May 7, 2010

आखिर चिदंबरम का क्या दोष

अजय प्रकाश

कुछ नेताओं, सुरक्षा विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों को छोड़ दें तो सरकार क्या यह नैतिक साहस कभी कर पायेगी कि मारे गये सुरक्षाबलों की जिम्मेदारी चिंदबरम पर सुनिश्चित करे ?

दंतेवाड़ा के चिंतलनार में मारे गये 76सुरक्षाबलों की जांच के लिए गृह मंत्रालय ने ईएन राममोहन कमेटी गठित की थी। बीएसएफ के पूर्व डीजी राममोहन के नेतृत्व में गठित यह कमेटी अप्रैल के अंतिम सप्ताह में सरकार को रिपोर्ट सौंप चुकी है। लेकिन जो जानकारियां आ चुकी थीं उससे अधिक के तथ्य कमेटी मुहैया नहीं करा सकी। लेकिन गृहमंत्रालय को कुछ तो करना है। सो मंत्रालय निचले स्तर के कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों पर कार्यवाही कर साल-दो साल में चिदंबरम के नेतृत्व में माओवादियों के सफाये का फिर एक बार दंभ भरेगा।

पी चिदंबरम :  काम से सीइओ और पद से गृहमंत्री 

इसके लिए माहौल भी बनना शुरू  हो गया है। जैसे सीआरपीएफ कर्मियों की जीवन स्थिति बदहाल है, रहने-खाने की उचित व्यवस्था नहीं है, जबकि अधिकारी मौज मारते हैं। साथ ही चिदंबरम छत्तीसगढ़ पुलिस के उच्चाधिकारियों पर एक के बाद एक तीखी टिप्पणियां लगातार कर रहे हैं, जो यूं ही नहीं हैं। हालांकि चिदंबरम के इन सवालों से हमारा कोई इनकार नहीं है। लेकिन इतने बड़े घटनाक्रम के बाद क्या सीधे नीति पर बात नहीं होनी चाहिए थी? उसी नीति पर जिसके परिणाम के तौर पर हम सुरक्षाबलों की मौत और आदिवासियों की तबाही से रोज दो-चार हो रहे हैं। साथ ही माओवादियों और उनके समर्थकों की गिरफ्तारियों और हत्याओं का भी सवाल है.  

तो  क्या चिदंबरम को इस बात का थोडा भी अहसास है कि मध्य भारत के इस हिस्से को वह अपनी साम्राज्यवादी  चाहत  और चन्द व्यावसायिक घरानों के  लिए कहाँ पहुँचाने जा रहे हैं.  हत्याओं के भरोसे  जंगलों में स्वराज लाने की चाहत से ओतप्रोत चिदंबरमवाद अगर जंगलों के भीतर सैन्य छावनी बना ले तो  संघर्ष रूक जायेगा ? अगर इस खामखयाली से गृहमंत्री नहीं उबर पाए हैं तो यह देश के लिए सदमा ही होगा. 
  
यह लड़ाई आदिवासिओं की है, वहां के वाशिंदों की है. कल को वहां माओवादी नहीं होंगे कोई और होगा. लेकिन लोग कभी नहीं स्वीकारेंगे कि विकास के बहाने तबाही की बुनियाद पर  दुनिया का कोई भी सत्ताधारी  उनका इस्तेमाल करे.न ही  अपने अंतिम समय तक वह यह स्वीकार कर पाएंगे कि सरकार सुरक्षा के नाम पर उन्हें अपने गावों-घरों से उजाड़कर कैम्पों में बसाये.अगर सरकार का रवैया यही  रहा तो, हो सकता है कि आदिवासी लड़ाके दो कदम पीछे हटें और मज़बूरन उन्हें जंगलों में भागना पड़े. मगर उसके बाद सैन्य छावनियों और वहां के वाशिंदों के  बीच जो युद्ध शुरू होगा वह भारतीय संघीय प्रणाली की चूलें हिला देगा.जिसका हल सरकार को फिर एक बार  बंदूकों में ही नज़र आएगा.

ऐसे में  प्रश्न है कि इन सवालों पर अभी खुलकर बात क्यों नहीं हो रही है, जबकि सुरक्षाबलों के घरों में मातम का माहौल  बिलकुल ताज़ा है. बात सुरक्षाबलों की बदहाली पर हो रही है। सेना,पुलिस और सुरक्षाबलों में भर्ष्टाचार का मामला न तो नायाब  है और न ही नया. नया है तो इतनी बड़ी संख्या में एक साथ मारे गए सुरक्षाबल. हालाँकि अगर यह सुरक्षाबल मारे नहीं गए होते तो माओवादियों  के बहाने आदिवासियों को मार कर आते.यानी एक बात सपष्ट है कि सरकार की नीतियों के चलते सुरक्षाबलों और स्थानीय लोगों के बीच का सम्बन्ध दुश्मनाना बन चुका है जिसका  लक्ष्य जीत हासिल करना है.

इन्हें पहचाने   : आदिवासी या माओवादी
मीडिया मैनेज में माहिर और मनोवैज्ञानिक युद्ध के महारथी चिदंबरम जानते हैं कि असल मुद्दे पर अगर जोर जारी रहा तो इस्तीफा देने का दिखावा जो उन्होंने पिछले दिनों किया था वह हकीकत में बदल जायेगा.वित्तमंत्री से गृहमंत्री बने पी चिदंबरम के बदलते बयानों को इकट्ठा कर लिया जाये तो यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि आदेश और आरोप ही उनकी काबीलियत का सार है। इस काबीलियत से तंग आकर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया ‘जबान संभाले’तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा ‘थम के बोलिये और काम से बरसिये।’रही बात झारखंड के मुख्यमंत्री शिबु सोरेन की तो उनके बारे में चिदंबरम साहब के अधिकारी ही माओवादियों के मामले में संदेह व्यक्त करने वाले बयान देते हैं। सरकार के इस रवैये पर समयांतर पत्रिका के संपादक पंकज बिष्ट कहते हैं, ‘गृहमंत्री और गृहसचिव जीके पिल्लई को कौन समझाये कि सरकार युद्ध की तारीख तो तय कर सकती है लेकिन खात्मे की नहीं। युद्ध की अमेरिकी रणनीति आजमा रही सरकार को इसका अनुभव तो अफगानिस्तान, वियतनाम और इराक से लेना चाहिए।’

माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी व्यवस्था अमल में लाने के लिए सफाया,कब्जा और निर्माण की अमेरिकी युद्ध नीति के तहत सरकार कार्यवाही कर रही है। चिंतलनार में मारे गये अर्धसैनिक  बल के 62वीं बटालियन के 75 सुरक्षाबल  समेत  ७६ जवान उसी नीति के तहत की जा रही कार्यवाही के दौरान माओवादियों और समर्थकों के हाथों मारे गये। ऐसी रणनीति का प्रयोग सरकार १९९० के दशक में उल्फा के सफाये के लिए उत्तर-पूर्व के राज्यों में कर चुकी है। इस युद्ध रणनीति के तहत सबसे पहले सुरक्षाबलों को अतिवादियों को मटियामेट कर एक निश्चित क्षेत्र में कब्जा करना होता है। जिसके बाद वहां फौजी नियंत्रण कायम कर सुरक्षाबल कब्जे के लिए आगे बढ़ते हैं। सफाये और कब्जे की लंबी प्रक्रिया के बाद सरकारी मशीनरी वहां निर्माण काम अपने हाथों में लेती है।

