May 6, 2017

रविदास की मूर्ति तोड़कर महाराणा प्रताप की मूर्ति लगाना था मकसद, दलित नहीं झुके तो फूंक दी उनकी पूरी बस्ती

फिजा में था कि जब विधायक राजपूत, मुख्यमंत्री राजपूत फिर देखते हैं कौन बचाता है चमारों के इस देवता को। हाथ में तलवार और बल्लम लिए राजपूत युवा नारा लगा  रहे थे, महाराणा प्रताप की मूर्ति वहीं लगेगी जहां से उखड़ेगा रविदास। और यह सबकुछ हो रहा था स्थानीय भाजपा विधायक बृजेश सिंह की उपस्थिति में। 

शब्बीरपुर गांव में फूंका गया ​दलित का घर

शब्बीरपुर गांव से तसलीम कुरैशी की रिपोर्ट

जी हां। यही हकीकत है कल की घटना का पर इसे कहने और बोलने से प्रशासन और स्थानीय विधायक बच रहे हैं। स्थानीय विधायक बृजेश सिंह घटना के मौके पर मौजूद थे पर अब वे इससे इनकार कर रहे हैं और बता रहे हैं कि वे इस आगजनी और हिंसा की घटना के वक्त गाजियाबाद के नेहरुनगर भाजपा कार्यालय में दीनदयाल उपाध्याय की जयंती मना रहे थे।

पर गाजियाबाद के नेहरु नगर कार्यालय पर हुई बातचीत में आॅफिस कर्मचारी ने कहा कि कल यहां दीनदयाल उपाध्याय पर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है। भाजपा के नेहरु नगर कार्यालय प्रभारी के प्रभारी मेहश शर्मा ने भी देवबंद विधायक की दी गयी जानकारी को गलत साबित किया।

महेश शर्मा ने बताया, 'दीनदयाल उपाध्याया जयंती के मौके पर 5 मई को कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है, बल्कि कल 7 मई को गाजियाबाद के कृ​ष्णा इंजीनियरिंग कॉलेज में दीन दयाल उपाध्याय पर कार्यक्रम है। पूरे जिले में कई जगहों पर कार्यक्रम रखे गए हैं।'

गांव में वाल्मिकी मंदिर, नीचे के फोटो में रविदास की उखाड़ दी गयी मूर्ति। नीचे वीडियो  देखें


इतनी बड़ी घटना के बाद हर तरफ चुप्पी का माहौल है। कल दोपहर के बाद से गांव में मीडिया को नहीं जाने दिया जा रहा है, जबकि वीडियो को देख आपको साफ समझ में आ जाएगा कि गांव श्मशान में तब्दील हो चुका है और दलित गांव छोड़कर भाग चुके हैं।

लेकिन 'कैलाश पर संजीवनी बूटी' खोजने वाली मीडिया को यह सब नहीं पता चल पा रहा है। पर हम आपको एक—एक कर बताएंगे कि असल में सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में महाराणा प्रताप की ​जयंती मनाने के पीछे असल मकसद क्या था, क्यों तोड़ी गयी रविदास की मूर्ति और कैसे एक राजपूत जाति से ताल्लुक रखने वाले युवक की हुई मौत।

सबसे पहले महाराणा प्रताप की शोभायात्रा
सहारनपुर के बड़गांव थानाक्षेत्र के शब्बीरपुर गांव में 5 मई की दोपहर महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर शोभायात्रा निकली। यह शोभायात्रा कुछ दूसरे गांवों से होकर शब्बीरपुर पहुंची थी। शोभायात्रा में रसूलपुर टांक, रनखंडी, जडौदा जट, बहैला, गलौली, सिमलाना, महेशपुर समेत कई गांवों के राजपूत जाति के लोग शामिल थे। शोभायात्रा बैंडबाजा और डीजे के साथ चली शब्बीरपुर गांव में बढ़ी चली आ रही थी जिसमें तलवार लिए दो दर्जन से ऊपर नौजवान और घोड़ों पर सवार लोग थे। शोभायात्रा में शामिल ज्यादातर लोगों ने साफा बांध रखा था जिनकी उम्र 15 से 25 वर्ष के बीच थी।



शब्बीरपुर गांव में ही क्यों हुआ विवाद
आसपास के सभी गांवों में राजपूतों की मजबूत पकड़ है पर शब्बीरपुर गांव में मात्र 15—20 राजपूत परिवार होने के चलते वो वहां जातीय रसूख का वैसा इस्तेमाल नहीं कर पाते, जैसा दूसरे गांवों में करने की उनको परंपरागत आदत है। शब्बीरपुर में वाल्मिकियों और चमार जाति के परिवारों की संख्या 100 से ऊपर है। संख्याबल इसी ताकत के कारण ग्रामीणों ने मायावती के शासन में गांव के पश्चिम में रविदास की एक मूर्ति लगाई। उस समय भी राजपूतों ने रविदास की मूर्ति लगाए जाने का विरोध किया था। पर कुछ कर नहीं पाए थे​ जिसकी कसक तभी से चली आ रही थी। लेकिन भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जाति राजपूत होने के कारण उन्हें बल मिला। दूसरा स्थानीय देवबंद विधायक बृजेश सिंह भी राजपूत हैं। ऐसे में इस बार आसपास के गांवों के राजपूतों ने इसे नाक का सवाल बनाकर मोर्चा लिया।



पत्थरबाजी से बढ़ा तनाव
अभी सहारनपुर के सड़क दूधली प्रकरण की आग शांत भी नही हुई थी कि एक और गाँव को उपद्रवियों ने आग के हवाले कर दिया। शब्बीरपुर गांव में तलवार से सजी शोभायात्रा जब पहुंची तो दलितों ने आवाज कम करने को कहा और शांतिपूर्ण ढंग से जाने को ताकीद किया। पर दलितों के इस सुझाव पर पहले से ही मोर्चा लेने की तैयारी से आए राजपूत जाति के युवा भड़क गए। हवा में तलवार लहराते हुए उन्होंने दलितों को चुनौती दी। दलितों की ओर पत्थरबाजी शुरू हुई। पत्थरबाजी में राजपूत जाति का 26 वर्षीय युवक घायल हो गया जिसकी नानौता पीएचसी अस्तपाल में मौत हो गयी।



