Mar 27, 2017

सरदार जोक्स पर फाइनल फैैसला आज, सबको है इंतजार

जनज्वार। बहुचर्चित और सरदार जोक्स पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट आज विस्तृत आदेश पारित करेगा। पिछले दिनों 7 फरवरी, 2017 को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरदार जोक्स पर प्रतिबंध लगाने से मना कर दिया था। मगर साथ ही यह भी कहा था कि अगर इससे किसी की भावनाएं आहत होती हों तो वह कानूनन केस जरूर दर्ज कर सकता है।

गौरतलब है कि दिल्ली की 54 वर्षीय सिख वकील हरविंदर चौधरी ने सरदार जोक्स पर पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इस मामले में अदालत ने कहा था कि किसी समुदाय विशेष के लिए गाइडलाइन गठित की जानी काफी पेंचीदा काम है, मगर यह जरूर है कि किसी जोक विशेष से किसी को कोई परेशानी होती है तो वह कानून के अनुसार केस दर्ज करा सकता है।  

7 मार्च, 2017 को इस मामले में की गई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर अदालत किसी किसी धर्म या जाति विशेष पर कोई दिशा निर्देश जारी कर देगी तो इस फैसले के बाद अन्य दूसरी जातियां और धर्म भी इसी फैसले को आधार बनाकर अपनी मांगें मनवाएंगे। जहां तक हंसी की बात है तो उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। कोई हंसता है, कोई नहीं हंसता.

गौरतलब है कि वकील हरविंंदर चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में कहा था कि इंटरनेट पर मौजूद हजारों वेबसाइटें  सरदारों के नाम पर चुटकुले बेचती हैं, जिनमें सरदारों का बुद्धू, पागल, मूर्ख, बेवकूफ़, अनाड़ी और अंग्रेज़ी भाषा की अधूरी जानकारी रखने वाला कहते हुए मजाक उड़ाया जाता है। 

मन की बात में पहले भोजन बर्बादी पर भाषण दिया और फिर भोजन बर्बादी के कार्यक्रम के मेहमान बन गए

मोदी जी 'मन की बात' किस रिश्तेदार को सुनाते हैं, जब खुद वही करते हैं जो दूसरे पैसे वाले मंत्री, विधायक और पूंजीपति करते हैं। क्या उनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं कि ऐसे कार्यक्रमों का बहिष्कार कर अपने रईस मंत्रियों को सबसे पहले भोजन बर्बादी करने से रोकें.....

जनज्वार। मोदी जी ने जब कल मन की बात में खाने की बर्बादी पर भाषण दिया और बचाने की की अपील की तो देश को बहुत अच्छा लगा। देश के आम नागरिकों को लगा कि जिस देश की 80 फीसदी आबादी को ठीक से दो समय का भोजन नहीं मिलता, वहां इस तरह की बर्बादी रोकने पर पहल एक सकारात्मक और जरूरी प्रयास है।  
वैंकेया  नायडू  द्वारा ट्विटर पर शेयर की गई एक फोटो
पर थोड़ी ही देर में उनके बाकि बयानों की तरह यह भी खालिस ड्रामा साबित हुआ। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के शब्दों में कहें तो 'जुमला।' आपको याद होगा कि मोदी जी के हर खाते में पंद्रह लाख के बयान को अमित शाह ने मोदी जी का चुनावी जुमला बता दिया था। तब भाजपा और प्रधानमंत्री की बहुत किरकिरी हुई थी। 

कल 'मन की बात' करने के बाद मोदी जी अपनी सरकार के वरिष्ठ मंत्री वैंकेया नायडू के यहां एक भव्य कार्यक्रम में पहुंचे। वैंकेया नायडू मोदी सरकार में शहरी विकास के साथ शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री हैं। मंत्री ने अपने आवास पर 'उगादि' का आयोजन रखा था जिसमें सैकड़ों की सख्या में मेहमान पहुंचे, जिसमें बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी भी थे। उगादि दक्षिण भारत में नववर्ष का दिन होता है। मंत्री का ताल्लुक दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश से इसलिए उन्होंने अपने यहां कार्यक्रम रखा था। 

