May 27, 2011

और दलित बध का सिलसिला कभी नहीं थमा


मैंने पत्रकारों द्वारा किये जा रहे इस कृत्य का विरोध किया, लेकिन मेरी ज़बान और कलम दोनों को रोक दिया गया। पत्रकारों और पुलिस के इस बेमेल गठजोड़ ने दो परिवारों के घरों की खुशियां चन्द मिनट में ही छीन लीं...  किस्त 2

सोनभद्र से विजय विनीत  

गौरतलब है कि यह घिनौना और नृंशस कार्य केवल पुलिस की ही उपज नहीं थी  । इसके लिये जिले के पत्रकारों के एक वर्ग ने पुरज़ोर तरीके से पुलिस का साथ दिया था। यह सच इस फैसले के बाद उजागर हुआ है। पुलिस अधीक्षक ने मुठभेड़ के पहले रेनुकूट के एक अतिथिगृह में कुछ पत्रकारों के साथ बैठक कर उनसे मुठभेड़ में इन दोनों युवकों को मारने के लिये सहयोग की अपील की थी। इनमें से कुछ पत्रकारों ने दोनों युवकों को गोली मारने की हामी भी भरी थी।

इस घटना का मैं खुद चश्मदीद गवाह हूं। मैंने पत्रकारों द्वारा किये जा रहे इस कृत्य का विरोध किया, लेकिन मेरी ज़बान और कलम दोनों को रोक दी गयी. पत्रकारों और पुलिस के इस बेमेल गठजोड़ ने दो परिवारों के घरों की खुशियां चन्द मिनट में ही छिन लीं। वह कलम जो अन्याय का विरोध करने की क्षमता रखती थी, स्वयं खूनी बन गयी। तब मुझे लगा था कि हमारे जैसे लोगों के हाथ में रहते हुए पहली बार कलम हार गयी थी। चाहकर भी किसी बड़े अखबार ने घटना की सच्चाई उजागर नहीं की थी। फिर भी पत्रकारों के इस घिनौने कृत्य को इलाहाबाद से छपने वाले एक साप्ताहिक अखबार ' न्यायाधीश' ने मेरी रिर्पोट को छापा।

यह पहली बार हुआ है कि रनटोला मामले में सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए इतने अहम फैसले के बाद मानवाधिकार संगठनों,  बुद्धिजीवियों,  प्रगतिशील समुदायों की तरफ से यह मांग उठाई जा रही है कि उन पत्रकारों को भी तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के साथ सह अभियुक्त बनाया जाये, जिन्होंने उस बैठक में हिस्सा लिया था जहां दो मासूमों की हत्या करने का फैसला हुआ। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक वर्तमान में सोनभद्र के पड़ोसी जिले मीरजापुर में तैनात है। मगर इस मुद्दे पर वह मीडिया से कोई बात नहीं करना चाहते।

मृतक प्रभात के पिता लल्लन श्रीवास्तव इस फैसले पर खुश हैं,लेकिन इसे वह आधी जीत बताते हैं। उनका कहना है कि जब तक तत्कालीन एसपी को सज़ा नहीं होगी तब तक वे चैन से नहीं बैंठेगे, न ही उनके बेटे की आत्मा को शांति मिलेगी। इस मुठभेड़ में दोषी अधिकारियों और पत्रकारों को सज़ा मिलने से लल्लन प्रसाद के बेटे की आत्मा को तो शांति मिलेगी, लेकिन जिले के ही   ऐसे सैकड़ों मां-बाप को कब शांति मिलेगी जिनके बच्चों को भी यहां की पुलिस ने बेरहमी से मुठभेड़ दिखा मौत के घाट उतार दिया।

