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Jun 23, 2017

रेल यात्राओं के भयंकर अनुभवों से अभिभूत एक रेल यात्री


पहले कोहरे में ट्रेनें लेट होती थीं, लेकिन अब ट्रेनें आमतौर पर लेट होने लगी हैं, मानो उनके ड्राईवर रास्तों में गाड़ियों को रोक देशद्रोह और देशप्रेम की खालिस बहसों में उलझ जाते हों...
तारकेश कुमार ओझा
अक्सर न्यूज चैनलों के पर्दे पर दिखाई देता है कि अपनी रेल यात्रियों के लिए रेलवे खास डिजाइन के कोच बनवा रही है, जिसमें फलां-फलां सुविधाएं होंगी। यह भी बताया जाता है कि जल्द ही ये कोच यात्रियों के सेवा में जुट जाएंगे। लेकिन हकीकत में तो ऐसे अत्याधुनिक कोचों से कभी सामना हुआ नहीं, अलबत्ता आम भारतीय की तरह रेल यात्रा का संयोग बन जाने पर साबका उसी रेलवे और ट्रेन से होता है जिसे चार दशक से देखता आ रहा हूं।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान बुलेट ट्रेन की बड़ी चर्चा थी। हालांकि मेरी दिलचस्पी कभी इस ट्रेन के प्रति नहीं रही। लेकिन मोदी सरकार में जब रेल मंत्री का दायित्व काफी सुलझे हुए माने जाने वाले सुरेश प्रभु को मिला तो विश्वास हो गया कि बुलेट ट्रेन मिले न मिले, लेकिन हम भारतीयों को अब ठीक—ठाक रेलवे तो जल्द मिल जाएगी, जिसके सहारे इंसानों की तरह यात्रा करते हुए अपने गंतव्य तक पहुंचना संभव हो सकेगा।
मगर पिछली कुछ रेल यात्राओं के अनुभवों के आधार पर इतना कह सकता हूं कि चंद महीनों में रेलवे की हालत बद से बदतर हुई है। उद्घोषणा के बावजूद ट्रेन का प्लेटफार्म पर न पहुंचना। पहुंच गई तो देर तक न खुलना। किसी छोटे से स्टेशन पर ट्रेन को खड़ी कर धड़ाधड़ मालगाड़ी या राजधानी और दूसरी एक्सप्रेस ट्रेनें पास कराना आदि समस्याएं पिछले कुछ महीनों में विकराल रुप धारण कर चुकी हैं। कहीं पूरी की पूरी खाली दौड़ती ट्रेन तो कहीं ट्रेन में चढ़ने के लिए मारामारी। यह तो काफी पुरानी बीमारी है रेलवे की। जो अब भी कायम है।
इसमें नयी बात यह है कि पहले ट्रेनें आमतौर पर जाड़ों यानी कुहासे के दिनों में लेट होती थीं पर जबसे सुरेश प्रभु मंत्री बने हैं तबसे चमकती धूप में ट्रेनों का 4 से 5 घंटा लेट होना आम बात हो गयी है। लेट होती ट्रेनों को देख ऐसा लगता है मानो उनके ड्राईवर रास्तों में गाड़ियों को रोक देशद्रोह और देशप्रेम की खालिस बहसों में उलझ जाते हों, क्योंकि देश तो आजकल इसी में उलझा हुआ है।
पिछले साल अगस्त में जबलपुर यात्रा का संयोग बना था। इस दौरान काफी जिल्लतें झेलनी पड़ीं। लौटते ही अपनी आपबीती रेल मंत्री से लेकर तमाम अधिकारियों को लिख भेजी। इसका कोई असर हुआ या नहीं, कहना मुश्किल है। क्योंकि किसी ने भी कार्रवाई तो दूर प्राप्ति स्वीकृति की सूचना तक नहीं दी। इस साल मार्च में होली के दौरान उत्तर प्रदेश जाने का अवसर मिला। संयोग से इसी दौरान प्रदेश में चुनावी बुखार चरम पर था। वाराणसी से इलाहाबाद जाने के लिए ट्रेन को करीब पांच घंटे इंतजार करना पड़ा।
वाराणसी से ही खुलने वाली कामायिनी एक्सप्रेस इस सीमित दूरी की यात्रा में करीब घंटेभर विलंबित हो गई। वापसी में भी कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ। प्लेटफार्मों पर किसी ट्रेन की बार-बार उद्घोषणा हो रही थी, तो कुछ ट्रेनों के मामलों में उद्घोषणा कक्ष की अजीब खामोशी थी। वापसी बीकानेर-कोलकाता साप्ताहिक सुपर फास्ट एक्सप्रेस से करनी थी, जो करीब पांच घंटे विलंब से प्लेटफार्म पर पहुंची।
इस बीच स्टेशन के प्लेटफार्म पर एक खाकी वर्दी जवान को नशे की हालत में उपद्रव करते देखा। जीआरपी के व्हाट्सअप पर इस आशय का संदेश दिया। लेकिन आज तक कोई जवाब नहीं मिला। मध्य रात्रि ट्रेन इलाहाबाद से रवाना तो हो गई, लेकिन इसे मुगलसराय पहुंचने में करीब पांच घंटे लग गए। बहरहाल ट्रेन हावड़ा पहुंचा तो खड़गपुर की अगली यात्रा के लिए फिर टिकट लेने काउंटर पहुंचा। यहां मौजूद एक बुकिंग क्लर्क ने सीधे-साधे बिहारी युवक को दिए गए रेल टिकट के एवज में 60 रुपए अधिक झटक लिए। युवक के काफी मिन्नत करने के बाद क्लर्क ने पैसे लौटाए।
वापसी के बाद अपने ही क्षेत्र में फिर छोटी यात्रा करने की नौबत आई। लेकिन पता चला कि दो घंटे की दूरी तय करने वाली ट्रेन इससे भी ज्यादा समय विलंब से चल रही है। न ट्रेन के आने का समय न चलने का। यात्री बताने लगे कि ट्रेन रवानगी स्टेशन से ही लेट छूटी है।
यह सब देख लगा कि क्या रेलवे में अब भी जवाबदेही नाम की कोई चीज है। क्योंकि यह सब तो चार दशक से देखता आ रहा हूं, फिर रेलवे में आखिर क्या बदला है। अंत में यही सोच कर संतोष कर लेना पड़ा कि इस देश में यदि सबसे सस्ता कुछ है तो वह आम नागरिकों का समय।
कुछ साल पहले केंद्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु चुनाव प्रचार के सिलसिले में मेरे शहर आए थे। अपने संभाषण में उन्होंने रेलवे की हालत पर गंभीर चिंता व्यक्त की। हाल की यात्राओं के अनुभव के मद्देनजर इतना कहा जा सकता है कि रेलवे की हालत वाकई चिंताजनक है।
(तारकेश कुमार ओझा पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
रेलवे भारत की सबसे बड़ी यात्री नेटवर्क है। आपके पास भी कोई अनुभव हो तो editorjanjwar@gmail पर मेल करें।

Jun 5, 2017

जनरल पहले आप कानून का सम्मान करें

पैंतीस वर्ष के पुलिस जीवन में मेरा सैकड़ों पत्थर फेंकने वाली हिंसक भीड़ से, अनेकों बार हजारों की संख्या में भी वास्ता पड़ा होगा जिसमें शामिल लोग ‘उपद्रवी’, ‘शरारती’, ‘पथभ्रष्ट’, ‘भाड़े के टटटू’ कुछ भी कहे जाने चाहिये थे, पर देश के दुश्मन हरगिज नहीं.....

विकास नारायण राय 

भारत के सेनाध्यक्ष जनरल रावत ने कश्मीर में उपचुनाव के बहिष्कार के समर्थन में पत्थर फेंकने वालों को ‘डर्टी वार’ का हिस्सा और देश का ‘दुश्मन’ करार दिया है. उनसे निपटने में सेना की ‘मानव कवच’ रणनीति के समर्थन में उतरे जनरल ने कहा कि लोग डरेंगे नहीं तो सेना के आदेशों का सम्मान नहीं करेंगे.


पैंतीस वर्ष के पुलिस जीवन में मेरा सैकड़ों पत्थर फेंकने वाली हिंसक भीड़ से, अनेकों बार हजारों की संख्या में भी वास्ता पड़ा होगा जिसमें शामिल लोग ‘उपद्रवी’, ‘शरारती’, ‘पथभ्रष्ट’, ‘भाड़े के टटटू’ कुछ भी कहे जाने चाहिये थे, पर देश के दुश्मन हरगिज नहीं. यह भी मेरा अनुभव रहा है कि उत्तेजित लोग तभी आपकी बात मानेंगे जब आप भी कानून का सम्मान करें. 

9 अप्रैल, श्रीनगर उपचुनाव के दिन, पांच घंटे सेना की जीप के बोनेट पर रस्सी से बंधे-बंधे एक कश्मीरी मुस्लिम युवक को अट्ठाईस किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़ा था. जीप उसे इसी रूप में कुल सत्रह गांवों में लेकर गयी और अंत में एक सीआरपीएफ़ कैंप में उसे उसके भाई और सरपंच के हवाले किया गया.

सारा दिन वह इस बात की गारंटी रहा कि उसे कवच बनाकर निकली सैन्य टुकड़ी पर पत्थर न फेंके जायें. 13 अप्रैल को जाकर स्थानीय पुलिस ने मुक़दमा दर्ज किया. 22 मई को सेना ने मेजर को पुरस्कृत किया. अगले दिन मेजर ने प्रेस कांफ्रेंस में ऐसी गढ़ी कहानी सुनायी जिस पर एक भी सवाल लेने की उनकी हिम्मत नहीं हो सकी.

गोगोई के अनुसार उन्हें उपचुनाव के दिन सूचना मिली कि एक मतदान केन्द्र में तैनात लोगों को पत्थरबाजी करती भीड़ ने घेर रखा है. मौके पर पहुंचे उनके जवानों ने भीड़ में से एक प्रमुख पत्थरबाज फारूकडार को काबू कर जीप के बोनेट से बाँध दिया जिससे उनकी दिशा में आने वाला पथराव रुक गया और वे घिरे लोगों को निकालकर ले जा सके. ऐसा उन्होंने स्थानीय लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया, अन्यथा उन्हें गोली चलानी पड़ती. तब से छिड़ी देशव्यापी बहस में कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने भी गोगोई के कदम को साहसी और त्वरित बुद्धि वाला करार दिया है. उनके मुताबिक, हिंसक प्रतिरोध की आशंका में मानव कवच का प्रयोग कोई नयी रणनीति नहीं है.

यह देश उकसाऊ कश्मीरी पत्थरबाजों की आशंका से घिरे मेजर गोगोई के जोशीले रणनीतिक अतिरेक को तो शायद पचा सकता है, लेकिन बचाव में उतरे जनरल रावत के‘दुश्मन’ और ‘डर्टी वार’ से निपटने के शेखचिल्ली दावों को नहीं. इन दावों से रावत ने, जिन्हें दो वरिष्ठों की अनदेखी कर सेनाध्यक्ष बनाया गया है, अपने संघी पैरोकारों को बेशक खुश किया हो, कश्मीर में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर तो निराशा ही बढ़ी है. 

रावत ने कहा-
1. भारतीय सेना कश्मीर में डर्टी वार लड़ रही है.
2. वहां दुश्मन के विरुद्ध कल्पनाशील दांव-पेंच की जरूरत है.
3. मेजर गोगोई ने स्थानीय युवक फारूकडार को मानव कवच बनाकर मौके के मुताबिक ठीक किया. अन्यथा उन्हें मतदान केंद्र में फंसे जवानों को बचाने में पत्थरबाजी कर रहे स्थानीय लोगों पर गोली चलानी पड़ती.
4. सेनाध्यक्ष होने के नाते अपने अफसर के पक्ष में खड़ा होना उनका कर्तव्य बनता है.
5. मामले में कोर्ट मार्शल की कार्यवाही का नतीजा आये बिना सेना का गोगोई को पुरस्कृत करना उचित कदम है.
6. नागरिकों को सेना से डरना चाहिए अन्यथा वे सेना के आदेशों का सम्मान नहीं करेंगे.

