Jun 2, 2011

जनपक्षधर मीडिया को संगठित करने का दौर

वर्तमान दौर में सूचना क्रान्ति से ऐसा हौव्वा खड़ा किया जा रहा है, मानो राष्ट्र की सारी सीमाएं बौनी हो गयी हैं, लेकिन यथार्थ में दुनिया पहले से ज्यादा विभाजित और असमान हुई है...

अयोध्या प्रसाद ‘भारती’

उत्तराखंड के रूद्रपुर में पत्रकारिता दिवस की पूर्व संध्या 29 मई के मौके शहर के नगर पालिका सभागार में साहित्यिक-सांस्कृतिक मंच ‘उजास’ और ‘पीपुल्स फ्रैंड’ द्वारा ‘समय, समाज और मीडिया’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। देश में लागू नई आर्थिक नीतियों के बाद मीडिया के चरित्र में आए बदलावों पर उत्तराखण्ड के रुद्रपुर में  आयोजित इस गोष्ठी में विद्वान और मीडिया विशेषज्ञों ने वर्तमान मीडिया के चाल, चरित्र और चेहरे पर गंभीर विचार-विमर्श किया और पत्रकारिता के मूल तत्वों को बचाने के लिए न्यायपसंद लोगों की एकजुटता को जरूरी बताया।

अपने अध्यक्षी वक्तव्य में वरिष्ठ पत्रकार व मानवाधिकार समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष पी.सी.तिवारी ने कहा कि आज मीडिया ने समाज को जकड़ रखा है, उसके मुक्ति के जद्दोजहद में आमजन की मीडिया को संगठित होना है। उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में सूचना क्रान्ति से ऐसा हौव्वा खड़ा किया जा रहा है, मानो राष्ट्र की सारी सीमाएं बौनी हो गयी हैं, लेकिन यथार्थ में दुनिया पहले से ज्यादा विभाजित और असमान हुई है। उन्होंने कहा कि दैत्याकार उद्योग का रूप ले चुकी मीडिया आमजन की दुख-तकलीफों से दूर हो चुकी है, ऐसे में वैकल्पिक मीडिया के गठन की जरूरत और ज्यादा बढ़ गयी है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य और ‘बहुवचन’ पत्रिका के पूर्व संपादक प्रो0 राजेंद्र कुमार ने कहा कि पत्रकारिता को उस बैरोमीटर की भांति होना चाहिए जो न केवल आज के दबावों के बारे में बताए बल्कि आने वाले खतरों के प्रति भी चेताए। उन्होंने अध्यापकों से अपील की कि उन्हें कम से कम दो-दो जुझारू और संवेदनशील, न्यायपसंद छात्र तैयार करने की जिम्मेदारी उठानी होगी, ताकि सत्ता और बाजार के बरअक्श एक न्यायपूर्ण ताकत का निर्माण किया जा सके। वैकल्पिक मीडिया पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वैकल्पिक मीडिया खड़ा करने की बात बार-बार होती है, लेकिन उसके लिए हमारे पास संसाधन नहीं हैं। पहले संसाधनों के बारे में सोचा जाए। यदि संवेदनशील और न्यायपसंद लोग एक-एक रुपया भी लगा दें तो संसाधन जुटाए जा सकते हैं।

गोष्ठी को संबोधित करते हुए ‘जनपक्ष आजकल’ के संपादक चारू चन्द तिवारी ने कहा कि मुख्यधारा की मीडिया में आम जनता की परेशानियां हाशिए पर हैं, खबरों की शक्ल में विज्ञापन परोसे जा रहे हैं। पत्रकार आज अपने नियोक्ताओं, राजनीतिकों, पूंजीपतियों और सत्ता के तमाम दबावांे के बीच काम करने को मजबूर हैं। इसलिए तमाम जरूरी स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दे खबरों से नदारद हैं।

कवि-कथाकार डॉ.शम्भू दत्त पांडे ‘शैलेय’ की राय में समाज में मीडिया की भूमिका हर दौर में रही है। संचार क्रांति के इस दौर में मीडिया एक बड़ी ताकत के रूप में उभर कर सामने आया है। संचार माध्यमों की उपयोगिता और अपरिहार्यता बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही बाजारवाद के इस दौर में पूरा समाज और पत्रकारिता जगत नई चुनौतियों-संकटों से दो-चार हो रहा है। ऐसे में सभी संवेदनशील और न्यायपसंद लोगों को संगठित होकर बाजारवाद के खिलाफ एक ताकत खड़ी करनी होगी। समाजशास्त्र के प्रवक्ता डॉ.सुभाष वर्मा ने कहा कि ‘हुकूक पे जब से अड़ गये हैं, निगाहे हाकिम पे चढ़ गये हैं, दिमाग के दायरे बढ़े हैं, दिलों के रिश्ते सिकुड़ गये हैं।

कवि-कथाकार कस्तूरीलाल तागरा ने मीडिया में आई विकृतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि हम सभी को आपस की बातचीत से कोई ऐसा रास्ता निकालना चाहिए कि धंधे की जरूरतें भी पूरी हो जाएं और पत्रकारिता सभी के साथ यथासंभव न्याय कर सके। गोष्ठी को गांधीवादी चिंतक दिनेश कुमार, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के उपाध्यक्ष और ‘प्रेरणा अंशु’ के संपादक प्रताप सिंह, अध्यापक विजय सिंह, राजीव अग्रवाल, संजय रावत, रूपेश कुमार सिंह, हरप्रसाद पुष्पक, शिवजी धीर, मदन भारती, अजितपाल आदि ने संबोधित किया। पत्रकार मिथलेश मिश्रा ने गोष्ठी के विषय पर रचित ताजा कविता प्रस्तुत की।

