Dec 18, 2008

मुंतदिर अल जैदी को सलाम


तानाशाह और जूते

मदन कश्यप

उसके जूते की चमक इतनी तेज थी
कि सूरज उसमें अपनी झाइयां देख सकता था
वह दो कदम में नाप लेता था दुनिया
और मानता था कि पूरी पृथ्वी उसके जूतों के नीचे है
चलते वक्त वह चलता नहीं था
जूतों से रौंदता था धरती को

उसे अपने जूतों पर बहुत गुमान था
वह सोच भी नहीं सकता था
कि एक बार रौंदे जाने के बाद
कोई फिर से उठा सकता है अपना सिर
कि अचानक ही हुआ यह सब

एक जोड़े साधारण पांव से निकला एक जोड़ा जूता
और उछल पड़ा उसकी ओर
उसने एक को हाथ में थामना चाहा
और दूसरे से बचने के लिए सिर मेज पर झुका लिया
ताकत का खेल खेलने वाले तमाम मदारी
हतप्रभ होकर देखते रहे
और जूते चल पड़े
दुनिया के सबसे चमकदार सिर की तरफ
नौवों दिशाओं में तनी रह गयीं मिसाइलें
अपनी आखिरी गणना में गड़बड़ा गया
मंगलग्रह पर जीवन के आंकड़े ढूंढने वाला कम्प्यूटर
सेनाएं देखती रह गयीं
कमांडों लपक कर रोक भी न पाये
और उछल पड़े जूते

वह खुश हुआ कि आखिरकार उसके सिर पर नहीं पड़े जूते
शर्म होती तब तो पानी पानी होता
मगर यह क्या कि एक जोड़े जूते के उछलते ही
खिसक गयी उसके पांव के नीचे दबी दुनिया
चारो तरफ से फेंके जाने लगे जूते
और देखते देखते
फटे पुराने, गंदे गंधाये जूतों के ढेर के नीचे
दब गया दुनिया का सबसे ताकतवर तानाशाह

Oct 11, 2008

जेल से पत्र

उन्होंने जेलों से पत्र भेजा है

अजय प्रकाश

उत्तर प्रदेष कचहरी बम विस्फोट के दो मुख्य आरोपी मोहम्मद हकीम तारिक कासमी और मोहम्मद खालिद मोजाहिद पर से हाल ही में अदालत ने देषद्रोह का मुकदमा खारिज कर दिया। ये दोनों आरोपी बाराबंकी जेल में बंद हैं। इसी केस में कोलकाता से गिरफ्तार आफताब अंसारी पहले ही बाइज्जत रिहा हो चुके हैं। एसटीएफ ने गिरफ्तारी के वक्त आफताब को इंडियन मुजाहिद्दीन का कमांडर बताया था जबकि तारिक और खालिद को मास्टर माइंड कहा।
गिरफ्तारी के बाद पुलिस और एसटीएफ ने आरोपियों के साथ कैसा व्यवहार किया इस बारे में तारिक और खालिद ने जज और जेल अधीक्षक के नाम जेल से पत्र लिखे। पत्र की मूल प्रतियां उर्दू में हैं। जेलों में गुजारे गये दिनों के बारे में उन पत्रों में विस्तार से चर्चा की गयी है। उसके एक छोटे से हिस्से का अनुवाद हम हिंदी में छाप रहे हैं।


श्रीमान श्रीमान अधीक्षक साहब
सीजेएम साहब जिला कारागार लखनउ
फैजाबाद
मैं मुहम्मद खालिद महतवाना (मुहल्ला) मड़ियाहूं जिला जौनपुर का रहने वाला हूं। 16-12-07 की षाम एसटीएफ वाले मड़ियाहूं बाजार के दुकान से लोगों की मौजूदगी में मुझे उठाये और नामालुम जगह पर ले गये। जहां जबरदस्त तषद्दुद किया। मुख्तलिफ तरीके से मारा पिटा। दाढ़ी के बाल जगह जगह से उखाड़े गये। दोनों पैरों का चीरकर उस पर खड़े होकर अजू-ए-तनासुल (लिंग) को मुंह में डालकर चुसवाया गया। पखाना के रास्ते पेट्रोल डालना, षर्मगाह को धागे से बांधकर दूसरे किनारे पर पत्थर बांधकर खड़ा कर देना और षर्मगाह पर सिगरेट दागना आम बात थी। षराब पिलाना और सुअर का गोष्त खिलाना, पेषाब पिलाना जारी रहा। साथ ही बर्फ लगाना, मूंह और नाक के रास्ते जबरदस्ती पानी पिलाया जाता रहा,जिससे दम घुटने लगता था। इलेक्ट्रिकल षोला मारते हुए आला के जरिये से जिस्म जलाना, करंट चार्ज का देना आम बात थी। यह सिर्फ इसलिए किया जाता रहा कि हम मान लें कि गुनहगार हैं।




श्रीमान श्रीमान अधीक्षक साहब
सीजेएम साहब जिला कारागार लखनउ
फैजाबाद

तारिक कासमी

निवेदन इस प्रकार है कि मैं मुहम्मद तारिक पुत्र श्री रियाज अहमद साकिन सम्मुपुर रानी की सराय आजमगढ़ का रहने वाला हूं। 12 दिसंबर को मेरी अपनी दवाई की दुकान के आगे के रास्ते से राह चलते हुए एसटीएफ के जरिये उठाया गया और 10 दिन तक गैर इंसानी सुलूक और तषद्दुद करके झुठी कहांनियां गढ़कर विडियो बनवाई गयी। 22 दिसंबर को अपनी गाड़ी से एसटीएफ वाले बाराबंकी ले गये और आरडीएक्स और दिगर सामान के साथ हमारी गिरफ्तारी दिखाई गयी। जबकि हम 10 दिनों से इन्हीं के कब्जे में थे। हमारे पास आरडीएक्स या कोई भी सामान नहीं था। 24 दिसंबर से दो जनवरी तक रिमाण्ड पर एसटीएफ ने आफिस में ही रखा था। दूसरी रिमाण्ड सीओ फैजाबाद के जरिये 9 जनवरी को को षुरू हुई । दिन रात तषद्दुद के जरिये अपनी मकसद की बात करवाते रहे। 17 जनवरी 2008 की रात में सीओ सीटी फैजाबाद श्री राजेष पाण्डेय और एसटीएफ दरोगा ओपी पाण्डेय ने एक छोटी लाल रंग की बैटरी (जिस पर षक्ति लिखा हुआ था और उसपर कोई ऐसी चीज लगी हुई थी जो चिपक रही थी) को पकड़वाया था। इसके बाद डाबर केवड़ा की बोतलें पकड़वायी गयी और फिर आखों पर पट्टी बांधकर दूसरे कमरे में ले गये। मालुम नहीं हाथों में क्या क्या चीजें पकड़वायीं। पट्टी बंधी होने की वजह से मालुम नहीं हो पाया। हां इतना अंदाजा हुआ कि डिब्बा और बैग है। मुझे डर इस बात का है कि इन्होंने हमारे फिंगर प्रिंट मुख्तलिफ तरीकों से लिए और इस चीज की कोषिष की, हम समझने न पायें। अत: आपसे निवेदन है कि ये लोग हमको फंसाना चाहते हैं। सुबूत में ये फिंगर प्रिंट पेष करें तो आप हमारी इन बातों का जरूर ध्यान रखें, आपकी अतिकृपा होगी। मैं एक अमन पसंद, मुहिब्बे वतन षहरी हूं, मैंने कभी कोई अपराध नहीं किया है और ना ही ऐसी तबयत का हूं।