मेजर के प्रेस कांफ्रेंस के वीडियो में बयान किया गया घटनाक्रम पहली नजर में ही बनावटी बातों का पुलिंदा नजर आता है. पत्थर बरसाती पांच सौ नौजवानों की उग्र भीड़ के बीच से, बिना गोली चलाये, एक व्यक्ति को पकड़कर जीप के बोनेट पर बांधना संभव ही नहीं है. डार ने उस दिन उपचुनाव में वोट भी डाला था, लिहाजा उसके पत्थर मारने वालों में शामिल होने की बात में वैसे भी दम नहीं लगता. न उसे घंटों बोनेट पर बाँध कर गाँव-गाँव घुमाने की जरूरत थी.

उसे गोगोई की टुकड़ी द्वारा रास्ते से उठाकर मानव कवच के रूप में इस्तेमाल करने का विवरण, तब से कई राष्ट्रीय अख़बारों में आ चुका है. यह भी तय है कि अगर जीप से बंधे डार की तस्वीर वाइरल न हुयी होती तो न गोगोई पर सवाल उठते और न रावत का बयान आता.

जायज सवाल है कि क्या कश्मीर अपवाद नहीं है? क्या वहां पाकिस्तान के समर्थन से छाया युद्ध ही नहीं चलाया जा रहा? तो आइये, कानून-व्यवस्था में सेनाको झोंकने की गति को एक अलग प्रसंग से समझते हैं. फरवरी, 2016 में हरियाणा के हिंसक जाट आरक्षण आन्दोलन के बीच सेना की झज्जर शहर के मुख्य बाजार में तैनात टुकड़ी ने गोली चलाकर आठ व्यक्तियों को मार दिया था, जबकि वहां आगजनी और लूट-पाट का दौर तब भी निर्बाध चलता रहा.

दरअसल, प्रदेश में नागरिक समुदाय का कोई भी तबका उस दौरान सेना की भूमिका से संतुष्ट नहीं था. होता भी कैसे, सेना से जो काम लिया जा रहा था, उसके लिए सेना बनी ही नहीं है. उसे झज्जर के बाजार की व्यवस्था का नहीं देश की सीमा की रक्षा का ज्ञान दिया जाता है, उसे नागरिकों के असंतोष से नहीं दुश्मनों के दांव-पेंच से निपटने की सिखलाई दी जाती है.

अन्यथा जनरल रावत से बेहतर कौन जानेगा कि पाकिस्तान का छाया युद्ध वहां की सेना और आइएसआई, भाड़े के आतंकियों और खरीदे हुए अलगाववादियों की मार्फ़त लड़ रहे हैं. कि पाकिस्तान का जिहादी इस्लाम वहां की सत्ता राजनीति को इस छाया युद्ध के लिए उकसाता रहता है. सीमा पर भारतीय सैनिकों का सर काटना ‘डर्टी वार’ का हिस्सा है. अलगाववादियों को आर्थिक और कूटनीतिक मदद देना ‘डर्टी वार’ का हिस्सा है. भाड़े के आत्मघाती तैयार कर भारतीय सैन्य कैम्पों पर हमला कराना ‘डर्टी वार’ है. कारगिल‘डर्टी वार’ था. कश्मीरी पंडितों का घाटी से पलायन ‘डर्टी वार’ था. इन सब को रोकने के लिए बेशक कल्पनाशील दांव-पेंच चाहिए.

हमारा राजनीतिक, कूटनीतिक और सामरिक नेतृत्व इन मोर्चों पर वांछित परिणाम नहीं दिखा सका है. उपचुनाव में मतदान का बायकाट और फर्जी मुठभेड़ या सेना और पुलिस की अन्य ज्यादतियों पर बाजार बंद और उस क्रम में पथराव जैसा असंतोष प्रदर्शन देश में कहाँ नहीं होता. कश्मीर में इन सबको ‘डर्टी वार’ का हिस्सा मानने का मतलब है हम पाकिस्तान के हाथ खेल रहे हैं. क्या इस तरह हम हर कश्मीरी मुस्लिम को पाकिस्तान के पाले में खड़ा नहीं कर रहे?

स्पष्ट कर दूँ, मैं भी उन लोगों में से ही हूँ जो मानते हैं कि कश्मीर में लम्बे अरसे से उग्र नागरिक स्थितियों से दो-चार हो रही अपनी सेना से हम भारतीयों को पूरी सहानुभूति रखनी चाहिए. वे इस तरह के काम के लिए बने ही नहीं हैं, यानी अफस्पा या बिना अफस्पा, उनके हिस्से अलोकप्रियता ही आनी है.

मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड में कानून-व्यवस्थाकी कवायद से लम्बे सैन्य साहचर्य का कटु अनुभव हमारे सामने है. इसी कारण इन प्रदेशों में भारतीय सेना को लेकर लोगों में गर्मजोशी का प्रकट अभाव मिलेगा। साथ ही पंजाब का उदाहरण हमारे सामने है जहाँ सेना का आतंकवाद से निपटने में सीमित एवं केन्द्रित इस्तेमाल सभी के लिए फलदायी रहा। सबक यह कि सेना सरहद के लिए होनी चाहिए, वक्ती जरूरत पड़ने पर अपवादस्वरूप नागरिक प्रशासन की मदद में आये. लेकिन नागरिकों के बीच उसकी अंतहीन उपस्थिति प्रतिकूल ही सिद्ध होगी.

हालाँकि किसी को ऐसा मुगालता भी नहीं होना चाहिए कि कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर स्थानीय पुलिस की भूमिका,प्रायः लोकप्रिय रहती है. दरअसल, नागरिकों के असंतोष से निपटने के क्रम में पुलिस पर पक्षपात, मनमानी, निकम्मापन और सत्ता केन्द्रित होने के आरोप आम लगते रहते हैं, एक हद तक सही भी.

कितनी ही स्वतंत्र एवं सरकारी जांच रपटों में पुलिस की कमियों और मिलीभगत का लेखा-जोखा पाया जा सकता है. लेकिन, निर्णायक तत्व यह है कि एक गयी गुज़री पुलिस भी न कभी नागरिकों को ‘दुश्मन’ करार देने की गलती करेगी, और न डींग मारेगी कि नागरिकों को पुलिस से डरना चाहिए.

कश्मीर में असंभव नागरिक दायित्व निभा रही सैन्य टुकड़ियों से किसी को ईर्ष्या नहीं हो सकती. दिल्ली से संचालित सत्ता केंद्र जब तक अपनी नीतियां नहीं बदलते, सेना को बेहद विषम परिस्थितियों में मनोबल कायम रखना ही है. हालाँकि, मेजर गोगोई के मानव कवच वाले कृत्य पर खेद जारी कर सेना न सिर्फ अपनी गौरवशाली परम्पराओं के साथ खड़ी नजर आती, शायद कश्मीर में विश्वसनीय आंतरिक सुरक्षा माहौल देने का श्रेय भी पा रही होती.

हमारे जनरलों को दोटूक बताना चाहिए कि सेना को दुश्मन से युद्ध लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है, न कि नागरिकों के बीच कानून-व्यवस्था संभालने की. नागरिक प्रशासन की मदद में ड्यूटी करने वाली सैन्य टुकड़ियों में उग्र भीड़ से निपटने के समय प्रायः अनुभव और सिखलाई की कमी दिखना स्वाभाविक है.

तो भी मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं कि सेना को अपनी गलती पकड़े जाने पर खेद जताना नहीं सिखाया जाता. सामान्य शिष्टाचार का यह सबक सैन्य अनुशासन का अभिन्न हिस्सा होता है, बेशक सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत इसे अपवाद सिद्ध करने पर उतारू नजर आते हों.

editorjanjwar@gmail.com

May 29, 2017

तुम इतने कट्टर क्यों हो भक्तो!

कौन हैं ये भक्त और क्या वे रातोंरात कट्टर भक्ति लिये पैदा हो गए? अमेरिका के नस्ली गोरे और भारत के सवर्ण दावेदार! वे जो इतिहास को नकारना चाहते हैं और क्रमशः ट्रम्प और मोदी में अपने मुक्तिदाता को देखते हैं...

अमेरिका से जनज्वार के लिए विकास नारायण राय 

अमेरिका और भारत दुनिया में लोकतंत्र के मानक कहे जाते हैं। प्रधानमत्रंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के पूर्ववर्तियों, मनमोहन सिंह और बराक ओबामा को सारी दुनिया सार्वजनिक जीवन में शिष्टता का प्रतीक मानती रही है। इस सन्दर्भ में मोदी का पिछले वर्ष का अमेरिकी दौरा याद कीजिये। सैन फ्रांसिस्को में फेसबुक मुख्यालय पर भारतीयों से मुलाकात के दौरान स्वयं होस्ट मार्क जुकरबर्ग को मोदी ने कैमरे की जद से धक्का मारकर किनारे कर दिया था। 

ऐसी ही सड़कछाप उजड्डता ट्रम्प ने भी हालिया पहले विदेशी दौरे में सहयोगी नाटो राष्ट्राध्यक्षों के जमावड़े में दिखायी, जब वे मोंटेनीग्रो के प्रधानमंत्री को धकियाते हुए कैमरे के केंद्र में पहुँच गए। क्या दोनों भक्त समूहों के लिए यह विचलन की घड़ी हो सकती थी? नहीं, जरा भी नहीं। उनके लिए तो यह उनके नायकों की सहज चेष्टा ही रही।

उत्तर पश्चिमी अमेरिका के बारिश भरे प्रान्त ऑरेगोन की सबवे ट्रेन में नस्ली गुरूर में डूबे एक व्हाइट अमेरिकी ने हिजाब पहनी हुयी दो अमेरिकी मुस्लिम औरतों को अनाप-शनाप दुत्कारना शुरू कर दिया। टोकने पर उसने एक के बाद एक तीन व्हाइट सहयात्रियों को चाकू मार दिया, जिनमें दो की मृत्यु हो गयी। 

उत्तर पश्चिमी भारत के पशु बहुल राजस्थान प्रान्त में मुस्लिम गाय व्यापारियों के एक समूह पर स्वयंभू गौ-रक्षक को सरेआम लाठियों से ताबड़तोड़ हमला कर हत्या करने में रत्ती भर भी संकोच नहीं हुआ। अमेरिका का राष्ट्रपति संभावित आतंकवाद रोकने के नाम पर अपने ही देश के मुस्लिम नागरिकों को देश में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा देता है। भारत का सेनाध्यक्ष पत्थर फेंकते कश्मीरी मुस्लिम युवकों को देश के ‘दुश्मन’ की संज्ञा से संबोधित करता है। ट्रम्प और मोदी समर्थकों के लिए यह सब राष्ट्रीय शर्म का नहीं, अपने नायकों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने का अवसर सरीखा है।

कौन हैं ये भक्त और क्या वे रातोंरात कट्टर भक्ति लिये पैदा हो गए? अमेरिका के नस्ली गोरे और भारत के सवर्ण दावेदार! वे जो इतिहास को नकारना चाहते हैं और क्रमशः ट्रम्प और मोदी में अपने मुक्तिदाता को देखते हैं। इसे विसंगति मत समझिये कि अमेरिकी गृहयुद्ध के नायक और दास प्रथा को समाप्त करने वाले अब्राहम लिंकन नहीं, कॉर्पोरेट एनपीए में अमेरिका को डुबाने वाले रोनाल्ड रीगन हैं ट्रम्प के आदर्श।।

नस्ली गोरों का एजेंडा रहा है काले और लातीनी समुदाय को अमेरिका से खदेड़ना, जो उनके हिसाब से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बोझ हैं। उन्हें भावी अप्रवासियों को भी अमेरिका में आने से रोकना है जो उनके ख्याल से उनका रोजगार खा रहे हैं। आखिर ट्रम्प की राजनीति भी इसी तरह अमेरिका को महान बनाने की ही तो है।

भक्तों के लिए उस मोदी में भी कोई विसंगति नहीं है जो गाँधी को तो राष्ट्रपिता कहता है पर गाँधी के घोषित उत्तराधिकारी और आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू को कोसने और गाँधी के वैचारिक हत्यारे सावरकर को महिमामंडित करने में पूरी ऊर्जा लगा देता है। सोचिये, स्वतंत्र भारत में सवर्ण सपने क्या रहे हैं? मुसलमानों और ईसाइयों का दमन, पाकिस्तान की पिटाई, दलित शोषण, आरक्षण की समाप्ति, कम्युनिस्ट दमन, मर्द अधीन स्त्री, मनुवाद और परलोकवाद की स्थापना! उसके हिसाब से भारत की सनातनी श्रेष्ठता के लिए आवश्यक तत्व यही हैं। क्या मोदी शासन उसके सपनों को ही हवा नहीं देता! 

