Oct 20, 2016

भाजपा आपको भटका रही है और आप भटकने के एक्सपर्ट बनते जा रहे हैं

पिछले दो दशकों से जनसंघर्षों की अगुवाई कर रहे हिमांशु कमार का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप

भाजपा बड़ी चालाकी से सारी राजनैतिक बहस को असली मुद्दों से हटा कर गाय, मुसलमान, पाकिस्तान जैसे काल्पनिक मुद्दों पर ले गयी है। इनकी साजिश को पहचानिए, इन्हें असली मुद्दों पर खींच कर लाइए...

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत सरकार ने गरीबों को राशन मिलने के तरीके में कुछ बदलाव किये हैं। अब गरीबों के लिए दो नए नियम बनाये गए हैं।

पहला तो यह की राशन उसी को मिलेगा जिसके पास आधार कार्ड होगा। अब आधार कार्ड तो उसी का बन सकता है जिसके पास पहले से कोई पहचान पत्र हो। लेकिन जो लोग फुटपाथ पर रहते हैं, ट्रांसजेंडर, बेघर और प्रवासी मजदूर हैं इनके पास कोई पहचान पत्र नहीं हैं, इसलिए इनका आधार भी नहीं बनेगा .

और इनका आधारकार्ड नहीं बनेगा तो इन्हें राशन भी नहीं मिलेगा, जबकि सस्ते राशन की ज़रूरत तो सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों को है। यानि जिन लोगों को राशन की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उन्हें ही सरकार नें धक्के मार कर बाहर खदेड़ दिया है। इसके अलावा सरकार नें राशन दुकानों में अंगूठे और उँगलियों के निशान के मार्फत ही राशन देने का नियम बना दिया है।

अब जो मजदूर पत्थर ढोने का काम करते हैं या अमीरों के घरों में बर्तन साफ़ करने वाली महिलायें हैं, उनकी उँगलियों के निशान घिस जाते हैं या सर्दियों में उंगलियों की खाल फट जाती हैं। इन हालातों में दूकान पर दी गयी मशीन उँगलियों के निशान नहीं पहचानती, बुढापे में झुर्रियां पड़ने से भी मशीन उँगलियों के निशान नहीं पहचानती।

इसकी वजह से मजदूर, महिलायें और बुजुर्ग लोग कई किलोमीटर पैदल चल कर आते हैं और मशीन के द्वारा उँगलियों के निशान ना पहचाने जाने पर खाली हाथ वापिस चले जाना पड़ता है। कई महीनों तक राशन ना देने के बाद दुकानदार लिख देता है की यह व्यक्ति राशन लेने नहीं आता है। क्योंकि सरकार द्वारा दूकान वालों को यही आदेश दिया गया है, इसके बाद ऐसे लोगों के राशन कार्ड रद्द कर दिए जाते हैं।

जाहिर है लाखों गरीबों का राशन लेने का हक सरकार साजिश करके मार रही है। एक तरफ अंबानी जैसे धनिकों को पैसे के बल पर सारे देश की आबादी की दाल से मुनाफा कमाने और तीन गुना कीमत कर देने की सहूलियत दी जा रही है। वहीं जान—बूझ कर गरीब को राशन की दूकान से भगा कर बाज़ार से सामान खरीदने की साजिश पर काम चालू है ताकि गरीब मजदूर की जेब से भी मुनाफ़ा निकाल कर तिजोरी में डाला जा सके।

हम सरकार को चुनौती देते हैं कि सरकार में दम है तो गरीब जनता से जुड़े मुद्दों पर राजनीति कर के दिखाए। सर्जिकल स्ट्राइक जैसे काल्पनिक मुद्दों पर सारे देश का ध्यान भटकाने की साजिश बंद करी जाय। चुनाव भी देश की गरीब जनता के मुद्दे पर लड़ कर दिखाइये।

देश की गरीब जनता की बात कोई नहीं सुन रहा है। भाजपा बड़ी चालाकी से सारी राजनैतिक बहस को असली मुद्दों से हटा कर गाय, मुसलमान, पाकिस्तान जैसे काल्पनिक मुद्दों पर ले गयी है। इनकी साजिश को पहचानिए, इन्हें असली मुद्दों पर खींच कर लाइए, अगर आप भाजपा के मुद्दों पर बहस में फंसेंगे तो वो आपको अपने मैदान में पीट कर भगा देंगे। इन संघियों को अपने मैदान में घसीट कर लाइए,
ये यहाँ मार खायेंगे कि ये हिन्दुओं की नहीं अमीरों के गुलामों की सरकार है।

घटिया होती पत्रकारिता का जिन्हें गम है सिर्फ वही पढ़ें

इस लेख को उन पत्रकारों को जरूर पढ़ना चाहिए जो सच को सामने लाने के लिए खुद में हलचल महसूस करते हैं और मानते हैं कि उनमें पत्रकारिता की धारा बदल देने का माद्दा है...