गोष्ठी का संचालन नौजवान भारत सभा के मुकुल ने किया। अपने हस्तक्षेप में उन्होंने कहा कि जनपक्षधर शक्तियों के लिए वर्तमान समय की इस चुनौती को समझना और साझे प्रयास से वैकल्पिक तैयारी की दिशा में बढ़ना ही समाज की मांग है। इस अवसर पर वरिष्ठ अधिवक्ता सुभाश छाबड़ा, अयोध्या प्रसाद ‘भारती’, खेमकरण सोमन, नरेश कुमार, प्रकाश भट्ट, प्रो. प्यारेलाल, विजय तिवारी,, गुरबाज सिंह, अविनाश गुप्ता समेत मीडिया, लेखन, अध्यापन, श्रमिक आंदोलन, विधि आदि विविध क्षेत्रों के लोग भी मौजूद थे।


(लेखक रूद्रपुर से निकलने वाले साप्ताहिक अखबार  पीपुल्स फ्रैंड के संपादक हैं।) 



पाखण्ड है मायावती की किसान पंचायत


जनज्वार. उत्तर प्रदेश सरकार की  आज लखनऊ में बुलायी  गयी किसानों की पंचायत बुनियादी रूप से किसानों को बुरबक बनाने  के लिए थी. हालाँकि 7 मई को ग्रेटर नोएडा के भट्टा और परसौल  गाँव  के किसान आन्दोलन से परेशानी  में फंसी सरकार नए जमीन अधिग्रहण कानून के नाम पर जो  नया झुनझुना किसानों को थमाने  में  लगी है, उसकी मियाद भी लम्बी नहीं दिखती. 

जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि प्रदेश  में कारपोरेट घरानों के मुनाफे के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलनरत किसानों की हत्या करने के बाद आज सरकार द्वारा बुलायी गयी किसान पंचायत महज किसानों को गुमराह करने के लिए है। उन्होनें कहा कि आज किसान पंचायत आयोजित कर 70 फीसदी और 30 फीसदी की कवायद कांग्रेस द्वारा लाए जा रहे भूमि अधिग्रहण सम्बंधी बिल के पाखण्ड के सामानांतर  मायावती का पाखण्ड है। जबकि कांग्रेस और मायावती दोनों की ही नीयत किसानों की जमीन छीनना है।

 संसद अगले मानसून सत्र में नए कानून के लिए बसपा की ओर  से  संघर्ष की बात करते हुए मायावती ने अधिग्रहण में प्रभावित हो रहे परिवार के एक सदस्य को नौकरी और प्रति एकड़ के हिसाब से 33 वर्ष तक 23 हजार रूपये देने की भी बात कही है. मायावती  की यह अधिग्रहण नीति  हरियाणा में चल रही मौजूदा अधिग्रहण नीति की बारीक फेरबदल के साथ नक़ल है, जिसे मानसून सत्र में आदर्श राज्य के तौर पर केंद्र सरकार की पेश करने की तैयारी में  है. हालाँकि  हरियाणा में ही इस अधिग्रहण नीति का लगातार विरोध हो रहा है और लोग इसे सरकार की नयी ठगी का तरीका मान रहे हैं.

पूंजीपतियों द्वारा जमीन सीधे लेने की घोषणा करने वाली मायावती सरकार को प्रदेश  की जनता को बताना चाहिए कि उनकी सरकार ने अब तक जेपी समूह को जमीन क्यों दी और इलाहाबाद के कचरी में वहां के डीएम द्वारा किए गए समझौते को भी आज तक लागू क्यों नहीं किया जा रहा है। वैसे में  किसान नेताओं को सरकार के इस जाल में फंसने से बचना चाहिए और  1894 का भूमि अधिग्रहण कानून रद्द होना चाहिए. उससे पहले  प्रदेश  में किसानों से एक भी इंच जमीन लेने पर रोक लगनी चाहिए। इसी सवाल पर जन संघर्ष मोर्चा ने विगत 13 मई को दिल्ली में प्रदर्षन कर गिरफ्तारी दी और प्रधानमंत्री को पत्र भी भेजा है और कल 3 मई को आयोजित रैली में 1894 के भूमि अधिग्रहण के काले कानून में संशोधन  नहीं इसे पूरे तौर पर रद्द करने और नयी राष्ट्रीय भूमि उपयोग नीति बनाने का सवाल प्रमुखता से उठेगा।
       
भूमि अधिग्रहण कानून के सवाल पर मायावती की संसद मार्च की बात वैसे ही पाखंड है जैसे उनकी महंगाई कम करने की मांग, जबकि वह टैक्स में कटौती करके इसे खुद ही कम कर सकती है. वैसे में मायावती तथा कांग्रेस के खेल को बेनकाब करना सबसे महत्वपर्ण हो गया है.



सरकार को अंगूठा मत देना अन्ना ?


पहले तो राजनेताओं और भ्रष्टाचारियों ने लोकपाल बिल की मसौदा कमिटी बनाने में अड़चन डाली और अब कोशिश यह कर रहे हैं कि  ऐसा बिल बने कि जनता के शोषकों पर कोई असर न पड़े...

