Feb 28, 2011

धमाकों की नए सिरे से जांच हो



संजरपुर/ आज़मगढ़. आज़मगढ़ के निर्दोष मुस्लिम नौजवान ही नहीं सरकारी मशीनरी  के निशाने पर छत्तीसगढ़ के ग़रीब आदिवासी भी हैं। वहां पर 650गांवों जलाकर आदिवासियों को बेघर कर दिया गया। सैकड़ों की संख्या में लोग लापता हैं। मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाएं कहां हैं?नए हिन्दुस्तान की लड़ाई छत्तीसगढ़ के आदिवासियों और संजरपूर के निर्दोष नौजवानों को मिलकर लड़नी है।”ये बातें वरिष्ठ मानवाधिकार नेता हिमांशु कुमार ने संजरपूर में आयोजित विशाल राष्ट्रीय मानवाधिकार जनसम्मेलन में कही।

दिल्ली से आई मानवाधिकार नेता शबनम हाशमी ने जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद में विस्फोट करने वाले असीमानंद और सुनील जोशी का योगी आदित्यनाथ के साथ गहरा संबंध उजागर हुआ है,बावजूद इसके आजतक योगी को गिरफ्तार करना तो दूर पूछताछ तक भी नहीं की गई।


संजरपुर में मानवाधिकार : संबोधित करती शबनम हाशमी
पीयूसीएल के राष्ट्रीय सचिव चितरंजन सिंह ने कहा कि देश में हुए तमाम धमाकों की नए सिरे से जांच की जाए। उन्होंने संघ परिवार और उसकी फासिस्ट विचारधारा की न्यायपालिका तक में घुसपैठ पर चिंता जताते हुए न्यायपालिका में धर्मनिरपेक्ष मुल्यों की पुनर्बहाली की मांग की। लखनउ के वरिष्ठ वकील मो.शोएब ने भाजपा के बजाए कांग्रेस, सपा और बसपा को ज़्यादा खतरनाक बताते हुए कहा कि ये पार्टियां भाजपा की दूसरे नंबर की टीम हैं,जो सेकुलर चेहरे के साथ संघ परिवार के एजेन्डे को बढ़ा रही हैं।

मुंबई से आए मानवाधिकार नेता फिरोज़ मिठीबोलवाला ने भारत सरकार के अमेरिका और इजराईल के साथ बढ़ते नापाक रिश्ते को भारत में बढ़ती आतंकी घटनाओं और निर्दोष मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी की वजह बताया। वहीं अयोध्या से आए महंत युगल किशोर शरण शास्त्री ने कचहरियों पर हुए कथित हमलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि फैजाबाद कचहरी में हुआ विस्फोट भाजपा नेता विश्वनाथ सिंह और महेश पाण्डे की चौकियों पर हुए थे और वो दोनों हादसे के वक़्त गायब थे। उन्होंने कचहरी विस्फोटों में सुनवाही कर रहे न्यायाधिशों के साम्प्रदायिक रवैये का भी ज़िक्र किया।

आर.टी.आई.कार्यकर्ता अफ़रोज़ आलम साहिल जिन्होंने बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ में मारे गए युवकों के पोस्टमार्टम रिपोर्ट को निकलवाया था,ने सूचना के अधिकार कानून पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें भी साम्प्रदायिक कारणों से रिपोर्टों को लटकाया जाता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता हरमन्दिर पाण्डे ने किया। संचालन पीयूसीएल प्रदेश उपमंत्री मसीहुद्दीन संजरी ने किया।

कार्यक्रम में 12सूत्रीय प्रस्ताव भी पारित किया गया। कार्यक्रम में तारिक़ शफ़िक़,महासागर गौतम,बलवंत यादव, अब्दुल्लाह, आफताब अहमद, सालीम दाउदी, जितेन्द्र हरि पाण्डेय, सुनील, गुलाम अम्बिया, फहीम अहमद प्रधान, वसीउद्दीन, रवि शेखर, विजय प्रताप, शाहनवाज आलम, राजीव यादव, गुंजन, बबली, अंशुमाला आदि मौजूद रहे। इस सम्मेलन में शमीम अख्तर संजरी की पुस्तक ‘लहू-लहू’ और तीन पुस्तकों सहित डॉक्यूमेंट्री फिल्म भगवा युद्ध का विमोचन किया गया।








काली कमाई के सरगनाओं में अहमद पटेल और देशमुख भी



विदेशों में काला धन जमा करने वालों में बड़े उद्योगपति ही नहीं,कई शीर्ष नेता भी हैं। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अहमद पटेल उन नेताओं में शामिल हैं...



विदेशों में जमा काले धन को स्वदेश वापस लाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ रामलीला मैदान में आयोजित रैली में पूर्व आयकर आयुक्त विश्वबंधु गुप्ता ने कहा कि   ‘गृह मंत्री पी.चिदंबरम विदेशी बैंक में ‘दाऊद’ कंपनी के करीबी हसन अली द्वारा एक लाख करोड़ रुपए जमा कराने के मुद्दे पर कार्रवाई करने वाले थे। लेकिन वे इसलिए चुप हो गए क्योंकि उनकी पार्टी के दो लोगों के नाम काला धन जमा करने वालों की सूची में उजागर हो गए।’


भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान के मुखिया बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार की  पांच वजहें बतायीं.  पहला  90फीसदी बड़े नोट छापे जा रहे हैं, दूसरा  एक लाख से ज्यादा लोग अवैध खनन कर रहे हैं, तीसरा  विकास योजनाओं के धन में बड़े पैमाने पर हो रही है चोरी, चौथा  संवैधानिक पदों पर बैठे लोग रिश्वतखोरी को बढ़ावा दे रहे हैं और टैक्स की चोरी के लिए लोग विदेशों में धन जमा कर रहे हैं।

