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Oct 20, 2016

घटिया होती पत्रकारिता का जिन्हें गम है सिर्फ वही पढ़ें

इस लेख को उन पत्रकारों को जरूर पढ़ना चाहिए जो सच को सामने लाने के लिए खुद में हलचल महसूस करते हैं और मानते हैं कि उनमें पत्रकारिता की धारा बदल देने का माद्दा है...

प्रेम से बोलो जय भारत माता की  

शेखर गुप्ता
पाकिस्तानी पत्रकार अौर टिप्पणीकार प्राय: कहते हैं कि जब विदेश और सैन्य नीतियों की बात आती है तो भारतीय मीडिया उनके मीडिया की तुलना में सत्ता के सुर में अधिक सुर मिलाता है। कड़वा सच तो यह है कि कुछ पाकिस्तानी पत्रकार (ज्यादातर अंग्रेजी के) साहसपूर्वक सत्ता प्रतिष्ठानों की नीतियों व दावों पर सवाल उठाते रहे हैं। इनमें कश्मीर नीति में खामी बताना तथा अातंकी गुटों को बढ़ावा देने जैसे मुद्‌दे शामिल हैं। इसके कारण कुछ पत्रकारों को निर्वासित होना पड़ा (रजा रूमी, हुसैन हक्कानी) या जेल जाना पड़ा (नजम सेठी)।

भारतीय पत्रकारों की अपनी दलील है : भारत में कहीं ज्यादा असली लोकतंत्र है व सेना राजनीति से दूर है, इसलिए तुलना अप्रासंगिक है। जहां जरूरत होती है, हम सवाल खड़े करते ही हैं। श्रीलंका सरकार के खिलाफ लिट्‌टे को पहले ट्रेनिंग व हथियार देने में सरकार का अंध समर्थन करने (इंडिया टुडे ने 1984 में मुझे यह स्टोरी ब्रेक करने दी थी। इंदिरा गांधी ने तब मुझे राष्ट्र विरोधी कहा था।) और बाद में भारतीय शांतिरक्षक बल के द्वारा वहां हस्तक्षेप करने के समर्थन का भारतीय मीडिया पर कोई आरोप नहीं लगा सकता।

किंतु यह परिपाटी अब बदल रही है और यह सिर्फ उड़ी हमले के बाद नहीं हुआ जब इंडिया टुडे के करण थापर ही एकमात्र एेसे पत्रकार थे, जिन्होंने सवाल उठाया कि कैसे चार गैर-सैनिक ब्रिगेड मुख्यालय की सारी सुरक्षा को चकमा देने में कामयाब हुए। लेफ्टिनेंट जनरल जेएस ढिल्लौ आलोचनात्मक आकलन करने वाले एकमात्र रिटायर्ड जनरल थे। वे उन पांच ब्रिगेड में से एक के कमांडर थे, जो 1987 के अक्टूबर में सबसे तेज गति से जाफना पहुंची थीं। वह भी न्यूनतम नुकसान के साथ।

मैं स्वीकार करूंगा कि बदलाव करगिल के साथ हुआ। करगिल युद्ध तीन हफ्तों के इनकार के बाद शुरू हुआ। पाकिस्तानियों ने इनकार किया कि वे वहां मौजूद हैं, हमारी सेना ने इतनी गहराई और विस्तार में हुई घुसपैठ से इनकार किया। जनरलों के पहले जर्नलिस्ट वहां पहुंच गए। वहां पत्रकारों और सैन्य इकाइयों में एक-दूसरे के लिए फायदेमंद रिश्ता स्थापित हो गया। अंतिम नतीजा सबके लिए अच्छा रहा : भारत की विश्वसनीयता बढ़ी, क्योंकि इसने स्वतंत्र प्रेस को रणभूमि में बेरोक-टोक पहुंचने की अनुमति दी।

सेना को यह फायदा हुआ कि उसके असाधारण पराक्रम की कहानियां पूरे देश में पहुंचीं। इस सारी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण खबर रह गई : इतने सारे पाकिस्तानी इतने भीतर तक कैसे घुस आए, हमें इसका पता लगने में इतना वक्त क्यों लगा, हमने इसकी आधे-अधूरे मन से (छोटे गश्ती दलों का इस्तेमाल कर) पड़ताल क्यों की या ऐसे विमान क्यों इस्तेमाल किए, जो कंधे से चलाई जा सकने वाली मिसाइलों का निशाना बन सकते थे, जबकि बेहतर विकल्प मौजूद थे।

