Showing posts with label chattisgarh. Show all posts
Showing posts with label chattisgarh. Show all posts

Mar 26, 2017

भाजपा सुशासन का एक सीन यह भी

तस्वीर में दिख रहे युवक 14 किलोमीटर दूर से कंधे पर एक मरीज को लादकर ईलाज कराने के लिए लाए हैं क्योंकि वहां सरकार एंबुलेंस की व्यवस्था नहीं कर सकती।

जी हां, भाजपा शासित छत्तीसगढ़ में फिर एक बार स्वास्थ्य व्यवस्था को तार—तार कर देने वाली तस्वीर सामने आई है। जन सुविधाओं के बड़े—बड़े वायदे करने वाली छत्तीसगढ़ सरकार की हालत यह है कि वह अपने राज्य की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी को स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मुहैया करा पा रही है।

आदिवासी बहुतायत वाले दंतेवाड़ा में आज 14 किलोमीटर पैदल चलकर एक मरीज के परिजन उसे अस्पताल लेकर पहुंचे। तस्वीरों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे  14 किलोमीटर दूर से  कंधे पर मरीज को लेकर लोग पहुंचे होंगे।


May 20, 2016

छत्तीसगढ़ में कलेक्टर ऐसे देता है पत्रकार को धमकी

जरा इस आॅडियो का सुनिए.
 https://soundcloud.com/janjwar/aud-20160520-wa00021
जगदलपुर कलेक्टर अमित कटारिया पत्रकार कमल शुक्ला को कैसे गालियां दे रहे हैं और मसल देने की धमकी दे रहे हैं। उन्हें मक्खी और दो—कौड़ी का बोल रहे हैं। जगदलपुर के वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ला कलेक्टर से बातचीत में उसी कार्यक्रम का हवाला दे रहे हैं जिसमें वह और उनके करीब दर्जन भर पत्रकार साथी हफ्ते पहले दिल्ली आए थे। इन पत्रकार साथियों का दिल्ली आने और जंतर—मंतर पर प्रदर्शन् करने का मकसद छत्तीसगढ़ सरकार और पुलिस द्वारा पत्रकारों पर की जा रही ज्यादती थी।

आॅडिया की पूरी बातचीत यहां पढ़ सकते हैं 

कलेकटर अमित कटारिया :-  हेलो
पत्रकार कमल शुक्ला:- हा सर नमस्कार में कमल शुक्ला बोल रहा हु ..
कलेकटर अमित कटारिया :- हा हा नमस्कार
पत्रकार कमल शुक्ला:- आपका पोस्ट देखा सर में कल वाला
कलेकटर अमित कटारिया :- हा हा ...
पत्रकार कमल शुक्ला:-उस समय भी आप एकदम से निर्णय ले लिये थे कि हमारा आंदोलन नक्सली प्रेरित है कर के ..और कल वाला पोस्ट देखा .. तो मेरे को समझ आ गया की सर क्या गंदा मानसिकता है आपका ..एकदम से आप ऐसा सोच लिये है की नक्सली लोग उनको बुला लेंगे..दिल्ली से ..JNU से की आप धमकाओ लोगो को ...
कलेकटर अमित कटारिया :-  क्या बोला तू ..क्या बोला तू
पत्रकार कमल शुक्ला:- तू तड़ाक क्यों बोल रहे है सर.
कलेकटर अमित कटारिया :- क्या बोला तू गन्दी मानसिकता ..तेरी इतनी हिम्मत दो कौड़ी का आदमी..साला तू किससे बात कर रहा है जानता है?इतनी हिम्मत हो गई साल तुझे मसल दूंगा..
पत्रकार कमल शुक्ला :- मसल दोगे न सर मसलने के लिए पैदा हुए है..
कलेकटर अमित कटारिया :-  चूजे,मच्छर, मक्खी है तू..
पत्रकार कमल शुक्ला :- हम तो मच्छर मक्खी पैदा होते है सर ..

