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Jun 18, 2017

क्रिकेट शुरू हो उससे पहले इन तथ्यों पर भी गौर ​कीजिए

खेल में देश अव्वल हो इससे किसको ऐतराज हो सकता है, पर खेल देश की जनता के जीवन की कीमत पर हो तो इसे यूं ही 'बी कूल' होकर आप नहीं देख सकते...
प्रेमा नेगी
क्रिकेट के बुखार में देशभक्ति की तपिश से आप पाकिस्तान की सीमा पर जलजला ला दें, उससे पहले इन आंकड़ों को पढ़ लीजिए कि कैसे आप किसानों के लिए सिर्फ स्यापा करते हैं और हकीकत में मुनाफे की लाल कालीन उनके लिए बिछाते हैं, जिनकी मुनाफाखोरी की वजह से इस देश में हर रोज सैकड़ों किसान, मजदूर और बेरोजगार आत्महत्या करते हैं, भूख, गरीबी और गुर्बत में मरते हैं, मरते हुए जीने को मजबूर होते हैं।

अब से कुछ ही घंटों बाद भारत-पाकिस्तान के बीच लंदन के ओवल में चैम्पियंस ट्रॉफी का फाइनल मैच खेला जाएगा। इसका लाइव टेलीकास्ट करने वाले स्टार स्पोर्ट्स ने अपने सभी चैनल्स पर विज्ञापन के रेट 10 गुना तक बढ़ा दिए हैं। इन चैनल्स पर मैच के दौरान दिखाए जाने वाले 30 सेकंड के विज्ञापन के लिए 1 एक करोड़ रुपए लिए जा रहे हैं।
जबकि आम दिनों में इन चैनल्स पर इतने वक्त के विज्ञापनों के लिए 10 लाख रुपए चार्ज किए जाते हैं। यानी आज आपकी देशभक्ति मुनाफाखोरों को 10 गुना ज्यादा मुनाफा दिलाएगी! आज के मैच को करीब दुनियाभर के 100 करोड़ लोग देखने वाले हैं। प्रतिशत में देखें तो यह विश्व की कुल आबादी का 12.5 प्रतिशत होगा।
30 सेकेंड का 1 करोड़। उतना वक्त जितने वक्त में एक रोटी नहीं सेंकी जा सकती, किसान अपने जानवरों के लिए एक बाल्टी नहीं भर सकता और विद्यार्थी अपने पाठ का पूरा का एक पैराग्राफ नहीं पढ़ सकता। सिर्फ इतने वक्त का 1 करोड़ मिलेगा।
कौन देगा? आपकी आंखें!
खैर! आप अपनी आंखें उन्हें दे दीजिए लेकिन दृष्टि तो अपने पास रखिए। कभी सोचा है कि जब आपकी आंखें इतनी कीमती हैं तो आपको उस कीमत का क्या मिलता है? आपकी क्या भागीदारी होती है।
यह भी सोचिए कि जिन विज्ञापनों का रेट आपकी वजह से 10 गुना बढ़ा है, 10 लाख के 30 सेकेंड का स्लॉट 1 करोड़ हुआ है, तो 90 लाख जो कंपनियां स्टार स्पोर्ट्स को वहन करेंगी वह किसकी जेब से आएगा, वह रोकड़ा किसकी मेहनत की कमाई का होगा?
सवाल यह भी है कि क्या एक देशभक्त युवा, नौजवान, छात्र ऐसा होगा जो अपनी दृष्टि की कमी के कारण अपनी आंखें पूंजीपतियों और मुनाफाखोरों के यहां यूं ही जाया कर देगा और किसानों, मजदूरों के लिए सिर्फ फेसबुक और अन्य मीडिया माध्यमों पर सरकार और व्यवस्था को कोसेगा, रूदन करेगा? या यह सच जानकर उसकी आंखें खुलेंगी और वह लौटा लाएगा अपनी बची आंखों की गर्मी।
