Jul 9, 2011

नीतीश की कृपा से जेल से बाहर आया रणवीर सेना का मुखिया

बिहार में तीन सौ दलितों और पिछड़ों के नरसंहार के लिए जिम्मेदार रणवीर सेना प्रमुख ब्रम्हेश्वर मुखिया को कल जहानाबाद की एक अदालत ने 22 में से 16 मामलों में  बरी कर दिया और शेष में जमानत दे दी. 2002 में पटना से गिरफ्तार हुआ मुखिया आरा जेल में बंद था, जहाँ रिहाई के समय उसका भव्य स्वागत किया गया...

नवल किशोर कुमार

ब्रम्हेश्वर मुखिया ने 1994से लेकर 2000तक जिन तीन सौ दलितों और पिछड़ों की हत्याओं को अंजाम दिलवाया था,वह किसी एक आवेग में नहीं बल्कि रणवीर सेना का गठन करके 22 बार हमला करके अंजाम दी गयी  थीं.ब्रम्हेश्वर के इशारे पर दलितों और पिछड़ों की बच्चियों के साथ बलात्कार किया गया। सैंकड़ों मासूमों का गर्दन एक झटके में उड़ा दिया गया.रणवीर सेना का मास्टरमाइंड ब्रम्हेश्वर मुखिया खुलेआम कहता था कि दलितों और पिछड़ों के बच्चों को मारकर उसने और उसके साथियों ने कोई गलती नहीं की,आखिर बड़े होने पर वे नक्सली ही बनते।

महिलाओं का बलात्कार कर उन्हें जान से मार देने वाले इस दरिंदे का कहना था कि ये महिलायें नक्सलियों को जन्म देतीं,इसलिये इनका मारा जाना अनिवार्य है। सच कहा जाये तो आदमी के रुप में यह जिंदा शैतान जेल की सलाखों से बाहर आ चुका है। अदालत ने इस दरिंदे को 22में से 16मामलों में पहले ही बरी कर दिया था और पांच मामलों में इसे जमानत मिल चुकी थी। कल इस दरिंदे को अदालत ने एक और मामले में जमानत दे दी। इस प्रकार ब्रम्हेश्वर मुखिया को जेल से बाहर आने की अनुमति मिल गई।

ब्रम्हेश्वर मुखिया : नरसंहारों का मास्टरमाइंड

ब्रहमेश्वर  के खिलाफ़ सबूत नही

यह कानून का मजाक नहीं तो और क्या है?जिस दरिंदे ने 300लोगों की हत्या कर दी और जिसने बाथे नरसंहार जैसी निंदनीय घटनाओं को अंजाम दिया,उसके खिलाफ़ सरकार को कोई सबूत नहीं मिला। कानून के कई जानकार यह बताते हैं कि सरकार ने अपनी ओर से ब्रहमेश्वर मुखिया के खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की। वर्ष 2006 से वह बिहार के विभिन्न जेलों में सरकारी मेहमान के रुप में रह रहा था। दलितों और पिछड़ों का खून पीने वाले इस खूनी भेड़िये को बिहार सरकार की ओर से वह हर सुविधा हासिल थी,जो एक राजनीतिक कैदी को मिलता है। यानी बिहार सरकार की नजर में वह दलितों और पिछड़ों का कातिल नहीं, बल्कि एक राजनीतिक कार्यकर्ता था.

नीतीश ने निभाई वफ़ादारी

अपने मूल स्वभाव के अनुसार नीतीश कुमार ने अपनी वफ़ादारी साबित करते हुए ब्रह्मेश्वर मुखिया के खिलाफ़ कोई सबूत न पेशकर अपनी स्वामी भक्ति साबित कर दी। हालांकि यह दूसरा अवसर था, जब नीतीश कुमार ने ब्रह्मेश्वर मुखिया और इनके खूनी सेना यानी रणवीर सेना अर्थात भूमिहार सेना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करते हुए जनवरी 2006में ही अमीरदास आयोग को भंग कर दिया। अमीरदास आयोग का गठन तत्कालीन राजद सरकार ने रणवीर सेना के कारनामों को जगजाहिर करने के लिये किया था। जस्टिस अमीरदास भी मानते हैं कि उनकी ओर से सारी कार्रवाई पूरी हो चुकी थी,केवल रिपोर्ट देना ही शेष रह गया था। लेकिन इससे पहले कि मौत के दरिंदे और इसकी खूनी सेना का काला सच लोगों के सामने आ पाता, नीतीश कुमार ने उस आयोग को ही भंग कर दिया।

ब्रम्हेश्वर मुखिया और रणवीर सेना का काला इतिहास

बिहार में ब्रहमेश्वर मुखिया ने वर्ष 1994के अंत रणवीर सेना यानि भूमिहार सेना का गठन किया था। इस सेना के गठन का एकमात्र उद्देश्य था- दलितों और पिछड़ों की आवाज को कुंद करना। खूनी दरिंदों की इस सेना ने दिनांक 29 अप्रैल 1995 को भोजपुर जिले के संदेश प्रखंड के खोपिरा में पहली बार कहर बरपाया। इस दिन ब्रहमेश्वर मुखिया की मौजूदगी में उसके इशारे पर रणवीर सेना के राक्षसों ने 5 दलितों की हत्या कर दी। इसके बाद करीब 3 महीने बाद रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के ही उदवंतनगर प्रखंड सरथुआं गांव में दिनांक 25 जुलाई 1995 को 6 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी।

इस घटना को अंजाम देने के ठीक 10 दिन बाद ही रणवीर सेना ने दिनांक 5 अगस्त 1995 को भोजपुर के बड़हरा प्रखंड के नूरपुर गांव में हमला कर 6लोगों की हत्या कर दी। इस घटना को अंजाम देने के बाद रणवीर सेना के दरिंदों ने गांव से 4महिलाओं का अपहरण कर लिया था और सभी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार करने के बाद उनका कत्ल कर दिया गया था। मारी गई इन महिलाओं में एक 13साल की बच्ची भी शामिल थी। पुलिसिया रिकार्ड में यह आज भी दर्ज है कि इस बच्ची का बलात्कार किसी और ने नहीं,बल्कि ब्रह्मेश्वर मुखिया ने ही की थी और अपना मुंह काला करने के बाद इसी दरिंदे ने उसके जननांग में गोली मारकर उसकी हत्या कर दी थी।

दिनांक 7 फ़रवरी 1996 को रणवीर सेना के दरिंदों ने एक बार फ़िर भोजपुर जिले के चरपोखरी प्रखंड के चांदी गांव में हमला कर 4 लोगों की हत्या कर दी। इसके बाद दिनांक 9 मार्च 1996 को भोजपुर के सहार प्रखंड के पतलपुरा में 3, दिनांक 22 अप्रैल 1996 को सहार प्रखंड के ही नोनउर नामक गांव में रणवीर सेना ने 5लोगों की हत्या कर दी। सहार में रणवीर सेना का खूनी तांडव रुका नहीं। दिनांक 5 मई 1996 को नाढी नामक गांव में 3 लोगों की हत्या करने के बाद रणवीर सेना ने दिनांक 19 मई यानि ठीक 14वें दिन एकबार फ़िर नाढी गांव पर कहर बरपाया और 3 और लोगों की हत्या कर दी। दिनांक 25 मई 1996 को रणवीर सेना ने उदवंतनगर के मोरथ नामक गांव में 3 लोगों की हत्या कर दी। यानी दिनांक 29 अप्रील 1995 से लेकर 25 मई 1996 तक के बीच रणवीर सेना ने कुल 38 लोगों की हत्या कर दी।

इसके बाद दिनांक 11जुलाई 1996के दिन पूरा बिहार कांप उठा था। वजह यह था कि आज के नीतीश कुमार के भगवान यानि ब्रहमेश्वर मुखिया के नेतृत्व में रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के सहार प्रखंड के ही बथानी टोला नामक दलितों और पिछड़ों की बस्ती पर हमला बोलकर 21 लोगों की गर्दन रेतकर हत्या कर दी। इस घटना को अंजाम देने के बाद रणवीर सेना ने दिनांक 25 नवंबर 1996 को सहार के पुरहारा में 4, दिनांक 12 दिसंबर 1996 को संदेश प्रखंड के खनेऊ में 5, दिनांक 24 दिसंबर 1996 को सहार के एकवारी गांव में 6, और दिनांक 10 जनवरी 1997 को तरारी प्रखंड के बागर नामक गांव में 3 लोगों की हत्या कर दी गई। इस प्रकार बिहार में मौत का नंगा नाच नाचने वाले रणवीर सेना ने केवल भोजपुर जिले में कुल 77 लोगों की निर्मम हत्या की थी।