Jul 19, 2011

क्यों हटाया गया विधिभंजन को !


(इस रचना के सभी पात्र और घटनाएँ काल्पनिक है इनका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से समानता मात्र संयोग है )


हिमांशु कुमार

एक राज्य था पच्चीसगढ़. उसका मुखिया था दमन सिंह. सेनापति का नाम था विधिभंजन. विधिभंजन राजा का मुंहलगा और अतिप्रिय था. वह राजा की खुशी के लिए राज्य के सुचारू संचालन हेतु बनाये गए सारे नियमों को तोड़ देता था. इसलिए राजा उसे बहुत पसंद करता था. एक बार राजा के दरबार में कुछ परदेसी व्यापारी आये.उन्होंने राजा को कीमती रत्न और माणिक भेंट किये और कहा की महाराज आपके राज्य के जंगलों में मिटटी के नीचे कुछ मूल्यवान धातुएं हैं.

अगर आप की कृपादृष्टी हो जाए तो हम लोग वो धातुएं खोद लेंगे और बदले में आपको कर भी दे देंगे. राजा ने उन व्यापारियों को ऐसा करने की अनुमति दे दी. व्यापारी अपने यन्त्र आदि लेकर जब धातुएं खोदने जंगल में पहुंचे तो देखा की जंगल में धातुओं के ऊपर तो जंगली लोग रहते हैं. विदेशी व्यापारियों ने राजा से कहा की क्या हम अपने देश से सेना लाकर इन जंगलियों को मार सकते हैं? राजा ने कहा कि नहीं इससे प्रजा में असंतोष फ़ैल जाएगा इसलिए आपका यह कार्य हमारी सेनाये कर देंगी. राजा ने सेनापति विधिभंजन को बुलाया और कहा की राज्य की सेना लेकर वन में जाओ और इन व्यापारियों के सुगम व्यवसाय हेतु वन में रहने वाले जंगलियों को उन धातुओं के ऊपर से हटा दो.

वैसे भी ये जंगली हमें ना तो कर देते हैं ना ये हमारी तरह सभ्य हैं.इनकी भाषा भी हमारे दरबार में कोई नहीं जानता. इन लोगों के साथ बातचीत भी करना मुश्किल है. इसलिए इन्हें इस राज्य से बाहर खदेड़ दो.सेनापति विधिभंजन ने अपनी सेनाओं की एक टुकड़ी को इन जंगलियों को वहां से खदेड़ने के लिए भेजा. जंगलियों ने अपनी शिकार करने की तकनीकों का प्रयोग करके सेनापति की सेना की टुकड़ी को मार गिराया.इस पर राजा ने क्रुद्ध होकर सेनापति को पूरी सेना लेकर इन जंगलियों के सफाए के लिए भेज दिया.

विधिभंजन स्वयं तो राजधानी में ही बैठा रहा और सैनिकों को जंगल में भेज दिया.सैनिकों ने कुछ जंगली युवकों को घेर कर पकड़ लिया और उनसे कहा की देखो तुमने हमारी सेना के कुछ सैनिकों को मार डाला है हम चाहें तो तुम्हें तत्काल मार सकते हैं, लेकिन अगर तुम हमारी मदद करोगे तो हम तुम्हें स्वर्ण मुद्राएँ भी देंगे.इसके अतिरिक्त तुम जंगलियों को लूट पाट कर जितना चाहो धन एकत्र कर लेना. जो भी तुम्हारे कृत्यों का विरोध करे उसका अथवा तुम जिसका चाहो वध भी कर सकोगे. राज्य तुम्हे इसके लिए कोई दंड नहीं देगा.