नतीजा यह हुआ कि किसी की बर्खास्तगी नहीं हुई। स्थानीय ब्रिगेड कमांडर सशस्त्र बल न्यायाधीकरण में भेजे गए और बच गए। युवा अफसरों व सैनिकों की वीरता की खबरें देकर हमने ठीक ही किया, लेकिन राजनीतिक व सैन्य प्रतिष्ठानों को अपना कर्तव्य निभाने में लापरवाही चाहे न भी कहें, बहुत बड़ी अक्षमता के साथ बच निकलने देकर ठीक नहीं किया। सैन्य कमांडरों की नाकामी से बढ़कर खतरनाक कोई नाकामी नहीं होती और यही वजह है कि परम्परागत सेना जवाबदेही पर इतना जोर देती है। इस बीच भारतीय मीडिया को ताकत बढ़ाने वाले तत्व (फोर्स मल्टीप्लायर) के रूप में सराहना मिल रही थी।

हम उस पल में डूब गए, लेकिन गलत छाप भी छोड़ गए : पत्रकार देश के युद्ध प्रयासों के आवश्यक अंग हैं, उसकी सेना की शक्ति बढ़ाने वाले कारक। वे दोनों हो सकते हैं, लेकिन सच खोजने की चाह दिखाकर, सेवानिवृत्त पाकिस्तानी जनरलों पर चीखकर नहीं या चंदमामा शैली के सैंड मॉडल के साथ स्टूडियो को वॉर रूम में बदलकर नहीं। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे यहां सिरिल अलमिडा और आयशा सिद्दीका नहीं हैं, जो ‘शत्रु’ के प्रवक्ता घोषित होने का जोखिम मोल लेकर कड़वा सच बोलने को तैयार हों। भारतीय न्यूज टीवी सितारों (मोटतौर पर) का बड़ा हिस्सा स्वेच्छा से प्रोपेगैंडिस्ट बनकर रह गया है।

जब पत्रकार अपने लिए ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की परिभाषा स्वीकार कर लेते हैं, तो प्रश्नों के लिए कोई गुंजाइश नहीं बचती। बेशक उड़ी और बाद की घटनाएं इस लेख की वजह हैं। इसने मीडिया को दो ध्रुवों में बांट दिया है, एक तरफ अत्यंत प्रभावी पक्ष उनका है, जो न सिर्फ कोई प्रश्न नहीं पूछते बल्कि वे दावे करने में सरकार व सेना से भी आगे निकल जाते हैं। इन दावों को भरोसेमंद बनाने के लिए रात्रिकालीन कमांडो कवायद के ‘सांकेतिक’ फुटेज का इस्तेमाल किया जाता है। साफ कहें तो कोई भी विश्वनीयता के साथ यह बताने की स्थिति में नहीं है कि तीन हफ्ते पहले हुआ क्या था। या तो हमारी सरकार तथ्यों को गोपनीय बनाए रखने में माहिर हो गई है या हम पत्रकारों ने उन्हें खोजना बंद कर दिया है।

दूसरी तरफ बहुत ही छोटा और सिकुड़ता ध्रुव है, खुद को दूसरों से बेहतर समझने वाले संदेहवादियों का। वे सरकार के किसी दावे पर भरोसा नहीं करते, लेकिन कोई तथ्य नहीं रखते, खोजकर कोई बड़ा धमाका नहीं करते। वे बहुत ही मार्मिक ढंग से सरकार से अपने दावों की पुष्टि करने वाले सबूत देने को कहते हैं। पत्रकारिता महाविद्यालय में जाने वाले हर युवा को सिखाया जाता है कि सरकार छिपाती है और पत्रकार को खोजना होता है। यहां हमारे सामने संदेहवादी खेमे में सबसे उदार, श्रेष्ठतम शिक्षा पाए, प्रतिष्ठित, ख्यात सेलेब्रिटी पत्रकार हैं, वे धमाकेदार खबर खोजते नहीं, बल्कि प्रेस कॉन्फ्रेंस की मांग करते हैं।

 वे खबर नहीं प्राप्त कर सकते, लेकिन वे मानक तय कर देते हैं, जिनका दूसरों को पालन करना ही चाहिए। एक समूह कहता है, आप मुझे जितना बता रहे हैं, उससे ज्यादा में भरोसा करता हूं, मुझे सबूत नहीं चाहिए। दूसरा कहता है, आप जो भी कह रहे हैं, उसमें किसी बात पर मुझे भरोसा नहीं है, इसलिए सैन्य अभियान को सार्वजिनक करें वरना मैं मान लूंगा कि आप झूठ बोल रहे हैं। अब यह न पूछें कि मैं क्यों कह रहा हूं कि भारतीय पत्रकारिता आत्म-विनाश के पथ पर है। जब यह नारा लगाने को कहें : ‘प्रेम से बोलो, जय भारत माता की’ तो कौन भारतीय इसमें दिल से शामिल नहीं होना चाहेगा, लेकिन यदि आप आपकी सरकार को मातृभूमि और राष्ट्र मान लें तो आप पत्रकार नहीं, भीड़ में शामिल एक और आवाज भर हैं।
(दैनिक भास्कर से साभार)

Jun 1, 2016

एक पहेली सुनिए और सुलझाइए...