जब ढलती दोपहर में आप अपने पेप्सी—कोक की बोतलें लिए अंकल चिप्स का कुरकुराता पैकेट दांतों से मसल रहे होंगे, ठीक उन्हीं घंटों में देश का कोई किसान आत्महत्या कर रहा होगा और उसी आत्महत्या की कीमत पर बने अंकल चिप्स को लेकर आप ये मारा—वो मारा, ले ली पाकिस्तान की करते हुए आह्लादित हो रहे होंगे। अपने दोस्तों के साथ 'हाय फाइव' कर रहे होंगे।
आपको इस आह्लाद से कोई रोक नहीं सकता। रोकना भी क्यों चाहिए। आप खुश होइए! देश खेल में अव्वल बने इससे किसको ऐतराज हो सकता है। पर खेल देश की जनता के जीवन की कीमत पर होने लगे तो ऐतराज तो बनता है। ऐतराज तब और गंभीर बनता है जब वह हमारी आंखों के साथ हमारी दृष्टि भी मुनाफों के तिजोरियों में कैद हो जाएं।
आखिर वह कौन सा जादू है जिसके बूते 2 किलो का आलू आपकी चिप्स बनते—बनते 4 सौ रुपए किलो का हो जाता है। कभी तो आप सोचते होंगे? यह तथ्य तो आपकी जानकारी में वर्षों से है? इसपर जिरह इसलिए क्योंकि आप सब, हम सभी किसान आत्महत्याओं पर स्यापा खूब करते हैं।
थोड़ा इस पर सोचिएगा कि आपकी पेप्सी की एक बोतल तब बनती है जब पानी का सौ लीटर बर्बाद होता है।
यह दो मामूली आंकड़े इसलिए जरूरी हैं कि तमिलनाडु, आंध्र, विदर्भ, बुंदेलखंड, मध्यप्रदेश, पंजाब और दूसरे अन्य राज्यों में किसान आत्महत्याओं का मुख्य कारण पानी की कमी और उनके उपज को न मिलने वाली कीमत ही है।
इसे भी पढ़ें-
बंगलादेश के लोकप्रिय क्रिकेटर मशरफ़े मुर्तज़ा का दुनिया के सभी क्रिकेटप्रेमियों के नाम संदेश
"हाँ, में क्रिकेट खेलता हूँ। लेकिन क्या मैं किसी की जान बचा सकता हूँ? क्या गेहूं का एक दाना उगा सकता हूं? क्या एक ईंट जोड़ सकता हूँ? हीरो बनाना है तो डॉक्टर को, किसान को, मज़दूर को बनाइए।
मैं काहे का हीरो हूँ? मैं आपका मनोरंजन करने के पैसे लेता हूँ। आपका चहेता परफॉर्मर हूँ, जैसे फिल्मी सितारे होते हैं।
मुक्ति योद्धाओं ने गोलियों का सामना पैसे के लिए नहीं किया। वे हीरो थे, परफॉर्मर नहीं। हीरो क्रिकेटर रकीबुल हसन था जो मुक्तियुद्ध के पहले ही अपने बल्ले पर जय बांग्ला लिखकर मैदान पर उतरा था।
वे कौन अहमक (मूर्ख) हैं जो देशभक्ति को क्रिकेट से जोड़कर खेल बना रहे हैं। वे ख़तरनाक खिलाड़ी हैं। वे सच्चे देशभक्तों की बेइज़्ज़ती करते हैं।..."

Oct 22, 2016

5 करोड़ में बिका 'देशप्रेम', अब दलाली देकर रख सकेंगे पाकिस्तानी कलाकार

महेंद्र मिश्र

लीजिए भाई । अब राष्ट्रवाद भी बिकाऊ हो गया है । पहली बोली मुम्बई में लगी है । कीमत लगी है 5 करोड़ रुपये । यह एक फ़िल्म को रिलीज करने देने के एवज में लगी है ।