फिर गांव श्मशान में बदल गया
पत्थरबाजी के बाद रसूलपुर टांक, रनखंडी, जडौदा जट, बहैला, गलौली,सिमलाना, महेशपुर से बदला लेने के लिए राजपूतों का रेला चल पड़ा। उन्होंने पूरे शब्बीरपुर गांव को चारों ओर से घेर लिया और एक तरफ से दलितों के घरों को फूंकना शुरू कर दिया। आप वीडियो में भी देख सकते हैं आग कितनी भयावह है। देवबंद कोतवाल चमन सिंह चावड़ा समेत दर्जनभर लोग दोनों ओर से घायल हुए। भीड़ ने एडीएम को कब्जे में लिया।

क्या है ​दलितों का हाल
आगजनी और हिंसा के बाद मीडिया की पाबंदी के बाद गांव में दलितों का क्या हाल है, यह बात बाहर नहीं आ पा रही है। लेकिन आग और हिंसा को देख दलितों के साथ क्या गुजरा होगा इसकी भयावहता समझी जा सकती है।

May 5, 2017

'माओवादियों ने राजनीति के लिए सबसे निरीह लोगों को चुना'

वरिष्ठ पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी ने माओवादी प्रवक्ता को लिखा खुला खत, कहा आपने बस्तर के आदिवासी को लड़ना सिखाया, इसके लिए इतिहास आपको साधुवाद देगा पर अब आदिवासियों के कंधों पर बंदूक लादना बंद करो...पढ़िए पूरा पत्र



 प्रिय वासु 

पिछले हफ्ते बहुत दिन बाद आपकी आवाज़ सुनकर अछा लगा. आपने माओवादी प्रवक्ता की तरह किसी अज्ञात स्थान से एक ऑडियो विकल्प के नाम से भेजा. पहले तो लग रहा था वह ​किसी और की आवाज़ है पर धीरे धीरे स्पष्ट होता गया कि वह आपकी ही आवाज़ है. हो सकता है वह आपकी आवाज़ न हो. न विकल्प आपका सही नाम है और न वासु, पर आपके आंदोलन के 50वीं वर्षगाँठ पर कुछ बात आपसे करना ज़रूरी हैं।

पिछले दिनों 26 जवानों को एक हमले में मारकर आपका आंदोलन एक बार फिर देश में चर्चा में है. आपने अपने ऑडियो संदेश में कहा है कि सुरक्षा बल के जवानों के द्वारा पिछले दिनों आम आदिवासी पर किये गए “पाशविक अत्याचार” का बदला लेने के लिए आपकी पार्टी ने यह हमला किया. 50 की उम्र सिर्फ इस तरह के हमले और प्रतिहमले के लिए ही होती है?

आप और हम एक दूसरे को अब लगभग 30 साल से जानते हैं। एक पत्रकार की तरह आप माओवादी आंदोलन में मेरे पहले संपर्क सूत्र थे. एक राजनीतिज्ञ की तरह आपके जज्बे और समर्पण को मैं अब भी सलाम करता हूँ, आप सभी बहुत मेहनती हैं, पर आपकी यह मेहनत आपको, आपकी राजनीति को और आपका साथ देने वाले आदिवासियों को कहाँ लेकर जा रही है? 

आपके बड़े नेता मुझे कहते हैं कि अगले 50 साल में पूंजीवाद अपने ही बोझ तले ध्वस्त हो जाएगा तब आपकी राजनीति एक विकल्प की तरह सामने होगी। यह एक बेहद विवादास्पद सोच है. उस समय तक आप और मैं दोनों नहीं होंगे, पर जिन आदिवासियों के कंधे पर बंदूक रखकर आप यह प्रयोग कर रहे हैं वे कहाँ होगे? क्या वे आपकी जनताना सरकार के कब्ज़े में पूंजीवादी व्यवस्था से बेहतर स्थिति में होंगे? 

आप एक नव लोकतांत्रिक क्रांति के लिए लड़ रहे हैं. आप कहते हैं उसके बाद समाजवाद आएगा और उसके भी बाद कम्यूनिज्म और यह सब आप आम जनता की भलाई के लिए कर रहे हैं। दुनिया में बेहतर लोकतंत्र के लिए तरह-तरह के प्रयोग हो रहे हैं. वे प्रयोग भी अधिक सफल नहीं हैं, पर मुझे लगता है तकनीक की मदद से किए जा रहे कुछ प्रयोग आपके प्रयोग से तो अधिक आशा जगाते हैं।
 
आपके बड़े नेता आज भी फ्रांस की क्रांति के युग में ही जी रहे हैं और उसके ही सपने बेच रहे हैं. फ्रांस में इस समय कई चरण में चुनाव हो रहे हैं और बेहद असमंजस की स्थिति है, वहां जनता को नवफासीवाद और नवउदारवाद के बीच ही चुनाव करना है. पर वहां इस पर खासी बहस हो रही है और आशा है इन सब जददोजहद के बीच पूरी मानव जाति के लिए धीरे धीरे बेहतर रास्ते निकलेंगे कि हमारी राजनीति कैसी होनी चाहिए।
 
आपने अपनी राजनीति के लिए जंगल की खामोशी, लुका-छुपी और दुनिया के सबसे निरीह लोग को चुना है जहां बहस की गुंजाइश लगभग शून्य है। आज 50 साल बाद भी आदिवासी और महिला आपकी सर्वोच्च समितियों में नहीं हैं। जब हम जैसे उच्च वर्ग के लोग आपकी पार्टी में आने लगभग बंद हो गए हैं और जब आपके सभी उम्रदराज़ नेता थोड़े साल में एक के बाद एक मर जाएंगे तब पार्टी का दिशा निर्धारण कौन करेगा? या आप आदिवासियों को गंभीरता से सुनना शुरू करेंगे?