समीकरण सीधा है, लोकतंत्र में हर विचारधारा को अपना राजनीतिक प्रतिनिधि चाहिए। नस्ली और सवर्ण श्रेष्ठता के पैरोकारों को भी। अन्यथा,अमेरिका में नस्ली-धार्मिक और भारत में सांप्रदायिक-जातीय घृणा के जब-तब फूटने वाले हालिया उभार में नया कुछ नहीं है, सिवाय इसके कि आज इन दोनों लोकतांत्रिक देशों के शासन पर जो काबिज हैं, ट्रम्प और मोदी, उन्होंने अपनी विजय यात्रा इसी घृणा की लहर पर सवार होकर तय की है।

यानी स्वाभाविक है, जनसंख्या के एक प्रबल हिस्से का घोषित एजेंडा और शासन में बने रहने का ट्रम्प-मोदी का अघोषित एजेंडा परस्पर गड्मड् होकर दोनों देशों की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय धरोहर को बेशक आशंकित करते रहें, भक्तों को तो आश्वस्त ही रखेंगे। स्पष्टतः न मोदी भक्ति 2014 और न ट्रम्प भक्ति 2016 अचानक या जल्दबाजी में संपन्न हुयी परिघटना हैं|

मोदी और ट्रम्प भक्तों में अद्भुत समानता है। मोदी और ट्रम्प कितना भी फिसलें, उनके भक्तों की कट्टर निष्ठा अडिग रहेगी। बेशक ट्रम्प से चिपके तमाम लैंगिक और नस्ली कलंक उदाहरणों में अब राष्ट्रपति चुनाव अभियान में रूस से मिलीभगत के गंभीर आरोप भी शामिल हो गए हों। बेशक,मोदी के सांप्रदायिक और कॉर्पोरेट-यारी वाले चेहरे को इतिहास के सबसे बड़े फेकू होने का दर्जा मिल रहा हो। 

ये सब बातें भक्तों के लिए बेमानी हैं। मजबूत तर्क और अकाट्य तथ्य उनकी भक्ति को हिला नहीं सकते। दरअसल, मोदी और ट्रम्प अपने इन कट्टर समर्थकों के क्रमशः सोलह आना खरे राजनीतिक प्रतिनिधि सिद्ध हुए हैं। इस हद तक और इतने इंतजार के बाद कि उनके लिए वे एकमात्र विकल्प जैसे हैं।

दोनों के भक्तों के अडिग आचरण को समझने के लिए यहाँ एक और पर्दाफाश जरूरी है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी अभियान में माना जाता था कि ट्रम्प ने बड़े आक्रामक अंदाज में रिपब्लिकन पार्टी का नामांकन हथियाया है। लेकिन अब पार्टी का केंद्र और उसका समर्थक मीडिया,ओबामा केयर समाप्त करने और अमीरों को टैक्स छूट देने में ही नहीं, चिर-दुश्मन रूससे मिलीभगत की छानबीन में भी जिस अंदाज में ट्रम्प के साथ खड़े नजर आते हैं, उनके एक दूसरे का पूरक होने में कोई शक नहीं।  

मोदी ने संघ के आशीर्वाद से भाजपा का नेतृत्व हथियाया था। तब भी,उनके कैंप की ओर से,खरीदी मीडिया के माध्यम से, लगातार‘विकास’ के एजेंडे पर इस तरह जोर दिखाया जाता रहा है मानो संघ की हिंदुत्व ध्रुवीकरण की विभाजक पैंतरेबाजियों से मोदी का लेना-देना न हो। जाहिर है,संघ के दलित और मुस्लिम विरोधी एजेंडे पर ही नहीं, किसान और मजदूर की कीमत पर व्यापारियों और पूंजीशाहों के बेशर्म पोषण पर भी, संघ और मोदी की प्रशासनिक एकता इस छद्म प्रचार को अब और अधिक चलने नहीं दे पा रही।

इस आलोक में ट्रम्प और मोदी की चुनावी सफलतायें उतनी आकस्मिक नहीं रह जाती हैं, जितना उनके विरोधी विश्वास करना चाहेंगे। न ही उनके अंधसमर्थकों को ऐसे बरगलाये लोगों का समूह मानना सही होगा, जिन्हें राष्ट्रीय विरासत, लोकतांत्रिक परम्पराओं और संवैधानिक दबावों के रास्ते पर लाने की बात जब-तब बौद्धिक आकलनों में उठाई जाती है। 

दरअसल,समर्थकों की तिरस्कृत पड़ी आकांक्षाओं को मोदी और ट्रम्प ने राष्ट्रीय राजनीति में जैसे प्रतिष्ठित किया है, वे चिर ऋणी क्यों न रहें? समझे, भला भक्त इतने कट्टर क्यों?

May 28, 2017

मोदी देंगे देश को पहला आदिवासी राष्ट्रपति?

तो एक आदिवासी महिला देश की राष्ट्रपति बनेंगी, खबरें तो इसी तरफ इशारा करती हैं। अगर प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से सच में द्रौपदी मूर्मू के नाम पर मोहर लग चुकी है तो वह वह देश की राष्ट्रपति बनने वाली पहली आदिवासी बन जाएंगी.....


राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 25 जुलाई, 2017 को पूरा हो रहा है। इसी महीने नये राष्ट्रपति का चुनाव होगा और वह अपना पदभार ग्रहण करेंगे। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम ने भाजपा को बहुमत के करीब ला दिया है। अपनी पसंद का राष्ट्रपति बनाने के लिए भाजपा को 10,98,882 मतों में से 5.49 लाख वोट चाहिए। भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास 4.57 लाख वोट हैं। अगर तीसरा मोर्चा एकजुट हो जाये, तो भी भाजपा के बराबर वोट नहीं ला पायेगा। इसलिए तय है कि भाजपा अपनी पसंद का अगला राष्ट्रपति बनायेगी।

राष्ट्रपति पद की दौड़ में भाजपा की तरफ से पहले कई नाम शामिल थे, जिनमें भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और यहां तक ​​कि रजनीकांत का नाम भी शामिल था। ऐसे में वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर द्रौपदी मूर्मू के नाम पर नरेंद्र मोदी का मोहर लगाना ​थोड़ा आश्चर्यचकित भी करता है। एक कारण यह भी रहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी पर फिर से केस चलाये जाने की सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद आडवाणी और जोशी के बाद वो लोग राष्ट्रपति पद की रेस से बाहर हो गए थे। 

महिला और स्वच्छ छवि के चलते विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी दौड़ में रहींं, लेकिन उनकी सेहत ठीक नहीं होने की वजह से उनकी दावेदारी कमजोर पड़ गयी। दक्षिण के पिछड़ी जाति के नेता और केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू को भी दौड़ में शामिल माना जा रहा है, लेकिन उनके नाम पर विपक्ष सहमत होगा, इस पर भाजपा को संदेह है। इन परिस्थितियों में द्रौपदी मुर्मू की दावेदारी अधिक मजबूत और तार्किक बतायी जा रही है। 


द्रौपदी मूर्मू वर्तमान में झारखंड की राज्यपाल हैं और पिछले दो दशकों से वह राजनीति में सक्रिय हैं। विपक्ष के लिए भी उनकी उम्मीदवारी को खारिज करना मुश्किल होगा। द्रौपदी मूर्मू राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार होंगी। द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी से झारखंड की मुख्य विपक्षी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का भी समर्थन भाजपा को हासिल हो सकता है। झारखंड विधानसभा में झामुमो मुख्य विपक्षी पार्टी है। 

इसे भी संयोग ही कहा जाएगा कि द्रौपदी झारखंड और देश की पहली आदिवासी महिला राज्यपाल हैं। द्रौपदी को प्रत्याशी बनाकर भाजपा और सरकार देश को अलग संदेश दे सकती है। 

ओड़िशा के आदिवासी परिवार में 20 जून, 1958 को ओड़िशा के एक आदिवासी परिवार में जन्मी द्रौपदी मूर्मू रामा देवी वीमेंस कॉलेज से बीए की डिग्री लेने के बाद ओड़िशा के राज्य सचिवालय में नौकरी करने लगीं। 1997 में नगर पंचायत का चुनाव जीतकर राजनीति में कदम रखा। पहली बार स्थानीय पार्षद (लोकल काउंसिलर) बनीं. 

पार्षद से राष्ट्रपति उम्मीदवार बनने तक का उनका सफर देश की सभी आदिवासी महिलाओं के लिए एक आदर्श होगा। वह ऐसे राज्य से ताल्लुक रखती हैं, जहां 2014 के मोदी लहर में भी भाजपा का सिर्फ खाता ही खुला था। राज्य में लोकसभा की 21 सीटें हैं, 20 सीटें बीजद ने जीती थीं। 

साफ-सुथरी राजनीतिक छवि के कारण द्रौपदी को भाजपा आलाकमान ने हमेशा तरजीह दी। वह भाजपा के सामाजिक जनजाति (सोशल ट्राइब) मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य के तौर पर काम करती रहीं और वर्ष 2015 में उनको झारखंड का राज्यपाल बना दिया गया। 

द्रौपदी मूर्मू 18 मई, 2015 से झारखंड की राज्यपाल हैं -2000 से 2004 तक ओड़िशा विधानसभा में रायरंगपुर से विधायक और राज्य सरकार में मंत्री रहीं। वह पहली ओड़िया नेता हैं, जिन्हें राज्यपाल बनाया गया -छह मार्च, 2000 से छह अगस्त, 2002 तक वह भाजपा और बीजू जनता दल की गठबंधन सरकार में वाणिज्य और परिवहन के लिए स्वतंत्र प्रभार मंत्री रहीं। छह अगस्त, 2002 से 16 मई, 2004 तक मत्स्य पालन और पशु संसाधन विकास राज्य मंत्री रहीं।

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May 25, 2017

पुलिस अधिकारियों से पत्रकार पहले लेते हैं डिक्टेशन, फिर करते हैं सहारनपुर हिंसा की रिपोर्टिंग

शब्बीरपुर में घटित जातीय हिंसा की रिपोर्टिंग चाहे प्रिंट हो या इलैक्ट्रॉनिक या फिर डिजिटल मीडिया में ऐसे की गई, जैसे यह जातीय संहार नहीं बल्कि व्यक्तिगत रंजिश में की गई हत्याएं हों.....