प्रेम से बोलो जय भारत माता की  

शेखर गुप्ता
पाकिस्तानी पत्रकार अौर टिप्पणीकार प्राय: कहते हैं कि जब विदेश और सैन्य नीतियों की बात आती है तो भारतीय मीडिया उनके मीडिया की तुलना में सत्ता के सुर में अधिक सुर मिलाता है। कड़वा सच तो यह है कि कुछ पाकिस्तानी पत्रकार (ज्यादातर अंग्रेजी के) साहसपूर्वक सत्ता प्रतिष्ठानों की नीतियों व दावों पर सवाल उठाते रहे हैं। इनमें कश्मीर नीति में खामी बताना तथा अातंकी गुटों को बढ़ावा देने जैसे मुद्‌दे शामिल हैं। इसके कारण कुछ पत्रकारों को निर्वासित होना पड़ा (रजा रूमी, हुसैन हक्कानी) या जेल जाना पड़ा (नजम सेठी)।

भारतीय पत्रकारों की अपनी दलील है : भारत में कहीं ज्यादा असली लोकतंत्र है व सेना राजनीति से दूर है, इसलिए तुलना अप्रासंगिक है। जहां जरूरत होती है, हम सवाल खड़े करते ही हैं। श्रीलंका सरकार के खिलाफ लिट्‌टे को पहले ट्रेनिंग व हथियार देने में सरकार का अंध समर्थन करने (इंडिया टुडे ने 1984 में मुझे यह स्टोरी ब्रेक करने दी थी। इंदिरा गांधी ने तब मुझे राष्ट्र विरोधी कहा था।) और बाद में भारतीय शांतिरक्षक बल के द्वारा वहां हस्तक्षेप करने के समर्थन का भारतीय मीडिया पर कोई आरोप नहीं लगा सकता।

किंतु यह परिपाटी अब बदल रही है और यह सिर्फ उड़ी हमले के बाद नहीं हुआ जब इंडिया टुडे के करण थापर ही एकमात्र एेसे पत्रकार थे, जिन्होंने सवाल उठाया कि कैसे चार गैर-सैनिक ब्रिगेड मुख्यालय की सारी सुरक्षा को चकमा देने में कामयाब हुए। लेफ्टिनेंट जनरल जेएस ढिल्लौ आलोचनात्मक आकलन करने वाले एकमात्र रिटायर्ड जनरल थे। वे उन पांच ब्रिगेड में से एक के कमांडर थे, जो 1987 के अक्टूबर में सबसे तेज गति से जाफना पहुंची थीं। वह भी न्यूनतम नुकसान के साथ।

मैं स्वीकार करूंगा कि बदलाव करगिल के साथ हुआ। करगिल युद्ध तीन हफ्तों के इनकार के बाद शुरू हुआ। पाकिस्तानियों ने इनकार किया कि वे वहां मौजूद हैं, हमारी सेना ने इतनी गहराई और विस्तार में हुई घुसपैठ से इनकार किया। जनरलों के पहले जर्नलिस्ट वहां पहुंच गए। वहां पत्रकारों और सैन्य इकाइयों में एक-दूसरे के लिए फायदेमंद रिश्ता स्थापित हो गया। अंतिम नतीजा सबके लिए अच्छा रहा : भारत की विश्वसनीयता बढ़ी, क्योंकि इसने स्वतंत्र प्रेस को रणभूमि में बेरोक-टोक पहुंचने की अनुमति दी।

सेना को यह फायदा हुआ कि उसके असाधारण पराक्रम की कहानियां पूरे देश में पहुंचीं। इस सारी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण खबर रह गई : इतने सारे पाकिस्तानी इतने भीतर तक कैसे घुस आए, हमें इसका पता लगने में इतना वक्त क्यों लगा, हमने इसकी आधे-अधूरे मन से (छोटे गश्ती दलों का इस्तेमाल कर) पड़ताल क्यों की या ऐसे विमान क्यों इस्तेमाल किए, जो कंधे से चलाई जा सकने वाली मिसाइलों का निशाना बन सकते थे, जबकि बेहतर विकल्प मौजूद थे।

नतीजा यह हुआ कि किसी की बर्खास्तगी नहीं हुई। स्थानीय ब्रिगेड कमांडर सशस्त्र बल न्यायाधीकरण में भेजे गए और बच गए। युवा अफसरों व सैनिकों की वीरता की खबरें देकर हमने ठीक ही किया, लेकिन राजनीतिक व सैन्य प्रतिष्ठानों को अपना कर्तव्य निभाने में लापरवाही चाहे न भी कहें, बहुत बड़ी अक्षमता के साथ बच निकलने देकर ठीक नहीं किया। सैन्य कमांडरों की नाकामी से बढ़कर खतरनाक कोई नाकामी नहीं होती और यही वजह है कि परम्परागत सेना जवाबदेही पर इतना जोर देती है। इस बीच भारतीय मीडिया को ताकत बढ़ाने वाले तत्व (फोर्स मल्टीप्लायर) के रूप में सराहना मिल रही थी।

हम उस पल में डूब गए, लेकिन गलत छाप भी छोड़ गए : पत्रकार देश के युद्ध प्रयासों के आवश्यक अंग हैं, उसकी सेना की शक्ति बढ़ाने वाले कारक। वे दोनों हो सकते हैं, लेकिन सच खोजने की चाह दिखाकर, सेवानिवृत्त पाकिस्तानी जनरलों पर चीखकर नहीं या चंदमामा शैली के सैंड मॉडल के साथ स्टूडियो को वॉर रूम में बदलकर नहीं। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे यहां सिरिल अलमिडा और आयशा सिद्दीका नहीं हैं, जो ‘शत्रु’ के प्रवक्ता घोषित होने का जोखिम मोल लेकर कड़वा सच बोलने को तैयार हों। भारतीय न्यूज टीवी सितारों (मोटतौर पर) का बड़ा हिस्सा स्वेच्छा से प्रोपेगैंडिस्ट बनकर रह गया है।