Sep 30, 2008

शाहिद बदर का साक्षात्कार


इस्लामिक स्टूडेंट मूवमेंट ऑफ इंडिया के अध्यक्ष शाहिद बदर से बातचीत

हमने नौजवानों को हौसला दिया है हथियार नहीं

अजय प्रकाश

आजमगढ़ के प'सिध्द नेशनल सिबली कॉलेज से कुछ फर्लांग की दूरी पर शाहिद बदर एक यूनानी दवाखाना चलाते हैं। यह वही बदर हैं जिन्हें दि'ी पुलिस ने सिमी को प'तिबंधित किये जाने के मात्र बारह घंटे बाद मु'य कार्यालय जाकिर नगर से गिरफ्तार किया था। इसके बाद बदर ने तिहाड़, बहराईच, गोरखपुर और आजमगढ़ जेल में तीस महीने गुजारे। जेल से छूटने के बाद जहां एक तरफ सिमी अध्यक्ष प'तिबंध हटाये जाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, वहीं गिरफ्तारी के बाद लगभग बिखर चुके परिवार को समेटने का भी प'यास कर रहे हैं। देश उन्हें किस रूप में याद करता है यह बहस का मसला है, कानून क्या व्यवहार करता है यह अदालती जिम्मेदारी है, मगर आजमगढ़ के लोग उन्हें हकीम कहते हैं। शाहिद कहते हैं, 'अपनी मिट्टी ने मुझे जो अपनत्व दिया है उसके बलबूते हम हर दाग को धो डालेंगे।' सिबली कॉलेज के पि'ंसिपल इ्फितखार अहमद हों या फिर टौंस नदी के तट पर बसे गांव दाउदपुर के हरीशचन्द' यादव, इन जैसे तमाम आम लोगों की निगाह में उनके डॉक्टर साहब भले और सामाजिक मनई (आदमी) हैं।
बहरहाल, सिमी कार्यकर्ताओं की मध्यप'देश में हुई ताजातरीन गिरफ्तारियों के मद्देनजर उनसे तमाम सांगठनिक पहलुओं पर विस्तार से बातचीत हुई, पेश हैं मु'य अंश

हाल के दिनों में सिर्फ मध्यप'देश में ही लगभग दो दर्जन सिमी कार्यकर्ता पकड़े गये हैं, उनकी रिहाई के लिए आपकी तरफ से क्या प'यास हो रहा है?
फिलहाल वे लोग चौदह दिनों की रिमाण्ड पर हैं और अखबारों में लिखा है कि जरूरत पड़ी तो रिमाण्ड अवधि और बढ़ाई जा सकती है। इसलिए हम भी अभी देख ही रहे हैं कि और कितने बम, गोला, बारूद पुलिस रिमाण्ड पर लिए जाने के बाद पुलिस उनके पास से बरामद कराती है। बताते चलें कि नागौरी को छोड़कर और कोई भी नाम ऐसा नहीं है जिसे हम सिमी का कार्यकर्ता कह सकें। रही बात पुलिस की, तो वह किसी भी मुसलमान युवक को सिमी कार्यकर्ता बता सकती है और मीडिया आतंकवादी।

इस पूर्वाग'ह की कोई वजह ?
यह पूर्वाग'ह नहीं, भुगते हुए दिल का दर्द है। पुलिसिया फर्जीवाड़ों की चर्चा क्या की जाये। हमारे खिलाफती बहुत सारी बातें पत्रकारों ने भी ऐसी लिखीं या बोलीं जो हमने कभी कहीं थीं। लेकिन उन्हें हमारी ही जुबानी पेश किया गया और हम कुछ न कर सके। हम देखते रहे उन खबरों को, पलटते रहे अपने खिलाफ छपे पन्नों को, सबकुछ जानते हुए भी हम चुप रहे क्योंकि वो जरिया हमारे पास नहीं है जो एक खबरनवीस के पास है। आपसे गुजारिश है कि जो हम कहें उसी को प'काशित करें।

जो तोहमत आप मीडिया पर लगा रहे हैं उसका कोई आधार?
दो चार वजहें हों तो बतायें। हमारे बारे में हर बार वही कहा गया जो सरकार या खुफिया एजेंसियां मीडिया से कहलवाना चाहती थीं। 2006 में हुए मुंबई सिरियल बम धमाकों को ही लीजिए। धमाकों के ठीक बाद खुफिया ने आरोप लगाया कि
उसमें सिमी का हाथ है। उस समय मैं दि'ी में मौजूद था और दो दिन बाद दि'ी के पटियाला हाउस कोर्ट परिसर में प'ेस कांफ'ेंस कर अपना पक्ष रखा। लोगों ने मना किया, शुभचिंतकों ने कहा, सिमी प'तिबंधित है और मैं गिरफ्तार कर लिया जाऊंगा। लोग इसलिए भी डर रहे थे कि मैं तीस महीने की सजा काटकर हाल ही में लौटा था। फिर भी यह सोचकर मीडिया से रू-ब-रू हुआ कि अब और फर्जी दोषारोपण सहना ठीक नहीं। मगर इस बार भी मीडिया ने खुफिया एजेंसियों की ही तीमारदारी की और हम आहत हुए। खुफिया और सरकार के दबाव के बाद जो इमानदारी बची थी वह खोजी और विशेष खबरों की तेजी में गुम हो गयी। पत्रकार ख़ुद को स्टार साबित करने के लिए और मीडिया घराने मुनाफे के लिए एक पूरे समुदाय के साथ जो नाइंसाफी करते हैं उसे मुनासिब नहीं कहा जा सकता। लगभग दो साल पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक नुमाइन्दे ने फोन करके कहा कि वह हमसे गुप्तगू करना चाहता है। उन दिनों मैं केस के सिलसिले में दि'ी के जामिया नगर में रहा करता था। उसने मेरा साक्षात्कार जामिया नगर की सड़क पर किया। पर शाम के वक्त उस चैनल के स्टूडियो में मैं मध्यप'देश राज्य की पहाड़ियों के बीच था। टीवी एंकर ऐलान के अंदाज में कहता रहा, ''जिस खूंखार आतंकवादी शाहिद बदर को खुफिया पुलिस ढूंढने में नाकाम रही, उसे हमारे रिपोर्टर ने खोज निकाला है।'' एक हकीकत यह थी कि मैं दि'ी के जामिया नगर में अपने दोस्त के यहां बैठा उस कार्यक'म की देख रहा था, वहीं इसके उलट पूरा देश मुझे बतौर आतंकवादी पहाड़ियों के बीच देख रहा था। मीडिया का यह रवैया बदस्तूर जारी है।

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सिमी की आर्थिक जरूरतें वर्ल्ड एसेम्बली फॉर मुस्लिम यूथ, रियाध और आईआईएफएसओ से पूरी की जाती हैं?
जिन संगठनों के नाम आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए बताये गये हैं उनके बारे में रिपोर्ट जारी करने वाला ही बता सकता है। हम बता दें कि सिमी आर्थिक जरूरतें व्यक्तिगत सहयोग, रमजान की जकात और बकरीद में मिलने वाली खाल (बकरी की खाल) से जुटाया करता था। इसके अलावा जो लोग हमारे कामों को ठीक मानते हैं उनसे सहयोग जुटाया जाता था और कार्यकर्ता सालाना तौर पर निश्चित राशि देता था। नीति के स्तर पर सिमी ने निर्णय लिया था कि संगठन किसी भी तरह का विदेशी अनुदान नहीं लेगा।