वर्ष 1997 में रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के बाहर कदम रखा और 31 जनवरी 1997 को जहानाबाद के मखदूमपुर प्रखंड के माछिल गांव में 4 दलितों की हत्या कर दी। इस घटना को अंजाम देने के बाद रणवीर सेना का हौसला इस कदर बढा कि उसने पटना जिले के बिक्रम प्रखंड् के हैबसपुर नामक गांव में 10 लोगों की हत्या कर दी। इस घटना को रणवीर सेना ने दिनांक 26 मार्च 1997 को अंजाम दिया। इसके बाद दिनांक 28 मार्च 1997 को ही जहानाबाद के अरवल प्रखंड(वर्तमान में अरवल जिला बन चुका है) के आकोपुर में 3, भोजपुर के सहार प्रखंड के एकवारी गांव में दिनांक 10 अप्रैल 1997 को 9 और भोजपुर जिले के चरपोखरी प्रखंड के नगरी गांव में दिनांक 11 मई 1997 को 10 लोगों की हत्या रणवीर सेना ने कर दी।

निजी सेनाओं का बिहार : हत्याएं ही संघर्ष

दिनांक 2 सितंबर 1997 को रणवीर सेना के दरिंदों ने जहानाबाद के करपी प्रखंड के खडासिन नामक गांव में 8 और दिनांक 23 नवंबर 1997 को इसी प्रखंड के कटेसर नाला गांव में 6 लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई। इसके बाद दिनांक 31 दिसंबर 1997 को ब्रहमेश्वर मुखिया की उपस्थिति में रणवीर सेना ने जहानाबाद के लक्ष्मणपुर-बाथे नामक गांव में एक साथ 59लोगों की निर्मम हत्या कर दी। यह बिहार में हुए अबतक का सबसे बड़ा सामूहिक नरसंहार है। पाठकों को बता दें कि इस नरसंहार के मामले में कुल 18लोगों को आजीवन उम्रकैद की सजा दी गई है। जबकि मुख्य अभियुक्त ब्रहमेश्वर मुखिया को इस मामले में बरी कर दिया गया और इसका श्रेय भी रणवीर सेना के दलाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही जाता है।

खैर,दिनांक 25 जुलाई 1998 को जहानाबाद के करपी प्रखंड के रामपुर गांव में एक बार फ़िर रणवीर के दरिंदों ने मौत का खेल खेला और 3 लोगों की जान ले ली। दिनांक 25 जनवरी 1999 को रणवीर सेना ने जहानाबाद में एक और बड़े नरसंहार को अंजाम दिया। जहानाबाद के अरवल प्रखंड के शंकरबिगहा नामक गांव में 23 लोगों की हत्या कर दी गई। इसके बाद दिनांक 10 फ़रवरी 1999 को जहानाबाद के नारायणपुर में 12, दिनांक 21 अप्रैल 1999 को गया जिले के बेलागंज प्रखंड के सिंदानी नामक गांव में 12, दिनांक 28 मार्च 2000 को भोजपुर के सोनबरसा में 3, नोखा प्रखंड के पंचपोखरी में 3 और दिनांक 16 जून 2000 को रणवीर सेना ने औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड के मियांपुर गांव में 33 लोगों की सामूहिक हत्या कर दी।
(नवल किशोर 'अपना बिहार' वेबसाइट के मॉडरेटर हैं. यह लेख वहीं से साभार प्रकाशित किया जा रहा है.)  


Jul 8, 2011

सांसद निधि में वृद्धि क्यों?


सांसद निधि के दुरुपयोग के कई मामले सामने आए हैं। आंध्र प्रदेश के छह जिलों में तो इस मद में जारी 64करोड़ रुपए बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में रखकर उनसे ब्याज कमाया जा रहा था...

राजेंद्र राठौर

देश के आधे से अधिक सांसदों ने वर्ष 2010-11  में विकास निधि का 35फीसदी हिस्सा खर्च नहीं किया है। देश में 20सांसद ऐसे भी है, जिन्होंने तो अपने क्षेत्र के विकास में फूटी कौड़ी खर्च नहीं की है,जबकि कुछ सांसद विकास निधि बांटने में अव्वल है,उन्होंने कमीशनखोरी कर प्राइवेट संस्थाओं को सांसद निधि की राशि रेवड़ी की तरह बांटी है। ऐसे में सांसद निधि की राशि दो करोड़ से बढ़ाकर पांच करोड़ किए जाने का आखिर औचित्य ही क्या है?
सांसद निधि के सही उपयोग से कई क्षेत्रों की तस्वीर बदल गई है, वहीं कई क्षेत्रों में तो सांसद निधि का जमकर दुरूपयोग हुआ है। अपने प्रतिनिधियों के साथ मिलकर सांसदों ने इस निधि में करोड़ों की हेराफेरी की है, जिससे उस क्षेत्र में विकास कार्य नहीं हो सका है। कुछेक सांसदों को छोड़कर बात करें तो कई राज्यों के ज्यादातर सांसद ऐसे हैं,जिन्होंने अपनी निधि से राशि स्वीकृत करने के एवज में एक निश्चित राशि कमीशन बतौर ली है।

काम व राशि के हिसाब से सांसदों ने कमीशन भी तय कर रखा है,जिसे देकर कोई भी व्यक्ति या प्राइवेट संस्था,सांसद निधि से अनुदान प्राप्त कर सकता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण छत्तीसगढ़ राज्य में देखा जा सकता है। यहां जरूरतमंद या सरकारी संस्थाओं को लाभ भले ही न मिले,लेकिन प्राइवेट संस्थाओं को सांसद निधि की राशि आसानी से मिल रही है। भाजपा शासित राज्य होने के बावजूद यहां के ज्यादातर भाजपाई सांसदों ने अपने निधि से सरकारी संस्थाओं के बजाय प्राइवेट स्कूल,कालेज व संगठनों को लाखों रूपए अनुदान दिया है।

कई प्राइवेट संस्था तो ऐसे भी है,जिन पर सांसद भारी मेहरबान है और एक सत्र में ही उन्हें तीन-चार बार अनुदान राशि दी गई है। सांसद निधि स्वीकृत करने के पीछे का खेल बहुत लंबा-चौड़ा है। सांसदों ने अपने चहेतों को अनुदान राशि बिना किसी स्वार्थ के खैरात की तरह नहीं दी है,अनुदान राशि स्वीकृत करने के लिए सांसदों ने कुल राशि में से 20 से 30 फीसदी कमीशन लिया है। अनुदान राशि भी उन्हीं लोगों को दी गई है,जिन्होंने कमीशन पहले दिया है। यही नहीं सांसद निधि स्वीकृत कराने के लिए दलाल एक महत्वपूर्ण कड़ी बने हुए हैं,जो सांसदों को ग्राहक ढूंढ़कर देने में अहम् भूमिका निभा रहे हैं।

सांसद निधि के दुरुपयोग के कई मामले सामने आए हैं। आंध्र प्रदेश के छह जिलों में तो इस मद में जारी 64करोड़ रुपए बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में रखकर उनसे ब्याज कमाया जा रहा था। नियमों के मुताबिक यह राशि राष्ट्रीय बैंकों के बचत खाते में ही रखी जा सकती है,ताकि जरूरत पड़ने पर उसे फौरन उपयोग में लाया जा सके। मामले की शिकायत के बाद छानबीन में पाया गया कि कई राजनेताओं ने अपने रिश्तेदारों के स्कूलों और क्लबों तक में सांसद निधि खर्च करवा दी।

चार साल पहले एक स्टिंग ऑपरेशन में कुछ सांसदों को इस योजना के ठेकों में कमिशन की बात करते पकड़ा गया था। इससे स्पष्ट होता है कि बहुत से सांसद इस निधि से व्यक्तिगत हित ही साधना चाहते हैं। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते हैं,तो वे इसके उपयोग में ही हीलाहवाली करते हैं। इस कारण सांसद निधि खर्च ही नहीं हो पाती। पिछले 16 वर्षों में सरकार द्वारा जारी की गई सांसद निधि के 1053.63 करोड़ रुपए खर्च नहीं किए गए। सांसद निधि योजना तो अच्छी है, लेकिन इस योजना के तहत् राशि स्वीकृत करने के पीछे तमाम तरह की खामियां है।

इस बात को केन्द्र सरकार भी भलीभांति जानती है,फिर भी आंख बंद किए हुए देश की बर्बादी तमाशा देख रही है। सांसद निधि के दुरूपयोग की शिकायतें छत्तीसगढ़ राज्य ही नहीं बल्कि, देश के कई राज्यों से आए दिन सामने आ रही है, लेकिन एक भी मामले में सांसद के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे साफ जाहिर होता है कि सरकार ही नहीं चाहती कि जनता को उनका जायज हक मिले। यही वजह है कि जनता के लिए सरकार से मिलने वाली राशि का ज्यादातर हिस्सा सांसद व उनके चमचे ही हजम कर जा रहे है, फिर भी सांसदों को निधि के तहत् मिल रहा 2 करोड़ रूपए कम लग रहा था।
केन्द्र सरकार से सांसद बार-बार विकास निधि बढ़ाए जाने की मांग कर रहे थे। राशि बढ़ाने के संबंध में सांसदों का तर्क था कि महंगाई के इस दौर में 2 करोड़ रूपए विकास कार्यो के लिए पर्याप्त नहीं है। राशि कम होने की वजह से क्षेत्र में अपेक्षित विकास कार्य नहीं हो पा रहे हैं। सांसद निधि में वृद्धि को लेकर केन्द्र सरकार लंबे समय से विचार कर रही थी। आखिरकार 7 जुलाई को कैबिनेट ने सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि योजना के तहत प्रत्येक सांसद को मिलने वाली दो करोड़ की राशि को बढ़ाकर पांच करोड़ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।