जब पत्रकार अपने लिए ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की परिभाषा स्वीकार कर लेते हैं, तो प्रश्नों के लिए कोई गुंजाइश नहीं बचती। बेशक उड़ी और बाद की घटनाएं इस लेख की वजह हैं। इसने मीडिया को दो ध्रुवों में बांट दिया है, एक तरफ अत्यंत प्रभावी पक्ष उनका है, जो न सिर्फ कोई प्रश्न नहीं पूछते बल्कि वे दावे करने में सरकार व सेना से भी आगे निकल जाते हैं। इन दावों को भरोसेमंद बनाने के लिए रात्रिकालीन कमांडो कवायद के ‘सांकेतिक’ फुटेज का इस्तेमाल किया जाता है। साफ कहें तो कोई भी विश्वनीयता के साथ यह बताने की स्थिति में नहीं है कि तीन हफ्ते पहले हुआ क्या था। या तो हमारी सरकार तथ्यों को गोपनीय बनाए रखने में माहिर हो गई है या हम पत्रकारों ने उन्हें खोजना बंद कर दिया है।

दूसरी तरफ बहुत ही छोटा और सिकुड़ता ध्रुव है, खुद को दूसरों से बेहतर समझने वाले संदेहवादियों का। वे सरकार के किसी दावे पर भरोसा नहीं करते, लेकिन कोई तथ्य नहीं रखते, खोजकर कोई बड़ा धमाका नहीं करते। वे बहुत ही मार्मिक ढंग से सरकार से अपने दावों की पुष्टि करने वाले सबूत देने को कहते हैं। पत्रकारिता महाविद्यालय में जाने वाले हर युवा को सिखाया जाता है कि सरकार छिपाती है और पत्रकार को खोजना होता है। यहां हमारे सामने संदेहवादी खेमे में सबसे उदार, श्रेष्ठतम शिक्षा पाए, प्रतिष्ठित, ख्यात सेलेब्रिटी पत्रकार हैं, वे धमाकेदार खबर खोजते नहीं, बल्कि प्रेस कॉन्फ्रेंस की मांग करते हैं।

 वे खबर नहीं प्राप्त कर सकते, लेकिन वे मानक तय कर देते हैं, जिनका दूसरों को पालन करना ही चाहिए। एक समूह कहता है, आप मुझे जितना बता रहे हैं, उससे ज्यादा में भरोसा करता हूं, मुझे सबूत नहीं चाहिए। दूसरा कहता है, आप जो भी कह रहे हैं, उसमें किसी बात पर मुझे भरोसा नहीं है, इसलिए सैन्य अभियान को सार्वजिनक करें वरना मैं मान लूंगा कि आप झूठ बोल रहे हैं। अब यह न पूछें कि मैं क्यों कह रहा हूं कि भारतीय पत्रकारिता आत्म-विनाश के पथ पर है। जब यह नारा लगाने को कहें : ‘प्रेम से बोलो, जय भारत माता की’ तो कौन भारतीय इसमें दिल से शामिल नहीं होना चाहेगा, लेकिन यदि आप आपकी सरकार को मातृभूमि और राष्ट्र मान लें तो आप पत्रकार नहीं, भीड़ में शामिल एक और आवाज भर हैं।
(दैनिक भास्कर से साभार)

Oct 17, 2016

मुस्लिमों से ज्यादा है हिंदुओं में एक से अधिक पत्नी रखने का रिवाज

दिल्ली के मुखर्जी नगर में प्रमोद कुमार झा आईएएस की तैयारी करते हैं। हमारी उनसे मुलाकात दिल्ली के लक्ष्मीनगर में एक मित्र के यहां दावत पर हुई जिसमें कई लोग भागीदार थे। प्रमोद ने बताया कि वह दो बार प्री दे चुके हैं और अबकी उम्मीद है कि वह चुन लिए जाएंगें। चुने जाने को लेकर वह इसलिए भी आश्वस्त हैं कि उन्होंने परीक्षा और साक्षात्कार पास करने के सभी तरीकों को सीख लिया है और उनका सामान्य ज्ञान बहुत दुरुस्त है। वहां मौके पर मौजूद दूसरे मित्र भी बताने लगे कि प्रमोद का सामान्य ज्ञान वाकई कमाल का है।

हमने जानना चाहा कि अगर आप कल को देश के किसी महत्वपूर्ण पद पर काबिज हो जाएंगे तो पहला सुधार क्या करना चाहेंगे? प्रमोद ने तपाक से कहा, 'कल का पता नहीं पर अभी होता तो मुस्लिम धर्म में तीन तलाक का प्रावधान एक झटके में खत्म कर देता।' जब उनसे यह जानने की कोशिश की गयी, ऐसा क्यों, उनका जवाब था, 'ये तीन बार तलाक बोल के दूसरी औरत की जिंदगी बर्बाद करते हैं। एक से अधिक बीवियां ऐसे रखते हैं मानो औरत नहीं बकरी हों।'

बातचीत आगे बढ़ी तो हमने जानना चाहा कि आपके इस दावे का आधार? पहले तो हमारी बात को उन्होंने मजाक में लिया पर हमने आधार जानने पर जोर दिया तो वह कहने लगे कि इस तथ्य से सभी वाकिफ हैं, आधार का क्या मतलब है? मेरे साथ गए सहयोगी मित्र ने कहा कि आपको समुद्र तल की उंचाई जानने के लिए तथ्य की जरूरत पड़ती है पर इतने बड़े सामाजिक दावे के लिए कहते हैं, तथ्य का क्या मतलब है? कहीं तो कोई स्रोत होगा आपकी जानकारी का, कहीं आपने पढ़ा होगा, कहीं लिखा होगा।

