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Jun 25, 2011

राष्ट्रपति से माओवादियों के कुछ सवाल जवाब

छत्तीसगढ़ की विधानसभा को सम्बोधित करते हुए 24 जून को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने माओवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने को कहा . राष्ट्रपति की इस अपील पर माओवादी क्या और क्यों  सोचते हैं, उस पूरे तर्कशास्त्र  को रखती  माओवादियों की ओर से  जारी प्रेस विज्ञप्ति ...


रायपुर प्रवास के दौरान राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने आज, यानी 24 जून 2011 को हमारे सामने यह प्रस्ताव रखा है कि 'माओवादी हिंसा छोड़कर बातचीत के लिए आगे आएं और मुख्यधारा से जुड़ जाएं ताकि आदिवासियों के विकास में शामिल हुआ जा सकें।' राष्ट्रपति का प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है जबकि भारतीय सेना के करीब एक हजार जवान बस्तर क्षेत्र के तीन जिलों में अपना पड़ाव डाल चुके हैं ताकि देश की निर्धनतम जनता पर जारी अन्यायपूर्ण युद्ध - ऑपरेशन गी्रनहंट में शिरकत कर सकें।

राष्ट्रपति ऐसे वक्त ‘वार्ता’ की बात कह रही हैं जबकि खनिज सम्पदा से भरपूर देश के कई इलाकों से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बाबत् सरकारों और कार्पोरेट कम्पनियों के बीच वार्ता के कई दौर पूरे हो चुके हैं और लाखों करोड़ रुपए के एमओयू पर दस्तखत किए जा चुके हैं। वे ‘वार्ता’ की बात तब कह रही हैं जबकि बस्तर क्षेत्र में 750 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र, जिसके दायरे में दर्जनों गांव और हजारों माड़िया आदिवासी आते हैं, सेना के हवाले करने का फैसला बिना किसी वार्ता के ही लिया जा चुका है।


देश की ये सर्वप्रथम महिला राष्ट्रपति हमें ऐसे समय हिंसा छोड़ने की हिदायत दे रही हैं जबकि इसी छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी छोर पर स्थित ताड़िमेट्ला, मोरपल्ली, पुलानपाड़ और तिम्मापुरम गांवों में सरकारी सशस्त्र बलों के हाथों बलात्कार और मारपीट की शिकार महिलाओं के शरीर पर हुए जख्म भरे ही नहीं। वे ऐसे समय हमें हिंसा त्यागने की बात कह रही हैं जबकि न सिर्फ इन गांवों में, बल्कि दण्डकारण्य, बिहार-झारखण्ड, ओड़िशा, महाराष्ट्र, आदि कई प्रदेशों में, खासकर माओवादी संघर्ष वाले इलाकों या आदिवासी इलाकों में सरकारी हिंसा रोजमर्रा की सच्चाई है।

दरअसल सरकारी हिंसा एक ऐसा बहुरूपिया है जो अलग-अलग समय में विभिन्न रूप धारण कर लेता है। जैसे कि अगर आज का ही उदाहरण लिया जाए, तो रातोंरात मिट्टी तेल पर 2 रुपए, डीजल पर 3 रुपए और रसोई गैस पर 50 रुपए का दाम बढ़ाकर गरीब व मध्यम तबकों की जनता की कमर तोड़ देने के रूप में भी होती है, जो पहले से महंगाई की मार से कराह रही थी। लेकिन राष्ट्रपति को इस ‘हिंसा’ से कोई एतराज नहीं!

भारत की यह प्रथम नागरिक हमें उस ‘मुख्यधारा’ में लौटने को कह रही हैं जिसमें कि उस तथाकथित मुख्यधारा के ‘महानायकों’ - घोटालेबाज मंत्रियों, नेताओं, कार्पोरेट दैत्यों और उनके दलालों के खिलाफ दिल्ली से लेकर गांव-कस्बों के गली-कूचों तक जनता थूं-थूं कर रही है। वो ऐसी ‘मुख्यधारा’ में हमें बुला रही हैं जिसमें मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं आदि के लिए अन्याय, अत्याचार और अपमान के अलावा कुछ नहीं बचा है।

प्रतिभा पाटिल हमें उस पृष्ठभूमि में वार्ता के लिए आमंत्रित कर रही हैं, जबकि ऐसी ही एक पेशकश पर हमारी पार्टी की प्रतिक्रिया सरकार के सामने रखने वाले हमारी पार्टी के प्रवक्ता और पोलिटब्यूरो सदस्य कॉमरेड आजाद की हत्या इसी सरकार ने एक फर्जी झड़प में की थी। इत्तेफाक से उनकी शहादत की सालगिरह ठीक एक हफ्ता बाद है, जबकि साल भर पहले करीब-करीब इन्हीं दिनों में चिदम्बरम और उनका हत्यारा खुफिया-पुलिस गिरोह उनकी हत्या की साजिश को अंतिम रूप दे रहे थे। कॉमरेड आजाद ने वार्ता पर हमारी पार्टी के दृष्टिकोण को साफ तौर पर देश-दुनिया के सामने रखा था और उसका जवाब उनकी हत्या करके दिया था आपकी क्रूर राज्यसत्ता ने। और उसके बाद भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पकड़कर जेलों में कैद करने का सिलसिला लगातार जारी रखा हुआ है।

60-70 साल पार कर चुके वयोवृद्ध माओवादी नेताओ को जेलों में न सिर्फ अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं, बल्कि उन्हें बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित रखकर प्रताड़ित किया जा रहा है। उन पर 10-10 या 15-15 राज्यों के झूठे केस लगाए जा रहे हैं, ताकि ताउम्र उन्हें जेल की कालकोठरियों में बंद रखा जा सके।

इसलिए देश की जनता से हमारा आग्रहपूर्वक निवेदन है कि - आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘शांति वार्ता’ की पेशकश करने से पहले उनकी सरकार जनता पर जारी युद्ध - ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद करे; बस्तर में सेना का ‘प्रशिक्षण’ बंद करे; और तमाम माओवाद-प्रभावित इलाकों से सेना व अर्धसैनिक बलों को वापस ले। अगर सरकार इसके लिए तैयार होती है तो दूसरे ही दिन से जनता की ओर से आत्मरक्षा में की जा रही जवाबी हिंसा थम जाएगी।

आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘विकास’ की बात करने से पहले उनकी सरकार कार्पोरेट घरानों और सरकारों के बीच हुए तमाम एमओयू रद्द करे। बलपूर्वक जमीन अधिग्रहण की सारी परियोजनाओं को फौरन रोके; उनकी सरकार यह मान ले कि जनता को ही यह तय करने का अधिकार होगा कि उसे किस किस्म का ‘विकास’ चाहिए।

आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘मुख्यधारा’ में जुड़ने की बात करने से पहले सरकार सभी घोटालेबाजों और भ्रष्टाचारियों को गिरफतार कर सजा दे। विदेशी बैंकों में मौजूद सारा काला धन वापस लाए। घोटालों और अवैध कमाई में लिप्त तमाम मंत्रियों और नेताओं को पदों से हटाकर सरेआम सजा दे।


सीपीआइ (माओवादी) के केन्द्रीय  कमेटी की यह विज्ञप्ति अभय के नाम से जारी हुई है, इसे यहाँ दखल की
दुनिया ब्लॉग से साभार प्रकाशित किया जा रहा है .

