Mar 15, 2011

गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल 23 मार्च से


गोरखपुर.प्रतिरोध का सिनेमा अभियान का सोलहवां और गोरखपुर का छठा फिल्म फेस्टिवल इस बार आधी दुनिया के संघर्षों की शताब्दी और लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा की स्मृति को समर्पित होगा. २३ मार्च की शाम को ५ बजे प्रमुख नारीवादी चिन्तक उमा चक्रवर्ती के भाषण से फेस्टिवल की शुरुआत होगी.


चौथे फिल्म फेस्टिवल में पहुंची लेखिका अरुंधती राय

यह वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का शताब्दी वर्ष है.इस मौके बहाने इस बार गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में महिला फिल्मकारों और महिला मुद्दों को ही प्रमुखता दी जा रही है.इसके अलावा जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य और लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा सिन्हा स्मृति को भी छठा फेस्टिवल समर्पित है.गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल से ही पहले अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान की शुरुआत होगी.पहला अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान फेस्टिवल के दूसरे दिन २४ मार्च को शाम मशहूर भारतीय चित्रकार अशोक भौमिक "चित्तप्रसाद और भारतीय चित्रकला की प्रगतिशीलधारा" पर देंगे.

पांच दिन तक चलने वाले छठे गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में इस बार १६ भारतीय महिला फिल्मकारों की फिल्मों को जगह दी गयी है. इन फिल्मकारों में से इफ़त फातिमा, शाजिया इल्मी, पारोमिता वोहरा और बेला नेगी समारोह में शामिल भी होंगी.छठे गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल को पिछले फेस्टिवल की तरह ही इस बार फिर दो नयी फिल्मों के पहले प्रदर्शन का गौरव हासिल हुआ है. ये फिल्में हैं - नितिन के की "मैं तुम्हारा कवि हूँ "और दिल्ली शहर और एक औरत के रिश्ते की खोज करती समीरा जैन की फिल्म "मेरा अपना शहर".बेला नेगी की चर्चित कथा फिल्म "दायें या बाएं" से फेस्टिवल का समापन होगा.

इस बार के फेस्टिवल के साथ-साथ दूसरी कला विधाओं को भी प्रमुखता दी गयी है. अशोक भौमिक के व्याख्यान के अलावा उदघाटन वाले दिन उमा चक्रवर्ती पोस्टरों के अपने निजी संग्रह के हवाले महिला आन्दोलनों और राजनैतिक इतिहास के पहलुओं को खोलेंगी.मशहूर कवि बल्ली सिंह चीमा और विद्रोही का एकल काव्य पाठ फेस्टिवल का प्रमुख आकर्षण होगा.

पटना और बलिया की सांस्कृतिक मंडलियाँ हिरावल और संकल्प के गीतों का आनंद भी दर्शक ले सकेंगे.महिला शताब्दी वर्ष के खास मौके पर हमारे विशेष अनुरोध पर संकल्प की टीम ने भिखारी ठाकुर के ख्यात नाटक बिदेशिया के गीतों की एक घंटे की प्रस्तुति तैयार की है.बच्चों के सत्र में रविवार के दिन उषा श्रीनिवासन बच्चों को चाँद -तारों की सैर करवाएंगी.

फिल्म फेस्टिवल में ताजा मुद्दों पर बहस शुरू करने के इरादे से इस बार भोजपुरी सिनेमा के ५० साल और समकालीन मीडिया की चुनौती पर बहस के दो सत्र संचालित किये जायेंगे. इन बहसों में देश भर से पत्रकारों के भाग लेने की उम्मीद है.

गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल से ही 2006 में प्रतिरोध का सिनेमाका अभियान शुरू हुआ था.पांच वर्ष फिर से गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल ने ही इस बार एक महत्वपुर्ण पहलकदमी ली है. यह पहल है देश भर में स्वंतंत्र रूप से काम कर रही फिल्म सोसाइटियों के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन की.फेस्टिवल के दूसरे दिन इन सोसाइटियों का पहल सम्मेलन होगा जिसमे प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के बारे में महत्वपूर्ण विचार विमर्श होगा और के राष्ट्रीय नेटवर्क का निर्माण भी होगा.