हमने सुना है सुकमा हमले के बाद 100 से अधिक स्थानीय आदिवासियों पर मुकदमा दर्ज हुआ है। आशंका है कि जैसे ही मेहमान पत्रकारों का दल वहां से हटेगा, उन पर फिर से अकथ्य अत्याचार शुरू होंगे और फलस्वरूप आपकी ताकत और बढ़ेगी और आप फिर से एक और बड़ा हमला करेंगे। हमारी तरफ तो कल्पनाशीलता को जैसे कैंसर हो गया है, पर आप सोचने—समझने वाले तथाकथित क्रांतिकारियों की सोच को लकवा मारा हुआ है?

सरकार की गलत नीतियों के कारण बस्तर के आदिवासी आपके वहां आने के 10 साल बाद आप से जुड़ना शुरू हुए थे और जहां तक मेरी जानकारी है, अब वे आपका साथ छोड़ने का मन बना रहे हैं. माओ देवता के पोंगापंथी पुजारी और आपके अधिकतर दाम्भिक और भ्रष्ट बड़े नेताओं से तो मुझे कोई आशा नहीं है, पर आप जैसे मध्यम दर्जे के नक्सली नेता इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आप आदिवासियों को अपना रास्ता चुनने का मौक़ा देंगे?

आपने बस्तर के आदिवासी को लड़ना सिखाया, इसके लिए इतिहास आपको साधुवाद देगा, पर जब आज आपका आंदोलन कहीं आगे बढ़ता नज़र नहीं आता तो इस 50 साल की जददोजहद के बाद जिन लोगों ने आपका सबसे अधिक साथ दिया या उनके लिए कुछ हासिल करना एक बेहतर राजनीतिक उद्देश्य नहीं लगता? लिट्टे का उदाहरण सामने है. 72 की तरह ही, शहर को घेरने के बजाय आप एक बार फिर से घिरते नज़र आ रहे हैं।

आपका 99 फीसदी आदिवासी कैडर अपने जल, जंगल, जमीन और स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहा है जो अधिकार इस देश के संंविधान के तहत उनको दिए हुए हैं। क्या आप अपनी ताकत में समझ जोड़कर कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि इसी सड़ी-गली व्यवस्था में जनतांत्रिक तकनीक की मदद से भारत के अच्छे लोगों को जोड़कर एक ऐसी संख्या बनाई जाए कि भारत का लोकतंत्र उसके बहुसंख्य गरीबो की बेहतरी के लिए काम करे? यह बंदूक लेकर लड़ने से अधिक कठिन काम है।

मेरे एक संगीतज्ञ मित्र थे जब उनको किसी साथी कलाकार की बुराई करनी होती थी तो वे कहते थे “वह बहुत मेहनती है”| जाहिर है सिर्फ मेहनत से अच्छा संगीत नहीं तैयार होता। इतनी विषम परिस्थितियों भी आप बड़े—बड़े हमले करने की क्षमता रखते हैं, इससे घोर असहम​ति के बावजूद आपकी मेहनत काबिल-ए-तारीफ है, पर कुछ कालजयी करने के लिए मेहनत के साथ सोच जरूरी होती है। ये ठीक है कि कॉमरेड कभी नहीं थकता, पर थोड़ा आराम करो वासु और अपने आदिवासी कॉमरेड के साथ थोड़ी और बात करो, बेहतर रास्ता वे ही सुझाएंगे...

 ( लेखक ने छत्तीसगढ़ के माओवादियों पर “उसका नाम वासु नहीं” नाम से एक किताब लिखी है जो माओवादी कार्यकर्ता वासु के जीवन पर आधारित है ) 

May 4, 2017

कश्मीर में उलटी पड़ी असलियत, 7 सालों में सबसे ज्यादा मोदी सरकार में मारे गए सैनिक

प्रधानमंत्री अपने भाषणों में दोहराते रहे हैं कि वह कश्मीर से आतंकवाद का सफाया कर देंगे, पर असलियत कुछ और ही सामने आ रही है। हर रोज सेना और नागरिकों में टकराहट बढ़ रही है, आतंकवादी हमले बढ़ रहे हैं और पत्थरबाजों की बढ़ती संख्या से राज्य में अमन चाहने वाले लोग हलकान में हैं। 

जनज्वार। साउथ एशिया टेरेरिज्म पोर्टल 'एसएटीपी' की रिपोर्ट के अनुसार जम्मू—कश्मीर में 2009 के बाद से सबसे ज्यादा सेना और सुरक्षा बलों के 88 जवान 2016 में मारे गए। वहीं इस वर्ष 2017 में 30 अप्रैल तक 15 जवान मारे जा चुके हैं। 


2016 में पिछले 7 सालों में सबसे ज्यादा सैनिकों का मारा जाना इसलिए भी आश्चर्यजनक है क्योंकि 2016 ही वह साल है जब प्रधानमंत्री मोदी ने तमाम मंचों से कहा कि वह कश्मीर में आतंकवाद का सफाया कर देंगे। नोटबंदी की शुरुआत 8 नवंबर और नोटबंदी का समय खत्म होने के दिन 31 मार्च को प्रधानमंत्री ने कहा कि आतंकवाद खत्म होगा। वैसे में उसी साल का आंकड़ा सबसे ज्यादा होना बताता है कि सरकार और जनता, भाषण और असलियत में फर्क लंबा है। 

इन आंकड़ों से साफ है कि मोदी सरकार जैसे वादे कर रही है वैसे परिणाम देखने को नहीं मिल रहे, अलबत्ता सेना के जवानों की कुर्बानी बढ़ती जा रही है और साथ ही कश्मीर में तनाव भी बढ़ता जा रहा है। 

एसएटीपी के आंकड़ों के अनुसार 1990 से लेकर 2007 के बीच औसत 800 नागरिक हर साल मारे जाते रहे, जो अब कम हो गया है। 2016 में सिर्फ 14 आम ना​गरिक सेना और आतंकियों के हमलों और मुठभेड़ों में मारे गए। 