राज्य का दंड विधान तुम्हारे किसी भी अपराध पर लागू नही होगा. इसके उपरांत इन जंगली युवकों की मदद से विधिभंजन के सैनिको ने जंगलियों पर जोरदार हमला बोल दिया.राजा की सेना ने जंगलवासियों की झोपडीयों और बस्तियों में आग लगाना उनकी महिलाओं की अस्मत लूटना और और उनके घर का माल असबाब लूटना प्रारम्भ कर दिया.सैनिकों के इन अत्याचारों से बचने के लिए अनेकों जंगली लोगों ने अपनी बस्तियां छोड़ कर घने वनों में शरण ले ली. कुछ जंगली युवकों ने सैनिकों से लुटे हुए अस्त्र शस्त्रों की मदद से एक अपनी सशस्त्र टुकड़ी भी बना ली और घात लगा कर राजा के सैनिकों पर हमला करने लगे.

राजा ने एक कुटिल चाल खेली उसने नगर में रहने वाले नागरिकों से कहा की वन में रहने वाले ये जंगली लोग बगावत पर उतर आये हैं और स्वयं राजा बनने का सपना देख रहे हैं, इसलिए कोई भी सभ्य व्यक्ति इन वनों की तरफ नहीं जायेगा तथा इन जंगलियों के पक्ष में एक भी शब्द नहीं बोलेगा, अन्यथा ऐसे व्यक्ति को राजद्रोह का दंड मिलेगा. राज्य में एक एक वैद्य भी रहता था. उसका नाम था गजानन जेन. उसने इन जंगलियों और राजा के सैनिकों के बीच होने वाले युद्ध के विषय में सत्य जानने का निश्चय किया.वो अपने कुछ मित्रों के साथ राजा को सूचित किये बिना वन में गया. वहां उसने जंगलवासियों की जली हुई बस्तियां देखीं. उसने कुछ जंगलियों से बात भी की.

जंगलियों ने उस वैद्य को अपने ऊपर हुए अत्याचारों के विषय में बताया.वैद्य ने नगर में लौट कर एक बड़ी सभा बुलाई.उस सभा में वैद्य ने राजा को जंगलियों की दुर्दशा के लिए उत्तरदायी बताया और सेना को वनों में से वापिस बुलाने की मांग रखी. सभा में व्यापारियों के अनुचर और राजा के गुप्तचर भी उपस्थित थे.उन्होंने दरबार में जाकर राजा के कान भरे की ये वैद्य जंगली बागियों के साथ मिल कर आप का राज्य छीनने का षड़यंत्र कर रहा है.राजा ने तुरंत वैद्य को कारागार में डालने का आदेश दिया और उसे राजद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास का दंड दे दिया.

राजा का एक मंत्री था जिसका नाम था सनकी राम भंवर. उसका एक लम्पट पुत्र था. विदेशी व्यापारियों ने मंत्री व उसके पुत्र को स्वर्ण मुद्राओं और युवा कन्याओं के संसर्ग का प्रलोभन दिया. मंत्री और उसका पुत्र विदेशी व्यापारियों के व्यवसाय हेतु जंगलियो की भूमि कुटिल रीती से व्यापारियों के लिए षड़यंत्रपूर्वक हडपने लगा.मंत्री के पुत्र की इन गतिविधियों के विषय में सेनापति को सूचना मिली. सेनापति मन ही मन इस मंत्री के प्रति शत्रुता रखता था. उसे अपने पुराने शत्रु पर वार करने का अच्छा अवसर मिल गया.उसने अपने ही कुछ अनुचरों से कह कर मंत्री के पुत्र के विरुद्ध एक दंडनीय अपराध करने का प्रकरण बना कर मंत्री के उस पुत्र को कारागार में डालने का उपक्रम करने लगा.

मंत्री सनकी राम भंवर भी अति शक्तिशाली था .उसकी पहचान नाकपुर नगर में स्थित राजा के धर्मगुरु के आश्रम के पुरोहितों से भी थी.राजा के इस धर्मगुरु के आश्रम का नाम था "राजकीय सशत्र सेवक संघ". धर्मगुरु को जब अपने प्रिय शिष्य मंत्री सनकी राम भंवर के मुसीबत में पड़ने के विषय में पता चला तो तो उसने तत्काल राजा को सेनापती को पद से हटाने के लिए आदेश दिया. राजा सेनापती को हटाने का निर्णय लेने में भयभीत था,क्योंकि सेनापती को राजा की समस्त अनैतिक गतिविधियों की जानकारी थी.इसलिए राजा नहीं चाहता था की सेनापती राज्य छोड़ कर जाए. इसलिए राजा ने सेनापती को उसके पद से तो हटाया परन्तु उसे एक दूसरे लाभदायक पद पर नियुक्त कर दिया. ...क्रमश.


दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.




Jun 25, 2011

राष्ट्रपति से माओवादियों के कुछ सवाल जवाब

छत्तीसगढ़ की विधानसभा को सम्बोधित करते हुए 24 जून को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने माओवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने को कहा . राष्ट्रपति की इस अपील पर माओवादी क्या और क्यों  सोचते हैं, उस पूरे तर्कशास्त्र  को रखती  माओवादियों की ओर से  जारी प्रेस विज्ञप्ति ...


रायपुर प्रवास के दौरान राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने आज, यानी 24 जून 2011 को हमारे सामने यह प्रस्ताव रखा है कि 'माओवादी हिंसा छोड़कर बातचीत के लिए आगे आएं और मुख्यधारा से जुड़ जाएं ताकि आदिवासियों के विकास में शामिल हुआ जा सकें।' राष्ट्रपति का प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है जबकि भारतीय सेना के करीब एक हजार जवान बस्तर क्षेत्र के तीन जिलों में अपना पड़ाव डाल चुके हैं ताकि देश की निर्धनतम जनता पर जारी अन्यायपूर्ण युद्ध - ऑपरेशन गी्रनहंट में शिरकत कर सकें।

राष्ट्रपति ऐसे वक्त ‘वार्ता’ की बात कह रही हैं जबकि खनिज सम्पदा से भरपूर देश के कई इलाकों से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बाबत् सरकारों और कार्पोरेट कम्पनियों के बीच वार्ता के कई दौर पूरे हो चुके हैं और लाखों करोड़ रुपए के एमओयू पर दस्तखत किए जा चुके हैं। वे ‘वार्ता’ की बात तब कह रही हैं जबकि बस्तर क्षेत्र में 750 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र, जिसके दायरे में दर्जनों गांव और हजारों माड़िया आदिवासी आते हैं, सेना के हवाले करने का फैसला बिना किसी वार्ता के ही लिया जा चुका है।


देश की ये सर्वप्रथम महिला राष्ट्रपति हमें ऐसे समय हिंसा छोड़ने की हिदायत दे रही हैं जबकि इसी छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी छोर पर स्थित ताड़िमेट्ला, मोरपल्ली, पुलानपाड़ और तिम्मापुरम गांवों में सरकारी सशस्त्र बलों के हाथों बलात्कार और मारपीट की शिकार महिलाओं के शरीर पर हुए जख्म भरे ही नहीं। वे ऐसे समय हमें हिंसा त्यागने की बात कह रही हैं जबकि न सिर्फ इन गांवों में, बल्कि दण्डकारण्य, बिहार-झारखण्ड, ओड़िशा, महाराष्ट्र, आदि कई प्रदेशों में, खासकर माओवादी संघर्ष वाले इलाकों या आदिवासी इलाकों में सरकारी हिंसा रोजमर्रा की सच्चाई है।

दरअसल सरकारी हिंसा एक ऐसा बहुरूपिया है जो अलग-अलग समय में विभिन्न रूप धारण कर लेता है। जैसे कि अगर आज का ही उदाहरण लिया जाए, तो रातोंरात मिट्टी तेल पर 2 रुपए, डीजल पर 3 रुपए और रसोई गैस पर 50 रुपए का दाम बढ़ाकर गरीब व मध्यम तबकों की जनता की कमर तोड़ देने के रूप में भी होती है, जो पहले से महंगाई की मार से कराह रही थी। लेकिन राष्ट्रपति को इस ‘हिंसा’ से कोई एतराज नहीं!