घनश्याम वत्स

महाभारत में प्रसंग आता है कि एकलव्य धनुर्विद्या सीखने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया  तो गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया. जब एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य कि मूर्ति के सम्मुख स्वयं के अभ्यास से धनुर्विद्या में प्रवीणता हासिल कर ली तो गुरु द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिना के बदले एकलव्य का अंगूठा मांग लिया,ताकि भविष्य में एकलव्य कभी भी राजकुमार अर्जुन को चुनौती न दे सके और राजकुमार अर्जुन विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन सके. भोला  एकलव्य इस चाल को न समझा और उसने अपना अंगूठा तुरंत काट कर गुरु द्रोणाचार्य को भेंट कर दिया .

भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है. बस एकलव्य, अर्जुन और द्रोणाचार्य बदल गए हैं. भारत की आम जनता एकलव्य हो गयी है, तो भ्रष्टाचारी लोग राजकुमार अर्जुन बन बैठे हैं  जिनकी रक्षा गुरु  द्रोणाचार्य की भूमिका में भ्रष्ट राजनेता कर रहे हैं. वे जनता का पक्ष रख रहे प्रतिनिधियों से लोकपाल बिल में बड़ी मछलियों को बचाने के कुछ छेद चाहते हैं. वे चाहते हैं कि बिल की  मूल आत्मा  को काटकर अलग करने की बात पर अन्ना की टीम राजी हो जाये. पहले तो राजनेताओं और भ्रष्टाचारियों ने लोकपाल बिल की मसौदा कमिटी बनाने में अड़चन डाली और अब कोशिश यह कर रहे हैं की ऐसा बिल बने कि जनता के शोषकों पर कोई असर न पड़े.आखिर सरकार को लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री और सांसदों को लाने में  हर्ज क्या है ?  

जनता ने भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर जब सरकार से भ्रष्टाचारियों पर लगाम कसने के विषय में कानून बनाने अनुरोध किया तो आजादी के बाद से ही  सरकार कोई न कोई बहाना बना कर उसे टालती रही.  जब जनता ने बिना सरकार की सहायता के "जन लोकपाल बिल" तैयार कर लिया और उसे लागू कराने के लिए अन्ना हजारे के उपवास के माध्यम से सरकार पर चौतरफा दबाव बनाया तो सरकार को जनता की बात माननी पड़ी और एक "लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी" का गठन किया गया. लेकिन  कुछ लोग "लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी" के जन प्रतिनिधियों को लगातार किसी न किसी प्रकार से निशाना बना रहे है और उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करके भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई की धार को कुंद करने में लगे हुए है,ताकि भ्रष्टाचारी लोगों का बोलबाला कायम रह सके.

हमें इस सत्य को स्वीकार करना पड़ेगा कि भ्रष्टाचारी, कमेटी में शामिल जन प्रतिनिधियों पर हमला करते हुए उन्हें बदनाम करने में लगे रहेंगे. दूसरा  हमें यह  स्वीकार करना पड़ेगा कि इस भ्रष्ट समाज में शत प्रतिशत भ्रष्टाचार मुक्त व्यक्ति को ढूँढना लगभग असंभव है. यदि कमेटी के किसी प्रतिनिधि ने कोई भ्रष्टाचार किया है भी तो कानून अपना काम करेगा. यदि आप सचमुच भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई के पक्षधर है तो आप उस भ्रष्टाचारी को   सजा दिलाने का काम करें  न कि सिर्फ बयानबाज़ी करके भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रही लड़ाई को कमज़ोर करने का.

"लोकपाल बिल"  किसी धर्म, जाति और लिंग से जुडा हुआ मुद्दा भी नहीं है इसलिए धर्म, जाति और लिंग के सवाल उठाकर कुछ राजनेता केवल मात्र अपने क्षुद्र राजनितिक स्वार्थों कि पूर्ति करते हुए केवल इसके व्यवहारिक होने में ही अडंगा डालने का काम कर रहे है. आम जनता को इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि जब इतनी बड़ी और समझदार संविधान सभा द्वारा बनाए गए संविधान में कुछ परिवर्तनों की गुंजाइश रह सकती है तो यदि धर्म,जाति और लिंग के कारण "लोकपाल बिल" में किसी कारण कोई कमी रह जायेगी तो उसमे भी आवश्यकतानुसार परिवर्तन किये जा सकते है. इसलिए हमारा सारा ध्यान केवल एक व्यवहारिक और ठोस  "लोकपाल बिल"  पर होना चाहिए  न कि कहीं और.

दूसरी ओर यदि जनता की और से कमिटी में शामिल जनप्रतिनिधि अपने उद्देश्य से किंचित मात्र भी विचलित होते हैं  तो इतिहास और ये जनता जिसने इस आन्दोलन के लिए अप्रत्याशित समर्थन दिया है वह इस कमेटी के सदस्यों को कभी माफ़ नहीं करेगी. साथ ही  यह भविष्य में होने वाले जनांदोलनो के लिए भी घातक होगा.