करीब पंद्रह दिन पहले की बात है। एक स्कूल होता है। उसमें लड़का—लड़की दोनों पढ़ते हैं। जैसा कि पढ़ाई के दौरान कई बार होता है, वो यहां भी होता है। 16—17 साल के एक ही गांव के एक जोड़े में मोहब्बत हो जाती है। पर मोहब्बत भी इतनी आसान चीज कहां। निगोड़ी हर बार जाति—धर्म के साथ आती है, सो इस बार भी आई है। 

लौंडिया हिंदू है और लौंडा मुसलमान। प्रेम परवान चढ़ता है। दुनिया खूबसूरत लगने लगती है। जोड़े एक बार इस दुनिया को जिंदगी में घुली खूबसूरती के साथ निहारते हैं। वह खूबसूरती की खुशी को सबमें बांटना चाहते हैं। वे अपनों से चहक—चहक के 'जिंदगी में पहली बार हुआ है' कहना चाहते हैं। पर कहां ये खाम ख्याली। उनकी आंखें सूख जाती हैंं। हृदय कहता है यहां अब और नहीं, कहीं और चलो। वे प्लान बनाते हैं। 

लौंडे के पास थोड़ा पैसा है, कुछ घर से दाएं—बाएं करता है। एक बाइक जुगाड़ता है और निकल पड़ते हैं दोनों कि जहां तक आसमां चले। पर बाइक और पेट से दिल का क्या। यह तो रोकड़े से चलता है और रोकड़े की नियती खत्म होने की है। सो खत्म हो जाता है और जोड़ा अपने घर लौट आता है। 

अब कहानी रोकड़ा खत्म होने के बाद की
जोड़ा शादी कर चुका है। लड़की ससुराल जाती है। मायके वालों को पता चल जाता है। बेटी को वह घसीट लाते हैं। थोड़े दिन सब चुप रहते हैं। फिर बेटी की शादी अपनी जाति में कहीं और कर दी जाती है। लड़की थोड़े दिन नए पति के साथ रहती है। फिर एक दिन वह लौटकर मायके आती है। देर रात में वह अकेले मायके से निकल पड़ती है। अपने प्रेमी के घर जाती है। लड़का मिलता है। वह अपने कमरे में होता है। शायद लड़की के इंतजार में। लड़की उसके कमरे में जाती है और थोड़ी देर बाद कमरे से धुआं उठता है। मोहल्ले को पता चलता है। लोग जुटते हैं। दरवाजा टूटता है। दो लाशें गिरती हैं।

आखिरी बयान
विक्षिप्त सा हो रहा लड़के का पिता कहता है, 'उस पानी में ही क्यों उतरना जिसको पार करना न आता हो।'

पहेली में जो सुलझाना है
आपको गुनहगार बताना है। ध्यान रहे जब आप गुनहगार चिन्हित कर लें तो यह पहेली आप औरों को सुनाएं और उनसे कहें वह किसी और को सुनाएं। बहुत जरूरी पहेली है सर। हल्के में मत लेना। हल्के में लेंगे तो फिर एक बार पुलिस इसे आत्महत्या का सीधा मामला और समाज 'जैसी करनी वैसी भरनी' की परिपाटी बताकर आपको चलता कर देगा।

May 31, 2016

इस धंधे में नौकरी मिलने का एक मात्र पैमाना संपर्क, जाति और जुगाड़ है...