य​​ह आंकड़़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि बीएसएफ की 200वीं बटालियन के हेड कांस्टेबल प्रेम सागर और सेना के 22वें सिख रेजिमेंट के नायब सूबेदार परमजीत सिंह की पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा भारतीय सीमा में घुसकर हत्या कर दिए जाने के बाद सरकार तरह—तरह के वादों से आम जनता को उद्वेलित कर भ्रम में डाल रही है। 

भ्रम की इन स्थितियों के कारण कश्मीर के बाहर की जनता जहां कश्मीरियों को देश को दुश्मन और आतंकियों का दोस्त समझने लगी है तो कश्मीर के व्यापक आवाम में फिर से यह भाव बढ़ता जा रहा है कि भारत हमारा देश नहीं हो सकता। 

यही वजह है कि कश्मीर और घाटी के दूसरे जिलों में राष्ट्रविरोधी नारा लगाने वालों की संख्या दिन—प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। पहले जहां प्रदर्श​नकारियों और पत्थर फेंकने वालों में समाज के ज्यादातर अराजक तत्व या अलगाववादी विचारों शामिल हुआ करते थे, अब 2 महीनों से हो रहे प्रदर्शनों में स्कूली छात्रों और बच्चों व किशारों की संख्या बहुतायत में है।  

वर्ष 1990 से लेकर 2007 के बीच औसत 800 नागरिक हर साल मारे जाते रहे। हालांकि एसएटीपी के आंकड़ों के अनुसार पिछले 7 वर्षों में सबसे कम 14 ना​गरिक भी 2016 में ही मारे गए। इस वर्ष 30 अप्रैल तक आतंकवादी हमलों और मुठभेड़ों में सेना और सुरक्षा बलों के 15 जवान मारे जा चुके हैं। 

पिछले तीन दशकों में 1990 से लेकर 2010 तक कश्मीर में सर्वाधिक हिंसा हुई, पर 2011 इन वर्षों के मुकाबले अधिक शांतिपूर्ण रहा। 

7 वर्षों में  मारे गए सैनिकों  का आंकड़ा

वर्ष              मारे गए सैनिकों की संख्या
2009           78
2010           69 
2011           30 
2012           17
2013           61  
2014           51  
2015           41 
2016           88 
    

May 3, 2017

किशन पटनायक को टाइम्स आॅफ इंडिया ने बताया माओवादी, लिखा एनजीओ करेंगे प्रदर्शन

जिन्हें लगता है हिंदी पत्रकारिता में ही हैं केवल बकलोल, सांप्रदायिक और लालबुझक्कड़, मन से बात बनाने, बाइट चिपकाने वाले, तो वे पढ़ लें इन अंग्रेजी सूरमाओं की रिपोर्ट, पता चल जाएगा कितने पानी में है अंग्रेजी मीडिया, कैसे बनाता है झूठ का पुलिंदा




जनज्वार। दो पत्रकारों अभिषेक चौधरी और सौमित्र बोस के संयुक्त प्रयास से छपी इस रिपोर्ट को पढ़कर आप हंसी नहीं रोक पाएंगे। साथ ही आप मानने को मजबूर होंगे कि हिट्स, मुनाफे और सबसे पहले आने की जल्दबाजी में बड़े मीडिया संस्थान कैसे गैरजिम्मेदार पत्रकारिता पर उतर आए हैं और उसे बढ़ावा दे रहे हैं। उन्हें पाठकों की कोई परवाह ही नहीं है।

गैर जिम्मेदारी के पहले पायदान पर रहा टाइम्स आॅफ इंडिया और दूसरे पर रहा नई दुनिया। नई दुनिया में छपी राजेश शुक्ला की रिपोर्ट में तो बकायदा एक्सक्लूसिव भी लिखा हुआ है और हेडिंग लगी है 'डेढ़ करोड़ के इनामी रहे नक्सली लीडर किशनजी सीबीएसई के पाठ्यक्रम में।'

अंग्रेजी अखबार टाइम्स आॅफ इंडिया में महाराष्ट्र के नागपुर से 3 मई को ‘NCERT textbook has chapter on Naxalite leader Kishenji'  के नाम से एक रिपोर्ट छपी। अभिषेक चौधरी और सौमित्र बोस की ओर से लिखी गयी इस रिपोर्ट में अफसोस जाहिर करते हुए बताया गया है कि 10वीं कक्षा के छात्रों को एनसीआरईटी एक माओवादी किशनजी को पढ़ा रही है, जो कि नवंबर 2011 में कोबरा बटालियन द्वारा जंगलों में मारा गया। वह भी सामाजिक विज्ञान की पुस्तक राजनीतिक दल के सबसेक्शन ‘राजनीति की नैतिकता’ के अंतर्गत। 

10वीं के लिए एनसीआरटी द्वारा प्रकाशित पुस्तक सामाजिक विज्ञान — 2 की मूल कॉपी

एनसीआरटी को दोषी करार देते हुए पत्रकार लिखते हैं, ‘किताब में बकायदा किशनजी को महिमामंडित किया जा रहा है।’  रिपोर्ट में पत्रकार जिक्र करते हैं कि इस बात की जानकारी टीओआई को नागरिकों के एक समूह ने दी है। समूह का कहना है कि किताब आप आॅनलाइन डाउनलोड कर सकते हैं। 

फिर पत्रकार विस्तार से बताते हैं कि बताइए भला किताब में हमारे देश के कर्णधारों को उस किशनजी को पढ़ाया जा रहा है जो माओवादी नेता थे और कोबरा पोस्ट ने उन्हें झारखंड-बंगाल के बाॅर्डर पर 24 नवंबर 2011 को मार डाला था। पत्रकार यहीं नहीं रुकते, किशनजी पर किताब छपने के गुनाह का इतिहास भी बताते हैं। वे बताते हैं कि 2007 से यह किताब बच्चों को पढ़ाई जाती है।  

रिपोर्ट में 2007 लिखते हुए भी पत्रकारों की भक्तांधता नहीं डिगती कि कैसे एक जीवित आदमी जो कि भारत सरकार की निगाह में आतंकवादी था, उसकी जीवनी पढ़ाई जाएगी। 