रनटोला मुठभेड़ तो मात्र एक नमूना है सोनभद्र पुलिस के चाल, चलन और चरित्र का। इस इलाके में इस तरह की ऐसी पचासों मुठभेड़ें  हुई हैं, जिनमें  पुलिस ने दलितों और आदिवासियों  को गोलियों से भून डाला। यह हत्यायें अति नक्सल प्रभावित सोनभद्र,चन्दौली और मीरजापुर जिले में तथाकथित माओवादियों को मार गिराने के नाम पर हुई हैं। इन तीनों जिलों में आदिवासी -दलित काफी संख्या में हैं। एक समय में इन जंगलों पर जिन आदिवासियों का राज हुआ करता था,आज वही शोषण, उत्पीड़न के  शिकार हैं।

इस इलाके में जितनी संख्या दलित-आदिवासियों की है,उससे कहीं अधिक संख्या उनके उत्पीड़न, शोषण और अन्तहीन दुःख-दर्द की है। जब इस शोषण,उत्पीड़न और अपने हकों को लेकर दलित-आदिवासी अपनी आवाज़ बुलंद करने लगे तो उन्हें नक्सली करार देकर उनके तमाम हकों को छीनने और जनवादी ताकतो को समाप्त करने का काम किया गया।

पिछले एक दशक से इस समूचे आदिवासी इलाके में हजारों निरीह सत्तापोषित कुचक्र का शिकार बने हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ सरकारें बदलती रहीं, उनका नजरिया और कार्यप्रणाली एक जैसे रहे। प्रदेश की बागडोर भाजपा, सपा व बसपा के बीच हस्तांतरित होती रही। मुख्यमंत्री के रूप में रामराज की बात करने वाले राजनाथ सिंह,दलितों की शुभचिंतक मायावती और समाजवाद के पोषक मुलायम सिंह प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते रहे। मगर किसी भी सरकार के कार्यकाल में दलित बध का सिलसिला रूका नहीं।

इसके साथ ही अनेक परिवारों पर नक्सलियों का शरणदाता होने का आरोप लगा। किसी घर में अगर हथियारबन्द दस्ते के लोगों ने जबरिया घुसकर खाना खाया तो वह भी जेल गया। इन सरकारों के कार्यकाल में पुलिसिया कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं आया। जिसने पुलिस की मुखबिरी नहीं की, उसके परिवार की महिलाओं और लड़कियों  को नक्सली बताकर जेल भेजा गया। शायद सोनभद्र प्रदेश का पहला ऐसा जिला होगा,  जहाँ जनवादी तरीके से हक-हकूक की बात करने वाली महिलाओं पर रासुका और गैंगेस्टर की कार्यवाही हुई।

फर्जी मुठभेड़ों का यह सिलसिला वर्ष 2001 से शुरू हुआ। सोनभद्र पुलिस ने 21 जनवरी 2001 को पन्नूगंज थाना क्षेत्र के खदरा गांव से रामेश्वर नामक दलित युवक जो अपनी ससुराल आया था,को उठाकर धंधरौल बांध के पास गोली मार दी। इस पर भाकपा (माले) ने एक पखवाड़े तक जिला मुख्यालय पर क्रमिक अनशन किया। उस समय बहुजन समाज पार्टी ने भी इस मुद्दे पर खूब  हो-हल्ला मचाया। अभी यह शोरगुल थमा भी नहीं था कि सोनभद्र पुलिस ने चन्दौली के एक किसान नेता गुलाब हरिजन को चुर्क पहाड़ी पर 8 फरवरी 2001 को मुठभेड़ में मार गिराया।

गुलाब के मारे जाने से सोनभद्र, चन्दौली और मीरजापुर के लोग भौचक्के रह गये। गुलाब इन जिलों में जनवादी किसान नेता के रूप मे जाने जाते थे। वह जिला पंचायत का चुनाव भी लड़ चुके थे। पुलिस ने उनका सम्बन्ध माओवादी संगठन से होना बताया। इस पर भाकपा (माले) के तत्कालीन राज्य सचिव कामरेड अखिलेन्द्र प्रताप सिह ने पुलिस को माओवादियों और गुलाब के सम्बन्ध उजागर करने की चुनौती दी थी। बसपा सरकार के वर्तमान मंत्री इन्द्रजीत सरोज राबर्ट्सगंज सदर तहसील में आयोजित इस धरने में शामिल हुये थे।