स्वामी दयानंद सरस्वती के जन्मदिवस और शहीद चंद्रशेखर आजाद के बलिदान दिवस के अवसर पर योग गुरू स्वामी रामदेव के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट द्वारा यह रैली आयोजित की गई थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाएंगे रामदेव रैली में बाबा रामदेव ने घोषणा की कि वह लोगों को योग सिखाने के अलावा देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने का भी अभियान चलाएंगे। उन्होंने कहा कि नेताओं को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए अनुलोम-विलोम जैसे योग सिखाना
होगा।


भ्रष्टाचार रोकने के पांच उपाय


कठोर कानून बनाया जाए व बड़े नोटों को वापस लिया जाए।
यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन संधि (2006 से लंबित) का अनुमोदन हो।मॉरिशस रूट को बंद किया जाए।
काला धन जमा करने वाले विदेशी बैंकों पर प्रतिबंध लगे।
फॉरेन एकाउंट पॉलिसी की तुरंत घोषणा की जाए।


रैली में समाज सुधारक अन्ना हजारे, वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी, राजनेतासुब्रमण्यम स्वामी, चिंतक गोविंदाचार्य, पूर्व आईपीएस किरन बेदी, आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल, ऑल इंडिया उलेमा काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना मकसूद हसन कासमी,स्वामी अग्निवेश जैसी हस्तियां उपस्थित थीं। वक्ताओं ने भ्रष्टाचार और कालेधन की समस्या के पांच कारण और इन्हें दूर करने के पांच सुझाव भी बताए।

रैली के बाद एक ज्ञापन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को सौंपा गया। इसमें भ्रष्टाचार से मुकाबले के लिए कठोर कानून बनाने की मांग की गई। ट्रस्ट के एक सदस्य के मुताबिक ज्ञापन में 30 लाख लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं।




मध्य-पूर्व एशियाई देशों में मचा कोहराम तथा भारत



लीबिया के गृहमंत्री ने गद्दाफी का साथ छोड़ दिया है। सेना का एक बड़ा भाग गद्दाफी के विरुद्ध हो चुका है। शासकीय असहयोग,व्यापक जनविद्रोह तथा सत्ता से चिपके रहने की गद्दाफी की जि़द ने लीबिया में गृहयुद्ध छिडऩे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं...


तनवीर जाफरी

मध्य-पूर्व एशिया के कई प्रमुख देश इस समय शासन व्यवस्था के परिर्वतन के लिए चल रहे जनआंदोलन के दौर से गुज़र रहे हैं। जागरूक हो चुकी आम जनता तानाशाहों, बादशाहों तथा सत्ता पर जबरन क़ाबिज़ हुक्मरानों को अब सिंहासन खाली करने की सलाह दे रही है। मिस्र और टयूनिशिया के हुक्मरानों ने जान बचाने की कीमत पर आखिरकार गद्दी छोड़ ही दी। दूसरी तरफ  लीबिया के विचित्र प्रवृति के तानाशाह कर्नल मोअ मार गद्दाफी ने अपनी अंतिम सांस तक सत्ता से चिपके रहने का संकल्प लिया है।

इस जनविरोधी आकांक्षा को अमल में लाने के लिए यदि लीबिया को बरबादी के मुहाने तक भी ले जाना पड़ा तो शायद उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। यही वजह है कि हुक्मरानी के आखिरी क्षण गिन रहे गद्दाफी ने अपने समर्थकों से यह अपील की है कि वे ''विद्रोहियों को कुचल डालें,काकरोच की तरह उन्हें मसल डालें,उनपर हमले किए जाएं तथा उनकी पहचान कर उन्हें घरों से बाहर निकाल उनका दमन किया जाए।''

 कल्पना कीजिए कि जिस तानाशाह के सिंहासन के नीचे की ज़मीन खिसक रही हो और ऐसे संकटकालीन समय में वह इस प्रकार के आक्रामक तेवर दिखा सकता है तो समझा जा सकता है कि सत्ता पर अपनी मज़बूत पकड़ रखते हुए गद्दाफी जैसा शासक अपने विरोधियों तथा आलोचकों का क्या हश्र करता रहा होगा। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसे तानाशाह शासक चंद दिनों पहले हुआ इराकी तानाशाह सद्दाम हुसैन का हश्र इतनी जल्दी भूल जाते हैं।

बहरहाल,गद्दाफी के इस आक्रामक आह्वान का लीबिया की जनता पर थोड़ा बहुत असर तो ज़रूर पड़ रहा है। वह गद्दाफी समर्थक सेना और पुलिस द्वारा बरती जा रही हिंसा का शिकार भी हो रही है। चूंकि अब गद्दाफी के ज़ुल्मो-सितम ने अपनी सभी हदें पार कर दी हैं लिहाज़ा धीरे-धीरे वह सभी लोग उसका साथ छोड़कर विद्रोहियों के पक्ष में खड़े हो रहे हैं जिनके समक्ष गद्दाफी बेनकाब हो चुके हैं।

लीबिया के गृहमंत्री ने गद्दाफी का साथ छोड़ दिया है। कई मंत्री साथ छोडऩे वाले हैं। सेना का एक बड़ा भाग गद्दाफी के विरुद्ध हो चुका है। आधा दर्जन से अधिक लीबियाई राजदूतों व तमाम राजनयिकों ने भी उसका साथ छोड़ दिया है। शासकीय असहयोग,व्यापक जनविद्रोह तथा सत्ता से चिपके रहने की गद्दाफी की जि़द ने लीबिया में गृहयुद्ध छिडऩे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि यदि गद्दाफी आसानी से गद्दी नहीं छोड़ते तथा गद्दी से चिपके रहने की अपनी जि़द पर अड़े रहते हैं तो देश में भारी नरसंहार भी हो सकता है। अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों की नज़रें लीबिया में हो रही उथल-पुथल पर लगी हुई हैं। मध्य-पूर्व एशियाई देशों में चल रही व्यवस्था परिवर्तन की इस बयार के चलते कच्चे तेल की कीमतों में भी भारी इज़ाफा होने की संभावना है।