यह सौदा मुख्यमन्त्री देवेन्द्र फड़नवीस की मध्यस्थता में उनके घर पर हुआ है । इस बैठक में सूबे की मशीनरी को बंधक बनाने वाले राज ठाकरे भी शामिल थे । साथ ही फ़िल्म के निर्माता निर्देशक के साथ बिरादरी के दूसरे वरिष्ठ लोग मौजूद थे । इसमें तय हुआ कि फ़िल्म के निर्माता सेना के कल्याण कोष में 5 करोड़ रुपये जमा करेंगे ।

साथ ही ठाकरे ने इसकी भी घोषणा कर दी कि आइन्दा कोई 5 करोड़ रुपये देकर पाक कलाकारों को फ़िल्म में रख सकता है । यानी 5 करोड़ में दुश्मन दोस्त में बदल जाएगा । और राष्ट्रवाद की गरिमा भी अक्षुण हो जायेगी । पहली बात तो हमारी सेना और उसका कल्याण इस तरह के किसी सौदे और फिरौती के पैसे के मोहताज नहीं है । और यह खुद उसके सम्मान के साथ खिलवाड़ है । साथ ही एक ऐसे अंदरूनी राजनीतिक मामले में उसको ले आना देश के भविष्य और उसकी राजनीति के लिए बहुत घातक है ।

इस मामले में केंद्र सरकार और खासकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह की भूमिका भी संदिग्ध रही । फ़िल्म के निर्माता और निर्देशक ने राजनाथ से मुलाकात की थी । उसके बाद देवेन्द्र फडनवीश भी उनसे मिले थे । यानी सब कुछ उनके संज्ञान में हुआ । ऐसे में अगर केंद्र ने इस समस्या का यही समाधान निकाला तो यह बहुत अफसोसनाक है ।

यह बिल्कुल कानून और व्यवस्था का मामला था । और फ़िल्म को शांतिपूर्ण तरीके से पर्दे पर दिखाये जाने की जिम्मेदारी सरकार की थी । लेकिन अपना यह कर्तव्य निभाने में वह पूरी तरह से नाकाम रही है। उसने एमएनएस के गुंडों के सामने समर्पण किया है । कल एक दूसरा गुंडा अपराधी इसी तरह से किसी मामले में सामने आए तो उसके लिए यह एक नजीर होगा । और हालात जिस तरफ जा रहे हैं कल को यह राष्ट्रवाद अगर चुरमुरे के भाव बिके तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए ।

बहरहाल कांधार कांड में आतंकियों के सामने घुटने टेकने वालों से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती है । बस अंतर यही है कि तब इन लोगों ने समर्पण बाहरी अपराधियों और गुंडों के सामने किया था । इस बार देश के भीतर के गुंडों के सामने किया है ।

Oct 12, 2016

नंदिता दास नहीं कर सकेंगी पाकिस्तान में शूटिंग

भारत के दंगाई मानसिकता के लोग पाकिस्तानी कलाकारों के भागीदारी से बन रही हिंदुस्तानी फिल्मों के अधर में लटकने से बहुत खुश थे। वे अब और खुश हो सकते हैं कि पाकिस्तान में हिंदुस्तानी फिल्म शूट होने का प्लान रद्द गया है...

लो जी मामला बराबर हो गया। भारतीय अभिनेत्री नंदिता दास जिस फिल्म के शूटिंग की तैयारी रही थीं, उसका प्लान अब रद्द हो गया है। उन्होंने मुंबई एक अखबार से बातचीत में कहा कि वह दिल्ली में शूटिंग की कोशिश कर रही हैं। फिल्म में मंटो का रोल नवाजुद्दीन सिद्दीकी निभाने वाले थे।

सार्थक फिल्मों की चर्चित अभिनेत्री नंदिता दास अपनी पूरी टीम के साथ प्रसिद्ध कहानीकार शआदत हसन मंटो पर बन रही एक फिल्म की शूटिंग के लिए लाहौर जाने वाली थीं। फिल्म दिसंबर में शूट होने वाली थी। मंटो लाहौर में भी रहे थे, इसलिए फिल्म के निर्देशक ने यथार्थ चित्रण के लाहौर को चुना।