जनज्वार सहारनपुर। सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में 5 मई, 2017 को दलितों पर हुए हमले की पहली रिपोर्टिंग जब जनज्वार में छपी तो लोगों को लगा कि क्या ऐसा भी हो सकता है? यह सिर्फ इसलिए नहीं लगा कि सबसे पहले जनज्वार में वीडियो, फोटो और सिलसिलेवार घटनाक्रम में यह रिपोर्ट छपी थी, बल्कि इसलिए भी लगा कि जब शब्बीरपुर गांव में दलितों के घर जलाए जा रहे थे और राजपूत जातियों के लपंट तत्व पूरे गांव में हाहाकार मचाए हुए थे, उस वक्त मौके पर जिले के सभी उच्चाधिकारी मौजूद थे। 


उच्चाधिकारियों डीएम, एसपी, एसएसपी की मौजूदगी में दलितों के घर फूंके गए, उन पर हमले हुए, उनकी गाड़ियां, मोटरसाइकिलें, साइकिलें स्वाहा कर दी गयीं और अनाज के ढेर जला दिए गए। कई मीडियाकर्मियोंं ने इन घटनाओं को अपने कैमरे में कैद भी किया और उच्चाधिकारियों के साथ खड़े रहकर घटनाक्रम के साक्षी भी रहे, पर 5 मई की इस घटना का अगले 5 दिनों तक ठीक से तब तक मीडिया कवरेज नहीं आया, जब तक कि जनज्वार जैसी तमाम दूसरी जनपक्षधर वेबसाइटस और सोशल मीडिया ने इसे एक बड़ा और राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बना लिया।

इसी तरह बसपा प्रमुख मायावती के शब्बीरपुर जाने से पहले और उनके जाने के बाद शब्बीरपुर समेत दूसरे तमाम गांवों में हिंसक वारदातें हुईंं, दलितों और राजपूतों में टकराहट हुई, दर्जन भर दलित गंंभीर रूप से घायल हुए, जिसमें से तीन की अब तक मौत हो चुकी है, मगर इस बड़ी घटना की भी रिपोर्टिंग चाहे प्रिंट हो या इलैक्ट्रॉनिक या फिर डिजिटल मीडिया में ऐसे की गई, जैसे यह जातीय संहार नहीं बल्कि व्यक्तिगत रंजिश में की गई हत्याएं हों। शब्बीरपुर में अब तक आधा दर्जन लोग इस जातीय नरसंहार की भेंट चढ़ चुके हैं।

इन दोनों घटनाओं और सहारनपुर में लगातार बने हुए तनाव के बीच जिस तरह की रिपोर्टिंग की जा रही है, उसको समझने के लिए पत्रकार, पत्रकार और अधिकारियों के रिश्ते, स्थानीय स्तर पर पत्रकारों और माफियाओ के रिश्ते और पत्रका​रों की जातीय संरचना को समझना बहुत जरूरी है। बगैर इन चारों चीजों को समझे देश को यह नहीं समझ में आ सकता कि मीडिया चाहे वह राष्ट्रीय हो या स्थानीय, इस खबर को प्राथमिकता और घटनाक्रम की बारीकियों के साथ क्यों नहीं पेश कर रहा।

एक बात और कि जिस तरह मुजफ्फरनगर दंगे की घटना को वृहत रूप देने में ठीक से रिपोर्टिंग न होना भी एक बड़ा कारण रहा, अब ऐसा ही कुछ शब्बीरपुर में हो रहा है। एक दूसरा कारण यह भी माना जा रहा है कि मुजफ्फरपुर दंगे में आजम खां जिस तरह से पहुंचे और शब्बीरपुर में मायावती, उसने दंगे को भड़काने और जातीय हिंसा को बढ़ाने का ही काम किया है। 

5 मई को जब शब्बीरपुर गांव जब रहा था, दलितों पर हमले हो रहे थे तो इस घटनाक्रम की रिपोर्टिंग करने से पहले डीएम, एसएसपी, एसपी ने गांव में पत्रकारों को डिक्टेशन दी। मौके पर आज तक, न्यूज नेशन, जीटीवी, ईटीवी, न्यूज 24, टीवी 100 समेत तमाम न्यूज चैनलों और सभी दैनिकों के पत्रकार डिक्टेशन लेने वालों में मौजूद थे। 


एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे, डीएम एनपी सिंह और एसपी देहात ने पत्रकारों को निर्देशित किया कि फलां फलां फुटेज दिखाइये और फलां फलां फुटेज मत दिखाइये। पत्रकार भी उच्चाधिकारियों की बात से सहमत थे इसलिए फुटेज और फैक्ट होने के बावजूद खबर सामने नहीं आई। कुछेक ईमानदार पत्रकारों ने आॅनलाइन मीडिया का सहारा लिया, जिसकी वजह से इस घटनाकम का सच सबके सामने आ पाया। इन्ही पत्रकारों में कुछेक ने जब आपस में कहा कि यह तो गलत है हमें खबर दिखानी चाहिए, कुछेक ने दिल्ली में अपने हैडआॅफिस वीडियो फुटेज भेजी भी, मगर खबर वहां से भी प्रसारित नहीं हो पायी।

गौरतलब है कि सहारनपुर जिले में छोटे—बड़े मीडिया घरानों के तकरीबन 210 पत्रकार काम करते हैं। इन पत्रकारों का बहुतायत बाह्मण, राजपूत और जाट है। 10 प्रतिशत के करीब पत्रकार मुस्लिम भी हैं। ऐसे में घटना मुजफ्फरपुर की हो या शब्बीरपुर की, पत्रकार आमतौर पर अपनी जातिवादी और साम्प्रदायिक समझदारी को ही पत्रकारिता का मूल्य बना लेते हैं। और ये तब और भी आसान हो जाता है जब ​तमाम उच्चाधिकारी भी साम्प्रदायिक और जातिवादी हों। ऐसे में अधिकारियों और पत्रकारों दोनों का गठजोड़ यह मान लेता है कि मुसलमानों और दलितों पर जो जातिवादी और साम्प्रदायिक अत्याचार हुआ है, वह वाजिब है और इसको लेकर खामखां का हल्ला मचाने की कोई जरूरत नहीं है। 

शब्बीरपुर मामले में भी हू—ब—हू यही हुआ। ज्यादातर स्थानीय पत्रकार किसान हैं और उन्होंने शब्बीरपुर और आसपास के दूसरे गांवों में दलितों पर हुए हमलों और अत्याचार को इसलिए वाजिब ठहरा दिया कि दलितों की महिलाएं उनके खेतों में जाने वाले पाइपों पर दरारी/​हसुआ मार देती हैं।

सहारनपुर से दूर बैठे और यहां की सामाजिकी, आर्थिकी से अनभिज्ञ व्यक्ति को पत्रकारों और पत्रकारिता के संदर्भ में यह बात मजाकिया लग सकती है, मगर सच यही है। दलित महिलाओं का खेत में जा रही पाइपों पर दराती मार देना, दलितों का राजपूतों के आगे पहले की तरह दंंडवत न होना, कुछेक दलितों की आर्थिक स्थिति मजबूत होना और उनका पढ़ा—लिखा होना भी उन पत्रकारों को गड़ता है या उन्हें सही रिपोर्टिंग नहीं करने देता, जो सहारनपुर की स्थानीय पत्रकारिता के टायकून हैं। 

अधिकारियों की डिक्टेशन और पत्रकारों की जातीय और सामाजिक हैसियत से इतर एक सच और भी है, जहां माफियाओं के आगे पत्रकार जाति—धर्म से परे हटकर सरेंडर किए हुए हैं। सहारनपुर के खनन माफिया मोहम्मद इकबाल जोकि बसपा के पूर्व एमएलसी भी रह चुके हैं और बसपा से ही तत्कालीन एमएलसी और उनके छोटे भाई महमूद अली सहारनपुर की पत्रकारिता को पालते—पोसते हैं। यहां के लोगों में यह सामान्य जानकारी है कि अवैध खनन पर रिपोर्टिंग न करने के बदले कुछेक पत्रकारों को छोड़ दें तो बहुतायत को एमएलसी परिवार से मासिक भत्ता जाता है। हालांकि अब सरकार ने औपचारिक तौर पर खनन बंद करवा दिया है, फिर भी यह जारी है।

देखें वीडियो :



Apr 14, 2017

आंबेडकर ने लिखा है गो मांस खाते थे हिंदू



पिछले वर्ष आज के ही दिन 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती के अवसर पर बीबीसी हिंदी में यह लेख छपा था जिसमें मोदी जी के आदर्श बाबा साहब आंबेडकर ने गोमांस सेवन के बारे मेें बताया है...  

भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माताओं में से एक डॉक्टर बीआर अंबेडकर अच्छे शोधकर्ता भी थे. उन्होंने गोमांस खाने के संबंध में एक निबंध लिखा था, 'क्या हिंदुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया?'

यह निबंध उनकी किताब, 'अछूतः कौन थे और वे अछूत क्यों बने?' में है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर शम्सुल इस्लाम ने इस निबंध को संपादित कर इसके कुछ हिस्से बीबीसी हिंदी के पाठकों के लिए उपलब्ध करवाए हैं.

'पवित्र है इसलिए खाओ'

अपने इस लेख में अंबेडकर हिंदुओं के इस दावे को चुनौती देते हैं कि हिंदुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया और गाय को हमेशा पवित्र माना है और उसे अघन्य (जिसे मारा नहीं जा सकता) की श्रेणी में रखा है.

अंबेडकर ने प्राचीन काल में हिंदुओं के गोमांस खाने की बात को साबित करने के लिए हिन्दू और बौद्ध धर्मग्रंथों का सहारा लिया.

उनके मुताबिक, "गाय को पवित्र माने जाने से पहले गाय को मारा जाता था. उन्होंने हिन्दू धर्मशास्त्रों के विख्यात विद्वान पीवी काणे का हवाला दिया. काणे ने लिखा है, ऐसा नहीं है कि वैदिक काल में गाय पवित्र नहीं थी, लेकिन उसकी पवित्रता के कारण ही बाजसनेई संहिता में कहा गया कि गोमांस को खाया जाना चाहिए." (मराठी में धर्म शास्त्र विचार, पृष्ठ-180).

अंबेडकर ने लिखा है, "ऋगवेद काल के आर्य खाने के लिए गाय को मारा करते थे, जो खुद ऋगवेद से ही स्पष्ट है."

ऋगवेद में (10. 86.14) में इंद्र कहते हैं, "उन्होंने एक बार 5 से ज़्यादा बैल पकाए'. ऋगवेद (10. 91.14) कहता है कि अग्नि के लिए घोड़े, बैल, सांड, बांझ गायों और भेड़ों की बलि दी गई. ऋगवेद (10. 72.6) से ऐसा लगता है कि गाय को तलवार या कुल्हाड़ी से मारा जाता था."

'अतिथि यानि गाय का हत्यारा'

अंबेडकर ने वैदिक ऋचाओं का हवाला दिया है जिनमें बलि देने के लिए गाय और सांड में से चुनने को कहा गया है.

अंबेडकर ने लिखा "तैत्रीय ब्राह्मण में बताई गई कामयेष्टियों में न सिर्फ़ बैल और गाय की बलि का उल्लेख है बल्कि यह भी बताया गया है कि किस देवता को किस तरह के बैल या गाय की बलि दी जानी चाहिए."

वो लिखते हैं, "विष्णु को बलि चढ़ाने के लिए बौना बैल, वृत्रासुर के संहारक के रूप में इंद्र को लटकते सींग वाले और माथे पर चमक वाले सांड, पुशन के लिए काली गाय, रुद्र के लिए लाल गाय आदि."