इससे इस योजना के तहत विकास कार्यों के लिए सांसदों को मिलने वाली राशि प्रतिवर्ष 1580से बढ़कर 3950करोड़ रुपए हो जाएगी और सरकारी खजाने पर प्रतिवर्ष 2370करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। कैबिनेट की बैठक में यह भी बताया है कि सांसद विकास निधि योजना के शुरू होने से लेकर 31 मार्च 2011 तक 22490.57 करोड रुपए जारी किए जा चुके हैं। वहीं इस योजना के तहत 31 मार्च 2011 तक 13.87 लाख कार्यों की सिफारिश सांसदों ने की तथा जिला अधिकारियों ने 12.30 लाख कार्यों को मंजूर किया एवं 11.24लाख कार्य पूरे किए गए।

हाल ही में 15 वीं लोकसभा के 2011-11 के कामकाज पर स्वयंसेवी संस्था मास फार अवेयरनेस के वोट फार इंडिया अभियान द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट की बात करें तो देश के आधे से अधिक सांसदों ने सही तरीके से इस निधि का उपयोग नहीं किया है। रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि इस निधि का महज 35 फीसदी हिस्सा ही सांसद खर्च कर पाए हैं। देश में 20 सांसद ऐसे भी हैं, जिन्होंने वर्ष के दौरान निधि से एक पैसा भी खर्च नहीं किया है,जिनमें भारतीय जनता पाटी के सांसद शाहनवाज हुसैन तथा कांग्रेस के सीपी जोशी भी शामिल है,जबकि सांसद निधि का कम उपयोग करने वाले सांसदों में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी, राहुल गांधी, सचिन पायलट, जनता दल यूनाईटेड के शरद यादव, राष्ट्रीय लोक दल के अजीत सिंह के नाम शामिल है। सांसद निधि का मिजोरम के सांसदों ने भरपूर उपयोग किया है।

बहरहाल, अगर इस धन का सही उपयोग हुआ होता, तो इतने वर्षों में ग्रामीण भारत की तस्वीर ही बदल चुकी होती, लेकिन यह निधि सार्वजनिक धन की बर्बादी का ही जरिया बनती जा रही है। ऐसे में सांसद निधि की राशि 2करोड़ से बढ़कर 5करोड़ हो जाए,या फिर 10करोड़, सांसदों के कमीशनखोरी की भूख मिटने वाली नहीं है और न ही देश के पिछले क्षेत्रों में विकास के कोई बड़े कार्य होने की उम्मीद है।

 

छत्तीसगढ़ के जांजगीर के राजेंद्र राठौर पत्रकारिता में 1999से जुड़े हैं.लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए 'जन-वाणी' ब्लॉग लिखते है.


 
 
 

जानलेवा उत्पादों से सावधान!


कहीं से किसी इन्वेर्टर के फट जाने की खबर मिलती है तो कहीं इन्वर्टर के साथ की बैटरी में धमाका हो जाता है। कहीं फ्रिज का कम्प्रेसर फट रहा है तो कहीं एयर कंडीशनर में धमाके की खबरें मिल रही हैं...

निर्मल रानी

वैज्ञानिकों ने आम लोगों की सुख-सुविधाओं के मद्देनज़र तमाम ऐसे आविष्कार किये जो निश्चित रूप से वरदान साबित हो रहे हैं। आज पूरा विश्व छोटे-से छोटे तथा बड़े से बड़े ऐसे सभी आविष्कारों के लिए वैज्ञानिकों का कृतज्ञ है और हमेशा रहेगा। मानव सुख-सुविधाओं के मद्देनज़र उन्होंने कभी टार्च का आविष्कार किया तो कभी बैटरी का, कभी इन्वर्टर तो कभी मोबाईल फोन। यहां तक की बैटरी चालित स्कूटर और कार से लेकर बड़े से बड़े विमान,पनडुब्बी तथा परमाणु हथियार व परमाणु ईंधन से चलने वाले बिजलीघर तक हमारे वैज्ञानिकों ने हमारे ही आराम व फायदे की लिए बना डाले।
ज़ाहिर है अपने प्रत्येक वैज्ञानिक आविष्कार को रचनात्मक रूप देने और इसे निर्मित कर उत्पाद का रूप देने के अपने मानदंड भी इन वैज्ञानिकों ने स्थापित किए। इन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि अमुक उत्पाद के लिए उसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्रियां किस श्रेणी की हों, कितनी हों तथा उन्हें किस प्रकार इस उत्पाद का अंग बनाकर इसे उसमें शामिल किया जाए।

लगता है कि समय बीतने के साथ-साथ वैज्ञानिकों की आशाओं और आकांक्षाओं पर पानी फिरता जा रहा है, क्योंकि उन्होंने किसी उत्पाद विशेष का आविष्कार कर उसके उत्पादन के कुछ मानदंड स्थापित किये थे। शायद कुछ उसी तरह जैसे हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी जान-माल की कुर्बानी देकर हमारे देश को इसलिए आज़ाद कराया था, ताकि भावी पीढ़ी स्वाधीन होकर अपने पैरों पर खड़ी हो और स्वतंत्र,शक्तिशाली एवं समृद्ध भारत का निर्माण करे। मगर देश की स्थिति इसके ठीक विपरीत है. आज देश के रक्षक ही भक्षक बनते दिखाई दे रहे हैं। कुछ ऐसा ही हाल वैज्ञानिकों और उनके आविष्कार को लेकर उनकी आकांक्षाओं तथा उनके आविष्कार को उत्पादन के स्तर तक ले जाने वाले मुनाफाखोर उत्पादकों के बीच देखा जा रहा है।
आए दिन ऐसे-ऐसे समाचार अवश्य प्राप्त होते हैं, जिनके द्वारा कभी कहीं से किसी इन्वेर्टर के फट जाने की खबर मिलती है तो कहीं इन्वर्टर के साथ की बैटरी में धमाका हो जाता है। कहीं फ्रिज का कम्प्रेसर फट रहा है तो कहीं एयर कंडीशनर में धमाके की खबरें मिल रही हैं। यहां तक कि विदेशी कम्पनियों के मोबाईल फोन और उनमें लगी बैटरी में भी धमाके कि खबरें आ चुकी हैं।

कुछ दिन पहले ऐसा ही दिल दहलाने वाला हादसा उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद के ब्रहमपुरी इलाके में हुआ। यहां एक युवा दंपत्ति अपने बेटे के साथ कमरे में सो रहा था। इसी दौरान अचानक इन्वर्टर के साथ रखी बैटरी में ज़ोरदार धमाका हुआ, जिससे बैटरी और इन्वर्टर दोनों में विस्फोट हो गया। कमरे में आग लग गई तथा पूरे कमरे में धुआं भी फैल गया। इस तीन सदस्यों के बदनसीब परिवार को इतनी मोहलत भी न मिल सकी कि वे कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल खुद बचा पाते। दम घुटने से तीनों की मौत हो गई। प्रारंभिक जांच पड़ताल में यही पाया जा गया कि इन्वर्टर तथा बैटरी दोनों ही किसी स्थानीय फैक्टरी में बनवाए गए थे जो उत्पाद के मानक पर पूरी तरह खरे नहीं उतरते थे।

इस तरह के हादसे हमारे देश में कहीं न कहीं होते ही रहते हैं। कुछ समय पूर्व पंजाब में भी एसी फटने की खबर आई थी। नोएडा व दिल्ली से भी ऐसे कई समाचार आ चुके हैं। ऐसा लगता है कि चंद पैसों की बचत के लिए ऐसे उद्योगों के मालिक आम लोगों की जान-माल की कोई परवाह नहीं करते। निजी क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार अपनी गहरी जड़ें बना चुका है। उदाहरण के तौर पर यदि आप छब्बीस या सत्ताईस प्लेट की बैटरी खरीदने जाएं तो दुकानदार या बैटरी बनाने वाली स्थानीय फैक्टरी का मालिक बाईस या तेईस प्लेट कि बैटरी को ही पच्चीस या सत्ताईस प्लेट की बता देगा। ऐसी बैटरी में सिक्का तथा तांबा भी निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पड़ता। यही हाल इनवर्टर तथा स्टेबलाईजऱ जैसी संवेदनशील विद्युत सामग्रियों का है।

एल्युमिनियम की बांईंडिग किये गए ट्रांसफार्मर को तमाम अधिक मुनाफाखोर व ठग प्रवृति के दुकानदार कॉपर का बताकर ग्राहक से मोटे पैसे ठग लेते हैं। ऐसे दुकानदारों व लघु उद्योगों के मालिकों को उपभोक्ताओं की जान-माल की परवाह कतई नहीं होती। बल्कि इनका ध्यान तो केवल इस ओर रहता है कि कम से कम लागत में ज़्यादा से ज़्यादा पैसे किस प्रकार कमाए जाएं। दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि लोगों की जान-माल से खिलवाड़ करने की शर्त पर कमाई गई दौलत पर भी यह खुद को एक सफल व्यवसायी कहने से बाज़ नहीं आते।