प्रधानमंत्री मन की बात करने के बाद जब इस कार्यक्रम में पहुंचे तो वहां मेहमानों को भोजन में बारहों तरह का व्यंजन परोसा गया। मंत्री जी खुद ही खुशी—खुशी दर्जनों व्यंजनों की फोटो लगाते रहे। उपर लगी तस्वीर भी मंत्री जी द्वारा शेयर की गयी तस्वीरों में से एक है। गौरतलब है कि हमारे देश में हर साल भंडारण के अभाव में ही 50,000 करोड़ रुपए यानी कुल खाद्यान्न उत्पादन का 40 फीसदी बर्बाद हो जाता है। यह बर्बादी केंद्र सरकार के मुताबिक ब्रिटेन के सालाना अनाज उत्पाद के बराबर है।  

ऐसे में सवाल बस यह कि फिर मोदी जी 'मन की बात' किस रिश्तेदार को सुनाते हैं, जब खुद वही करते हैं जो दूसरे पैसे वाले मंत्री, विधायक और पूंजीपति करते हैं। क्या उनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं कि ऐसे कार्यक्रमों का बहिष्कार करें और अपने रईस मंत्रियों को सबसे पहले भोजन बर्बादी करने से रोकें। ऐसे कार्यक्रमों में छप्पन भोग क्यों जरूरी हैं, जबकि 3—4 तरह के व्यंजनों से काम चल सकता है। 

हालांकि भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए कई प्रदेशों ने स्वाग्तयोग्य कदम भी उठाए हैं। जम्मू कश्मीर सरकार ने तो शादियों में भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए कानून तक बनाया है कि हर शादी में मीनू और खाने की मात्रा पहले ही तय कर ली जाए, ताकि खाना बर्बाद न जाए। वहीं सांसद रंजीत रंजन खाने की बर्बादी रोकने के लिए संसद में बिल पेश कर चुके हैं। 

मोदी अपने शहंशाह मानसिकता वाले मंत्रियों को बताएं कि देश का नब्बे फीसदी आमजन आज भी अपने बच्चे को रोज एक गिलास दूध नहीं दे पाता, बुंदेलखंड और विदर्भ रोज अपने बच्चे को दाल नहीं दे पाता और बंगाल, मध्यप्रदेश और उड़ीसा से लेकर उत्तर प्रदेश तक कुपोषित बच्चों वाले राज्यों में आज भी टॉप में आते हैं।

क्या दिखावे की बजाए मोदी को जीवन में उतारने वाली मन की बात नहीं करनी चाहिए। सवाल यह इसलिए भी बड़ा है कि खाने का यह भव्य आयोजन वह मंत्री कर रहा है जो शहरी व गरीबी उन्मूलन के लिए जिम्मेदार है और उन्मूलन की हालत यह है कि आज की तारीख में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बहुतायत शहरी आबादी गरीब है और उसे दो जून का संतुलित भोजन तो छोड़िए, भरपेट भोजन उपलब्ध नहीं है। 

Mar 26, 2017

भाजपा सुशासन का एक सीन यह भी

तस्वीर में दिख रहे युवक 14 किलोमीटर दूर से कंधे पर एक मरीज को लादकर ईलाज कराने के लिए लाए हैं क्योंकि वहां सरकार एंबुलेंस की व्यवस्था नहीं कर सकती।

जी हां, भाजपा शासित छत्तीसगढ़ में फिर एक बार स्वास्थ्य व्यवस्था को तार—तार कर देने वाली तस्वीर सामने आई है। जन सुविधाओं के बड़े—बड़े वायदे करने वाली छत्तीसगढ़ सरकार की हालत यह है कि वह अपने राज्य की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी को स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मुहैया करा पा रही है।

आदिवासी बहुतायत वाले दंतेवाड़ा में आज 14 किलोमीटर पैदल चलकर एक मरीज के परिजन उसे अस्पताल लेकर पहुंचे। तस्वीरों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे  14 किलोमीटर दूर से  कंधे पर मरीज को लेकर लोग पहुंचे होंगे।


सिर्फ 10 कॉरपोरेट 5 लाख करोड़ के कर्जदार और 9 करोड़ किसानों का कर्ज 12 लाख करोड़

बैंकों से लेकर नीति आयोग तक किसानों को कर्ज देने के मसले पर नाक—भौं सिकोड़ रहे हैं, पर सरकार और रिजर्व बैंक 70 हजार करोड़ से अधिक डकार जाने वाले डिफॉल्टरों का नाम बताने की हिम्मत नहीं कर पा रहे...