वह और उनकी तरफदारी कर रहे मित्र सकते में आ गए। उनके सामान्य ज्ञान का आधार नहीं मिल रहा था। जो जानकारी इस देश के करोड़ों के लिए आम है, उसके पक्ष में वह सबूत नहीं दे पा रहे थे। जिरह होने लगी तो बात निकली कि यह आंकड़ा तो सेंसेक्स से पता चलेगा। फिर वह और उनके मित्र गूगल पर जुट गए। बड़ी देर तक जुटे रहने के बाद उन्होंने जो पाया, वह उनके सामान्य ज्ञान को बदल गया।

आप भी पढ़िए और देश को तथ्यों के साथ खड़ा कीजिए, पूर्वग्रहों के साथ नहीं।

हमारा पूर्वाग्रह इतना तगड़ा है कि हम लोग अपने ही सरकार के आंकड़े को एक बार झांक कर नहीं देखते कि एक से अधिक पत्नी रखने के मामले में मुस्लिम मर्द पांचवे नंबर पर आते हैं। पहले पर आदिवासी, दूसरे पर जैन, तीसरे पायदान पर बौद्ध, चौथे पर हिंदू हैं।

धर्म और समुदाय आधारित शादियों को लेकर भारत सरकार द्वारा आखिरी सर्वे 1961 में हुआ था। उसके बाद कोई सर्वे सरकार कराने का साहस नहीं करा सकी, क्योंकि इन आंकड़ों के परिणाम बहुसंख्यक आबादी को नाराज करने वाले थे। इसके अलावा कोई सर्वे कभी हुआ ही नहीं, इसलिए बहुपत्नी प्रथा को समझने का सबसे आधिकारिक तरीका यही हो सकता है।

आबादी के हिसाब से एक करोड़ हिंदुओं ने एक से अधिक पत्नी रखी तो मुस्लिमों में 12 लाख मर्दों ने। हिंदूवादी आदिवासियों को भी अपना ही मानते हैं। अगर उनको भी साथ ले ​लिया जाए फिर यह अनुपात दुगुना हो जाएगा।

बहुपत्नी प्रथा का चलन जातियों और समुदायों के हिसाब से
आदिवासी - 15.25 प्रतिशत
बौद्ध - 7.9 प्रतिशत
जैन - 6.7 प्रतिशत
हिंदू - 5.8 प्रतिशत
मुस्लिम - 5.7 प्रतिशत 

स्रोत - सेंसस 1961

Oct 15, 2016

हत्या के 4 दिन बाद भी नहीं गया कोई सवर्ण झांकने

गांव में पहले भी हो चुकी एक दलित की हत्या 

नरेंद्र देव सिंह की रिपोर्ट

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के करडिय़ा गांव में एक दलित को सवर्ण जाति के एक व्यक्ति ने चक्की छू लेने की सजा उसकी गर्दन काट के दी। मामला सुर्खियों में आ गया। राष्टï्रीय मीडिया ने भी इसे जोर शोर से प्रसारित किया लेकिन अभी भी इस गांव के असली सच सामने नहीं आये हैं।

सोहन राम की पत्नी से बात करते बामसेफ के सदस्य

असल में हुआ क्या था
सोहन राम 5 अक्टूबर को कुंदन सिंह भंडारी की चक्की में गेहूं पिसाने गया था। एक स्कूल टीचर ललित कर्नाटक ने सोहन राम द्वारा चक्की छू लिये जाने पर उसे अपवित्र करने की बात कह कर उस पर जातिसूचक गालियों के साथ चिल्लाने लगा। ललित ने कहा, 'तूने नवरात्र में चक्की को अपवित्र कर दिया।' और इसी बात पर तैश में आकर ललित ने सोहन की दराती से गर्दन काट कर हत्या कर दी।

केस वापस लेने का दबाव
करड़िया का दौरा कर लौटे बामसेफ से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता मनोज कुमार आर्या ने बताया कि पीडि़त परिवार ही नहीं बल्कि यहां रहने वाले अन्य दलित परिवार भी भय में ही जी रहे हैं। कई बार पीडि़त परिवार को केस वापस लेने की धमकी दी गयी है। सबसे अमानवीय पहलू यह सामने आया कि सोहन की हत्या के बाद से चार दिन तक उस परिवार में कोई भी सामान्य जाति का व्यक्ति संवेदना व्यक्त करने के नाम पर झांकने तक नहीं आया।

मनोज आर्या के मुताबिक, 'जब कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा इस घर में पहुंचे तब उस गांव के प्रधान ने पहली बार ​दलित परिवार के घर में कदम रखने की जहमत उठायी।'

मृतक सोहन की गर्भवती पत्नी बीना देवी कहती हैं, 'पति की हत्या के बाद परिवार को केस वापस करने की धमकी दी गयी।' बीना रोते हुए कहती हैं, 'सोहन के मरने पर मेरे घर वाले आए थे और कह रहे थे कि इस गांव के दलितों में जितना खौफ है वो कहीं और नहीं देखा।' आरोपी ललित अपनी भाभी की हत्या के मामले में भी अभियुक्त रह चुका है।

हत्या का एफआईआर 15 साल बाद भी नहीं
मृतक सोहन के परिवार के एक रिश्तेदार की भी हत्या हो चुकी है। ग्रामीणों ने बताया कि ​सोहन के रिश्तेदार इसी गांव में रहते थे और उसकी भी हत्या पन्द्रह साल पहले सवर्ण जाति के लोगों ने कर दी थी। इस मामले की आज तक एफआईआर तक दर्ज नहीं हुयी है। ऐसा बिलकुल नहीं है कि जातिवाद की ये नृशंस घटना इस गांव में हाल फिलहाल की घटना है। यह यहां का चलन है और ये हत्या उसकी पराकाष्ठा।