साधारण उपभोक्ताओं के इस प्रकार के संकटों में पडऩे तथा जान-बूझकर अपनी व अपने परिवार के जान-माल पर खेल जाने का एक कारण यह भी है कि स्थानीय अथवा देसी उत्पाद आमतौर पर उपभोक्ताओं को न केवल सस्ते उपलब्ध होते हैं, बल्कि ऐसी सामग्रियां किश्तों पर भी उपलब्ध हो जाती हैं। इसी लालचवश या फिर आर्थिक तंगी के चलते मध्यमवर्गीय व निम्र मध्यमवर्गीय उपभोक्ता ऐसे घटिया उत्पाद खऱीदने को मजबूर हैं। परिणामस्वरूप घटिया उत्पाद के बाज़ार में बिकने का सिलसिला निर्बाध चलता रहता है। न तो प्रशासन इनके विरुद्ध कोई कार्रवाई करता है न ही गरीब व मध्यमवर्गीय उपभोक्ता इनसे सामान खरीदने या किश्तों पर सामान लेने से बाज़ आता है।

ऐसा भी नहीं है कि इस प्रकार के हादसे केवल देसी उत्पादों के साथ ही घटित होते हों। पिछले दिनों तो भारत में पूरे देश से दर्जनों ऐसे समाचार मिले जिनसे यह पता चला कि विश्वस्तरीय नोकिया कंपनी के मोबाईल फोन में डाली जाने वाली बैटरी में कई जगह धमाका हुआ। कई लोग इसमें घायल भी हुए। किसी की जेब में रखा मोबाईल फोन फटा तो किसी का फोन उस समय फटा जब वह किसी व्यक्ति से फोन पर बात कर रहा था।
नोकिया जैसी कंपनी जिसमें गुणवत्ता नियंत्रण पर ज़ोर दिया जाता है तथा ऐसी बड़ी कंपनियों में उत्पाद की गुणवत्ता नियंत्रण के लिए विशेष विभाग भी बनाए गए हैं, उससे इस बात की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती कि चंद पैसे बचाने की खातिर अपना घटिया माल भारतीय बाज़ारों में उतार दिया हो। यही वजह थी कि जैसे ही नोकिया को मीडिया के माध्यम से पता चला कि उनके मोबाईल फोन की बैटरियों में विस्फोट हो रहा है तथा उपभोक्ताओं की जान को खतरा पैदा हो गया है, कंपनी ने अत्यंत साहसिक कदम उटाते हुए पूरे भारतवर्ष में उन बैटरीज़ को ग्राहकों से वापस लेने तथा उनके स्थान पर दूसरी नई बैटरी देने का फैसला कर लिया।

यहां सोचने का विषय है कि नोकिया ने अपना विवादित उत्पाद वापस लेकर सैकड़ों करोड़ का घाटा आखिर क्यों उठाया गया। सिर्फ इसलिए कि नोकिया की बाज़ार में जो प्रतिष्ठा कायम थी वह बनी रहे। इस फैसले के कारण ही भारतीय बाज़ार में आज भी नोकिया की वही प्रतिष्ठा बरकरार है जो इस घटना से पूर्व थी। परंतु हमारे देश में तो तमाम देसी उत्पाद बनाने वाले उद्योगपत्ति मान-प्रतिष्ठा और इज़्ज़त नाम की चीज शायद जानते ही नहीं। उन्हें तो केवल अपने लिए अधिक से अधिक पैसा कमाने से ही वास्ता है। इसीलिए आये दिन हादसे होते रहते हैं।

ऐसे में जबकि तमाम देसी सामग्री के भारतीय उत्पादक अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हों, उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे स्वयं अपनी जान-माल की रक्षा करें। सर्वप्रथम उपभोक्ता सस्ते सामानों के चक्कर में पडऩे व घटिया उत्पाद खरीदने से परहेज़ करें। कोशिश करें कि जहां वह देसी उत्पाद खरीदने के लिए थोड़े पैसों का प्रबंध कर रहे हैं वहीं कुछ और पैसों का इंतज़ाम कर स्टैंडर्ड की कंपनी का गारंटेड माल ही खरीदें। और यदि जेब इजाज़त नहीं दे और मजबूरीवश सस्ता व देसी माल खरीदना ही पड़े तो विक्रेता से माल के विषय में पूरा विवरण हासिल करें। लिखित रूप से उससे उत्पाद की विश्वसनीयता की पूरी गारंटी लें, ताकि ज़रूरत पडऩे पर वह अपनी बात से मुकर न सके।

प्रशासन का भी कर्तव्य है कि वह बाज़ार पर इस बात की नज़र रखे कि दुकानदार द्वारा उपभोक्ताओं को कौन सा माल क्या कहकर व क्या बताकर बेचा जा रहा है। झूठ बोलकर व गुमराह कर सामान बेचने वाले व्यापारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की भी ज़रूरत है। अन्यथा उपभोक्ताओं के जान-माल के नुकसान को शायद रोका नहीं जा सकेगा।




लेखिका उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ हैं और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी लिखती हैं.

Jul 7, 2011

संतों-समाजसेवियों के संघर्षों पर सवाल क्यों?

विपक्षी दल मुंह बंद किए  हों, तथाकथित समाजसेवी, नौकरशाह, शिक्षक, वकील, प्रबुद्वजन और पत्रकार सत्ता की चाटुकारिता और गुणगान में मगन हों  तो देश के आम आदमी  हक और हकूक की बात आखिरकर कौन करेगा...

आशीष वशिष्ठ

अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, निखलानंद, नागनाथ और जैन मुनि श्री मैत्रि सागर को विश्व  के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र में अपनी बात सत्ता तक पहुंचाने के लिए आमरण अनशन का रास्ता क्यों चुनना पड़ता है। क्यों सत्ता को आम आदमी की आवाज और दुःख-दर्दे सुनाई नहीं देता है। क्यों ऐसे हालात बनाए जाते हैं कि किसी निगमानंद को राष्ट्रीय नदी गंगा को बचाने के लिए अपने प्राणों की बलि देनी पड़ती है,ये सवाल इस देश  के प्रत्येक नागरिक के मनोमस्तिष्क उमड़-घुमड़ रहा है कि लोकतंत्र में आमरण अनशन क्यों?

लोकतांत्रिक व्यवस्था को विश्व  की उत्तम व्यवस्थाओं में गिना जाता है, लेकिन हमारे यहां खाने और दिखाने के दांतों में फर्क है। हमारे तथाकथित नेताओं और प्रतिनिधियों की कथनी और करनी में  जमीन-आसमान का अंतर है। चुनावी बेला पर आश्वासनों  का लाली पॉप देने वाले नेता चुनाव जीतते ही वीआईपी हो जाते हैं। चुनाव से पूर्व देश और दुनिया की तकदीर बदलने के दावे और वायदे करने वाले वक्त पड़ने पर स्ट्रीट लाइट की एक टयूब बदलवाने के लिए भी आम आदमी से दस-बीस चक्कर लगवाते हैं।

जब देश में विपक्षी दल मुंह बंद किए बैठे हों, तथाकथित समाजसेवी, नौकरशाह, शिक्षक , वकील, प्रबुद्वजन और पत्रकार सत्ता की चाटुकारिता और गुणगान में मगन हों,तो देश के आम आदमी, किसान, मजदूर, महिलाओं, बच्चों और निचले तबके के हक और हकूक की बात आखिरकर कौन करेगा। ऐसे निराष और भ्रष्ट माहौल में जब लाखों-करोड़ों की भीड़ में से कोई संत या समाजसेवी उठकर व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद करता है, और सोयी हुई जनता को जगाने का पुनीत कर्म करता है तो व्यवस्था और सत्ता को उससे परेशानी होने लगती है।

आखिरकर रामदेव,अन्ना,निखलानंद,नागनाथ और जैन मुनिश्री मैत्रि सागर भी तो इसी देश के नागरिक हैं। उन्हें भी देश के संविधान ने वहीं अधिकार प्रदान कर रखे हैं, जो देश के अन्य करोड़ों नागरिकों को प्राप्त हैं। आखिरकर सत्ता उनकी बात क्यों नहीं सुनना चाहती। सत्ता को इनसे क्या वैर और दुष्मनी है। सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने वाले महानुभावों का भी इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था और संसदीय प्रणाली में पूर्ण विश्वास  और आस्था है। अगर सत्ता ने ये समझ लिया है कि वोट डालने और प्रतिनिधि चुनने तक ही आम आदमी के लिए लोकतंत्र की परिभाषा है तो इस परिभाषा का उल्लंघन गुनाह की श्रेणी में ही आएगा। 