ऐसे में  जनप्रतिनिधियों का  एकमात्र कर्तव्य बन जाता है कि वे अपने ऊपर लगने वाले हर आरोप का समुचित और सटीक उत्तर दें  और व्यर्थ कि बातों में न उलझकर अपनी एकाग्रता को बनाए रखे.  उन्हें  चाहिए कि  वे किसी भी प्रकार के दबाव में आए बिना निष्पक्ष रूप से अपना काम करें  और एक ठोस एवं कारगर लोकपाल विधेयक का निर्माण करें. जाहिर है  इसके निर्माण के दौरान उन्हें उन गंभीर विषयों और आलोचनाओ एवं टिप्पणियों के विषय में भी विचार करना चाहिए जो समय समय पर कुछ विद्वान् लोगो द्वारा इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम को और मज़बूत करने के विषय में कि जाती रही है.

जनप्रतिनिधियों को विशेष रूप से सजग और सतर्क रहना होगा और बिना किसी ब्लैक मेलिंग का  शिकार हुए ऐसा प्रभावशाली और व्यवहारिक "लोकपाल बिल"बनाना होगा कि अब कोई भ्रष्टाचारी द्रोणाचार्य से  अंगूठा मांगने की हिम्मत न कर सके.तभी सच्चे अर्थों में देश,जनता और सत्य की विजय होगी.


पेशे से डॉक्टर और सामाजिक-राजनितिक विषयों पर लिखने में दिलचस्पी.





Jun 1, 2011

अन्ना के खिलाफ सरकारी ब्रम्हास्त्र तो नहीं बाबा रामदेव ?

अनशन शुरू होने से पहले बाबा के उठाये मुद्दे जो चर्चा में आये हैं, उनपर गौर करें तो उनमें से कई मुद्दों पर वे सरकार की ज़बान बोल रहे हैं और असल टकराव  अन्ना हजारे से  दिखता है...
    
मुकुल सरल


पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बाबा रामदेव से अनशन न करने का आग्रह और फिर चार-चार मंत्रियों का उन्हें  दिल्ली एअरपोर्ट पर  मनाने जाना, दर्शाता तो यही है कि बाबा से सरकार डर गयी है ?  लेकिन यहाँ तो बाबा ही डरे हुए नजर आते हैं।  तभी तो जंतर-मंतर पर सत्याग्रह के साथ रामलीला मैदान में अष्टांग योग शिविर भी रख लिया है,  जो इस बात की गारंटी करे कि बाबा के सत्याग्रह-अनशन में समर्थकों की कमी न होने  पाए।

पहले से तय है कि 4 जून से शुरू होने जा रहे योग शिविर में लोग बाबा के समर्थन में उपवास भी रखेंगे और सत्याग्रही के तौर पर बाबा के अनशन में जाएंगे। अब अगर अनशन शुरू होने से पहले बाबा के उठाये मुद्दे  जो चर्चा में आये हैं, उनपर गौर करें तो उनमें से कई मुद्दों पर वे  सरकार की  ज़बान बोल रहे हैं और असल टकराव लोकपाल मसौदा समिति बनवाने में सफल रहे अन्ना हजारे से  नजर आता है।   प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने का मामला   हो या मसौदे में भ्रष्टाचारियों को मृत्युदंड देने का प्रावधान शामिल कराने की मांग, अन्ना टीम के लोकपाल बिल के मसौदे के खिलाफ ही जाती है।

तभी तो रामलीला मैदान में अन्ना के नाम के पर्चे बांटना भी बाबा के समर्थकों को गंवारा नहीं हुआ। जब लड़ाई एक है और देशहित में है तो फिर खुद चैंपियन बनने की इतनी ललक क्यों? दरअसल  अन्ना के आंदोलन से खुद को लगभग बाहर या उपेक्षित कर दिए जाने से तो बाबा पर लगभग बिजली ही टूटी। बाबा की राजनीति और राजनीतिक महत्वकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। बाबा को लगा कि अरे उनके मुद्दों  को तो अन्ना ले उड़े और देश के हीरो हो गए। उन्हें कोई श्रेय नहीं, यहां तक कि कमेटी में भी जगह नहीं!

जानकार तो ये भी कहते हैं कि सरकार ने ही अन्ना के आंदोलन को हवा दी और बाबा को काट दिया। ऐन चुनाव के मौके पर भ्रष्टाचार के सारे मुद्दे को लोकपाल बिल के ड्राफ्ट तक सिमटा दिया और बेहतर परिणाम पाए। अन्ना से समझौते के अगले दिन से ही सरकार के मंत्रियों ने बयान देने शुरू कर दिए कि केवल लोकपाल से क्या होगा। फिर सीडी के साथ अमर सिंह को खड़ा कर दिया गया। इस बीच दूसरे खेल भी खेले गए और अब बाबा रामदेव को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि अन्ना और उनकी टीम को निपटाया जा सके। सरकार ये भी दिखा सके कि हम भ्रष्टाचार के खिलाफ कितना गंभीर हैं। और ये पूरी मुहिम ही आपसी लड़ाई, आरोप-प्रत्यारोप, बंटवारा, संशोधन इस सबमें फंसकर खटाई में पड़ जाए।