नंदिता ने अखबार को बताया कि दोनों मुल्कों में तनाव के बाद असुरक्षित मान इस फिल्म को हम लाहौर में शूट नहीं कर सकते और हम दिल्ली में शूटिंग का मन बना रहे हैं।

गौरतबल है कि जिस मंटो ने दंगे और बंटवारे के खिलाफ सबसे मजबूती से लिखा उसी मंटो की फिल्म हिंदूस्तान—पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव की भेंट चढ़ गयी। 'टोबा टेक सिंह' बंटवारे पर मंटो की प्रसिद्ध कृति है, जिसका हजारो बार मंचन हो चुका है, फिल्में बन चुकी हैं।

Sep 22, 2016

पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर देते मोदी पर कांग्रेसियों, वामपंथियों ने कहीं का न छोड़ा

मोदी की 10 मजबूरियां
इन वजहों से मोदी नहीं कर पा रहे पाकिस्तान पर चढ़ाई

समर्थकों ने बड़ा दीमाग लगा के मोदी के बचाव में ​लिखा पत्र, विस्तार से बताईं मोदी की मजबूरियां, कहा लड़ने के लिए देश के पास 7 दिन का भी नहीं है रसद। ईमोशनल अपील कर बोला, मोदी जी को कमजोर कहने से पहले पढ़ें पूरा पत्र, जाने कांग्रेस और वामपंथ का सच। पर देश उड़ा रहा मजाक, लोग पूछ रहे हैं 56 इंच के सीने में साहस भरा है या शिगुफा, बात बहादुर मोदी पाकिस्तान के सामने भी हुए टांय—टांय फिस्स।

समर्थकों की ओर प्रसाारित किए जा रहे पत्र को आप पढ़िए हू—ब—हू

दोस्तों,
पठानकोट और उरी के बाद भी धीरज ....की वजह...!!

मित्रों....आप को ये जानना चाहिए कि भारत पाकिस्तान से युद्ध करने से क्यों पीछे हट रहा है,क्यों टाल रहा हैै ...?? ध्यान से पूरा पढना..

यह पोस्ट लाइक्स के लिए नहीं लिखी है, पढ़कर कुछ सकारात्मक लगे, अंतरात्मा जागे तो शेयर अवश्य करें..

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की ये हालत कांग्रेस और वामपंथियों ने कर रखी है। उन्होंने  भारत के रक्षा तंत्र को कहाँ पंहुचा दिया है।