इरानी फिल्मकार जफ़र पनाही के संघर्ष को सलाम करते हुए उनकी दो महत्वपूर्ण कथा फिल्मों ऑफ़साइड और द व्हाइट बैलून को फेस्टिवल में शामिल किया गया है.गौरतलब है कि इरान की निरंकुश सरकार ने जफ़र पनाही के राजनैतिक मतभेद के चलते उन्हें ६ साल की कैद और २० साल तक किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति पर पाबंदी लगा दी है.

प्रतिरोध का सिनेमा की मूल भावना का सम्मान करते हुए इस बार का फेस्टिवल भी स्पांसरशिप से परे है और पूरी तरह जन सहयोग के आधार पर संचालित किया जा रहा है.आयोजन गोकुल अतिथि भवन,सिविल लाइंस, गोरखपुर में सम्पन्न होगा. आयोजन में शामिल होने के लिए किसी भी तरह के प्रवेश पत्र या औपचारिकता की जरुरत नही है.आप सब सपरिवार सादर आमंत्रित हैं.सलंग्न फ़ाइल में फेस्टिवल का विस्तृत विवरण देखें.


आजादी के सफ़र में रोहिंगा


अराकान को स्वतंत्र कराने के लिए पाकिस्तान से मिलने वाली मदद के लिए रोहिंगा उसके इशारे पर भारत के खिलाफ गतिविधियों में शामिल होने को मजबूर हैं, तो वहीं अराकान में म्‍यांमारी जुंटा सैनिकों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के खिलाफ वे लड़ रहे हैं...


श्रीराजेश

म्यांमार में उत्तरी अराकान प्रदेश को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के लिए दो दशक से संघर्ष कर रहे सुन्नी मुस्लिम संप्रदाय के रोहिंगा अब भारत के लिए खतरा बनते जा रहे हैं. म्यांमार की सेना की सख्त कार्रवाई से रोहिंगाओं को म्यांमार से पलायन के लिए बाध्य होना पड़ा है. कई रोहिंगा नेता यूरोपीय देशों में तो भारी संख्या में रोहिंगा लड़ाके बांग्लादेश में शरण लिए हुए हैं. बांग्लादेश सरकार ने 'काक्स बाजार' जिले में इन शरणार्थियों के लिए दो शिविर भी लगाए हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन शिविरों में करीब 28 हजार रोहिंगा सपरिवार रह रहे हैं.


म्यामार सैनिकों के कब्जे में रोहिंगा मुसलमान : चाहें  आज़ादी 
 हाल में ही संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी की गयी रिपोर्ट में बांग्लादेश में तकरीबन तीन लाख रोहिंगा शरण लिए हुए हैं. अराकान की स्वतंत्रता की लड़ाई में इन्‍हें पाकिस्तान की ओर से भी मदद मिलती रही है. अपनी इस मदद के एवज में अब वह इनसे 'कीमत वसूलने' की तैयारी में है. पाकिस्‍तान अब इन रोहिंगाओं को भारत के खिलाफ इस्‍तेमाल करने में जुट गया है. पाक खुफिया एजेंसी आइएसआइ  इन छापामार लड़ाकों को प्रशिक्षण देकर बांग्‍लादेश के रास्‍ते भारतीय सीमा में घुसपैठ करा रही है.

भारतीय खुफिया एजेंसियों  ने यह खुलासा किया है कि बांग्लादेश सीमा से सटे पश्चिम बंगाल और असम से सीमावर्ती मुस्लिम बहुल इलाकों में तकरीबन डेढ़ हजार रोहिंगा लड़ाके छुपे हैं. खुफिया एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इनके पास विमान और युद्धपोतों को छोड़कर लगभग सभी प्रकार के अत्याधुनिक हथियार उपलब्ध हैं.