व्यवस्था परिवर्तन किए जाने के पक्ष में फैला यह जनाक्रोश मुस्लिम बाहुल्य देशों तक ही सीमित है। विद्रोह की इस लहर को अलग-अलग नज़रिए से देखा जा रहा है। कहीं अल्पसंख्यक सुन्नी समुदाय के तानाशाह के विरुद्ध बहुसंख्यक शिया समुदाय विद्रोह पर आमादा हो गया है तो कहीं अमेरिकी पिट्ठू शासक के विरुद्ध जनता का गुस्सा फूट पड़ा है। कई देशों के लोग अपने निरंकुश, निष्क्रिय,भ्रष्ट तथा विकास की अनदेखी करने वाले तानाशाह से रुष्ट हैं तो कहीं राजशाही को ठेंगा दिखाकर जनता-जनार्दन प्रजातंत्र लागू करना चाह रही है।

 मध्य-पूर्व एशियाई देशों के जनता की अलग-अलग प्रकार की समस्याएं हैं। कई सदियों से यह धारणा बनी हुई थी या इस्लाम विरोधी ताकतों ने इस बात को आम धारणा का रूप दे डाला था कि इस्लाम धर्म के मानने वाले बादशाहत या तानाशाही को ही पसंद करते हैं। इस प्रकार का दुष्प्रचार करने वालों को भी मध्य-पूर्व एशियाई देशों में फैली इस ताज़ातरीन जनक्रांति की लहर ने माकूल जवाब दे दिया है। इस क्रांति ने साबित कर दिया है कि मुस्लिम समाज का मिज़ाज न केवल लोकतांत्रिक है, बल्कि अहिंसक भी है।

 इस भारी जनाक्रोश के बीच भारत जैसे विशाल देश के तमाम राजनीतिक विश्लेषक इस विषय पर चिंतन-मंथन करने लगे हैं कि क्या यहाँ भी उसी प्रकार के हालात पैदा हो सकते हैं? ये कयास लगाए जाने का कारण केवल यही है कि देश के आमजन आज़ादी के 64 वर्षों बाद भी भयंकर गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, घपलों व घोटालों के शिकार हैं।

माओवाद तथा नक्सलवाद जैसी समस्या बहुत तेज़ी से भारत में अपनी जड़ें गहरी करती जा रही है। इसका कारण भी बढ़ती गरीबी, भूख, बेरोज़गारी तथा शासन व्यवस्था का इन ज़मीनी हकीकतों की तरफ से मुंह मोड़े रखना है। देश की आम जनता भारतीय शासन व्यवस्था की उदासीनता तथा निष्क्रियता के चलते त्राहि-त्राहि कर रही है।

देश के कई हिस्सों में कर्जदार किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। गरीब आज भी भूख के चलते दम तोड़ देता है। देश में सर्वोच्च समझी जाने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी  की कहीं भ्रष्टाचारियों द्वारा गोली मारकर तो कहीं जिन्दा   जलाकर हत्या की जा रही है तो कहीं माओवादियों द्वारा उनका अपहरण किए जाने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर विपक्षी दल संसद की कार्रवाई को बाधित करते हैं। मंहगाई इस समय अपने चरम पर है। राजनेता जनता के मध्य अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं।

भारत में चारों ओर ऐसा वातावरण बनता जा रहा है कि आम लोगों का वर्तमान राजनैतिक दलों, राजनेताओं तथा  राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास ही उठ रहा  है। आम आदमी को यह कहते सुना जा सकता है कि इस देश में कानून और न्याय का डंडा केवल गरीबों पर ही चलता है,जबकि संपन्न लोग इन सबसे ऊपर या इनसे निपटने में सक्षम नज़र आते हैं।  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं इस आशय की स्वीकारोक्ति कर भी चुके हैं।

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी यह महसूस कर चुके हैं कि भारतीय जनमानस के चेहरों पर मुस्कुराहट नहीं, बल्कि मायूसी के भाव नज़र आते हैं। ऐसे में यदि कुछ विश्लेषक इस बात की चिंता ज़ाहिर करें कि कहीं मध्य-पूर्व एशियाई देशों अर्थात् मिस्र, टयूनिशिया, लीबिया, यमन जैसे हालात कहीं यहाँ भी पैदा न हो जाएँ तो इसमें बिलकुल भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए। नि:संदेह यहाँ की जनता के भीतर भी व्यवस्था को लेकर तथा अपने और अपने परिवार के भविष्य को लेकर उतना ही गुस्सा व चिंता व्याप्त है जितनी कि कई मध्य-पूर्व एशियाई देशों में देखी जा रही है। बावजूद इसके कि हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा एवं सफल लोकतांत्रिक देश माना जाता है।

भला हो हमारे संविधान निर्माताओं का जिन्होंने देश की राजनैतिक प्रणाली तथा भारतीय संविधान के साथ राजनैतिक व्यवस्था के समन्वय का ऐसा ताना-बाना रचा है जिसके परिणामस्वरूप राजनैतिक तौर पर पूरे देश की जनता एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों राजनैतिक दलों,विचारधाराओं, वर्गों, क्षेत्रों आदि में विभाजित हो गई है। भारतीय सेना के गठन का ढांचा भी कुछ ऐसा ही पेंचीदा  है कि हमारे शासक सेना के अनुशासन और इसके वर्गीकरण का पूरा लाभ उठाते हुए सेना की ओर से पूरी तरह बेफ़िक्र रहकर अपना राजपाट चला सकते हैं।

