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Jun 19, 2017

राष्ट्रपति बनाने की रबर स्टांप परंपरा कायम

मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में....
बिहार के राज्यपाल और कानपुर वासी रामनाथ कोविंद होंगे एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कौन हैं रामनाथ कोविंद, कहां से लाए गए यह रबर स्टांप।
पूर्व आइएएस अधिकारी कोविंद का राष्ट्रपति बनना लगभग तय। राष्ट्रपति पद के लिए कोविंद का नाम आते ही लोग खोजने लगे गूगल पर उनकी कोविंद की जाति।

अगर बने तो कोविंद होंगे देश के दूसरे दलित राष्ट्रपति। इससे पहले दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले के आर नारायणन रह चुके राष्ट्रपति।
उपराष्ट्रपति के नाम पर अभी कोई चर्चा नहीं है। पर संभावना है कि दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद भाजपा उपराष्ट्रपति के लिए महिला सवर्ण नाम को प्राथमिकता देगी। माना जा रहा है दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद मोदी सरकार ने राष्ट्रपति पद के दूसरे दावेदारों के मुंह पर जाबी लगा दी है।
मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में। मीडिया ने मेट्रो मैन श्रीधरण के नाम पर भी लगाई थीं अटकलें।
बीजेपी ने एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का सोमवार को ऐलान कर दिया। दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बिहार के गवर्नर रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया गया है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कोविंद के नाम का ऐलान करते हुए कहा कि कोविंद को हमने इसलिए चुना है कि पार्टी गरीब समाज से ताल्लुक रखने वाले शख्स को राष्ट्रपति बनाने की तैयारी में थी।
कानपुर देहात में पैदा हुए कोविंद बीजेपी दलित मोर्चा के अध्यक्ष रह चुके हैं। यूपी से दो बार राज्यसभा गए हैं। पेशे से वकील कोविंद ऑल इंडिया कोली समाज के अध्यक्ष भी रहे हैं।

Jun 12, 2017

समोसा बेचे या चाय कोई काम मीडिया की निगाह में छोटा कैसे है

अगर गरीबों की तादाद ज्यादा है, तो उसके प्रतिनिधि क्‍यों तमाम अमीर लोग होते जा रहे हैं। अखि‍र इस करोड़पति तंत्र को लोकतंत्र लिखने की क्‍या मजबूरी है मीडिया की.... 

कुमार मुकुल

देश के तमाम छोटे—बड़े मीडिया समूह एक खबर चला रहे हैं कि 'आईआईटी में समोसे बेचने वाले का बेटा'। यह क्‍या तरीका है खबरें बनाने का। कल को अमित शाह जैसे राजनीतिज्ञ इसे 'बनिये का बेटा बना आईआईटीयन' कह सकते हैं। जब वे गांधी को बनिया कह सकते हैं, तो फिर उनसे और क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है। 


आखिर यह मीडिया राजनीतिज्ञों की भ्रष्‍ट भाषा को अपना आधार क्यों बना रहा है। यह प्रवृत्ति इधर बढती जा रही है। किसी भी सफल युवा को उसके आर्थिक हालातों के लिए सार्वजनिक तौर पर शर्मिंदा करना, जैसे जरूरी हो गया है। समोसा बेचे या चाय कोई काम मीडिया की नजर में छोटा क्‍यों है। केवल पैसे वालों के ही बेटे क्‍यों बढ़ें आगे। 

जाति, पेशे, धर्म, गरीबी आदि के आधार पर बांटने की राजनीतिज्ञों की बीमारी को मीडिया आखिर क्‍यों हवा दे रहा। एक ओर गुड़, तेल, चूरन बेचने वाले रामदेव को मीडिया योगीराज बताता है, जबकि रामदेव खुद अपना टर्नओवर (मुनाफा) बताते हुए खुद को मुनाफाखोर घोषित करते हैं। 

अगर वाकई यह लोकतंत्र है तो यह सहज होना चाहिए कि गरीब आदमी जिसकी संख्‍या ज्‍यादा है, उसको हर जगह ज्‍यादा जगह मिलनी चाहिए। खबर तो यह होनी चाहिए कि इस बार भी मुट्ठीभर अमीरजादों ने तमाम पदों पर कब्‍जा कर लिया।

संसद में साढ़े चार सौ के आसपास करोड़पति हैं। यह सवाल बार-बार क्‍यों नहीं उठाया जाता कि भारत में अगर गरीबों की तादाद ज्यादा है, तो उसके प्रतिनिधि क्‍यों तमाम अमीर लोग होते जा रहे हैं। अखि‍र इस करोड़पति तंत्र को लोकतंत्र लिखने की क्‍या मजबूरी है मीडिया की।