राजेश रपरिया 

भारतीय स्टेट बैंक की प्रमुख अरूंधति भट्टाचार्य के किसानों की कर्जमाफी से वित्तीय अनुशासन बिगड़ने के बयान से तूफान आ गया है। उन्होंने कहा कि चुनावों के वक्त किसानों का कर्ज माफ करना सही नहीं है। अगर ऐसा होता है तो हर चुनाव में कर्ज माफी की उम्मीद की जाएगी। इस बयान ने किसानों के गहरे जख्मों पर नमक तो छिड़का ही है, बल्कि बैंकिंग उद्योग को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। 

बैंको की बढ़ती अनर्जक आस्तियों (नॉन परफार्मिंग एसेट्स —एनसीए) से अर्थव्यवस्था और केंद्र सरकार की परेशानियां बढ़ गयी हैं, जबकि प्रमुख सरकारी बैंक की मुखिया अपने बयानों में ऐसे पेश आ रही हैं मानो देश की बढ़ती आर्थिक मुश्किलों का मुख्य कारण किसान ही हों। मार्च 2016 तक बैंकों की कुल कर्जराशि 70 लाख करोड़ रुपए थी, जिसमें उद्योग की हिस्सेदारी 41.71 फीसदी और कृषि कर्ज 13.49 फीसदी थी।



जाहिर है बड़े लोगों और कारोबारियों पर ही बैंकों का सबसे ज्यादा कर्ज फंसा हुआ है। पिछले 15 महीनों में बैंकों का एनपीए दोगुने से ज्यादा हो गया है। सितंबर 2015 में एनपीए 3 लाख 49 हजार 556 करोड़ रुपए के थे, जो सितंबर 2016 में बढ़कर 6 लाख 68 हजार 825 करोड़ रुपए के हो गए। विश्वविख्यात अंतरराष्ट्रीय वित्त कंपनी 'स्टैंडर्ड एंड पुअर्स' का अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में एनपीए बढ़कर 9 लाख करोड़ रुपए के पार कर जाएंगे। रिजर्व बैंक का तर्क है कि आर्थिक हालात खराब होने से कर्ई बार कर्जदार समय से कर्ज नहीं चुका पाता है। पर आर्थिक विकास दर में सुधार आने से एनपीए में कमी आएगी और रिकवरी बढ़ जाएगी। 

लेकिन विडंबना यह है कि रिजर्व बैंक और अन्य बैंक इस तरह के लाभ किसानों को देने को तैयार नहीं हैं। फिर विलफुल डिफॉल्टरों (जो कर्जदाता जानबूझ कर कर्ज वापस नहीं करते, जबकि कर्ज वापस करने की उनकी हैसियत होती है) का आंकड़ा और नाम क्यों छुपाया जाता है, इसका कोई वाजिब तर्क न रिजर्व बैंक के पास है और न ही केंद्र सरकार के पास। यह कर्जदार गलत हथकंडों और सांठगांठ से भारी मात्रा में बैंकों से कर्ज पाते हैं, जो बैंकों, बड़े लोगों और राजनेताओं के कारनामों का जीता—जागता पुराण है। जनता के पैसों पर यह डिफॉल्टर बेनामी संपत्तियां बनाते हैं और विलासिता में करोड़ों—करोड़ रुपए उड़ा देते हैं। गौरतलब है कि 10 बड़े कॉरपोरेट समूहों पर 5 लाख 73 हजार 682 करोड़ रुपए का कर्ज है। यह जानकारी राज्य सभा में वित्त राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने दी है। 

अपनी रिपोर्टों के लिए चर्चित न्यूज वेबसाइट न्यूज लॉन्ड्री ने इन डिफॉल्टरों के नाम उजागर किए। समाचार साइट फर्स्ट पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार 7129 बैंक खातों को डिफॉल्टर घोषित किया गया है, जिन पर 70 हजार 540 करोड़ का कर्ज है। इस साइट पर 18 बड़े कर्जदारों के नाम भी हैं। मोटा अनुमान है कि तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए ये डकार गए हैं। इनमें विजय माल्या का नाम जगजाहिर है। पर उषा इस्पात समूह के 17 हजार करोड़ रुपए के कर्ज डकारने की पूरी दास्तान जानकर न केवल किसी के होश उड़ जाएंगे, बल्कि गुस्सा भी आएगा कि एक छोटा—सा कर्ज देने के लिए बैंक कितने चक्कर लगवाता है, दस्तावेज मांगता है। पर इन डिफॉल्टरों को कर्ज पर कर्ज देने में इन्हें कोई परेशानी नहीं आती है। सच तो यह है कि इन बड़े आदमी के आगे बैंकों की बोलती बंद हो जाती है। ऐसा तब है जबकि रिजर्व बैंक बताता है कि कृषि कर्ज में किसान कर्ज ही नहीं कृषि कारोबार कर्ज भी शामिल रहता है । 