रामदेव, अन्ना, निखलानंद, नागनाथ और जैन मुनि श्रीमैत्रि सागर ने यही अपराध किया है कि उन्होंने अपने द्वारा चुनी सरकार से काम-काज का हिसाब-किताब मांग लिया,लोकपाल कानून बनाने में सिविल सोसायटी की भागीदारी मांग ली या फिर सरकार को ये बताने का अपराध कर डाला कि देश के हजारों-करोड़ की ब्लैक मनी विदेशी  बैंकों में जमा है। लेकिन सत्ता को देश और जनहित की ये बात कतई बर्दाश्त   नहीं आयी कि कोई अन्ना या रामदेव उठकर उससे तर्क-वितर्क करे और उसे राज-काज के तौर तरीके बताएं।

हम सब मिलकर लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटते तो जरूर हैं लेकिन असल में हमारे यहां लोकतंत्र नाममात्र का ही बचा है। प्रेस की आजादी सत्ता को सताने लगी है और समाज के भीतर से उठ रही विरोधी आवाजों को कुचलने-मसलने और दबाने की पुरजोर कोषिषें जारी हैं। कभी उस विरोधी स्वर को निखलानंद की भांति देशहित में प्राण गंवाने पड़ते हैं तो कभी रामदेव की तरह लाठी-डंडों की मार सहनी होती या फिर अन्ना की भांति धमकियों और मानसिक प्रताड़ना और तनाव का सामना करना पड़ता है। सत्ता की जनहित के मुद्दों और विरोधी स्वरों के विरूद्व रूखा,अड़ियल और अलोकतांत्रिक व्यवहार ही आज गहरी सोच और चिंतन का विषय है कि अगर एक लोकतान्त्रिक देश  में जनता की चुनी हुई सरकार अलोकतांत्रिक रीतियो, नीतियों और कारगुजारियों पर उतर आएगी तो फिर लोकतंत्र की रक्षा कैसी होगी।

सवाल लोकपाल बिल के निर्माण,गंगा के घाटों से अवैद्य खनन रोकने और विदेशों  में जमा काला धन वापिस लाने से बढ़कर यह है कि आखिकर जनता द्वारा चुनी हुई कोई सरकार प्रजातांत्रिक रीति-नीति और नियम छोड़कर तानाशाही पर उतारू क्यों है। आखिरकर क्यों देष और लोकहित से जुड़े मुद्दे और मांगे मनवाने के लिए संत और समाजसेवी आमरण अनषन के कठोर रास्ते पर चलने को मजबूर हैं?जब देश में आम आदमी की आवाज का कोई महत्व ही शेष  नहीं है तो फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था द्वारा चुनी सरकार को गद्दी पर बैठने का क्या अधिकार है। सत्ता के नशे  में मदमस्त सरकार और व्यवस्था अपनी कमियों,दोषों और गुनाहों पर विचार किये बिना अपने खिलाफ उठ रही आवाज को सुनने और समझने के बजाए उसे दबाने,डराने,धमकाने और कुचलने पर आमादा हो रही है।

पिछले दो-तीन दशकों में इस लूट-खसोट की प्रवृत्ति ने खासा जोर पकड़ा है। ऐसा भी नहीं है कि कोई एक ही राजनीतिक दल और नेता ही गुनाहगार है असलियत यह है कि हमाम में सभी नंगे हैं। नेता सत्ता के नषे में मदमस्त है और विपक्ष पस्त है और अगर ऐसे वातावरण में अन्ना, रामदेव या फिर कोई दूसरा आदमी उठकर सरकार से सवाल-जवाब करता है तो इसमें बुराई ही क्या है। वो अपने लिए तो कुछ मांग नहीं रहे हैं, जनहित और देशहित के लिए सोचना और आवाज बुलंद करना अगर गुनाह है, तो अन्ना और रामदेव सत्ता की नजर में गुनाहगार हैं।

सोलह  अगस्त से अन्ना ने एक बार फिर अनशन का ऐलान किया है। ऐसे में सवाल है कि  क्या इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमें और आपकों गर्व है। क्या यही है जनता की चुनी हुई सरकार जो हक मांगने पर आम आदमी पर को डंडे मारे और प्रताड़ित करे। अगर एक लोकतांत्रिक देश में अपनी बात मनवाने के और हक पाने के लिए आमरण अनशन की जरूरत है तो फिर काहे का लोकतंत्र और काहे की लोकतांत्रिक व्यवस्था।

स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक- सामाजिक मसलों के लेखक.


Jul 6, 2011

असहमति अन्ना से हो भ्रष्टाचार से नहीं


हमारे यहाँ ऐसे बुद्धिजीवियों की कमी नहीं जो  आन्दोलनों से रहते तो दूर हैं, पर सूँघने की इनकी नाक बड़ी लम्बी होती है। हर ओर इन्हें साजिश ही नजर आती है..

कौशल किशोर

आज अन्ना हजारे और उनके भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को लेकर कई सवाल उठाये जा रहे हैं। साहित्यकार मुद्राराक्षस ने हाल ही में आरोप लगाया है कि अन्ना भाजपा व राष्ट्रीय सेवक संघ का मुखौटा हैं और अन्ना के रूप में इन्हें ‘आसान झंडा’मिल गया है। जन लोकपाल समिति में ऐसे लोग शामिल हैं,जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। अन्ना हजारे की यह माँग कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में ले आया जाय, संविधान के विरुद्ध है।

मुद्राराक्षस ने यहाँ तक सवाल उठाया है कि अन्ना और उनकी सिविल सोसायटी पर संसद और संविधान की अवमानना का मुकदमा क्यों न दर्ज किया जाय?  ऐसे में अन्ना हजारे और भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन की पड़ताल जरूरी है क्योंकि आज यह आन्दोलन अपने अगले चरण की ओर अग्रसर है और जन आंदोलन की शक्तियाँ वैचारिक और सांगठनिक तैयारी में जुटी हैं।

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने देश की मुख्यधारा के राजनीतिक दलों को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है। हमारे संसदीय जनतंत्र में पक्ष और प्रतिपक्ष मिलकर मुख्य राजनीति का निर्माण करते हैं, लेकिन इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि तमाम पार्टियाँ सत्ता की राजनीतिक पार्टिर्यों में बदल गई हैं। उसके अर्थतंत्र का हिस्सा बनकर रह गई हैं aur अन्ना हजारे इसी यथार्थ की उपज हैं।

अन्ना हजारे के व्यक्तित्व और विचार में कमियाँ और कमजोरियाँ मिल सकती हैं। वे गाँधीवादी हैं। खुद गाँधीजी अपने तमाम अन्तर्विरोधों के बावजूद स्वाधीनता आन्दोलन के बड़े नेता रहे हैं। इसी तरह अन्ना हजारे के विचारों और काम करने के तरीकों में अन्तर्विरोध संभव है,लेकिन इसकी वजह से उनके आन्दोलन के महत्व को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता है।

 इस आन्दोलन का सबसे बड़ा महत्व यही है कि इनके द्वारा उठाया गया भ्रष्टाचार का मुद्दा आज केन्दीय मुद्दा बन गया है जिसने समाज के हर तबके को काफी गहरे संवेदित किया है और इसे खत्म करने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे हैं। अन्ना हजारे और उनके आंदोलन की इस उपलब्धि को क्या अनदेखा किया जा सकता है कि 42सालों से सरकार के ठंढ़े बस्ते में पड़ा लोकपाल विधेयक बाहर आया,उसे मजबूत और प्रभावकारी बनाने की चर्चा हो रही है,और इस पर सर्वदलीय बैठक आयोजित हुई।

हमारे यहाँ ऐसे बुद्धिजीवियों की कमी नहीं जो हर आन्दोलनों से रहते तो दूर हैं, पर सूँघने की इनकी नाक बड़ी लम्बी होती है। हर ओर इन्हें साजिश ही नजर आती है। ये अन्ना द्वारा नरेन्द्र मोदी की तारीफ पर तो खूब शोर मचाते हैं,लेकिन इस सम्बन्ध में अन्ना ने जो सफाई दी, ह इन्हें सुनाई नहीं देता है। किसानों की आत्म हत्या,बहुराष्ट्रीय निगमों का शोषण,चालीस करोड़ से ज्यादा लोगों का गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन के लिए बाध्य किया जाना जैसे मुद्दे तो इन्हें संवेदित करते हैं लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जब प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात आती है तो वह उन्हें देश में आजादी के बाद पहली बार अल्पसंख्यक सिख समुदाय के प्रधानमंत्री को अपमानित करने का षडयंत्र नजर आता है।

अपनी बौखलाहट में ये अन्ना और सिविल सोसाइटी पर जाँच बैठा कर मुकदमा चलाने की माँग करते हैं। ये इस सच्चाई को भुला बैठते हैं कि प्रधानमंत्री किसी समुदाय विशेष का न होकर वह सरकार का प्रतिनिधि होता है। हमारे इन बौद्धिकों को अन्ना द्वारा किसान आत्महत्याओं पर भूख हड़ताल न करने पर शिकायत है लेकिन किसान आंदोलनों पर सरकार के दमन पर ये चुप्पी साध लेते हैं।

कहा जा रहा है कि अन्ना हजारे जिस लोकपाल को लाना चाहते हैं,वह संसद और सविधान की अवमानना है। पर सच्चाई क्या है ?हमारी सरकार कहती है कि यहाँ कानून का राज है। लेकिन विडम्बना यह है कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए हमारे यहाँ कोई मजबूत कानून की व्यवस्था नहीं है। मामला चाहे बोफोर्स घोटाले का हो या भोपाल गैस काँड का या पिछले दिनों के तमाम घोटालों का हो,इसने हमारे कानून की सीमाएँ उजागर कर दी हैं। तब तो एक ऐसी संस्था का होना हमारे लोकतंत्र के बने रहने के लिए जरूरी है। यह संस्था जनता का लोकपाल ही हो सकती है जिसके पास पूरा अधिकार व क्षमता हो और वह सरकार के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त व स्वतंत्र हो तथा जिसके दायरे में प्रधानमंत्री से लेकर सारे लोगों को शामिल किया जाय।

प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात को लेकर मतभेद है लेकिन अतीत में प्रधानमंत्री जैसे पद पर जब अंगुली उठती रही है तब तो यह और भी जरूरी हो जाता है। सर्वदलीय बैठक में कई दलों के प्रवक्ता ने प्रधानमंत्री को इस दायरे में लाने की बात कही है और स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी उनसे मिलने गये सम्पादकों से कहा कि वे लोकपाल के दायरे में आने को तैयार हैं। फिर समस्या क्या है ?