May 27, 2010

विकास का आतंक और दंडकारण्य की दास्ताँ


 हथियार बंद संघर्ष और हथियार बंद विकास की लड़ाई में आदिवासी संघर्षों का रास्ता आगे बढ़कर चुन रहे हैं। वे लड़ रहे हैं,इसलिए हमसे बेहतर जानते हैं कि जिंदगी संघर्षों के बीच कितनी दुर्गम होती है। आदिवासियों की भलाई को आतुर सरकार सलवा जुडूम शुरू  होने के एक साल बाद ही दण्डकारण्य के जंगलों में रहने वालों के साथ क्या कर रही थी,माओवादियों के सफाये में लगे हजारों की संख्या में सुरक्षाबल किस तरह वहां की जनता के बीच लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना कर रहे थे,इन पहलुओं की पड़ताल करती-  अजय प्रकाश की रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ में ‘सलवा जुडूम’ अभियान, आदिवासियों की व्यथा और नक्सली जीवन के सच से बावास्ता होने, हम जब रायपुर में अपने मिलने की जगह पर पहुंचे तो पहली बार लाल मिट्टी पैरों में लगी थी और उसी मिट्टी का जन्मा एक लाल ‘लाल सलाम’ बोला था। उसी ने कहा रायपुर में लाल सलाम बोलने वाला हर आदमी नक्सली है या सरकार की नजर में नक्सलियों का एजेंट है। इसलिए जो उनके बारे में लिखेगा, उनसे मिलेगा, साक्षात्कार लेगा वह ‘जन सुरक्षा अधिनियम’ के तहत छत्तीसगढ़ सरकार के जेलखाने में होगा।

पिरिया गाँव में आदिवासी परिवार:  उजडेगा तो स्टील गलेगा.  फोटो- अजय प्रकाश
मगर हम डिगे नहीं। कलम की नोक को संगीनों से टकराने चल पड़े। एक ठिगने कद का गोंड नौजवान जो थोड़ी-बहुत हिंदी जानता था उससे हमें पता चला कि रायपुर से हमारी मंजिल काफी दूर है। ग्यारह घंटे के रास्ते में ड्राइवर ने वह ढेर सारी जानकारियां हमें दे दीं जो किसी क्षेत्र की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति को जानने-समझने की बुनियादी शर्त होती है। हमारा ड्राइवर एक बुजुर्ग सरदार था जो क्षेत्र का चलता-फिरता इन्साइक्लोपीडिया था। उसने बताया कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का कहते हैं - राज्य के 32 प्रतिशत थाने नक्सल प्रभावित हैं। फिर खुश होते हुए कहा -‘अपन लोगों को नक्सली कभी नहीं छेड़ते। वे तो बांस,तेंदूपत्ता के ठेकेदारों से वसूली करते हैं। मगर उनका एक काम गड़बड़ है,सड़क नहीं बनाने देते। बारूदी सुरंग से उड़ा देते हैं। पुलिस वालों से तो उनकी दुश्मनी जन्मजात है। अपन,जहां आप लोगों को छोड़ेगा वहां तो एक पुलिस वाला भी नहीं दिखता। सिर्फ सीआईएसएफ। वैसे सीआईएसएफ भी क्या कर लेती है। इसी साल फरवरी महीने में सीईएसएफ के बैलाडिला कैंप पर हमला कर नक्सलियों ने हथियार लूट लिये और कई टन विस्फोटक साथ ले गये।’ हमारी गाड़ी दंतेवाड़ा की तरफ बढ़ी तो बीच में गीदम पुलिस चौकी  के पास हम चाय-पानी के लिए रुके. वहां ड्राइवर ने बताया कि दो महीने पहले इस थाने को नक्सलियों ने लूट लिया था।

अब रात के आठ बज रहे थे। बुजुर्ग सरदार हमें किरंदुल छोड़कर जा चुका था। किरंदुल जिसे बैलाडिला के नाम से भी लोग जानते हैं वहां हम एक रात और दिन रहे। रात में उतरने के साथ ही पहली निगाह छत्तीसगढ़ के समृधि का पर्याय कहे जाने वाले 'नेशनल मिनरल्स डेवेलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएमडीसी)'पर पड़ी जिसके बारे में कुछ बातें हमें सरदार ने भी  बताईं थीं। जैसे यह कंपनी जापान सरकार के मदद से बनी है और भारत में इससे बड़ा कोई खदान नहीं है। यह पूरा क्षेत्र आदिवासी है लेकिन एनएमडीसी में आदिवासियों को काम पर नहीं रखा जाता । कंपनी के बाहर माल ढोने के लिए ठेकेदार इनका इस्तेमाल बस कूली के रूप में करते हैं। कंपनी के कामगार बाहर से आते हैं।

एनएमडीसी  : आदिवासियों को काम नहीं
 गहराती रात की तेज हवाएं,मौसम में अचानक बढ़ी ठंड,सड़कों पर घूम रहे कुत्ते और गश्त लगा रही सीआईएसएफ की गाड़ियां, ये सब मिलकर दहशतनुमा माहौल रच रहे थे। रात कटी, दिन गुजरा और फिर रात को हम चल पड़े। हम अपनी मंजिल के नजदीक पहुंच रहे थे। मगर अब अगल-बगल गाड़ियां,बिजली के पोल, इमारतें नहीं थीं। पहाड़,नदियां,जंगलों का असीम फैला मैदान ही अपना था और हम उनके लिए बेगाने। सहसा जंगलों के पास पहुंची हमारी टीम को देखकर गांव में अफरातफरी मच गयी। लोग घरों को छोड़ जंगलों में भागने लगे तो हमारे ‘कुरियर’ने गोंडी में चिल्लाकर बताया कि यह पुलिस- एसपीओ के लोग नहीं हैं, सलवा जुडूम की सच्चाई जानने-समझने आये हैं।