पंद्रह परिवार के पास दो नाली जमीन
यहां शादी ब्याहों के निमंत्रण में सवर्णों और दलितों में दूरी रहती है। अंर्तजातिय विवाह तो सोचना भी पाप है। यहां दलितों के पन्द्रह परिवार के पास केवल दो नाली (लगभग आधा बीघा) जमीन है। ये लोग सवर्णों की जमीन पर ही मजदूरी करते हैं। यहां रहने वाले दलितों का साफ कहना है कि उन्हें दिन भर मजदूरी के बाद भी कभी पचास तो कभी सौ रूपये ही थमा दिये जाते हैं। जहां तक पुलिस व्यवस्था की बात है तो वो कितनी लचर या कहें सवर्णों की गोद में बैठी है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि इस परिवार को सुरक्षा दिये जाने का दावे पुलिस महकमा कर रहा है लेकिन पुलिस तभी आती है जब कोई नेता उस घर तक जाता है। इस गांव में लगभग जितने परिवार सवर्णों के हैं उतने ही परिवार दलितों के भी हैं। मतलब संख्याबल में दलित कम नहीं हैं लेकिन सदियों से किये जा रहे जाति प्रथा के जुल्मों ने इन्हें इतना खोखला कर दिया है कि लोग सही से मुंह तक नहीं खोल पा रहे हैं।

सीएम की मदद की हकीकत
सीएम हरीश रावत ने यहां आकर पीडि़त परिवार को 12 लाख 62 हजार रूपये की मदद देने की घोषणा की। लेकिन इसमें से 5 लाख 62 हजार रूपये समाज कल्याण विभाग इस तरह के मामले में ही पहले से ही देता है। सरकार ने इस रकम को भी सीएम की मदद में जोड़ लिया।

Oct 14, 2016

आपको याद है वह 13 वर्ष की लड़की

हिंदी में पहली बार आया जैन धर्म के पाखंड सिलसिलेवार सच
                                एक भुक्तभोगी ने लिखी है जैन धर्म के पाखंड की असल कथा
                               जानिए कैसे हुई आराधना समदरिया की मौत, कैसे है यह हत्या
श्रेणिक मुथा

अक्सर ऐसा होता है कि हमारे आस-पास हुई कोई विचलित कर देने वाली घटना हमें उससे जुड़े अपने व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों की याद दिला देती है। आराधना समदरियाकी मौत ने मेरे लिए ऐसा ही किया। मैं अपनी कहानी को इस तरह बयाँ नहीं करना चाहता कि ये सारी बात मेरे ही इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाए लेकिन मुझे लगता है कि इस घटना को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने के लिए ये शायद ज़रूरी होगा कि मैं ये बताऊँ कि जो कुछ भी हुआ उसे मैं किस तरीक़े से देखता हूँ और उस पर मेरी प्रतिक्रिया क्या है।

मेरे बड़े होने के दौरान मेरे साथ वो सब कुछ हुआ जो किसी भी धार्मिक जैन परिवार में होता है, ना सिर्फ़ आस्था के स्तर पर बल्कि धर्म की पालना के तौर पर भी। धर्म की इस दुनिया में मेरा प्रादुर्भाव किस तरह हुआ इसकी पड़ताल कर पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं है क्योंकि उस वक़्त की कोई यादें मेरे पास बची नहीं है। लेकिन जो कुछ यादें बाक़ी हैंमैं उन्हीं में से कुछ को फिर से टटोलना चाहता हूँ।

जिस बिल्डिंग में मेरा बचपन बीता वहाँ सिर्फ़ मारवाड़ी जैन परिवार ही रहा करते थे। उनमें से सिर्फ़ एक मराठा था; जो कि उस बिल्डिंग का मालिक भी था। मैं जिस घर में रहताथा वो किराए पर लिया गया था और वो भी 1960 से। जब मैं अपनी यादों को टटोलने की कोशिश करता हूँ या उन बातों को याद करता हूँ जोकि अक्सर घर पर की जाती थीं तो  सा कोई भी लम्हा याद नहीं आता जिसमें कहीं भी ‘धोंडी बा’ का कभी कोई ज़िक्र हुआ हो। हमारे घर के मालिक होने के बावजूद एक अलग धर्म और जाति का होने की वजहसे हमारे घर की बात-चीतों में कहीं भी उनके लिए कोई जगह नहीं थी। हम सिर्फ़ उन्हीं लोगों के बारे में बात करते थे, उन्हें अपने घर बुलाते थे और उनके यहाँ जाना हमें पसंद थाजो हमारे ही धर्म और जाति के थे।और आज भी मेरे परिवार या समुदाय के लिए ये सब बदला नहीं है।

घर की चारदीवारी से बाहर, धर्म के साथ मेरे पहले जुड़ाव की याद तब की है जब मुझे ‘पूजा’ करने के लिए एक मंदिर ले जाया गया। जैन धर्म किसी भगवान/भगवानों में विश्वासनहीं करता, ये मुझे बहुत बाद में पता चला। लेकिन फिर भी इस धर्म में भी इसके अपने ‘भगवान’ हैं जिनकी पूजा की जाती है। मुझे नहलाया गया और नए कपड़े पहनाए गएजोकि सिर्फ़ इसी मौक़े के लिए अलग से रखे गए थे (उस दिन भी और उसके बाद हर दिन)। 

मैं ना तो इन कपड़ों को पहनकर खा सकता था और ना पेशाबघर जा सकता था क्यूँकि ऐसा करने पर ये कपड़े प्रदूषित हो जाते और मेरे बाक़ी कपड़ों की ही तरह हो जाते। ये कहना तो ज़रूरी ना होगा कि इस मंदिर में सिर्फ़ वही लोग आते और पूजा करते थेजो हमारे ही सम्प्रदाय के थे।