"तैत्रीय ब्राह्मण में एक और बलि का उल्लेख है जिसे पंचस्रदीय-सेवा बताया गया है. इसका सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, पांच साल के बगैर कूबड़ वाले 17 बौने बैलों का बलिदान और जितनी चाहें उतनी तीन साल की बौनी बछियों का बलिदान."

अंबेडकर ने जिन वैदिक ग्रंथों का उल्लेख किया है उनके अनुसार मधुपर्क नाम का एक व्यंजन इन लोगों को अवश्य दिया जाना चाहिए- (1) ऋत्विज या बलि देने वाले ब्राह्मण (2) आचार्य-शिक्षक (3) दूल्हे (4) राजा (5) स्नातक और (6) मेज़बान को प्रिय कोई भी व्यक्ति.

कुछ लोग इस सूची में अतिथि को भी जोड़ते हैं.

मधुपर्क में "मांस, और वह भी गाय के मांस होता था. मेहमानों के लिए गाय को मारा जाना इस हद तक बढ़ गया था कि मेहमानों को 'गोघ्न' कहा जाने लगा था, जिसका अर्थ है गाय का हत्यारा."
'सब खाते थे गोमांस'

इस शोध के आधार पर अंबेडकर ने लिखा कि एक समय हिंदू गायों को मारा करते थे और गोमांस खाया करते थे जो बौद्ध सूत्रों में दिए गए यज्ञ के ब्यौरों से साफ़ है.

अंबेडकर ने लिखा है, "कुतादंत सुत्त से एक रेखाचित्र तैयार किया जा सकता है जिसमें गौतम बुद्ध एक ब्राह्मण कुतादंत से जानवरों की बलि न देने की प्रार्थना करते हैं."

अंबेडकर ने बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय(111. .1-9) के उस अंश का हवाला भी दिया है जिसमें कौशल के राजा पसेंडी के यज्ञ का ब्यौरा मिलता है.

संयुक्त निकाय में लिखा है, "पांच सौ सांड, पांच सौ बछड़े और कई बछियों, बकरियों और भेड़ों को बलि के लिए खंभे की ओर ले जाया गया."

अंत में अंबेडकर लिखते हैं, "इस सुबूत के साथ कोई संदेह नहीं कर सकता कि एक समय ऐसा था जब हिंदू, जिनमें ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण दोनों थे, न सिर्फ़ मांस बल्कि गोमांस भी खाते थे."


Apr 4, 2017

पुलिस और जांच एजेंसियों की ड्यूटी बनती जा रही भाजपा की वफादारी

न पीपी पांडे जैसे पुलिस अफसर आसमान से टपकते हैं और न अमित शाह जैसे उनके राजनीतिक पैरोकार| उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने ठीक ही समाजवादी सरकार पर पुलिस थानों को पार्टी दफ्तरों के रूप में चलाने का आरोप लगाया था...

विकास नारायण राय, पूर्व आइपीएस 

सर्वोच्च न्यायालय में जूलियस रिबेरो की याचिका पर गुजरात के विवादास्पद डीजीपी पीपी पांडे को पद छोड़ना पड़ा और डीजीपी के पद पर सरकार को आनन-फानन में गीता जोहरी को बैठाना पड़ा. ऐसे में सवाल पूछा जा सकता है कि एक बदनाम हत्यारोपी पुलिस अफसर को, योग्यता और वरिष्ठता के मानदंडों को दरकिनार कर, राज्य पुलिस का मुखिया बनाने के पीछे क्या राजनीतिक सन्देश छिपा हुआ था | 

पांडे, अमित शाह के मोदी शासन में गुजरात के गृह राज्य मंत्री दौर में काफी समय तक राजनीतिक पुलिस मुठभेड़ों के लिए कुख्यात पुलिस अफसर वंजारा के वरिष्ठ रहे | बाद में इशरत जहान जैसे फर्जी मुठभेड़ कांडों में वे वंजारा के साथ गिरफ्तार किये गये और लम्बी जद्दोजहद के बाद जमानत मिलने पर कार्यवाहक डीजीपी बना दिए गये | जग जाहिर है कि आज तक भी गुजरात में शीर्ष पदों पर नियुक्तियां अमित शाह की मार्फत होती हैं | यानी प्रधानमंत्री मोदी की सुविधा को ध्यान में रखते हुए | पांडे को भी इस समीकरण के तहत ही डीजीपी बनाकर पुरस्कृत किया गया | 



मोदी-शाह की जोड़ी चाहती तो पांडे की हिंदुत्व के एजेंडे पर जेल जाने की भरपाई और तरह से भी कर सकती थी| पांडे के जमानत पर छूटने तक मोदी देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे और शाह काबिज थे भाजपा के शक्तिमान अध्यक्ष के पद पर| उन्होंने यदि पांडे को तब भी राज्य पुलिस का मुखिया ही बनाना तय किया तो इस तरह वे अपने वफादारों के लिए दो संदेश दे रहे थे| पहला यह कि वे अपने वफादारों की सेवाओं को पुरस्कृत करना कभी नहीं भूलते, हालाँकि यह संदेश पांडे को सूचना आयुक्त या निगरानी आयुक्त या लोक सेवा आयोग में पदस्थापित कर भी दिया जा सकता था| लिहाजा,इस सन्दर्भ में मोदी-शाह का दूसरा सन्देश ज्यादा महत्वपूर्ण था| अंधवफादारी के आगे वरिष्ठता, योग्यता या नेकनामी का कोई महत्व नहीं है।

केंद्र में सत्ता मिलने के बाद से मोदी-शाह को कहीं बड़े गेम खेलने पड़े हैं| गुजरात प्रकरणों में कांग्रेस ने भी सीबीआई की मार्फत शाह को जेल में रखा था और मोदी के पसीने छुड़ा दिए थे| दरअसल, यूपीए दो के दौर में मनमोहन सरकार को सत्ता में रखने में सीबीआई की बड़ी भूमिका रही- मायावती और मुलायम को जब-तब जेल का डर दिखाकर और अपने शासन के तरह-तरह के स्कैम में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश वाली जांचों को मन मुताबिक निर्देशित कर|

इस दौर में कांग्रेस सरकार ने सीबीआई को एपी सिंह और रंजीत सिन्हा के रूप में सीबीआई इतिहास के दो सर्वाधिक ‘लचीले’ डायरेक्टर दिए। फिलहाल,सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से इन दोनों के भ्रष्ट आचरण की जांच स्वयं सीबीआई को ही करनी पड़ रही है| इसी क्रम में मोदी-शाह ने भी गुजरात के ही एक जूनियर पुलिस अफसर राकेश अस्थाना को सीबीआई का कार्यवाहक डायरेक्टर बनाकर रखा| 

जाहिर है, पांडे जैसे ही इस ‘वफादार’ की मार्फत वे कांग्रेस से भी बढ़कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते रहे हों| सोचिये दांव पर कितना कुछ है कि यह सीनाजोरी तब की गयी जब भारत का मुख्य न्यायाधीश स्वयं सीबीआई का डायरेक्टर चुनने की समिति का हिस्सा होता है| अंततः उनका छद्म बहुत दिनों तक चला नहीं और सर्वोच्च न्यायालय के दखल के बाद वरिष्ठता के आधार पर एक नया डायरेक्टर लगाना पड़ा|

‘वफादारी’ का यह खेल उन्हें बेशक कांग्रेस ने सिखाया हो पर मोदी-शाह के तौर-तरीके कहीं अधिक निरंकुश हैं| उन्होंने सीबीआई के अलावा एकमात्र अन्य केन्द्रीय जांच एजेंसी एनआइए को भी पूरी तरह अपनी जकड़ में ले लिया है| कांग्रेस राज में एनआइएनेमालेगांव,समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद,अजमेर शरीफ जैसे आतंकी मामलों में भगवा आतंक का हाथ सिद्ध किया था और तदनुसार संघ के असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा समेत कई सदस्यों का अदालतों में चालान भी हुआ| 

केंद्र में मोदी सरकार बनते ही इन मुकदमों में अभियोजन के गवाहों को तोड़ने, संघी अभियुक्तों को जमानत दिलाने और उन्हें डिस्चार्ज कराने व बरी कराने का जिम्मा एनआइए के डायरेक्टर शरद कुमार ने उठा लिया| तब से असीमानंद अजमेर शरीफ मामले में बरी हो चुका है और प्रज्ञा को जमानत पर छोड़ने की अभूतपूर्व गुहार,जो स्वयं अभियोजक एजेंसी एनआइए कर चुकी है, अदालत ने ख़ारिज कर दी है| पुरस्कार स्वरूप शरद कुमार का सेवा काल दो वर्ष से लगातार बढ़ाया जा रहा है| 

मोदी-शाह को इसी स्तर की वफादारी चाहिए और इसलिए अपनी राजनीतिक साख की कीमत पर भी वे पीपी पांडे को गुजरात का एंटी करप्शन ब्यूरो के निदेशक बनाने से नहीं रुके| सोचिये, इस तरह उन्होंने शरद कुमार और राकेश अस्थाना जैसे कितने ही भावी ‘वफादारों’ को आश्वस्त किया होगा|

न पांडे जैसे पुलिस अफसर आसमान से टपकते हैं और न अमित शाह जैसे उनके राजनीतिक पैरोकार| उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने ठीक ही समाजवादी सरकार पर पुलिस थानों को पार्टी दफ्तरों के रूप में चलाने का आरोप लगाया था| हालाँकि वे भूल गए कि गुजरात में स्वयं उनकी पार्टी भी पुलिस का व्यापक दुरुपयोग करती रही है| आज स्वयं केंद्र में सीबीआई और एनआइए अमित शाह के इशारे पर चलने वाली जांच एजेंसियां बनी हुयी हैं| गुजरात पुलिस का तो कहना ही क्या!

Mar 25, 2017

सदी के सबसे भयंकर सूखे के बीच खड़ा नरमुंड लिया किसान

हर तीसरे घर में अपने मुखिया के खो जाने के बाद दुख में व्याकुल लोग मिल जाएंगे। तबाही का ये मंजर है कि अक्टूबर 2016 से आत्महत्याओं का आंकड़ा 254 पहुंच गया.....