  • वामपंथी और कांग्रेसियों ने 10 साल में कितने आयल रिजर्व बनाये?? युद्ध सिर्फ बयान से नहीं लड़े जाते। आयल रिजर्व भारत के पास कितने दिनों का था जब मोदी ने सत्ता संभाली? सितम्बर 2015 से मोदी सरकार नए आयल रिजर्व बना रही है जिससे की सेना को हिम्मत मिले।
  • युद्ध के लिए कम से कम 40 दिन की सामग्री होनी चाहिए. इटली वाली बाई और मौनी बाबा की कृपा से सेना के पास 40 दिन तक चलने वाला सिर्फ 10 फीसदी गोला बारूद ही था.  
  • चीन के पास 60 से 80 दिन का रिजर्व है और भारत के पास?? कांग्रेस ने  सिर्फ 7 दिन का रिजर्व रख छोड़ा था..और बातें करेंगे कि मोदी क्यों युद्ध नहीं कर रहा। 
  • कांग्रेस के 10 साल में सेना को तबाह कर दिया गया। भारतीय सेना का जनरल चिट्टी लिखता रहा, चिल्लाता रहा कि भारत की सेना के पास लड़ने को हथियार नहीं है परंतु 10 साल तक भारत सरकार के लोग 2G, 3G, जीजा G ,कॉमनवेल्थ और कोयला घोटालों में ही मस्त रहे।
  • विमानों खरीद में इतनी घटिया दलाली की राजनीति चली कि दलाली न मिलने के कारण 10 साल में विमानों को खरीदने का आर्डर नहीं दे पाये। वो तो भला हो नरेंद्र मोदी का जिन्होंने "राफेल डील" को खुद ही फ़्रांस जा के फाइनल करके हताश हो रही एयरफोर्स को नयी हिम्मत दी। वरना कांग्रेस का बस चलता तो बूत बन चुके आउटडेटेड MIG में ही मरने देती वायुसेना के पायलटों को। अगर यही डील कांग्रेसियों ने पहले फाइनल कर दी होती तो आज तक ये विमान हमारे एयरफ़ोर्स के हैंगरों में पहुंच चुके होते। 
  • गलती से कांग्रेस ने हेलीकॉप्टर और सेना के ट्रक खरीद लिए तो उसे "ऑगस्टा वेस्टलैंड हेलीकाप्टर घोटाला" और "टाट्रा ट्रक घोटाला" नाम से ये देश जानता है।
  • अब आते हैं नौसेना की स्थिति पर। क्या हालात बना दी कांग्रेसियों ने। 2004 से 2014 तक हादसों की झड़ी लगा दी। नौसेना की शान INS सिंधुरक्षक का खड़े खड़े तबाह हो जाना और 18 नौसैनिकों का मरना वो जख्म है जिसे सिर्फ एक हादसा नहीं माना जा सकता था।
  • घोटाले और मुफ्तखोरी से तबाह देश का खजाना तुमने मोदी को दिया था जो कोई युद्ध नहीं झेल सकता था। यही कारण है की उस देश के खजाने को भरने के चक्कर में आज मोदी कभी सेस बढ़ाता है तो कभी पेट्रोल डीजल पर वैट बढ़ा के देश को मजबूत करता है और हमारी थोक के भाव गालियां भी सुनता है।
  • कुछ लोगो की नौटंकी तो चलती रहती है। फ्री के वाईफाई, फ्री के बिजली,फ्री के पानी पर। अगर युद्ध हुआ तो ऐसे लोगों को जीत—हार से मतलब नहीं होगा उन्हें मतलब होगा युद्ध के बाद निश्चित बढने वाली महंगाई से। महंगाई बढ़ गई जी..मोदी ने टैक्स लगा दिया जी...ऐंड सो आन ।
  • अब कुछ मानसिक रूप से अपरिपक्व बच्चे, ये कहेंगे की अब तो मोदी है जो करना है कर लो...तो भाई जहाजो के आर्डर मोदी खुद फ़्रांस में देकर आया है...जहाज का आर्डर दिया है न की पिज्जा का जो दो मीनट में बनकर आधे घंटे में आ जाये, कुछ साल लगेंगे बनाने और डिलिवरी में..सेना का आधुनिकीकरण जारी है.नए आयल रिजर्व अगस्त सितम्बर 2015 से बनने शुरू हो गए.
  • करोडो के हथियारों की खरीद को रक्षामंत्री मनोहर पारिकर ने अप्रूव कर दिया. कांग्रेस की चहेती हथियारों की दलाल लाबी को भगा दिया गया है.
  • एक एक सौदे पर PMO की नजर है...!!! आपलोग भी अपनी नजर बनाये रखें!!! धैर्य रखें अच्छे दिनो का आगाज हो चूका है।।
अगर आप आम जनमानस को समझा सकें तो ये आपका समस्त देशप्रेमियों पर अहसान होगा !

Feb 9, 2016

निदा फाजली में कबीर की झंकार है!

मंगलेश डबराल
वरिष्ठ कवि

निदा फाजली का जाना हिंदी-उर्दू कविता का बड़ा नुकसान है। वे उर्दू के ऐसे शायर थे जिन्होंने उर्दू कविता को संभ्रातता और शहरीपने से बाहर कर भक्तिकाल के विद्रोही कवियों कबीर, मीरा के साथ एकरूप किया, किसानों और आम आदमी तक ले गए। उन्होंने उर्दू शायरी को सरल बनाया और इतना सरल कि जितनी पहले कभी नहीं थी। जैसे उनका दोहा देखिए,

बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलिशान, अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान।