 छत्तीसगढ़ में मारे गये जवानों की हत्या के बाद पहली बार  है कि सत्ताधारी यूपीए की मुख्य पार्टी कांग्रेस के भीतर से कई बड़े नेताओं ने चिदंबरम की सफाया नीति का खुलकर विरोध किया है। कांग्रेस महासचिव दिग्वीजय सिंह ने तो बकायदा एक आर्थिक अंग्रेजी दैनिक में लंबे लेख के जरिये चिंतलनार समेत पूरी नीति को लेकर गृहमंत्री की समझ पर सवाल खड़े किये। इस सवाल का पुरजोर समर्थन वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री मणिशंकर ने इस टिप्पणी के साथ किया कि ‘दिग्वीजय एक लाख प्रतिशत सही कह रहे हैं।’सुरक्षा विशेषज्ञ अजय साहनी दो टूक मानते हैं कि ‘यह चिदंबरम की रणनीतिक गलती का परिणाम है। ऐसे अभियान केंद्र सरकार आधारित कर संचालित करने पर भविष्य में इससे भी बुरे परिणाम हो सकते हैं।’



May 4, 2010

मुकम्मिल इनसानियत की धार थी

 यादें
 हैनसन टी के

स्मृतियों  का कोठार है मेरा हृदय
मैंने कुछ वैसे ही सहेज रखी है
प्रियजनों  की यादें
जैसे कोई अमीर व्यापारी  तिजोरी में
बंद किये रखता है सोना-चांदी


पसलियों के पिंजरे में कैद
मेरी प्रिय यादों को
न तेज हवाएं उड़ा सकती हैं
न सैलाब बहा सकता  है
न चोर  चुरा सकता है

सफेद कपड़े पहनती थीं मेरी मां
मेरी सांसों  में अब भी  बसी हुई है उनकी खुशबू
नारियल तेल, तुलसी के पत्ते  और
चंदनलेप की मिली-जुली खुशबू

मैं पड़ोस  की उस स्त्री को  याद करता हूं
जो संत थॉमस चर्च में प्रार्थना करती थी
और  जिसने मां के बीमार होने पर
स्तनपान कराया था मुझे
मेरे नन्हें होठों को स्पर्श करती वह
दूध की चंद बूंदें नहीं
मुकम्मिल इनसानियत की धार थी

हवा की धुन पर नाच रहा था लालझंडा
आगे-आगे थे मेरे पिता नारे लगाते हुए
शाम को  हमारे लिए वह
कागज के नन्हें-नन्हें झंडे लेकर आये थे
तब हमने भी झंडों के साथ मार्च किया था
आज भी लहरा रहा है लाल परचम

मैंने देखी थी दो कजरारी आंखें
पतले होंठ  लथपथ चेहरा
विद्यालय की वर्षगांठ पर
मेरे साथ नृत्य  किया था उसने
मैं अब भी  महसूस करता हूं   उसकी हथेलियों  की गरमाहट
भला मैं कैसे भूल सकता हूं   अपना पहला प्यार

स्मृतियों  का कोठार है मेरा हृदय
प्रियजनों और मधुर क्षणों  की यादों का घर

वैसे ज्वार के दौरान  फूलने लगती है नदी
पानीपर रूपहली चांदनी उड़ेल देता है चांद
अकेला नाविक रात के सन्नाटे को चीरते हुए
गाता है कोई लोकगीत

बारिश की शुरुआती बूंदों  में  स्पर्श पाकर
भाव विभोर  झूमते हैं नारियल वृक्ष
जैसे घटाओं  को  देखकर नाचता है मोर

सुबह की ठंडी हवा चलती है
फूलों  की खुशबू से सराबोर
घास   पर टिकी ओस की बूंदों
हजार-हजार सूरज चमकते हैं

सागर की लहरें किनारों  को
अपने रेशमी रूपहले फेन से संवारती हैं
मैं हृदयस्थ करता हूं
पहाड़ों और हरी घास के मैदानों को

अतीत के प्रहरी की तरह खड़े हैं पथरीले टेकरे
विशाल पत्रों  में खुदी मूर्तियों ने
बीते युगों की  यादों को  सहेज रखा है

माथे पर चंदनलेप लगाते हुए तुमने
अपनी अँगुलियों  के स्पर्श से अनुप्राणित किया था मुझे
तब तुम्हारी आँखों  में चमक रहे थे वे सितारे
जिन्हें स्वर्ग से चुरा लायी थी तुम
मैंने वह सबकुछ सहेज रखा है
जो बहुत-बहुत प्यारा है मुझे

मेरा हृदय स्मृतियों का कोठार  है
प्रियजनों और  मधुर क्षणों  की यादों का घर
                                                                        अनुवाद-  मदन कश्यप





May 3, 2010

काम पर परिवार


खुदाई  के  लिए  अभिसप्त  शहर दिल्ली का  यह आम दृश्य है.सरकार के मुताबिक ये सब  विकास के लिए हो रहा है और   विकास राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के लिए.शहर की सहूलियत और सुविधाओं के मार्फ़त खेलों के आयोजन का तो इतिहास रहा है,मगर दिल्ली को पहले ऐसे शहर कि ख्याति मिलेगी जो खेलों के मार्फ़त बदली  है, विकसित हुई  है.हो यह रहा है कि यहाँ  नागरिकों का ख्याल कर खेल और आयोजन के इंतजामात नहीं किये जा रहे बल्कि खेलों के हिसाब से लोगों के नागरिक अधिकार तय हो रहे हैं.


इस बारे में समाजशात्री आशीष नंदी ने एक साक्षात्कार  में कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं -'हमारे यहां एक तरफ राष्ट्र मंडल खेलों की तैयारियां चल रही हैं और दूसरी तरफ उतनी ही तेजी से झोपड़पट्टियों और गरीब बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है या पहले ही उजाड़ दिया गया है। मेरे लिए ये सब झकझोर देने वाली घटनाएं भी हैं। मैं सोचता हूं,यह कैसा देश है जहां दूसरों के स्वागत के लिए अपने लोगों को तबाह किया जा रहा है। न्यूयार्क, लंदन, शिकागो जैसी जगहों में भी स्लम हैं और हार्लेम तो दुनिया की मुख्य स्लम बस्तियों में से एक है। गौर करने वाली बात है कि अभी हाल ही में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का दफ्तर स्लम की तरफ बनाया गया है। लेकिन क्या हमारा कोई अदना-सा सांसद भी ऐसी किसी बस्ती की तरफ रहना पसंद करेगा। जाहिर है,हमारा शासक वर्ग सिर्फ स्लम को ही नहीं ऐसी हर समस्या को,जिसको वह नहीं चाहता है,भुला देना चाहता है नहीं तो ढंक देना चाहता है। यह हिंदुस्तानी शासक वर्ग की कार्यशैली की सामान्य आदत है कि जिसे वह नहीं चाहता है,मुख्य सामाजिक दायरे से उठाकर फेंक देता है।


आइये इस हालात को हम  फोटोग्राफर आरबी यादव की नज़रों से देखें -




नज़र न लगे लल्ला को : विकास की  नज़र से कैसे बचाओगी माई

का फोटो खींचत हौ चचा : रीअल्टी शो होगा का




काम पर परिवार : विकास के लिए जरूरी कहती सरकार



तापमान साक्षरता का विषय है : और काम कामगारों का



May 1, 2010

स्वदेश वापसी का रास्ता बंद है

राजशाही के खिलाफ लोकतंत्र की स्थापना के लिए लड़े नेपाली भाषी भूटानी नागरिकों को भूटान की राजशाही ने खदेड़ दिया था. ये  लोग  पिछले 18  वर्षों  से नेपाल के सात कैम्पों में शरणार्थियों का जीवन बीता रहे हैं. 

संयुक्त राष्ट्र संघ समेत अन्य  दानदाता एजेंसियों के सहारे गुजर-बसर कर रहे शरणार्थियों की आबादी भूटान की कुल जनसंख्या का पांचवां हिस्सा है.पराये देश में इनकी तीसरी पीढी नौजवान हो रही है. शरणार्थियों ने भूटान जाने का जब भी प्रयास किया तो भारतीय फौजों ने दखलंदाजी की.कारण कि नेपाल से भूटान जाने का रास्ता भारत (पश्चिम बंगाल)  होकर ही जाता है. ऐसे में सवाल है कि क्या भूटान में हो रहे दक्षेस देशों के 16वें शिखर सम्मेलन में 'शरणार्थियों',जिनकी संख्या डेढ़ लाख से अधिक है, उनपर भी कोई बात होगी.