नवंबर 2016 में वित्त राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने राज्यसभा में बताया कि सितंबर 2016 तक कुल कृषि कर्ज 12 लाख 60 करोड़ रुपए थे। इनमें से 7.75 लाख करोड़ के कृषि ऋ़ण थे और 4.84 लाख करोड़ रुपए के दीर्घकालिक कर्ज। उन्होंने यह भी साफ किया कि कृषि कल्याण कोष में किसानों की कर्ज अदायगी का कोई इरादा सरकार का नहीं है। कागज पर पिछले 15 सालों में कृषि कर्ज 8 गुना से ज्यादा बढ़े हैं, लेकिन उस अनुपात में किसानों खासकर छोटे, लघु और सीमांत किसानों के कर्ज नहीं बढ़े हैं। 

बजट भाषण में किसान 
किसानों के लिए 10 लाख करोड़ के कृषि कर्ज का लक्ष्य रखा गया है, जो लगभग बैंकों के संभावित कुल एनपीए के बराबर है। 

रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर मूलत: आधारित आर. राम कुमार और पल्लवी चौहान का शोधपत्र साफ बताता है कि बैंकिंग सेवा के भारी विस्तार और लक्ष्यों के बावजूद सीमांत किसानों की कर्ज निर्भरता सूदखोरों पर बढ़ी है। देश में 95 फीसदी सीमांत, लघु और छोटे किसान हैं जिनके पास एक, दो या पांच हेक्टेयर या उससे कम खेत हैं। देश की कुल कृषियोग्य भूमि का 68.7 फीसदी हिस्सा इन किसानों के पास है। इन किसानों के लिए अरसे से किसानी घाटे का सौदा बन गयी है। बाजार और मौसम की मार से उन्हें कोई कारगर सुरक्षा प्राप्त नहीं है। 


सरकार नहीं जानती किन पूंजीपतियों के कर्ज माफ हुए 
बैंकों ने बड़े कर्जदारों के 1.14 करोड़ रुपए के कर्ज तीन सालों 2013—2015 के कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिए। राजनीतिक बयानबाजी में इसे कर्जमाफी कहा जाता है। वित्त राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने राज्य सभा में बताया है कि 2015—2016 में भी 59 हजार 547 करोड़ रुपए बैंकों ने बट्टे खाते में डाले हैं। पर आश्चचर्य यह है कि जिन बड़े कर्जदारों के कर्ज बट्टे खाते में डाले गए हैं, इसकी जानकारी न रिजर्व बैंक के पास है न ही केंद्र सरकार के पास है। 

पिछले कुछ सालों में सवा 2 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। 2015 में 8 हजार 7 किसानों ने आत्महत्या की। यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे साफ जाहिर है कि देश में किसानों की आर्थिक हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। तमिलनाडु में सदी का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है। वहां के किसान 60 फीसदी सूद पर कर्ज लेने को मजबूर हैं, जबकि केंद्र सरकार का निर्देश किसानों को 7 फीसदी पर कर्ज देने का है। वहीं केरल में 115 साल बाद का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है, जिसके लिए केंद्र सरकार से 1000 करोड़ रुपए की मदद चाहिए। बैंकों ने पिछले 10—15 सालों में सवा 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा बट्टे खाते में डाल दिए हैं तो किसानों का कर्ज क्यों नहीं माफ किया जा सकता है। केंद्र सरकार को छोटे, सीमांत और लघु किसानों की कर्ज अदायगी के बारे में संजीदगी से सोचने का वक्त है। उत्तर प्रदेश में फसली ऋणों की घोषणा अपने भाषणों में कर सकते हैं, तो बाकि देश के किसानों ने क्या गुनाह किया है। 