...सही भी है सरकार बाबा से क्या डरेगी..क्यों डरेगी? जानकार कहते हैं कि बाबा के इतिहास, वर्तमान, कारोबार और संपत्ति को लेकर सरकार के पास ऐसी कई गोट हैं जिनका वह बाबा के खिलाफ जब चाहे इस्तेमाल कर सकती है।   सारे दांव-पेच और समीकरण तो यही बता रहे हैं कि बाबा रामदेव का सत्याग्रह भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के आंदोलन को आगे बढ़ाने की बजाय उसे पंक्चर करने का ही काम करेगा। देखिए भविष्य में क्या होता है क्योंकि आज ही बाबा निहाल हो गए हैं कि चार-चार मंत्री उन्हें मनाने आए...इसके बात उन्होंने बयान दिया कि
"पहले दौर की बात सकारात्मक रही है. बातचीत आगे भी होगी. कुछ मुद्दों पर सहमति भी बनी है । "

अपना सुर बदलते हुए बाबा रामदेव ने किसी पार्टी या नेता का नाम लेकर आलोचना करने से मना कर दिया. उनका कहना है , " हमारी लड़ाई किसी पार्टी या व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं है,  जनहित में है।  किसी की निंदा करना हमारा मकसद नहीं है." अब देखना है कि इस सबमें कितना जनहित है और कितना सरकार के साथ बाबा का हित। 



पत्रकार और कवि . हाल ही में  कविता संग्रह  'उजाले का अँधेरा ' प्रकाशित हुआ है.



पत्रकार को सच बोलने की सजा दी सरकार ने


ह्युमन राईट वाच  के पाकिस्तान प्रतिनिधि अली दयान हसन ने अल जजीरा को बताया कि शहजाद ने उन्हें हाल में बताया था कि 'रिपोर्ट के बाद से आईएसआई से उन्हें लगातार धमकी मिल रही थी...

विष्णु शर्मा

पाकिस्तान के पंजाब राज्य  की पुलिस ने मंगलवार को पत्रकार सईद सलीम शहजाद की हत्या की पुष्टि कर दी है. शव की शिनाख्त शहजाद के परिवार ने की. एशिया टाइम्स ऑनलाइन और इटली की समाचार एजेंसी एंडक्रोनोस इंटरनेशनल  के पाकिस्तान संवाददाता शहजाद पिछले रविवार से लापता थे. गौरतलब है कि  40 वर्षीय  खोजी पत्रकार शहजाद की गिनती  पाकिस्तान के उन  साहसी पत्रकारों में की जाती रही है जो सरकारी तंत्र और आतंकवादी संगठनों के गठजोड़ को सरेआम करते रहे हैं. 
  
आतंकवाद के  शिकार : पत्रकार सईद सलीम  शहजाद  
उनके लापता होने की खबर 29  मई को सामने आयी जब वे तय कार्यक्रम में नहीं पहुँच सके थे.माना जा रहा है कि उनकी हत्या में पाकिस्तानी नौसेना के उन अफसरों का हाथ होगा, जिनके सम्बन्ध तालिबान से होने की खबर शहजाद ने लिखी थी. 27  मई को एशिया टाइम्स में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में शहजाद ने खुलासा किया था कि पाकिस्तानी नौसेना के कुछ बड़े अफसर आतंकवादियों को सूचना पहुंचाते है. शहजाद पाकिस्तान में तालिबान पर विशेष जानकारी रखने वाले पत्रकार माने जाते थे. उनकी पुस्तक 'इनसाइड अल कायेदा एंड तालिबान: बियोंड बिन लादेन एंड 9/11' खासी सुर्ख़ियों में रही.

जानकारों का कहना है कि हाल में प्रकाशित उनकी रिपोर्ट के कारण पाकिस्तानी नौसेना में पड़े अंतरराष्ट्रीय  दवाब का बदला लेने के लिए उनकी हत्या की गई है.ह्युमन राईट वाच  के पाकिस्तान प्रतिनिधि अली दयान हसन ने अल जजीरा को बताया कि शहजाद ने उन्हें हाल में बताया था कि 'रिपोर्ट के बाद से आईएसआई से उन्हें लगातार धमकी मिल रही थी.' आईएसआई इस आरोप को बेबुनियाद बता रही है. उसके एक अधिकारी का कहना है कि आरोप लगाने वालों को इसका सबूत देना चाहिए.पकिस्तान के प्रधानमंत्री सईद युसूफ रज़ा गिलानी ने हत्या पर दुख प्रकट करते हुए कहा है कि उनकी सरकार दोषियों को जरूर सजा दिलाएगी.

हत्या की जाँच के लिए सरकार ने कमिटी का गठन कर दिया है. संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने शहजाद की हत्या को निंदनीय करार देते हुए इस की निष्पक्ष जांच की मांग की है. संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता के कहा है कि महासचिव आशा करते है कि पाकिस्तानी सरकार दोषियों को दंड देगी.रिपोर्टर विदाउट  बोर्डर और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को मंगलवार को भेजे अपने संयुक्त पत्र में कहा है कि 'हत्या से पत्रकार बिरादरी ठगा हुआ महसूस कर रही है.हम मांग करते है कि पकिस्तान सरकार हत्या की पुर जोर निंदा करे और इसके लिए जिम्मेदार लोगो को सजा दिलाये.'

पकिस्तान के अंग्रेजी दैनिक डेली टाईम्स ने आज अपने संपादकीय 'सलीम शहजाद: सच की कीमत' में लिखा है,'यह घटना उन सभी लोगों के लिए आखें खोलने वाली है जो यहाँ की सेना और उग्रवादी संगठनों से सहानुभूति रखते है.इस बात को समझने के लिए कि हमारा देश एक युद्ध क्षेत्र है जहाँ उग्रवादी और उनसे जो खुद को हमारा रखवाला कहते हैं, कोई भी सुरक्षित नहीं है.  हमें  बाहरी देशों को अपनी हर तकलीफ का दोषी कहना बंद करना होगा.जिस देश में आतंकवादी,हत्यारे,बलात्कारी और अपराधी सुरक्षित महसूस करते हों उस देश में निर्दोषों की हत्या एक सामान्य परिघटना है.'