इतना सुनने के बाद परछाइयां हम लोगों की तरफ बढ़ती दिखायी दीं। उन्होंने आगे बढ़कर हाथ मिलाया,लाल सलाम बोला और राहत की सांस ली। टॉर्च की मद्धिम पड़ रही रोशनी में भी उनके चेहरे पर उभरा सुकून किसी बीते भय की तरफ इशारा कर रहा था। बहरहाल,हम लंबी दूरी तय करने चल पड़े। जहां हम पहुंचे वह पुरनगिल था और नजदीक ही कहीं नदी के बहने की आवाज आ रही थी। कुशल-क्षेम होने के बाद ग्रामीण लकमा ने बताया कि स्कूल-अस्पताल तो इस इलाके में एक भी नहीं हैं। दसियों गांवों के बीच सड़क की तरफ कहीं-कहीं स्कूल हैं,लेकिन जब से सलवा जुडूम अभियान शुरू हुआ है तब से कोई मास्टर नहीं आया है। जुडूम वालों ने सुकलु नाम के एक शिक्षक की भी हत्या कर दी, जिसके बाद मास्टर आने से डरते हैं। हां, गंगकोट की तरफ एक आश्रम जरूर है जहां पांचवी कक्षा तक बच्चे पढ़ते हैं। दवा भी कभी-कभार सड़क की तरफ मिल जाती थी, लेकिन सालभर से वह भी बंद है। गंगलूर प्रखंड के पालनार गांव का नौजवान लक्खु 2001 से गांव में 4-14 वर्ष तक के बच्चों को पांचवीं कक्षा की शिक्षा दिया करता था,परंतु सलवा जुडूम गुंडों ने उसे इस कदर पीटा कि वह दुबारा बच्चों को पढ़ाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। दूसरा पढ़ने का विकल्प तोरका गांव का आश्रम था जिसे सलवा जुडूम ने तहस-नहस कर दिया।

दलम सदस्य: हर वक्त मुस्तैद.                         फोटो- अजय प्रकाश
रात के लगभग दस बजे हमें पता चला कि पत्रकारों की एक और टीम आयी है और थोड़ी दूरी पर ठहरी हुई है। हमारी टीम को इस बात की खुशी हुई कि चलो इस बियावान में अपनी बात समझने वाले कुछ लोग और आ गये हैं। थोड़ी देर की बातचीत के बाद हमें दाल-चावल खाने को मिला और जमीन पर झिल्लियों का बिस्तर बिछा दिया गया। गद्दों पर नींद लेने के आदी हम ‘शहरी मानुष’ सोने का प्रयास ही कर रहे थे कि कुत्ते तेज आवाज में भौंकने लगे। सामने से चार-पांच टॉर्च लाइटें आगे बढ़ती दिखीं। जब वे लोग झोपड़ियों के नजदीक पहुंचे तो कुत्ते दुम हिलाने लगे। उन्होंने हम सबको लाल सलाम किया। पांचों के कंधों पर बंदूकें लटकी हुई थीं। आते ही उन्होंने हमें एक चिट्ठी थमायी जो राज्य सचिव गणेश की थी। उस पत्र में कामरेड गणेश ने हमारा दण्डकारण्य के विशाल वन क्षेत्र में आने का स्वागत किया था और आगे लिखा था कि हम लोगों से उनकी मुलाकात अगले दिन संभव होगी। चिट्ठी लेकर आये चारों नौजवानों की बातचीत से पता चला कि वे दलम के सदस्य हैं। दलम यानी पार्टी का पूर्णकालिक हथियारबंद दस्ता, जिसे गुरिल्ला आर्मी के रूप में भी जाना जाता है। दलम ने बताया कि वे हमें अगली सुबह पांच बजे एक दूसरी जगह पर ले जायेंगे। हम लोगों को इन्हीं की सुरक्षा में चलना पड़ेगा।

अगले सफ़र से पहले : चूल्हा- चौकी में फर्क नहीं.                  फोटो- अजय प्रकाश
हमें पहाड़ों और जंगलों में चलने की आदत नहीं थी। इससे भी बढ़कर ये कि पैदल चलना सबसे अधिक भारी पड़ रहा था। हम पुरनगिल पांच घंटे पैदल चलकर पहुंचे थे। जब हमें यह पता चला कि पांच घंटे और चलकर मुख्य स्थान पर पहुंचना है तो हम पत्रकारों के पैरों की थकावट और बढ़ गयी। जहां हम पहुंचे वह क्षेत्र नक्सली आंदोलन के मुख्य आधार वाले इलाकों में से एक था। बावजूद उसके गुरिल्ले बेहद सतर्क थे और हथियारबंद जनमिलीशिया को पहरे पर लगा दिया गया था। बताया गया कि हर डेढ़ घंटे में ड्यूटी बदलती रहती है। सोमलु,जिसके घर पर हम रात को ठहरे उसने बताया कि यह सुरक्षा हम पुलिस से निपटने के लिए करते हैं। दूसरा यह कि आप लोग हमारे मेहमान हैं और उन चंद पत्रकारों में से हैं जिन्होंने तमाम खतरों को मोल लेते हुए यहां तक की दूरी तय की। इसलिए भी हमें सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना पड़ रहा है। भौगोलिक तौर पर समझने के लिए बताया गया कि बस्तर का यह दक्षिणी क्षेत्र है। बस्तर को उनकी पार्टी ने आधार इलाके खड़ा करने की दृष्टि से दो और इलाकों उत्तरी और पश्चिमी बस्तर में विभाजित किया है। खासकर 2001में संपन्न तत्कालीन पीडब्ल्यूजी की नौंवी कांग्रेस में दण्डकारण्य को आधार इलाके में तब्दील करने का कार्यभार अपनाये जाने के बाद से आंदोलन की रफ्तार और बढ़ गयी।

सुबह उठने में हम लोगों ने थोड़ी हिला-हवाली की। गुरिल्ले पांच बजे से पहले उठकर नित्य कर्म से निवृत हो हमें उठाने लगे। हम लोग भी साढ़े पांच बजे तक अपना-अपना किट लेकर चल पड़े। पुरनगिल गांव के ठीक पीछे कोटरी नदी मिली जो हमारे लिए अद्भुत थी। सुबह के शांत  माहौल में उसकी ध्वनि किसी हरकारे जैसी थी। दलम सदस्य शुकु  ने बताया कि यह नदी छह महीने गेरूए रंग की रहती है और छह महीने इसका पानी स्वच्छ रहता है, मगर ऐसा पिछले सात-आठ सालों से ही हो रहा है। ऐसा किस कंपनी की वजह से हो रहा है वह यह तो नहीं जानते, लेकिन इतना अवश्य जानते हैं कि यह नदी बैलाडिला के पहाड़ों की तरफ से आती है।