टेकनाथ रिजाल नेपाल में रहने वाले भूटानी शरणार्थियों के लोकप्रिय नेता हैं. भूटानी राजशाही ने १९८९ में लोकतांत्रिक आंदोलन खडा करने के आरोप में रिज़ाल को १० साल  कैद की सज़ा दे डाली थी. १८ दिसम्बर १९९९ को जेल से रिहा  होने के बाद से वह नेपाल में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं
राजशाही की देखरेख में लोकतन्त्र की स्थापना की कवायद से शणार्थियों को क्या उम्मीदें हैं, भारत से वे क्या चाहते हैं जैसे मसलों पर काठमांडू में हुई टेकनाथ रिज़ाल से अजय प्रकाश  की  बातचीत

टेकनाथ रिजाल : दक्षेश सम्मलेन से उम्मीद नहीं

भूटानी नागरिक भारतीयों के साथ कैसा रिश्ता महसूस करते हैं

भारत के आजादी से पहले का कहें या बाद का दक्षिणी भूटान के नेपाली भाषी लोंगों से भारतीयों का गहरा आत्मीय रिश्ता है. भारतीय फौजों में हमारे इतने लोग थे कि जब राजा ने देश निकाला किया तो उसमें सैकडों वीर चक्रों को हमसे छीन लिया.ये वीर चक्र हमारे लोगों को भारतीय सेना में काम करते हुये दिये गये थे.इतना ही नहीं भारत की आजादी की लडाई में शामिल हुये तीन-चार भूटानी नागरिक तो बहुत बाद तक पटना जेल में बंद रहे. मगर हमें अफ़सोस है कि जिस देश के साथ हम लोगों का इस तरह का रिश्ता रहा था वही देश आज हमें अपने देश जाने के लिए रास्ता नहीं दे रहा है.

भूटान-भारत के साथ मौजूदा और पूर्ववर्त्ती संबंधों के बीच आप लोग क्या फर्क देखते हैं .

१९६० के बाद भूटान में जिस स्तर पर नागरिक सुविधायें लागू कि गयीं उसमें भारत का अहम योगदान हैं
भूटान को इससे पहले एट्टियों यानी जंगली लोगों का देश कहा जाता था. किन योजनाओं में कितना खर्च होगा के हिसाब से लेकर मलेरिया तक के ईलाज का भार भारत ही उठाता था.मौजू़दा दौर में भारत सरकार का झुकाव और पक्षधरता भूटानी नागरिकों के प्रति होने के बजाय राजा के प्रति है.दक्षिण एशिया का सबसे ताकतवर और जनतांत्रिक देश होने के नाते न सिर्फ भूटान बल्कि इस क्षेत्र के हर देश की जनता बहुत उम्मीद से भारत की तरफ देखती हैं.हमारा स्पष्ट मानना भारत सरकार की मदद के बगैर न तो नेपाल में शांति प्रक्रिया को स्थिरता मिल सकती है और न भूटानी शरणार्थी सम्मानपूर्वक स्वदेश वापसी कर सकते हैं

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक नेपाल के शिविरों में रहने वाले भूटानी युवा आतंकवादी  गतिविधियों में संलिप्त है?

यह तथ्यजनक नहीं है.यह राजा प्रायोजित प्रचार है,जिसे हिन्दुस्तानी मीडिया हवा देता रहता है. जाहिर है कि राजा तथा उसकी मददगार शक्तियां नेपाल के कैम्पों में रह रहे डेढ लाख शरणार्थियों पर किसी बहाने तोहमत लगाती रहेंगी जिससे स्वदेश वापसी संभव न हो

दक्षिणी भूटान के नेपाली भाषियों को भूटानी राजा ने देशनिकाला क्यों किया?

उसके दो मुख्य कारण थे.एक तो यह कि भारत के साथ दक्षिणी भूटान के नागरिकों की नजदीकी बढती जा रही थी
दूसरा यह कि भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को देखकर भूटानियों ने भी जनतांत्रिक हकों के लिए पहल करना शुरू किया.लेकिन राजा को यह मंजूर नहीं था. प्रतिक्रिया में उसने नेपाली भाषी लोगों की संस्कृति, भाषा तथा जीवन जीने के तरीके तक पर हमले शुरू कर दिये
राजशाही के जुल्म इस कदर बढे कि राज्य की तथाकथित संसद में बैठे सांसदों,अदालत के जजों तक को राज्य निकाला कर दिया गया.फरवरी १९८५ में जब राजा ने हमारी नागरिकता को रद्द कर दिया तो हमें भरोसा था कि पडोसी देश भारत राजशाही की तानाशाही के खिलाफ ऐतराज करेगा. मगर यहां उल्टा हुआ. आज हम न भारत में हैं न भूटान में, हमें तीसरे देश की शरण लेनी पडी.
भारत,राजा के साथ अपने हित साध रहा है.कौन नहीं जानता कि भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मरीं तो राजा ने देश में जश्न मनाये.भारत की अखण्डता के लिये खतरा बन चुके उल्फा और बोडो उग्रवादियों की प्रमुख शरणस्थली तथा ट्रेनिंग कैम्प आज भी भूटान में है.
हमारे ऊपर आतंकवादी गतिविधियों के संचालित करने का आरोप लगाने वाली भारतीय मीडिया  को ये तथ्य क्यों नहीं दिखते?साथ ही भारतीय सरकार भूटान में भारत के लिए काम करने वाली स्थानीय खुफिया एजेंसियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं करती कि तैनात अधिकारी भारत के प्रति कितने ईमानदार हैं

शरणार्थियों की तीसरी पीढ़ी : नेपाल में चोरी-छुपे मिलता है काम

क्या यह सच है कि शिविर के युवाओं में भारत के खिलाफ नफरत बढ रही ?

पिछले कुछ सालों में भारत के प्रति नफरत बढी है. 17-18 वर्षों में हमने स्वदेश वापसी का सात-आठ बार शांतिपूर्वक प्रयास किया. मगर जाने में असफल रहे हैं. इन प्रयासों के खिलाफ भारतीय फौजें बार-बार रोडा बनकर खडी हुयी हैं



भूटान से भारत की नजदीकी की वजहें?

भूटान की कुल साढे छह लाख की आबादी में भारतीयों की संख्या ६० हजार है.भूटानी बाजार और व्यापार पर भारतीयों का ही कब्जा है.इसके अलावा भारत सरकार को यह भी डर है कि लोकतंत्र कायम होते ही वह भूटान में अपने कठपुतली राजा का उपयोग नहीं कर सकेगा.मतलब यह कि एक तरफ जहां भारत सीधे आर्थिक लाभ के कारण स्थानीय राजनीति पर अपना दबदबा बनाये रखना चाहता है वहीं विस्तारवादी नीति के मद्देनजर कमजोर देशों में सामंती राजसत्ताओं को बनाये भी रखना चाहता है.

अमेरिका ने प्रस्ताव दिया है वह शरणार्थियों को कनाडा और दूसरे देशों में पुनर्वासित करेगा ?

मीडिया में आयी खबरों के आधार पर हमने नेपाली सरकार से बातचीत की तो पता चला कि अमेरिका की तरफ से इस बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं हैं.हालांकि सांस्कृतिक,भौगोलिक विविधता की वजह से ऐसा होना संभव नही है.हुआ भी तो इसे स्थायी हल नही कहा जा सकता.अगर भूटानी शरणार्थियों का अमेरिका शुभचिंतक है तो भारत पर दबाव डाले कि वह शरणार्थियों को स्वदेश वापसी का रास्ता दे.
दूसरा यह कि भारत के लिये भी यह बेहतर नहीं कि हम अमेरिका में जाकर बसें.कैम्पों में भारत के खिलाफ बढ रही नफरत का कभी भी कोई साम्राज्यवादी देश इस्तेमाल कर सकता है

अमेरिकी प्रस्ताव पर शरणार्थियों का क्या विचार है?