खुफिया एजेंसियों  ने पश्चिम बंगाल एवं असम पुलिस को जो सूचना उपलब्ध करायी है उसके अनुसार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ इन रोहिंगा छापामारों को पाकिस्तान में छापामार युद्ध का प्रशिक्षण देकर बांग्लादेश के रास्ते भारत में घुसपैठ करा रही है.

पिछली  4 मार्च को त्रिपुरा पुलिस ने राजधानी अगरतला से तीन महिलाओं समेत दस रोहिंगाओं को गिरफ्तार किया. ये सभी लोग गैरकानूनी रूप से भारत में घुसे थे. इसके पहले 22जनवरी को अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से 700 किलोमीटर दूर समुद्र में थाईलैंड की समुद्री सुरक्षा बल ने भी 91 रोहिंगाओं को गिरफ्तार किया है. इनके पास भी थाई क्षेत्र में प्रवेश के लिए कोई वैध कागजात नहीं थे.

वर्ष 2008 में क्रिसमस की पूर्व संध्या को हावड़ा रेलवे स्टेशन से 32 म्‍यामारी रोहिंगा को बगैर वैध दस्तावेजों के गिरफ्तार किया गया. इनमें महिलाएं और बच्‍चे भी शामिल थे. इसके बाद हिंद महासागर से पांच मई 2010 को भारतीय तटरक्षकों ने 72 छोटी नौकाओं के साथ इन्हें गिरफ्तार किया.

इन गिरफ्तार म्‍यामारी रोहिंगाओं से पूछताछ में खुफिया विभाग को कई चौंकाने वाले तथ्य मिले हैं. खुफिया विभाग के मुताबिक ये रोहिंगा दो मोर्चे पर अपनी लड़ाई एक साथ लड़ रहे हैं. एक तरफ ये अराकान को स्वतंत्र कराने के लिए पाकिस्तान से मिलने वाली मदद के लिए उसके इशारे पर भारत के खिलाफ गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं, वहीं अराकान में म्‍यांमारी जुंटा सैनिकों द्वारा रोहिंगाओं पर किये जा रहे कथित अत्याचारों के खिलाफ लड़ रहे हैं.


रोहिंगा मुस्लिमों का जीवन : रैन बसेरों में पल रही पीढियां
 अराकान नेशनल रोहिंगा आर्गेनाइजेशन की ओर से 14 फरवरी, 2011 को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गयी जिसमें कहा गया, 'ये सभी रोहिंगा गलती से थाई जल क्षेत्र में चले गये थे.थाई सुरक्षा बलों को उनकी मजबूरी को समझना चाहिए.'

यूनियन रोहिंगा कम्यूनिटी ऑफ यूरोप के महासचिव हमदान क्याव नैंग का कहना है कि म्यांमार में रोहिंगाओं पर जुंटा सैनिक दमन नीति चला रहे हैं. वहां खुलेआम मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है.मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों की रोकथाम के लिए उन्होंने विश्व समुदाय से खासकर भारत से एमनेस्टी इंटरनेशनल पर दबाव बनाने का आग्रह किया है. उन्होंने तीन सितंबर 2008 को बांग्लादेशी अखबार दैनिक युगांतर, पूर्वकोण में प्रकाशित खबर और फोटो को सभी देशों को भेजा था.

इस रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि म्‍यांमार में किस तरह रोहिंगाओं को मस्जिद में नमाज अदा करने से जुटां सैनिकों द्वारा रोका जा रहा है. इसी तरह मांगदोव शहर से सटे रियांगचन गांव के मेई मोहमद रेदान नामक युवक को मानवाधिकार की रक्षा से संबंधित एक पत्रिका का प्रकाशन करने के आरोप में गिरतार किया गया. जुंटा सैनिकों की सहयोगी नसाका फोर्स ने उसे देकीबुनिया शिविर से गिरफ्तार किया और टार्चर किया.  इस क्रम में उसकी जीभ काट ली गई.