इससे पहले भी 19नवम्बर 2006में अफगानिस्तान के हेलमंड में रिपोर्टिंग के दौरान तालिबानी लड़ाकों  ने शहजाद का अपहरण कर लिया था.तालिबान को उन पर जासूसी करने का शक था. 26 नवम्बर 2006को तहकीकात के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया था. कैद के अपने अनुभवों को शहजाद ने 'इन दी लैंड ऑफ दी तालिबान' शीर्षक से एक लेख श्रृंखला भी लिखी थी.


जमीन के बदले जमीन ही सही पुनर्वास नीति


जनज्वार. उत्तर  प्रदेश  के इलाहबाद जिले के करछना में कचरी विद्युत संयंत्र के लिए  भूमि  अधिग्रहण किया जा रहा है. इस परियोजना से विस्थापित  होने वाले किसानों को रु. 3  लाख प्रति बीघा दिया जा रहा है. किसानों को उनकी जमीन के बदले दी जा रही ये कीमत वहां के  सर्किल रेट से तीन गुना  है. लेकिन सामाजिक कार्यकर्त्ता और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पाण्डेय का कहना है कि 'सही पुनर्वास नीति जमीन के बदले जमीन ही  है.

 आखिर रातों-रात अपना जीने कर तरीका या आजीविका का माध्यम बदल देने के लिए कौन तैयार होगा,  चाहे मुआवजा कितना  ही क्यों न हो' ?  अगर नकद से ही काम चल जाता तो सभी सरकारी अधिकारी स्वैच्छिक सेवा निवृति कर लाभ क्यों नहीं उठाते? इलाहबाद के जिलाधिकारी अलोक कुमार और मंडलायुक्त  मुकेश मेश्राम को लिखे अपने पत्र में संदीप पाण्डेय ने आगे कहा कि  जमीन के बदले सिर्फ  पैसे की अदायगी को किसानों के साथ न्याय नहीं कहा जा सकता। किसान परिवार के लिए जमीन ही उसकी जीविका व जीवन का साधन है और न्यायपूर्ण मुआवजा जमीन के बदले जमीन ही है।

इसलिए प्रसाशन को  अधिग्रहण वाले जिले में ही जमीन तलाश कर विस्थापित किसानों का पुनर्वास करना चाहिए. अगर  किसानों से ली गयी जमीन के बदले   में दी जाने वाली जमीन की गुणवत्ता में अंतर हो  तो जमीन के मूल्य के मुताबिक अधिग्रहित जमीन के अनुपात में दूसरी जगह जमीन दी जा सकती है। अगर पूरे किसान परिवार को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाएगा तो जमीन के बदले जमीन ही सही नीति प्रतीत होगी। हलांकि नकद मुआवजे का विकल्प,जो चाहें उनके लिए,खुला रखा जा सकता है। परन्तु इस पर परिवार की प्रमुख महिला की सहमति भी अनिवार्य होनी चाहिए।



चीन की उलझाऊ कूटनीति और भारत

चीन, भारत के खिलाफ एक राजनीतिक युद्ध में सीधा न उलझ कर, किसी न किसी बहाने भारत को उलझाकर रखना चाहता है . नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार में उसके हस्तक्षेप इसी योजना का एक अंग है...

घनश्याम वत्स

आज कल सभी न्यूज़ चैनल और पत्र-पत्रिकाएं जब चीन के विषय में बाते करतें हैं तो उनका निष्कर्ष यही होता है कि चीन भारत के हितों के खिलाफ कार्य कर रहा है और भारत के खिलाफ युद्ध की तैयारी में लगा हुआ है.लेकिन लाख टके का सवाल है कि क्या कभी चीन भारत पर आक्रमण करेगा ?

चीन इस दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला एक जिम्मेदार   देश है . उस पर अपने नागरिकों के भरण पोषण और उनके हितों की रक्षा की जिम्मेदारी है .जिस प्रकार हर देश को अपने नागरिकों के सुखद ओर स्वर्णिम भविष्य की कामना होती है उसी प्रकार चीन को भी अपने देश के नागरिकों के लिए सम्पन्नता और दुनिया में सम्मानजनक स्थान चाहिए . उसे अपने 140 करोड़ लोगों के लिए यूरोपीय देशों और अमेरिका  के नागरिकों के समान सुविधाएँ और संसाधन चाहिये. वह वैश्विक महाशक्ति बनना चाहता है . जिसके लिए वह प्रयासरत भी है . पिछले कुछ वर्षों में चीन एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरा है किन्तु उसे पता है कि केवल आर्थिक महाशक्ति बन कर वह यह सब हासिल नहीं कर सकता,उसे आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक महाशक्ति भी बनना होगा .