अन्त में,भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लम्बी है। मजबूत और प्रभावकारी लोकपाल का गठन इसका पहला चरण हो सकता है। हम अन्ना हजारे से सहमत हो सकते है, असहमत हो सकते हैं या उनके विरोधी हो सकते है लेकिन यदि हम समझते है कि भ्रष्टाचार हमारे राष्ट्र,समाज,जीवन,राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति को दीमक की तरह चाट रहा है तो समय की माँग है कि इस संघर्ष को अन्ना हजारे और उनके चन्द साथियों पर न छोड़कर देश के जगरूक नागरिक,देशभक्त,बुद्धिजीवी, ईमानदार राजनीतिज्ञ लोकतांत्रिक संस्थाएँ,जन संगठन आगे आयें और इसे व्यापक जन आंदोलन का रूप दें।
 
 
जनसंस्कृति मंच लखनऊ के संयोजक और सामाजिक संघर्षों में सक्रिय.


 
 
 
 

Jul 4, 2011

राजनीतिक महत्वाकांक्षा के शिकार बाबा रामदेव

बाबा अच्छा-भला योग क्रिया के क्षेत्र में मीडिया, विशेष कर टीवी चैनल, की कृपा से देश-विदेश में खूब नाम पैदा करने लगे थे। नाम कमाते-कमाते उन्होंने इसी योग के क्षेत्र से ‘दाम’ भी खूब पैदा किया...

तनवीर जाफरी

संतों की भारतीय राजनीति में सक्रियता कल भी थी, आज भी है और संभवत: भविष्य में भी रहेगी। भारतीय संविधान जब देश के किसी भी नागरिक को सक्रिय राजनीति में भाग लेने, मतदान करने तथा चुनाव लडऩे की इजाज़त देता है, तो साधु-संत समाज राजनीति से कैसे  दूर रह सकता है। सत्ता सुख, सरकारी धन दौलत पर ऐशपरस्ती तथा सत्ता शक्ति की ताकत और इसके करिश्मे राजनीति जैसे पेशे से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं इसलिए अन्य कोई पेशा किसी को  अपनी ओर आकर्षित करे या न करे, राजनीति और इसमें पाया जाने वाला 'ग्लैमर' निश्चित रूप से सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है।

भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य है कि उसमें शिक्षा-दीक्षा, पढ़ाई-लिखाई और किसी प्रकार के प्रशिक्षण की कोई आवश्यकता नहीं होती, इसलिए इसमें तमाम ऐसे लोग भी सक्रिय हो जाते हैं जो अनपढ़ तो होते ही हैं साथ ही कई क्षेत्रों में भाग्य आज़माने के बाद भी असफल रहे होते हैं, मगर राजनीति में ऐसे लोग भी सफल होने की उम्मीद रखते हैं। इस सोच का मुख्य कारण है भारतीय राजनीति का मतों पर आधारित होना। 

राजनीतिज्ञ यह जानता है कि देश में साठ से लेकर सत्तर फीसदी आबादी अशिक्षित और भोली-भाली है। इस बहुसंख्यक वर्ग को तरह-तरह के प्रलोभन, वादों, आश्वासनों तथा जाति-धर्म, वर्ग या किसी अन्य ताने-बाने में उलझा कर अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है। यह सोच भी तमाम नाकारा किस्म के लोगों को न केवल राजनीति में पर्दापण के अवसर उपलब्ध कराती है बल्कि इस प्रवृति के लोग राजनीति के क्षेत्र में कदम रखते ही बड़े-बड़े सुनहरे सपने भी सजोने लग जाते हैं। बाबा रामदेव के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। बाबा अच्छा-भला योग क्रिया  के क्षेत्र में मीडिया विशेषकर टीवी चैनलस की कृपा से देश-विदेश में खूब नाम पैदा करने लगे थे। नाम कमाते-कमाते उन्होंने इसी योग के क्षेत्र से दाम भी खूब पैदा किया। बताया जाता है कि रामदेव इसी योग के  चमत्कारस्वरूप तथा योगा जगत से सम्पर्क में आने वाले धनपतियों की दान दक्षिणा से लगभग 11 सौ करोड़ की संपत्ति के स्वामी बन चुके हैं।

एक ओर रामदेव योग के क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए अपना जनाधार बढ़ाते गए, तो दूसरी ओर आम लोगों की ही तरह देश के लगभग सभी दलों के राजनेता भी रामदेव की ओर खिंच कर आने लगे।  इसका कारण यह था कि उनके योग शिविरों में आने वाले सैकड़ों लोगों से राजनेता अपनी ‘हॉबी’ के मुताबिक रू-ब-रू होना चाहते थे। सर्वविदित है कि हमारे देश में नेताओं का भीड़ से बहुत गहरा रिश्ता है। भीड़ को संबोधित करने, उसे अपना चेहरा दिखाने तथा उससे संवाद स्थापित करने के लिए नेता तमाम प्रकार के हथकंडे अपना सकता है। ऐसे में किसी भी नेता को रामदेव के योगशिविर में जाने से आखिर क्या आपत्ति हो सकती थी, वहां तो भीड़ के दर्शन के साथ ‘हेल्थ केयर टिप्स’ तो बोनस में प्राप्त होने थे।
बाबा रामदेव ने भी राजनीतिज्ञों से अपने संबंधों का भरपूर लाभ उठाते हुए योग और आयुर्वेद संबंधी साम्राज्य का न केवल राष्ट्रीय, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक विस्तार किया। इसी दौरान उन्होंने धीरे-धीरे पतंजलि योगपीठ,  दिव्य योग मंदिर, दिव्य फार्मेसी और आगे चलकर भारत स्वाभिमान ट्रस्ट नामक संस्थानों व संगठनों की स्थापना कर डाली। पर लगता है कि बाबा को लगभग ग्यारह सौ करोड़ रुपये का विशाल साम्राज्य स्थापित करने के बाद भी तसल्ली नहीं हुई और उन्हें ऐसी गलतफहमी पैदा होने लगी कि क्यों न देश की राजनीति को अपने नियंत्रण में लेकर इस देश की सत्ता पर भी नियंत्रण रखा जाए। उन्हें यह भी मुगालता होने लगा कि उनका खुद का व्यक्तित्व ही कुछ निराला है, तभी तो सत्ता और विपक्ष का बड़ा से बड़ा नेता उनके योग शिविर में उनके निमंत्रण पर खिंचा चला आता है।

इस मुगालते ने धीरे-धीरे अहंकार का वह रूप धारण कर लिया, जिसने बाबा रामदेव के मुंह से अहंकार में यह तक निकलवा दिया, 'जब देश के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री मेरे चरणों में बैठते हों, फिर आखिर मैं क्यों प्रधानमंत्री बनना चाहूंगा।' इतने अहंकार भरे शब्द शायद ही अब तक देश के किसी प्रमुख व्यक्ति या साधु-संत के मुख से निकले हों। शायद योग शिविर के नाम पर लाखों लोगों को इकट्ठा करने वाले इस योगगुरु को यह भ्रम भी हो गया होगा कि जो भीड़ उन्हें विश्वविख्यात योगऋषि बना सकती है, उसी के कन्धों पर सवार होकर वे देश की लोकतांत्रिक-राजनीतिक व्यवस्था पर भी कब्ज़ा जमा सकते हैं। हो सकता है इसीलिए बाबा रामदेव ने विदेशों से काला धन वापसी का मुद्दा कुछ इस अंदाज़ में उठाया गोया देश में वही अकेले ऐसे व्यक्ति हों जिन्हें विदेशों से काला धन वापस मंगाने की सबसे अधिक चिंता हो या देश की जनता ने उन्हें इस काम के लिए अधिकृत कर दिया हो।