जब मैं कोई सात-आठ बरस का हुआ तो पर्यूशन (आठ दिन का एक उत्सव जो महावीर जयंती के दिन ख़त्म होता है) पर्व मेरे लिए पूजा करने और धर्म को समझने और अपनेअनुभव

पर्यूशन ‘चातुर्मास’ की शुरुआत के लगभग दो महीनों बाद आता है। चातुर्मास मानसून के चार महीनों के साथ पड़ता है। जैन धर्म की प्रथाएँ कोई मैकडॉनल्ड के मेन्यू से कमनहीं! एक व्यक्ति इनमें से किसी भी ‘कॉम्बो’ को चुन सकता है चातुर्मास के पालन के लिए-

दुविहार - दिन के समय जितना चाहे खा सकते हैं, लेकिन सूर्यास्त के बाद 10 बजे तक सिर्फ़ दवाई और उबला हुआ पानी ही ले सकते हैं। (कुछ जैन मुनियों के अनुसार 12 बजेतक पानी पिया जा सकता है।)

तिविहार - दिन के समय जितना चाहे खा सकते हैं लेकिन सूर्यास्त के बाद 10बजे तक सिर्फ़ उबला हुआ पानी ही पी सकते हैं।

चौविहार - दिन के समय भोजन खा सकते हैं लेकिन सूर्यास्त के बाद ना तो पानी पी सकते हैं और ना खाना खा सकते हैं।

ब्यासना - दिन में सिर्फ़ दो बार भोजन करना, सिर्फ़ उबले हुए पानी के साथ और वो भी सिर्फ़ सूर्यास्त से पहले।

एकाशना - दिन में सिर्फ़ एक बार भोजन करना, उबले हुए पानी के साथ, सूर्यास्त से पहले।

उपवास - बिलकुल भी खाना ना खाना, सिर्फ़ उबला हुआ पानी पीना वो भी सूर्यास्त से पहले तक।

चौविहार उपवास - पानी या खाने का बिलकुल भी सेवन ना करना।

अट्ठम - तीन दिन तक उपवास करना।

अट्ठाई - आठ दिनों तक उपवास करना।

15 दिनों तक उपवास करना।

मासखमन - 30 दिनों तक उपवास करना यानि कि भोजन का बिलकुल भी सेवन ना करना।

अपने परिवार के बड़ों को पूरे समर्पण से उपवास करते देख मुझे भी प्रेरणा मिली। पहले तो मैंने छोटे उपवास रखे। ज़्यादा से ज़्यादा एक ‘एकाशना’।

मुझे याद है जब मैंने पहली बार उपवास रखा तो मैं 8वीं कक्षा में था। मेरी माँ और चाची ने ‘अट्ठाई’ रखा था यानि कि आठ दिनों का उपवास। मैं ये कह सकता हूँ कि मेरा पहलाउपवास मैंने अपनी ‘मर्ज़ी’ से रखा था। ये कोई ज़्यादा मुश्किल नहीं था, बेशक रात में मुझे कई सपने आए जिनमें मिनट मेड के पल्पी ओरेंज जूस की बोतल भी शामिल थी!अगले साल मैंने आठ दिनों का उपवास रखा।

इस सब में सिर्फ़ ये समझना काफ़ी नहीं कि व्रत-उपवास रखना क्या होता है बल्कि ये भी समझना ज़रूरी है कि ये सब कैसे होता है (आख़िर क्या है जो बच्चों को ऐसे उपवासरखने को प्रेरित करता है)। यह तब मेरे ज़हन में साफ़ हो जाता है जब मैं विचार करता हूँ कि चौथी कक्षा से आठवीं कक्षा में आने के बीच मेरे साथ क्या-क्या हुआ। हमें (यानि हमारे समुदाय के बच्चों को) ‘पाठशाला’ में भेजा जाता था, हालाँकि ‘पाठशाला’ शब्द का मतलब तो विद्यालय भी होता है लेकिन यहाँ यह पाठशाला एक धार्मिक पाठशाला थी जैसे कि इस्लाम में मदरसा होता है।

मुझे (और मेरे चचेरे भाई-बहनों को) वहाँ मेरी माँ और चाची द्वारा ले जाया जाता था।पाठशाला में हमें धर्म के उपदेश दिए जाते थे। एकअच्छा जीवन जीने के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह बताया जाता था। 40-50 साल की एक बुज़ुर्ग महिला हमें पढ़ाती थी। मुझे वो वाक़या याद है जब हमें एक किताबसे कुछ चित्र दिखाए गए थे जिनमें इंसानों के टुकड़े करने और उन्हें तेल में सेंकने जैसी तस्वीरें थीं जोकि मूलतः ‘नरक’ का चित्रण था। 

चातुर्मास के उत्सव में एक ख़ास तरीक़े की प्रतियोगिता होती थी। । हमें एक कार्ड दिया जाता था जिस पर कई खाने बने होते थे। पहले कॉलम में कई चीज़ें लिखी होती थीं, जैसे ‘पूजा की’, ‘मंदिर गया/गयी’, ‘रात को खाना नहीं खाया’, ‘कुछ दान किया’, आदि। हममें से हर एक को उन खानों को टिक करना होता था जो काम हमने उस दिन किए। इस हर एक काम के लिए हमें ‘पोईंट’ मिलते थे और इन सबका योग करने के बाद जोफ़ाइनल स्कोर होता था उसके आधार पर हमें गिफ़्ट मिला करते थे। यह परम्परा बिना शर्म के आज भी बदस्तूर जारी है।