इसी तरह यूनियन रोहिंगा कम्यूनिटी ऑफ यूरोप की ओर से जारी एक विज्ञप्ति में बताया गया था कि पिछले दो वर्षों में जुंटा सैनिकों द्वारा 17 रोहिंगा समुदाय के धार्मिक नेताओं को गिरफ्तार किया गया, लेकिन अब वह कहां और कैसे हैं? इसकी जानकारी किसी को नहीं है. इन 17 धार्मिक नेताओं में मौलाना मोहमद सोहाब, मौलाना मोहमद नूर हसन, नैमुल हक भी शामिल हैं.


वर्ष 1991से म्यांमार में रोहिंगा और जुंटा सैनिकों के बीच छापामार युद्ध चल रहा है, लेकिन बीते तीन वर्षों से जुंटा सैनिकों ने रोहिंगाओं के आंदोलन को दमन करने का अभियान छेड़ दिया है.सेना के खिलाफ अपने अभियान के लिए वे अब मुस्लिम राष्‍ट्रों की ओर मदद के लिए देख रहे हैं.

बांग्‍लादेश सरकार अपने उस वादे पर भी अमल करती नजर नहीं आ रही जिसमें उसने यह कहा था कि उनके देश की जमीन का इस्‍तेमाल भारत विरोधी कार्यों के लिए नहीं किया जाएगा. जानकारी के अनुसार बांग्‍लोदशी जमीन पर उन्‍हें हर तरह की मदद मुहैया कराई जा रही है, वहीं आईएसआई भी उन्‍हें हथियार चलाने से लेकर अन्‍य सभी तरह के सैन्य प्रशिक्षण देकर भारत में घुसपैठ कराने में जुटी है.

ख़ुफ़िया अधिकारियों के मुताबिक पश्चिम बंगाल के सुंदर वन के जलमार्ग से बांग्लादेश के खुलना और सतखिरा होकर भारत में घुसपैठ कर रहे हैं. गुप्त सूचना के अनुसार कुछ छापामारों के उत्तर चौबीस परगना के बांग्लादेश सीमा से सटे इलाकों और दक्षिण चौबीस परगना के कैनिन, घुटियारी शरीफ, मगराहाट, संग्रामपुर, देउला, मल्लिकपुर और सोनारपुर में बांग्लादेशी घुसपैठियों के बीच छिपे होने की आशंका है. इनमें भारी संख्या में महिलाएं भी शामिल हैं.



 
लेखक हिंदी  साप्ताहिक  पत्रिका  'द  संडे इंडियन' से जुड़े  हैं, उनसे  rajesh06sri@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.








Mar 14, 2011

आवाम के शायर हबीब जालिब की याद में


हबीब जालिब पहली बार अय्यूब खान के सैनिक शासन में जेल गए। यह जेल अय्यूब खान की पूंजीवादी नीतियों के विरोध का सिला थी। इस दौरान जेल में उन्होंने अपनी मशहूर नज्म ‘दस्तूर’ लिखी...


सचिन  श्रीवास्तव  


यह पोस्ट कल डाली जानी थी,लेकिन वक्त की कमी और अखबारी मसरूफियत की वजह से यह हो न सका। कल हबीब जालिब की पुण्यतिथि थी। 12 मार्च 1993 को वे हमारे बीच नहीं रहे थे, लेकिन वे ऐसे शायर हैं,जिन्हें याद करने के लिए तारीखों की जरूरत नहीं।

हबीब : अवाम की आवाज
हबीब उन चंद नामों में से हैं कि कोई पूछे कि एक शायर, कवि, साहित्यिक या इंसान को कैसा होना चाहिए, तो हम बिना दिमाग पर जोर डाले जिन नामों को जवाब की शक्ल में उछाल सकते हैं,उनमें से एक नाम इस आवाम के शायर का भी है। जिन लोगों ने हबीब को पढा-सुना है वे मेरी बात से सहमत होंगे। हालांकि ऐसे लोग कम ही होंगे,जिन्होंने हबीब जालिब को नहीं पढा। फिर भी उन बदकिस्मत लोगों के लिए अफसोस के अलावा चंद बातें और कुछ नज्में।