दूसरी तरफ लोकतंत्र की ज़मीनी हकीकतों पर पर्दा डालते हुए हमारे शासक दुनिया को बार-बार यह बता कर अपनी पीठ स्वयं भी थपथपाते रहते हैं कि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे आदर्श लोकतंत्र है। इन शासकों तथा वर्तमान शासन व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों को इस वास्तविकता की अनदेखी हरगिज़ नहीं करनी चाहिए कि मनुष्य सबकुछ एक सीमा तक सहन कर सकता है। भय, भूख, गरीबी तथा अपने बच्चों के भविष्य के प्रति अनिश्चितता का वातावरण जागरुक समाज अधिक दिनों तक सहन नहीं कर सकता।

यदि भारत के विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का भ्रम दुनिया में बनाए रखना है तो आम लोगों की आम ज़रूरतों तथा उनकी आम परेशानियों से यथाशीघ्र रूबरू होना तथा उनका समाधान करना ही होगा। अन्यथा परिवर्तन की यह बयार कब किस देश की व्यवस्था की चूलें हिला बैठे,कुछ नहीं कहा जा सकता।




लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafri1@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.



 
 
 
 

Feb 27, 2011

दर्द की सांद्रता गाढ़ी है



 अंजनी कुमार

कहते हैं समय की मार बड़ी होती है
इस समय तो सरकार की मार बड़ी भारी है
दोनों के मिलने से दर्द की सांद्रता गाढ़ी है
अपना होना ही अब भारी है।।

लोग जानते हैं सरकार को खूब
मार करती सरकार को इंकार बर्दास्त  नहीं है
वह रोज ही भेज रहा हैं निर्णय
रोज ही पहुंचा देता है डाकिया
हमारे हिस्से का परवाना
और हिदायतें
और उस घूरती आंख का खतरनाक इशारा
और, और भी बहुत कुछ
समय धरता रहता है गिरेबान जब तब
कई कई रात नींद आंख में उतरती नहीं है।।

यह अपने समय की सरकार है
और यह सरकार का समय है
इतिहास की सूरत में यह एक दौर है
जहां हां पर चमकता हुआ सिर है
और ना पर उधड़ी हुई लावारिस लाश  है
जहां रोजमर्रा जिंदगी
बूट की नोक पर उछलते हुए चल रही है
जम्हूरियत जन की पीठ पर लदी हुई है
और राज चंद लोगों की जगीर है
इस निश्कर्श पर जन की हामी है
जनतंत्र कभी हंसी है, कभी गाली है।।

सच है कि सच की चमक से चिलकती है आंख
सवाल की नोक से उमड़ता है दर्द का लावा
जैसे अड़ियल दरख्त के खोखड़ में सुलग रहा हो आग
ऐसे ही सुलग रही है जमाने की छाती
सच है कि यह गुलामी का दौर नहीं है
जमाना बदला है बहुत कुछ
उसकी सलवटें अभी बाकी हैं
जम्हूरियत शब्द अभी बाकी है
पाठ कुपाठ, अर्थ अनर्थ जारी है
कुछ कहते हैं कि अब बंदूक की बारी है।।




राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार .फिलहाल मजदूर आन्दोलन पर कुछ जरुरी लेखन में व्यस्त.उनसे abc.anjani@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.








Feb 25, 2011

लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे



जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। 25 फरवरी को दिन के 12 बजे पटना के मगध अस्पताल में उनका निधन हुआ। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से पटना आ रहे थे, ट्रेन में ही उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया। तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए अखिरकार आज उन्होंने अन्तिम सांस ली। उनका अन्तिम संस्कार पटना में ही होगा।


 उनके निधन की खबर से पटना, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद आदि सहित जमाम जगहों में लेखको, संस्कृतिकर्मियों के बीच दुख की लहर फैल गई। जन संस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। उनके निधन को जन सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।

ज्ञात हो कि अनिल सिन्हा एक जुझारू व प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 11 जनवरी 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में हुआ। उन्होंने पटना विश्वविद्दालय से 1962 में एम. ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। विश्वविद्दालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने अपना पी एच डी बीच में ही छोड़ दिया। उन्होंने कई तरह के काम किये।

 प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विशयों पर शोध जैसे कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यवर्त,आज,ज्योत्स्ना, जन,दिनमान से वे जुड़े रहे। 1980में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ उन्होंने इस अखबार में काम किया। अमृत प्रभात लखनऊ में बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण,रीवाँ के भी वे स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने वह अखबार छोड़ दिया।

अनिल सिन्हा बेहतर,मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष  में अटूट विश्वास रखने वाले रचनाकार रहे हैं। वे मानते रहे हैं कि एक रचनाकार का काम हमेषा एक बेहतर समाज का निर्माण करना है,उसके लिए संघर्श करना है। उनका लेखन इस ध्येय को समर्पित है।

 वे जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। वे उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। वे जन संस्कृति मंच उत्तर  प्रदेश के पहले सचिव थे। वे क्रान्तिकारी वामपंथ की धारा तथा भाकपा माले  से भी जुड़े थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जैसे क्रान्तिकारी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। इस राजनीति जुड़ाव ने उनकी वैचारिकी का निर्माण किया था।
कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नम से उनका कहानी संग्रह पिछले दिनों 2005 में भावना प्रकाषन से आया। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता इतिहास,स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित  हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनुदित पुस्तक ‘सामा्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मुलन’छपकर आया थ। उनकी सैकड़ों रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है।


उनका रचना संसार बहुत बड़ा है,उससे भी बड़ी है उनको चाहने वालों की दुनिया। मृत्यु के अन्तिम दिनों तक वे अत्यन्त सक्रिय थे तथा 27फरवरी को लखनऊ में आयोजित,नागार्जुन व केदार जन्तषती आयोजन के वे मुख्य कर्मा.णर्ता थे।