उसे वर्तमान महाशक्ति अमेरिका  से यह ताज हासिल करने के लिए सबसे पहले दक्षिण एशिया में अपने प्रभाव को बढ़ाना पड़ेगा क्योंकि जिस देश का अपने पड़ोसियों में ही दबदबा न हो उसे दुनिया का सिरमौर कौन मानेगा .दक्षिण एशिया में भारत सबसे बड़ा देश है .सबसे पहले उसे दक्षिण एशिया में भारत के बढ़ते क़दमों को रोकना होगा . उसे विश्व में एक महाशक्ति बनना है तो उसे हर अड़ोसी-पडोसी देश ख़ास तौर पर भारत से बीस रहना ही पड़ेगा . भारत अन्य दक्षिण एशियाई देशों के साथ जितना घुलमिल कर रहेगा भारत का प्रभाव उतना ही बढेगा जो कि चीन के लिए एक राजनीतिक चुनौती पेश करेगा और चीन के महाशक्ति बनने के सपने में एक बड़ी अड़चन साबित होगा .
इसलिए अन्य दक्षिण एशियाई देशों से भारत को दूर करने के लिए एवं भारत के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए चीन ने नेपाल में माओवादिओं को बढ़ावा दिया और नेपाल को आर्थिक सहायता बढ़ाकर वहां कि राजनीति में अपना हस्तक्षेप बढाकर भारत के प्रभाव को कम कर दिया . इसी कड़ी में चीन ने परोक्ष रूप से पकिस्तान को दोस्ती के बहाने आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक मदद देना आरम्भ किया जिसका दुरूपयोग भारत के खिलाफ हो रहा है और अब एक कदम आगे बढ़कर एक तीर से दो निशाने साधते हुए चीन ने बिखरते हुए पाकिस्तान का खुलकर साथ देना प्रारंभ कर दिया है और पाकिस्तान में अमरीकी प्रभाव को भी कमज़ोर करना प्रारंभ कर दिया है . भारत के खिलाफ अपने इस अभियान में चीन ने श्रीलंका में भी अपने पैर जमाकर भारत को चारों ओर से घेरने की कोशिश की है .

लेकिन चीन दुविधा में भी है .वर्तमान महाशक्ति अमरीका के साथ G-8,नाटो देश एवं अन्य कई देश हैं,  जो समय-समय पर संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे विश्व मंचों पर अमेरिका  के निर्णयों को सही ठहराने में और उन्हें लागू करवाने में अमेरिका कि सहायता करते है . चीन के साथ ऐसा कोई गुट नहीं है . महाशक्ति बनने के लिए उसे भी कुछ देशों का साथ चाहिए ताकि जब वह महाशक्ति बने तो उसके भी कुछ सहयोगी हों और वह भी अमरीका कि तरह अपने सभी फैसले दुनिया पर लागू करवा कर राज कर सके . इसलिए उसे G-5 और ब्रिक्स जैसे संगठनों में भारत कि भागीदारी भी चाहिए क्योंकि भारत को नज़रंदाज़ करके विश्व के विषय में कोई नीति बनाना किसी बेवकूफी से कम नहीं है . दूसरा भारत चीनी सामान का एक बहुत बड़ा खरीदार है चीन इतने बड़े बाज़ार को भी खोना नहीं चाहेगा.

इतना ही नहीं चीन को भारत की सैन्य  क्षमता का ज्ञान है.उसे पता है कि भारत के लिए अब 1962 वाला समय नहीं है, इसलिए वह भारत के खिलाफ प्रत्यक्ष युद्ध नहीं करना चाहेगा. चीन, भारत के खिलाफ एक राजनीतिक युद्ध में सीधा न उलझ कर,किसी न किसी बहाने भारत को उलझाकर रखना चाहता है  नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार में उसके हस्तक्षेप इसी योजना का एक अंग है,ताकि भारत इन्ही मुद्दों में उलझकर रह जाए और चीन निश्चिन्त होकर दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाते हुए अपने लक्ष्य कि और बढ़ सके है.  


पेशे से डॉक्टर और सामाजिक-राजनितिक विषयों पर लिखने में दिलचस्पी.



May 31, 2011

ऐसी मुठभेड़ें तो चलती रहेंगी !

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने पुलिस को ललकारा और कहा कि 'अगर वे एक मारें तो आप चार मारें।' उनके इस बयान के बाद सोनभद्र, चन्दौली और मीरजापुर में मुठभेड़ों की बाढ़ आ गयी... किस्त- 3

सोनभद्र से विजय विनीत 


मानवाधिकार संगठनों के दबाव के चलते ही भवानीपुर काण्ड की मानवाधिकार आयोग द्वारा जांच की गयीलेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक यह रिर्पोट ज़ारी नहीं की गयी है। इसी बीच मारे गये देवनाथ और लालब्रत ने भी नौगढ़ में अपने को जिन्दा होने का दावा कर दिया। आज तक पुलिस यह बताने में नाकाम है कि देवनाथलालब्रतसुरेश बियार की जगह जो लोग मारे गये वे कौन थे। इसे मानवाधिकार संगठनों ने नरसंहार करार दिया और तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए पीयूसीएल ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की।

दुर्भाग्यवश यह याचिका उच्च न्यायालय ने यह कहकर स्वीकार नहीं की कि 'इस याचिका में कुछ खास नहीं है।' पुलिस ने भवानीपुर मुठभेड़ का जश्न मनाया। तत्कालीन डीजीपी एम.सी.द्विवेदी ने इस मुठभेड़ को जायज़ ठहराया और कहा कि ऐसी मुठभेड़ें तो होती रहेंगी। वहीं वाराणसी के आईजी वी.के.सिंह ने पुलिसकर्मियों को बधाई दी, जो कि स्वयं भवानीपुर में मुठभेड़ के दौरान मौजूद थे।