 एनएमडीसी  के  कचड़े से कोटरी नदी का रंग छह महीने लाल. फोटो- अजय प्रकाश  
हमने पहली चलायी में तीन छोटी नदियां पार कीं और चार घंटे में एकाध हाल्ट लेकर पीरिया गांव पहुंचे। दलम  ने बताया -'यह  गांव पांच किलोमीटर में फैला हुआ है । पहले यह नक्सलियों का सुरक्षित इलाका नहीं था। सलवा जुडूम अभियान के बाद यहाँ   आधार बना है।' साथ चलने वालों से पता चला कि रास्ते में पड़ने वाले सभी टोले और घर पीरिया गांव के तहत आते हैं। इस गांव के सरपंच को माओवादी पार्टी की जन अदालत ने गोली मारने का फैसला दिया था। गांव के ही मंगु ने अपनी टूटी-फूटी हिंदी में बताया कि वह सरपंच एसपीओ हो गया था और पुलिस की मुखबिरी करता था। उसने यह भी बताया कि सरपंच को पार्टी ने गलतियां सुधारने के तीन मौके दिये,मगर वह अपने आदतों से बाज नहीं आया और थोड़े से पैसे के लालच में तेरह घरों को जलवा दिया। उस घटना के बाद गांव के लोगों ने तय किया कि उसे गोली मार दी जाये। एसपीओ माने स्पेशन पुलिस अफसर। एसपीओ की खास बात यह है कि इनकी भर्ती आदिवासियों के ही बीच से होती है। इस समुदाय का मानना है कि यदि एसपीओ नहीं होते तो सीआरपीएफ और नगा बटालियन जंगलों के अंदर नहीं घुस पाते। सरकार ने सलवा जुडूम को सफल बनाने के लिए 3500लोगों को एसपीओ बनाया जिसके बदले उन्हें 1500 रुपये महीने दिये जाते हैं।

इसी गांव के दसवीं पास बुद्धराम के अनुसार पैसे का लालच आदिवासियों को एक दूसरे के खिलाफ भड़का रहा है। यह अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’जैसा है। जब सरकार को अपने तमाम प्रयासों से साफ हो गया कि वह नक्सली आधार को नेस्तनाबूद नहीं कर पायेगी तो छत्तीसगढ़ सरकार ने इजरायली सरकार की तर्ज पर ‘सलवा जुडूम’ का गठन किया। छत्तीगढ़ के बस्तर इलाके में सलवा जुडूम अभियान का नेतृत्व कर रहे कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा ने इस तरह के जन जागरण अभियान पहले भी चलाये हैं। वर्ष 1991 और 1997 में जन जागरण के नाम पर चलाये गये इन अभियानों को कोई खास सफलता नहीं मिल पायी थी। सफलता तो इस बार भी हाथ नहीं लगी है,मगर इस बार के जन जागरण अभियान में जो बर्बरता आदिवासियों पर ढायी गयी वह ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है। ‘आपरेशन रक्षक’ और ‘आपरेशन ग्रीन हंट’के नाम से दमन अभियान चलाये गये। इसके साथ ही गांवों में ‘ग्राम सुरक्षा समिति’का निर्माण कर सरकार की ओर हथियार देने की भी घोषणा की गयी। दरअसल,एसपीओ का प्रयोग कश्मीर की तर्ज पर किया गया और दंतेवाड़ा में इसकी ट्रेनिंग भी दी गयी।

खाना खाती गुरिल्ला बुधिया और आराम करते कुछ पत्रकार
फोटो - अजय प्रकाश  
ये तमाम बातें करते हुए वे लोग हम लोगों को एक खुले मैदान में ले गये जहां एक साफ-सुथरी झोपड़ी में तीन-चार चारपाइयां बिछी हुई थीं। इस समय घड़ी ने दिन के ग्यारह बजा दिया था। वहां आधे दर्जन महिला दलम ने हमारा स्वागत किया। हमें विशेष व्यवस्था के तहत दूध की चाय पिलायी गयी। विशेष व्यवस्था इसलिए कि वे लोग लाल चाय ही पीते हैं। चाय पीने या खाना खाने के दौरान गिलासों और थालियों की समस्या को वे पत्तों के दोने से दूर करते थे। गांव वालों को छोड़ सबके लिए एक चीज समान थी,वह था गर्म पानी। चूंकि दलम सदस्य हमेशा क्षे़त्रों का भ्रमण करते,जन समस्याओं को निपटाते,पार्टी मीटिंगें करते हुए आगे बढ़ते रहते इसलिए उनके किट का अहम हिस्सा,गर्म पानी था। सभी दलम कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के पास फौजी किट मौजूद रहती है। किट में कुछ दवाएं, घड़ी, टॉर्च, एक खाली पाउच, दो बाई दो मीटर की एक पॉलीथीन और इन सबसे बढ़कर एक हथियार हमेशा साथ रहता है।

साये के माफिक संगीनें इन गुरिल्लों के साथ लगी रहती हैं,फिर  चाहे गुरिल्ला सो रहा हो या नित्य कर्म से निवृत ही क्यों न हो रहा हो। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सहज-स्वाभाविक जिंदगी बसर करने वाले इन आदिवासियों के बीच बीस से तीस हजार के आसपास गुरिल्ले हैं जिनकी सुबह और रात संगीनों के साये के बीच होती है।वैसेतोभारतीयकम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी),दण्डकारण्य इकाई   आदिवासी मजदूर किसान संगठन,आदिवासी महिला संगठन,दण्डकारण्य आदिवासी बाल संगठन,संघम आदि संगठनों के माध्यम से आम जनता के बीच व्यापक पैठ रखती है,लेकिन पार्टी को मजबूत बनाने और दीर्घकालिक लोकयुद्ध को जारी रखने में मिलीशिया, जनमिलीशिया और दलम का महत्वपूर्ण योगदान है। जहां डीकेएमएस,केएएमएस,बलल (बाल संगठन)जनता के बीच काम करने वाले जनसंगठन हैं,वहीं दलम जैसी शाखाएं पार्टी संगठन हैं। यह जानकारी हमें बुन्नू ने दी जो तीन साल पहले दलम से जुड़ा है। इसी बीच लक्की नाम की एक महिला कामरेड आकर बताती है कि दोपहर का भोजन तैयार हो चुका है। खाने पर जाते हुए महिला कामरेड बद्री से बातचीत के दौरान पता चला कि पीपुल्स वार का नाम बदल चुका है और भाकपा (माओवादी) हो गया है। पार्टी का नाम परिवर्तन 2004 के सितंबर माह में हुआ था जब पीपुल्स वार की एकता माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसीआई) से हुई थी।