उनके निधन पर शोक  प्रकट करने वालों में मैनेजर पाण्डेय, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, प्रणय कृष्ण, रामजी राय, अशोक भैमिक, अजय सिंह, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेन्द्र कुमार, भगवान स्वरूप कटियार, राजेश कुमार, कौशल किशोर, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, चन्द्रेश्वर, वीरेन्द्र यादव, दयाशंकर राय, वंदना मिश्र, राणा प्रताप, समकालीन लोकयुद्ध के संपादक बृजबिहारी पाण्डेय आदि रचनाकार प्रमुख हैं।

अपनी संवेदना प्रकट करते हुए जारी वक्तव्य में रचनाकारों ने कहा कि अनिल सिन्हा आत्मप्रचार से दूर ऐसे रचनाकार रहे हैं जो संघर्ष में यकीन करते थे। इनकी आलोचना में सृर्जनात्मकता और शालीनता दिखती है। ऐसे रचनाकार आज विरले मिलेंगे जिनमे इतनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सृर्जनात्मकता हो। इनके निधन से लेखन और विचार की दुनिया ने एक अपना सच्चा व ईमानदार साथी खो दिया है।


Feb 24, 2011

विदेशों में जमा काला धन बनाम राजनीतिक हथकंडे


विदेशों में जमा काले धन के मुद्दे को लेकर भारत में मची हाय-तौबा की आड़ में तमाम नेता,राजनीतिक दल तथा राजनीति में पदार्पण करने की इच्छा पालने वाले कई नए चेहरे इस विषय पर कुछ ज्यादा ही दलीलें पेश कर रहे हैं...

 तनवीर जाफरी

भारतीय अर्थव्यवस्था,यहां व्याप्त गरीबी एवं  बेरोज़गारी,कायदे-कानून तथा अपनी ज़रूरत के लिए विदेशी बैंकों से समय-समय पर कर्ज लेते रहने जैसे हालात नि:संदेह किसी भी भारतीय को इस बात की इजाज़त नहीं देते कि वह अपने धन को देश के बजाए विदेशी बैंकों में जाकर जमा करे। वह भी केवल इसलिए कि उसने नाजायज़ और गलत तरीके से धन इकट्ठा  किया है। ऐसे लोग उस धन को दुनिया की नज़रों से सिर्फ इसलिए छुपाकर रखना चाहते हैं कि एक तो उनका धन सुरक्षित रह सके दूसरा,वह भारतीय वित्तीय कानूनों से बचे रह सकें और तीसरा,वह स्वयं को बदनामी से बचा सके।

पश्चिमी देशों के काला धन जमा करने वाले इन बैंकों में गोपनीयता बरकरार रखने के इतने ऊंचे पैमाने निर्धारित किए गए हैं कि अभी तक स्पष्ट रूप से किसी भी खातेदार का नाम और उसकी कुल जमाराशि का खुलासा नहीं हो पाया है। कल को विकीलीक्स जैसी वेबसाईट  या  खोजी पत्रकारिता के चलते कुछ नाम उजागर हो जाए तो यह अलग बात है। ऐसे बैंक 'काला धन'शब्द को भी अपने तरीके से परिभाषित करते हैं। भारत में पिछले कुछ महीनों से विदेशी बैंकों में जमा काले धन का मुद्दा बहुत गरमाया हुआ है। इससे ऐसा लगता है गोया इस विषय पर शोरगुल और हंगामा बरपाने  वालों को इस बात का पता चल चुका हो कि किस व्यक्ति का कितना धन किस देश के किस बैंक में जमा है।


इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत के आर्थिक हालात ऐसे नहीं हैं कि इस प्रकार के नकारात्मक आर्थिक वातावरण का सामना किया जा सके। इस विषय पर पूरी गंभीरता से काम किया जाना चाहिए तथा विदेशों में जमा काला धन यथाशीघ्र देश में वापस लाने के प्रयास करने चाहिए। इतना ही नहीं, ऐसे गैरकानूनी कामों में लिप्त लोगों को चाहे वह कितनी ही ऊंची हैसियत रखने वाले क्यों न हों उन्हें कानून के अनुसार सख्त सज़ा भी दी जानी चाहिए।

इनके नाम यथाशीघ्र उजागर किए जाने चाहिए, ताकि आम जनता यह समझ सके कि नेता, अभिनेता, अधिकारी, समाजसेवी या धर्मगुरु अथवा व्यापारी का लबादा ओढ़े हुए ये लोग वास्तव में वैसे नहीं है जैसे दिखाई देते हैं। साधु के भेष में छपे ये शैतान देश के  सबसे बड़े दुश्मन हैं। अवैध धन की जमाखोरी करने वाले यही वे लोग हैं जिनके कारण भारत को गरीब देश कहा जाने लगा है।

विदेशों में जमा काले धन के मुद्दे को लेकर भारत में मची हाय-तौबा की आड़ में तमाम नेता, राजनीतिक दल तथा राजनीति में पदार्पण करने की इच्छा पालने वाले कई नए चेहरे इस विषय पर कुछ ज्यादा ही दलीलें पेश कर रहे हैं। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने की कोशिशें हो रही हैं। इससे विदेशों से  काला धन वापस लाने जैसा गंभीर मुद्दा मुख्य विषय से भटकता हुआ दिखाई देने लगा है। साफ ज़ाहिर होने लगा है कि इस मुद्दे को लेकर किए जाने वाले शोर-शराबे का मकसद विदेशों से काले धन की वापसी कम,राजनीतिक रूप से व्यक्ति विशेष या दल विशेष को बदनाम करना अधिक है।

अफवाह फ़ैलाने वाले लोग भलीभांति जानते हैं कि साधारण जनता अफवाहों पर जल्दी विश्वास कर लेती है। वर्ष 1986-1987 के मध्य का वह दौर राजनीतिज्ञों के लिए एक उदाहरण बन चुका है, जब स्वीडन की बोफोर्स तोप सौदे में कथित रूप से ली गई दलाली के मुद्दे पर केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार की चूलें हिल गई थीं। आरोप जडऩे तथा दूसरों को बदनाम करने में महारत रखने वाले तत्कालीन महारथियों ने राजीव गांधी, अमिताभ बच्चन, अजिताभ बच्चन सहित कई लोगों को अपने अनर्गल आरोपों के घेरे में ले लिया था। परिणामस्वरूप कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। भारत में गठबंधन सरकार का दौर उसी दुर्भाग्यशाली समय से ही शुरू हुआ।