निदा से मेरी पहली मुलाकात 1971-72 में हुई थी। मैं एक शायर मित्र शाहिद माहुली के साथ दिल्ली में किराए के कमरे में रहता था। वह माउली के दोस्त थे और वहां उनका अक्सर आना जाना था। वहीं से उनसे मेरी दोस्ती हुई। वह बहुत ही फक्कड़ और मजाकिया किस्म के आदमी थे।

एक बार भोपाल आकाशवाणी ने कुछ लोगों को बुलाया। सुबह हम पटरी पर चाय पीने गए। वह मुस्लिम बस्ती थी। चाय वाले लड़के ने कहा, ‘पहले पैसा दोगे तो चाय पिलाउंगा।’ निदा तैयार हो गए। चाय पीकर हम उठे तो निदा का कुर्ता चाय वाले के फट्टे की कांटी में फंसकर फट गया। तभी निदा की निगाह एक वकील के बोर्ड पर पड़ी।

सुबह-सुबह मुवक्किलों को देख खुश होते हुए वकील बोले, ‘कहिए जनाब, मैं आपलोगों की क्या खिदमत कर सकता हूं।’ कुर्ते के कोने को दिखाते हुए निदा पूछे, ‘जनाब, यह फट गया है, क्या कोई मामला बनता है। मैं चाहता हूं चाय की दुकान वाला इसका हर्जाना भरे।’ वकील गंभीर होते हुए बोला,‘मामला बनता तो है। आइए बैठकर बात करते हैं।’ बाद में आने की बात कहकर हमलोग पीछे मुडे़ और उसके बाद जो हंसी का दौर चला वह जीवन भर हर मुलाकात पर जारी रहा।

ख्यात शायर शहरयार और निदा दोनों उस दौर में उभरे जब प्रधानमंत्री नेहरू के दिखाए सुंदर सपनों से देश दूर हो रहा था। पर शहरयार के मुकाबले उनकी नज्मों में उम्मीद, जिंदगी की एक आस हमेशा बनी रही। वह कभी आखिरी तौर पर निराश नहीं हुए। उन्होंने कभी नहीं माना कि हिंदुस्तान से गंगा-जमुनी संस्कृति को खत्म किया जा सकता है। शायद यही आस थी कि ग्वालियर दंगों के बाद जब निदा के मां-बाप पाकिस्तान चले गए तो उन्होंने हिंदुस्तान में ही रहना मुनासिब समझा। उन्होंने अपनी जीवनी का पहला भाग ‘दीवारों के बीच’ सबसे पहले हिंदी में लिखा, जिसमें एक किशोर के रूप में विभाजन और ग्वालियर से जुड़ी मार्मिक यादें हैं। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हिंदी और उर्दू के बीच बढ़ते फासलों को कम करने का निदा ने सजग प्रयास किया, अपनी गजलों में बिल्कुल नया प्रयोग किया। उनका एक मर्मस्पर्शी दोहा है,

‘मैं रोया परदेस में भींगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्टी बिन तार।’

यह सरलता और पहुंच आप उर्दू शायरी में बहुत कम पाएंगे, इसीलिए कई बार निदा कबीर को प्रतिध्वनित करते हैं। पारसी में एक कहावत है, ‘नज्म वह है जिसका कोई नस्र यानी गद्य नहीं हो सके’। निदा की शायरी इसका उदाहरण है।

निदा फाजली ग्वालियर से जाने के बाद मुंबई में रहे, लेकिन उनपर कभी फिल्मी रंग नहीं चढ़ा। प्रतिरोध के प्रति उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता कभी नहीं छोड़ी। वह देश में बढ़ती असहिष्णुता, हिंसा के सवाल पर मुखर रहे। साहस, उम्मीद और जिंदगी जीने की जिद उनमें कितनी भरपूर थी, उनकी यह नज्म बड़ी साफ कर देती है,

‘उठ के कपड़े बदल, घर से बाहर निकल... जो हुआ सो हुआ
रख के कांधे पर हल खेत की ओर चल... जो हुआ सो हुआ....

(अजय प्रकाश से बातचीत पर आधारित)