बहरहाल, जोश आगे बढ़ता है। और दो पत्रकारों की मेहनत से तैयार यह रिपार्ट उस परिणति तक पहुंचती जब सीबीएसई की 10वीं कि किताब में किशनजी यानी चर्चित समाजवादी नेता किशन पटनायक के राजनीति रणनीति, उसकी तैयारी और गलतियों पर चर्चा होती है।

नई दुनिया का कमाल : लिखने से पहले थोड़ा दीमाग भी लगा लिया होता
किशन पटनायक की चर्चा होने पर चैप्टर में बकायदा चार महिलाओं का जिक्र होता है कि किशनजी ने अपनी सर्वसमाहार वाली राजनीतिक परंपरा को कैसे आगे बढ़ाया। चारों महिलाएं अपना पक्ष रखती हैं और किशन पटनायक की उस चिंता को भी साझा करती हैं जब वह कहते हैं कि हमने पंचायतों में हमने प्रतिनिधि उतार कर चुनाव में भागीदारी का प्रयोग किया पर लोगों ने हमें वोट नहीं दिया। 

पर किताब में आई इन तमाम जिरहों से भी पत्रकारों को समझ में नहीं आता कि माओवादी किशनजी क्योंकर चुनाव लड़ने की बात करते, उनकी पार्टी कहां पंचायत चुनाव लड़ी है या फिर माओवादियों ने कहां कहा है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं को चुनाव में सीधे उतरना चाहिए। माओवादी तो मानते ही नहीं चुनावी राजनीति इस देश की तकदीर बदल सकती है, शोषणमुक्त समाज बना सकती है। वह क्रांतिकारी आंदोलनों के पक्षधर और गरीबों की सत्ता कायम करने को अपना ध्येय मानते हैं। 

और तो और रिपोर्टर किसी नक्सल अधिकारी का बयान भी फर्जी ढंग से गढ़के स्टोरी में चिपका देते हैं। वे किसी 'एएनओ' नाम के संगठन का जिक्र करते हैं जिसने महाराष्ट्र के माओवाद प्रभावित जिले गढ़चिरौली में 2 लाख छात्रों को नक्सलवादी विचारधारा से दूरी बनाने की बाबत कसम खिलवाई है। इस मौके पर पत्रकार यह बताना नहीं भूलते कि जल्दी ही कुछ एनजीओ सीबीएसई के खिलाफ तगड़ा विरोध दर्ज कराने वाले हैं। 

योगेंद्र यादव ने की टाइम्स आॅफ इंडिया से माफी की मांग


महिला नक्सली है या नहीं इसकी जांंच उसके स्तनों से दूध निचोड़ करती पुलिस

रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे का फेसबुक स्टेटस, जिसकी वजह से भाजपा सरकार ने उन्हें नौकरी से किया निलंबित

वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू-बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केसों में चारदिवारी में सड़ने भेजा जा रहा है। तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाएं... 

पूंजीवादी व्यवस्था के शिकार जवान शहीदों को सत सत नमन्


मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सच्चाई खुद-ब-खुद सामने आ जायेगी... घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं...भारतीय हैं। इसलिए कोई भी मरे तकलीफ हम सबको होती है। लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना... उनके जल जंगल जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाएं नक्सली हैं या नहीं इसका प्रमाण देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दूध निकालकर देखा जाता है। टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों  को जल, जंगल, जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है जबकि संविधान अनुसार 5वीं अनुसूची में शामिल होने के कारण सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमीन को हड़पने का.... 

आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है। नक्सलवाद खत्म करने के लिए... लगता नहीं। सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्ही जंगलों में है जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है। आदिवासी जल जंगल जमीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है। वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केसों में चारदिवारी में सड़ने भेजा जा रहा है। तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाएं... 

ये सब मैं नहीं कह रही CBI रिपोर्ट कहती है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत  कहती है। जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं, चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हो चाहे पत्रकार... उन्हे फर्जी नक्सली केसों में जेल में ठूस दिया जाता है। अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है। ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता।

मैनें स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुड़िया माड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था जिनको थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताड़ित किया गया था। उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करेंट लगाया गया था जिसके निशान मैंने स्वयं देखे। मैं भीतर तक सिहर उठी थी...कि इन छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किस लिए...मैंने डॉक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा।

हमारे देश का संविधान और कानून यह कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें...

इसलिए सभी को जागना होगा... राज्य में 5वी अनुसूची लागू होनी चाहिए। आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए। उन पर जबरदस्ती विकास ना थोपा जावे। आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं। हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए ना कि संहारक... पूँजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझे ...किसान जवान सब भाई भाई हैं हैं. अतः एक दुसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और ना ही विकास होगा...। संविधान में न्याय सबके लिए है... इसलिए न्याय सबके साथ हो... 

हम भी इसी सिस्टम के शिकार हुए... लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े, षडयंत्र रचकर तोड़ने की कोशिश की गई प्रलोभन रिश्वत का आफर भी दिया गया वह भी माननीय मुख्य न्यायाधीश बिलासपुर छ.ग. के समक्ष निर्णय दिनांक 26.08.2016 का para no. 69 स्वयं देख सकते हैं। लेकिन हमने इनके सारे इरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई... आगे भी होगी।

अब भी समय है...सच्चाई को समझे नहीं तो शतरंज की मोहरों की भांति इस्तेमाल कर पूंजीपतियों के दलाल इस देश से इन्सानियत ही खत्म कर देंगे।

ना हम अन्याय करेंगे और ना सहेंगे....
जय संविधान जय भारत

May 1, 2017

जाटों ने किया दलित बस्ती पर हमला, किसी हाथ का तोड़ा तो किसी का पैर

दलितों पर हमले  के लिए चर्चित हरियाणा फिर  एक बार सुर्ख़ियों में है. लाठी—डंडों और धारदार हथियारों से लैस 100 से ज्यादा जाट हमलावर दलितों पर टूट पड़, महिलाओं,  ल​ड़कियों के साथ की बदसलूकी।