आकांक्षा 

जंतर मंतर के सामने अपने आगे नरकंकालों की खोपड़ियां लिए धरने पर बैठे कुछ लोग सूनी आंखों से अपना दर्द बयान कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से खबरों में यही तस्वीर दिखाई जा रही हैं। ये लोग कोई और नहीं तमिलनाडु के किसान हैं। देश का अन्नदाता कहे जाने वाले किसान की ये दुर्दशा हो गई है कि खेतों की बजाय खोपड़ियां लिए प्रदर्शन करने को मजबूर हैं। वजह भयंकर सूखे के हालात, जो अकाल जैसी स्थिति में बदलते जा रहे हैं। 

भारत का दूसरा बड़ा चावल उत्पादक प्रदेश तमिलनाडु आज सदी के भीषण सूखे से जूझ रहा है। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि पिछले दो महीनों में 65 किसानों ने आत्महत्या कर ली। दिन पर दिन स्थिति और बिगड़ती ही जा रही है। अक्टूबर 2016 से ये सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इन हालातों को देखते हुए एआईडीएमके के नेता पन्नीरसेलवम ने जनवरी 2017 में तमिलनाडु के 32 जिलों के सूखे की चपेट में होने की रिपोर्ट केंद्र सरकार को दी है। तकरीबन 13,305 गांव बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। 

गौरतलब है कि पूरे तमिलनाडु में औसत से 35 से 85 प्रतिशत बारिश कम हुई है, जिसकी सीधी मार फसलों पर पड़ी है। सूखे के हालात और भी बदतर तब हुए जब कर्नाटक ने कावेरी नदी का पानी रोक लिया। इन सब  कारण पहले तो सामान्य से 40 से 50 प्रतिशत खेती नहीं हुई, जो हुई वह भी बिना पानी बर्बाद हो गई। फसलों से लहलहाने वाले खेत आज बंजर भूमि में तब्दील होकर रह गए और किसान हताशा के बोझ तले दब गए। तमिलनाडु के साथ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल के कुछ हिस्से भी सूखे से जूझ रहे हैं। 

हताशा का मंज़र

तमिलनाडु के औसत किसान के पास एक से तीन एकड़ जमीन है, जिस पर 15000 से 18000 रुपए प्रति एकड़ तक का खर्च आता है। लेकिन 2016 से हालात ऐसे बदले कि देखते ही देखते कृषि दर सामान्य से 40 से 50 प्रतिशत घट गयी। जिन किसानों की फसलें लहलहाने का और कटाई के बाद खुशियां मनाने का वक्त था, वह सूखे की चपेट में ऐसी आई कि घरों में मातम पसर गया। हर तीसरा घर मातम मनाता नजर आता है। 

एक किसान अपनी 3 एकड़ की फसल की बर्बादी को देखकर इस कदर टूटा कि अपने बेटे को चाय लाने के बहाने भेजकर आत्महत्या कर ली। फसलों की बर्बादी और कर्ज की लटकती तलवारों से निजात पाने का सिर्फ एक यही तरीका किसानों के पास रह गया है। 

तमिलनाडु के हर तीसरे घर में अपने मुखिया के खो जाने के बाद दुख में व्याकुल लोग मिल जाएंगे। तबाही का ये मंजर है कि अक्टूबर 2016 से आत्महत्याओं का आंकड़ा 254 पहुंच गया। पिछले दो महीनों में 65 किसानों ने भी यही रूख अपनाया। लेकिन सरकारी कागजों में ये आंकड़ा सिर्फ 17 तक ही पहुंचा। तमिलनाडु किसान संगठन के नेता बी आर पंडियन ने सरकार पर गुमराह करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरकार सही आंकड़े छुपा रही है जिससे हालात और बिगड़ सकते हैं।

सरकार का रुख

बर्बाद होती फसलें लगातार बढ़ती आत्महत्याओं और धरने प्रदर्शन के बाद सरकार ने तमिलनाडु को 10 जनवरी, 2017 को सूखाग्रसित राज्य घोषित कर दिया। सरकार ने करीब 10 दिन पहले नागापटटीनम और थंजावूर जैसे भारी तबाही वाले जिलों में किसान परिवारों को 3 लाख रुपए मदद के रूप में दिए। किसानों की प्रति एकड़ बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा देने का वादा भी किया गया। केंद्र ने सूखाग्रसित तमिलनाडु के लिए करीब 2014 करोड़ रुपए की सहायता राशि अनुमोदित की है। राज्य सरकार को केंद्र से 39000 करोड़ रुपए की मदद की उम्मीद थी। 

इस बारे में किसान संगठन अध्यक्ष बी पंडियन का कहना है ये राशि घड़े में एक बूंद के समान है। सरकार ने प्रति एकड़ जमीन के हिसाब से भी क्षतिपूर्ति देने का वादा किया है। इसमें कावेरी नदी के आसपास वाले किसानों को 25000 प्रति एकड़ दिए जाएंगे, जबकि अन्य किसानों को 21000 से 26000 प्रति एकड़ के बीच आपदा राहत कोष से सहायता मिलेगी। सर्वे के मुताबिक कावेरी नदी के आसपास करीब 80000 एकड़ फसल बर्बाद हुई है। यूं तो सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 130,000 धान के खेतों का बीमा किया हुआ था, जिसके अंतर्गत करीब 95 प्रतिशत किसानों के खेत आते हैं। कुल मिलाकर 11 करोड़ की प्रीमियम राशि भी किसानों तक पहुंच जाए, तो आत्महत्या जैसे हताशा भरे कदम से तो निजात मिलेगी।

सरकार के वादों से उम्मीद की जा सकती है कि किसानों की बदतर स्थिति में थोड़ा सुधार आएगा। लेकिन ये तभी मुमकिन है जब सरकार और किसानों के बीच के लंबे फासले को घटाया जा सके, ताकि मदद की गुहार लगाते किसानों को कुछ लाभ मिल सके।

मानसून की मार 

मौसम विभाग के अनुसार तमिलनाडु में इस बार 70 प्रतिशत मानसून कम रहा, जिसका सीधा असर भूमिगत जल स्तर पर पड़ा जो 85 प्रतिशत कम हो गया। जाहिर है बिना पानी के फसलें बुरी तरह बर्बाद हो गईं। मौसम विभाग के मुताबिक जून से सितंबर के बीच आने वाले दक्षिण पश्चिम मानसून पिछले 140 सालों में सबसे खराब रहा। यही हाल उत्तर पूर्वी मानसून का भी रहा, जो तमिलनाडु से होता हुआ आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों दक्षिण कर्नाटक और केरल से होकर जाता है। 145 सालों में दूसरी बार ये खराब मानसून रहा। इसका सीधा असर जल स्त्रोतों पर पड़ा, जो 20 प्रतिशत तक सूख गए। 

इसी के साथ पेयजल का संकट भी गहराने लगा है। सरकार की ओर से नदी नहरों के मरम्मत के लिए भी करोड़ों का प्रावधान रखा गया है जिससे किसानों को मनरेगा के तहत काम मिल सके। मनरेगा योजना में भी 100 दिन से बढ़ाकर 150 दिन कर दिए गए हैं, ताकि काम करने वाले किसानों की रोजी रोटी चल सके। 


आकांक्षा युवा पत्रकार हैं।
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Mar 17, 2017

देवबंद में है सिर्फ 35 फीसदी मुस्लिम वोट, 18 बार जीत चुके हैं हिंदू विधायक

पहली बार नहीं तीसरी बार जीती है भाजपा
अजय प्रकाश 


11 मार्च को जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणामों की घोषणा होने लगी तो एक खबर सिर चढ़कर मीडिया और सोशल मीडिया में छाने लगी। कहा गया कि देवबंद में भाजपा ने जीतकर इतिहास रच दिया है। हर तरफ प्रचारित होने लगा कि देश में भाजपा की जबर्दस्त लहर है और लहर के लपेटे में देवबंद जैसी 'कट्टरपंथी' और मुस्लिम वोटरों के बहुतायत वाली विधानसभा में भी पहली बार कोई हिंदू प्रत्याशी जीता है। गौरतलब है कि देवबंद धार्मिक मुस्लिम शिक्षा का बड़ा केंद्र है और हिंदूवादी जमातों में उसकी पहचान एक कट्टरपंथी शैक्षिक केंद्र के रूप में है।

 
भाजपा प्रत्याशी बृजेश को सहारनपुर जिले की देवबंद विधानसभा से 1 लाख 1 हजार 9 सौ 77 वोट मिलने और 29 हजार 3 सौ 23 वोट से जीतने की खबर कुछ इस रूप में फैली कि वहां 71 फीसदी मुस्लिम आबादी है, वहां आजादी के बाद से सिर्फ मुस्लिम ही जीतते हैं, बावजूद अबकी भाजपा जीत गयी। कुछ जगहों पर देवबंद विधानसभा की मुस्लिम आबादी को 80 प्रतिशत तक ​लिखा गया।

इन दावेदा​रियों का लब्बोलुआब ये रहा कि भाजपा की जीत बगैर मुस्लिम मतदाताओं के वोट के संभव नहीं है और इसको आधार बनाकर यह साबित करने की कोशिश की गयी कि भाजपा की 325विधानसभाओं में जो चमत्कारिक जीत है, वह बगैर मुस्लिम वोटों के संभव नहीं है। यानी अखलाक की हत्या, नोटबंदी से मुश्किलों में पड़ी मुस्लिमों की शिल्पकारी, भाजपा नेताओं की दंगाई मानसिकता और बार—बार मुस्लिमों को देशद्रोही साबित करने की हिंदूवादी प्रवृत्ति को अल्पसंख्यक मतदाता भूल गए और उन्हें मोदी जी के करिश्माई चरित्र ने अपनी ओर खींच लिया।

भाजपा की ऐतिहासिक जीत का खुमार ऐसा है कि तथ्य जांचना भी भाजपा के प्रति पूर्वग्रहित होना समझा जाने लगा है। सवाल करने वाले पत्रकारों और तथ्य के मांग करने वालों को 'वैचारिक लट्ठ' से हुरपेटा जा रहा है। बहुत ही शातिराना तरीके से ​हिंदू मानसिकता के पत्रकारों ने यह स्थापित करने की कोशिश की कि 'तीन तलाक' को खत्म करने के सकारात्मक रुख के कारण मुस्लिम महिलाओं ने बीजेपी को वोट दिया है। दो कदम आगे बढ़कर बाकायदा चुटकुले और फब्तियां शेयर होने लगीं और ज्यादातर संघी मानसिकता के लोगों ने मान लिया कि मुस्लिम मतदाताओं ने भी भाजपा को वोट दिया।

पर जनज्वार की पड़ताल में यह एक बड़ा झूठ निकला। वोट प्रतिशत से लेकर वोटरों की गिनती सबकुछ ​दुष्प्रचार का हिस्सा लगा। पता चला कि यहां न सिर्फ हिंदू—मुस्लिम वोटरों का प्रतिशत 60 'हिंदू'और 40 'मुस्लिम' का है, बल्कि 1951 से लेकर2017 के बीच सिर्फ 2 बार मुस्लिम ​विधायक जीते हैं, जबकि 18 बार हिंदू विधायक जीत चुके हैं।

देवबंद से भाजपा पहली बार नहीं तीसरी बार जीती है, जबकि बसपा दो बार और सपा सिर्फ एक बार जीती है। देवबंद पारंपरिक तौर पर कांग्रेस की सीट है,पर एक बार निर्दलीय और लोकदल के विधायक भी जीत चुके हैं। 2017 से पहले बीजेपी की शशिबाला पुंडीर 1993 में और सुखबीर सिंह पुंडीर 1996 में क्रमश: 68698 और 61807 वोट पाकर विधायक रह चुके हैं।

देवबंद के पत्रकारों, नेताओं, किसानों और सामाजिक कामों में सक्रिय करीब दर्जन भर लोगों से जनज्वार ने बात की। सहारनपुर ईटीवी संवाददाता तसलीम कुरैशी कहते हैं, 'हां, मैंने भी देखा कि मीडिया और सोशल मीडिया पर प्रचारित हो रहा है कि देवबंद में भाजपा से एक हिंदू ने विधायकी जीतकर इतिहास रच दिया है। पर आप यहां कहेंगे तो लोग हंसेंगे। मुझे अफसोस है कि ​दिल्ली में बैठे पत्रकार तथ्यों इस कदर अनभिज्ञ हैं और फेसबुक पर ​बैठ फिजूल की दावेदारियां किए जा रहे हैं। आखिर उन्होंने एक बार चुनाव की साइट की देख ली होती तब भी उनको पता चल जाता कि यहां पारंपरिक विजेता कौन है।'

मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ पत्रकार संजीव चौधरी के अनुसार, 'जीत की खुमारी में इलाकों के भूगोल बदलने की तेजी दरअसल उस सांप्रदायिक सोच को दिखाती है जो उन्मादी जमातों के दिल में दशकों से बैठा पड़ा है। जिस देवबंद में ​मुस्लिम वोटरों की आबादी ठीक से 35 प्रतिशत भी नहीं है, उसे 71 से80 बताने की मंशा का गहरा विश्लेषण होना चाहिए अन्यथा झूठ की नींव पर सच स्थापित करने की पत्रकारिता में नई परंपरा चल पड़ेगी।'
आंकड़ों में देवबंद का सच