मैं यहाँ इतनी छोटी-छोटी बातें भी इसलिए बयान कर रहा हूँ क्यूँकि उन लोगों की बातों को झुठलाने का यही एक तरीक़ा है जो कह रहे हैं कि आराधना समदरिया की मौत एक हादसा था और उसने उपवास अपनी ‘मर्ज़ी’ से रखा था।

नहीं, ऐसा क़तई नहीं है। उसी तरह जैसे मैं और मेरे इर्द-गिर्द के हर बच्चे ने अपनी ‘मर्ज़ी’ से ऐसा नहीं किया। यह उपवास तो हमारी धर्मिकता के आधार पर मिलने वाले इनामों और उस भय का परिणाम था जो धीरे-धीरे हमारे अंदर बैठाया गया था कि अगले जन्म में हमारा क्या हश्रहोगा। मुझे हमेशा ये बताया गया कि मैंने पिछले जन्मों में कुछ पुण्य किए थे जिनकी वजह से मेरा जन्म इस बार ‘दुनिया के सबसे बेहतरीन धर्म’ में हुआ है।

संस्कृति और संस्कार के नाम पर हमारा इंडॉक्ट्रिनेशन बहुत जल्दी ही शुरू हो जाता है और वो भी ऐसे तरीक़ों से जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में किए जाने वाले कामों के आधार पर कच्ची उम्र में ही हमारे अंदर आस्था के बीज बोती है।

बिना ज़्यादा तफ़सीलों में जाए मैं एक अन्य विवादास्पद लेकिन इससे जुड़े हुए मुद्दे पर बात करना चाहता हूँ और वो है ‘सनथारा’ यानि कि धार्मिक वजहों से आमरण उपवास करना। मैं यहाँ हाल ही निखिल सोनी बनाम भारतीय संघ के मुक़दमे में राजस्थान राज्य द्वारा पेश की गयी दलीलकी तरफ़ आपका ध्यान लाना चाहूँगा। राजस्थान राज्य ने अपनी दलीलों में ‘दबाव के तहत किए गए धार्मिक कृत्य’ और ‘धार्मिक परम्परा या रिवाजों’ के बीच फ़र्क़ किया है। जो लोग जैन धर्म को समझने के बाद इसे ग्रहण करते हैं उन्हें छोड़ दिया जाए तो हर जैन परिवार के बच्चों परधार्मिक प्रथाओं का थोपा जाना ‘दबाव’ नहीं तो और क्या है!

आराधना समदरिया का 68 दिनों का उपवास शायद उसके माता-पिता की नज़रों में किसी दबाव का परिणाम नहीं था। लेकिन एक समुदाय द्वारा ऐसी प्रथा का पालन करना उस 13 साल की बच्ची को 68दिनों तक उपवास करने के लिए दबाव का परिणाम नहीं तो और क्या है।अंतर्जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह जैसी प्रवृत्तियाँ जैन समुदाय में बहुत कम ही देखने को मिलती हैं क्यूँकि एक आम जैन व्यक्ति को ‘बाज़ार’ के अलावा और किसी संस्कृति से रूबरू होने का कोई मौक़ा ही नहीं मिलता।

ऐसे वाक़ये आए दिन होते रहते हैं लेकिन इन्हें चुनौती देने वालाकोई नहीं होता। एक लड़की को ‘माहवारी हिंसा’ के ख़िलाफ़ बोलने नहीं दिया जाएगा, अगर उसकी मर्ज़ी ना हो तो भी उसे मंदिर जाने से मना करने की इजाज़त नहीं होगी, किसी लड़के को कोई माँस खाने वाला दोस्त रखने की कोई इजाज़त नहीं होगी (अपनी मर्ज़ी से माँस खाने काफ़ैसला करना तो ईश-निंदा करने के बराबर होगा), लेकिन एक 13 साल की बच्ची को 68 दिन का उपवास रखने दिया जाएगा इसलिए क्यूँकि किसी भिक्षु ने उस लड़की के पिता से कहा होगा कि बच्ची के उपवास रखने से उनका कारोबार फलेगा-फूलेगा।

आराधना की मौत जैन समुदाय को लेकर ‘पंथ-निरपेक्षता’ के सवालों पर पुनः सोचने पर मजबूर करती है। जैन धर्म में महिला-पुरुष एवं लड़के-लड़कियों के ‘दीक्षा’ लेकर (लगभग ‘सन्यास’ की तरह) भौतिक संसार की सभी ज़रूरतों, इच्छाओं और आकांक्षाओं को छोड़ देने की प्रथा रही है। कई बार ऐसा भी होता है कि 15साल से भी छोटे लड़के-लड़कियों को ऐसे पथ पर स्वीकार कर लिया जाता है। 

आख़िर उनका ये क़दम कितना ‘स्वैच्छिक’ है? यह वाक़या राज्य-सत्ता और धर्म के बीच सम्बन्धों को लेकर भी पुनर्विचार करने पर मजबूर करता है। ख़ासकर जैन धर्म जैसे धर्म के बारे में जो ‘अल्पसंख्यक’ होने का फ़ायदा उठाते हुए अपनी परम्पराओं को बचाने और संरक्षित करने का काम कर रहा है। ये तो क़तई ऐसी परम्परा नहीं है जिसे हमें बचाना चाहिए। 

श्रेणिक मुथा ILS Law College, पुणे के छात्र हैं| उनसे shrenik.mutha@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता हैं|  अनुवाद: अमित शर्मा

Oct 13, 2016

बागेश्वर में दलित युवक की हत्या के खिलाफ प्रदर्शन

बागेश्वर से सुधीर कुमार की रिपोर्ट

जेएनयू आंदोलन के बाद चर्चा में आए या यूँ कहें कि मुख्यधारा की मीडिया की जानकारी में आए आज़ादी के नारे की गूँज अब उत्तराखण्ड के बागेश्वर में भी सुनाई पड़ी है.