कमांडर हरेराम:  ट्रेनिंग से पहले कुछ जरूरी निर्देश. फोटो- अजय प्रकाश
 इस एकता को सरकार ने नक्सलियों की सफलता के रूप में स्वीकारा था। हमारी बातचीत और आगे बढ़ पाती कि उसी वक्त सामने से गुरिल्ला का एक दल आता दिखायी दिया। उस दल में से दो लोगों के पास लाइट मशीनगन और एसएलआर थी। बंदूकों की चर्चा इसलिए कि हमने बंदूकों को ही देखकर नेता का अंदाजा लगाया। दल के बाकी लोग‘लाल सलाम’बोलकर हमसे अलग हो गये। सिर्फ वही दो लोग हम लोगों की तरफ बढ़े। उनमें एक पुरुष था जो ठिगने कद का दुबला-पतला गोरा गोंड आदिवासी था। वह भाकपा (माओवादी) का स्टेट सेक्रेटरी गणेश था, जिस पर सरकार ने पांच लाख का इनाम रखा है। दूसरी दलम सदस्य एक महिला थी जिसका परिचय डिवीजनल संयोजक के रूप में हुआ। उसके बाद गणेश से जो सवाल-जवाब का दौर शुरू हुआ वह रात के नौ बजे खत्म हो पाया। पार्टी की गतिविधियों की सामान्य चर्चा के बाद स्टेट सेक्रेटरी ने अपनी पूरी बातचीत ‘सलवा जुडूम’ अभियान जिसे वे सरकारी गुंडों का जुल्म नाम देते हैं,पर केंद्रित की। सलवा जुडूम शब्द  का गोंडी भाषा में संधि विच्छेद कर सचिव ने बताया कि इसका अर्थ ‘ठंडा शिकार’ होता है।

सेक्रेटरी की नजर में यह नक्सलियों के खिलाफ चलाया गया पहला सरकारी अभियान नहीं है। गणेश बताते हैं कि माओवादी संगठनों के पचीस साल के राजनीतिक सफर में (एकता से पहले भी)अलग-अलग सरकारों ने केंद्र सरकार की मदद से दर्जनों बार दमन अभियान चलाये हैं। नीजि सेनाओं का गठन,जनता के एक तबके को राज्य प्रायोजित हिंसा से जुड़ने के लिए बाध्य करना,माओवादियों के खिलाफ खड़ा कर देना और एक बड़ा झूठ गढ़ना कि आदिवासी खुद ही माओवादियों के खिलाफ खड़े हो गये हैं जैसे कई अभियान हमें उखाड़ फेंकने के लिए सरकार ने सिलसिलेवार सत्ता ने प्रायोजित किये। दण्डकारण्य में ‘जन जागरण’ अथवा ‘सलवा जुडूम’ के नाम से, झारखण्ड में ‘संदेश’ कहकर, महाराष्ट्र में ‘गांवबंदी’ का नाम देकर, उड़ीसा में ‘शांति सेना’ के नाम पर नक्सली दमन की योजना अमल में लायी गयी। इतना ही नहीं, आंध्र प्रदेश में ‘कोबरा’ तथा ‘टाइगर्स’ के नाम से निजी हथियारबंद गिरोहों का भी गठन किया गया है।

राज्य सचिव गणेश: अपना पक्ष  रखते हुए. फोटो- अजय प्रकाश
सेक्रेटरी के मुताबिक सरकार ने दण्डकारण्य में जो जुल्मी अभियान छेड़ा है उसके पीछे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबाव तथा स्थानीय सामंती ताकतों की पैरोकारी रही है। मई 2005में हुई मुख्यमंत्री रमन सिंह की कनाडा और अमेरिका यात्रा के मद्देनजर भी समझा जा सकता है क्योंकि ‘सलवा जुडूम’ने अपना पहला निशाना पांच जून और दूसरा 18जून को साधा। इसके बाद जो तांडव भैरमगढ़, बीजापुर, उसर वमेत कई और विकासखंडों में हुआ वह अभूतपूर्व था। ‘सलवा जुडूम’के शुरू  होने के बाद से बस्तर में हिंसा और प्रतिहिंसा का सिलसिला जारी है। इसने सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों को उनके रैन-बसेरों से उजाड़कर सड़क पर पटक दिया है। जिन गांवों की तरफ नगा बटालियन और सीआरपीएफ के जवान जाते,उन रास्तों में पड़ने वाले सारे गांव जनविहीन हो जाते,लेकिन जिन गांवों पर चोरी से हमला बोल दिया जाता है वे लोग बलि का बकरा बन जाते हैं। 28अगस्त को नगा बटालियन ने अरियल (चेरली)गांव में हमला बोल दस लोगों को खड़ा कर गोली मार दी जिसमें दस साल का एक बच्चा भी शामिल था।

हमारे सफर का अगला पड़ाव गांव मूकाबेल्ली था। इस गांव में दो महिलाओं का बलात्कार किया गया और एक गर्भवती के पेट को चीर डाला। गंगलुर क्षेत्र के सीपीआई (माओवादी)एरिया कमांडर संतोष ने बताया कि सरकारी गुंडों ने महिलाओं पर अत्याचार और बच्चों की हत्या को अपने अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाया है। इसी क्षेत्र के कर्रेमाका गांव में आदिवासी महिला संगठन की सक्रिय कार्यकर्ता सरिता के साथ 15अगस्त 2005 को नगा पुलिस और सलवा जुडूम के गुंडों ने सामूहिक बलात्कार किया। इसके बाद खून से लथपथ सरिता को भैरमगढ़ थाने ले गये और यातनायें देते रहे। ऐसी घटनाओं की पूरी फेहरिस्त है जो दिल दहला देने वाली है। एक अनुमान के मुताबिक पिछले एक वर्ष में कम से कम डेढ़ सौ महिलाओं के साथ सलवा जुडूम अभियान से जुड़े लोगों ने बलात्कार किया। औरतों पर ढाये गये जुल्मों की सबसे अधिक शिकार आदिवासी महिला संगठन की कार्यकर्ता हुईं।