मिला-जुला असर है.शगूफा उठा कि अमेरिका जाने वाले फार्म पर दस्तख्त करने से १७,००० लाख नेपाली रुपये मिलेंगे.इस लालच में तमाम शरणार्थियों ने फार्म भरे लेकिन पिछले दिनों जब स्वदेश वापसी की पहल हुई  तो सभी भारत की सीमाओं की तरफ जुटने लगे.किसी ने नहीं कहा कि वह अमेरिका जायेगा.इसलिये कहा जा सकता है कि शरणार्थी अब इस कदर त्रस्त हो चुके हैं कि वह कहीं भी सम्मान और बराबरी की जिन्दगी चाहते हैं चाहे वह कनाडा हो या भूटान.

पश्चिम बंगाल  की वामपंथी सरकार का रूख कैसा रहा है?

लंबे समय बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्ध्देव भट्टाचार्य ने २००७ के जून माह में आश्वासन दिया कि भूटानियों की समस्या का हल किया जायेगा.हालांकि इस वादे से हफ्ते भर पहले बंगाल पुलिस, असम पुलिस और सीआरपीएफ ने हमारे लोगों को गोलियों से भून डाला था.आखिरकार हम करें तो क्या करें.सच का एक बडा हिस्सा है कि समाधान भी उत्पीडक ही करेगा.

नेपाल का रुख?
सरकार चाहे किसी की रही हो नेपाल ने हमेशा आश्रय दिया है. कहना अतिरेक नहीं होगा कि नेपाली माओवादी
इस मसले को लेकर अन्य पार्टियों से हमेशा गंभीर रहे हैं.


 नोट- यह साक्षात्कार पुराना है, मगर मसले जस के तस बने हुए हैं

Apr 24, 2010

ठगी का सामाजिक अभियान


अजय प्रकाश

बुनियादी सुविधाओं से महरूम जनता की समस्याओं को किस तरह बेचा जा रहा है, इसे देखने और झेलने का मौका मुझे हाल ही में मिला. यह मौका इंफोसिस के पूर्व सह अध्यक्ष और अब यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया के मुखिया नंदन नीलेकणी की पत्नी रोहिणी नीलेकणी के एनजीओ आरघ्यम की दिल्ली स्थित उपशाखा इंडिया वाटर पोर्टल की ओर से पंजाब के भटिण्डा में दो दिवसीय कार्यशाला में मिला.


इंडिया वाटर पोर्टल मुख्य रूप से पानी पर सूचनाओं के प्रसारण का काम करती है.साथ ही वह पानी पर काम करने वाले एनजीओ की दानदाता एजेंसी भी है.पोर्टल की हिंदी वेबसाइट की संचालक मीनाक्षी अरोड़ा और सिराज केसर की तरफ से 26 मार्च को पत्रकारों के लिए एक लिखित निमंत्रण आया. निमंत्रण पंजाब के मालवा क्षेत्र से संबंधित था, जिसमें बताया गया था कि पानी में यूरेनियम की अधिकता से सेरीब्रल पैल्सी रोग हो रहा है. अंत में बताया गया था कि 29 मार्च को दिल्ली से एक गाड़ी जायेगी जिसमें इच्छुक पत्रकार सवार हो सकते हैं.

29 तारीख को मैं भी उस गाड़ी में सवार हो गया. गाड़ी में किसी और पत्रकार को न देख मुझे आश्चर्य हुआ. पूछने पर मेजबानों ने बाजारू पत्रकारिता का हवाला देकर मुझे सामाजिक पत्रकारिता का वीर पुरुष करार दिया. अफसोस भी जताया कि हमने तो मेल कई हजार लोगों को भेजे थे, उनमें आपके अलावा सिर्फ एक और पत्रकार मणिमाला साथ जा रही हैं.मणिमाला से परिचय के बाद जब हमलोग चाय के लिए रूके तो उन्होंने एनजीओ के अनुभवों को साझा किया कि,एक नहीं सभी अपने बजट का 85 फीसदी हिस्सा बड़े पदाधिकारियों के खर्चे और तामझाम में लगा देते हैं.

भटिंडा का सर्किट हाउस : ठगा सा महसूस करते लोग
भटिंडा में पहले दिन का सत्र शुरु होने के बाद भी दूसरे किसी भागीदार पत्रकार को न देख हमें संदेह हुआ. पूछने पर कि हमलोग इलाके में कब चलेंगे, सिराज केसर ने बताया कि पहली पारी की बैठक खत्म हो जाये तो हम सभी क्षेत्र में चलेंगे. एक घंटा फूलों के लेन-देन और स्वागत में लगाने के बाद गुरुनानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर से आये भौतिकी के प्रोफेसर डॉक्टर सुरिंदर सिंह ने यूरेनियम पर 20 साल पहले का एक अध्ययन पेश किया. डेढ़ घंटे के भाषण में वे एक दफा भी नहीं बता पाये कि यूरेनियम की वजह से कोई रोग हो रहा है.

इस पर सवाल उठा तो दिल्ली और भटिंडा के आयोजक हमें यह समझानें में लग गये कि यह जबाव भौतिकी के प्रोफेसर का बनता ही नहीं है. तो जवाब कौन देगा, इस पर आयोजकों ने चुप्पी साध ली. हमारा सवाल था कि तथ्यों की सही जानकारी के बगैर गुमराही का यह काम ‘खेती विरासत’ के इशारे पर ‘आरघ्यम’ और ‘पोर्टल’ ने संयुक्त रूप से कैसे कर लिया?
हमने प्रोफेसर सुरिंदर सिंह से पूछना उचित समझा कि बीस साल पहले किये गये अध्ययन को आज पेश कर आप क्या बताना चाहते हैं.जिन प्रोफेसर सुरिंदर सिंह ने यूरेनियम में पानी पर डेढ़ का लंबा भाषण दिया था, उन बेचारे ने डेढ़ मिनट में जो कुछ बताया वह इस प्रकार से है- मालवा क्षेत्र के कुछ इलाकों में पानी में यूरेनियम ज्यादा है जिसका 90 प्रतिशत स्रोत प्राकृतिक है. रही बात बीस साल पहले के अध्ययन को पेश करने की तो यहां इन्होंने बुलाया था, इसलिए हमने पेश किया. इसकी वजह से कोई बीमारी होती है या किन रोगों की संभावना होती है,ऐसा कोई अध्ययन मैंने क्या, किसी ने नहीं किया है.

दिल्ली से गये दानदाताओं ने बताया कि इस फर्जी जानकारी के सूत्रधार तो स्थानीय संयोजक एनजीओ ‘खेती विरासत’ के सुरिंदर सिंह और उनके सहयोगी शिक्षक चंद्रप्रकाश हैं. हिंदी वाटर पोर्टल के सिराज के मुताबिक,"खेती विरासत ने ही पानी में अधिक यूरेनियम होने की वजह से क्षेत्र में सेरीब्रल पैल्सी रोग हो रहा है, की जानकारी मुहैया करायी थी." लेकिन हमारा सवाल था कि तथ्यों की सही जानकारी के बगैर गुमराही का यह काम ‘खेती विरासत’ के इशारे पर ‘आरघ्यम’ और ‘पोर्टल’ ने संयुक्त रूप से कैसे कर लिया?
प्रो. राजकुमार : सब कहा, बस इतना नहीं बता पाए कि आर्सेनिक से दक्षिण- पश्चिम पंजाब में केंसर  है.

इसमसले पर बहस में जाने केबजाय अब हम फिर क्षेत्र में जाने के कार्यक्रम पर आगये. लेकिन ‘खेतीविरासत’ के संयोजक सुरिंर सिंह पीड़ितोंसे मिलाने ले जाने को अनसुना करते रहे.काफी जद्दोजहद के बाद वह दूसरे दिन सुबह आठ बजे हमें पीड़ितों से मिलाने को तैयार हुए.