बालू गांव  से लौटकर राजेश कापड़ो
हरियाणा के जिला कैथल के गांव बालू में मई दिवस की सुबह गुस्साए जाटों ने बाल्मीकि बस्ती पर हमला कर दिया। लाठी, डंडों व तेजधार हथियारों से लैश 100 से ज्यादा हमलावर दलित बस्ती पर टूट पड़े और बस्ती के बाहर खड़े दलित युवकों को ताबड़तोड़ पीटना शुरू कर दिया। घरों के दरवाजे तोड़ डाले, जमकर पथराव किया और म​हिलाओं—लड़कियों के साथ बदसलूकी की।

हमलावर गाड़ी ही ईंट—पत्थर डालकर लाए थे। इस हमले में दर्जनभर से ज्यादा दलित युवकों को चोट लगी है। दलितों के 20-25 घरों में तोड़फोड़ की गई है। मकानों के दरवाजे तोड़ डाले। घरों से निकाल—निकालकर दलितों को पीटा गया। हमलावर एक मोटरसाईकिल भी उठा कर ले गए। 

चार-पांच दलित युवकों को कलायत सरकारी अस्पताल में स्थानीय पुलिस ने भर्ती करवाया था, जिन्हें बाद में हालत गम्भीर होने के कारण कैथल शहर के अस्पताल में रैफर कर दिया गया। हमले में घायल संजीव व संदीप दोनों का इलाज फिलहाल यहीं चल रहा है। गांव में दहशत का वातावरण व्याप्त है। लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे। कैथल में दाखिल घायलों ने बताया कि कई घायल लोग अभी भी गांव में ही हैं जो डर के मारे नहीं आ पा रहे। उन्हें भी डाक्टरी सहायता की आवश्यकता है।

क्या कहते हैं घायल

घायलों ने बताया कि हमला सुबह आठ बजे ही हो गया था, लेकिन पुलिस साढे नौ बजे गांव में पहुंची और फिर भी हमलावरों की तरफ ही बैठी रही। बड़ी मुश्किल से चार-पांच घायलों को अस्पताल में दाखिल करवाया और अभी तक कोई मुकदमा पुलिस ने दर्ज नहीं किया । एस एच ओ कलायत  से जब यह पूछा कि इस वारदात में अब तक कितने हमलावरों को गिरफ्तार किया गया है तो उनका जवाब था कि अभी तक इस घटना के संबंध में उनके पास कोई शिकायत नहीं आई है इसलिए कोई केस अभी तक दर्ज नहीं किया गया है। जबकि पूरे घटनाक्रम की जानकारी पुलिस को सुबह से ही है ।

पुलिस खुद घायलों को उठाकर अस्पताल लाई थी। जिला पुलिस कप्तान के रीडर के अनुसार एक डीएसपी रैंक का अधिकारी भारी पुलिस बल के साथ गांव में डटा हुआ है। रात नौ बजे तक भी कोई पुलिस अधिकारी घायलों के ब्यान दर्ज करने कैथल के सरकारी अस्पताल नहीं पहुंचा था।

यह जानना महत्वपूर्ण है कि तीन महीने पहले भी दलित समाज के युवकों ने एससी/एसटी आयोग को एक लिखित शिकायत दी थी कि जाट जाति के कुछ बदमाश किस्म के लोग दलित बस्ती में आकर रौब जमाते है और दलित महिलाओं पर बूरी नियत रखते हैं । यह शिकायत पुलिस थाना कलायत ने यह कह कर वापस करवा दी कि तकनीकी आधार पर यह एक कमजोर शिकायत है । दलितों ने पुलिस के दबाव में उक्त शिकायत वापस ले ली ।

डीएसपी से मिले दलित,  सरपंच सहित 90 से ज्यादा के खिलाफ एफआई दर्ज
आज सुबह ही गांव बालू के 50 से ज्यादा दलित समाज के बुजुर्ग व नौजवान जिला मुख्यालय पर आए । 1 मई को हुई दलित उत्पीड़न की घटना में जिला पुलिस ने आज सुबह तक कोई गिरफ्रतारी नहीं की थी । दलित समाज के लोगों ने डीएसपी सतीश गौतम से मिल कर अपनी समस्या बताई । डीएसपी ने बताया कि 90 से ज्यादा लोगों के खिलाफ एस सी/एस टी अधिनियम तथा 148/149 आईपीसी आदि धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है । यह डीएसपी इस मुकदमें का जांच अधिकारी भी हैं । घायलों के बयान पुलिस ने लिख लिए है । घायल संजीव और संदीप के एक्स-रे आज सुबह ही हो पाए हैं । इनको लगी चोटों पर डाक्टरों की राय अभी नही आई है ।

सरपंच की फर्जी डिग्री से उठा विवाद
हाल ही में दो दलित युवकों संजीव व मोहन लाल ने वर्तमान सरपंच के खिलाफ एक लिखित शिकायत सीएम विन्डो के माध्यम से मुख्यमंत्री कार्यालय को दी जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि ग्राम सरपंच रमेश कुमार का दसवीं का प्रमाण-पत्र फर्जी है । इसकी जांच का जिम्मा जिला शिक्षा अधिकारी कैथल को सौंपा गया। जांच अभी चल रही है । 27 अप्रैल के पंजाब केसरी के स्थानीय संस्करण में इसी शिकायत के संबंध में एक समाचार छपा जिसमें सरपंच के दसवीं के प्रमाण-पत्र पर उंगली उठाई गई थी । दलित युवकों की यह हिम्मत जाट सरपंच बरदाश्त नही कर सका । इसलिए अल सुबह लाठी,डंडों व तेजधार हथियारों से लैश उन्मादी बदमासों को लेकर दलित बस्ती पर टूट पड़ा । दो गंभीर रूप से घायलों में एक शिकायत कर्ता संजीव है जिसकी दोनों बाजूओं की हड्डियां तोड़ डाली गई है । घायलों ने बताया कि हमलावर उसको मरा हुआ समझकर छोड़ कर गए हैं ।