दरअसल, रामदेव ने आम लोगों को भावनात्मक रूप से अपने साथ जोडऩे की  गरज़ से मुद्दा तो काले धन की वापसी का उठाया, लेकिन धीरे-धीरे वे देश में अपनी राजनीतिक शक्ति को भी तौलने लगे। पिछले संसदीय चुनावों में स्वाभिमान ट्रस्ट द्वारा शत-प्रतिशत मतदान करने की अपील के साथ पूरे देश में तमाम जगहों पर रैलियां भी निकाली गईं। यह सब कार्रवाई केवल नवगठित ‘भारत स्वाभिमान संगठन’ की ज़मीनी हकीकत को मापने तथा इसे प्रचारित करने के लिए की गई थी। मगर राजनीतिक तिकड़मबाजि़यों से अनभिज्ञ रामदेव की भारतीय राजनीति के क्षितिज पर चमकने की मनोकामना आखिरकार उस समय धराशायी हो गई जब वे रामलीला मैदान से अपने समर्थकों और अनुयायियों को उनके हाल पर छोड़ कर स्वयं पुलिस से डर कर किसी महिला के कपड़े पहनकर भाग निकले। पुलिस ने इसी हालत में उनको गिरफ्तार कार लिया।

उनकी दूसरी बड़ी किरकिरी उस समय हुई जब वे नींबू-पानी व शहद ग्रहण करने के बावजूद स्वयं को ‘अनशनकारी’ बताते रहे। उन्हें सबसे अधिक मुंह की तब खानी पड़ी, जब इस तथाकथित अनशन को समाप्त करने के लिए भी केंद्र सरकार का कोई प्रतिनिधि उन्हें मनाने नहीं गया। उन्होंने कुछ संतों की गुज़ारिश पर अपनी कोई मांग पूरी हुए तथा किसी सरकारी आश्वासन के बिना अनशन तोड़ दिया। अब यही बाबा रामदेव राजनीति से ‘वास्तविक  साक्षात्कार’ होने के पश्चात काले धन की वापसी पर तो कम बोलते दिखाई दे रहे हैं, मगर अब उन्हें लोगों को यह बताना पड़ रहा है कि वे रामलीला मैदान से क्यों भागे, उन्होंने औरतों के कपड़े किन परिस्थितियों में पहने तथा अपना तथाकथित अनशन उन्हें कैसे  तोडऩा पड़ा।

अब वे अपनी धन-सपत्ति तथा तमाम आरोपित अनियमितताओं का जवाब देते फिर रहे हैं। रामलीला मैदान से उनके भेष बदल कर पलायन करने की घटना को भी संत समाज कायरतापूर्ण कार्रवाई बता रहा है जबकि बाबा रामदेव और उनके समर्थक इसे वक्त की ज़रूरत तथा सूझबूझ भरा कदम बता रहे हैं। बहरहाल बाबा रामदेव की मुश्किलें निकट भविष्य में खत्म होती दिखाई नहीं दे रही हैं। प्रत्येक आने वाला दिन उनके लिए विशेषकर उनके महत्वाकांक्षी राजनीतिक अस्तित्व के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है।

कल तक जिस अहंकार से रामदेव ने अन्ना हज़ारे के लिए यह कहा था कि-अन्ना हज़ारे पहले महाराष्ट्र तक सीमित थे उन्हें अपने मंच पर लाकर राष्ट्रीय स्तर पर मैंने उनका परिचय देशवासियों से कराया। जिस अन्ना हज़ारे के जंतर-मंतर पर आयोजित अनशन को बौना करने की गरज़ से उन्होंने अपना ‘रामलीला मैदान का शो’ आयोजित किया था, अब वही अन्ना अपने भविष्य के कार्यक्रम में रामदेव को अपनी शर्तों के साथ शामिल करने की बात कह रहे हैं। खबर तो यह भी है कि 16 अगस्त के अन्ना हज़ारे प्रस्तावित अनशन में रामदेव से जनता के बीच में बैठ कर अनशन में शरीक होने की बात की जा रही है, न कि मंच सांझा करने की बात। उधर प्रवर्तन निदेशालय बाबा रामदेव द्वारा इकट्ठी की गई 1100 करोड़ की संपत्ति की जांच करने में इस संदेह के कारण लग गया है कि कहीं रामदेव द्वारा फेमा नियमों का उल्लंघन तो नहीं किया गया?

रामदेव के परम सहयोगी बालकृष्ण पर दो पासपार्ट रखने तथा इन पासपोर्ट पर कई विदेशी यात्राएं करने जैसे आरोप लग रहे हैं। कुल मिला कर हम यह कह सकते हैं कि बाबा रामदेव को योग ने तो आसमान पर चढ़ा दिया लेकिन राजनीतिक  महत्वाकांक्षा उन्हें ले डूबी। 

लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.



Jul 3, 2011

जनतंत्र भ्रम फैलाने का शासन है


आज तो जनतंत्र जनता में भ्रम पैदा करने वाला शासन है जो धूर्तता और पाखण्ड के सहारे चलता है। जनता में अपना विश्वास जमाने, भ्रम पैदा करने तथा उसे अपने पक्ष में करने के लिए शासक दल, उनकी सरकारें जनता के हाव-भाव, जीवन शैली, जनता के नारे और मुद्दे अपना लेते हैं...
 
कौशल किशोर

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह कहकर कि वे लोकपाल के दायरे में आने को तैयार हैं, अन्ना हजारे की माँग का ही नैतिक समर्थन किया है। भले ही यह मनमोहन सिंह के निजी विचार हैं और इसका सरकार के दृष्टिकोण पर ज्यादा असर न पड़े । फिर भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश के प्रधानमंत्री के विचार हैं और जिन  मुद्दों को लेकर सरकार और अन्ना हजारे के नागरिक समाज के बीच गतिरोध बना हुआ है, उनमें यह प्रमुख है। ऐसे में प्रधानमंत्री के इस कथन को क्या भावुकता में कही बातें समझी जाय या इसका कोई गंभीर निहितार्थ है ? इसे किस रूप में लिया जाय ?

हाल की घटनाओं ने जिन तथ्यों को उजागर किया है, उसे लेकर आम नागरिक काफी संवेदित है। आमतौर पर कहा जा रहा है कि मौजूदा तंत्र व व्यवस्था भ्रष्ट हो चुकी है। यह सरकार स्वयं कई घोटालों में फँसी है। उसके कई मंत्रियों को इन मामलों में जेल के सीखचों के पीछे जाना पड़ा है। भ्रष्टाचार से संघर्ष करने में सरकार द्वारा जो प्रतिबद्धता दिखाई जानी थी, इस सम्बन्ध में वह कमजोर साबित हुई है तथा लोकपाल बिल लाने के लिए भी वह तब तैयार हुई जब नागरिक समाज के आंदोलन का दबाव बना। और अब वह ऐसा लोकपाल लाना चाहती है जो नख दंत विहीन हो। आज ऐसी बातें आम चर्चा में हैं। इसने सरकार, कांग्रेस पार्टी तथा मंत्रियों की छवि को धूमिल किया है।

इस सबके बावजूद इस सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के व्यक्तित्व के बारे में अलग राय व्यक्त की जा रही है। इनके बारे में यही कहा जाता है कि वे स्वच्छ और ईमानदार छवि वाले एक अच्छे इन्सान है। वे कमजोर हो सकते हैं। उनका लोगों से संवाद कम हो सकता है, लेकिन उनके ऊपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता है। अर्थात भले ही सरकार के पाप का घड़ा भर गया हो, लेकिन उसका मुखिया पाक साफ है। सरकार, सत्ता प्रतिष्ठान, कांग्रेस पार्टी, मीडिया, राजनेताओं और बौद्धिकों के बड़े हिस्से द्वारा इसे  अवधारणा के स्तर पर प्रचारित और स्थापित किया गया है।

आखिरकार राजनीति की इस परिघटना को किस रूप में देखा जाय ? अगर यह मौजूदा राजनीति की विसंगति है, तो इसकी व्याख्या कैसे की जाय ? मनमोहन सिंह एक ईमानदार व्यक्ति हैं और स्वयं इस विचार के हैं कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में आना चाहिए, तो क्या यह कुर्सी मोह या मात्र सत्ता का मोह है जो उन्हें कथित ‘भ्रष्टाचार और घोटालों की सरकार’ का मुखिया बने रहने के लिए बाध्य किये हुए है ? उनकी अपनी नैतिकता क्या कठघरे में नहीं खड़ी है ?

बातें तो इससे भी आगे जाकर कही जा रही हैं कि मनमोहन सिंह की सरकार कठपुतली सरकार है और इसका रिमोट कन्ट्रोल दस जनपथ के पास है। इस सरकार में निर्णय लेने की इच्छा शक्ति नहीं है और मनमोहन सिंह कांग्रेस का असली चेहरा नहीं है। इस सबके बावजूद मनमोहन सिंह अपने दल और सरकार में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त करते हैं। सत्ताधारी दल की इसके पीछे क्या मजबूरी हो सकती है ?