इस संगठन का नाम सिमी किसने रखा?
मीडिया ने। हमने तो हमेशा 'स्टूडेन्ट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया' या आईएसएम कहा है। सत्ताईस सितम्बर 2001 में जब संगठन पर प'तिबंध लगाया गया उस समय मीडिया के बीच 'सिमी' नाम पहली बार जोर-शोर से चर्चा में आया। हमने इस नाम की व्या'या की थी-''ए सैय्यम इज ए मूवमेंट ऑफ द स्टूडेंट, बाई द स्टूडेंट, फॉर द स्टूडेंट ऑफ वेल्फेयर ऑफ द सोसाइटी''- सैय्यम एक तंजीम है, तलबा की, तलबा के जरिये, समाज की बेहदूद (बेहतरी) के लिए।

सिमी के कामकाज का क्या तरीका था?
आजमगढ़ के मनचोभा गांव में जहां की मेरी पैदाइश है, मदरसे से पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए अलीगढ़ चला गया। वर्ष 1991 में बीयूएमएस में दाखिला लिया तथा सिमी को इसी आधार पर ज्वाइन किया कि यह संगठन चारित्रिक निर्माण पर जोर देता था। संगठन की 'वाहिश थी कि सभी आला तालीम ( अच्छी शिक्षा) हासिल करें, मगर जीवन के शुरू से आखिर तक खुदा के बन्दे बनकर रहें। क्योंकि हुकूमत चाहे कितना भी पहरा बिठा दे जब तक इन्सान में खुदा के प'ति जवाबदेही पैदा नहीं होगी वह जुर्म करने से बाज नहीं आयेगा। हम पैगम्बर साहब की शिक्षाओं के प'चार-प'सार के साथ नौजवानों को देश और दुनिया के हालातों से रू-ब-रू कराते थे। गोष्ठियों, सम्मेलनों के माध्यम से इंसाफपसंद नौजवानों को हमने हौसला दिया, कभी हथियार की हिमायत नहीं की। हमने गुप्त कामकाज को कभी अपने कार्यशैली में शामिल नहीं किया। यह बात हम इसलिए नहीं कह रहे हैं कि सिमी पर भूमिगत काम करने के आरोप लग रहे हैं। बल्कि सांगठनिक संविधान में ही इसे शामिल नहीं किया गयाथा। जहां कहीं भी जुल्म होता, संगठन उसका जोरदार विरोध करता। साथ ही हम रैगिंग के खिलाफ थे । हमने राष्ट्र व्यापी स्तर पर 1996 से 'एन्टी वर्ण व्यवस्था' कैंपेन भी चलाये। मामला इससे आगे बढ़ा, तो आरएसएस ने जो गलत तारीख किताबों में पढ़ानी शुरू की थी हमने उसके खिलाफ भी छात्रों-युवाओं में जागरूकता अभियान चलाया। संगठन छात्रसंघ चुनावों में भागीदारी करता था या फिर हम चुनावों का सपोर्ट करते थे। जहां कहीं भी फसाद हुआ राहत शिविरों के माध्यम से संगठन ने लोगों की मदद की।

सिर्फ मुस्लिम जनता के लिए या फिर औरों के लिए भी?
ऐसा नहीं था। हमारा उसूल है कि जालिम का हाथ पकड़ लो यही एक मजलूम की मदद होगी। आज भी हम वही करते हैं।

संगठन का स्वरूप कैसा था?

आजादी से पहले या बाद के हिन्दुस्तान की तारीख में सिमी राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम युवाओं का पहला संगठन था। सदस्यता की उम' 18 से लेकर तीस वर्ष के बीच रखी गयी थी। चार सौ अंसार ( मु'य कार्यकर्ता) के अलावा 20 हजार कार्यकर्ताओं वाले संगठन में अध्यक्ष, महासचिव, खजांची के अलावा कार्यकारिणी के सदस्य हुआ करते थे। चुनाव हर दो साल पर होता। देशभर में जो अंसार थे, उन्हीं में से पदाधिकारी चुने जाते। सिमी का किसी पार्टी या दल से ता'ुकात नहीं था। बावजूद इसके हमलोग देशभर के विश्वविद्यालयों, कॉलजों में तेजी के साथ पढे-लिखे मुस्लिम युवाओं से जुड़ रहे थे। आज भी सरकार से लेकर खुफिया एजेंसियां तक यह बखूबी जानती हैं कि हमारे कार्यकर्ताओं की एक बड़ी सं'या डॉक्टर, इंजीनियर या फिर उच्च शिक्षा प'ाप्त छात्रों की रही है।

संगठन इस्लाम की शिक्षाओं के साथ भारतीय संविधान में भी विश्वास रखता है ?

बेशक। हमारी संविधान प'दत्त व्यवस्था में आस्था है। अगर कहीं से उपलब्ध हो सके तो आप सिमी का संविधान जरूर देखें और लिखें, जिससे की जनता में यह साफ हो सके। आज हम संगठन के प'तिबंध के खिलाफ कानूनी लड़ाई को अंतिम विकल्प के तौर पर देखते हैं। लेकिन यह सवाल उन लोगों से क्यों नहीं पूछा जाता जो लोकतंत्र की चिंदी-चिंदी उड़ाकर हमें अपने ही मुल्क में कैद होने के लिए मजबूर करते हैं। वे उस अहसास को जब्त कर लेना चाहते हैं जो एक आजाद मुल्क का नागरिक चाहता है।

यह आरोप क्यों लगाया जाता है कि सिमी इस्लाम आधारित व्यवस्था चाहता है?

अगर इस देश में कम्युनिस्टों को साम्यवाद लाने का हक है, कुछ लोग हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात करते हैं, यह जुर्म नहीं है तो हम जो इस्लामी इंकलाब लाना चाहते हैं वह जुर्म कैसे है।

संगठन पर प'तिबंध क्यों लगाया गया?

जाहिर है, सिमी की कार्यवाइयां हिन्दुस्तान की उस जमात को बर्दाश्त नहीं थीं जो हमें यहां का नागरिक मानने से इनकार करती है। उसका नारा है ''मुसलमानों के दो स्थान, पाकिस्तान या कबि'स्तान''। गर सिमी के इतिहास को देखा जाये तो 25 अप'ैल 1977 में अलीगढ़ में इसकी स्थापना हुई। तबसे लेकर 1998 तक हमारे खिलाफ एक भी मामला दर्ज नहीं था। वर्ष 1998 में भाजपा के नेतृत्व में केन्द' सरकार बनी और मात्र दो सालों के भीतर दर्जनों झूठे मुकदमे सिमी से जुड़े युवाओं पर मढ़ दिये गये। हमारे खिलाफ भाजपा, बजरंग दल, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद आदि ने बकायदा एक माहौल तैयार किया। उसी की अन्तिम परिणति थी 27 सितम्बर 2001 की शाम चार बजे जब इस छात्र संगठन को प'तिबंधित कर दिया गया। हां, यह जरूर रहा कि हमारे साथी इस्लाम की शिक्षाओं का मानने वाले रहे और आज हम उसी जुर्म की सजा भुगत रहे हैं।

सिमी का दुनियाभर के कई आतंकवादी संगठनों से रिश्ता बताया जाता है। अब तो अलकायदा और हूजी से भी सांठ-गांठ उजागर होने की बात कही जा रही है?