कई सारे पत्रकार सोशल मीडिया पर बता रहे हैं कि आज पत्रकारिता दिवस है। लोग एक दूसरे को बधाइयां दे रहे हैं। मैं भी इस मौके पर कुछ कहना चाहता हूँ। मगर कहने से पहले एक सफाई । मैं वर्तमान के बारे अपने अनुभव शेयर करूँगा क्योंकि इतिहास का गर्व मैं कभी महसूस नहीं कर पाया...
● पत्रकारिता एक मात्र धंधा है जहाँ आप पत्रकारिता करने के आलावा जो भी करें उसके लिए प्रोत्साहित किये जाते हैं, आपको तवज्जो मिलती है..लाइजनिंग, सेटिंग, बारगेनिंग, क्रिमिनल एक्टिविटी ...दूसरे किसी धंधे में ऐसा नहीं होता। गौर करें यह सभी अंग्रेजी के शब्द हैं पर हिंदी पत्रकारिता इसे सर्वाधिक अपने व्यवहार में उतारती है, वरिष्ठ इसे परंपरा की तरह नए में रोपते हैं। 
●सभी धंधों की मांग होती है उच्च गुणवत्ता। पर इस धंधे में उच्च गुणवत्ता लाने वालों की नौकरी हमेशा बोरिया-बिस्तर समेटने की मुद्रा में होती है। कहा जाता है- नोटिस तुम्हें खुद झेलनी होगी, मानहानी के मामले में नौकरी जायेगी, तेज न बनो, पॉलिसी समझो, नौकरी जायेगी, नहीं चलेगी एक्टिविस्ट टाइप पत्रकारिता।

● उदाहरण के लिए आप स्टील के धंधे को लें। इसकी गुणवत्ता इंजिनियरिंग विभाग तय करता होगा क्योंकि वही इसके काबिल है। पर पत्रकारिता की गुणवत्ता का मापदंड संपादकीय विभाग को छोड़कर दूसरे सभी विभाग तय करते हैं। मोटा सच ये है कि संपादकीय सिर्फ अंगूठा लगाता है।

● यह एक मात्र धंधा है जहाँ प्रोडक्ट प्रोड्यूस यानि अख़बार निकालने वालों की सैलरी सभी अन्य विभागों मार्केटिंग, सेल्स, प्रोडक्शन, प्रिंटिंग, सर्कुलेशन से कम होती है।

● अगर कोई सर्वे हो और उन्हें दूसरे काम का विकल्प दिया जाय तो मीडिया हाउसों में काम करने वाले 80 फिसदी कर्मचारी-पत्रकार नौकरी छोड़ना पसंद करेंगे।

● जिस धंधे का बहुतायत किसी आनंद, संतुष्टि, महत्वाकांक्षा या फितरत के कारण काम नहीं कर रहा, बल्कि पेट, परिवार और ईएमआई की मज़बूरी में ख़ट रहा है उसकी गुणवत्ता की बात करना टाइम पास है।

● अख़बारों और टीवी चैनलों की सबसे बड़ी वर्कफोर्स स्ट्रिंगर हैं, किसी मीडिया हॉउस को राष्ट्रीय बनाने की वह धुरी हैं पर उनकी औसत सैलरी 500 रुपये प्रतिमाह भी नहीं है।

● अभिव्यक्ति के इस धंधे में जो सबसे कम अभिव्यक्ति करता है, सबकुछ सह लेता है, वह आसमान में उड़ता है और जो बोलता है वह इस पेज से उस पेज पर गरई पकड़ता है।

● जिनको लिखने नहीं आता वह संपादक बनते हैं और जो लिखना जानते हैं उनकी सबसे बड़ी उपयोगिता संपादकीय के 3 सौ शब्द लिखने में साबित होती है।

● इस धंधे में नौकरी मिलने का एक मात्र पैमाना संपर्क, जाति और जुगाड़ है। संघी-वामपंथी-समाजवादी होना अतिरिक्त योग्यता है। साक्षात्कार संस्थान के मानक को बनाये रखने का जरिया भर है जिससे कंपनी के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय वैल्यू में कमी न आये। यह ठीक वैसे ही है जैसे आप हर साल अपरेजल फार्म भरते हैं पर उससे पहले ही तय हो चुका होता है कि सबकी सालाना सैलरी कितनी बढ़नी है।

अब आप कह सकते हैं कि जब इतना कुछ नकारात्मक है तो आप क्यों हैं पत्रकारिता में, छोड़ क्यों नहीं देते। हो सकता है कुछ मित्र फोन करें कि नौकरी चली जायेगी भाई।

इसपर मेरा बस कहना है दोस्तों मैं पत्रकारिता को जीता हूँ, इसलिये लिख रहा हूँ। आप भी लिखिए। डंके की चोट पर 'हम कह कर लेंगे' तो सूरत बदलेगी।

बाजार सक्षम और विवेकवान लोगों को भी कम स्पेस नहीं देता। जरुरत है तो पत्रकारिता की काई को साफ़ करने की, क्योंकि हमने काई देखते - देखते पानी के अस्तित्व को ही भुला दिया है। ‪#‎hamtobolenge‬