एनपीए का नुकसान छोटे कर्जदारों और किसानों को 
बैंकों के एनपीए पिछले कुछ सालों से बेहिसाब बढ़े हैं। बढ़ते एनपीए से बैंकों की कर्ज देने की क्षमता कम होती है और कर्ज की ब्याज दरें अनावश्यक रूप से ज्यादा बनी रहती हैं। इसका असली खामियाजा छोटे बचतकर्ताओं और कर्जदारों को भुगतना पड़ता है। बैंक की भाषा में छोटे कर्जदारों को 'स्मॉल ब़रोअर' कहा जाता है। 1991 में शुरू हुए उदारीकृत अर्थव्यवस्था के दौर से छोटे कर्जदारों की हिस्सेदारी 63 फीसदी से घटकर 32 फीसदी रह गयी है। टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज के आर रामकुमार और पल्लवी चौहान के शोधपत्र में पुख्ता ढंग से यह बात सामने आयी है कि बैंकिंग उद्योग किसानों से दूर केवल बड़े लोगों और कारोबारियों का बन कर रह गया है। 

(राजेश रपरिया वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार हैं। यह लेख दैनिक भास्कर से साभार।)

Mar 25, 2017

सदी के सबसे भयंकर सूखे के बीच खड़ा नरमुंड लिया किसान

हर तीसरे घर में अपने मुखिया के खो जाने के बाद दुख में व्याकुल लोग मिल जाएंगे। तबाही का ये मंजर है कि अक्टूबर 2016 से आत्महत्याओं का आंकड़ा 254 पहुंच गया.....

आकांक्षा 

जंतर मंतर के सामने अपने आगे नरकंकालों की खोपड़ियां लिए धरने पर बैठे कुछ लोग सूनी आंखों से अपना दर्द बयान कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से खबरों में यही तस्वीर दिखाई जा रही हैं। ये लोग कोई और नहीं तमिलनाडु के किसान हैं। देश का अन्नदाता कहे जाने वाले किसान की ये दुर्दशा हो गई है कि खेतों की बजाय खोपड़ियां लिए प्रदर्शन करने को मजबूर हैं। वजह भयंकर सूखे के हालात, जो अकाल जैसी स्थिति में बदलते जा रहे हैं। 

भारत का दूसरा बड़ा चावल उत्पादक प्रदेश तमिलनाडु आज सदी के भीषण सूखे से जूझ रहा है। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि पिछले दो महीनों में 65 किसानों ने आत्महत्या कर ली। दिन पर दिन स्थिति और बिगड़ती ही जा रही है। अक्टूबर 2016 से ये सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इन हालातों को देखते हुए एआईडीएमके के नेता पन्नीरसेलवम ने जनवरी 2017 में तमिलनाडु के 32 जिलों के सूखे की चपेट में होने की रिपोर्ट केंद्र सरकार को दी है। तकरीबन 13,305 गांव बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। 

गौरतलब है कि पूरे तमिलनाडु में औसत से 35 से 85 प्रतिशत बारिश कम हुई है, जिसकी सीधी मार फसलों पर पड़ी है। सूखे के हालात और भी बदतर तब हुए जब कर्नाटक ने कावेरी नदी का पानी रोक लिया। इन सब  कारण पहले तो सामान्य से 40 से 50 प्रतिशत खेती नहीं हुई, जो हुई वह भी बिना पानी बर्बाद हो गई। फसलों से लहलहाने वाले खेत आज बंजर भूमि में तब्दील होकर रह गए और किसान हताशा के बोझ तले दब गए। तमिलनाडु के साथ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल के कुछ हिस्से भी सूखे से जूझ रहे हैं। 

हताशा का मंज़र

तमिलनाडु के औसत किसान के पास एक से तीन एकड़ जमीन है, जिस पर 15000 से 18000 रुपए प्रति एकड़ तक का खर्च आता है। लेकिन 2016 से हालात ऐसे बदले कि देखते ही देखते कृषि दर सामान्य से 40 से 50 प्रतिशत घट गयी। जिन किसानों की फसलें लहलहाने का और कटाई के बाद खुशियां मनाने का वक्त था, वह सूखे की चपेट में ऐसी आई कि घरों में मातम पसर गया। हर तीसरा घर मातम मनाता नजर आता है। 

एक किसान अपनी 3 एकड़ की फसल की बर्बादी को देखकर इस कदर टूटा कि अपने बेटे को चाय लाने के बहाने भेजकर आत्महत्या कर ली। फसलों की बर्बादी और कर्ज की लटकती तलवारों से निजात पाने का सिर्फ एक यही तरीका किसानों के पास रह गया है। 