दूसरे दिन वे पहुंचे तो सही, मगर नये बहानों के साथ. बहाना था कि साथ जाने वाला कोई नहीं है और आपलोग पंजाबी जानते नहीं हैं, इसलिए वहां बात कैसे कर पायेंगे. यह सब होते-हवाते दिन के ग्यारह बज गये, जबकि हमें वहां लौटकर तीन बजे दिल्ली के लिए रवाना भी होना था. मौके की नजाकत और आयोजकों का टालू रवैया देख पत्रकार मणिमाला ने क्षेत्र में जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया और कहा कि मुझे यहां किताबों का वितरण करना है, सो मैं नहीं जा पाउंगी.

अब मैं जाने वालों में अकेला बचा था. इनकी ठगी पर जितना कोफ्त हो रहा था, उससे कहीं ज्यादा अपनी समझदारी पर कि गर मैंने दिल्ली में मित्रों से राय ले ली होती तो एनजीओ के भरोसे रिपोर्टिंग के मुगालते से बच गये रहते. इस अफसोस के साथ थोड़ी खुशी भी थी. खुशी इसलिए कि पहली दफा की ही मुफ्तखोरी ने अहसास करा दिया था कि देशी-विदेशी दानदाताओं की पेटियों से झरझराते सिक्के हमारे जैसे पत्रकारों के लिए नहीं हैं. तभी ‘खेती विरासत’ के सुरिंदर सिंह ने कहा कि भटिंडा जिले की तलवंडी साबो तहसील में कई ऐसे गांव हैं, जहां पानी में आर्सेनिक की अधिकता की वजह से केंसर और अन्य घातक रोग हो रहे हैं.

यानी अब मामला यूरेनियम से खिसकर आर्सेनिक पर आ गया था. बात को जायज ठहराने के लिए खेती विरासत से जुड़े चंद्र प्रकाश ने कुछ नामचीन अखबारों, रेडियो और टीवी चैनलों का हवाला भी दिया कि वह इस मसले पर कई बड़ी खबरें कर चुके हैं.अपनी तीन दिन की छुट्टी और उर्जा को किसी तरह बचा लेने की अंतिम कोशिश करते हुए मैंने उनके आर्सेनिक वाले प्रस्ताव को स्वीकार लिया. मैंने आयोजकों से कहा कि कुछ गांवो के नाम और दो-चार संपर्क बता दें, जिससे सुविधा हो.

बड़ी मुश्किल से सुरिंदर ने मलकाना गांव के एक सज्जन का नंबर दिया, जिनका भूरा सिंह नाम था. इस गांव के बारे में स्थानीय आयोजकों ने मुझे बताया गया कि यहां न सिर्फ सेरीब्रल पैल्सी बल्कि केंसर, नपुंसकता, दस पंद्रह की उम्र के बाद एकाएक न्यूरो तंत्र का शरीर से नियंत्रण खत्म हो जाने वाला रोग और गर्भपात के रोगियों की एक बड़ी संख्या है.भटिंडा से लगभग पैंतीस किलोमीटर दूर जब इस गांव में पहुंचे तो भूरा सिंह गुरूद्वारे के पास हमारा इंतजार कर रहे थे.
उनके साथ चार-पांच और लोग खड़े थे.भूरा सिंह ने बताया कि यह सभी लोग किसी की तेरही में खाने आये हैं. बातचीत में पता चला कि गांव में सात हजार आबादी और बत्तीस सौ वोट हैं. पीने के पानी की समस्या पर लोगों ने बताया कि अब गांव में सरकार की मदद से पंचायत ने आरओ (पानी शुद्ध करने का यंत्र) लगा दिया है.

पानी में आर्सेनिक की अधिकता की वजह से केंसर के बारे में गांव वालों ने इनकार किया. इनकार तो उस कार्यक्रम में आये गुरूनानक देव विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजकुमार ने भी किया था. श्रोताओं ने जब यह पूछा कि क्या कोई ऐसा अध्ययन है जो बताता है कि पानी में आर्सेनिक की बढ़ी मात्रा की वजह से केंसर हो रहा है तो प्रोफेसर राजकुमार ने हाथ खड़े कर लिये. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पानी में आर्सेनिक के मुख्यतः स्रोत प्राकृतिक हैं.’ तब वहां सवाल भी उठा था कि फिर इस आयोजन का मकसद क्या है और प्रोफेसर साहब चुप हो गये थे.दरअसल प्रोफेसर लगातार यह समझा रहे थे कि जहां पानी में आर्सेनिक अधिक है, वहां केंसर रोगी ज्यादा हैं. मगर जो नक्शा दिखाकर जानकारियां दे रहे थे, वह उनके रिसर्च का हिस्सा नहीं बल्कि पंजाब के एक अंग्रेजी दैनिक का उतरन था.

बहरहाल हम यह सब झेलकर उस जगह पर आ गये थे,जिस गांव के एक डॉक्टर ने बताया कि "चंडीगढ़ पीजीआई की टीम आई थी जिसने कहा कि पानी में आर्सेनिक नहीं बल्कि क्लोरोमिअम ज्यादा है, जिसका कारण भारी मात्रा में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक हैं." बताते चलें कि मालवा क्षेत्र का भटिंडा जिला पंजाब में इस्तेमाल किये जाने वाले कुल कीटनाशकों का एक बड़ा उपभोक्ता है.

फिर पानी में आर्सेनिक की वजह से मलकाना गांव में लोग केंसर पीड़ित हैं,को लेकर हंगामा क्यों है.गांव के नौजवान और क्लब सदस्य रणधीर सिंह ने बताया कि ‘क्षेत्र के किसी गांव में चले जाइये, आमतौर पर 40 से 50 प्रतिशत लोग नशाखोरी की जद से त्रस्त मिल जायेंगे. वहीं कीटनाशकों के इस्तेमाल से पानी की गड़बड़ी की शिकायत आम है.वैसे में एनजीओ वाले आर्सेनिक पर जोर ज्यादा इसलिए देते हैं कि इसमें खतरे कम हैं.अगर नशाखोरी के खिलाफ लड़ना है तो पहली लड़ाई माफियाओं से है. पेस्टीसाइड के खिलाफ लड़ेंगे तो सरकार, कंपनी और माफिया तीनों से भिड़ना है. इन सबसे से उपर यह है कि इन लड़ाईयों और जागरूकता के संसाधन जनता से जुटाने हैं, जबकि एनजीओ उन्हीं पूंजीपति घरानों के दान से चलते हैं जो पहले हमारे पानी को जहरीला करते हैं, फिर हमें आरओ सिस्टम बेच जाते हैं.’

मलकाना गाँव : केंसर रोगी हैं पर आर्सेनिक के नहीं
ग्रामीण गुरूतेज सिंह एक दूसरा मामला भी उजागर करते हैं- ‘मलकाना समेत कई गांवों के बारे में मीडिया और एनजीओ ने मिलकर केंसर का एक ऐसा हौवा खड़ा किया कि अब हमारे गांवों में कोई शादी नहीं करना चाहता.’

ग्राम सदस्य ज्ञानी जगदेव सिंह गांव के उन युवाओं में से एक हैं जिनकी शादी इसी हौवे की वजह से नहीं हो रही है. जगदेव सिंह ने धार्मिक पढ़ाई की है और वे धर्म का वास्ता देते हुए कहते हैं कि "नशाखोरी का चलन इतना ज्यादा है कि आमतौर पर चालीस की उम्र पार करते कोई न कोई रोग नशेड़ियों को हो ही जाता है.ईलाज की कोई व्यवस्था न होने के कारण रोग जब अपने चरम पर होता है और रोगी अंतिम समय में. कुछ अस्पताल आते-जाते मरते हैं तो कुछ पहुंचने से पहले ही. वैसे में जो मरा वही केंसर रोगी हो गया.अभी तो बकायदा भटिंडा से बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन का नाम ही मीडिया ने ‘केंसर ट्रेन’ रख दिया है."