गांव में अभी भी दहशत का माहौल
कई दलित परिवार गांव छोड़कर सुरक्षित जगहों पर चले गए हैं । दलित समुदाय के रमेश, हरिकेश पुत्र महाली तथा रामपाल पुत्र धूला राम का परिवार कल हुए हमले से भयभीत होकर गांव छोड़कर चले गए हैं । कल हुए हमले में हुए नुकसान की जानकारी भी दलित संमाज के लोगों ने दी । एक युवक नरेश ने बताया कि हमलावरों कुर्सी, मेज, दरवाजे, खिड़कियां सब कुछ तहस नहस कर दिया । रमेश पुत्र महालि राम के चौबारे की खिड़की उखाड़ दी । बलराज के घर का लोहे का मेन गेट तोड़ दिया । 6-7 साईकिल भी तोड़ डाले । बालू गांव की इस बस्ती के ज्यादातर बाल्मीकि दलित साईकिलों पर पंजाब में फेरी लगा कर बाल खरीदते हैं । इस कार्य में साईकिल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है,  इसलिए सोच समझ कर साईकिलों को निशाना बनाया गया।

जो यूनियन मजदूर विरोधी उसी की सदस्यता सबसे ज्यादा

देश की सबसे ज्यादा सदस्य संख्या वाली वह ट्रेड यूनियन है जो लगातार मजदूर हकों के खत्म होते का दशकों से तमाशा देखती रही है। 

कृपा शंकर, आंदोलनकारी 

अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस पर सभी मजदूरों को मुबारकवाद।

आज हम मई दिवस को एक परम्परा की तरह मनाते हैं। परन्तु आज विश्वपरिस्थिति कैसी है? 

मजदूर वर्ग के लिए कार्ल मार्क्स ने नारा दिया था, 'दुनिया के मेहनतकशो एक हो। तुम्हारे पास खोने के लिए बेड़ी के अलावे कुछ नहीं है और पाने को पूरी दुनिया है।'



परन्तु आज हम क्या पाते हैं, मार्क्स के नारे को किस रूप में अमल होते देखते हैं?  

दुनियाभर के पूँजीपति इस फिराक में जुटे हैं कि पूंजी​पतियों एक हो। लूटने के लिए पूरी दुनिया को एक करो। मेहनतकशों को लड़ाओ और मेहनत कर दो जून की रोटी खाने वालों में अंधराष्ट्रवाद फैलाओ।

धनपशु जानते हैं कि मेहनतकशों की एकता और उनके जीवन की बुनियादी जरूरतों की हकबंदी से ही पूंजीपतियों की लूट का रास्ता बंद होता है। 

ऐसे हमें यह गंभीरता से सोचना चाहिए कि वह कौन सी परिस्थितियां हैं जिनकी वजह से मजदूर तेजी से प्रतिक्रियावादी यूनियनों में शामिल हो रहे हैं। हालांकि ये हालात अकेले भारत के नहीं हैं। दुनिया में हर कहीं ऐसी ताकतों के पीछे मजदूर और किसान गोलबंद हो रहे हैं जो स्वयं उनकी विरोधी हैं, जो मजदूर और किसान हकों को दीमक की तरह चट कर रही हैं। 

भारत में सबसे प्रतिक्रियावादी, नग्न पूँजीवाद की पोषक, अमरीकी पूँजीवाद की चाकरी के लिये लालायित, हिन्दू ब्राह्मणिक सामंतवाद की पैरोकार आरएसएस और भाजपा के नेतृत्व वाली ट्रेड यूनियन 'भारतीय मजदूर संघ' की सदस्य संख्या सबसे ज्यादा है। 

भारतीय मजदूर संघ जैसी ट्रेड यूनियनें मेहनतकशों के ऊपर दमन बढ़ने पर कुछ कवायदें कर चुप्पी मार जाती हैं। उनकी ही सरकारें मजदूर विरोधी नीतियां ला रही हैं और वह तमाशा देख रही हैं। ये ट्रेन यूनियनें खुलेतौर पर पूँजीवाद का हित पोषण कर रही हैं, मेहनतकशों को आपस मे बांटकर लड़ा रही है, जनता में युद्धोउन्माद फैला रही हैं, फिर भी मेहनतकश इनकी ही शरण में मुक्ति का रास्ता तलाश रहा है, आखिर ऐसा क्यों है?

आज मेहनतकशों की एकता को शोषक वर्ग तोड़ने में सफल क्यों हो रहा है? 

जाहिर है हमारी फूट, हमारा बिखराव और हमारा हो असंगगित हो संघर्षों की अगुवाई करना पूंजीपतियों की ताकत बनता जा रहा है। इसलिए मई दिवस पर हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि अपने बीच के भेदों को मित्रवत हल करते हुए शासकवर्ग के अंधराष्ट्रवादी बटवारे में नहीं फंसना है। ब्राह्मणवादी जातिभेद से पीड़ित सभी तबकों,  अल्पसंख्यकों, मजदूर किसान वर्गों, महिलाओं और बुद्धिजीवी समुदायों की एकता पर बल देना है। 
नहीं तो बहुत देर हो जाएगी।

Apr 30, 2017

एकजुट होंगे तो ही रूकेगा शोषण का पहिया

मई दिवस पर विशेष 

मई दिवस मजदूर आंदोलन की वो विरासत है जो मजदूरों के संघर्ष का इतिहास बताता है, नये संघर्ष की प्रेरणा देता है। 1886 में अमेरिका के शिकागो शहर में मजदूरों ने जो लड़ाई लड़ी वो किसी खास प्लांट या मजदूरों के किसी खास हिस्से की मांग को लेकर नहीं अपितु दुनिया के सभी मजदूरों के लिए थी यानी मजदूर वर्ग के लिए।