विधानसभा — देवबंद — संख्या — 5

आबादी  — 8 लाख से अधिक

मतदान केंद्र — 178


वोटर — महिला — 1 लाख 49 हजार 547

      पुरुष —  1 लाख 77 हजार 306

कुल वोटर — 3 लाख 26 हजार 853


देवबंद विधानसभा में हिंदू व दलित वोट — 2 लाख17 हजार 354

देवबंद विधानसभा में मुस्लिम वोट — 1 लाख 9हजार 567

पूरा वोट — 3 लाख 26 हजार 921


प्रतिशत में हिंदू वोट — लगभग 65 प्रतिशत

प्रतिशत में मुस्लिम वोट — 35 प्रतिशत


चुनाव आयोग की संख्या और जाति और धर्म आधारित वोटरों की गिनती में 68 का फर्क है, वह इसलिए है कि उतने वोटरों का नाम वोटर लिस्ट में नहीं था।


इस बार देवबंद में वोट

भाजपा — 101977

बसपा — 72654

सपा — 55278

रालोद — 1129

सभी निर्दलीय प्रत्याशी — 1901

नोटा — 796

कुल वोट जो इस बार पोल हुआ — 2 लाख 33 हजार735

प्रतिशत — 67 प्रतिशत


इसमें से सपा और बसपा को मिले वोट को देखें तो वह 1 लाख 27 हजार 932 होता है, जबकि भाजपा को 1 लाख 1 हजार 77 वोट मिले हैं।

जाहिर वह दावेदारी इन तथ्यों के आगे सिर के बल खड़ी नजर आती है, जो मीडिया और सोशल मीडिया ने बड़े जोर—शोर से प्रचारित किया।

एक तो देवबंद में न तो हिंदुओं से मुसलमान ज्यादा हैं और न ही मुस्लिम या उनकी औरतों ने कोई वोट किया है। बल्कि भाजपा को हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण का फायदा मिला है। अलबत्ता चुनाव परिणामों से साफ है कि हिंदुओं की करीब 40 हजार आबादी ने सपा—बसपा को भी वोट किया है।

Mar 10, 2017

सैफुल्ला के पिता ने की जांच की मांग

भाई ने उठाए पुलिसिया दावे पर सवाल

लखनऊ के ठाकुरगंज में आतंकी होने के आरोप में मारे गए सैफुल्ला के पिता सरताज ने बेटे के इनकाउंटर के जांच की मांग की है। उनका कहना है कि बेटे के आतंकी होने की खबर मीडिया से मिली। सच्चाई क्या है, यह तो जांच से ही पता चल सकता है..... 

रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बातचीत करते सैफुल्ला के भाई और पिता
उन्होंने यह भी कहा, 'अत्यधिक दबाव के चलते मैंने बेटे की लाश लेने से मना कर दिया, पर मैं मीडिया के सामने बार-बार पूरे मामले की जांच की मांग करता रहा। मीडिया ने उसे प्रसारित नहीं किया।'

रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बात करते हुए सैफुल्ला के पिता ने बार—बार कहा कि मैं अभी भी बहुत दबाव महसूस कर रहा हूं। हालांकि आतंक के मामले में फर्जी ढंग से फंसाए गए लोगों की कानूनी मदद करने वाले संगठन 'रिहाई मंच' ने सैफुल्ला के परिजनों से मुलाकात कर उन्हें किसी के भी दबाव में न आने की बात कही। रिहाई मंच की ओर से मंच के अध्यक्ष एडवोकेट मो0 शुऐब, महासचिव राजीव यादव, शबरोज मोहम्मदी, प्रियंका शुक्ला, शरद जायसवाल, गुंजन सिंह, सेराज बाबा, फिरदौस सिद्दीकी, एखलाक चिश्ती, रजीउद्दीन और परवेज सिद्दीकी कानपुर गए थे। 

कानपुर में सैफुल्ला के घर दौरे पर गए रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बातचीत में सैफुल्ला के भाई खालिद ने बताया कि किसी ने उन्हें फोन करके अपने को पुलिस अधिकारी बताया और कहा,  तुम अपने भाई को समझाओ। हम तुम्हारी उससे बात करवाते हैं वो सरेंडर नहीं कर रहा है और शहादत देने की बात कर रहा है। इसके बाद खालिद ने बदहवासी में अपने भाई से जोर-जोर से सरेंडर कर देने की बात करता रहा, लेकिन उधर से कोई आवाज नहीं आ रही थी, जिसके बाद फोन कट गया।'

रिहाई मंच के पूछने पर कि उसे आपको भाई की आवाज सुनाई दे रही थी तो सैफुल्ला के भाई खालिद का जवाब था, 'भाई की आवाज नहीं सुनाई दे रही थी। सिर्फ गोलियों की आवाज ही सुनाई दे रही थी।' 

रिहाई मंच के अध्यक्ष और लखनऊ हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील मोहम्मद शोएब कहते हैं, 'सैफुल्ला के कानपुर​ स्थित घर जाने से पहले हमारी टीम ने लखनऊ के ठाकुरगंज स्थित कथित मुठभेड़ स्थल का दौरा कर स्थानीय लोगों से बातचीत की।' 

मोहम्मद शोएब के अनुसार, 'पुलिस ने लाउडस्पीकर पर सैफुल्ला के आत्मसमर्पण करने की बात कहने का दावा किया है। लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। सवाल उठता है कि तब पुलिस यह दावा क्यों कर रही है? क्या ऐसा करके वो इस कथित मुठभेड़ में हुई हत्या को विधिपूवर्क पूरा किए गए अपने कथित काउंटर अटैक का तार्किक परिणाम बताना चाहती है?' 

Feb 28, 2017

गुरमेहर कौर से डरने लगे हैं अमित शाह

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को अंदाजा नहीं था कि एक अकेली लड़की गुरमेहर कौर भाजपा के लिए इतनी बड़ी चुनौती बन जायेगी। अन्यथा वह विद्यार्थी परिषद वालों को चूं तक नहीं करने देते। लेकिन अब मामला हाथ से बाहर जा चुका है और उनको उत्तर प्रदेश के शहरी मतदाताओं के छिटकने का डर सता रहा है....


दरअसल, भाजपा को लगा था कि पार्टी को उत्तर प्रदेश के पश्चिम में जाटों के विरोध के कारण वोट का जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई पूर्वी उत्तर प्रदेश कर देगा। पर 15, 23 और 27 फरवरी के चुनाव में भाजपा कुछ खास नहीं कर पाई। आरएसएस ने कहा है हम सत्ता में नहीं आ रहे।

आखिरी बाजी के तौर पर अध्यक्ष अमित शाह ने 4 और 8 मार्च के चुनाव को माना। इसी के मद्देनजर अमित शाह ने अपना और सहयोगियों का लखनऊ से बोरिया बिस्तर समेटवाकर बनारस पहुंचवा दिया।

पर पार्टी सूत्र बता रहे हैं, अब अमित शाह का सपना पूरा होने का चांस कम लग रहा है। शहरी वोटरों में कारगिल शहीद की बेटी की चर्चा है। दूसरी पार्टियों के समर्थक हर तरफ शहीद की बेटी का माहौल बना रहे हैं। कारगिल शहीद की बेटी होने की वजह से भाजपा प्रचारक मुश्किल में हैं क्योंकि यह शहीद, सेना, शहादत, बॉर्डर इनके लिए हॉट केक होते हैं।

प्रांत की जिम्मेदारी निभा रहे एक आरएसएस से जुड़े जानकार का कहना है, अमित शाह और उत्तर प्रदेश की टीम दिल्ली में फोन पर फोन किये जा रही है कि लड़की के मामले को समेटो। इसी के तहत एबीवीपी ने अपनी ओर से कारगिल शहीद की बेटी को गाली और बलात्कार की धमकी देने वालों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराने की कोशिश की है। पर बवाल और सामूहिक और व्यापक होता जा रहा है। गृहराज्य मंत्री ने उल्टा बोलकर बड़ी मुश्किल खड़ी हो गयी है। यह हमारे लिए बहुत बड़ी चुनौती है।

मैंने उनसे पूछा, आप ऐसा कैसे मान रहे हैं? और बीजेपी ने उल्टा बोला ही क्यों? उन्होंने कहा, 'भाजपा की सामान्य रणनीति चढ़ बैठने की है। जब न संभले फिर नरम होना है। भाजपा ने यह आरएसएस से उधार लिया है। पर आज हमेशा नहीं चल सकता।

उन्होंने आगे कहा, 'आज ही बीएचयू की महिला शाखा बनारस शहर में प्रचार करने गयी थी। लोगों ने कारगिल की बेटी पर सवाल पूछ-पूछ कर मुश्किल कर दिया। बनारस के रविन्द्रपुरी के एक महिला होस्टल से लड़कियों ने भाजपा प्रचारकों को भगा ही दिया।'

Jan 29, 2017

पंजाब हारेंगे तो केजरीवाल जिम्मेदार


पंजाब में चुनाव प्रचार अपने पूरे चरम पर है । किसी समय इकतरफा आम आदमी पार्टी की झोली में जाते दिख रहे पंजाब में कांग्रेस ने तेजी से ना सिर्फ वापसी की है, बल्कि पंजाब के राजनीतिक हलकों और जनता की  बहस में कांग्रेस की सरकार बनने के भी कयास  लगाए जा रहे हैं।

आप कार्यकर्ताओं की मानें तो पंजाब में आम आदमी पार्टी की इस हालत के लिए अरविन्द केजरीवाल खुद जिम्मेवार हैं। पिछले लोकसभा चुनावों में  जब अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी थी, यहां तक कि दिल्ली में भी उनकी पार्टी बुरी तरह हारी, ऐसे में पंजाब ने अप्रत्याशित रूप से 4 लोकसभा सांसद देकर मरणासन्न पड़ी पार्टी में न सिर्फ  संजीवनी बूटी देकर बचाने का काम किया, बल्कि कांग्रेस और अकाली में से किसी एक को हर बार चुनने को मजबूर जनता के सामने एक नया विकल्प पेश किया.

जनता ने आप को हाथोंहाथ लिया। हजारों की संख्या में नए कार्यकर्ता बने, जिन्होंने पंजाब में अपने स्थानीय नेतृत्व में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए काम करना शुरू किया। इनमें से जस्सी जसराज भगवंत मान ,एच एस फुलका, डॉ. धर्मवीर गांधी लोकप्रिय नेता बनके उभरे।  वहीं से आगामी मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन होगा, इसको लेकर चर्चाएं और गुटबाजी शुरू हो गई । पार्टी के पिछले लोकसभा चुनावों में प्रत्याशी रहे पार्टी के एक सदस्य ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि कुछ एक हिस्सों को छोड़कर  पंजाब में किसी पार्टी की लहर नहीं है और इस समय पार्टी को कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिल रही है ।

केजरीवाल को पिछले 2 सालों से एक ही चिंता सताए जा रही है कि कहीं ऐसा न हो कि आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद पंजाब का नेतृत्व उन्हें दरकिनार कर दे। उनका सारा ध्यान इसी में लगा रहा कि पंजाब के उभर रहे नेताओं का कद किस तरह कम किया जाए और कैसे चुनावों के बाद पंजाब सरकार हर काम  दिल्ली हाईकमान के निर्देशानुसार करे। इन्हीं सब कारणों से पार्टी को पंजाब में गंभीर नुकसान पहुँचने के कयास लगाए जा रहे हैं।

केजरीवाल की सबसे बड़ी गलती थी पंजाब के स्थानीय नेतृत्व को बड़े कद का होने से रोकना और पंजाब के हर निर्णय को खुद बिना स्थानीय नेतृत्व से सलाह किए बिना पंजाब पर थोपना। इसी से नाराज होकर पंजाब के एक बड़े नेता एच एस फुल्का जिनका नाम उस समय मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में था पार्टी के सभी पदों  व सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। पंजाब के इस समय पार्टी के सबसे बड़े नेता भगवंत मान का एक ऑडियो क्लिप आया था, जिसमें वे पटियाला के सांसद धर्मवीर गांधी को पंजाब और स्थानीय नेतृत्व को लेकर केजरीवाल की जमकर आलोचना कर रहे हैं।