जहाँ तक सत्ता मोह या कुर्सी मोह की बात है, यह कहना इस विसंगति की सरलीकृत व्याख्या होगी।  हकीकत तो यह है कि आज हमारी व्यवस्था राजनीतिक संकटों में फँसी है। सरकार ने जिन अमीरपरस्त नीतियों पर अमल किया है, उनसे अमीरी और गरीबी के बीच की खाई चौड़ी हुई है। सत्ता और सम्पति से बेदखल गरीबों का कोई पुरसाहाल नहीं है। वे लोग जिनके श्रम से देश चलता है, अपने हक और अधिकार से वंचित किये जा रहे हैं। महँगाई और भ्रष्टाचार से हर तबका त्रस्त है। जनता के पास आज इतनी समस्याएँ है कि वह इसके बोझ के नीचे दब सी गई है। जितनी जटिल समस्याएँ हैं, उतने ही तरह के आन्दोलन भी उठ खड़े हुए हैं।

यह सरकार के लिए कठिन स्थिति है  कि उसे एक तरफ अपनी नीतियों व एजेण्डे को अमल में लाना है, वहीं उसे इसका भी ख्याल रखना है कि उसकी विश्वसनीयता जनता के बीच कायम रहे। हमारी राजनीतिक प्रणाली संसदीय जनतांत्रिक है। इसकी यही खूबी है कि जिन मतदाताओं के बूते राजनीतिक पार्टी सरकार बनाती है, उसी के ऊपर उसे शासन करना होता है और आगे शासन में बने रहने के लिए उसे उन्हीं मतदाताओं के पास जाना होता है। संकट उस वक्त आता है, जब सरकार की घोषित नीतियाँ तो कुछ और होती हैं, पर अघोषित नीतियाँ कुछ और हैं जिन पर वह अमल करती है। ऐसे में इस राजनीतिक प्रणाली की वजह से सत्ताधारी दलों और उनकी सरकार को दोहरे दबाव में काम करना होता है। यही उनके चरित्र में भी दोहरापन लाता है।

इब्राहिम लिंकन ने जनतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि यह जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन है। लेकिन आज के राजनीतिक संकट के युग में यह परिभाषा बहुत प्रासंगिक नहीं रह गई है। बल्कि आज तो जनतंत्र जनता में भ्रम पैदा करने वाला शासन है जो धूर्तता और पाखण्ड के सहारे चलता है। जनता में अपना विश्वास जमाने, भ्रम पैदा करने तथा उसे अपने पक्ष में करने के लिए शासक दल, उनकी सरकारें जनता के हाव-भाव, जीवन शैली, जनता के नारे और मुद्दे अपना लेते हैं। जनतंत्र में शासक वर्ग के लिए यह जरूरी होता है क्योंकि अपनी इन्हीं तरकीबों से वह अपनी सत्ता को स्थिर करता है तथा अपनी वास्तविक नीतियों को बेरोकटोक लागू करने में सफल हो पाता है।

इंदिरा गांधी इस राजनीति की कुशल खिलाड़ी थी। उन्होंने ‘गरीबी हटाओ, समाजवाद लाओ’ के नारे के साथ देश को तानाशाही का ‘तोहफा’ दिया था। बाद के सत्ताधारी दलों और उनकी सरकारों ने इसी तरह के भ्रम पर अमल किया है। आज जब मनमोहन सिंह अपने को लोकपाल के दायरे में लाने की बात करते है तो वे उसी भ्रम को फैला रहे होते हैं तथा इसका मकसद भ्रष्टाचार को लेकर जनता में उभर रहे जन असंतोष को अपने में समायोजित कर लेना है।



जनसंस्कृति मंच लखनऊ के संयोजक और सामाजिक संघर्षों में सक्रिय.




उन दीवारों का शोर किसी ने सुना नहीं...


चारों ओर से आलीशान इमारतों से घिरे उस घर की बात ही कुछ अलग थी। उसके आसपास के सभी घर दोबारा बनाए जा चुके थे। वहां सिर्फ वही एक घर था, जो मध्यमवर्गीय परिवार की झलक दिखलाता था। शायद अब तक उस घर में बड़ा फेरबदल नहीं किया गया था...

इमरान खान

बक्शे पर खूबसूरत अंदाज़ में दर्ज के-25 और अमृता प्रीतम
 दीवारें चीखती रहीं,चिल्लाती रहीं पर किसी को कुछ सुनाई नहीं दिया। उस घर की एक-एक ईंट पर इतिहास के लाखों लफ्ज उभरे थे, लेकिन वो उन मजदूरों को दिखाई नहीं दिए, जो शायद पढऩा-लिखना नहीं जानते थे। उनके हर वार पर उस घर का जर्रा-जर्रा रोया तो जरूर होगा। अफसोस इतना कुछ होने पर भी किसी ने कुछ सुना नहीं, किसी ने कुछ देखा नहीं। 

यह सब शायद दिल्ली में ही मुमकिन है। पंजाब की बेटी जिसने अपनी कलम से दुनिया को रौशनी दिखाते हुए औरत के हक की आवाज बुलंद की, उसका घर टूट चुका है। घर टूटते ही उसका वो सपना भी चूर-चूर हो चुका है, जिसमें उसने उस घर को सदियों तक वैसा ही रखने का सोचा था। दिल्ली के हौजखास स्थित के-25 जहां अमृता ने अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा बिताया था, वो घर अब रहा नहीं। उस घर में अमृता का परिवार जिसमें उनके दोनों बेटे, उनकी बीवियां और बच्चे रहते थे, अब वहां वीरानी छाई है।

उस घर में वो इंसान भी रहता था जो अमृता के बेहद करीब था, जिसने उसकी हर याद को संजोकर रखा था। जी हां, मैं इमरोज की ही बात कर रहा हूं। वो घर किन कारणों से बिका, इसका अभी तक खुलासा नहीं हुआ है। उनके बच्चों ने इमरोज के रहने का इंतजाम तो कर दिया है, लेकिन ऐसा क्यों हुआ इससे पर्दा उठना अभी बाकी है। ज्यादातर संभावनाएं खराब आर्थिक स्थिति की हैं। अमृता तो अपनी कविताओं में रहती दुनिया तक जिंदा रहेगी, लेकिन उनके सपनों के घर को तोड़ दिया जाना भी बेहद दुखदाई है।

चारों ओर से आलीशान इमारतों से घिरे उस घर की बात ही कुछ अलग थी। उसके आसपास के सभी घर दोबारा बनाए जा चुके थे। वहां सिर्फ वही एक घर था, जो मध्यमवर्गीय परिवार की झलक दिखलाता था। शायद अब तक उस घर में बड़ा फेरबदल नहीं किया गया था, इसलिए उस घर की नक्काशी उधर से गुजरते हुए राहगीर का ध्यान अपनी ओर खींच ही लेती थी। 

घर का दरवाजा शायद उस मोहल्ले के सभी दरवाजों से छोटा था। छोटा होने पर भी उसकी शान में कोई कमी मालूम नहीं पड़ती थी। दरवाजा घर की बाईं ओर था। दरवाजे के दाईं ओर गहरे जामुनी रंग के बने दो बक्सों में एक पर के-25 और दूसरे पर दर्ज था अमृता प्रीतम। दोनों बक्सों पर लटकती पत्तियां उस नाम को और भी खूबसूरत बनाती थीं। दरवाजे की दाईं ओर बेतरतीबी से उगे रंग-बिरंगे फूलों की महक एकबारगी में ही अमृता के जीवन को उसके अंतर्मन से महसूस करने वाले के जेहन में उतार देती थी।

सफेद रंग से रंगा अमृता प्रीतम का वो घर देखने वाले को एक सुकून का अहसास करवाता था, जो शायद दिल्ली में ढूंढने पर ही कहीं मिले। दरवाजे से सीधे जाने पर दाईं ओर एक छोटा दरवाजा ऊपर को जाता था, ऊपर के कमरों में ही अमृता और इमरोज ने लगभग 40 साल बिताए थे। इतनी बड़ी लेखिका का घर इतना साधारण, पहली बार वहां जाने वाला शख्स सोचता तो जरूर होगा, लेकिन दीवारों से निकलते मोहब्बत के झोंके उसे इतना मदहोश कर देते कि और कुछ सोचने की किसी में हिम्मत न रहती। घर के आखिर में पहुंचने पर वहां प्लास्टिक की एक कुर्सी और एक छोटा टेबल रखा था। छत पर टंगा पंखा भी 30-35 साल पुराना ही मालूम होता था। इमरोज अपने चाहने वालों से उसी जगह मिला करते थे।

घर टूटने का गम अमृता और इमरोज को चाहने वाले करोड़ों लोगों को होगा, पर अफसोस कि अब कुछ किया नहीं जा सकता। हमारे बहुत से दोस्त इसका साहित्यिक विरोध भी कर रहे हैं, मगर अब इसका क्या फायदा। खरीदने वाले ने तो वहां नई इमारत बनाने का काम भी शुरू करवा दिया है। विरासत का किला तो अब ढह चुका है। अब तक तो उस घर के कण-कम में बसी मोहब्बत करोड़ों लोगों के जेहन में उतर चुकी होगी।

लेखक पत्रकार हैं.