अब हम गांव से लौट रहे थे, जहां किसी एक ने भी नहीं कहा था कि आर्सेनिक की वजह से कैंसर हो रहा है.लेकिन इंडिया वाटर पोर्टल और आरघ्यम को 'खेती विरासत'की आंखों से पानी में आर्सेनिक और यूरेनियम की वजह से केंसर और सेरीब्रल पैल्सी रोग होता क्यों दिख रहा था,यह समझना मुश्किल था. इस सवाल पर दिल्ली रवाना होने से पहले आयोजकों के ही एक सहयोगी ने बताया कि पैसे आने के माध्यम से एनजीओ में समस्याएं और सामाजिक संकट तय होते हैं.
 http://www.raviwar.com/ से साभार


Apr 17, 2010

जहां गुंडे भी विधायक हैं


अजय प्रकाश

‘चाचा हमार विधायक हउवें ना घबराइब हो, ए डब्बल चोटी वाली तहके टांग ले जाइब हो’- भारतीय राजनीति को जनता किस रूप में समझती है,भोजपुरी भाषी क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय यह गीत इसकी एक बानगी भर है। 

राजनीति में अपराध के बढ़े शेयर का न तो इससे बेहतर विश्लेषण हो सकता है और न ही इससे बड़ा तिरस्कार। अभी हालत यह है कि देश के सबसे बड़ी आबादी और विधानसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश के 40प्रतिशत से अधिक विधायक अपराधी हैं। जिनमें से ज्यादातर हत्या,बलात्कार, गैंगवार, फिरौती, राहजनी, उठाईगीर जैसे कई अपराधों में नामजद, सजायाफ्ता, नहीं तो भगोड़ा घोषित हैं।

कोलसला विधायक अजय राय :  गुंडा एक्ट के तहत गिरफ्तार करने पहुंची पुलिस
                                                                                                 फोटो- वाराणसी व्यू ब्लॉग  
ऐसे जनप्रतिनिधि जनता की भलाई कितना करते हैं, वह तो आंकड़ों में फंसकर फाइलों में दफ्न हो जाता है मगर इनकी गुंडई का असर लोगों में दिन-रात रहता है। सिर्फ मार्च महीने में प्रदेश के 6विधायकों श्रीपति आजाद,दीप नारायण सिंह, सुल्तान बेग, विजय कुमार मिश्रा, अजय राय और यशपाल रावत पर हत्या, हत्या का प्रयास, वाहन चोरी गैंग और अपहरण के मुकदमें दर्ज हुए हैं। समाजवादी पार्टी के महाराजगंज सदर के विधायक श्रीपती आजाद ने रामपुर बुजुर्ग गांव की एक विधवा महिला सावित्री देवी को सिर्फ इसलिए जला दिया कि वह अब उन्हें पसंद नहीं कर रही थी। वहीं संत रविदास नगर जिले के ग्यानपुर के सपा विधायक विजय कुमार मिश्रा वाहन चोर गैंग के नेता निकले तो बरेली जिले के कंवर क्षेत्र के सपा विधायक के खिलाफ चोर गैंग के सरगना होने का मुकदमा दर्ज हुआ।

वाराणसी के कोलासला क्षेत्र के विधायक अजय राय ने भानू प्रताप सिंह नाम के बीज व्यापारी को एक संपत्ति विवाद में 25 मार्च को जिंदा जला दिया। पुराने आपराधिक रिकॉर्ड वाले अजय राय 2007 चुनाव से पहले भाजपा में थे,चुनाव के वक्त सपा ने समर्थन दिया और फिलहाल कांगे्रसी कार्यकर्ताओं ने,गुंडा एक्ट में उन्हें गिरफ्तार किये जाने के बाद वाराणसी में खूब हंगामा किया। बाहुबली अजय राय प्रदेश के इकलौते नेता नहीं हैं जो अपराध की राजनीति के बदौलत प्रदेश की हर बड़ी पार्टी में रसूख रखते हैं। इस तरह के नेताओं की भरमार है जो पार्टियों में बेहतर राजनीति की पैरोकारी करने वालों को हाशिये पर डाल देते हैं और शीर्ष  नेताओं की क्षत्रछाया में मलाई मारते हैं। मुख्तार अंसारी, राजा भैया, अमरमणि त्रिपाठी, हरिशंकर तिवारी, अतिक अहमद, गुड्डु पंडित, डीपी यादव, अखिलेश सिंह जैसे नेता इस राजनीति के स्थापित नाम हैं।

उत्तर प्रदेश की मौजूदा विधानसभा में ‘जिसकी जितनी भागीदारी, उनके उतने हैं अपराधी’ वाली बात है। पिछले 2007के विधानसभा चुनावों में दलितों-ब्राम्हणों के गठजोड़ से ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली बसपा के 206 प्रतिनिधि हैं जिनमें से 71 पर आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का मुकदमा दर्ज है। जबकि प्रदेश को संभालने वाले कैबिनेट के मंत्रियों में अपराधिक छवि वाले कितने हैं उसका अंदाजा बुंदेलखंड क्षेत्र से आने वाले उन पांच  मंत्रियों से लगाया जा सकता है जिनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिस पर कि आपराधिक मुकदमा नहीं है। भाजपा से बसपा में आये और मौजुदा सरकार में लघु उद्योग मंत्री बने बादशाह सिंह पर लगभग डेढ़ दर्जन मुकदमें दर्ज हैं।

ऐसा भी नहीं है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपराधियों की भरमार एकाएक हो गयी है। पिछली विधानसभा में तो आधे से अधिक 403 में से 207 जनप्रतिनिधियों पर संगीन मुकदमें दर्ज थे जिसमें सर्वाधिक संख्या 84 सपा विधायकों की थी। वैसे भी सपा के बारे में राजनीतिक विश्लेषकों की आम राय रही है कि जब वह सत्ता में होती है तो अराजकता बढ़ जाती है। याद होगा कि मुलायम सिंह ने राजनीति में अपराधियों की बढ़ती तादाद के मद्देनजर मैनपुरी में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘अपराधियों को राजनीतिक तंत्र से खदेड़ने की जरूरत है और चाहिए कि असमाजिक तत्वों को जगह न दें। इसकी शुरूआत में अपनी पार्टी से करने जा रहा हूं।’प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की यह चिंता काबिले तारिफ थी लेकिन खालिश भाषण साबित हुई। मौजूदा विधानसभा में उनकी पार्टी के 97विधायकों में से 48 यानी आधे असमाजिक और आपरधिक टैग वाले हैं।

राजनीतिक सुचिता और शुद्धता पर सर्वाधिक शोर मचाने वाली पार्टी भाजपा के शाहाहाबाद क्षेत्र के विधायक कांशीराम दिवाकर पर बरेली के एक व्यापारी नरेंद्र सिंह ने हत्या और वसूली का मुकदमा दर्ज कराया है। प्रदेश में लगातार जनाधार खो रही भाजपा को आखिरकार अब आपराधिक राजनीति की वही राह चुननी पड़ी है,जिसका सिद्धांतों में ही सही वह विरोध करती रही है। इस बार विधानसभा में भाजपा के मात्र 50 विधायक ही पहुंच सकें हैं जिसमें से 19 अपराधियों की बिरादरी से आते हैं। अब कांग्रेस को देखें तो उत्तर  प्रदेश में उसके सबसे कम गुंडा विधायक हैं कि  सबसे कम 20 विधायक हैं।

प्रदेश की 403 सीटों वाली विधानसभा में 160 से उपर माफियाओं और अपराधियों की भागीदारी में जनता से जुड़े मुद्दे किस कदर हाशिये पर जाते हैं उसकी एक बानगी मौजूदा विधानसभा के चले सत्र को देखकर समझा जा सकता है। पूरे सत्र में एक सप्ताह भी सदन नहीं चला और न ही जनता से सीधे जुड़े किसी मसले पर चर्चा हो सकी। सवाल है कि जिस सत्र को कमसे कम साल में तीन महीने चलना चाहिए वह एक सप्ताह भी नहीं चलता है और विपक्ष इस पर विरोध की खानापूर्ति कर चुप्पी साध लेता है।