पहले प'तिबंध लगा दिया और अब सांठ-गांठ का आरोप। हमारे यहां भी लोकतंत्र का चलन अजीब है कि मुंह में जाबी (प्रतिबंध) लगा दो और जो चाहे सो कहते रहो। ओसामा बिन लादेन और अलकायदा के बारे में हमने भी मीडिया के माध्यम से ही जाना-सुना है। दुनिया जानती है कि तालिबानियों को रूस के खिलाफ अमेरिका ने सह दी और आज भी वह अपनी जरूरतों के मुताबिक आतंक की परिभाषाएं ईजाद करता रहता है। किसी ने कभी ओसामा को देखा नहीं, जबकि अमेरिका ने उसके सफाये का बहाना बनाकर कई मुल्कों की सभ्यताओं को तबाह कर दिया। ऐसा नहीं है कि भारत का जागरूक नागरिक सरकार की इन चालबाजियों को नहीं समझता, पर उसे कोई विकल्प नहीं दिख रहा कि वह क्या करे। रही बात आरोपों की, तो यह हमारी सरकार के हाथ में है कि कैसा आरोप उसे सुविधाजनक लगता है। यह कैसा लोकतंत्र है कि जिस खुले संगठन सिमी के खिलाफ लगातार खुफिया एजेंसियां दुष्प'चार कर रही हैं उस फरेब को लेकर हम बोल भी नहीं सकते। यह हमारे खिलाफ एक गहरी साजिश का हिस्सा है कि कानूनी लड़ाई को कभी हाइलाईट नहीं किया जाता। अब तक तीन बार प'तिबंध की अवधि आगे बढ़ाई गयी है। तीनों केस सुप'ीमकोर्ट में चल रहे हैं, पर यह सारे मसले कभी खबरों का हिस्सा नहीं बनते।

शाहिद बदर को कोई सिमी का अध्यक्ष क्यों माने?
यह तो जाहिर है कि प'तिबंध के खिलाफ हम संघर्ष कर रहे हैं। जब तक प'तिबंध नहीं हटाया जाता और चुनाव नहीं होता, तब तक तो यही सच है।

इन्दौर में गिरफ्तार किये गये सफदर नागौरी को सिमी का चीफ कैसे बताया जा रहा है? चर्चा यह भी है कि सिमी को तोड़कर सिम नाम का कोई नया संगठन बनाया गया है?

इसके जवाब में मैं ये कहूंगा कि यह जानकारी मीडिया के जरिये ंहम तक पहुंची है। इसलिए यह कहना मुमकिन नहीं कि यह घोषणा किसकी है।



द पब्लिक एजेंडा से साभार

Jan 10, 2008

राजशाही की गोद में खेलेगा भूटानी लोकतंत्र

नेपाली भाषी भूटानी नागरिक पिछले १६ सालों से नेपाल के सात कैम्पों में शरणार्थियों का जीवन बीता रहे हैं| इन नागरिकों को भूटानी राजशाही ने देश निकाला कि सजा दी क्योंकि इन्होने लोकतांत्रिक प्रक्रिया लागु किये जाने के लिये संघर्ष किया| संयुक्त राष्ट्र संघ आदि दानदाता एजेंसियों के सहारे गुजर-बसर कर रहे शणार्थियों की आबादी लगभग १ लाख पचास हजार हो चुकी है| देशनिकाला का दंश झेल रहे इस आबादी का यह अनुपात भूटान की कुल जनसंख्या का पांचवां हिस्सा है|पराये देश में इनकी तीसरी पीढी नौजवान हो चुकी है| अपने मुल्क की ओर जाने का जब भी प्रयास किया तो भारतीय फौजों ने दखलंदाजी की| कारण कि नेपाल से भूटान जाने का रास्ता भारत होकर ही जाता है| हालिया राजनीतिक परिवर्तनों के मद्देनजर भूटान में चुनाव होने जा रहे हैं बावजूद कि वहां कि एक बडी आबादी देश से बाहर है|
टेकनाथ रिजाल नेपाल में रहने वाले भूटानी शरणार्थियों के लोकप्रिय नेता हैं| भूटानी राजशाही ने १९८९ में लोकतांत्रिक आंदोलन खडा करने के आरोप में रिज़ाल को १० साल के कैद की सज़ा दे डाली| १८ दिसम्बर १९९९ को जेल से मुक्त होने के बाद से वह नेपाल में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं|राजशाही की देखरेख में लोकतन्त्र की स्थापना की कवायद से शणार्थियों को क्या उम्मीदें हैं, भारत से वे क्या चाहते हैं जैसे मसलों पर टेकनाथ रिज़ाल से अजय प्रकाश ने जून २००७ में विस्तृत बातचीत की| आज जब वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया लागू किये जाने की नौटंकी हो रही है वैसे में इस साक्षारत्कार से आपका साबका हो,यह जरूरी लगता है|

काठमांडू में टेकनाथ रिज़ाल


भूटानी नागरिक भारतीयों के साथ कैसा रिश्ता महसूस करते हैं

भारत के आजादी से पहले का कहें या बाद का दक्षिणी भूटान के नेपाली भाषी लोंगों से भारतीयों का गहरा आत्मीय रिश्ता है| भारतीय फौजों में हमारे इतने लोग थे कि जब राजा ने देश निकाला किया तो उसमें सैकडों वीर चक्रों को हमसे छीन लिया |ये वीर चक्र हमारे लोगों को भारतीय सेना में काम करते हुये दिये गये थे|इतना ही नहीं भारत की आजादी की लडाई में शामिल हुये तीन-चार भूटानी नागरिक तो बहुत बाद तक पटना के जेल में बंद रहें| जिस देश के साथ हम लोगों का इस तरह का रिश्ता रहा था वही देश आज हमें अपने देश जाने के लिए रास्ता नहीं दे रहा है|

भूटान-भारत के साथ मौजूदा और पूर्ववर्त्ती संबंधों के बीच आप लोग क्या फर्क देखते हैं|

१९६० के बाद भूटान में जिस स्तर पर नागरिक सुविधायें लागू कि गयीं उसमें भारत का अहम योगदान हैं| भूटान को इससे पहले एट्टियों यानी जंगली लोगों का देश कहा जाता था| किन योजनाओं में कितना खर्च होगा के हिसाब से लेकर मलेरिया तक के ईलाज का भार भारत ही उठाता था| मौजू़दा दौर में भारत सरकार का झुकाव और पक्षधरता भूटानी नागरिकों के प्रति होने के बजाय राजा के प्रति है|
दक्षिण एशिया का सबसे ताकतवर और जनतांत्रिक देश होने के नाते न सिर्फ भूटान बल्कि इस क्षेत्र के हर देश की जनता बहुत उम्मीद से भारत की तरफ देखती हैं| भारत सरकार की मदद के बगैर न तो नेपाल में शांति प्रक्रिया को स्थिरता मिल सकती है और न भूटानी शरणार्थी सम्मानपूर्वक स्वदेश वापसी कर सकते हैं|

नेपाल में मज़दूरी कर जीवनयापन करते भूटानी युवा


खुफिया एजेंसियों के मुताबिक शिविरों में रहने वाले युवा आतंवादी गतिविधियों में संलिप्त है?

यह तथ्यजनक नहीं है| राजा प्रायोजित प्रचार है, जिसे हिन्दुस्तानी मीडिया हवा देता रहता है| जाहिर है कि राजा तथा उसकी मददगार शक्तियां नेपाल के कैम्पों में रह रहे डेढ लाख शरणार्थियों पर किसी बहाने तोहमत लगाती रहेंगी जिससे स्वदेश वापसी संभव न हो|

दक्षिणी भूटान के नेपाली भाषियों को भूटानी राजा ने देशनिकाला क्यों किया?