वर्तमान विधायक सत्य नारायण जैसल, पूर्व विधायक परमेश्वर दयाल, भदोही के पूर्व सांसद नरेन्द्र कुशवाहा, रमेश वर्मा, जिलाध्यक्ष बसपा समेत तमाम कार्यकर्ताओं ने रामेश्वर की मुठभेड़ को हत्या बताया था और इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री के नाम पत्र लिखकर पूरे घटनाक्रम  की सीबीआई जॉंच की मांग की गयी थी। लेकिन तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा इन मुठभेड़ों की जांच करने की कोई भी कार्यवाही में नहीं की गई। इसके बाद तो मानो  पुलिस को फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम देने लाईसेंस मिल गया। 

वर्ष 2002 में मीरजापुर के भवानीपुर में तीनों जनपदों की पुलिस ने होलिका दहन के दिन 16 दलितों और आदिवासियों को नक्सली बताकर उनके खून से होली खेली। जिन डेढ़ दर्जन लोगों को पुलिस ने निर्ममता से गोली मारी उसमें एक 11वर्षीय बालक कल्लू भी था। मारे गये लोगों में पुलिस रिकार्ड में खूंखार नक्सली के रूप में देवनाथ और लालब्रत का भी नाम शामिल था। पुलिस ने सभी शवों का आनन-फानन में मीरजापुर में परीक्षण कराया। इसलिये शव परिजनों को न सौंपकर गंगा नदी के हवाले कर दिये गये।

सके बाद पुलिस ने दस मृतकों के नामों की सूची जारी की और शेष को अज्ञात बताया। इस सूची मे जिस सुरेश बियार को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था, उसने घटना के एक सप्ताह बाद यानी  14 मार्च 2002 को मीरजापुर कचहरी में भवानीपुर हत्याकाण्ड के विरोध में बुलाई गयी सभा में उपस्थित होकर पुलिस को अपने जिन्दा होने का सबूत दिया। इसके बाद तो पीयूसीयूएल ,पीयूएचआर ,पीयूडीआर जैसे मानवाधिकार संगठनों ने इस मुठभेड़ की परतें और पुलिस की बखिया उधेड़नी शुरू कर दी थी। 


विजय विनीत  उन पत्रकारों में हैं,जो थानों पर नित्य घुटने टेकती पत्रकारिता के मुकाबले विवेक को जीवित रखने और सच को सामने लाने की चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं.





किस्त 1 -  फर्जी मुठभेड़ के 14 बहादुरों को आजीवन कारावास



2 comments:

  1. शालिनी श्रीवास्तव, लखनऊTuesday, May 31, 2011

    मैं दिल से शुक्रगुजार हूँ विजय विनीत का जिन्होंने पैसे के दौर में पत्रकारिता की है. अगर ऐसी खबरों पर सीरिज चलें तो लोगों को गंभीर खबरों में दिलचस्पी बढ़ेगी ही. मेरी राय में तो विजय विनीत को दलाल पत्रकारों का नाम भी खोलना चाहिए.

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  2. विजय विनीत जी इस चुनोती को स्वीकार करने के लिए आपको साधुवाद !
    पत्रकारिता का विश्वास कुछ स्वार्थी एवं लालची एवं चाटुकार लोगो ने अपने इसी प्रकार के कृत्यों से क्षीण कर दिया है. लोकतंत्र के इस चोथे एवं महत्वपूर्ण स्तम्भा की गरिमा एवं विश्वास की रक्षा के लिए केवल आप ही क्यों हम सबको एकजुट प्रयास करना चाहिए
    कितना सार्थक हे ये , खबर हर कीमत पर ?
    में आपको ये सन्देश दूंगा की " वीर तुम बढे चलो धीर तुम बढे चलो ... "
    भारत शर्मा
    गाजियाबाद
    9810179069

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