एसपीओ ने किया बलात्कार
मगर दिलचस्प तथ्य यह है कि नक्सलियों को जड़मूल से समाप्त करने के लिए आयी फौजें उनके मात्र दो दलम कार्यकर्ताओं को मार पायीं। डिवीजनल संयोजक निर्मला बेहिचक स्वीकार करती हैं कि माओवादी पार्टी को इस जुल्मी अभियान से कुछ खास नुकसान नहीं हुआ है। बड़ा नुकसान जनता का हुआ है जो जंगलों की ओर भागकर खूंखार जानवरों के बीच रहने के लिए मजबूर है। निर्मला कहती है कि सलवा जुडूम अभियान से हमारी ताकत दुगुनी से ज्यादा बढ़ी है,जबकि इस तथाकथित जनजागरण अभियान से आतंकित हो 600 गांवों के 50 हजार आदिवासी अपने आशियानों को छोड़कर भागने के लिए मजबूर हुए। अभी भी लगभग एक हजार आदिवासी राज्य की विभिन्न जेलों में बंद हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि एक भी पुलिसिया जवान के खिलाफ किसी भी थाने में मुकदमा दर्ज नहीं किया गया है। जो आदिवासी कुछ महीनों तक हमारे प्रति उदासीन रहते थे अब उनमें से हजारों की तादाद में हमारे तमाम जनसंगठनों में सक्रिय भूमिकाएं निभा रहे हैं। जहां अभी हम प्लाटून बना रहे थे,वहीं सलवा जुडूम के बाद हमने अब मिलिट्री कंपनियां खड़ी कर ली हैं। स्थानीय युवक सुराजा ने बताया कि जब से पार्टी (नक्सली) आयी है तब से कोई न तो भूखा मरता है और न ही किसी लड़की की इच्छा के बगैर शादी  होती है। यह दो बातें आदिवासी जनता के लिए विशेष महत्व की हैं। कबीलाई सभ्यता से धीरे-धीरे ऊपर उठ रहे आदिवासियों में पटेल,सरपंच जमींदारों जैसी स्थिति में हैं। लेकिन जिन इलाकों में माओवादी हैं वहां उन्होंने जमीनों का वितरण पारिवारिक जरूरत और परिवार में मौजूद सदस्यों के आधार पर कर दिया है।

हथियार बंद संघर्ष: क्या बदलेगा समाज.          फोटो- अजय प्रकाश
 इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण चीज है,कैंपों की जिंदगी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कैंपों में पैंतालीस हजार शरणार्थी रह रहे हैं। हालाँकि  भैरमगढ़ इलाके के माओवादी एरिया कमांडर हरेराम मानते हैं कि अब सिर्फ शिविरों में चार हजार लोग बचे हैं। उसमें बड़ी संख्या उनकी है जो पुलिस के मुखबिर हैं या जनविरोधी लोग। हिंसा के शुरूरुआती महीनों में पुलिस बल जबर्दस्ती लोगों को शिविरों में ले गये और लोगों को बंदियों के माफिक रखा। कारण कि वहां से मीडिया को बताना था कि यह जनता माओवादियों के जुल्मों से तंग आकर शिविरों में रह रही है। इसका फायदा सरकारों को मिला भी। मीडिया ने मौका मुआयना किये बगैर ही सरकारी जानकारी को छापा। अब तक हजारों लोग कैंप से भागकर वापस गांवों में आ गये हैं। इतना ही नहीं,कुल एसपीओ में से 50अपने गांवों में वापस आ गये हैं। भैरमगढ़ ब्लॉक के एक राहत शिविर से भागकर आयी सुबकी ने बताया कि उसकी वहां जबरन ‘शादी  कर दी गयी और कई दिनों तक उसके तथाकथित पति ने बलात्कार किया।

घर से किलोमीटर दूर, सलवा जुडूम कैम्पों में रहने को मजबूर  
 सावनार,पालनार गांवों के सैकड़ों लोग जो कि अपनी आपबीती सुनाने के लिए आये थे,उनके अनुभवों से स्पष्ट हो गया कि राहत शिविरों की जिंदगी बदतर है। वहीं जो सरपंच,पटेल या पार्टियों के नेता शिविरों का नेतृत्व कर रहे हैं, मालामाल हुए हैं।गुदमा,जांगला,भाटवाड़ा, बैरंगढ़, बादेली, पिंडकोंडा, मिप्तुल, करडेली, वंगा आदि गांवों में राहत शिविर बनाये गये हैं। बैरंगढ़ कैंप से भागकर आये लच्छु ने बताया कि एसपीओ ने गांव में घोषणा की है कि जो आदिवासी अपना गांव छोड़ शिविरों में नहीं आयेगा उनके घर जला दिये जायेंगे।

माओवादी कार्यकर्ता बुद्धराम के मुताबिक जनता को राहत शिविरों में रख सरकार ने हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। बाकायदा धमकी दी गयी कि यदि माओवादी फौजों पर हमला करेंगे तो फौजें शिविरों में रह रहे लोगों को भून डालेंगी।




('द संडे पोस्ट' में प्रकाशित रिपोर्ट का संपादित अंश)

May 7, 2010

आखिर चिदंबरम का क्या दोष

अजय प्रकाश

कुछ नेताओं, सुरक्षा विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों को छोड़ दें तो सरकार क्या यह नैतिक साहस कभी कर पायेगी कि मारे गये सुरक्षाबलों की जिम्मेदारी चिंदबरम पर सुनिश्चित करे ?

दंतेवाड़ा के चिंतलनार में मारे गये 76सुरक्षाबलों की जांच के लिए गृह मंत्रालय ने ईएन राममोहन कमेटी गठित की थी। बीएसएफ के पूर्व डीजी राममोहन के नेतृत्व में गठित यह कमेटी अप्रैल के अंतिम सप्ताह में सरकार को रिपोर्ट सौंप चुकी है। लेकिन जो जानकारियां आ चुकी थीं उससे अधिक के तथ्य कमेटी मुहैया नहीं करा सकी। लेकिन गृहमंत्रालय को कुछ तो करना है। सो मंत्रालय निचले स्तर के कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों पर कार्यवाही कर साल-दो साल में चिदंबरम के नेतृत्व में माओवादियों के सफाये का फिर एक बार दंभ भरेगा।

पी चिदंबरम :  काम से सीइओ और पद से गृहमंत्री 

इसके लिए माहौल भी बनना शुरू  हो गया है। जैसे सीआरपीएफ कर्मियों की जीवन स्थिति बदहाल है, रहने-खाने की उचित व्यवस्था नहीं है, जबकि अधिकारी मौज मारते हैं। साथ ही चिदंबरम छत्तीसगढ़ पुलिस के उच्चाधिकारियों पर एक के बाद एक तीखी टिप्पणियां लगातार कर रहे हैं, जो यूं ही नहीं हैं। हालांकि चिदंबरम के इन सवालों से हमारा कोई इनकार नहीं है। लेकिन इतने बड़े घटनाक्रम के बाद क्या सीधे नीति पर बात नहीं होनी चाहिए थी? उसी नीति पर जिसके परिणाम के तौर पर हम सुरक्षाबलों की मौत और आदिवासियों की तबाही से रोज दो-चार हो रहे हैं। साथ ही माओवादियों और उनके समर्थकों की गिरफ्तारियों और हत्याओं का भी सवाल है.  