लग रहा है कि आगामी संसदीय चुनावों से पूर्व एक बार फिर परोपेगंडा महारथियों द्वारा देश में वैसे ही हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है। मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी बार-बार न केवल केंद्र पर यह आरोप लगा रही है कि वह काला धन मुद्दे पर कोई कार्रवाई नहीं करना चाह रही है, बल्कि इस विषय में छानबीन के लिए उसने एक टॉस्क फोर्स का गठन भी किया है।


भाजपा की इस टॉस्क फोर्स ने दावा किया था कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी तथा कांग्रेस अध्यक्ष तथा यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गाँधी स्वयं विदेशों में काला धन जमा करने जैसे गंभीर और गैरकानूनी मामलों में लिप्त हैं। उनके कई विदेशी बैंकों में खाते हैं। यह टॉस्क फोर्स इस बात का पता करने का काम कर रही है कि किन-किन लोगों का किन-किन देशों के किन-किन बैंकों में कितना-कितना धन जमा है।

इस सिलसिले में अपना तथा स्व. राजीव गांधी का नाम लिए जाने पर सोनिया गाँधी ने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को पत्र लिखा तथा अपने और अपने परिवार के ऊपर भाजपाईयों द्वारा लगाए जाने वाले इन आरोपों पर कड़ी आपत्ति जताई। सोनिया ने आडवाणी को लिखे पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा कि किसी भी विदेशी बैंक में उनका कोई खाता नहीं है। सोनिया के पत्र के जवाब में आडवाणी ने भी शिष्टाचार का परिचय देते हुए उन्हें जवाबी पत्र लिखकर इस बात के लिए खेद जताया कि ''इस मामले में आपके परिवार का जि़क्र किया गया, इसके लिए मुझे खेद है। गांधी परिवार की ओर से इस तरह की सफाई पहले दी गई होती तो अच्छा रहता।''

आडवाणी का सोनिया गांधी से माफी मांगना या भाजपा द्वारा उनके  विरुद्ध किए गए दुष्प्रचार के लिए खेद जताना तो निश्चित रूप से एक शिष्ट राजनीति का एक हिस्सा माना जा सकता है। शीर्ष नेताओं के बीच इस प्रकार की वार्ताओं, पत्रों और टेलीफोन पर होने वाली वार्ताओं की बातें कभी-कभी प्रकाश में आती रहती हैं। मगर बिना किसी ठोस प्रमाण, आधार या सूचना के इस प्रकार सोनिया गांधी, स्व. राजीव गांधी या किसी भी अन्य व्यक्ति को दुष्प्रचारित करना कहां की नैतिकता है। इसे किस प्रकार की राजनीति कहा जाना चहिए?



लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafri1@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.




Feb 23, 2011

डीएम के आदेश पर दीवार रंगती पुलिस



करोड़ों  रूपये खर्च कर सरकार  देश के नागरिकों को जागरूक करती है, लेकिन  उसी जागरूकता की जिम्मेदारी मुफ्त में निभाने की कोशिश की तो एक युवा  मुजरिम बन गया...


एक हैं राम प्रकाश। उन्हें गांव वाले सामाजिक रूप से एक जागरूक युवा मानते हैं। ऐसा इसलिए है कि राम प्रकाश अपने गांव और समाज की जरूरतों की फिक्र करते हैं। उसी फिक्र में राम प्रकाश ने अपने साथियों संग मिलकर गांव की समस्याओं को दीवारों पर लिख डाला जिससे कभी अधिकारी -मंत्री आयें तो उनकी सामने गांव की तस्वीर साफ रहे।

लेकिन जागरूकता की जिम्मेदारी निभाना उत्तर प्रदेश सरकार हरदोई जिले के जिलाधिकारी एके सिंह की निगाह में जुर्म है । जिलाधिकारी महोदय के इशारे पर जिले के पुलिस वाले रामप्रकाश की गिरफ्तारी और कुटाई के लिए लगातार संभावित जगहों पर दबीश दे रहे हैं।

राम प्रकाश के नेतृत्व में हुआ दीवार लेखन उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के जिलाधिकारी एके सिंह के लिए निगाह में जुर्म इसलिए दिखा क्योंकि इसके रहते जिलाधिकारी जनता के अपराधी माने जाते।

दरअसल जिस गांव में जनससमयाओं को लेकर दीवार लेखन किया गया था उस गांव में अगले कुछ दिनों में प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती दौरे पर आनेवाली थीं। उससे पहले इलाके में जिलाधिकारी एके सिंह के मनमाफिक सब हो रहा है या नहीं उसे 22 फरवरी को देखने क्षेत्र में दौरे पर आये। उसमें एक गांव लाला मऊ मवई भी था। वहां पहुंच कर डीएम साहब  की निगाहें उन नारों पर पड़ी जो गांव में जारी अव्यवस्था और मांगों पर सुनवाई न होने को लेकर थीं।


इसमें मुख्य मांग प्राथमिक विद्यालय की अपूर्ण दीवार को पूरा करने की थी। इसके अलावा एक स्वास्थ्य उप-केन्द्र के स्वीकृत की भी चर्चा थी जिसे ईंट भट्ठा मालिक अमित सिंह गांव जखसरा में बनवाना चाहते हैं जबकि गांव वाले लाला मऊ बनवाना चाहते हैं। तीसरी मांग के तौर पर पास में बहने वाली नहर के पानी को गांव में लाने के लिए नहर पर एक झाल बनवाने की बात दीवारों पर लिखी गयी थी।