तमिलनाडु के हर तीसरे घर में अपने मुखिया के खो जाने के बाद दुख में व्याकुल लोग मिल जाएंगे। तबाही का ये मंजर है कि अक्टूबर 2016 से आत्महत्याओं का आंकड़ा 254 पहुंच गया। पिछले दो महीनों में 65 किसानों ने भी यही रूख अपनाया। लेकिन सरकारी कागजों में ये आंकड़ा सिर्फ 17 तक ही पहुंचा। तमिलनाडु किसान संगठन के नेता बी आर पंडियन ने सरकार पर गुमराह करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरकार सही आंकड़े छुपा रही है जिससे हालात और बिगड़ सकते हैं।

सरकार का रुख

बर्बाद होती फसलें लगातार बढ़ती आत्महत्याओं और धरने प्रदर्शन के बाद सरकार ने तमिलनाडु को 10 जनवरी, 2017 को सूखाग्रसित राज्य घोषित कर दिया। सरकार ने करीब 10 दिन पहले नागापटटीनम और थंजावूर जैसे भारी तबाही वाले जिलों में किसान परिवारों को 3 लाख रुपए मदद के रूप में दिए। किसानों की प्रति एकड़ बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा देने का वादा भी किया गया। केंद्र ने सूखाग्रसित तमिलनाडु के लिए करीब 2014 करोड़ रुपए की सहायता राशि अनुमोदित की है। राज्य सरकार को केंद्र से 39000 करोड़ रुपए की मदद की उम्मीद थी। 

इस बारे में किसान संगठन अध्यक्ष बी पंडियन का कहना है ये राशि घड़े में एक बूंद के समान है। सरकार ने प्रति एकड़ जमीन के हिसाब से भी क्षतिपूर्ति देने का वादा किया है। इसमें कावेरी नदी के आसपास वाले किसानों को 25000 प्रति एकड़ दिए जाएंगे, जबकि अन्य किसानों को 21000 से 26000 प्रति एकड़ के बीच आपदा राहत कोष से सहायता मिलेगी। सर्वे के मुताबिक कावेरी नदी के आसपास करीब 80000 एकड़ फसल बर्बाद हुई है। यूं तो सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 130,000 धान के खेतों का बीमा किया हुआ था, जिसके अंतर्गत करीब 95 प्रतिशत किसानों के खेत आते हैं। कुल मिलाकर 11 करोड़ की प्रीमियम राशि भी किसानों तक पहुंच जाए, तो आत्महत्या जैसे हताशा भरे कदम से तो निजात मिलेगी।

सरकार के वादों से उम्मीद की जा सकती है कि किसानों की बदतर स्थिति में थोड़ा सुधार आएगा। लेकिन ये तभी मुमकिन है जब सरकार और किसानों के बीच के लंबे फासले को घटाया जा सके, ताकि मदद की गुहार लगाते किसानों को कुछ लाभ मिल सके।

मानसून की मार 

मौसम विभाग के अनुसार तमिलनाडु में इस बार 70 प्रतिशत मानसून कम रहा, जिसका सीधा असर भूमिगत जल स्तर पर पड़ा जो 85 प्रतिशत कम हो गया। जाहिर है बिना पानी के फसलें बुरी तरह बर्बाद हो गईं। मौसम विभाग के मुताबिक जून से सितंबर के बीच आने वाले दक्षिण पश्चिम मानसून पिछले 140 सालों में सबसे खराब रहा। यही हाल उत्तर पूर्वी मानसून का भी रहा, जो तमिलनाडु से होता हुआ आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों दक्षिण कर्नाटक और केरल से होकर जाता है। 145 सालों में दूसरी बार ये खराब मानसून रहा। इसका सीधा असर जल स्त्रोतों पर पड़ा, जो 20 प्रतिशत तक सूख गए। 

इसी के साथ पेयजल का संकट भी गहराने लगा है। सरकार की ओर से नदी नहरों के मरम्मत के लिए भी करोड़ों का प्रावधान रखा गया है जिससे किसानों को मनरेगा के तहत काम मिल सके। मनरेगा योजना में भी 100 दिन से बढ़ाकर 150 दिन कर दिए गए हैं, ताकि काम करने वाले किसानों की रोजी रोटी चल सके। 


आकांक्षा युवा पत्रकार हैं।
editorjanjwar@gmail.com

Mar 24, 2017

वीसी के सामने कांफ्रेंस में पीटा महिला कर्मचारी को

जनज्वार। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की जूनियर स्टोर इंचार्ज डॉक्टर पुष्पा गौतम की पिटाई का वीडियो सामने आने के बाद कल बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच ने झांसी मेडिकल कॉलेज उनसे मुलाकात की। पुष्पा गौतम पर हुए जानलेवा हमले के बाद से ही वह मेडिकल कॉलेज में भर्ती हैं। 

