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Aug 11, 2011

प्रधानमंत्री धृतराष्ट्र तो नहीं



सरकार पर दवाब बनाया जाता है तो प्रधानमंत्री महोदय को जनता की मांग गैर-संवैधानिक नज़र आने लगती है और जनता का प्रयास समानांतर सरकार चलाने की उद्दंडता...

पीयूष पन्त
 

हमारे प्रधानमंत्री महोदय को सवालिया संस्कृति नहीं भाती. तभी तो जब भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी यूपीए सरकार के मंत्रियों के भ्रष्ट  आचरण को लेकर मीडिया में सवाल उठाये जाते हैं या फिर नागरिक समाज द्वारा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने  के लिए जनता के सरोकारों को समाहित करने वाले जन लोकपाल विधेयक को संसद द्वारा शीघ्र पास कराने की खातिर सरकार पर दवाब बनाया जाता है तो प्रधानमंत्री महोदय को जनता की मांग गैर-संवैधानिक नज़र आने  लगती है और जनता का प्रयास समानांतर सरकार चलाने की उद्दंडता .

जब सरकार शासन चला पाने में असमर्थ दिखाई दे रही हो तो मीडिया और जनता द्वारा उसकी खिंचाई करना और सरकार पर सुसाशन का दबाव डालना पूरी तरह से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है. अब प्रधानमंत्रीजी की समझ का क्या किया जाये कि उन्हें लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ पुलिसिया राज का आगाज़ करती दिखाई देती हैं. जबकि सच तो यह है की उनकी अपनी सरकार की यूआईडी कार्ड बनाना, जनता से धरना-प्रदर्शन स्थलों को लगातार छीनते चले जाना, आदिवासी-किसानों द्वारा अपने जंगल-ज़मीन बचाने की खातिर आन्दोलन करने को देशद्रोह बता उन पर लाठी-गोली बरसाना और उनके मुद्दों को उठाने वाले पत्रकारों को माओवादी करार दे फर्जी मुठभेड़ में मार देना सरीखी कारगुजारियां देश को पुलिस राज में तब्दील कर चुकी हैं. 

धृतराष्ट्र तो वाकई अंधे थे, लेकिन हमारे  प्रधान मंत्री जान-बूझ कर अंधे होने का नाटक क्यों कर रहे हैं, या फिर देशी-विदेशी कर्पोरेटेस  ने उन्हें ऐसा चश्मा पहना दिया है जिसके चलते उन्हें कोर्पोरेट हितों के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं देता है. जन कवि बाबा नागार्जुन की निम्न पंक्तियाँ आज रह-रह कर याद आती हैं...

 
                        खड़ी हो गयी चांपकर कंकालों की हूक  
                        नभ में विपुल विराट-सी शासन की बन्दूक 
                        उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
                        जिसमें कानी हो गयी शासन की बन्दूक
                        बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक
                        धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बन्दूक
                        सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक 
                        जहां तहां दगने लगी शासन की बन्दूक
                        जली ठूंठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक
                        बाल न बांका कर सकी शासन की बन्दूक                                                           

Jul 10, 2011

नागार्जुन के नाम

पीयूष पन्त की कविता


शब्द हुए बंधक
कलम हुई दासी
जनता में फैली अजब उदासी
मुट्ठी जब भिंचती है उठने को ऊपर
त्योरियां तब चढ़ जाती हैं उनकी क्यों कर
नारे उछलते हैं गगनभेदी
मानो बजती हो दुन्दुभी जनयुद्ध की

होते इशारे फिर कहर है बरपाता
जनता पर डंडे और गोली बरसाता
बार- बार लोकतंत्र की कसमें है खाता
सत्ता के नशे में रहता मदमाता
फिर भी वो जनता का नेता कहलाता

कैसा ये लोकतंत्र कैसी आज़ादी
बोलने समझने की, जहाँ ना हो मुनादी



विदेशी मामलों के महत्वपूर्ण टिप्पणीकार और सामाजिक आन्दोलन से जुडी 'लोक संवाद' पत्रिका के संपादक.