पाकिस्तान में 24मार्च 1928 को पैदा हुए जालिब उम्र भर अपनी कविताओं के माध्यम से पाकिस्तान के सैनिक कानून, तानाशाही और राज्य की हिंसा के खिलाफ लिखते, बोलते और तकरीरें करते रहे। उम्र भर सत्ता की आंख में चुभते रहे जालिब की कविताएं पाकिस्तान की सीमा पर कर दुनिया के हर संघर्ष और सत्ता की खिलाफत करने वाले इंसान की आवाज बन गई हैं।

अंग्रेजी राज में पैदा हुए जालिब का शुरुआती नाम हबीब अहमद था। बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान का रुख कर गए और कराची से निकलने वाले डेली इमरोज में प्रूफरीडर हो गए। प्रगतिशीलता के पक्षधर जालिब ने इसी दौरान कुछ अंग्रेजी कविताओं का अनुवाद किया, जिनसे वे पाठकों की नजरों में आए। उस दौर के स्थापित नामों से अलग शैली अपनाते हुए उन्हें सपाट बयानी और पाठक को संबोधित करने वाली भाषा की बुनावट में जुल्म,ज्यादती,मुफलिसी और गैर बराबरी को अपनी कविताओं का हिस्सा बनाया। अपने समय की राजनीति पर लयबद्ध कविताओं के जरिए चोट करने वाले जालिब जल्द ही आवाम के शायर हो गए थे।
पाकिस्तान की कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे जालिब मार्क्सवाद से गहरे प्रभावित थे और अपनी कविताओं के विषय कम्यूनिज्म की बारीकियों से ही चुनते थे। पाकिस्तान में जब कम्यूनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया गया था और इसके सदस्य राष्ट्रीय आवामी पार्टी के बैनर तले काम कर रहे थे, तब हबीब जालिब भी एनएपी के साथ जुड़ गए। इस दौरान भी हबीब जालिब के तेवर तीखे ही रहे और इसी कारण उन्हें अपना ज्यादातर समय जेल में बिताना पड़ा।

वे पहली बार अय्यूब खान के सैनिक शासन में जेल गए। यह जेल अय्यूब खान की पूंजीवादी नीतियों के विरोध का सिला थी। इस दौरान जेल में उन्होंने अपनी मशहूर नज्म ‘दस्तूर’लिखी। 1962 में जब अय्यूब खान के संविधान को पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी मुहम्मद अली ने लायलपुर के क्लॉक टॉवर से सराहा,तो हबीब ने इसके जवाब में नज्म ‘मैं नहीं मानता’लिखी। शासन के विरुध अपने तीखे तेवरों के कारण उस दौर के सरकारी मीडिया में जालिब को प्रतिबंधित कर दिया गया था, लेकिन वे झुके नहीं और अन्य मोर्चों पर निरंकुश शासन की खिलाफत करते रहे।
फातिमा जिन्ना ने जब अय्यूब खान के खिलाफ चुनाव लड़ने की तैयारी की,तो तमाम लोकतांत्रिक ताकतें उनके इर्दगिर्द इकट्ठा हो गईं  और सरकारी प्रतिबंध के बावजूद जालिब ने पूरी पाकिस्तानी आवाम के दर्द को अपनी लेखनी में उतारते हुए बड़े जनसमूहों को उस दौर में अपनी शायरी के जरिए संबोधित किया। उस दौर में उन्होंने ‘मां के पांव तले जन्नत है,इधर आ जाओ’ जैसी कविताएं भी लिखीं,जो उनकी भावुकता का चरम मानी जाती है। यूं भी जालिब को अपनी कविताएं पूरी भावुकता के साथ पढ़ने के लिए भी याद किया जाता है।

