Feb 27, 2011

दर्द की सांद्रता गाढ़ी है



 अंजनी कुमार

कहते हैं समय की मार बड़ी होती है
इस समय तो सरकार की मार बड़ी भारी है
दोनों के मिलने से दर्द की सांद्रता गाढ़ी है
अपना होना ही अब भारी है।।

लोग जानते हैं सरकार को खूब
मार करती सरकार को इंकार बर्दास्त  नहीं है
वह रोज ही भेज रहा हैं निर्णय
रोज ही पहुंचा देता है डाकिया
हमारे हिस्से का परवाना
और हिदायतें
और उस घूरती आंख का खतरनाक इशारा
और, और भी बहुत कुछ
समय धरता रहता है गिरेबान जब तब
कई कई रात नींद आंख में उतरती नहीं है।।

यह अपने समय की सरकार है
और यह सरकार का समय है
इतिहास की सूरत में यह एक दौर है
जहां हां पर चमकता हुआ सिर है
और ना पर उधड़ी हुई लावारिस लाश  है
जहां रोजमर्रा जिंदगी
बूट की नोक पर उछलते हुए चल रही है
जम्हूरियत जन की पीठ पर लदी हुई है
और राज चंद लोगों की जगीर है
इस निश्कर्श पर जन की हामी है
जनतंत्र कभी हंसी है, कभी गाली है।।

सच है कि सच की चमक से चिलकती है आंख
सवाल की नोक से उमड़ता है दर्द का लावा
जैसे अड़ियल दरख्त के खोखड़ में सुलग रहा हो आग
ऐसे ही सुलग रही है जमाने की छाती
सच है कि यह गुलामी का दौर नहीं है
जमाना बदला है बहुत कुछ
उसकी सलवटें अभी बाकी हैं
जम्हूरियत शब्द अभी बाकी है
पाठ कुपाठ, अर्थ अनर्थ जारी है
कुछ कहते हैं कि अब बंदूक की बारी है।।




राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार .फिलहाल मजदूर आन्दोलन पर कुछ जरुरी लेखन में व्यस्त.उनसे abc.anjani@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.








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