भवानीपुर हत्याकाण्ड ने प्रदेश स्तर पर तमाम मानवाधिकार संगठनों, प्रगतिशील ताकतों और बुद्धिजीवी वर्ग को लामबंद किया। इस हत्याकाण्ड के विरोध में कई कार्यक्रम हुए। सोनभद्र के मुख्यालय राबर्ट्सगंज में इस फर्जी मुठभेड़ को लेकर पीपुल्स यूनियन फार ह्यूमन राइट्स ने दो दिवसीय मानवाधिकार सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें पूर्व न्यायाधीश इलाहाबाद उच्च न्यायालय वी.के.मेहरोत्रा और पूर्व न्यायाधीश पंजाब राजेन्द्र सच्चर समेत पीयूसीएल के उपाध्यक्ष चितरंजन सिंह, पूर्व जिला जज भगवन्त सिंह, पूर्व शिक्षा निदेशक उत्तर प्रदेश डा. कृष्णा अवतार पाण्डेय, सम्पादक अरूण खोटे अखिलेन्द्र प्रताप सिंह, सलीम समेत कई मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल हुए।

पूर्व न्यायाधीश राजेन्द्र सच्चर ने भवानीपुर की घटना को पंजाब से जोड़ा और कहा कि वर्षों पूर्व बसों से उतारकर छः निर्दोष युवकों की हत्या कर दी गयी। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई से करायी गयी जांच में मुठभेड़ फर्जी पायी गयी। ठीक यहीं स्थिति भवानीपुर की है। उन्होंने इस घटना का सबसे दुःखद पहलू इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इन फर्जी मुठभेड़ों पर याचिका को स्वीकार न करना बताया। राजेन्द्र सच्चर द्वारा उत्तर प्रदेश में हो रहे मानवाधिकार हनन के मामले के सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय को भेजे गये पत्र पर ही उच्चतम न्यायालय ने मानवाधिकार आयोग को भवानीपुर काण्ड की जांच करने के आदेश दिये।

सीबीआई जॉंच भी लम्बित है, लेकिन लगभग दस वर्ष बाद भी जॉंच रिपोर्ट सार्वजनिक न होना केंद्र और राज्य सरकारों की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़ा करती है। साथ ही यह भी आभास होता है कि सरकारें आज भी पूरी तरह सामन्ती व्यवस्था के तहत संचालित हैं और उन्हें दलितों और निर्दाषों के मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं। भवानीपुर हो चाहे सोनभद्र का करहिया अथवा चन्दौली में हुई मुठभेड़े।

ऐसी हिंसा की शुरूआत क्यों हुई, इसके पीछे के कारणों पर गौर किया जाये तो उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह इस नरसंहार के लिये कहीं न कहीं जरूर दोषी हैं। राज्य द्वारा हिंसा का यह क्रूर खेल तब शुरू हुआ जब 13 अक्टूबर 2000 को सोनभद्र के करमा थाना क्षेत्र में रात में मुठभेड़ के दौरान चन्दौली के नौगढ़ थानाध्यक्ष ओ.पी. सिंह और सिपाही वेदप्रकाश की कथित माओवादियों की गोली लगने से मौत हो गयी। इस पर मृत थानाध्यक्ष और सिपाही को श्रद्धांजलि देने पहुंचे राजनाथ सिंह ने पुलिस को ललकारा और कहा कि 'अगर वे एक मारें तो आप चार मारें।' उनका यह बयान इस समूचे आदिवासी इलाके के लिए शोषण उत्पीड़न व दमन का कारण बन गया। उनके इस बयान के बाद सोनभद्र, चन्दौली और मीरजापुर में मुठभेड़ों की बाढ़ आ गयी।

भवानीपुर की घटना में शामिल तो इन तीनों जिलों की पुलिस थी, लेकिन पदोन्नति और पुरस्कार सिर्फ मिर्ज़ापुर पुलिस को मिली। सोनभद्र तथा चन्दौली पुलिस ने भी मिर्ज़ापुर पुलिस की तरह पदोन्नति व पुरस्कार पाने के लालच में माओवादियों के नाम पर दलितों-आदिवासियों की हत्या का अभियान शुरू कर दिया।

मई 2001 में करमा थाने की पुलिस ने टिकुरिया गॉंव निवासी राजेन्दर हरिजन को मार गिराया। राजेन्दर क्षेत्र में अपनी बिरादरी के स्वाभिमान, सम्मान और हक़ की आवाज़ उठाने लगा था। इसे भी पुलिस ने नक्सली की सूची में शामिल कर दिया था। इसी वर्ष जुलाई के प्रथम सप्ताह में पन्नूगंज पुलिस ने बगौरा गॉंव निवासी बचाउ हरिजन को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया, जबकि रामगढ़ बाजार के तमाम लोगों का कहना था कि पुलिस ने उसे बाजार में खरीददारी करते वक्त पकड़ा। इसी तरह सितम्बर और नवम्बर में भी एक-एक दलित युवकों की पुलिस ने हत्या की।



विजय विनीत उन पत्रकारों में हैं,जो थानों पर नित्य घुटने टेकती पत्रकारिता के मुकाबले विवेक को जीवित रखने और सच को सामने लाने की चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं.