Jan 12, 2011

'दिशा' ने भेजी सफाई, नहीं मांगी माफ़ी


यह सफाई गोरखपुर के उन संगठनों-बुद्धिजीवियों को भेजी गयी है जो दिशा की गुंडई के खिलाफ गोरखपुर में लामबंद हुए हैं...

तपीश, दिशा छात्र संगठन

पांच जनवरी की दुखद एवं क्षोभपूर्ण घटना के संबंध में आप द्वारा हस्ताक्षरित पत्र 7जनवरी को दोपहर बाद साथी विकास के हाथों प्राप्त हुआ। सबसे पहले हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि दिशा छात्र संगठन किसी भी रूप में साथी चक्रपाणि के साथ घटी घटना को समर्थन नहीं करता है।

पांच जनवरी को दिशा के चार कार्यकर्ता साथी चक्रपाणि से अपनी आपत्ति दर्ज कराने गये थे। बातचीत के दौरान चक्रपाणि का रवैया उकसावे भरा था जिससे तल्खी पैदा हुई और दिशा के एक नये कार्यकर्ता से उनकी झड़प हो गयी। हमें इस घटना का बेहद अफसोस है। हम समझते हैं कि गोरखपुर के बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक हल्कों से संबंधित व्यक्तियों तथा संगठनों को घटना का केवल एक पक्ष ही बताया गया है। अतः हम आपकी सेवा में कुछ तथ्य प्रस्तुत करना चाहते हैं।

भेजी सफाई की फोटो प्रति


1. चक्रपाणि   ने जिस कार्यवाही की शुरूआत दिशा के पर्चे पर मुहर लगा पछास का बताकर वितरित करने से किया वह आगे बढ़ते हुए दिशा की दीवार पत्रिकाकाओं के उपर पछास के पोस्टर चिपका देने से होते हुए दिशा द्वारा किये गये दीवार लेखन के इर्द-गिर्द पछास का नाम लिखने और फिर दिशा का नाम मिटाकर अपने संगठन का नाम लिखने तक जाती है।

2. कम ही लोग जानते हैं कि साथी चक्रपाणि पर्चे पर मुहर लगाने की अपनी गलती को पूर्व में स्वीकार कर चुके हैं।

3. दीवार लेखन को लीपने-पोतने संबंधी जानकारी उनके  एक करीबी मित्र और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता श्री स्वदेश कुमार को भी थी, हालांकि हमलोग पछास को आधिकारिक तौर पर भी इन घटनाओं की शिकायत करने की तैयारी भी कर रहे थे लेकिन इससे पहले कि यह हो पाता 5जनवरी को दुर्भाग्यपूर्ण घटना घट गयी।

हमें इतना ही कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम में दिशा का पक्ष सुने बिना कुछ ऐसे फैसले लिये गये जो हम सभी के व्यापक लक्ष्य को नुकसान पहुंचाने वाले हैं। बुर्जुआ न्यायालय तक दूसरा पक्ष सुने बिना फैसला नहीं लेते लेकिन गोरखपुर के वाम दायरे में 5जनवरी की घटना पर जिस तरह इकतरफा सुनवाई हुई वह क्षोभ पैदा करने वाली है। उक्त तथ्यों को फोटो सहित आपके समक्ष प्रस्तुत करने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि दिशा छात्र संगठन कार्यवाही का समर्थन करती है। आगे का फैसला हम आपके विवेक पर छोड़ते हैं।

नोट- इसके साथ चार तस्वीरें भेजी गयीं थीं जिसमें यह दिखाने की कोशिश है कि पछास कार्यकर्त्ता दिशा के प्रचार-प्रसार के साथ अतिक्रमण करते थे.  


‘दिशा’ के खिलाफ दिल्ली में भी बैठक


दिल्ली विश्वविद्यालय में 11दिसंबर को सामाजिक कार्यकर्ताओं,शिक्षकों और वकीलों ने बैठक कर दिशा छात्र संगठन कार्यकर्ताओं द्वारा परिवर्तकामी छात्र संगठन के नेता चक्रपाणि पर किये कायराना हमले की भर्त्सना  की है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 5दिसंबर की रात चार फाटक के नजदीक  चक्रपाणि पर यह हमला बातचीत के बहाने बुलाकर दिशा के करीब 15-20 कार्यकर्ताओं ने किया था। इस हमले में चक्रपाणि को अंदरूनी चोटें आयी हैं।

दिशा छात्र संगठन प्रमुख: ये तो बाजा 
बजाते हैं, गुंडई कौन कराता है.   
क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन द्वारा आयोजित इस बैठक को लेकर जारी प्रेस विज्ञप्ती में कहा गया है कि वजह चाहे जो हो,मगर घात लगातर किये गये इस हमले को कहीं से भी न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए राजनीतिक चेतना के मशालधारियों को अब सावधान हो जाना चाहिए। बैठक में शामिल हुए दिल्ली विश्विद्यालय  के शिक्षक कुमार संजय सिंह ने कहा कि ‘दिशा के लोगों ने जो मारपीट की है उसकी अब सिर्फ भर्त्सना  ही नहीं ठोस कार्यवाही भी होनी चाहिए, जिससे इस तरह की घटनाओं का दोहराव बंद हो।’

सामाजिक कार्यकर्ता जेपी नरेला की राय में ‘दिशा द्वारा छात्र नेता पर किया गया हमला कोई नायाब नहीं है। यह संगठन पहले भी नेतृत्व की सहमति से ऐसे हमले करते रहा है। दूसरी बात यह कि माफी मांगने की होशियारी भी नेतृत्व की चालबाजी का हिस्सा रहा है। इसलिए अब जरूरत उस कार्यवाही की जिससे ये लोग अगली गुंडई से बाज आयें।’ दिल्ली विश्विद्यालय  के शिक्षक राकेश रंजन ने भी इस घटना की भर्त्सना  की।

क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के कमलेश ने चक्रपाणि पर किये गये इस हमले की पुरजोर भत्र्सना की और मांग रखी कि जिम्मेदार नेतृत्व इस दिशा के इस कायराना करतब पर तत्काल लिखित माफी मांगे। आगे के कार्रवाई के तौर पर बैठक में शामिल लोगों ने पूरे मामले की जानकारी के लिए एक जांच टीम गोरखपुर भी भेजने का निर्णय लिया है। इस मामले में अगली बैठक 18दिसंबर को होनी है। बैठक में राजनीतिक कार्यकर्त्ता  अंजनी कुमार, दिल्ली स्टुडेंट यूनियन के कुंदन, क्रांतिकारी युवा संगठन के सुनील समेत करीब दो दर्जन लोग मौजूद थे।


Jan 11, 2011

मैं रोज हाजिरी लगाती है साहब !


वो लडकी रो रही थी कि सर मैं तो रोज़ अपने स्कूल में पढ़ाती हूँ,वहाँ मेरी हाजिरी लगी हुयी है,मैं  जेल में अपने पति से मिलने भी जाती हूँ और जेल के रजिस्टर में दस्तखत भी करती हूँ .लेकिन फिर भी मुझे फरार घोषित कर दिया है...

हिमांशु कुमार

पिछले दिनों मैंने दंतेवाडा जिले की एक आदिवासी लडकी सोनी सोरी के मुश्किल हालात पर एक लेख लिखा था. जिसमें उसके भांजे लिंगा कोडोपी को दिल्ली से वापिस बुला कर पुलिस के हाथों में सौंप देने के लिए वहां का एस एस पी कल्लूरी इस लडकी से सौदेबाजी कर रहा है.पहले तो उसने धमकी दी कि अगर इस लडकी सोनी सोरी ने अपने भांजे लिंगा कोडोपी को दिल्ली से लाकर पुलिस को नहीं सौंपा तो पुलिस इस लडकी की ज़िंदगी बर्बाद कर देगी.

इसके बाद कल्लूरी नें अपनी धमकी पर अमल करते हुए करते हुए इस लडकी के पति को जेल में डाल दिया तथा इनकी जीप को ज़प्त कर लिया और इस लडकी को भी नक्सलियों के साथ मिल कर थाने पर और एक कांग्रेसी नेता के घर पर हमला करने के दो मामलों में फंसा दिया और इसके खिलाफ वारंट जारी कर दिया. इसके बाद इस लडकी ने मुझसे मदद करने की गुहार की.लेकिन आखिर इस देश में दंतेवाडा के एसएसपी कल्लूरी से ऊपर तो कोई है नहीं. इसलिए मैं इस लडकी की कोई मदद नहीं नहीं कर पाया.


एसआरपी कल्लूरी : कानून से ऊपर

मैं मीडिया,एक्टिविस्टों और नेताओं से इस लडकी की मदद के लिए मिला,लेकिन मदद के नाम पर सबने हाथ खड़े कर दिए.अंत में मैंने इस उम्मीद में एक लेख लिखा की शायद इस लडकी की ज़िंदगी को बर्बाद होने से कोई तो बचाएगा. मुझे उम्मीद थी कि आखिर इस विशाल और महान देश में कोई न कोई तो उसकी मदद करेगा.

अभी बिनायक सेन को उम्रकैद की सज़ा मिलने के बाद टेलीवीज़न पर ऐसे बहुत से बहादुर लोग बोलते हुए दीखते हैं जो अदालत,सरकार,और लोकतंत्र की तारीफ़ में बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं .और सफलतापूर्वक ये सिद्ध  कर रहे हैं कि  हम जैसे लोगों को न्याय व्यवस्था पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहिए क्योंकि  उससे देश कमज़ोर होता है. तो देश की मजबूती की रक्षा की खातिर मैंने सब बातों को स्वीकार कर लिया और उनकी बातें सुन कर मुझे भी खुद के विचारों पर शक और इस देश की व्यवस्था पर विश्वास सा होने लगा था .

लेकिन फिर आये  एक फोन ने मेरे सारे विश्वास को डगमगा दिया.दंतेवाड़ा से फिर उसी आदिवासी लडकी ने मुझे बताया कि सर,दंतेवाडा के एसएसपी कल्लूरी नें फिर दो नयी नक्सली वारदातों में उसका नाम जोड़ दिया है और अदालत में उसके खिलाफ चालान भी पेश कर दिया है.वो लडकी रो रही थी कि सर मैं तो रोज़ अपने स्कूल में पढ़ाती हूँ,वहाँ मेरी हाजिरी लगी हुयी है,मैं  जेल में अपने पति से मिलने भी जाती हूँ और जेल के रजिस्टर में दस्तखत भी करती हूँ .लेकिन फिर भी एसएसपी कल्लूरी ने मुझे फरार घोषित कर दिया है और मुझे मारने की फिराक में है.फोन के उस तरफ वो लडकी रोती जा रही थी और फोन के इस तरफ मैं गुस्से ,बेबसी, और असमंजस की हालत में उसका रोना सुनता जा रहा था.

लाखों लोग इस देश की आजादी के लिए लड़े थे मेरे पिता भी लड़े थे.क्या यही दिन देखने के लिए उन सारे लोगों ने कुर्बानी दी थी ?क्या भगत सिंह इस तरह के देश के लिए शहीद हुए थे? कम से कम मुझे कोई ये तो बता दे की मुझे क्या करना चाहिए ? आदिवासी होता तो बन्दूक उठा सकता था. पर सबने गांधीवादी कह कह कर मुझे इतना इज्ज़तदार बना दिया है कि अब मैं हर अन्याय पर बस इन्टरनेट पर एक लेख लिखता हूँ और सोच लेता हूँ कि काफी देश सेवा हो गयी. अब तो मीडिया वालों ने मेरे फोन भी उठाने बंद कर दिए हैं.

क्या कोई मेरी बात सुन रहा है? हेल्लो? मीडिया, सरकार, न्याय पालिका? है कोई गरीब जनता,आदिवासियों की बात सुनने वाला ? क्या कोई बचा है ? कम से कम इस लोकतंत्र को बचाने की आखिरी कोशिश तो कर लो , कोई है जो इस बेबस आदिवासी लडकी को बचा सकता है?



दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.उनसे vcadantewada@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.



Jan 10, 2011

विनायक सेन के लिए उठे हाथ


सामाजिक और मानवाधिकार नेता विनायक सेन को छत्तीसगढ़ की अदालत द्वारा  24दिसम्बर को माओवादियों का सहयोगी होने के नाते आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी है. सजा सुनाये जाने के बाद से ही चौतरफा विरोधों का सिलसिला शुरू हो गया है.  उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए झारखण्ड के देवघर शहर के वरिष्ठ कलाकार पबन राय ने विनायक सेन के समर्थन में वाटर कलर से बनी चित्रकारी जनज्वार को विशेष तौर पर भेजी है.पवन राय की यह कृति हमें  दैनिक प्रभात खबर के देवघर संपादक संजय मिश्र के सहयोग से प्राप्त हो पाई है...


चित्रांकन- पबन राय

विनायक सेन के लिए उठे हाथ : आवाज नहीं दबेगी




कोलकाता के इंडियन कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स से पढ़े पबन अबतक दर्जन भर  प्रदर्शनियों  में भागीदारी कर चुके हैं. कला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कामों के लिए उन्हें आधा दर्जन पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है.पबन राय खुद को आदिवासी और लोक  कला में पारंगत करने में लगे हैं.इस ध्येय से उन्होंने 'कोर्निक' नाम के कला समूह का गठन भी किया है.उनसे kornik91@rediffmai.comपर संपर्क किया जा सकता है.




Jan 9, 2011

रूपम पाठक ने अभी सिर्फ चेतावनी दी है सरकार


रूपम पाठक का मामला केवल बिहार, भाजपा, नीतीश  कुमार या राजनीतिक ताकतों के मनमानेपन का प्रमाण नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा उदाहरण है जो हर छोटे-बडे व्यक्ति को यह सोचने पर विवश करता है कि नाइंसाफी से परेशान इंसान किसी भी सीमा तक जा सकता है...


डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'


सारे देश में लोगों के लिये यह खबर एक नया सन्देश लेकर आयी है कि बिहार विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनकर आये बाहुबली विधायक राजकिशोर केसरी का जनता से मेलमिलाप के दौरान रूपम पाठक ने सार्वजनिक रूप से चाकू घोंपकर बेरहमी से कत्ल कर दिया। मौके पर तैनात पुलिसवालों ने रूपम को घटनास्थल पर ही पकड लिया और पीट-पीटकर अधमरा कर दिया।


घटनास्थल पर उपस्थित अधिकांश लोगों और विशेषकर पुलिसवालों को इस बात की पूरी जानकारी थी कि विधायक पर हमला क्यों  किया गया है और हमला करने वाली महिला कितनी मजबूर थी। बावजूद इसके आक्रमण करने वाली महिला अर्थात् रूपम पाठक द्वारा किये गए आक्रमण के समय सुरक्षा गार्ड उसको नियन्त्रित नहीं कर सके । उसकी बेरहमी से पिटाई की गयी, जिसका पुलिस को कोई अधिकार नहीं था। जहाँ तक मुझे जानकारी है रूपम की पिटाई करने वाले पुलिसवालों के विरुद्ध किसी प्रकार का कोई प्रकरण तक दर्ज नहीं किया गया है। जबकि रूपम के विरुद्ध हत्या का अभियोग दर्ज करने के साथ-साथ, रूपम पर आक्रमण करने वाले पुलिसवालों के विरुद्ध भी मामला दर्ज होना चाहिये था।

हिरासत में रूपम पाठक: विधायक  को मारने का अफ़सोस नहीं

विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या के बाद यह बात सभी के सामने आ चुकी है कि इस घटना से पहले रूपम पाठक ने बाकायदा लिखित में फरियाद की थी कि राजकिशोर केसरी विधायक चुने जाने के पूर्व से ही यानी पिछले तीन वर्षों से उसका यौन-शोषण करते आ रहे थे और उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित भी कर रहे थे।

रूपम पाठक ने नीतीश प्रशासन से कानूनी संरक्षण प्रदान करने और दोषी विधायक के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने की मांग भी की थी। लेकिन पुलिस प्रशासन और नीतीश सरकार ने रूपम पाठक को न्याय दिलाना तो दूर, किसी प्रकार की प्राथमिक कानूनी कार्यवाही करना तक जरूरी नहीं समझा। आखिर सत्ताधारी गठबन्धन के विधायक के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही कैसे की जा सकती थी?

स्वाभाविक रूप से रूपम पाठक द्वारा पुलिस के पास शिकायत करने के बाद विधायक राजकिशोर केसरी एवं उनकी चौकडी ने रूपम पाठक एवं उसके परिवार को तरह-तरह से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। सूत्र यह भी बताते हैं कि रूपम पाठक से राजकिशोर केसरी के लम्बे समय से सम्बन्ध थे, जिन्हें बाद में रूपम ने यौन शोषण का नाम दिया है।

हालांकि इन्हें रूपम ने अपनी नियति मानकर स्वीकार करना माना है, लेकिन पिछले कुछ समय से राजकिशोर केसरी ने उस की 17-18 वर्षीय बेटी पर कुदृष्टि डालनी शुरू कर दी थी, जो रूपम पाठक को मंजूर नहीं था। इसी कारण रूपम पाठक ने पहले पुलिस में गुहार की और जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो खुद ही विधायक एवं विधायक के आतंक का खेल खतम कर दिया।

रूपम पाठक ने जिस विधायक को मारा है, उस विधायक के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही न करने के लिये बिहार पुलिस के साथ-साथ नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली संयुक्त सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है। विशेषकर भाजपा इस कलंक को धो नहीं सकती, क्योंकि राजकिशोर केसरी को भाजपा ने यह जानते हुए भी टिकट दिया कि वह पूर्णिया जिले में आपराधिक छवि के व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। इस बात की पुष्टि चुनाव लडने के लिये पेश किये गये स्वयं राज किशोर केसरी के शपथ-पत्र से ही होती है।
पवित्र चाल,चरित्र एवं चेहरे तथा भय, भूख एवं भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने का नारा देने वाली भाजपा का यह भी एक चेहरा है, जिसे बिहार के साथ-साथ पूरे देश को ठीक से पहचान लेना चाहिये। नीतीश कुमार को देश में सुशासन की शुरूआत करने वाला जननायक सिद्ध करने वालों को भी अपने गिरेबान में झांकना होगा। इससे उन्हें ज्ञात होना चाहिये कि बिहार के जमीनी हालात कितने पाक-साफ हैं।

जो सरकार एक महिला द्वारा दायर मामले में संज्ञान नहीं ले सकती, उससे किसी भी नयी शुरूआत की उम्मीद करना दिन में सपने देखने के सिवा कुछ भी नहीं है। रूपम पाठक का मामला केवल बिहार, भाजपा, नीतीश कुमार या राजनीतिक  ताकतों के मनमानेपन का ही प्रमाण नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा उदाहरण है जो हर छोटे-बडे व्यक्ति को यह सोचने पर विवश करता है कि नाइंसाफी से परेशान इंसान किसी भी सीमा तक जा सकता है।


बलात्कार के आरोपी विधायक केसरी

पुलिस, प्रशासन एवं लोकतान्त्रिक ताकतें आम व्यक्ति के प्रति असंवेदनशील होकर अपनी पदस्थिति का दुरूपयोग कर रही हैं और देश के संसाधनों का मनमाना उपयोग तथा दुरूपयोग कर रही हैं। सत्ता एवं ताकत के मद में चूर होकर आम व्यक्ति के अस्तित्व को ही नकार रही हैं।

ऐसे मदहोश लोगों को जगाने के लिये रूपम ने फांसी के फन्दे की परवाह नहीं करते हुए अन्याय एवं मनमानी के विरुद्ध एक आत्मघाती कदम उठाया है।  हालांकि इसे न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन रूपम का यह कदम न्याय एवं कानून-व्यवस्था की विफलता का ही प्रमाण एवं परिणाम है।

जब कानून और न्याय व्यवस्था निरीह, शोषित एवं दमित लोगों के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं तो रूपम पाठक तथा फूलनदेवियों को अपने हाथों में हथियार उठाने पडते हैं। जब आम इंसान को हथियार उठाने  पड़ते हैं तो उसे कानून अपराधी मानता है और सजा भी सुनाता है, लेकिन देश के कर्णधारों के लिये और विशेषकर जनप्रतिनिधियों तथा अफसरशाही के लिये यह मनमानी के विरुद्ध एक ऐसी शुरूआत है, जिससे सर्दी के कडकडाते मौसम में अनेक लोगोंका पसीना छूट रहा है।

अत: बेहतर होगा कि राजनेता, पुलिस एवं उच्च प्रशासनिक अधिकारी रूपम के मामले से सबक लें और लोगों को कानून के अनुसार तत्काल न्याय देने या दिलाने के लिये अपने संवैधानिक और कानूनी फर्ज का निर्वाह करें। अन्यथा हर गली-मोहल्ले में आगे भी अनेक रूपमों को पैदा होने से रोका नहीं जा सकेगा। समझने वालों के लिये रूपम एक चेतावनी है!
 

Jan 8, 2011

'जनचेतना' ने बनाया 'दिशा' कार्यकर्ताओं को कायरों का कुनबा


‘जनचेतना’से जुड़े करीब दर्जन भर लोगों ने  छात्रनेता चक्रपाणि पर यह  हमला तब किया  है जब देश के सभी जनवादी संगठनों के लिए चिंता का विषय पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनायक सेन को सुनाई गयी आजीवन कारावास के खिलाफ व्यापक एकता बनाना है...


धर्मेंद्र कुमार, गोरखपुर

देश की तकदरी बदलने के बहाने पैसा वसूली करने वाली किताब की दुकान ‘जनचेतना’ और इसकी सहयोगी संस्था 'दिशा छात्र संगठन'  से जुड़े लोगों ने अबकी बार गोरखपुर के एक छात्रनेता चक्रपाणि पर घात लगाकर हमला किया है,जिसमें उनको अंदरूनी चोटें आयी हैं। साम्यवादी राजनीति में परिवारवादी परंपरा को क्रांतिकारी रणनीति मानने वाले इस कुनबे ने छात्र नेता पर यह हमला क्रांतिकारी राजनीति का हिस्सा मानकर किया है और उन्होंने धमकी दी है कि "आगे भी ऐसे हमले के लिए विरोधी तैयार रहें क्योंकि पहले भी ऐसे हमले हम करते रहे हैं।"

वहीं गोरखपुर के बुद्धिजीवियों और संगठनों ने नेतृत्व के इशारे पर ‘दिशा छात्र संगठन’ और जनचेतना  द्वारा किये गये इस कुकृत्य को गुंडई कहा है और दिशा छात्र संगठन से सभी तरह के सामाजिक-राजनीतिक संबंध समाप्त करने का निर्णय लिया। सनद रहे कि यह वही छात्र संगठन है जो गोरखपुर में बजरंग दल, विद्यार्थी परिषद् ,हिन्दू युवा वाहिनी  जैसे संगठनों से माफी मांगता रहा है। इसी  संगठन ने वर्ष 2000में गोरखपुर साइकिल स्टैंड के गुंडों से हाथ जोड़कर कर माफी मांगी थी कि आइंदा से हमारे कार्यकर्ता साइकिल स्टैंड में साइकिल नहीं रखेंगे। जिसके सालभर बाद तक स्टैंड पर साइकिलें खड़ी नहीं की गयीं।
 
पहली बैठक का प्रस्ताव : सिलसिला जारी 

गौरतलब है कि यह कायराना करतब  क्रांति की दुकान ‘जनचेतना’ के उन लोगों ने किया है जो गोरखपुर में ‘दिशा छात्र संगठन’ नाम से दुकान के लिए पैसा वसूली करते हैं। कभी-कभार खुद के क्रांतिकारी भ्रम को ढंकने के लिए दीवार रंगने, फेरी लगाने और पोस्टर चिपकाने का काम भी कर लेते हैं,जिससे अगले वसूली का साहस उनमें बरकरार रहे। पीडीएफ़आइ के राष्ट्रीय संयोजक अर्जुन प्रसाद सिंह ने कहा कि 'छात्र नेता चक्रपाणिपर किया गया हमला निंदनीय है
.समाज बदलने के जोश में जुड़े युवाओं को यह संगठन कायर 
बना रहा है और बिरादराना संगठनों पर हर तरह के हमले कर रहा है.यही वह संगठन है जिसने शासक   वर्ग के कहने से पहले ही   माओवादियों को आतंकवादी कहा था.'
घटना के अनुसार गोरखपुर के चार फाटक इलाके में 5दिसंबर की रात आठ बजे परिवर्तनकामी छात्रसभा के नेता चक्रपाणि को दिशा से जुड़े मुकेश नाम के एक लड़के ने फोन कर बातचीत के बहाने बुलाया। चक्रपाणि के वहां पहुंचते ही ट्रक के पीछे छिपे 15-20 लोगों ने चक्रपाणि पर यह कहते हुए हमला बोल दिया कि तुमने हमारे नारे के ऊपर नारा कैसे लिखवाया। इस मारपीट में मुकेश भी शामिल था। चक्रपाणि ने बताया कि ‘मारपीट देख वहां लोग जुटने लगे तो कायरों की ‘दिशा’ हीन टीम वहां से यह कहते हुए हवा हो गयी कि यह तो हमारी पहली क्रांतिकारी कार्यवाही है। अब आगे भी हम लोग ऐसी कार्यवाहियां करते रहेंगे।’

हिंदी कवयित्री कात्यायिनी और उनके कुनबे के मालिकाने में चल रहे ‘जनचेतना’,'राहुल फाउंडेशन', 'परिकल्पना प्रकाशन', 'अनुराग बाल ट्रस्ट', 'बिगुल मजदूर दस्ता', 'दिशा छात्र संगठन' की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक बेइमानियों,धूर्तताओं और चालबाजियों को लेकर कुछ महीने पहले इसी वेबसाइट पर एक लंबी और सारगर्भित चर्चा हुई थी। उस चर्चा के दौरान मुझे एक बार लगा था कि यह क्यों किया जा रहा है। क्या ये लोग इतने बेईमान हैं कि सच में क्रांति की दुकान चला रहे हैं और जनता और कार्यकर्ताओं का खून चूस रहे हैं।

मगर अब जबकि यह कायराना हरकत सबके सामने आ चुकी है तो उनके सरोकारों को समझना अब किसी के लिए मुश्किल नहीं रह गया है। इस बावत सामाजिक कार्यकर्ता जेपी नरेला ने कहा कि 'यह किसी संगठन के पतित होने का चरम बिंदु है जब वह बिरादराना संगठनों पर घात लगाये.एक नारे के ऊपर दूसरा नारा लिखा जाना ऐसी कौन सी बात हो गयी जिसके  लिए गुंडों जैसी हरकत करनी पड़ी.'  

हिंदी कवयित्री कात्यायिनी,उनके पति शशिप्रकाश  और बेटे अभिनव समेत करीब आधा दर्जन से अधिक उनके पारिवारिक सदस्यों के मालिकाने में चल रही किताबों की दुकान ‘जनचेतना’से जुड़े करीब दर्जन भर लोगों ने परिवर्तनकामी छात्रसभा के नेता चक्रपाणि को लेकर यह कायराना हरकत तब की है जब देश के सभी जनवादी संगठनों के लिए चिंता का विषय पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनायक सेन को सुनाई गयी आजीवन कारावास के खिलाफ व्यापक एकता बनाना है।

सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार अंजनी कुमार की राय में 'यह संगठन  राजनीति में नहीं कायरता में महारत हासिल किये हुए है.यह संगठन जिस तरह के कामों को क्रांतिकारी रणनीति बनाये हुए है अगर उसी रणनीति को दूसरे संगठन बस  दो-चार दिन व्यवहार में उतार दें तो पता चल जायेगा कि कुनबे की असल राजनीति क्या है.'  

मारपीट के शिकार हुए छात्र नेता चक्रपाणि ने 'जनज्वार'से हुई बातचीत में बताया कि ‘मुकेश जिसका मोबाइल नंबर 07275050105है उसने मुझे कई दफा फोन किया कि मैं आपसे मिलकर कुछ बात करना चाहता हूं। मुकेश के विश्वविद्यालय का छात्र होने के नाते मुझे बातचीत करने में कोई हिचक नहीं हुई और मैं उसकी बुलाई हुई जगह पर पहुंचा। पहले मैं गोरखपुर चार फाटक के पास विश्वविद्यालय वाली साइड में खड़ा था तो उसने मुझे फोन कर बुलाया कि आप दूसरी तरफ चले आइये। उसकी सुविधा को देखते हुए मैं उस पार पहुंच गया। पहुंचने के एक-दो मिनट तक वह हालचाल पूछता रहा और उसके बाद वह लोग मुझे पीटने लगे।’हालांकि वारदात के बाद से ही मुकेश का मोबाइल बंद है.

चक्रपाणि के मुताबिक ‘यह हमला 'दिशा' में पिछले कुछ वर्षों से सक्रिय कार्यकर्ता प्रमोद, प्रशांत, अपूर्व और तपीश ने कराया है। मगर मारने वालों में जिनको मैं पहचान सका हूं उनमें राजू,विरेश और मुकेश मुझे मार और गालियां दे रहे थे। अंधेरा होने की वजह से मैं बाकियों को नहीं पहचान सका। यह हमला क्यों किया गया?के बारे में पता चला कि ‘परिवर्तनकामी छात्रसभा’ का सातवाँ राष्ट्रीय सम्मेलन 4-5 दिसंबर को देहरादून में होने वाला था।

सम्मेलन के लिए दीवार पर प्रचार के लिए लिखते वक्त दिशा के लिखे गये किसी एक नारे पर ओवरराइटिंग हो गयी,जिसका बदला उन्होंने कायरों की तरह पीटकर लिया है।’चक्रपाणि से यह पूछने पर कि इस मामले में आपने मुकदमा क्यों नहीं दर्ज कराया तो उनका जवाब था,' हमलोग उनकी इस गुंडई में जो राजनीतिक विचलन देखते हैं उसका जवाब राज्य के थानों में नहीं है.हाँ मगर जवाब जरूर देंगे , इतना तो तय है.'  

कात्यायनी के कुनबे की इस कायराना हरकत के खिलाफ गोरखपुर में लगातार बैठकों का सिलसिला जारी है। हमले के अगले दिन हुई बैठक में गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के शिक्षक अनिल राय ने कहा कि ‘दिशा कार्यकर्ताओं की इस गुंडई की जितनी भी निंदा की जाये, वह कम है।' अनिल राय ने दिशा कार्यकर्ताओं के इस कायराने हमले पर यह भी कहा कि'इस संगठन को कायराना हरकत परंपरा विरासत में मिली है। इसलिए दिशा की गुंडई के खिलाफ शहर के समस्त न्यायप्रिय लोगों एकजुट होना चाहिए।'दिशा में सक्रिय रहे गोरखपुर के पूर्व कार्यकर्ता और शिक्षक संतोष सिंह ने बताया कि ‘यह संगठन हमेशा ही समाज के साथ बेइमानियों की शिक्षा देता है और कात्यायिनी के परिवार को लाभ पहुंचाने की हर कोशिश को क्रांति कहता है।’

पीयूएचआर के गोरखपुर मंडल अध्यक्ष चतुरानन ओझा ने कहा कि 'दिशा कार्यकर्ता परिवर्तनकामी छात्रसभा की बढ़ती साख से परेशान थे। इसी के चलते दिशा कार्यकर्ता अब गुंडई पर उतर रहे हैं। मगर उनकी यह गुंडई बर्दाश्त नहीं की जा सकती है और उनके इस कायराने हमले का  प्रतिकार सही समय पर अवश्य होना चाहिए।' हास्यास्पद है कि वारदात के पांच दिन बाद भी जनचेतना  और दिशा छात्र संगठन की ओर से कोई लिखित बयान या माफीनामा नहीं आया है. सूत्रों के मुताबिक वारदात के दो दिन बाद तक जनचेतना से जुड़े लोग यह कहते रहे कि  दिशा ने कायराना हरकत नहीं की है,पर अब मौखिक तौर पर  स्वीकार करना शुरू किया है.

गोरखपुर के पत्रकार मनोज सिंह ने कहा कि 'जिस तरह से बातचीत के बहाने बुलाकर छात्र नेता की सुनियोजित पिटाई की गयी है, उसके बाद तो दिशा वालों की बुलाई जगह पर जाने में लोग डरेंगे. जिस विवाद का निपटारा बातचीत से हो सकता था उसके लिए ऐसा कर उन्होंने अपनी राजनीतिक समझ को ही उजागर किया है. ' 
'पहल' साहित्यिक मंच के रामू सिद्धार्थ के मुताबिक दिशा कार्यकर्ताओं द्वारा पूर्व में भी जनवादी-क्रांतिकारी संगठनों के कार्यकर्ताओं पर हमला बोला जा चुका है। अब उनकी गुंडई इतनी बढ़ गयी है तो समाज को जागृत कर इस संगठन का व्यापक स्तर पर पर्दाफाश किया जाना चाहिए।' गोरखपुर,नोएडा और दिल्ली में कात्यायनी और उनके पति शशिप्रकाश के संगठन पहले भी लोगों को बातचीत के बहाने अकेले में बुलाकर मारपीट करते रहे हैं। नोएडा पुलिस चौकी में तो इनके खिलाफ इस मामले में मुकदमा भी दर्ज है।

'न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव' के स्वदेश सिन्हा ने घटना की घोर निंदा करते हुए कहा कि ‘ऐसी घटिया और ओछी हरकत की जितनी निंदा की जाये,कम है। परिवर्तनकामी छात्रसभा छात्रों के बुनियादी अधिकारों के लिए लड़ने वाला संगठन है। उसके खिलाफ खड़े होने वाले किसी भी ताकत का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए और मुंहतोड़ जवाब दिया जाना चाहिए।'

इस घटना के खिलाफ गोरखपुर में हुई बैठक में राजाराम चौधरी, पीयूएचआर के वैजनाथ मिश्र, श्याम मिलन, सामाजिक कार्यकर्ता विकास दिवेदी, सुरेंद्र, 'पहल' के आनंद पांडेय आदि लोगों ने भी इस घटना की निंदा की। इसके साथ ही डॉक्टर संध्या पांडेय, पीयूसीएल के जिलाध्यक्ष फतेहबहादुर सिंह, भाकपा माले के सचिव राजेश साहनी, उत्तराखंड के सामाजिक कार्यकर्ता मुकुल,सुनील चौधरी आदि ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की है और 'दिशा'से कोई संबंध न रखने की बात कही।



Jan 6, 2011

नंदीग्राम,लालगढ़ और नारायण पटना जनसंघर्षों के नये मॉडल - गणपति

माओवादी पार्टी  के महासचिव गणपति के साक्षात्कार की अंतिम किस्त और भाग-4


पार्टी मुख्यतः जनता से सहयोग लेती है और हमारे गुरिल्ला जोन में व्यापारियों से फंड लेती है। हमारे पास एक साफ जनवित्तीय नीति है। क्षेत्र में विभिन्न तरीके का काम करने वाले ठेकेदारों से हमारी पार्टी वाजिब लेवी भी लेती है। इस फंड का एक बड़ा हिस्सा जनसत्ता निकायों द्वारा जनता के कल्याण पर खर्च होता है...गणपति, इस अंतिम किस्त के आलावा भाग-१,भाग-२ और भाग-३ के क्रम में छपे गणपति के ये सभी साक्षात्कार हिंदी में पहली बार सिर्फ जनज्वार पर ही प्रकाशित हुए  हैं.गणपति के भेजे जवाबों का अनुवाद जनज्वार टीम ने किया है.बाकी साक्षात्कारों को पढ़ने के लिए कर्सर नीचे ले जाएँ...




हाल ही में गृह मंत्रालय ने  आरोप लगाया कि आप विदेशों से विशेषकर चीन,म्यांमार और बंगलादेश से हथियार और पैसे प्राप्त कर रहे हैं। वे यह भी आरोप लगा रहे हैं कि उत्तर पूर्व के अलगाववादी संगठनों से आपको सहायता मिल रही है, इस बारे में आपका क्या स्पष्टीकरण है?

हमारी पार्टी को जनता से अलग-थलग करने और उसे एक आतंकवादी और गद्दार संगठन के रूप में चित्रित करने के लिए शासक वर्ग द्वारा हमारे खिलाफ जो मनोवैज्ञानिक युद्ध चलाया जा रहा है, यह दोषारोपण उसी का हिस्सा है। हमारे हथियार मुख्यतः देशी हैं। सभी हथियार हमने मुख्यतः सरकारी सशस्त्र बलों पर हमला करके जब्त किये हैं। दुश्मन यह भलीभांति जानता है कि हथियारों का हमारा मुख्य स्रोत यही है।

हमारी पार्टी विभिन्न राष्ट्रीयता के संघर्षों का समर्थन करती है जो राष्ट्रीयता की मुक्ति के लिए और आत्मनिर्णय के अधिकार चलाये जा रहे हैं। इन संघर्षों का नेतृत्व करने वाले कुछ संगठनों के साथ हमारे राजनीतिक संबंध हैं। हमने अपनी पत्रिकाओं में भी इसके बारे में वक्तव्य जारी किये हैं। व्यापक जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली एक क्रांतिकारी राजनीतिक पार्टी के रूप में और भविष्य में सत्ता में आने के बाद इस देश के लिए पूरी तरह जिम्मेदार सरकार का नेतृत्व करने वाली पार्टी के रूप में विश्व में विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं वाले देशों के साथ पंचशील सिद्धांत के आधार पर संबंध स्थापित करेंगे।

मौजुदा समय में और भविष्य में भी विश्व के विभिन्न संगठनों और पार्टियों के साथ हम विश्व क्रांति के हित में संबंधों को बनायेंगे। पार्टी कार्यक्रम के जरिये बहुत पहले ही इस नीति की घोषणा कर दी गयी है। जनयुद्ध की जरूरतों को पूरा करने के लिए हम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में हथियार भी खरीदेंगे। हथियारों का यह हमारा तीसरा और अंतिम स्रोत है। उन देशों से हथियार और पैसा प्राप्त करने के बारे में चिदम्बरम और जीके पिल्लई ने जो दोषारोपण किया है, वह निराधार बकवास है।

वस्तुतः भारत सरकार ही क्रांतिकारी आंदोलन,राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों और लोकतांत्रिक जनांदोलनों को कुचलने के लिए अमेरिका, रूस, फ्रांस जैसे साम्राज्यवादी देशों तथा इजरायल और दूसरे देशों से हथियार, युद्ध सामग्री और आधुनिक तकनीक खरीद रही है। इतनी बड़ी मात्रा में युद्ध सामग्री के साथ भारतीय विस्तारवाद दक्षिण एशियाई देशों के लिए खतरा बनता जा रहा है और यह पाकिस्तान के साथ हथियारों की दौड़ को भी बढ़ावा दे रहा है। क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कामरेडों को निशाना बनाने और उनकी हत्या करने का प्रशिक्षण लेने के लिए यहां से अफसरों को कुख्यात गुप्तचर एजेंसियों जैसे मोसाद और सीआईए के पास भेजा जा रहा है। शासक वर्ग और उनकी सेना के उच्च अधिकारी जनता के पैसों को नष्ट कर रहे हैं। विभिन्न सौदों में दलाली के बतौर अरबों रुपये अपनी झोली में भर रहे हैं और देश से गद्दारी कर रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इसकी निंदा  करनी चाहिए और इस पर सवाल उठाना चाहिए।

माओवादी नेतृत्व को भारी मात्रा में खनन उद्योगों और दूसरी कारपोरेट कंपनियों से फंड मिल रहा है, इस आरोप पर आपकी क्या सफाई देंगे?

यह भी सरकार द्वारा हमारे बारे में चलाये जा रहे गंदे प्रचार का हिस्सा है। वे यहां तक कहते हैं कि हम सालाना पांच हजार करोड़ रुपये इकट्ठा कर रहे हैं। जीके पिल्लई, पी चिदम्बरम और प्रकाश सिंह लगातार ‘वसूली’ की बात कर रहे हैं। शायद वे दलाली के रूप में हजारों करोड़ रुपये देखने के आदी हो चुके हैं और इसी आदत से मजबूर होकर वे हमारे धन संग्रह को भी इसी अर्थ में देख रहे हैं। जितनी राशि इकट्ठा करने का आरोप हम पर लगता है उसका एक प्रतिशत भी इकट्ठा कर पाते तो हम जनता के लिए बहुत कुछ कर सकते थे।

हमारी पार्टी मुख्यतः जनता से सहयोग लेती है और हमारे गुरिल्ला जोन में व्यापारियों से फंड लेती है। हमारे पास एक साफ जनवित्तीय नीति है। हमारे क्षेत्र में विभिन्न तरीके का काम करने वाले ठेकेदारों से हमारी पार्टी वाजिब लेवी भी लेती है। इस फंड का एक बड़ा हिस्सा जनसत्ता निकायों द्वारा जनता के कल्याण पर खर्च होता है।

जहां तक खनन कंपनियों का सवाल है, हमारी जनता हरसंभव तरीके से उनको हमारे मजबूत क्षेत्र में आने से रोकने के लिए लड़ रही है। हमारी पार्टी इन संघर्षों का नेतृत्व कर रही है। अतः स्पष्ट है कि इन कंपनियों से फंड इकट्ठा करने का सवाल ही नहीं पैदा होता। पुलिस अफसरों, सरकारी अधिकारियों और शासकवर्गीय पार्टियों के लोगों को जो गैरकानूनी तरीके से विभिन्न संगठनों से करोड़ों रुपये इकट्ठा करते हैं,दलाली खाते हैं और अपने पैसों को स्विस बैंक में जमा करते हैं,हमारे खिलाफ उंगली उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

ईराक और अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के संदर्भ में,ओबामा की नीति के बारे में,भारत-अमेरिका परमाणु डील के बारे में और हाल में पास हुए न्यूक्लियर लाइबिलिटी बिल के बारे में आपका क्या मूल्यांकन है? ओबामा की भारत यात्रा को आप कैसे देखते हैं?

ईराक युद्ध को जारी रखने के लिए अमेरिका को सैकड़ों बिलियन डालर खर्च करने पड़े जिससे उसकी अर्थव्यवस्था तबाह हो गयी। इस युद्ध के दलदल में फंसने के कारण हजारों अमेरिकी सैनिक मारे गये हैं। बुश ने बहुत घमंड से कहा था कि वह कुछ महीनों में ही परिस्थितियों पर नियंत्रण पा लेगा, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका। उसकी काफी बेइज्जती हुई। इन कारणों से ओबामा की तो बात ही छोड़िये,बुश को भी बहुत पहले ही सेना वापसी की बात करनी पड़ी थी।
अमेरिका का ईराक पर हमला मानवता के प्रति एक जघन्य अपराध है। वस्तुतः अमेरिका ने वहां कोई बहादुराना युद्ध नहीं लड़ा। अमेरिका एक बहुत बड़ी ताकत है, लेकिन उसने वहां क्या किया? ईराकी शहरों-कस्बों पर लाखों टन बम बरसाये, लाखों इराकियों को मार डाला। वहां तबाही मचायी और दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता, उसकी समृद्ध विरासत, संस्कृति और समाज को नष्ट कर डाला। अतः जिस दिन से ईराक पर कब्जा किया, उसी दिन से अमेरिका को ईराक की मुक्तिकामी जनता, देशभक्तों और विद्रोहियों के प्रतिरोधों का सामना करना पड़ा।

अमेरिकी साम्राज्यवाद ने सद्दाम द्वारा बनाये राज्य सेना, न्याय व्यवस्था, वैधानिक निकाय और प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह नष्ट कर डाला। अपनी कठपुतलियों को सामने रखकर वह नवऔपनिवेशिक राज्य बनाने में जुट गया। इसने कठपुतली ताकतों के सथ एक नयी शासन व्यवस्था बनायी। इसने सद्दाम और उसके अनुयायियों को तो नष्ट कर दिया,लेकिन जनता और अमेरिका की कठपुतलियों के बीच पैदा हो चुके नये अंतरविरोधों को हल नहीं कर सका। जन प्रतिरोधों को दबाने में भी वे नाकामयाब रहे। ओबामा ने जो सेना वापस बुलाई है उसकी संख्या अभी ईराक में मौजूद संख्या से कम है। हाल ही में जब ईराकी राष्ट्रीय बलों ने बड़े हमले को अंजाम दिया तब अमेरिकी सेना उसकी मदद के लिए ईराक की बैरक से तुरंत बाहर आ गयी।

ओबामा जब सत्ता में आये तो उन्होंने 30 हजार अतिरिक्त सेना को अफगानिस्तान भेजा। अफगान जनता के भीषण विरोध के बीच चुनाव का पाखंड आयोजित किया और अमेरिका की कठपुतली हामिद करजई को जिताया गया। अमेरिकी बमबारी में मरने वाले 90 प्रतिशत लोग सामान्य नागरिक हैं। अमेरिकी नेतृत्व में नाटों की सेना अंधाधुंध तरीके से अफगान जनता को मार रही है। अमेरिकी अत्याचार इतना भयानक है कि उसकी कठपुतली करजई को अपना मुंह खोलने पर बाध्य होना पड़ा। पश्चिमी पाकिस्तान में ड्रोन हमले में वे सैकड़ों आम लोगों को मार रहे हैं।

करजई की सत्ता शहरों तक सीमित है। अफगान जनता अपने पूरे इतिहास में किसी भी घुसपैठिये के शासन के आगे नहीं झुकी है। सारी मुसीबतों का सामना करते हुए जनता ने अपनी जमीन पर से साम्राज्यवादियों और कब्जा करने वालों को भगा दिया है। ठीक रूसी साम्राज्यवादियों की तरह अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए भी अफगान राजनयिक कब्र साबित होगी। ओबामा भी बुश की ही राजनयिक नीतियों को मध्य और दक्षिण एशिया में लागू कर रहे हैं। चीन को घेरने, अफगानिस्तान में स्थायी बेस बनाने और कैस्पियन समुद्री गैस पर नियंत्रण करके विश्व पर आधिपत्य जमाने की अमेरिकी रणनीति का असफल होना तय है।

यूपीए प्रथम काल के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जनता के कड़े विरोध को नजरअंदाज करते हुए अमेरिका के साथ सिविलियन न्यूक्लियर डील को पास करके यह सिद्ध कर दिया कि वह अमेरिकी साम्राज्यवादियों का एक विश्वस्त सेवक हैं। संसद द्वारा हाल में पास किया गया न्यूक्लियर लाइबिलिटी बिल और कुछ नहीं,इसी चाकरी की निरंतरता है। भोपाल गैस कांड में हजारों लोगों की भयानक तरीके से जान गयी और भोपाल के हजारों लोगों के लिए यह एक बड़ी दुर्घटना साबित हुई। भारत की जनता के दिलादिमाग में यह जख्म आज भी निरंतर टीस रहा है और अब यूपीए सरकार ने बेशर्मी के साथ इस बिल को तैयार करने की जुर्रत की है जिसमें अनेक ऐसे ‘भोपाल की संभावना बढ़ गयी है।

इस बिल ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि यदि ऐसे जनसंहार होते हैं तो इसके लिए जिम्मेदार विदेशी पूंजीपतियों को न्यूनतम जिम्मेदारी से भी मुक्त कर दिया जाये। (जैसा कि वारेन एण्डरसन और डो केमिकल के मामले में हुआ।)जहां भारतीय जनता पार्टी ने यूपीए सरकार को इस बिल को पास कराने में मदद की वहीं अपने आपको कम्युनिस्ट कहने वाली वाम पार्टियों ने एक बार फिर अपना समझौतावादी चरित्र बेनकाब किया। उन्होंने इस विश्वासघाती बिल की दृढ़तापूर्वक मुखालफत नहीं की और इसके खिलाफ जनांदोलन शुरू नहीं किया। ओबामा के आने से पहले इस बिल को पास कराने में मनमोहन सिंह ने कड़ी मेहनत की।

अमेरिकी साम्राज्यवाद पूरे विश्व में गरीब देशों को लूट रहा है। शोषित राष्ट्रीयताओं का दमन कर रहा है और कुख्यात ठगों ओर तानाशाहों को सत्ता में बिठा रहा है। जो देश उसका सहयोग नहीं कर रहे,उन्हें धमका रहा है। किसी भी हद तक जाकर तेल-खनिज और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों और स्रोतों को लूट रहा है। अतः यह दुनिया की जनता का दुश्मन नंबर एक है। इसके नेता बराक ओबामा से समूची मानवता को घृणा करनी चाहिए। इसके पूर्ववर्ती जॉर्ज बुश ने पूरी दुनिया से अपने लिए घृणा इकट्ठा की,तब अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने बराक ओबामा को इस योजना के साथ पेश किया कि उनके रंग से जनता को धोखा दिया जा सकता है। हालांकि ओबामा बुश की नीतियों का विरोध करते रहे हैं,लेकिन व्हाइट हाउस में घुसने के बाद उनके द्वारा लिये गये सभी निर्णय और नीतियां बुश प्रशासन के अंतिम दिनों तक के निर्णयों और नीतियों की निरंतरता ही है।

वास्तव में जॉर्ज बुश और बराक ओबामा के बीच का अंतर उनके रंग और उनकी पार्टियों के नाम में ही है। विश्व की जनता,शोषित राष्ट्रीयताओं और देश तथा अमेरिका के मजदूर वर्ग के दमन-उत्पीड़न के मामले में इनके बीच कोई फर्क नहीं है। इस तथ्य से बिल्कुल भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस काले राष्ट्रपति को कुख्यात सफेद अमेरिकी साम्राज्यवादी गिद्धों द्वारा चुना गया है।

भारत के दलाल शासक वर्ग ओबामा का स्वागत पलक-पावड़े बिछाकर कर रहे हैं। ओबामा के स्वागत का मतलब संप्रभुता, स्वतंत्रता, स्वाधीनता, आत्मनिर्भरता, शांति, न्याय और लोकतंत्र के मूल्यों से गद्दारी है। अपने प्यारे देश में ओबामा को आमंत्रित करने का मतलब इसकी युद्धपरक आक्रमणकारी शाषक और आधिपत्य वाली नीतियों की चाकरी है। अतः भाकपा (माओवादी)की केंद्रीय कमेटी की तरफ से मैं समूची जनता,क्रांतिकारी और जनवादी संगठनों तथा भारत की सभी देशभक्त ताकतों का आह्वान करता हूं कि वे विभिन्न तरीकों से अपना विरोध दर्ज करें और एक स्वर में जोरदार तरीके से ‘ओबामा वापस जाओ’ का नारा लगायें।

अंत में, 2007 में हुई एकता कांग्रेस के बाद सफलता और असफलता का मूल्यांकन आप कैसे करते हैं?

जनवरी 2007 में हमारी एकता कांग्रेस हुई। इसने मुख्य, तात्कालिक और केंद्रीय कार्यभारों को हाथ में लिया-पूरे देश में जनयुद्ध को तेज करना, गुरिल्ला युद्ध को चलायमान युद्ध में बदलना और आधार क्षेत्र की स्थापना के उद्देश्य से पीएलजीए को पीएलए (नियमित सेना) में बदलना। इसी के तहत हमारी कांग्रेस ने हमें कई कार्यभार दिये। जैसे कि जनसंघर्षों को तेज करना, आंदोलन को फैलाना, संयुक्त मोर्चा बनाना और उसे मजबूत करना। पिछले साढ़े तीन सालों में हमारी समूची पार्टी अपने आपको जनता के बीच मजबूती से जमाते हुए हरसंभव तरीके से इन कार्यभारों को पूरा करने के लिए लड़ी।
इस प्रक्रिया में हमें कुछ महत्वपूर्ण सफलतायें हासिल हुईं। हमें कुछ गंभीर असफलताओं का भी सामना करना पड़ा। हमें कई मूल्यवान अनुभव हासिल हुए। हमने कुछ मजबूत सबक सीखे। कुल मिलाकर जब हम अपनी सफलताओं की ओर देखते हैं तो हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि इन सफलताओं के द्वारा भारतीय क्रांति को विजयपथ पर आगे बढ़ाने के लिए जरूरी बुनियाद अधिक मजबूत हुई है।

पिछले साढ़े तीन वर्षों में हमारे देश के कई हिस्सों में हमारी पार्टी के नेतृत्व में जनसंघर्षों का विस्फोट हुआ है। विशेषकर दण्डकारण्य, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडीशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में जनता और विदेशी कंपनियों द्वारा की जा रही उनके संसाधनों की लूट के खिलाफ और विशेष तौर पर आदिवासियों के विस्थापन के खिलाफ व्यापक स्तर के संघर्षों में शामिल हुई है। भारतीय शासक वर्ग ने सलवा जुडूम,सेन्द्रा,नागरिक सुरक्षा समिति और हरमदवाहिनी जैसे गुण्डा गैंग खड़े कर लिये हैं और जनता पर भयानक हिंसा और अत्याचार बरपा रहे हैं। इसके बावजूद जनता हमारी पार्टी के नेतृत्व में और पीएलजीए के समर्थन से बहादुराना संघर्ष चला रही है।

कलिंगनगर, सिंगुर, नंदीग्राम, लालगढ़, नारायण पटना, दुमका, पुलावरम, लोहानदिगुदा, रावघाट, पलमाड़ और कई दूसरी जगहों की जनता बड़े पैमाने पर लामबंद हुई है और संघर्षों में शामिल हुई है। नंदीग्राम,लालगढ़ और नारायण पटना जनसंघर्षों के नये मॉडल के रूप में सामने आये हैं। राजनीतिक मुद्दों पर हमने जिन विभिन्न कार्यक्रमों को अपने हाथ में लिया उसमें हमने लाखों जनता को लामबंद किया। विभिन्न राज्य विधानसभाओं और संसद के चुनाव का बहिष्कार करने वाले हमारे राजनीतिक कार्यक्रमों का जनता ने बड़े उत्साह के साथ स्वागत किया। हमारे आंदोलन के इलाके में बड़ी संख्या में जनता ने चुनावों का बहिष्कार किया और जन राजनीतिक सत्ता की जरूरत को मजबूती के साथ स्थापित किया।

वर्ष 2009के मध्य से केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय द्वारा चलाये जा रहे आपरेशन ग्रीनहंट के तहत जनता का नरसंहार किया गया है। इसके बावजूद दण्डकारण्य, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश में हजारों की संख्या में शोषित जनता,विशेषकर आदिवासियों और महिलाओं ने राज्य दमन के खिलाफ विभिन्न कार्यक्रमों और राजनीतिक मुद्दों पर हुए कार्यक्रमों में हिस्सेदारी की।

दूसरी महत्वपूर्ण विजय साम्राज्यवादियों के सहयोग से चलने वाले सामंती दलाल,नौकरशाह बुर्जुआ राज्य व्यवस्था के विकल्प के रूप में जनता की जनवादी राजनीतिक सत्ता का प्राथमिक स्तर पर विकास और उसकी मजबूती तथा फैलाव है। दण्डकारण्य और बिहार-झारखण्ड के हमारे मुख्य गुरिल्ला जोनों में क्रांतिकारी जन कमेटी (आरपीसी) गठित हो चुकी है और अपना काम कर रही है। वे मजबूत हो रही हैं और उनका फैलाव हो रहा है। हमारे देश के राजनीतिक परिदृश्य पर अभी-अभी आये लालगढ़ और  नारायणपटनम में दुश्मन के क्रूर हमलों के बीच में जनता के विकास को केंद्र में रखते हुए प्राथमिक स्तर पर जनसत्ता के जो निकाय गठित हुए हैं,उन्होंने हमारे देश की जनता का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।

उन्होंने स्थानीय शोषक वर्गों के शासन को उखाड़ फेंका है और प्राथमिक स्तर पर जन शासन चला रहे हैं। ये राजनीतिक सत्ता के निकाय, जनता के वास्तविक विकास के उद्देश्य के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, जनव्यवस्था और विकास के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। देशभर की शोषित जनता,जनवादी संगठनों और बुद्धिजीवियों के लिए ये महान प्रेरणा के स्रोत हैं। ये जनता की सही वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में सामने आ रहे हैं। शोषकों के झूठे विकास के मॉडल के उत्तर के रूप में ये नये राजनीतिक सत्ता निकाय जनता के सच्चे विकास के मॉडल के रूप में सामने आ रहे हैं।

पिछले साढ़े तीन सालों में गुरिल्ला युद्ध तेज हुआ है और उच्चतर स्तर पर जारी है। शोषक वर्गों के हितों को पूरा करने के लिए जनता पर अंतहीन अत्याचार और हिंसा करने वाली पुलिस,अर्धसैनिक बल और कमांडो बलों पर हमारे जन गुरिल्लाओं ने बहादुराना हमले किये हैं। हमारे गुरिल्लों ने भाड़े की इन सेनाओं के सैकड़ों लोगों को खत्म किया है। इनसे सैकड़ों आधुनिक हथियार जब्त करते हुए अपने आयुध भंडार को समृद्ध किया है।

हमारे नेतृत्व में चलने वाले गुरिल्ला युद्ध ने जनता को प्रेरित किया है और उसे आत्मबल प्रदान किया है। प्राथमिक स्तर पर विकसित हो रही जन राजनीतिक सत्ता की रक्षा करते हुए और जनता के जीवन एवं उसकी संपत्ति की रक्षा करते हुए हमारी जनसेना जनता के वास्तविक रक्षक के रूप में उभरकर सामने आयी है। यद्यपि दुश्मन कई दमनात्मक अभियान चला रहा है, लाखों पुलिस और अर्धसैनिक बलों को नियुक्त कर कारपेट सुरक्षा लागू कर रहा है और लगातार हमले कर रहा है,इसके बावजूद जनता के सक्रिय सहयोग से हमारी पीएलजीए और अधिक तेजी से विकसित हो रही है।

विशेष तौर से जब हम एकता कांग्रेस के बाद के समय पर नजर डालते हैं तो देश के राजनीतिक परिदृश्य पर एक बड़े वैकल्पिक राजनीतिक ताकत के रूप में हमारी पार्टी का विकास एक दूसरी महत्वपूर्ण सफलता है। जनता इस बात को ज्यादा से ज्यादा समझने लगी है कि हमारी राजनीतिक लाइन सही है। आज देश के सामने जो ढेर सारी समस्यायें हैं, उसके बारे में हमारी अवस्थिति और समाधानों के बारे में हमारे देश के नागरिक ज्यादा से ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं। पिछले 63वर्षों से जनता विभिन्न शोषक-शासक वर्गीय पार्टियों,हिंदू धार्मिक अंधराष्ट्रवादियों और स्वयं को वाम पार्टी कहने वाले संशोधनवादियों की दीवालिया राजनीति से निराश हो चुकी है। अब यह स्पष्ट देखा सकता है कि जनता पहले की तुलना में कहीं तेजी के साथ माओवादियों की राजनीति से प्रभावित हो रही है और उसके करीब आ रही है। हमें विश्वास है कि इससे भविष्य में एक मजबूत व्यापक और देशव्यापी संयुक्त मोर्चे का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

इन सफलताओं के साथ हमें कुछ गंभीर असफलताओं और नुकसानों का भी सामना करना पड़ा है। दुश्मन के हमले में नेतृत्वकारी ताकतों को खोने से हमें गंभीर नुकसान हुआ है। हमारी पार्टी कांग्रेस के बाद बड़ी संख्या में हमारी केंद्रीय कमेटी के सदस्य दुश्मन द्वारा पकड़े गये हैं और या तो उन्हें झूठी मुठभेड़ों में मार दिया गया है या फिर जेलों में डाल दिया गया है। अपना लक्ष्य प्राप्त करने में हमारे सामने यह एक बड़ा अवरोध है। निस्संदेह भारतीय इंकलाब पर इसका गहरा असर पड़ा है।

दुश्मन के गंभीर आक्रमण के कारण इसे अच्छी तरह से समझने में हमारी असफलता के कारण और उचित प्रतिकार्यनीति बनाकर इसे लागू करने में हमारी असफलता के कारण हम कुछ नीतियों में कमजोर पड़े और कुछ जगहों से हमें पीछे हटना पड़ा।

इसी बीच हमारे देश में मजदूर वर्ग की जीवन स्थितियां लगातार खराब होती जा रही हैं। किसान अपने ऊपर सामंती और साम्राज्यवादी शोषकों द्वारा जारी नीतियों के कारण लगातार निर्धन होता जा रहा है और लाखों की संख्या में आत्महत्यायें कर रहा है। नई नीतियों के नाम पर शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, रक्षा, यातायात, मीडिया, व्यापार आदि क्षेत्रों में विदेशी पूंजी की घुसपैठ काफी बढ़ चुकी है। साम्राज्यवादियों का शोषण, दमन और नियंत्रण 1947 के बाद से अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ चुका है।

कश्मीर और उत्तर पूर्व की जनता,जो अलग होने के अधिकार सहित आत्मनिर्णय के अधिकार तथा अपनी राष्ट्रीय मुक्ति के लिए लड़ रही है,पर भी भीषण दमन जारी है। अमेरिकी साम्राज्यवादियों के साथ मिलकर भारतीय विस्तारवाद जिन नीतियों का अनुसरण कर रहा है उसके कारण दक्षिण एशिया की जनता उससे अत्यधिक नफरत करती है। दलित, आदिवासी, महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों का सामाजिक रूप से सबसे दमित तबका आज विभिन्न तरह की समस्यायें झेल रहा हे।

जब हम इन सारी समस्याओं का आकलन करते हैं तो यह ज्यादा से ज्यादा साफ होता जाता है कि हमारे देश में सभी बुनियादी अंतरविरोध ज्यादा से ज्यादा तीखे होते जा रहे हैं। जैसे सामंतवाद और व्यापक जनता के बीच का अंतरविरोध, साम्राज्यवाद और भारतीय जनता के बीच का अंतरविरोध, पूंजी और श्रम के बीच का अंतरविरोध और शासक वर्गों के बीच का अंतरविरोध। हमारी पार्टी जनता की समस्याओं को उठाते हुए लगातार आगे बढ़ रही है। हमारी राजनीतिक लाइन इन समस्याओं के समाधान पर जोर देती है।

हमारा विश्वास है कि भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन, आधार क्षेत्र की स्थापना के उद्देश्य से हमारी जनसेना को मजबूत करते हुए और सर्वहारा के नेतृत्व में इन सारी ताकतों को संयुक्त मोर्चे में गठित करते हुए, हमारी पार्टी के नेतृत्व में चलाये जा रहे जनयुद्ध के रास्ते से ही विजय पथ पर आगे बढ़ेगा। हमारा यह भी विश्वास है कि इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि यह प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ेगी। कुल मिलाकर हम भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के भविष्य के प्रति बहुत आशान्वित हैं।

हमारी पार्टी हमारे देश की शोषित जनता के लिए आशा की मशाल का काम कर रही है। इस पतनशील और भ्रष्ट व्यवस्था के बीच हमारी पार्टी एक चमकदार तारे की तरह चमक रही है। हम यह नहीं कहते कि हमारे पास विश्व क्रांति और भारतीय क्रांति में मौजूद जटिलताओं का पहले से तैयार समाधान मौजूद है,लेकिन हमारे पास एक सही राजनीतिक लाइन है। हमें विश्वास है कि हम समाजवाद और साम्यवाद की तरफ पहले कदम के रूप में नवजनवादी क्रांति को सफलतापूर्वक संपन्न करने की प्रक्रिया में इन सभी समस्याओं को हल कर सकते हैं। हमारा विश्वास है कि समाज के सामने मौजूद सभी समस्याओं को माक्र्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की रोशनी में हल किया जा सकता है।

(समाप्त)








Jan 4, 2011

जनता के लिए सीपीएम अभी 'शेर' है तो ममता बनर्जी 'भालू' - गणपति


भाग- 3

असंभव है दमन दबाव और वार्ता एक साथ,  नया संविधान निर्माण,जनता का लोकतान्त्रिक अधिकार, के बाद अब साक्षात्कार का यह तीसरा भाग भी माओवादी पार्टी के महासचिव गणपति के उन जवाबों की प्रस्तुति है जो पत्रकारों के एक समूह ने सवाल भेजकर उनसे पूछा था.भाग-1,भाग-2और अब भाग तीन,ये सभी साक्षात्कार हिंदी में पहली बार सिर्फ जनज्वार पर प्रकाशित हो  रहे हैं,जिसका अनुवाद जनज्वार टीम ने किया है

वर्तमान में ऐसा दिखता है कि आपका आंदोलन सुदूर जंगली और आदिवासी क्षेत्रों में सिमटा हुआ है। शहरी क्षेत्रों के युवाओं की भी भर्ती नहीं हो रही है, जैसा कि अतीत में हुआ है। कुछ लोग सोचते हैं कि आप कभी भी शहरी क्षेत्रों जैसे गुड़गांव में वैसे विस्तार नहीं कर पायेंगे जैसे गिरीडिह(झारखंड) में किया है?

विलय के बाद कुछ क्षेत्रों में हम मजबूत हुए हैं,जबकि कुछ क्षेत्रों में कमजोर। जिन क्षेत्रों में हम कमजोर हुए हैं उनमें कुछ मैदानी क्षेत्र हैं और कुछ शहरी। जिन क्षेत्रों में हम मजबूत हुए हैं उनमें कुछ सुदूरवर्ती क्षेत्र हैं और कुछ मैदानी। दीर्घकालिक युद्ध में ऐसे उतार-चढ़ाव अपरिहार्य हैं। यह सच नहीं है कि हम शहरी क्षेत्रों और मैदानी क्षेत्रों से पूरी तरह खत्म हो चुके हैं जैसा कि कुछ लोग प्रचार कर रहे हैं या कुछ दूसरे इस पर भरोसा कर रहे हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा है विश्व में भारत उन कुछ देशों में से है जहां माओवादी आंदोलन जारी है। साम्राज्यवादी और हमारे देश के शासक वर्ग मिलकर हमारे आंदोलन का दमन करने के लिए हमला तेज कर रहे हैं। जब वे इतना केंद्रित होकर हम पर हमले करते हैं तो हमें नुकसान उठाना पड़ता है और हमने नुकसान उठाया।

यह समस्या का महज एक पहलू है। शहरी क्षेत्रों में हमें कई अनुभव हासिल हुए। शहरी कामकाज के बारे में हमने अपनी नीति को समृद्ध किया। हमने अपने देश और दुनिया में होने वाले आर्थिक-राजनीतिक बदलाओं का अध्ययन किया और उसके अनुसार कार्यक्रम सूत्रबद्ध किया। कम्युनिस्ट कभी भी अपनी आत्मगत इच्छा से काम नहीं करते। समाज में वस्तुगत परिस्थितियों का अध्ययन करते हुए वे काम करते हैं। हमें जो भी सकारात्मक और नकारात्मक सबक हासिल हुए हैं, उस पर निर्भर होकर हम क्षति से उबरने का प्रयास कर रहे हैं।

इस समस्या का दूसरा पहलू यह है कि दुश्मन के हमलों में हमें जरूर कुछ नुकसान उठाना पड़ता है, लेकिन दूसरी तरफ उनके दमन अभियानों, उनकी साम्राज्यवादपरस्त नीतियों और उनकी जनविरोधी कार्रवाइयों के कारण वे जनता से ज्यादा अलगाव में पड़ते जा रहे हैं। इसका मतलब ये है कि वे खुद ऐसी परिस्थितियां तैयार कर रहे हैं कि जनता उनके खिलाफ हो जाये। यह सही है कि वर्तमान में हम 1970-19के दशक की भांति मजदूरों,छात्रों, बुद्धिजीवियों को लामबंद करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। उन परिस्थितियों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हो चुके हैं। उन क्षेत्रों में जहां दुश्मन मजबूत है,काम करना बेहद जटिल हो चुका है और ट्रेड यूनियन आंदोलन में जहां संशोधनवादियों ने अपनी जड़ें गहरायी से जमायी हुई हैं, में भी काम करना बेहद जटिल है।

यह सिर्फ भारत की बात नहीं है,यह परिस्थिति समूचे विश्व में है। लेकिन क्रांतिकारी इससे जरूर उबरेंगे। इस देश को मुक्त करने के लिए हमें किसानों को संगठित करने पर ध्यान देना चाहिए। वर्तमान में हम किसानों के बीच अपने आंदोलन को मजबूत करेंगे और निश्चित तौर पर शहरी क्षेत्रों में विस्तारित होंगे। दूसरी तरफ यह किसान आंदोलन शहरी जनता को प्रेरित करेगा और उन पर अत्यधिक प्रभाव डालेगा। अतः जब हम मैदानी क्षेत्र की व्यापक किसान आबादी को संगठित कर लेंगे तब कस्बे और शहर की जनता इससे अछूती नहीं रहेगी।

आज हमारे देश के मजदूर फिर से उन्हीं परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं जो उन्नीसवीं सदी के मजदूरों ने यूरोप में झेली थीं। ज्यादातर मजदूर ठेका मजदूर और अस्थायी मजदूर में तब्दील हो रहे हैं। उन्हें 12से 16घंटे तक भयानक परिस्थितियों में काम करने पर बाध्य किया जा रहा है। सरकार साम्राज्यवादी शोषण को तेज करने के लिए सभी मजदूर कानूनों को बदल रही है। मजदूरों के परिवार उनके लिए बैरकों में गुलामों की तरह रहने को बाध्य हैं। सारी चीजों का पुनर्गठन किया जा रहा है। दुश्मन इस बात से खुश है हो सकता है कि उसने हमें काफी नुकसान पहुंचाया, लेकिन तकलीफ झेल रही जनता उसके खिलाफ विभिन्न रूपों में लड़ रही है। हमारी पार्टी निश्चित ही इन संघषों का बहादुरी और दृढ़ता के साथ नेतृत्व करेगी। सर्वहारा और शहरी जनता के तूफान की तरह उठ खड़े होने और इस शोषणकारी व्यवस्था को नष्ट कर देने के लिए सभी जरूरी परिस्थितियां धीरे-धीरे परिपक्व हो रही हैं।

भारत सरकार दूसरी पीढ़ी के एलपीजी(लिबरलाइजेशन प्राइवेटाइजेशन ग्लोबलाइजेशन)सुधारों को लागू कर चुकी है और अब तीसरी पीढ़ी के सुधारों को लागू करने जा रही है। इसके तहत यह साम्राज्यवादी पूंजी की जरूरतों के अनुसार शिक्षा नीति में बहुत से परिवर्तन करने जा रही है। शिक्षा नीति में शासक वर्ग द्वारा साम्राज्यवाद निर्देशित परिवर्तनों को लागू करने की पृष्ठभूमि में, शिक्षा के अवसर मजदूर वर्ग, किसान, आदिवासी, दलित और धार्मिक अल्पसंख्यक परिवारों से आने वाले गरीब बच्चों और महिलाओं के लिए कम होते जा रहे हैं।

वर्तमान में शिक्षा का मतलब मुख्यतः कारपोरेट आधिपत्य वाली शिक्षा है। यह शिक्षा व्यवस्था मुख्यतः घरेलू और विदेशी कारपोरेशनों के हितों की सेवा करती है। इससे एक तरफ छात्र, अध्यापक,अभिभावक और दूसरी तरफ शासक वर्ग के बीच गहरी खायी बनने लगी है। बहुत जल्द यह विस्फोटक रूप ले लेगा। हमारी पार्टी इसके अध्ययन और इसका नेतृत्व करने की आवश्यकता महसूस करती है। हम इस मामले में जो भी संभव होगा करेंगे।

खुदरा बाजार में साम्राज्यवादी पूंजी को अनुमति देने के कारण और आर्थिक संकट से उबरने के लिए साम्राज्यवादियों और कारपोरेट कंपनियों की हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर बढ़ती पकड़ के कारण शहरी क्षेत्रों में बहुत से छोटे व्यापारी और छोटे तथा मध्यम पूंजीपति दीवालिया हो चुके हैं। शहरों के सौंदर्यीकरण के नाम पर स्लम को खाली कराया जा रहा है और मध्यवर्गीय जनता को उपनगरीय क्षेत्रों में खदेड़ा जा रहा है। मजदूर वर्ग और स्लम में रहने वाली जनता की स्थिति बदहाल है। इन लोगों के बीच बहुत से ऐसे लोग हैं जो हमारे आंदोलन वाले क्षेत्रों से इन शहरों में चले गये हैं। हम इन सभी परिघटनाओं का अध्ययन कर रहे हैं और उचित कार्यनीति के साथ इनके बीच काम करने का प्रयास कर रहे हैं।

गांव और बड़े शहरों के बीच सभी तरह की धन संपदा गरीब ग्रामीण इलाके के लोग पैदा करते हैं। गरीब दलित और आदिवासी मजदूर अपना खून-पसीना जलाकर भारतीय और विदेशी कारपोरेट प्रभुओं के लिए बड़े महल और बुनियादी ढांचे का निर्माण करते हैं। शॉपिंग माल और कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों और कर्मचारियों का बहुमत ग्रामीण क्षेत्रों से ही आता है। चाहे सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक संबंधों के अर्थ में बात करें या आंदोलन के संबंधों के अर्थ में,गांव और शहर एक दूसरे से अलग-अलग दो द्वीप नहीं हैं। दोनों परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। यह हमारे विस्तार के लिए एक मजबूर आधार का निर्माण कर रहा है। अतः यह कहना हास्यास्पद और अवास्तविक बात होगी कि हम शहरी क्षेत्रों तक कभी भी विस्तार नहीं कर सकेंगे। यदि पहले ग्रामीण क्षेत्र अपने आपको मुक्त कर लेते हैं तब इसकी मजबूती पर निर्भर होकर और शहरी क्षेत्रों में मजदूर वर्ग के संघर्षों द्वारा, बाद में शहर भी अपने आपको मुक्त कर लेंगे। शहरों की मुक्ति के साथ ही हमारे देश से दलाल बुर्जुआ शासन और साम्राज्यवादी नियंत्रण भी खत्म हो जायेगा।


सीपीआईएम पार्टी बार-बार यह आरोप लगाती रही है कि तृणमूल कांग्रेस और माओवादियों के बीच सांठ-गांठ हैं। ममता बनर्जी ने आजाद की हत्या पर न्यायिक जांच की भी मांग की थी?


हम इस बात से कतई आश्चर्यचकित नहीं हैं कि ममता बनर्जी ने आजाद की हत्या के बारे में न्यायिक जांच की मांग की है। बंगाल के राजनीतिक हालात से जो भी परिचित है उसे आश्चर्य नहीं होगा। जनवादी संगठन, जाने-माने लोग तथा कई जनसंगठन न्यायिक जांच की मांग कर रहे हैं और कह रहे हैं,आजाद के हत्यारों पर मुकदमा चलना चाहिए और उन्हें सजा दी जानी चाहिए। यह मांग जनता की आकांक्षा का परिचायक है। इसे ध्यान में रखते हुए ही ममता ने न्यायिक जांच की मांग की है। जाहिर है आजाद के लिए ममता के दिल में कोई सम्मान या सहानुभूति क्यों होगी?


वे कौन लोग हैं जो यह महसूस करते हैं कि आजाद को बहुत ही अन्यायपूर्ण तरीके से मार डाला गया। केवल जनता है जो यह सोचती है कि आजाद जिस राजनीतिक उद्देश्य के लिए लड़ रहे थे वे न्यायपूर्ण हैं। जो सच्चे जनवाद के लिए प्रतिबद्ध हैं तथा उसका समर्थन करते हैं सिर्फ वही उनकी हत्या की गंभीरतापूर्वक निंदा करते हैं। दूसरे लोग,इसकी निंदा विभिन्न कारणों से कर सकते हैं। ममता भी उनमें से एक है। वे अपने हित में ऐसा करते हैं। हालांकि ममता ने यह मांग सीपीएम के साथ चल रहे उनके संघर्षों और आने वाले चुनाव को ध्यान में रखकर किया है, फिर भी यह मांग स्वागत योग्य है। उनकी यह मांग कुछ हद तक जनता के संघर्षों में मददगार होगी।


इसके अलावा पिछले पंद्रह या उससे अधिक वर्षों से तृणमूल और सीपीएम के बीच गंभीर संघर्ष चल रहा है। कभी-कभी कुछ जगहों पर यह सशस्त्र संघर्ष का एक रूप भी ले लेता है। सीपीआईएम ने हरमदवाहिनी जैसे सशस्त्र सामाजिक फासीवादी गैंग का निर्माण किया है और तृणमूल, माओवादियों, जनवादियों तथा जनता को दबाने के लिए उन पर हमले कर रही है। तृणमूल ने सीपीआईएम से लड़ने के लिए हथियार उठा लिये हैं। अतः इन हमलों का मुकाबला करने के लिए और अगले चुनाव में सत्ता में आने के लिए यह स्वाभाविक है कि ममता जनता को आकर्षित करने के लिए कुछ बातें बोलें । हमारे देश में पिछले 30-35 सालों में एक चारित्रिक विशेषता है जो बंगाल की राजनीति में जारी है। वह यह है कि शासक वर्ग एक दूसरे से सशस्त्र संघर्षों में उलझते रहे हैं। ज्यादातर दूसरे राज्यों में ऐसा नहीं है।


शासक वर्गों के बीच यह अंतरविरोध दूसरे राज्यों में दूसरे रूपों में बहुत तीखा है,लेकिन यह सशस्त्र संघर्ष के स्तर पर नहीं है। यह अंतरविरोध नंदीग्राम में प्रकट हुआ और जनता के लिए उपयोगी था। बाद में हुए संसदीय और नगर निगम के चुनाव में तृणमूल ने कहीं ज्यादा सीटें जीतीं। अब आने वाले विधानसभा चुनाव में यह प्रतिस्पर्धा और कठिन होगी;यदि उसे सत्ता में आना है तो उसे इस तरह से बात करने पर बाध्य होना होगा ताकि लगे कि वह जनता की तरफ खड़ी है। जनता जो सीपीआईएम से घृणा करती है, निश्चित रूप से उसे सबक सिखायेगी।


आज बंगाल की समस्त जनता और जनवादी लोग सामने खड़े शेर से बचना चाहते हैं। आज उनके लिए सामने खड़ा वह शेर कहीं ज्यादा खतरनाक है बनिस्पत उनके पीछे खड़े भालू से। लेकिन शेर को भगाने के लिए वे भालू के खतरे से नहीं बच सकते। हमारी पार्टी इस खतरे के बारे में लगातार लोगों को सचेत कर रही है। हम उनसे कहते हैं कि भविष्य में इस भालू को भी भगाना पड़ेगा। उन्हें इस भालू के खिलाफ भी लड़ाई लड़नी होगी। जब तक जनता इन दोनों खतरों से छुटकारा नहीं पा लेती, इनमें से कोई एक जनता के पीठ पर सवारी गांठती रहेगी।


कल यदि ममता बनर्जी सत्ता में आती हैं तो वह सामंतों से जमीन जब्त करके उसे गरीबों में नहीं बांटेंगी और न ही साम्राज्यवादियों और बड़े पूंजीपतियों के उद्योगों को ही जब्त करेंगी। जनता को भी चुनाव में स्वतंत्र तरीके से भागीदारी करने का अवसर नहीं मिलेगा। इसका मतलब यह है कि यदि वह सत्ता में आती हैं तब भी कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं होगा। हालांकि सामाजिक फासीवादियों को एक लंबे शासनकाल के बाद यदि तृणमूल सत्ता में आती है तो वह निश्चित तौर पर प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाने का पुरजोर प्रयास करेगी। इस समयावधि में चुनाव में किये गये वादों को ध्यान में रखते हुए वह कुछ समय के लिए जनता पर हमले बंद कर सकती है। लेकिन यह अस्थायी ही होगा। बाद में जनता को उनकी सरकार के खिलाफ भी लड़ना पड़ेगा।