पुष्पा गौतम से मुलाकात करते दलित अधिकार मंच के लोग 

बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच के कुलदीप बौद्ध ने बताया कि वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि पांच - सात पुरुष कर्मचारी पुष्पा गौतम को लाल—घूसों और कुर्सी उठाकर मार रहे हैं लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने दोषी सात कर्मचारियों के साथ पुष्पा गौतम को क्यों निलंबित कर दिया है, समझ से परे है। 

गौरतलब है कि 18 मार्च को परिक्षाओं के मद्देनजर वीसी की उपस्थिति में झांसी के बुंदेलखंड विश्व​विद्यालय के सभी प्रशासनिक कर्मचारियों की बैठक चल रही थी। बैठक में जैसे ही पुष्पा गौतम ने बताना शुरू किया कि उनसे पिछले कुछ महीनों से तीन—चार कर्मचारी नेता दो लाख रुपया मांग रहे हैं तभी वह नेता पुष्पा पर पिल पड़े। 

अस्पताल में कुलदीप बौद्ध को मामले की जानकारी देते हुए पुष्पा गौतम ने बताया कि मारने वाले कर्मचारी ज्यादातर पिछड़ी जाति से हैं और मैं दलित। अशोक कुशवाहा, संतोष कुशवाहा, उमेश करोलिया, मुकेश शर्मा आदि लोग समय—समय पर मुझ पर दबाव बनाते थे और कहते थे तुम बहुत कमाती हो दो लाख हमें भी दो। हमारे विभाग का एक चपरासी भी इनके साथ है। वह एक ​दिन ड्यूटी पर नहीं आया तो मैंने अनु​पस्थिति दर्ज कर दी। इस पर उसने मुझे धमकी दी। बाद में उसने उन लोगों को भी धमकोने के लिए बुलाया जिनका नाम मैंने उपर बताया। फिर वो लोग दो लाख को लेकर कहने लगे। मैंने कह दिया, मैं नहीं दूंगी और अब मैं वीसी से शिकायत करूंगी। और उस दिन मैं शिकायत ही करने के लिए उठी थी और मामले की जानकारी ही दे रही थी कि इन लोगों ने मुझपर हमला कर दिया। 

फिलहाल मुकदमा दर्ज हो गया है। पर एक भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई है। आरोपी फोन पर धमकी देकर एसएसटी एक्ट के तहत दर्ज मामले को वापस लेने की बात कर रहे हैं। पर पुष्पा गौतम का कहना है कि मैं पीछे नहीं हटुंगी, मैं दोषियों को सजा दिला के रहुंगी। 

पुष्पा गौतम पर हमले का वीडियो 

Mar 23, 2017

योगी के एंटी रोमियो दल की करतूत देखकर खून न खौला तो पानी है

उत्तर प्रदेश में एंटी रोमियो दल कैसे काम कर रहा है उसको जानना है तो आप तीन मिनट का यह ​वीडियो जरूर देख लें। लखनऊ  के राममनोहर लोहिया पार्क का यह वीडियो बताने के लिए काफी है कि आपने कैसी और किसकी सरकार चुनी है। जिस तरह वीडियो में लड़के—लड़कियों का बेइज्जत किया जा रहा है, मारा—पीटा जा रहा है, उसको देख कर आपका खून खौल जाएगा कि इसी दिन के लिए भाजपा को पूर्ण बहुमत की सरकार दी थी। 

इतना याद रखिए अगर यह सिलसिला चलता रहा और आप तमाशा देखते रहे तो एक दिन आप, आपकी बहन, प्रेमिका, दोस्त शिकार किए जाएंगे और तब कहने वाला कोई न होगा ! 


Mar 22, 2017

दलित लड़की का गैंगरेप, विरोध करने पर भाई की उंंगलियां काटीं

योगी जी की पुलिस पहले गैंगरेप के सबूत मिटाती है फिर चार दिन बाद ​मुकदमा दर्ज करती है


जनज्वार। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही एक्शन में आए योगी आदित्यनाथ के प्रदेश की स्थिति यह है कि वहां चार ब्राह्मण जाति के लड़के जीतू, बॉबी, रितेश और प्रवीण पहले एक नाबालिग दलित लड़की का गैंगरेप करते हैं, भाई द्वारा विरोध करने पर उसकी उंगलियां काटते हैं, पेट में चाकू से 10 बार से ज्यादा वार करते हैं, मरा हुआ जानकर छोड़ जाते हैं और पिता शिब्बू जब इन घटनाओं को बताने के लिए पुलिस को फोन करते हैं तो इलाके का एसएचओ पीड़िता के बाप को एक रात हवालात की हवा खिलाकर कुटाई करता है कि तुम अपना केस वापस लो, मासूम लड़कों को बलात्कार जैसे संगीन आरोप में न फंसाओ, उनकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। 