भारत की यह प्रथम नागरिक हमें उस ‘मुख्यधारा’ में लौटने को कह रही हैं जिसमें कि उस तथाकथित मुख्यधारा के ‘महानायकों’ - घोटालेबाज मंत्रियों, नेताओं, कार्पोरेट दैत्यों और उनके दलालों के खिलाफ दिल्ली से लेकर गांव-कस्बों के गली-कूचों तक जनता थूं-थूं कर रही है। वो ऐसी ‘मुख्यधारा’ में हमें बुला रही हैं जिसमें मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं आदि के लिए अन्याय, अत्याचार और अपमान के अलावा कुछ नहीं बचा है।

प्रतिभा पाटिल हमें उस पृष्ठभूमि में वार्ता के लिए आमंत्रित कर रही हैं, जबकि ऐसी ही एक पेशकश पर हमारी पार्टी की प्रतिक्रिया सरकार के सामने रखने वाले हमारी पार्टी के प्रवक्ता और पोलिटब्यूरो सदस्य कॉमरेड आजाद की हत्या इसी सरकार ने एक फर्जी झड़प में की थी। इत्तेफाक से उनकी शहादत की सालगिरह ठीक एक हफ्ता बाद है, जबकि साल भर पहले करीब-करीब इन्हीं दिनों में चिदम्बरम और उनका हत्यारा खुफिया-पुलिस गिरोह उनकी हत्या की साजिश को अंतिम रूप दे रहे थे। कॉमरेड आजाद ने वार्ता पर हमारी पार्टी के दृष्टिकोण को साफ तौर पर देश-दुनिया के सामने रखा था और उसका जवाब उनकी हत्या करके दिया था आपकी क्रूर राज्यसत्ता ने। और उसके बाद भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पकड़कर जेलों में कैद करने का सिलसिला लगातार जारी रखा हुआ है।

60-70 साल पार कर चुके वयोवृद्ध माओवादी नेताओ को जेलों में न सिर्फ अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं, बल्कि उन्हें बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित रखकर प्रताड़ित किया जा रहा है। उन पर 10-10 या 15-15 राज्यों के झूठे केस लगाए जा रहे हैं, ताकि ताउम्र उन्हें जेल की कालकोठरियों में बंद रखा जा सके।

इसलिए देश की जनता से हमारा आग्रहपूर्वक निवेदन है कि - आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘शांति वार्ता’ की पेशकश करने से पहले उनकी सरकार जनता पर जारी युद्ध - ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद करे; बस्तर में सेना का ‘प्रशिक्षण’ बंद करे; और तमाम माओवाद-प्रभावित इलाकों से सेना व अर्धसैनिक बलों को वापस ले। अगर सरकार इसके लिए तैयार होती है तो दूसरे ही दिन से जनता की ओर से आत्मरक्षा में की जा रही जवाबी हिंसा थम जाएगी।

आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘विकास’ की बात करने से पहले उनकी सरकार कार्पोरेट घरानों और सरकारों के बीच हुए तमाम एमओयू रद्द करे। बलपूर्वक जमीन अधिग्रहण की सारी परियोजनाओं को फौरन रोके; उनकी सरकार यह मान ले कि जनता को ही यह तय करने का अधिकार होगा कि उसे किस किस्म का ‘विकास’ चाहिए।

आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘मुख्यधारा’ में जुड़ने की बात करने से पहले सरकार सभी घोटालेबाजों और भ्रष्टाचारियों को गिरफतार कर सजा दे। विदेशी बैंकों में मौजूद सारा काला धन वापस लाए। घोटालों और अवैध कमाई में लिप्त तमाम मंत्रियों और नेताओं को पदों से हटाकर सरेआम सजा दे।


सीपीआइ (माओवादी) के केन्द्रीय  कमेटी की यह विज्ञप्ति अभय के नाम से जारी हुई है, इसे यहाँ दखल की
दुनिया ब्लॉग से साभार प्रकाशित किया जा रहा है .