरीक्षक फय्याज़ लघारी को न सिर्फ बर्खास्त कर दिया है बल्कि महालेखाकार कार्यालय को यह निर्देश भी दिया कि इन अधिकारियों को उस समय तक कोई वेतन न दिया जाए जब तक अदालत अपना अगला आदेश जारी न करे। दोषी  रेंजर्स को घटना के अगले ही दिन गिरफ्तार कर पुलिस के हवाले कर दिया गया था। इस कत्ल को लेकर पाक रेंजर्स द्वारा अपने बचाव में यह कहा जा रहा है कि सरफराज़ डकैती जैसे जुर्म में शामिल था। जबकि उसके परिजनों का कहना है कि उनका लडक़ा बेगुनाह था तथा पार्क में सैर करने की गरज़ से गया हुआ था। उच्चतम न्यायालय ने इस बात की जांच के आदेश दिए हैं कि युवक सरफराज़ का कोई आपराधिक रिकॉर्ड था भी या नहीं।

इस घटना पर पाकिस्तान के कई जि़म्मेदार नेताओं द्वारा गहरी चिंता व दु:ख व्यक्त किया गया है। पाकिस्तान में तमाम जि़म्मेदार लोग यह महसूस कर रहे हैं कि चूंकि पाक रेंजर्स पाकिस्तान के आंतरिक सुरक्षा केंद्र का एक अंग है तथा सीधे तौर पर यह गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं,इसलिए इतनी जि़म्मेदार सुरक्षा एजेंसी द्वारा दिन-दहाड़े एक निहत्थे युवक के साथ कातिलों के रूप में पेश आना पाकिस्तान की शासन व्यवस्था तथा सुरक्षातंत्र की कार्यप्रणाली पर सीधे तौर पर प्रश्रचिन्ह लगाते हैं। हालांकि पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने इस घटना के फौरन बाद ही घटना की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए थे। परंतु प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी को पाकिस्तान व दुनिया के अन्य हिस्सों में  इस घटना को लेकर पाक रेंजर्स की हो रही निंदा व आलोचना अच्छी नहीं लगी। गिलानी ने साफतौर पर सदन में पाक रेंजर्स का यह कहकर बचाव किया कि ‘किसी एक घटना से समूचे संस्थान को बदनाम नहीं किया जा सकता’।

मानवाधिकार उल्लंघन की इस प्रकार की कोई सिर्फ एक या दो घटनाएं ही नहीं बल्कि  इसी वर्ष मई माह में पांच चेचेन नागरिकों को  सुरक्षा बलों ने पाकिस्तान के क्वेटा के खरोताबाद क्षेत्र में दिन-दहाड़े मार डाला गया। इनमें तीन पुरुष व दो महिलाएं शामिल थीं। मारी गई एक महिला सात माह की गर्भवती भी थी जिसके शरीर में सुरक्षाबलों ने 12 गोलियां उतार दीं। इन निहत्थे चेचेन नागरिकों की हत्या के बाद जब सुरक्षा बलों के विरुद्ध हंगामा हुआ उस समय अपने पक्ष में सुरक्षा बलों द्वारा फिर यही तर्क दिया गया कि इनमें से तीन युवक संदिग्ध आत्मघाती हमलावर थे। 18 से लेकर 25 वर्ष आयु वर्ग के यह सभी नवयुवक संदिग्ध आतंकी होने के कथित संदेह पर सरेआम मार दिए गए।

हालांकि उनके कब्ज़े से किसी प्रकार के कोई हथियार भी बरामद नहीं हुए। जबकि सुरक्षा कर्मियों पर आरोप यह लगाया गया कि पाक सुरक्षा कर्मी एक चेचेन महिला के साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती कर उसे अपनी हवस का शिकार बनाना चाह रहे थे।  ऐसे में सवाल यह उठता है की   आत्मघाती हमलावरों,आतंकवादियों, कट्टरपंथी ताकतों, बाहुबलियों,पंचायतों द्वारा पाकिस्तान में सरेआम मानवाधिकारों का  उल्लंघन किया ही जा रहा है,अब सुरक्षाकर्मियों,सैनिकों,आईएसआई व रेंजर्स द्वारा भी उसी मानवता विरोधी नक्शेकदम पर चलने का प्रयास, आखिरकार पाकिस्तान को किस मोड़ पर ले जाएगा ।



लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.