इन मांगों को लिखा देख जिलाधिकारी काफी नाराज हुए। अपनी नाराजगी की अभिव्यक्ति उन्होंने पुलिस को राम प्रकाश को गिरफ्तार करने के आदेश के रूप में की। अब पुलिस राम प्रकाष को खोज रही है और राम प्रकाष भागे-भागे फिर रहें हैं। 23 फरवरी की शाम तक पुलिस राम प्रकाश  के घर पर थी और दीवारों  को लिखी मांगों को मिटा रही थी।

समाज के अंतिम आदमी की मजबूती की बात करने वाली मायावती सरकार में ऐसा गैरलोकतांत्रिक व्यवहार ना जाहिर करता है कि प्रषासन लोगों मांगों को ताकत के बल पर दबाना चाहता है। हालत यह है कि जिलाधिकारी महोदय को बचाने के लिए पुलिस गांव वालों को आतंकित कर रही है।

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय से जुड़े और मैग्ससे पुरस्कार विजेता संदीप पाण्डेय कहते हैं कि    यदि जिला प्रशासन   ने लोगों की मांगों पर पहले ध्यान दिया होता तथा उनको सुलझाने की कोशिश की होती तो आज यह नौबत न आती कि लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन करने के लिए पुलिस का सहारा लेना पड़ता।




Feb 22, 2011

एक बदचलन की मौत !

एक आटो आकर रुका। उसमें से दो औरतें उतरीं। आगे वाली औरत उतरते ही छाती पीटते हुए गला फाड़ रोने लगी। आवाज लोगों के घरों तक पहुंची तो सभी घरों की बालकनी बच्चों और महिलाओं से भर गयी...

अजय प्रकाश

परसों की बात है। दिन के करीब दस बज रहे थे। दुबारा लौट आयी ठंड के बाद मेरी हिम्मत ठंडे पानी से नहाने की नहीं हुई तो सोचा क्यों न धूप में खड़े होकर थोड़ा गरम हो लिया जाये। धूप की गरमी से अगर हिम्मत बंध गयी तो नहा लूंगा,नहीं तो कंपनियों ने महकने का इंतजाम तो कर ही रखा है। यह सोचकर मैं बालकनी से लगकर सड़क की हरियाली देखने लगा।

तभी एक आटो आकर रुका। उसमें से दो औरतें उतरीं। आगे वाली औरत उतरते ही छाती पीटते हुए गला फाड़ रोने लगी। आवाज लोगों के घरों तक पहुंची तो सेकेंडो में सभी घरों की बालकनी बच्चों और महिलाओं से भर गयी। काम पर नहीं गये कुछ मेरे जैसे मर्द भी झांकने लगे। जिनके कमरे नीचे के फ्लोर में थे वो रोने वाली के आसपास मंडराने लगे। मेरी मां से नहीं रहा गया तो वह नीचे मौका-मुआयना करने के लिए चल दी। मां के नीचे जाते देख बीबी ने पूछा, कहां जा रही हैं?

मां जवाब दिये बगैर चलते बनी तो सामने से पड़ोसी की बीबी ने कहा,‘देहात से आयी हैं,इसलिए वो तो जाये बिना नहीं मानेंगी। मेरी सास भी ऐसी ही हैं।’इस बीच दहाड़ मारती औरत आटो से आगे बढ़ते हुए अपने कमरे की ओर चिल्लाते हुए चल पड़ी,‘अरे हमार बछिया कौन गति भईल तोहार (ओह,मेरी बेटी तेरा क्या हाल हुआ)।'

मेरी बीबी ने उसकी आवाज सुन मुझसे कहा जरा सुनना तो क्या कह रही है भोजपुरी में। मैं अभी कुछ कहता उससे पहले ही कोने वाली मकान मालकिन अपनी बालकनी से बोल पड़ी, ‘बिहार की हैं- छपरा की।’ फिर मैंने कहा, ‘उसकी बेटी को कुछ हुआ है।’

अब उस औरत के रोने-घिघियाने की आवाज शब्दों में बदल चुकी थी। सड़क से ग्राउंड फ्लोर और ग्राउंड फ्लोर से फर्स्ट  फ्लोर होते हुए हमतक बड़ी जानकारी ये आयी कि रोने वाली औरत की बेटी की लाश चार दिन से किसी सरकारी हॉस्पीटल में पड़ी है। बड़ी जानकारी मिलते ही क्यों...क्यों...क्यों, की आवाज तमाम बालकनियों और फ्लोरों पर गूंजने लगी।

अबकी बड़ी जानकारी का विस्तार आया। वह इस प्रकार से कि रोने वाली औरत की मरने के बाद सड़ रही बेटी चार बच्चों की मां है और वह गली की चौथी मकान में बाएं  तरफ किराये पर रहती है। इसी मकान में रहते हुए एक सप्ताह पहले बीमार हुई तो किसी ने ले जाकर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया था और मरने के बाद वहीं पड़ी है।

इसके बाद यह सवाल उठा कि क्या वह औरत अकेले ही अस्पताल गयी थी। इस सवाल पर जवाब मिला,‘नहीं। बीमारी की हालत में औरत ने किसी को फोन कर बुलाया था और वही उसे अस्पताल ले गया था। मगर ईलाज के दौरान औरत मर गयी तो वह छोड़कर भाग गया। तबसे लाश अस्पताल में ही पड़ी है।

मृत औरत का कोई खोज-खबर रखने वाला नहीं आया तो अगले दिन अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने खोजबीन में औरत के पास से मिले कागज पर लिखे मोबाइल नंबर को मिलाया। पता चला मोबाइल नंबर मृत महिला के पति का है और वह बिहार के छपरा जिला के किसी ब्लॉक का रहने वाला है।