तो  क्या चिदंबरम को इस बात का थोडा भी अहसास है कि मध्य भारत के इस हिस्से को वह अपनी साम्राज्यवादी  चाहत  और चन्द व्यावसायिक घरानों के  लिए कहाँ पहुँचाने जा रहे हैं.  हत्याओं के भरोसे  जंगलों में स्वराज लाने की चाहत से ओतप्रोत चिदंबरमवाद अगर जंगलों के भीतर सैन्य छावनी बना ले तो  संघर्ष रूक जायेगा ? अगर इस खामखयाली से गृहमंत्री नहीं उबर पाए हैं तो यह देश के लिए सदमा ही होगा. 
  
यह लड़ाई आदिवासिओं की है, वहां के वाशिंदों की है. कल को वहां माओवादी नहीं होंगे कोई और होगा. लेकिन लोग कभी नहीं स्वीकारेंगे कि विकास के बहाने तबाही की बुनियाद पर  दुनिया का कोई भी सत्ताधारी  उनका इस्तेमाल करे.न ही  अपने अंतिम समय तक वह यह स्वीकार कर पाएंगे कि सरकार सुरक्षा के नाम पर उन्हें अपने गावों-घरों से उजाड़कर कैम्पों में बसाये.अगर सरकार का रवैया यही  रहा तो, हो सकता है कि आदिवासी लड़ाके दो कदम पीछे हटें और मज़बूरन उन्हें जंगलों में भागना पड़े. मगर उसके बाद सैन्य छावनियों और वहां के वाशिंदों के  बीच जो युद्ध शुरू होगा वह भारतीय संघीय प्रणाली की चूलें हिला देगा.जिसका हल सरकार को फिर एक बार  बंदूकों में ही नज़र आएगा.

ऐसे में  प्रश्न है कि इन सवालों पर अभी खुलकर बात क्यों नहीं हो रही है, जबकि सुरक्षाबलों के घरों में मातम का माहौल  बिलकुल ताज़ा है. बात सुरक्षाबलों की बदहाली पर हो रही है। सेना,पुलिस और सुरक्षाबलों में भर्ष्टाचार का मामला न तो नायाब  है और न ही नया. नया है तो इतनी बड़ी संख्या में एक साथ मारे गए सुरक्षाबल. हालाँकि अगर यह सुरक्षाबल मारे नहीं गए होते तो माओवादियों  के बहाने आदिवासियों को मार कर आते.यानी एक बात सपष्ट है कि सरकार की नीतियों के चलते सुरक्षाबलों और स्थानीय लोगों के बीच का सम्बन्ध दुश्मनाना बन चुका है जिसका  लक्ष्य जीत हासिल करना है.

इन्हें पहचाने   : आदिवासी या माओवादी
मीडिया मैनेज में माहिर और मनोवैज्ञानिक युद्ध के महारथी चिदंबरम जानते हैं कि असल मुद्दे पर अगर जोर जारी रहा तो इस्तीफा देने का दिखावा जो उन्होंने पिछले दिनों किया था वह हकीकत में बदल जायेगा.वित्तमंत्री से गृहमंत्री बने पी चिदंबरम के बदलते बयानों को इकट्ठा कर लिया जाये तो यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि आदेश और आरोप ही उनकी काबीलियत का सार है। इस काबीलियत से तंग आकर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया ‘जबान संभाले’तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा ‘थम के बोलिये और काम से बरसिये।’रही बात झारखंड के मुख्यमंत्री शिबु सोरेन की तो उनके बारे में चिदंबरम साहब के अधिकारी ही माओवादियों के मामले में संदेह व्यक्त करने वाले बयान देते हैं। सरकार के इस रवैये पर समयांतर पत्रिका के संपादक पंकज बिष्ट कहते हैं, ‘गृहमंत्री और गृहसचिव जीके पिल्लई को कौन समझाये कि सरकार युद्ध की तारीख तो तय कर सकती है लेकिन खात्मे की नहीं। युद्ध की अमेरिकी रणनीति आजमा रही सरकार को इसका अनुभव तो अफगानिस्तान, वियतनाम और इराक से लेना चाहिए।’

माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी व्यवस्था अमल में लाने के लिए सफाया,कब्जा और निर्माण की अमेरिकी युद्ध नीति के तहत सरकार कार्यवाही कर रही है। चिंतलनार में मारे गये अर्धसैनिक  बल के 62वीं बटालियन के 75 सुरक्षाबल  समेत  ७६ जवान उसी नीति के तहत की जा रही कार्यवाही के दौरान माओवादियों और समर्थकों के हाथों मारे गये। ऐसी रणनीति का प्रयोग सरकार १९९० के दशक में उल्फा के सफाये के लिए उत्तर-पूर्व के राज्यों में कर चुकी है। इस युद्ध रणनीति के तहत सबसे पहले सुरक्षाबलों को अतिवादियों को मटियामेट कर एक निश्चित क्षेत्र में कब्जा करना होता है। जिसके बाद वहां फौजी नियंत्रण कायम कर सुरक्षाबल कब्जे के लिए आगे बढ़ते हैं। सफाये और कब्जे की लंबी प्रक्रिया के बाद सरकारी मशीनरी वहां निर्माण काम अपने हाथों में लेती है।

 छत्तीसगढ़ में मारे गये जवानों की हत्या के बाद पहली बार  है कि सत्ताधारी यूपीए की मुख्य पार्टी कांग्रेस के भीतर से कई बड़े नेताओं ने चिदंबरम की सफाया नीति का खुलकर विरोध किया है। कांग्रेस महासचिव दिग्वीजय सिंह ने तो बकायदा एक आर्थिक अंग्रेजी दैनिक में लंबे लेख के जरिये चिंतलनार समेत पूरी नीति को लेकर गृहमंत्री की समझ पर सवाल खड़े किये। इस सवाल का पुरजोर समर्थन वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री मणिशंकर ने इस टिप्पणी के साथ किया कि ‘दिग्वीजय एक लाख प्रतिशत सही कह रहे हैं।’सुरक्षा विशेषज्ञ अजय साहनी दो टूक मानते हैं कि ‘यह चिदंबरम की रणनीतिक गलती का परिणाम है। ऐसे अभियान केंद्र सरकार आधारित कर संचालित करने पर भविष्य में इससे भी बुरे परिणाम हो सकते हैं।’