पंजाब को पूरी तरह दिल्ली के नियंत्रण में रखने के लिए पंजाब के आब्जर्वर संजय सिंह और दुर्गेश पाठक को ख़ास निर्देशों के तहत ऐसे नए चेहरों की तलाश करने के लिए कहा गया, जो किसी भी तरह से स्थानीय नेताओं के प्रभाव में न हो। यहां तक कि युवाओं का घोषणापत्र जिसमें स्वर्ण मंदिर पर झाड़ू की तस्वीर थी, पंजाब में बिना किसी को दिखाए बिना पंजाब में  किसी से सलाह मशविरा किए दिल्ली से जारी किया गया और नाराजगी दिखाने पर प्रदेश संयोजक सुचा सिंह छोटेपुर को दिल्ली की टीम ने साजिश के तहत बाहर किया गया । 

आप पंजाब के एक बड़े नेता और भटिंडा से लोकसभा के उम्मीदवार जस्सी जसराज ने इन दोनों पर बड़ा आरोप लगाया। पार्टी के पुराने मेहनतकश कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर सिर्फ पैसे और रसूख के दम पर लोगों को पार्टी में ऊँचे पद देने का इल्जाम लगाया. उन्होंने टिकट वितरण में भी इन दोनों नेताओं पर बड़े पैमाने पर भ्र्ष्टाचार करने और पैसे के बदले टिकट देने का आरोप लगाया ।

उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में  पुराने कांग्रेस और अकाली नेताओं जिन्होंने  पूरी उम्र भ्र्ष्टाचार करके पैसा कमाया है और जिनका जनसंघर्षों से दूर दूर तक कोई नाता नहीं रहा जो चुनाव से थोड़ा वक़्त पहले ही टिकट के लिए आए हैं और जिन्होंने लोकसभा चुनावों में पार्टी को वोट देना तो दूर आम आदमी पार्टी के खिलाफ जनता में जमकर जहर उगला था वे कैसे ईमानदार हो गए । पार्टी में 50 से ज्यादा ऐसे लोगों को टिकट दिया गया है जो या तो लंबे समय तक  अकाली या कांग्रेस पार्टी और सरकार में मलाईदार पदों पर रहे हैं या बस अपने पैसे और रसूख के दम पर टिकट के आश्वासन पर चुनावों से कुछ समय  पहले पार्टी में आए हैं 

पार्टी के अन्य  नेताओं का कहना है केजरीवाल से इस तरह की बेवकूफियों और गलतियों  की उम्मीद नहीं थी. पंजाब में नियुक्त 52 ओबजरवेर्स में से 50 को पंजाबी न बोलनी आती है ,न वे समझ सकते हैं, न ही उन्हें पंजाब की राजनीति के बारे में कुछ पता है। जिस कारण यहां के कार्यकर्ताओं और दिल्ली से भेजे गए आब्जर्वर के बीच एक बड़ी संवादहीनता रही है और वो कार्यकर्ताओं व आम जनता में काम करने की बजाए चमचों के साथ सैर सपाटा और अय्याशी करते रहे।

 यही नहीं जो भी कार्यकर्ता दिल्ली फ़ोन करके अपनी समस्या बताते रहे या दिल्ली अपनी बात रखने के लिए गए, पार्टी के उदासीन और दिल्ली के सरकारी नौकरशाही जैसे रवैये से वो नाराज होकर घर बैठ गए.  अभी भी पार्टी के कार्यकर्ताओं में संजय सिंह और दुर्गेश पाठक के प्रति जमकर गुस्सा है, जिनके  कार्यकर्ताओं के लिए दर्शन हमेशा दूभर रहे।  अपने पूरे प्रवास के दौरान पांच सितारा सुविधाओं वाली जगह पर ही रुकते थे। दोनों में से शायद ही किसी ने दलित बस्ती या आम गरीब जनता के बीच रात बिताई हो। खबर ये भी है चुनावों के बाद इन दोनों को पंजाब की राजनीति से अलग कर दिया जाएगा।

पर केजरीवाल के लिए इस समय  सबसे बड़ी चिंता भगवंत मान हैं, जो केजरीवाल की लाख कोशिशों के बाद भी कार्यकर्ताओं में मुख्यमंत्री का सबसे बड़ा और लोकप्रिय चेहरा हैं। चुनाव कुछ दिन दूर हैं, पर अभी भी मुख्यमंत्री कौन होगा, ये आम आदमी पार्टी की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल है। पार्टी के सूत्रों का कहना है केजरीवाल या तो खुद मुख्यमंत्री बनेंगे या दिल्ली के अपने किसी ऐसे कृपापात्र को बनाएंगे, जिसके जरिए वो स्थानीय नेतृत्व को हमेशा अपने नियंत्रण में रख सकें, ताकि पार्टी व पंजाब के वही सुप्रीमो बने रहें।


वैसे उनका दिल्ली के विधायक जरनैल सिंह को पंजाब में चुनाव लड़वाना इसी ओर इशारा करता है । आम आदमी पार्टी पंजाब जीते या हारे, दोनों स्थितियों में पंजाब का स्थानीय नेतृत्व केजरीवाल से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है । 

Nov 9, 2016

तुगलकी फैसला पर स्वागतयोग्य

बाकि पार्टियों की तरह भ्रष्ट भक्तों और कालाबाजारी के समर्थन वाली बीजेपी के नेता भी अंदरखाने में मोदी को वही कह रहे हैं जो कॉमरेड और कांग्रेसी लोग कह रहे हैं। सब कम समय की दुहाई दे रहे हैं और मोदी को तुगलक बता रहे हैं।


तरुण शर्मा  


मंगलवार की शाम प्रधानमंत्री मोदी जब सेना के तीनों प्रमुखों के साथ बैठे तो एकबारगी लगा कि ये बेमौसम बरसात क्यों? मुल्क पर ऐसी क्या इमरजेंसी आ गयी कि देश के मुखिया को सेना प्रमुखों के साथ बैठना पड़े। ​फिर लगा कि संभव है मोदी सरकार की तमाम मोर्चों पर जारी असफलताओं के मद्देनजर वह पाकिस्तान पर हमले का कोई नया जुमला छोड़ें। 

भक्तों को छोड़ व्यापक जनता में यह पूर्वग्रह इसलिए भी है कि सरकार और भाजपा हर वादे के बाद उसे जुमला, कहानी या ऐवें ही बोल दिया था, कह देती है।

लेकिन इन तमाम अटकलों और आकलनों को परे ढकेलते हुए जब मोदी ने 500 और 1000 के नोट बंद करने की अचानक घोषणा कर दी तो देश हतप्रभ रह गया। यह एक फैसला ऐसा था जिसकी खबर मोदी कैबिनेट तक को नहीं थी, यहां तक कि बैंकों को भी नहीं। यही वजह है कि बीजेपी के छोटे—बड़े नेता अभी भी हैंगओवर में हैं कि ये क्या हुआ कि जिसकी उनको भनक ही नहीं थी। 

बाकि पार्टियों की तरह भ्रष्ट भक्तों और कालाबाजारी के समर्थन वाली बीजेपी के नेता भी अंदरखाने में मोदी को वही कह रहे हैं जो कॉमरेड और कांग्रेसी लोग कह रहे हैं। सब कम समय की दुहाई दे रहे हैं और मोदी को तुगलक बता रहे हैं। 

आप इस फैसले को तुगलकी कह सकते हैं। पर बेहद गोपनीयता और सही समय पर लिए गए इस फैसले के बाद उत्साह और बेहतरी की उम्मीद से जिस तरह देश भर गया वह जरूर 'ऐतिहासिक' था।  ऐसे में किसी के पास कुछ ठोस कहने को नहीं है पर आम आदमी खुश है कि चलो एक फैसला मोदी सरकार ने ऐसा किया है जिसके साथ हमारी भी बराबर की भागीदारी बनती है।

अब बात संशय पर। हो सकता है कि सरकार जैसा अभी कालेधन योजना पर नकेल कसने के जो कसीदे पढ़ रही है, वैसा कल को न हो। यह भी दिखावा मात्र बनकर रह जाए। दूसरी योजनाओं और सुधारों की तरह फेल हो जाए और कागजी साबित हो। पर हमारा सवाल यह है कि अभी से इस नकारात्मक चाह में खुद को पतले क्यों करते जाना है? अभी तो गलत नहीं लग रहा है। हां, गरीबों-मजदूरों की व्यापक आबादी को जरूर कुछ ​दिन मुश्किल के गुजारने होंगे, क्योंकि उनका जीवन कैश पर ही चलता है। 

पर आप यह भी तो देखिए कि कौन-सा ऐसा सुधार होता है जिसमें लोगों को मुश्किल नहीं झेलनी पड़ती है। याद है न आपको दिल्ली मेट्रो। कितनी मुश्किल झेलनी पड़ी दिल्ली वालों को। बहुत लोग अपने घरों से उजड़े, उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट होना पड़ा। पर आज सुविधा कौन उठा रहा है, घंटों की उमस और जाम से भरी दूरियों को मिनटों में कौन पूरा कर रहा है।  

इस फैसले पर तमाम तरह की बहस और चर्चाएं मीडिया और समाज में चल रही है आम आदमी व मध्यमवर्ग इस मुद्दे पर पुरजोर समर्थन के साथ मोदी की पीठ ठोकता नजर आ रहा है वहीं हैरत की बात यह है कि व्यवसाय के तमाम कालेधन के गढ़ शिक्षा व सवास्थ्य माफिया, प्रॉपर्टी व रियल एस्टेट कारोबारी, राजनीति से जुड़े हुए दलाल  इस पर खामोश हैं। वहीं कुछ वामपंथी  जिसके पास कालाधन तो क्या अपना खर्चा उठाने लायक पैसे नहीं है बिना तथ्य व जानकारी के फेसबुक पर मोदी विरोध व आलोचना की अपनी दैनिक दिनचर्या को जारी रखे हुए हैं. 

सरकार के इस फैसले से उम्मीद है प्रॉपर्टी व रियल एस्टेट जिसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कालेधन से गतिमान और संचालित होती है पर नकेल लगेगी और जनता को अपेक्षाकृत सस्ता आवास उपलब्ध होगा। घरेलू व्यापार जिसका एक बड़ा हिस्सा कालेधन से चलता है व्यापार  में नकदी की कमी दूर करने के लिए कीमतें कम करने के लिए मजबूर होगा और कालाबाजारी पर रोक लगेगी। 

इस फैसले के अलग-अलग पहलू हैं जिनकी आलोचनात्मक समीक्षा की जानी चाहिए. इसमें एक बड़ा सवाल है कि कुछ दिनों के लिए आम आदमी को इससे असुविधा होगी. नकदी संकट के चलते उसे दैनिक लेनदेन व रोजमर्रा की जरुरी चीजों की खरीद में परेशानी आएगी। आम आदमी की नकदी समस्या  पर .ध्यान देने के बजाए धैर्य से काम ले।  मीडिया के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह जनता में फ़ालतू की हड़बड़ी और खलबली पैदा करने कि बजाए  कालाधन सफ़ेद करने के तरीके खोज रहे कालाधन सरगनाओं की तिड़कमों का पर्दाफ़ाश करे और ये सुनिश्चित करे कि भ्रष्ट राजनीतिक नेतृत्व और कालेधन के व्यापारी बैंकिंग व्यवस्था में सांठ गाँठ से न दिखने वाला कोई सेफ पैसेज खोज लें।