Apr 16, 2010

माओवादियों का गांधीवादी प्रयोग


अजय प्रकाश

यह अदभुत तो नहीं, आश्चर्यजनक जरूर है। साथ ही चिंतलनार में छह दर्जन से अधिक सुरक्षाबलों की हत्या के बाद यह खबर सुकून देने वाली है। सुनने में थोड़ा अटपटा लग सकता है कि माओवादियों ने गांधीवादी प्रयोग शुरू कर दिये हैं, पर यह सच है। यह उतना बड़ा सच है जितना कि चिंतलनार हमले से पहले माओवादियों ने आसपास के दस गांवों का सर्वे किया था और पाया कि महीने दिन के भीतर वहां 70 से अधिक महिलाओं का सुरक्षाबलों ने बलात्कार किया और गांव के गांव फूंक डाले।
ऑपरेशन ग्रीन हंट :  पहले यहाँ आदिवासी घर था

माओवादियों के नेता गुड्सा उसेंडी के इस बयान को लिखने के साथ ही हो सकता है कि मैं ‘खूनी दरिंदों’ का हमसफर मान लिया जाऊं। हो सकता है उन 70 महिलाओं के साथ हुई हिंसा को माओवादी दुष्प्रचार मान लिया जाये। ठीक उसी तरह जिस तरह से पिछले नवंबर से लेकर अब तक 107 हत्याओं की लिस्ट लेकर घूम रहे आदिवासियों की दिल्ली से लेकर दंतेवाड़ा तक कोई सुनने वाला नहीं है। वे अभी-अभी दिल्ली स्थित कांस्टिच्यूशन क्लब में ‘इंडिपेंडेंट पीपुल्स ट्रिब्यूनल’ की तीनदिनी बैठक में दंतेवाड़ा का हालात बताने आये भी थे। मगर उनको चिंता यह सताये जा रही थी कि यहां से जाने के बाद दंतेवाड़ा से अपने गांव सकुशल पहुंच पायेंगे कि नहीं।

अब मूल मुद्दे पर आयें तो सुरक्षा बलों के मुकाबले में भारी जान-माल गंवा रहे माओवादी और उनकी समर्थक जनता ने झारखंड में संघर्ष का एक नया प्रयोग किया है। सरकार कि घोषणा के मुताबिक झारखंड के 22 में से अठारह जिले माओवाद प्रभावित हैं। प्रभावित जिलों में से एक खूंटी है। बाकी जिलों की तरह वहां भी केंद्र सरकार की मदद से राज्य सरकार आपरेशन ग्रीनहंट चला रही है। रांची से लगभग पचास किलोमीटर दूर जिले के अड़की थाना क्षेत्र में जब लोगों ने आपरेशन का हल्ला सुना तो, सुरक्षा बलों के अत्याचारों से बचने के लिए तरह-तरह के उपाय में जुट गये। उन्हीं में से चार गांवों के लोगों ने तय किया कि क्यों न जब तक आपरेशन हो तब तक हम थाने ही में रहें और जब सुरक्षा बल आपरेशन कर लौट आयें तो हम वापस गांव जायें।

फिर क्या था, इन गांवों के लोग इकठ्ठा होकर अपनी ढोर-डंगर, सामान और मुर्गे-मुर्गियां लेकर भोर में ही अड़की थाना परिसर पहुंच गये और वहां डेरा डाल लिया। पुलिस के लिए यह अचंभित करने वाला था। पुलिस अधिकारियों के पूछने पर लोगों ने बताया कि आज हमारे गांवों में आपरेशन ग्रीन हंट होना है इसलिए पहले ही हम लोग थाने आ गये। जो जांच-पड़ताल करनी है, जिन माओवादियों को पकड़ने हमारे गांव जाना है, यहीं पहचान कर लीजिए।

माओवादी इलाकों में चल रहे आपरेशन से त्रस्त जनता के बीच का यह सामान्य अनुभव है कि ग्रामीणों पर सुरक्षा बल माओवादी या समर्थक होने का आरोप लगाकर तरह-तरह के अत्याचार करते हैं। जिससे बचने के लिए लोग भागकर जंगलों में जाते हैं। वैसे में सुरक्षा बलों की निगाह किसी पर पड़ गयी तो गोली मार देते हैं, नहीं तो माओवादी बताकर प्रताड़ित करते हैं। कुछ नहीं मिलने पर गांव के गांव फंकने में भी वह नहीं हिचकते। जाहिर है यह अनुभव अड़की थाना क्षेत्र के उन ग्रामीणों का भी रहा होगा जो डेरा डाल चुके थे।

ग्रामीणों ने पुलिस वालों  को यह भी सुझाव दिया कि अगर आप लोगों को हम लोगों की बात में कोई फरेब नजर आता है तो, हमारे गांवों   में जांच कर आइये। जब तक आप लोग वापस नहीं आते, तब तक हम लोग यहीं थाने में ही रहेंगे। बस गांव वालों ने यह मांग रखी कि हमारे खाने-पीने का इंतजाम कर दिया जाये, जिससे सुरक्षा बल आराम से दो-चार दिन तक अभियान चला सके।

कल तक जो लोग सुरक्षा बलों के डर से भागे फिरते थे वे आज थाने में बेहद संतुष्ट होकर इत्मीनान से बैठे हुए थे, जबकि पुलिस की घिग्घी बंधी हुई थी कि कैसे वह लोगों को वापस गांवों में भेजे। आखिरकार बहुत समझाने-बुझाने और इस आश्वासन पर कि ‘आपके गांवों में कोई आपरेशन नहीं चलाया जायेगा’ ग्रामीण वापस अपने गांव लौटे। उस दिन ग्रामीणों के पास सुरक्षा बलों से मुकाबले के लिए हथियार तो नहीं थे, मगर उन्होंने जो संघर्ष का तरीका अख्तियार किया था, वह हमेशा ही हथियार की हर राजनीति पर भारी रहा है और रहेगा। अब देखना है कि सरकार  माओवादियों के इस  गांधीवादी   प्रयोग पर क्या प्रतिक्रिया करती है. 

                                                        

Apr 14, 2010

घरवाली नहीं, घरवालियों की जीत

अजय प्रकाश

हरियाणा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब एक अदालती फैसले ने जातीय पंचायतों की चूलें हिला दी हैं। फैसला करोड़ा गांव की बनवाला खाप पंचायत मामले में आया है जो हरियाणा की उन 47 पंचायतों में से एक है जो गोत्र, गांव और बिरादरी की शुद्धता को बरकरार रखना लोकतंत्र में पहली और अंतिम जिम्मेदारी मानती हैं। इन पंचायतों की चाहतों और फरमानों से अलग जिस किसी ने भी जिंदगी की दीगर राह चुनी, उनकी चौधरियों ने परिवार पर जोर डालकर या तो हत्या करा दी, परिवार समेत बेदखल कर किया या फिर उन्हें ताजिंदगी भटकने को मजबूर कर दिया। लेकिन यह पहली बार हुआ है जब पंचायत में शरीक रहे हत्यारों को फांसी और उम्रकैद की सजा हुई है। महत्वपूर्ण यह भी है कि सजा दिलाने वाला कोई चौधरी नहीं, एक चौधरी की  घरवाली है.