Apr 16, 2010

माओवादियों का गांधीवादी प्रयोग


अजय प्रकाश

यह अदभुत तो नहीं, आश्चर्यजनक जरूर है। साथ ही चिंतलनार में छह दर्जन से अधिक सुरक्षाबलों की हत्या के बाद यह खबर सुकून देने वाली है। सुनने में थोड़ा अटपटा लग सकता है कि माओवादियों ने गांधीवादी प्रयोग शुरू कर दिये हैं, पर यह सच है। यह उतना बड़ा सच है जितना कि चिंतलनार हमले से पहले माओवादियों ने आसपास के दस गांवों का सर्वे किया था और पाया कि महीने दिन के भीतर वहां 70 से अधिक महिलाओं का सुरक्षाबलों ने बलात्कार किया और गांव के गांव फूंक डाले।
ऑपरेशन ग्रीन हंट :  पहले यहाँ आदिवासी घर था

माओवादियों के नेता गुड्सा उसेंडी के इस बयान को लिखने के साथ ही हो सकता है कि मैं ‘खूनी दरिंदों’ का हमसफर मान लिया जाऊं। हो सकता है उन 70 महिलाओं के साथ हुई हिंसा को माओवादी दुष्प्रचार मान लिया जाये। ठीक उसी तरह जिस तरह से पिछले नवंबर से लेकर अब तक 107 हत्याओं की लिस्ट लेकर घूम रहे आदिवासियों की दिल्ली से लेकर दंतेवाड़ा तक कोई सुनने वाला नहीं है। वे अभी-अभी दिल्ली स्थित कांस्टिच्यूशन क्लब में ‘इंडिपेंडेंट पीपुल्स ट्रिब्यूनल’ की तीनदिनी बैठक में दंतेवाड़ा का हालात बताने आये भी थे। मगर उनको चिंता यह सताये जा रही थी कि यहां से जाने के बाद दंतेवाड़ा से अपने गांव सकुशल पहुंच पायेंगे कि नहीं।

अब मूल मुद्दे पर आयें तो सुरक्षा बलों के मुकाबले में भारी जान-माल गंवा रहे माओवादी और उनकी समर्थक जनता ने झारखंड में संघर्ष का एक नया प्रयोग किया है। सरकार कि घोषणा के मुताबिक झारखंड के 22 में से अठारह जिले माओवाद प्रभावित हैं। प्रभावित जिलों में से एक खूंटी है। बाकी जिलों की तरह वहां भी केंद्र सरकार की मदद से राज्य सरकार आपरेशन ग्रीनहंट चला रही है। रांची से लगभग पचास किलोमीटर दूर जिले के अड़की थाना क्षेत्र में जब लोगों ने आपरेशन का हल्ला सुना तो, सुरक्षा बलों के अत्याचारों से बचने के लिए तरह-तरह के उपाय में जुट गये। उन्हीं में से चार गांवों के लोगों ने तय किया कि क्यों न जब तक आपरेशन हो तब तक हम थाने ही में रहें और जब सुरक्षा बल आपरेशन कर लौट आयें तो हम वापस गांव जायें।

फिर क्या था, इन गांवों के लोग इकठ्ठा होकर अपनी ढोर-डंगर, सामान और मुर्गे-मुर्गियां लेकर भोर में ही अड़की थाना परिसर पहुंच गये और वहां डेरा डाल लिया। पुलिस के लिए यह अचंभित करने वाला था। पुलिस अधिकारियों के पूछने पर लोगों ने बताया कि आज हमारे गांवों में आपरेशन ग्रीन हंट होना है इसलिए पहले ही हम लोग थाने आ गये। जो जांच-पड़ताल करनी है, जिन माओवादियों को पकड़ने हमारे गांव जाना है, यहीं पहचान कर लीजिए।

माओवादी इलाकों में चल रहे आपरेशन से त्रस्त जनता के बीच का यह सामान्य अनुभव है कि ग्रामीणों पर सुरक्षा बल माओवादी या समर्थक होने का आरोप लगाकर तरह-तरह के अत्याचार करते हैं। जिससे बचने के लिए लोग भागकर जंगलों में जाते हैं। वैसे में सुरक्षा बलों की निगाह किसी पर पड़ गयी तो गोली मार देते हैं, नहीं तो माओवादी बताकर प्रताड़ित करते हैं। कुछ नहीं मिलने पर गांव के गांव फंकने में भी वह नहीं हिचकते। जाहिर है यह अनुभव अड़की थाना क्षेत्र के उन ग्रामीणों का भी रहा होगा जो डेरा डाल चुके थे।

ग्रामीणों ने पुलिस वालों  को यह भी सुझाव दिया कि अगर आप लोगों को हम लोगों की बात में कोई फरेब नजर आता है तो, हमारे गांवों   में जांच कर आइये। जब तक आप लोग वापस नहीं आते, तब तक हम लोग यहीं थाने में ही रहेंगे। बस गांव वालों ने यह मांग रखी कि हमारे खाने-पीने का इंतजाम कर दिया जाये, जिससे सुरक्षा बल आराम से दो-चार दिन तक अभियान चला सके।

कल तक जो लोग सुरक्षा बलों के डर से भागे फिरते थे वे आज थाने में बेहद संतुष्ट होकर इत्मीनान से बैठे हुए थे, जबकि पुलिस की घिग्घी बंधी हुई थी कि कैसे वह लोगों को वापस गांवों में भेजे। आखिरकार बहुत समझाने-बुझाने और इस आश्वासन पर कि ‘आपके गांवों में कोई आपरेशन नहीं चलाया जायेगा’ ग्रामीण वापस अपने गांव लौटे। उस दिन ग्रामीणों के पास सुरक्षा बलों से मुकाबले के लिए हथियार तो नहीं थे, मगर उन्होंने जो संघर्ष का तरीका अख्तियार किया था, वह हमेशा ही हथियार की हर राजनीति पर भारी रहा है और रहेगा। अब देखना है कि सरकार  माओवादियों के इस  गांधीवादी   प्रयोग पर क्या प्रतिक्रिया करती है.