उसके दो मुख्य कारण थे| एक तो यह कि भारत के साथ दक्षिणी भूटान के नागरिकों की नजदीकी बढती जा रही थी| दूसरा यह कि भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को देखकर भूटानियों ने भी जनतांत्रिक हकों के लिए पहल करना शुरू किया| लेकिन राजा को यह मंजूर नहीं था| प्रतिक्रिया में उसने नेपाली भाषी लोगों की संस्कृति, भाषा तथा जीवन जीने के तरीके तक पर हमले शुरू कर दिये| राजशाही के जुल्म इस कदर बढे कि राज्य की तथाकथित संसद में बैठे सांसदों, अदालत के जजों तक को राज्य निकाला कर दिया गया|
फरवरी १९८५ में जब राजा ने हमारी नागरिकता को रद्द कर दिया तो हमें भरोसा था कि पडोसी देश भारत राजशाही की तानाशाही के खिलाफ ऐतराज करेगा| मगर यहां उल्टा हुआ| आज हम न भारत में हैं न भूटान में| हमें तीसरे देश की शरण लेनी पडी|
भारत, राजा के साथ अपने हित साध रहा है|कौन नहीं जानता कि भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मरीं तो राजा ने देश में जश्न मनाये|भारत की अखण्डता के लिये खतरा बन चुके उल्फा और बोडो उग्रवादियों की प्रमुख शरणस्थली तथा ट्रेनिंग कैम्प आज भी भूटान में है| हमारे ऊपर आतंकवादी गतिविधियों के संचालित करने का आरोप लगाने वाली भारतीय मिडिया को ये तथ्य क्यों नहीं दिखते| साथ ही भारतीय सरकार भूटान में भारत के लिए काम करने वाली स्थानीय खुफिया एजेंसियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं करती कि तैनात अधिकारी भारत के प्रति कितने ईमानदार हैं|

क्या यह सच है कि शिविर के युवाओं में भारत के खिलाफ नफरत बढ रही ?

पिछले कुछ सालों में भारत के प्रति नफरत बढी है| १६-१७ वर्षों में हमने स्वदेश वापसी का सात-आठ बार शांतिपूर्वक प्रयास किया|मगर जाने में असफल रहे हैं|इन प्रयासों के खिलाफ भारतीय फौजें बार-बार रोडा बनकर खडी हुयी हैं|

भूटान से भारत की नजदीकी की वजहें?

भूटान की कुल साढे छह लाख की आबादी में भारतीयों की संख्या ६० हजार है| भूटानी बाजार और व्यापार पर भारतीयों का ही कब्जा है| इसके अलावा भारत सरकार को यह भी डर है कि लोकतंत्र कायम होते ही वह भूटान में अपने कठपुतली राजा का उपयोग नहीं कर सकेगा| मतलब यह कि एक तरफ जहां भारत सीधे आर्थिक लाभ के कारण स्थानीय राजनीति पर अपना दबदबा बनाये रखना चाहता है वहीं विस्तारवादी नीति के मद्देनजर कमजोर देशों में सामंती राजसत्ताओं को बनाये भी रखना चाहता है|

अमेरिका ने प्रस्ताव दिया है वह शरणार्थियों को कनाडा और दूसरे देशों में पुनर्वासित करेगा ?

मीडिया में आयी खबरों के आधार पर हमने नेपाली सरकार से बातचीत की तो पता चला कि अमेरिका की तरफ से इस बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं हैं|हालांकि सांस्कृतिक, भौगोलिक विविधता की वजह से ऐसा होना संभव नही है| हुआ भी तो इसे स्थायी हल नही कहा जा सकता| अगर भूटानी शरणार्थियों का अमेरिका शुभचिंतक है तो भारत पर दबाव डाले कि वह शरणार्थियों को स्वदेश वापसी का रास्ता दे| क्योंकि भारत के रास्ते ही हम अपने देश भूटान जा सकते हैं|दूसरा यह कि भारत के लिये भी यह बेहतर नहीं कि हम अमेरिका में जाकर बसें|कैम्पों में भारत के खिलाफ बढ रही नफरत का कभी भी कोई साम्राज्यवादी देश इस्तेमाल कर सकता है|


अमेरिकी प्रस्ताव पर शरणार्थियों का क्या विचार है?

मिला-जुला असर है|शगूफा उठा कि अमेरिका जाने वाले फार्म पर दस्तख्त करने से १७,००० लाख नेपाली रुपये मिलेंगे| इस लालच में तमाम शरणार्थियों ने फार्म भरे| लेकिन एपिछले दिनों जब स्वदेश वापसी की पहल हुयी तो सभी भारत की सीमाओं की तरफ जुटने लगे| किसी ने नहीं कहा कि वह अमेरिका जायेगा| इसलिये कहा जा सकता है कि शरणार्थी अब इस कदर त्रस्त हो चुके हैं कि वह कहीं भी सम्मान और बराबरी की जिन्दगी चाहते हैं चाहे वह कनाडा हो या भूटान|

भारत के जिस राज्य की सीमा से शरणीर्थियों को भूटान जाना है वह पश्चिम बंगाल है| इस मसले पर वहां की वामपंथी सरकार का रूख कैसा रहा है|

लंबे समय बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्ध्देव भट्टाचार्य ने २००७ के जून माह में आश्वासन दिया कि भूटानियों की समस्या का हल किया जायेगा| हालांकि इस वादे से हफ्ते भर पहले बंगाल पुलिस, असम पुलिस और सीआरपीएफ ने हमारे लोगों को गोलियों से भून डाला था| आखिरकार हम करें तो क्या करें| यह तो बडे देश के सामने छोटे देश की पीडा है|ऐसे में सच का एक बडा हिस्सा है कि समाधान भी उत्पीडक ही करेगा|

नेपाल का रुख?

सरकार चाहे किसी की रही हो नेपाल ने हमेशा आश्रय दिया है| हां यह कहना अतिरेक नहीं होगा कि माओवादी प्रमुख प्रचण्ड इस मामले को गंम्भीरता से लेते हैं| कुछ महीने पहले नेपाल दौरे पर आये अमेरिकी राष्ट्रपति जीमी कार्टर से भी प्रचण्ड ने समस्या के समाधान पर बातचीत किया था|

Nov 16, 2007



धोखा है
अजय प्रकाश

धोखा है उस मजदूर के साथ
जो हल के पीछे चल रहा है वर्षों से
कि नयी फसल के साथ जिंदगी बेहतर होगी

षड्यंत्र है उस आधी आबादी के साथ
जो सदियों बाद मुक्ति द्वार पर दस्तक दे रही है

निष्क्रियता है तुम्हारे कामों की
जो हरावली होने का दंभ भरते हैं

तुम्हारे कागजी कामों का ही सार है
कि उसके आठ, बारह घंटे हो गये
तुम कमरे में करते रहे विश्लेषण
और वे बाहर टूटते-बिखरते, पीछे हटते रहे

यह कायरता है तुम्हारे बुद्धिजीविता की
जिसने दशकों में भी खून से लथपथ साथी नहीं देखे
और घोषित कर दिया कि
कम्युनिस्ट शिविर विघटित हो चुके हैं
मुनादी करा दी कि तुम अकेले पार्टी हो
और परिवार केंद्रीय कमेटी

मार्क्स की दाढी, एंगेल्स का भौं, लेनिन का नैपकिन
और स्टालिन का बटोरकर
ख्रुश्चेव से लेकर गोर्बोचेव तक पर जब तुम बोल रहे थे
तभी से तुम्हारे पुनर्जागरण्-प्रबोचन का केंद्रीय कर्यभार
धन उगाही रहा
गरियाना मार्क्सवादी रणनीति

पलिहार खेतों के खलिहर चरवाहा बन
बहका रहे हो नयी नस्लों को
अयोध्या ही नहीं गुजरात को भी
सीलबंद कर चुके हो
खैरंलाजी को सोचना ही अवसरवाद है
और विदर्भ की बात करना 'नरोदवाद'
आदिवासियों के लिये लडना
शब्दकोष में शामिल ही नहीं किया

'बोल्शेविज्म' तो तुम्हारे यहां चुप्पी के नाम से ख्यात है
मानो कि याज्ञवल्य के नये संस्करण तुम्ही है
चूं और पों के रूपावतार भी तुम्ही हो

नहीं तो ऐसा क्यों होता कि
तुम शोमैन होती और पार्टी दर्शक
तुम्हीं हो सिक्के गिनने वाले क्रांपा लिमिटेड

मैं कैसे भूल सकता हूं पिछली सदी का वह अंतिम जेठ
थपथपायी थी तुमने पीठ
और सब से पहले मेरी आंखों में देखा था

मगर तुम भूल गये
मार्क्सवाद उबने का नहीं डूबने का दर्शन है

तुम्हें याद है वह दिन
तुमने ब्लैकबोर्ड पर बंकर बनाया था
इस डर से कि कतारें कहीं ज़मीन पर
बारूदी सुरंगें न बिछा दें
और दुश्मन से पहले तुम्हारा वह
रनिवास न ढह जाये
जो तुम्हारी पत्नी के नाम पर है
जिसे कभी पार्टी फंड से बनाया गया था

यह शातिरी है तुम्हारे विचारों की
जो अब विचार ही नहीं रहे
दुकान होकर रह गये हैं
जहां तुम बेच रहे हो
अपनी महत्वाकांक्षायें, कुंठायें और युवा
और युवा कुछ भी कर सकता है
इतना इतिहास तो तुमने पढा ही है

तो आओ
एक प्रकाशन परिकल्पित किया जाये
और प्रकाशनों में क्रांतिकारी, क्रांतिकारियों में प्रकाशन
होनें का निर्विवाद दर्जा लिया जाये

Nov 6, 2007

मैं नक्सली कवि हूं: वरवर राव



वरवर राव से अजय प्रकाश की बातचीत

आपकी साहित्यिक यात्रा की शुरूआत कैसे हुयी?

मैं एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखता हूं जिसने आंध्र प्रदेश के निजाम विरोधी संघर्ष में भागीदारी की आगे चलकर मेरा परिवार कांग्रेसी हो गया इसलिये मैं इस भ्रम में भी रहा कि जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में चल रही कांग्रसी सरकार समाजवाद की स्थापना करेगी १९६०-६२ में श्रीकाकुलम के दमन के बाद मेरा भ्रम क्रमश्: छंटता गया और नेहरू के बारे में मेरी राय १९६४ तक स्पष्ट हो गयी इसी बीच मुझे जनकवि पाणीग्रही ने बेहद प्रभावित किया उन्हीं के प्रभाव में 'सृजना' नाम की साहित्यिक पत्रिका भी निकली उसी दौरान हमने 'विरसम' का गठन किया

किस कविता के पात्र ने आपको अधिक प्रभावित किया है?

आंध्रा के निजामाबाद में एक लोमहर्षक घटना हुई थी। उस पर मैंने 'कसाई' नाम की एक कविता लिखी १९८४ में निजामाबाद के कामारेड्डा कस्बे मे बंद का आहवान किया गया थाजिसमे १९ वर्षीय अमरेंद्र रेड्डी मांस की दुकान बंद कराने पहुंचा बात उलझ गयी और कसाई ने पुलिस को फ़ोन कर दिया पुलिस ने बंद समर्थक को इतना मारा कि उसने मौके पर दम तोड दिया जांच करने गयी कमेटी से कसाई ने बयान किया था कि 'मैंने सोचा पुलिस आयेगी तो उसे पकड ले जायेगी हमें क्या पता था कि उसे गोली मार देंगे मैने कितनी बकरियों का जिबह किया होगा,पर मुझे बकरियों की जात से नफरत नहीं हैलेकिन पुलिसवालों ने बंद समर्थक को जिस वहशियाने अन्दाज मे मारा मुझे लगा असली कसाई मैं नहीं उनकी जमात है'

आप जैसा लिखते हैं वैसा जीते हैं ,क्या एक रचानाकार के लिये यह जरूरी होता है.

रचनाकर्म में रचनायें प्रधान पहलू हैं,उसका व्यक्तिगत जीवन गौण हम रचनाओं से वाकिफ़ हैं और पीढियां भी उसी से वास्ता रखेंगी


आपकी कविताओं से सरकार परेशान हो जाती है, क्या इसलिये कि आप माओवादी कवि हैं?

मैं माओवादी नहीं हूं, रचनाकार हूं बेशक आप मुझे नक्सली कवि कह सकतें हैं

साल भर पहले बनी पीडीएफ़आई {पीपुल्स डेमोक्रेटिक फेडेरेशन ऑफ इंडिया} का क्या
लक्ष्य था.

लोकतांत्रिक हकों को बहाल करने और नये जनवादी अधिकारों को हासिल करने का पीडीएफ़आई एक खुला मोर्चा है सामंती उत्पीडन एव साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ़ हमारी एकता ऐतिहासिक है जो 'मुंबई प्रतिरोध मंच' के दो सालों के गंभीर प्रयासों की देन है १७५ संगठनों का यह मोर्चा हमेशा कायम रहेगा या नहीं यह बाद की बात है परंतु आज दरकार इसकी है कि हम सत्ता दमन के खिलाफ़ एक व्यापक एकजुटता कायम करें पीडीएफ़आई आम जनों के शोषण, देशी-विदेशी कंपनियों की लूट, जल-जंगल- ज़मीन पर हक और अर्जित की गयी पूंजी देश में रहे, ऐसे तमाम मौलिक मांगों पर एक आम सहमति रखता है जहां तक इसके भविष्य का प्रश्न है तो यह कहा जा सकता है कि संघर्ष के एक मुकाम के बाद 'वर्ग संघर्ष' के सवाल पर मतभेद उभर सकते हैं

पीडीएफ़आई में आप जैसे संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी का औचित्य ?

समानांतर जनसंस्कृति का एक नाम 'विरसम' है विप्लवी रचयिता संग्रामी मंच जनता की संघर्षशील चेतना को उन्नत कर रहा हैइसलिये यह जरूरी नहीं कि हम जहां जायें वे कम्यूनिष्ट ही हों जैसे चिली में १९७३ में एलएनडी के नेतृत्व में संघर्ष हुआ लेकिन वह शुरुआती राजनितिक जीवन में कम्युनिस्ट नहीं था फिर भी उसके रचे गीतों ने जनता की विद्रोही चेतना को सघर्षों से एकरूप किया विशाल गोखले को ही देखें तो उन्होने जो विद्रोही गीत गाये, उन गीतों का गोखले की रजनितिक समझ से कोई तालमेल ही नहीं है इसलिये संस्कृतिकर्मी किसी पार्टी का नहीं बल्कि संघर्षशील सर्वहारा का हरावल होता हैविश्व के कई देशों में इस तरह के उदाहरण देखे जा सकते है

लेकिन सरकार ने 'विरसम' पर यह कहकर प्रतिबंध लगा दिया कि यह नक्सलवादियों का एक मंच है?

सरकार का रवैया फासीवादी है हम नक्सलवादी फ़्रंट नहीं है,परंतु नक्सलबाडी की विरासत को आगे बढाने वाले ज़रूर है

साम्राज्यवाद विरोधी सघर्षों में मुसलमान जनता की भागीदारी न के बराबर है?

'मुंबई प्रतिरोध मंच'२००४ के आयोजन में कम्युनिस्टों के बाद सबसे बडी भागीदारी साम्राज्यवाद विरोधी मुस्लिम सगठनों की थी पीडीएफ़आई मे उनकी भागीदारी नहीं हो सकी हैबेशक यह हमारी कमी है


क्या वजह रही कि 'मुंबई प्रतिरोध मंच' में जहां ३५० संगठन थे वह संख्या पीडीएफ़आई में घटकर १७५ हो गयी है?

यह लोकसंघ्रर्ष का एक मोर्चा हैपीडीएफ़आई जितने संगठनों को फिलहाल अपने साथ ला सकता था उनका उसने साथ लियाभारत जैसे बडे देश मे हज़ारों संगठन छोटे स्तर पर ही सही मगर सम्राज्यवाद-सामंतवाद के खिलाफ़ मुहिम चला रहे है इसलिये सारे संगठनों से पीडीएफ़आई का संपर्क अभी भी होना बाकी है

राष्ट्रीयताओं के सघर्ष यानी 'अलगाववाद' को किस रूप में देखते हैं?

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे राष्ट्रीयताओं के संघर्षों का क्रांतिकारी समर्थन करते हैं राष्ट्रीयताओं की मांगों को सरकार को फौरी तौर पर मान लेना चाहिये इतिहास का उदाहरण रूस से लिया जा सकता है जहां लेनिन ने छोटे-छोटे राज्यों को राष्ट्रीयता का दर्जा दे दिया था आगे चलकर हुआ यह कि वे सभी देश फिर रूस में शामिल हो गये और सोवियत संघ का निर्माण हुआ मगर वे अपनी स्वेच्छा से शामिल हुए हैं

आंध्र प्रदेश सरकार से नक्सलवादियों की बातचीत में आप वार्ताकार थे, उसका कोई हल नहीं निकला?

हल निकलता भी कैसे? एक तरफ़ सरकार हमसे शांति वार्ता कर रही थी और दूसरी तरफ़ सरकार इनकाउंटर कर रही थी हम कांबिंग बंद करने तथा फ़र्जी इनकाउंटर पर केस दर्ज करने की मांग कर रहे थे और पुलिस बल अपनी कार्रवाइयां ज़ारी रखे हुए था मेरा स्पष्ट मानना है कि नक्सली नेताओं का फर्जी इनकाउंटर पुलिसिया कार्रवाई मात्र नहीं है बल्कि राज्य प्रयोजित अभियान है १९९० में कांग्रेस मुख्यमंत्री चन्द्रा रेड्डी के कार्यकाल में जनवरी से सितम्बर तक आंध्र प्रदेश में एक भी इनकाउंटर नहीं हुआ ऐसा पुलिस के चलते नहीं राज्य सरकार के चलते हुआ था

प्रमुख मांगें क्या थीं?

जितने भी इनकाउंटर हुए हैं उसमें पुलिस वालों के खिलाफ़ ३०२ और ३०७ द्क मुकदमा दायर किया जाये साथ ही पुलिस बल यह साबित करे कि उसने जो कत्ल किये हैं वह आत्मरक्षा में हुए हैं इस मांग को सरकार ने सिरे से नकार दिया हमारी दूसरी मांग भूमि सुधार की थी आंध्र प्रदेश में लगभग ३५ प्रतिशत ज़मीन सरकार की है पूरी योजना के साथ हमने सरकार को बताया की आंध्र की भूमिहीन जनता को तीन-तीन एकड ज़मीन दी जाये

तो फिर आपकी गिरफ्तारी क्यों हुई?

वही पुराना बहाना कि मैं नक्सलियों का वर्ताकार था वारंगल में चल रहे 'विरसम' की दो दिनी कांफ़्रेंस पर भी हमला हुआ और १७ अगस्त को विरसम पर प्रतिबंध लगा १९ अगस्त को मुझे गिरफ्तार कर लिया गया


( बातचीत पहले की है, कुच्छ सन्दर्भ पुराने लग सकते हैं)
















तबाही की बुनियाद पर बांध
टिहरी तथा नर्मदा के बाद अब एक और बडे बांध को बनाने की तैयारी हो गयी है जो पोल्‍लावरम बांध परियोजना के रूप में जाना जायेगा़। आंध प्रदेश के तेलंगाना क्षेृ में बनने वाला 150 मीटर की ऊंचाई का यह दुनिया का तीसरा सबसे बडा बांध होगा। यहां गोदावरी नदी बहती है। इस बांध के बन जाने पर तेलंगाना ही नहीं छत्‍तीसगढ का दंतेवाडा जिला और उडीसा के भी दर्जनों गांव जल समाधि ले लेंगे। डूबने वाले 276 गांवों में 150 फीसदी आदिवासी तथा 15 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग होंगे। अजीब है कि नर्मदा या टिहरी की तरह इसका विरोध नहीं हो रहा है, न कहीं आंदोलन की सुगबुगाहट है। स्‍थानीय तौर पर कुछ संगठन जरूर इसकी खिलाफत कर रहे हैं जो नाकाफी है। पोल्‍लावरम बांध बनने से होने वाली तबाही का जायजा लेने एक फैक्‍ट फाईडिंग कमेटी ने प्रभावित क्षेतरों का दौरा किया जिसमें दि संडे पोस्‍ट संवाददाता अजय प्रकाश भी शामिल थे। वहां से लौटकर पेश है उनकी यह रिपोर्ट