हमारी पार्टी का तृणमूल के साथ किसी भी तरह का कोई खुला या गुप्त संबंध नहीं है,लेकिन कुछ मौकों पर शासक वर्ग भी जनता के हित में बात कर सकता है। वे कुछ संघर्ष भी चलाते हैं। हालांकि इन संघर्षों का दायरा बहुत सीमित होता है। ऐसे लोग जब जनता के हित में बात करते हैं तो हमें ठोस तरीके से उनका विश्लेषण करना चाहिए। दुश्मन के बीच अंतरविरोध सर्वहारा के फायदे में होता है। ठोस परिस्थितियों पर निर्भर होते हुए हमारी पार्टी इन चीजों पर अपनी अवस्थिति साफ करती रहती है।


हमारी पार्टी आंख मूंदकर न तो समर्थन करती है,न ही विरोध। लेकिन जनता को उनकी वर्ग प्रकृति तथा उनकी राजनीतिक-आर्थिक नीतियों को गंभीरतापूर्वक समझने का प्रयास करना चाहिए और उनके बारे में कोई भी भ्रम नहीं पालना चाहिए। यदि ऐसा भ्रम है तो यह हमारी पार्टी का एक कार्यभार होगा कि हम उन्हें इससे बाहर निकालें। जब हमारी अवस्थिति इतनी साफ है तो यह कहना उचित नहीं है कि हमारा ममता की पार्टी से कोई संबंध है और हम उसे औचित्य प्रदान कर रहे हैं।



कश्मीर में हाल में आये जनउभार और सरकारी सशस्त्र बलों द्वारा उनसे निपटने के तरीकों पर आपकी पार्टी की क्या प्रतिक्रिया है, कश्मीर समस्या का आपके पास क्या समाधान है?


कश्मीर की जनता पिछले साठ वर्षों से अपनी स्वाधीनता और आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए लड़ रही है। इस संघर्ष को दबाने के लिए भारत सरकार उन पर लगातार अत्याचार,नरसंहार और हिंसा चला रही है। अस्सी हजार से ज्यादा कश्मीरी मारे जा चुके हैं। हालांकि भारतीय शासक वर्ग यह दावा कर रहा है कि उसने मिलिटेन्सी को समाप्त कर दिया है, कश्मीरी जनता अनेक अवसरों पर लहरों की तरह उठ खड़ी हो रही है।


हाल ही में 11 जून से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों में सौ से ज्यादा कश्मीरी युवक पुलिस, अर्धसैनिक बलों और सेना की गोलियों से मारे गये हैं। सात लाख सेना और अर्धसैनिक बलों की तैनाती से कश्मीर पूरे विश्व में सबसे अधिक सैन्यीकृत क्षेत्र में तब्दील हो चुका है। हमारी पार्टी मजबूती के साथ कश्मीरी जनता के न्यायपूर्ण आंदोलन का समर्थन करती है। आजादी और आत्मनिर्णय के अधिकार की उनकी मांग पूरी तरह न्यायोचित है। कश्मीर कश्मीरियों का है। यह कभी भी भारत का अविभाज्य अंग नहीं रहा है। भारत और पाकिस्तान का इस पर कोई अधिकार नहीं है। हमारी पार्टी गंभीरतापूर्वक कश्मीरी जनता पर हो रहे भयानक दमन की भत्र्सना करती है। भारतीय जनता को कश्मीर में जारी सरकारी नरसंहार की एक स्वर से निंदा करनी चाहिए। हमारी पार्टी का यह साफ कहना है कि बिना यह किये भारत की संघर्षरत जनता पर शासक वर्गों के क्रूर हमलों का प्रभावी तरीके से मुकाबला करना या उसे परास्त करना संभव नहीं है। हमारी पार्टी कश्मीर मुद्दे को हल करने के लिए ठोस तरीके से निम्न मांगें रखती है-


  •  कश्मीर में भारत सरकार की सशस्त्र सेनाओं द्वारा किये जा रहे नरसंहार को तत्काल बंद किया जाये।
  • अर्धसैनिक बलों और सेना को कश्मीर से तुरंत वापस बुलाया जाये।
  • सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को तत्काल समाप्त किया जाये जिसके कारण सेना को जनता की अंधाधुंध हत्यायें करने का अधिकार मिला है।
  • कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाये और कश्मीरियों को उनका भविष्य खुद चुनने दिया जाये।
  • समस्त राजनीतिक कैदियों को बिना शर्त रिहा किया जाये।
कॉमनवेल्थ खेल के प्रति पूरे देश में गुस्सा रहा है, आपकी पार्टी की इस पर क्या सोच है?

कामनवेल्थ खेल के नाम पर सत्तर हजार करोड़ रुपये शासक वर्ग खर्च कर चुका है। दूसरी ओर बहुसंख्यक जनता द्वारा झेली जा रही गरीबी, भूख, अशिक्षा, बेरोजगारी, विस्थापन, बाढ़, बीमारियों, आश्रयहीनता आदि समस्याओं के प्रति इसका कोई ध्यान नहीं है। यह एक हास्यास्पद स्थिति है कि 77 फीसदी जनता प्रतिदिन 20 रुपये से कम पर गुजारा कर रही है वहीं खेल के बहाने करोड़ों रुपये इकट्ठा किये गये। ये करोड़ों रुपये स्टेडियम,सड़क और खेलों के लिए बनने वाले भवनों पर खर्च किये गये तथा विभिन्न तरह के उपकरणों की खरीद में भ्रष्ट अधिकारियों,मंत्रियों और ठेकेदारों की झोलियों मं चले गये।

निर्माण कार्यों में काम करने वाले इन मजदूरों को मामूली वेतन देकर उनका शोषण किया गया। दूसरी तरफ इन खेलों के कारण मजदूर वर्ग और मध्यवर्गीय लोगों का जीवन बदहाल हो गया। दिल्ली के सौंदर्यीकरण के नाम पर हजारों हजार स्लम आबादी,सड़क के किनारे खोमचा लगाने वालों तथा भिखारियों को शहर से बाहर खदेड़ा गया। सुरक्षा के नाम पर जनता की रोजाना की आवाजाही पर पाबंदियां लगायी गयीं। यह सबकुछ कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे और मंत्री-अधिकारियों के कमीशन के लिए किया गया।
विशेष तौर पर नौजवानों का उनकी बुनियादी समस्याओं से ध्यान हटाने, उनमें बढ़ रहे असंतोष को ‘शांत करने और उनके सामने एक खूबसूरत दुनिया का भ्रम गढ़ने के लिए यह खेल कराये गये। जनता इन खेलों से सिवाय करों के बोझ के और कुछ प्राप्त नहीं कर पायी। इसके अलावा कॉमनवेल्थ खेल गुलामी के प्रतीक औपनिवेशिक अतीत के अवशेष हैं। ब्रिटेन के पुराने उपनिवेश इसमें शामिल हैं। दलाल शासक जो नव उपनिवेशवादियों (साम्राज्यवादियों)की सेवा करते हैं, के अलावा कोई भी नागरिक भारत की स्वाधीनता चाहता है और कोई भी देशभक्त इस बात को पचा नहीं सकता कि हमारा देश इसका सदस्य है। आत्मसम्मान वाले किसी भी देश को ऐसे संगठन से अपने आप को हटा लेना चाहिए। हम इसमें भाग लेने वाले विभिन्न देशों के खिलाड़ियों की प्रशंसा करते हैं,लेकिन इसका समर्थन तभी किया जा सकता है जब इसका आयोजन समानता के आधार पर हो, कोई दिखावा न हो और संबंधित देशों की संप्रभुता के साथ कोई समझौता न हो।


बाबरी मस्जिद मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने विवादित क्षेत्र को तीन भागों में बांटने का फैसला दिया है, इस विवाद के लिए आपके पास क्या समाधान है?

हमारी पार्टी ने पिछले 18वर्षों में कई बार बाबरी मस्जिद ढहाने जाने के ऊपर अपनी राय स्पष्ट की है। पार्टी के केंद्रीय समिति सदस्य (सीसी)के प्रवक्ता कामरेड अभय ने एक वक्तव्य में साफ तौर से हमारी पार्टी राय रखी है। निश्चय ही यह बहुत दुखद है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लनखऊ बैंच ने विवादित क्षेत्र को तीन भागों में बांट दिया है। ऐसा करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसके समर्थन में कोई ऐतिहासिक साक्ष्य भी नहीं है। हमारा शुरू से ही यह कहना है कि बाबरी मस्जिद को दुबारा उसी जगह पर बनाया जाना चाहिए। इसका ढहाया जाना एक जघन्य अपराध है। हमारी पार्टी की अवस्थिति है कि पूरी जमीन मुस्लिम समुदाय का है। इस फैसले के जरिये मुस्लिम समुदाय के प्रति अन्याय हुआ है।


हिंदुवादी नेताओं का मानना है कि जहां पहले बाबरी मस्जिद खड़ी थी वहीं राम का जन्म हुआ था। इस सवाल के बरख्स फिर हम भारत के इतिहास को देखें तो एक समय ऐसा भी था जब वहां कोई मस्जिद भी नहीं थी। जैसे नेपाल और भारत से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और कुछ पूर्वी एशियाई देशों में हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। उसी तरह इस्लाम सहित सभी धर्म अपने जन्म स्थान से विश्व के दूसरे हिस्सों में फैले। अतः यह कारण दिखाकर और इस तरह के फैसले को मॉडल बनाकर सभी मस्जिद को विवादित क्षेत्र बताया जा सकता है और झगड़ा पैदा किया जा सकता है।


फैसले के इस आधार पर अल्पसंख्यक समुदाय के सारे प्रार्थना स्थलों को ढहाया जा सकता है। फैसले के बाद अल्पसंख्यक लोगों में असुरक्षा बढ़ने की पूरी संभावना है। जैसा कि हमारी पार्टी के प्रवक्ता अभय ने कहा कि जनता को कट्टरपंथियों,विशेषकर हिंदू कट्टरपंथियों से सावधान रहना चाहिए। भिवण्डी, मुंबई, कर्नाटक, हैदराबाद, गुजरात और उड़ीसा के धार्मिक दंगों के नाम पर हुई सभी घटनायें शासक वर्गों विशेषकर हिंदू अंध राष्ट्रवादियों द्वारा अंजाम दी गयी हैं। इस फैसले से बाबरी मस्जिद के विध्वंस को वैधानिकता प्राप्त हो गयी है। कोर्ट के इस फैसले ने वह आधार तैयार कर दिया है, जहां हिंदू अंध राष्ट्रवादी धार्मिक अल्पसंख्यकों के ऊपर विभिन्न रूपों में अधिक आक्रामक हो जायेंगे।



हमारी पार्टी का विचार है कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों सहित सभी धार्मिक अल्पसंख्यक लोग,धर्मनिरपेक्ष ताकतें, जनवादी ताकतें और हमारे देश की शोषित जनता एकजुट होकर लड़ेंगी और कट्टरपंथी ताकतें विशेषकर हिंदू अंधराष्ट्रवादी ताकतों को अलगाव में डालेंगी तभी इस समस्या या इस जैसी अन्य समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है।


(जारी...)