और जब पिता ऐसा नहीं करता है तो आरोपियों के परिजन 17 वर्षीय नाबालिग पीड़िता के पिता के घर की छत में छेद करते हैं, उसे बाहर निकालते हैं, दम भर कु​टाई करते हैं और फिर घर लूटकर फूंक देते हैं। जिसमें दो मोटरसाइकिलों समेत सबकुछ जलकर खाक हो जाता है। साथ ही आरोपियों के परिजन धमकाते हैं अब राज बदल गया है. भाजपा विधायक अनिल शर्मा भी हमारा, पुलिस भी  हमारी. इस बीच वाल्मिकी परिवार खेतों—खलिहानों के रास्ते भागते हुए बुलंदशहर जाकर अपनी जान बचाता है। लूटपाट, आगजनी और जान से मारने की कोशिश के मामले में  मनोज, मनोज की घरवाली, पंकज, मुकेश, मनीष, नीतू, सोनू, राधा शर्मा,  शिवदत्त, सत्ता, वीरेंद्र और सोमू पर मुकदमा दर्ज है। पर एक भी गिरफ्तारी अबतक नहीं हुई है।

जी, हां। यही हुआ है यूपी के बुलंदशहर जिला के थाना जहांगिराबाद के ​कटियावली गांव में। गांव में तीन घर वाल्मिकी और पूरा गांव ब्राह्मणों का है। 14 मार्च की शाम 7.30 बजे अपने घेर (घर से अलग थोड़ी दूर पर जहां जानवरों को पालते हैं) पर पीड़िता जानवरों को बांधकर लौटने की ही वाली थी कि चार ब्राह्मण जाति के लड़कों ने उसको दबोच कर गैंगरेप किया। रेप करने वाले चारों आरोपियों की उम्र 20 से 30 साल के बीच है। 

पीड़ित पक्ष के वकील रणवीर सिंह लोधी बताते हैं, '14 मार्च की घटना का मुकदमा 18 मार्च को दर्ज हुआ। जहांगीराबाद थाना प्रभारी श्यामवीर ​सिंह ने मुकदमा दर्ज करने की बजाए पीड़िता के पिता को ही हवालात में डाल दिया और मुकदमा नहीं लिखाने पर दबाव बनाने लगे। दो दिन बाद में जब ये लोग मेरे पास आए तो एसएसपी सोनिया सिंह के हस्तक्षेप पर धारा 376, एसएसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है। हालांकि अब तक चारों में से किसी आरोपी की गिरफ्तारी पुलिस नहीं कर सकी है। पुलिस ने यह जरूर किया है कि आरोपियों के साथ मिलकर ज्यादातर सबूत मिटा दिए हैं।'

मुकदमा दर्ज कराए जाने के बाद पीड़ित परिवार गांव लौटने की हिम्मत नहीं कर पा रहा। मगर सरकार की ओर से अब तक पीड़ित परिवार के लिए न तो रहने की कोई व्यवस्था, न सुरक्षा और न ही कोई आर्थिक मदद मिली है। पीड़िता के भाई को बुलंदशहर जिला अस्पताल से दिल्ली रेफर कर दिया गया है। वहां के डॉक्टरों ने बताया कि पीड़िता के भाई राजा की हालत नाजुक है, उसे बेहतर ईलाज की जरूरत है। 

गौरतलब है कि 14 मार्च की शाम पीड़िता की चीख सुन उसका भाई राजा उसको बचाने के लिए दौड़ा आया। भाई को देख चारों ने लड़की को छोड़ उस पर हमला कर दिया। दरिंदों ने बचाव करते भाई के हाथ की चार उंगलियां काट दीं और 10 बार से ज्यादा बार चाकू से वार किया। इस जघन्य वारदात की सूचना के लिए पीड़िता के पिता ने रात में कई बार पुलिस के 100 नंबर पर फोन किया पर कोई नहीं आया। पीड़िता के पिता शिब्बू अन्य रिेश्तेदारों के साथ बेटे को नजदीकी अस्पताल में ले गए।