किसान विद्रोह और अब अलग राज्‍य की मांग के लिए आंदोलन तेलंगाना वह क्षेत्र है जहां की मिटटी में पैदा हुआ यूके‍लिप्‍टस का कागज देश को साक्षर बनाता है, कोयले से पैदा हुयी बिजली भारत को रोशन करती है और उस मिटटी में उपजा कपास,धान,मिर्च तथा तम्‍बाकू तन ढकने के साथ-साथ जीने की खुराक देता है। विस्‍तार में जायें तो प्राकतिक प्रचुरता की बदौलत जो एहसान बाकि देश पर तेलंगाना ने किया है उसेकी भरपाई के रूप में वह तबाही,गैर बराबरी और विनाश का दंश वर्षों से झेलता रहा है। इस बार आन्‍ध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र के जिलों और जमीनों के वास्‍ते जिस पोल्‍लावरम बांध को बनाने की तैयारी केन्‍द्र और प्रदेश सरकारें कर रहीं हैं उससे तेलंगाना की आदिवासी जनता की ऐतिहासिक और सांस्‍ककितिक धरोहरें तो नष्‍ट होगी ही यहां के सामातिक'आर्थिक ढांचे को भी भारी नुकसान होगा। इसकी भरपाई किसी भी तरह के कितने भी संसाधन उपलब्‍ध्‍ा कराकर या पुनर्वास योजना लागू कर सरकारी मशीनरी नहीं कर सकती। बाल एवं महिला विकास मंतरी रेणुका चौधरी के संसदीय क्षेतर खम्‍मम के कुल सात मंडलों के पूरी तरह डूब जाने या फिर जीवन जीने की परिस्थितियां समाप्‍त हो जाने की प्रबल संभावना है। इसके अलावा पूर्वी एवं पश्‍िचमी गोदावरी जिला के एक'एक मंडल भी जलमग्‍न हो जायेंगे। आंध्र प्रदेश का विशाखापटनम, करष्‍णना जिला तथा कुछ अन्‍य क्षेतरों में पानी पहुंचाने लिए यह बांध बनाया जा रहा है। जिसके बाद खम्‍मम जिले के सातों आदिवासी मंडल डूब जायेंगे। मंडल के नजदीक गोदावरी नदी पर बनाया जा रहा पोल्‍लावरम बांध जिन लोगों को पानी में डूबो देगा उसमें ज्‍यादातर कोया और कोयारेडिडस आदिवासी हैं।
150 मीटर ऊंचाई के दुनिया के तीसरे सबसे बडे बांध के रूप में बनने को तैयार पोल्‍लावरम बांध पर सरकार ने निशानदेहीयां कर दी हैं। बताया जाता है कि अगले कुछ महीनों में इसे बनाने की शुरूआत कर दी जायेगी। बांध के निर्काण में लगने वाली लागत का ठीक'ठाक अनुमान लगाना मुश्‍िकल है इसलिए 20 हजार करोड से 50 हजार करोड तक के बजट की संभावना विशेषज्ञ जता रहे हैं।
बहरहाल, बांध बनाने की तैयारियां सरकार ने तब पूरी कर ली हैं जबकि अभी तक ज्‍यादातर संस्‍तुति देने वाले मंतरालयों और विभागों ने अनुमति भी नहीं दी है। केन्‍द्रीय जल आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में राज्‍य सरकार को पार्टी बनाते हुए पोल्‍लावरम प्रोजैक्‍ट के खिलाफ केस कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इसके लिए वन, पर्यावरण, राष्‍टरीय अनुसूचित जनजाति आयोग तथा कुछ अन्‍य सरकारी आयोगों से भी अनुमति नहीं ली गयी है। इधर सुप्रीम कोर्ट के कारण बताओ नोटिस के जवाब में प्रदेश सरकार बांध बनाने को लेकर तमाम अंतविरोधी पहलुओं को अन्‍य सरकारी संस्‍थाओं की राय के तौर पर रख रही है।
आंकडों की जुबानी की बात करें तो सरकारी स्रोतों के अनुसार डूबने वाले 276 गांवाें में 50 प्रतिशत आदिवासी हैं तथा 95 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग हैं। दो लाख छत्‍तीस हजार लोगों को उनकी संस्‍करति'सभ्‍यता से उजाडकर दूसरी जगह बसाने की बात करने वाला पोल्‍लावरम प्रोजेक्‍ट जिन कोया और कोयारेडिडस आदिवासियों को उजाडने की योजना पर अमल करने की तरु बढ रहा है। यह आदिवासी जमात जंगलों में रहती है। उनकी भाषा आंध्र प्रदेश की आम भाषा हेलगू भी नहीं बल्कि कोया बोलते हैं। ऐसे में यदि इलकों में पुनर्वास के लिए बनाये जा रहे घरों में उन्‍हें लाकर बसा दिया गया तो या फिर ये दर'बदर हो जायेंगे नहीं तो वे स्‍वत खत्‍म हो जायेंगे। आदिवासियों की इन तमाम सांस्‍करतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विविधताओं पर सरकार द्वारा ध्‍यान न दिया जाना स्‍पष्‍ट करता है कि आदिवासियों के हक'हकूक की चिंता न तो सरकार को है और न वहां काम कर रही राजनीतिक पार्टियों को।
आश्‍चर्यजनक तो यह है कि जिस बांध के बनने के बाद तेलंगाना का समरद मिर्च, धान और तम्‍बाकू का क्षेतर पानी में तिरोहित हो जायेगा उसका पानी भी इसके किसी जिले को नहीं मिलने वाला है। एक अनुमान के अनुसार सिर्फ खम्‍मम जिले में 50 लाख एकड जमीन खेती योग्‍य है किन्‍तु पानी के अभाव में यह बेकार पडी हुई है। इसके उलट सच्‍चाई ये है कि गंगा के बाद देश की दूसरी सबसे बडी नदी गोदावरी तेलंगाना के क्षेतर में 77 प्रतिशत तथा इसी क्षेतर में आंध्र प्रदेश की जीवन रेखा मानी जाने वाली नदी करष्‍णा भी 65 प्रतिशत बहती है। बावजूद इसके यहां का बहुतायात क्षेतर असिंचित रह जाता है क्‍योंकि आजादी के बाद से लेकर अब तक कोस्‍टल आंधरा के लिए जल वितरण की व्‍यवस्‍थाएं सरकार करती रही है और विकास भी।
1954 में न्‍यायाधीश फजल अली के नेतत्‍व में प्रथम राज्‍य पुनर्गठन कमेटी की जो सिफारिश आयी उसके बाद वरहत आंधरा के कई एक जिले केरल, कर्नाटक राज्‍य में चले गए तथा आंध प्रदेश के नौ जिले तेलंगाना के हिस्‍से में आये। महबूबनगर, नालागुण्‍डा, मेदक, हैदराबाद टवीन सिटी,निजामाबाद, अदीलाबाद, करीमनगर, वारंगल तथा खम्‍मम जिले वाले तेलंगाना के बारे में न्‍यायाधीश फजल अली ने भारत सरकार से स्‍पष्‍ट कहा कि भौगाेलिक, सांस्‍करतिक भाषायी फर्क के मददेनजर तेलंगाना को एक अलग राजय का दर्जा दिया जाना चाहिए। कभी सीपीआई के नेतत्‍व में अलग राज्‍य की मांग के साथ खडा हुआ तेलंगाना संघर्ष अब तेलंगाना राष्‍टर समिति के नेतत्‍व में चल रहा है। तेलंगाना राष्‍टर समिति के वारंगल विधायक विजय रामा राव ने बातचीत के दौरान बांध का विरोध इसलिए किया क्‍योंकि सरकार ने अधिकरत विभागों से अनुमति नहीं ली है। सवाल यह उठता है कि क्‍या यदि सरकार सभी विभागों से मंजूरी ले भी ले तो भी बांध बनाना जनता के हित में होगा। तेलंगाना क्षेतर के नालागुण्‍डा जिलेके लोग पिछले 25 30 वर्षों से पानी के अभाव में फलोरोसिस के शिकार हैं। इसके लिए बांध बनने से पुनर्वास के इलाकों में जल'स्‍तर के अत्‍यधिक ऊपर हो जाने के बाद कोई महामारी नहीं फैलेगी इसकी कोई गारंटी नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि बांध बनने के बाद जल स्‍तर इतना ऊपर आ जायेगा कि पीने योग्‍य पानी कई तरह के रोगों को पैदा करेगा। इतना ही नहीं तेलंगाना के क्षेतरों में बांध या छोअी नहरों के अभाव के चलते हर वर्ष लगभग 2000 से 3000 टीएमसी पानी बंगाल की खाडी में चला जाता है। तेलंगाना के साथ आंध्र प्रदेश सरकार कैसा व्‍यवहार करती है यह इन चंद उदाहरणो्रं के अलावा कोस्‍टल आंध्र के करष्‍णा जिले के बजट से भी समझा जा सकता है। हैदराबाद हाईकोर्ट के वकील चिकडू प्रभाकर बताते हैं कि करष्‍णा जिला का बजट पूरे तेलंगाना के बजट से अधिक है।
नर्मदा से भी उंचा बनने वाला यह बांध किसी जाति,धर्म या क्षेत्र को खत्‍म नहीं करेगा बल्कि इस इलाके की संरचना को खत्‍म कर दे्गा। इसको संरचनात्‍मक हिंसा कहा जाता है। गैर सरकारी सूत्रों के मुताबिक यहां 276 गांव ही नहीं लगभग 400 गांव डूब जायेंगे। डूबने वाले क्षेत्रों की तुलना उत्‍तर प्रदेश या बिहार के गांवों से नहीं की जानी चाहिये क्‍योंकि इन राज्‍यों में गांवों की बसावट सघन है। तेलंगाना के गांवों के बीच की दूरी उत्‍तर प्रदेश सरीखे राज्‍यों की दो तहसीलों के बीच की दूरी से भी अधिक होती है। इसलिये खेती योग्‍य भूमि, अकूत प्राकृतिक संसाधनों से भरे पडे जंगलों के जो परिक्षेत्र डूब जायेंगे वह लाखों-लाख हेक्‍टेयर में होगे। महत्‍वपूर्ण है कि बांध बनने से पहले भी खम्‍मम जिले के नौ मंडलों में से ज्‍यादातर मंडल हर साल बाढ में एक-दो हफ़ते के लिये डूब जाते हैं। कल्‍पना की जा सकती है कि जब बांध बन जायेगा तो जिसकी वजह से हजारों सालों से गोदावरी की गांद में बसी सभ्‍यतायें नष्‍ट हो जायेंगी।