अब बालकनी पर खड़े मुझ जैसे दुखितों का इंट्रेस्ट सस्पेंस में था कि चार बच्चों की मां,ऊपर से बीमार और चार दिन से अस्पताल में पड़ी सड़ रही और पति यहां से हजार-बारह सौ किलोमीटर दूर पड़ा। आखिर माजरा क्या है? तो अब माजरे की पुख्ता जानकारी कुछ इस प्रकार से पसरी- दरअसल जो आदमी उसे अस्पताल में भरती कराने ले गया था वह उसका तीसरा और अंतिम पति था। इससे पहले वह करीब तीन साल एक पंजाबी के साथ रही थी,जबकि शादी उसकी छपरा वाले से हुई थी जो अब उसके मरने के बाद उसकी मां को लेकर दिल्ली आया था।


यह विशेष जानकारी नीचे वाली चाची ने दिया। बकौल चाची- थोड़े दिन पहले एक पंजाबी बैग लेकर आया था और उनसे कह रहा था कि वह अपना बच्चा लेने आया है। उसने चाची को यह भी बताया कि चैथे नंबर का बच्चा उसी का है और सिर्फ वह उसी को ले जाने आया है। पंजाबी से ही चाची को पता चला था कि चार बच्चों की मां बीमार है और अस्पताल में भर्ती है।

तभी किसी महिला ने चाची से पूछ लिया,‘यानी उसे जो अस्पताल ले गया था वह न पंजाबी था न बिहारी। फिर वह कौन था।’इसका जवाब एक दूसरी महिला ने दिया जिसके होंठ खूनी आत्माओं की तरह टहटह लाल हो रहे थे, - अरे वह एक मुसलमान था जिसके साथ वह पिछले कुछ महीनों से रह रही थी।

इसके बाद बालकनी दुखितों ने हां-हूं करते हुए उस औरत के अस्पताल में सड़ने को भगवान का जायज फैसला माना और औरत की मौत को एक बदचलन की मौत करार दिया। हालांकि उसे जानने वाली एक औरत ने ऐसा कहने पर ऐतराज जताया। कहा भी अगर वह दूसरी-तीसरी शादी नहीं करती तो उसके चार बच्चों की लाश यहां भूख से पड़ी रहती। वह तो मुसलमान ही था जो इन बच्चों का पेट पाल रहा था। इससे पहले पंजाबी से भी इसीलिए शादी की क्योंकि बिहारी कुछ करता ही नहीं था, सिवाय बच्चा पैदा करने के।

बहस थोड़ी और आगे बढ़ी तो पता चला बिहारी पहले किसी रबर की फैक्ट्री में काम करता था मगर काम छूट जाने के बाद पिछले तीन वर्षों से उसे काम ही नहीं मिला। सड़ रही लाश के पक्ष में बोलने वाली महिला ने आगे कहा,‘किसी की जवानी नहीं फटती है कि वह बेवजह इस गोद से उस गोद में कूदे। बच्चों का मुंह देख लोग पता नहीं क्या-क्या करते हैं।’

तभी किसी ने फिक्र बिखेरी,‘बेचारे बच्चों को कौन देखेगा।’बच्चों की बात आयी तो पता चला दो बेटियां और दो बेटे हैं। सबसे बड़ी बेटी करीब 12साल की है और बाकी सभी बच्चे उससे छोटे हैं। सामने वाले की बीबी ने नीचे परचून की दूकान के पास इशारा कर दिखाया,‘वह  बैठी है उसकी बड़ी बेटी। बाकी तीनों भाई-बहनों को चाय मट्ठी खिला रही है।’इस दृश्य को महत्वपूर्ण मान सभी ने बालकनी से सिर झुका-झुका कर चाय-मट्ठी का लाइव देखा।

अब बारी लाश को फूंके जाने के बहस को लेकर थी। सड़ रही लाश की मां ने बेटी को एक बार देखने की इच्छा जाहिर की और कहा उसे घर लाया जाये। इस पर सभी बिपर पड़े। तमाशबीनों ने करीब आदेशात्मक ढंग से कहा, ‘सड़ी हुई लाश मुहल्ले में क्यों लानी है, पहले से क्या बिमारियां कम हैं।’ कुछ ने कहा, उस बदचलन ने ऐसा कौन सा महान काम किया है कि अंतिम दर्शन को लाया जाये। आखिरकार तय हुआ कि लाश को अस्पताल से सीधे ‘मशान ले जाया जायेगा।

इस प्रस्ताव पर अस्पताल जाने को लिए दो-चार लोग तैयार हो गये। तैयार होने वालों में मानद पति के क्षेत्र और जाति के लोग थे। इसके अलावा जो लोग मौके पर पहले से खड़े थे, उन्होनें नौकरी या अन्य जरूरी कामों का वास्ता देकर जा पाने में असमर्थथा जाहिर की। हालांकि चलन में ऐसा नहीं है। गाड़ी का इंतजाम हो जाने पर अंतिम संस्कार में जाने वालों से गाड़ी आमतौर पर भर जाती है।

खैर!अब हमारे बीच से सड़ी लाश को राख हुए दो दिन बीत चुके हैं और राख का मानद पति ‘छपरा वाला’,राख का कर्मकांड करने गांव जा चुका है। इस बीच मुहल्लेवालों ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हुए मानद पति को ‘रखवाला’ का तमगा दे, राख के बाकी दो पतियों को मजावादी करार दे दिया है। मानद के जाते-जाते एक औचक सवाल मुहल्ले वालों ने उसके लिए जरूर छोड़ा था, ‘मानद, क्या कभी चारों बच्चों में से किसी एक पर भी अपनी औलाद होने का फक्र कर सकेगा।’

और इसी सवाल के साथ कहानी का इंड हो गया था। लोग बालकनी से इस सकून के साथ वापस लौटे थे कि एक बदचलन औरत के मरने, सड़ने और अंततः राख होने में मुहल्ला भागीदार नहीं हुआ और सभ्य बना रहा।