यह मामला कैथल जिले के करोड़ा गांव का है जहां मनोज और बबली का घर था और पंचायत ने उनकी शादी के बाद हत्या कर दी थी। गांव के खाप समर्थक जाट जो शादियों में गोत्र की शुद्धता के मामले में सीना तानकर ‘खाप कहे सो अंतिम सै’, कहा करते थे वे 30 मार्च को हुए अदालती फैसले के बाद यह कहने में ही भलाई समझ रहे हैं कि जिसने जैसा किया है, वैसा भुगतेगा। 64 सुनवाईयों और 41 गवाहों के बयानों के मद्देनजर दोषियों में पांच को फांसी की सजा हुई है जिनमें बबली के भाई सुरेश, चाचा राजिंदर, मामा बारूराम, मामा के दो बेटे गुरुदेव और सतीश शामिल हैं। वहीं कांग्रेस नेता गंगाराज जो कि खाप के प्रमुख और दबंग सदस्य थे, को उम्रकैद और अपहरण करने वाली गाड़ी के चालक संदीप को सात साल की सजा मुकर्रर हुई है। चंडीगढ़ उच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील राजीव गोदारा कहते हैं कि ‘इस ऐतिहासिक फैसले पर समाज की चुप्पी ने साबित कर दिया कि हरियाणवी लोग भी आधुनिक मूल्यों को स्वीकारने को तैयार है। जो लोग भी खापों की ताकत को बढ़ाचढ़ाकर आंकते थे, उनकी आंखें खुलेंगी।’

इस मामले में खास बात यह है कि हत्यारों को चुनौती देने का साहस किसी और ने नहीं, बल्कि मनोज की विधवा मां चंद्रपति ने किया। बबली के परिवार वालों पर हत्या का मुकदमा दर्ज होने के बाद कई दफा पंचायत वाले चंद्रपति के दरवाजे चढ़कर आये कि पैसे लेकर समझौता कर लो। मगर बेटे-बहू को गंवा चुकी मां अड़ी रही कि हमारा हर समझौता दोषियों की सजा मुकर्रर किये जाने के साथ ही पूरा होता है। विधवा मां के इस साहसिक बयान पर समाज ऐंठा तो बहुत, लेकिन कानूनी डर से अगली हत्या का दुस्साहस न कर सका। मनोज के भागने के दिन से ही सामाजिक बहिष्कार झेल रहे उसके परिवार वालों पर गांव ने और कड़ाई कर दी ताकि वे हिम्मत हारकर मुकदमा वापस ले लें। चंद्रपति हत्या के अगले दिन 16 जून से घोषित सामाजिक बहिष्कार के दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि ‘हमारे बच्चों की हत्या के बाद गांव का दूकानदार समान नहीं देता था, टेंपो वाले नहीं बैठाते थे, माचिस के लिए भी यहां से दूर बाजार जाना पड़ता था। जब भैंस के लिए चारा तक नहीं मिला तो हमने उसे भूसा खिलाकर जिंदा रखा।’ हरियाणा में चंद्रपति अकेली नहीं हैं जिन्होंने समाज का ऐसा रवैया भुगता। पंचायती इच्छा के विरूद्ध जाने पर यह रिवाज यहां बड़ी आम है।


चंद्रपति का परिवार आज भी अघोषित बहिष्कार भुगत रहा है। पिछले तीन वर्षों से किसी पड़ोसी का उनके यहां आना-जाना नहीं है। दस घरों की पट्टीदारी से लेकर रिश्तेदारों तक ने कभी उनके घर झांकने की जहमत नहीं उठायी। इतना ही नहीं, बेटे की हत्या के बाद मातम में डूबे इस परिवार से मेलजोल करने वालों पर पंचायत ने 25 हजार जुर्माना करने का भी फरमान सुना दिया। चंद्रपति से यह पूछने पर कि इस माहौल में आपको डर नहीं लगता, वे कहती हैं, ‘अब मैं क्यों डरूं, डरने के दिन तो हत्यारों  और उनके हिमायतियों के आये हैं। जब मेरे साथ कोई नहीं था, तब मैंने हार नहीं मानी, आज मेरे साथ मीडिया और अदालत दोनों खड़े हैं।’ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि औरत को घरवाली और गोबरवाली से अधिक की औकात न देने वाले उस जाट समाज को चंद्रपति ने संविधान और कानून का रास्ता दिखाया है, जो अपने क्रूर अमानवीय फैसलों का महिमामंडन करता है और उसे परंपरा का हिस्सा मानता है।

एक ही गांव, गोत्र और जाति के होने के नाते तीन साल पहले स्थानीय थाने की मिलीभगत से बबली के परिवार वालों ने उसे और उसके पति मनोज को बस से खींचकर गांव के खेत में हुई पंचायत के बाद 15 जून की रात को मार डाला था। इसी तारीख को यह जोड़ा कैथल अदालत में बयान दर्ज कराने आया था। बयान की जरूरत इसलिए पड़ी कि लड़की पक्ष वालों ने राजौन थाने में लड़के के घर वालों पर अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया था। चंद्रपति रोते हुए कहती हैं, ‘मनोज-बबली की शादी से पहले मैं बबली की मां से मिली कि इन दोनों की खुशी इसी में है तो शादी कर देते हैं। लेकिन उसने मुझे अपने घर से दुत्कार कर भगा दिया था कि ‘अब फैसला तो पंचायत ही करेगी।’ उधर जिंदगी साथ गुजारने की अंतिम इच्छा लिए मनोज-बबली भागकर चंडीगढ़ के एक मंदिर में 7 अप्रैल को शादी कर चुके थे। शादी की खबर फैलते ही पंचायती चैधरियों के बढ़ते दबाव के खौफ में उन्होंने सुरक्षा के लिए अदालत में अर्जी लगायी जिस पर कोर्ट ने नवविवाहित युगल और मनोज के परिवार वालों को सुरक्षा देने का आदेश दिया था।

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) की जनवादी महिला समिति की हरियाणा इकाई की सचिव जगमति सांगवान और नौजवान सभा की मदद से हत्यारों को सजा दिलाने में चंद्रपति अंततः सफल रही, लेकिन इसके लिए अदालतों और थानों के इतने चक्कर लगाने पड़े कि उसे हर बात तारीख और दिन के साथ याद है। उसे याद है कि पचीस हजार आबादी वाले इस गांव में सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में जब उन्हें मार डाला गया तो किसी एक का भी दिल नहीं पसीजा। किसी ने यह बताने की हिम्मत नहीं की थी कि वे मार डाले गये। मनोज-बबली के मरने की जानकारी एक नहीं, पूरे पंद्रह रोज बाद 30 जून को मिली जब हिसार जिले के नारनौंद नहर में दो लाश मिलने की खबर चंद्रपति तक पहुंची। लेकिन जब तक चंद्रपति, बेटी सीमा और बहन के बेटे नरेंद्र के साथ थाने पहुंची, पुलिस वाले लावारिश लाशें बताकर जला चुके थे और शिनाख्त के लिए उन्हें थाने में बहू के गहने और बेटे का शर्ट दिया गया।

हत्यारों के सजायाफ्ता होने के बाद से हरियाणा ही नहीं, देश भर से बर्बर खापों के समर्थक लगातार इस फिराक में लगे हुए हैं कि कैसे अपराधियों की कानूनी-सामाजिक मदद की जाये। इसके लिए राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर के  खाप प्रतिनिधि लगातार हरियाणा के अलग-अलग जिलों में हो रही खाप महापंचायतों  में लगातार पहुँच रहे हैं. लेकिन ऐसा पहली बार है कि प्रतिनिधि जुटाये नहीं जुट रहे हैं।

मनोज के परिवार के वकील लाल बहादुर कहते हैं ‘पंचायत फैसला चाहे जो ले, मगर जो काम पुलिस, जनप्रतिनिधि नहीं कर पाये वह अदालत ने करके चौधरियों को बता दिया कि उन्हें लोकतंत्र में वैयक्तिक स्वतंत्रता की इज्जत करना सीखना पड़ेगा।’ दूसरी तरफ देखें तो पंचायत चौधरियों के इशारों पर हो रही हत्याओं में अभी कोई कमी आयी है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन अदालत के फैसले से उम्मीद जरूर बंधती हैं जब करोड़ा गांव के खाप समर्थक बुजुर्ग हेर सिंह हमारे पीछे-पीछे दौड़कर सिर्फ यह बताने आते हैं कि ‘मेरा नाम न छापना, मैं उस पंचायत में नहीं था।’


द पब्लिक एजेंडा  में प्रकाशित रिपोर्ट का सम्पादित अंश