सुमित

आठ घंटे काम की मांग मई दिवस के संघर्षों से उभरकर सामने आयी थी और आज 129 सालों बाद ये अधिकार इस मौजूदा पीढ़ी से पूँजीपतियों ने छीन लिया है। 4 मई 1886 यानी मई दिवस की घटना के पीछे सतत संघर्ष मौजूद था जिसने मालिकों और उनकी दलाल सरकारों के तमाम षडयंत्र और दमन-शोषण का मुँह तोड़ जवाब देते हुए हार मानने से लगातार इंकार किया था।

मई दिवस तथाकथित न्यायपालिका का मजदूर विरोधी चरित्र उजागर करता है। आठ घण्टे काम की मांग करने पर मई दिवस के शहीदों को जिस प्रकार पूँजीपतियों के षड़यंत्र के मुताबिक अदालत ने फांसी की सजा सुनाई आज ठीक उसी प्रकार यूनियन बनाने की मांग करने पर मारुति के 13 मजदूरों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई। एक बार फिर मालिकों ने मजदूरों को डराने के लिए अदालत का इस्तेमाल करते हुए ये बताना चाहा कि अगर मजदूर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने आगे आएंगे तो फांसी और उम्रकैद के जरिए उन्हें और उनके आंदोलन को कुचल दिया जाएगा।

बदलाव के नये रूप
तमाम उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए आज पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में लगातार बदलाव हो रहा है। इसी के साथ शोषण की प्रक्रिया में अलग-अलग बदलाव हुए हैं। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था ने जहाँ मुनाफे की रफ्तार तेज कर दी है, वहीं सामाजिक बंटवारे को तीखा कर दिया है। दूसरी तरफ राजकीय नियंत्राण को घटा कर निजीकरण को खुला रूप दे दिया है।

उदारीकरण के पिछले तीस साल में उत्पादन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ढांचागत बदलाव हुआ है। वे उच्च तकनीक से थोड़े से स्थाई और भारी पैमाने पर ठेका, ट्रेनी, स्किल डेवलपमेण्ट आधारित कम वेतन और कभी भी निकालने के अधिकार के साथ उत्पादन व भारी मुनाफा बटोरने में जुटे हैं। आज मज़दूर  स्थाई-ठेका-ट्रेनी, मुख्य प्लाण्ट, वैण्डर, सब वैण्डर जैसे बहु संस्तरों में बंटा-बिखरा है।

अधिकारों को छीनने का दौर
मई दिवस की परम्परा में लम्बे संघर्षों के दौर में हासिल सीमित कानूनी अधिकारों को छीनने का यह दौर है। मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से ही इसे तेज कर दिया। एक-एक कर कानूनों को मालिकों के हित में बदलना उसका प्रमुख एजेण्डा है। जिसके मूल में है हायर एण्ड फायर, यानी जब चाहो काम पर रखो, जब चाहो निकाल दो। कम से कम वेतन पर ज्यादा से ज्यादा खटाओ।

नस्ल-धर्म आधरित बंटवारे तेज
आज पूरी दुनिया में मेहनतकश आवाम पर धर्म, नस्ल व जाति के आधार पर बंटवारे जुनूनी हद तक तेज हो गये हैं। पूरी दुनिया में नस्लवादी, फासीवादी मजदूर विरोधी ताकतें जाति और धर्म की पहचान को उभारकर जनता को घृणा और उन्माद के जरिए लामबंद कर सत्ता में आ रही हैं। देश के भीतर जातीय व मजहबी हमले और बंटवारे बेहद तीखे हो गये हैं। इसी के साथ, वाट्सऐप, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया झूठ और भ्रम फैलाने के महत्वपूर्ण उपकरण बन गये हैं।

मुनाफाखोरों की चालों को पहचानो
यह मालिकों के मुनाफे को कायम रखने के लिए मजदूरों का शोषण बढ़ाने का मामला है। इनके खिलाफ मजदूरों को ठेका, स्थायी, कैजुअल के बंटवारे की दीवार को तोड़कर व्यापक एकता बनानी होगी - जाति और धर्म की पहचान से परे समान काम समान वेतन, सम्मानजनक वेतन व ठेका प्रथा के खात्मे जैसी तत्कालिक मांगों को लेकर ना सिर्फ प्लांट स्तर पर बल्कि इलाका स्तर पर एकजुट होकर संघर्ष करना होगा। इन संघर्षो का नेतृत्व भी खुद मजदूरों को करना होगा और जिस तरह संघर्ष आगे बढ़ेगे नेतृत्व करने वाले मजदूर भी निकलकर आएंगे। लेकिन मौजूदा भ्रमपूर्ण स्थिति में मज़दूरों के सामने वैचारिक स्थिति भी साफ करना होगा। मई दिवस की विरासत हमें बताती है कि जब तक उत्पादन और राज-काज पर मेहनतकश वर्ग का नियंत्रण नहीं होगा, तब तक मज़दूरों की मुक्ति संभव नहीं है। इसलिए मज़दूरों को अपने तात्कालिक माँगों के साथ अपनी मुक्ति के दीर्घकालिक मुद्दों पर भी सतत संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा।

नयी राह पर आगे बढ़ना होगा!
ऐसे में मई दिवस का रास्ता मजदूर वर्ग की मुक्ति की लड़ाई में ऐसा प्रेरणा स्रोत है जिसे हमें लगातार अपने सामने रखकर मजदूरों को संगठित करना होगा। आज वो दौर नहीं है कि लगातार बड़ी बड़ी हड़ताले हो रही हैं और मजदूर खूद अपनी पहलकदमी से मालिकों को, उत्पादन को चुनौती दे रहा है। स्थिति ठीक विपरीत है। आज के हालात में मजदूर आन्दोलन बिखरा हुआ है और लगातार पीछे जा रहा है। हालांकि बढ़ते शोषण के खिलाफ लगातार उठते स्वतःस्पफूर्त आन्दोलन प्रतिरोध की स्थितियां भी बयां कर रहे हैं।

इन्हीं मौजूदा चुनौतियों के बीच मई दिवस पर ये सवाल उपस्थित है कि मज़दूर आन्दोलन को नयी राह पर आगे कैसे बढ़ाया जाये?
                                                                (‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका से)