कल 12 अक्टूबर को दलित सोहन राम की हत्या के विरोध में अम्बेडकर चेतना मंच द्वारा जिला मुख्यालय में जोरदार प्रदर्शन कर क्षेत्र में मौजूद जातिय व सामाजिक भेदभाव का पुतला फूंका.

6 अक्टूबर को बागेश्वर के भेटा गांव में दलित सोहन राम की दरांती से गर्दन काटकर सरेआम हत्या कर दी गयी थी. हत्यारे सरकारी शिक्षक ललित कर्नाटक द्वारा सोहन राम की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी थी कि उसने आटा चक्की को छूकर अशुद्ध कर दिया था. हत्यारोपी ललित कर्नाटक, सह अभियुक्त  घनश्याम कर्नाटक और आनन्द कर्नाटक को न्यायालय के आदेश पर जेल भेज दिया गया है.

हत्या के खिलाफ कल बागेश्वर के नुमाइश मैदान से शुरू हुआ जुलूस नगर के मुख्य मार्गों से होता हुआ कलक्ट्रेट पहुंचा. छुआछूत, सवर्णवाद, ब्राह्मणवाद और मनुवाद से आज़ादी के नारे लगाता यह जुलूस दलितों के खिलाफ हमलों को रोके जाने की बात कर रहा था. 


Oct 12, 2016

नंदिता दास नहीं कर सकेंगी पाकिस्तान में शूटिंग

भारत के दंगाई मानसिकता के लोग पाकिस्तानी कलाकारों के भागीदारी से बन रही हिंदुस्तानी फिल्मों के अधर में लटकने से बहुत खुश थे। वे अब और खुश हो सकते हैं कि पाकिस्तान में हिंदुस्तानी फिल्म शूट होने का प्लान रद्द गया है...

लो जी मामला बराबर हो गया। भारतीय अभिनेत्री नंदिता दास जिस फिल्म के शूटिंग की तैयारी रही थीं, उसका प्लान अब रद्द हो गया है। उन्होंने मुंबई एक अखबार से बातचीत में कहा कि वह दिल्ली में शूटिंग की कोशिश कर रही हैं। फिल्म में मंटो का रोल नवाजुद्दीन सिद्दीकी निभाने वाले थे।

सार्थक फिल्मों की चर्चित अभिनेत्री नंदिता दास अपनी पूरी टीम के साथ प्रसिद्ध कहानीकार शआदत हसन मंटो पर बन रही एक फिल्म की शूटिंग के लिए लाहौर जाने वाली थीं। फिल्म दिसंबर में शूट होने वाली थी। मंटो लाहौर में भी रहे थे, इसलिए फिल्म के निर्देशक ने यथार्थ चित्रण के लाहौर को चुना।

नंदिता ने अखबार को बताया कि दोनों मुल्कों में तनाव के बाद असुरक्षित मान इस फिल्म को हम लाहौर में शूट नहीं कर सकते और हम दिल्ली में शूटिंग का मन बना रहे हैं।

गौरतबल है कि जिस मंटो ने दंगे और बंटवारे के खिलाफ सबसे मजबूती से लिखा उसी मंटो की फिल्म हिंदूस्तान—पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव की भेंट चढ़ गयी। 'टोबा टेक सिंह' बंटवारे पर मंटो की प्रसिद्ध कृति है, जिसका हजारो बार मंचन हो चुका है, फिल्में बन चुकी हैं।

Oct 7, 2016

देवी से दो बातें

हर 2 मिनट में
अत्चायार होता है म​हिलाओं पर

हर घंटे
26 अपराध होते हैं औरतों पर

हर 10 घंटे में
पति प्र​ताड़ित करता है बीवी को

और पिछले दस साल में
2 लाख 43 हजार 51 का हुआ बलात्कार
3 लाख 15 हजार 74 के साथ हुई अपहरण की वारदात
80 हजार 8 सौ 33 मार दी गयीं कि दहेज कम ले आईं
4 लाख 70 हजार 5 सौ 56 महिलाओं का हुआ यौन उत्पीड़न

चलो मान लिया
हर 2 मिनट में संभव नहीं
हर घंटे भी मुश्किल होगी
10 घंटे में भी नहीं संभल पाएगा देश
पर दस साल में

दस साल में तो
बीस बार आए होंगे नवरात्रे
इतनी ही बार अव​तरित हुई होंगी देवी भी
और संगी रही होंगी अनेकानेक देवियां

फिर
इतने साल क्या कम थे
बलात्कार
हत्या
छेड़खानी
उत्पीड़न और औरत पर अपराध रोकने के लिए
एक दस हाथ वाली देवी के लिए
जो हर दस साल पर अपराध दोगुने से भी ज्यादा होते जाते हैं

इसलिए
मुझसे नहीं अपनी देवी से पूछो
मैं क्यों नहीं रखता नवरात्रे
सुबह उठकर क्यों नहीं करता दुर्गा सप्तसती का पाठ
मैं तो बस इतना जानता हूं
इंसान  अपना काम न करे तो उसे निकम्मा कहते हैं
अगर दिन, महीने, साल और सदी
दस हाथों वाली देवी हाथ पर हाथ धरे बैठी रहें
तो  उन्हें क्या कहेंगे
ये आप ही बता दो 
हम कुछ बालेंगे
आप तलवार खींच लोगे