घटनाएं जालिब को शायरी के लिए किस कदर प्रभावित करती थीं, इसका एक और बड़ा उदाहरण है। यह घटना पाकिस्तान की प्रतिरोधी संस्कृति की लोकगाथाओं में भी शुमार की जाती है। हुआ यूं कि एक बार पश्चिमी पाकिस्तान (तब बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा था और मूल पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान कहा जाता था)के गर्वनर से मिलने ईरान के शाह रेजा पहलवी आए। उनके मनोरंजन के लिए गवर्नर ने फिल्म कलाकार नीलू को डांस करने के लिए बुलाया। नीलू ने इससे इंकार कर दिया,तो उसे लेने के लिए पुलिस भेजी गई। जिस पर नीलू ने आत्महत्या का प्रयास किया। इस घटना पर हबीब जालिब ने कविता लिखी,जो बाद में नीलू के पति रियाज शाहिद ने अपनी फिल्म ‘जर्का’ में इस्तेमाल की। ये कविता थी- ‘तू क्या नावाकिफ-ए-आदाब-ए-गुलामी है अभी/ रक्स जंजीर पहन कर भी किया जाता है।’

जब जुल्फिकार अली भुट्टो के शासन 1972 में आने के बाद जालिब के कई साहित्यिक और राजनीतिक साथी सत्ता का लुत्फ लेने लगे और भुट्टो के साथ हो लिए। जालिब ने इस दौरान विपक्ष की भूमिका को ही पसंद किया। बताया जाता है कि एक बार जालिब भुट्टो से मिलने उनके घर पहुंचे। भुट्टो ने अपनी पार्टी में आने का न्यौता देते हुए जालिब से पूछा-‘कब शामिल हो रहे हो?’ जिस पर जालिब ने जवाब दिया-‘क्या कभी समुंदर भी नदियों में गिरा करते हैं?’तब भुट्टो ने जवाब दिया- ‘कभी-कभी समुद्र नदियों की तरफ जाते हैं, लेकिन नदियां ही उन्हें पीछे धकेल देती हैं’। अपनी शासन विरोधी कार्रवाइयों के कारण जालिब को एक बार पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, तब जुल्फिकार भुट्टो ने ही उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था।



पत्रकार हसन अली के साथ हबीब जालिब  
 इसके बाद जनरल जिया उल हक की तानाशाही के दौरान जालिब ने लोकतांत्रिक आंदोलन में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने अपनी मशहूर कविता ‘क्या लिखना’ लिखी। जिया का अर्थ होता है, प्रकाश और जालिब इसीलिए पूछते हैं, ‘जुल्मत को जिया क्या लिखना’। जिया उल हक के शासन में ज्यादातर वक्त जालिब जेल में रहे।

1988 में जनरल जिया उल हक की हवाई दुर्घटना में मौत के बाद हुए आम चुनाव जीतकर बेनजीर भुट्टो शासन में आर्इं,उन्होंने हबीब जालिब को जेल से रिहा कराया। तानाशाही के बाद आए लोकतंत्र में कुछ लोगों को राहत मिली,लेकिन आवाम के तरफदारों के लिए यह मुसीबत का दौर था। निरंकुश तानाशाही के बाद लोकतंत्र की बयार में पाकिस्तान के कई लेखकों-शायरों के लिए वैचारिक संकट था।

अगर वे बेनजीर के लोकतंत्र की खिलाफत करते थे,तो उन्हें तानाशाही की याद दिलाई जाती थी, कि उस दौर से तो यह दौर बेहतर है। ऐसे में एक बार जालिब से पूछा गया कि वे इस लोकतंत्र में क्या बदलाव चाहते हें,तो उन्होंने अपनी एक नज्म के जरिए मुल्क पर चढ़े कर्ज और औरतों के हालात का जिक्र करते हुए जवाब दिया-हाल अब तक वही हैं गरीबों के,दिन फिरे हैं फकत वजीरों के हर ‘बिलावल’ है देश का मकरोज पांव नंगे हैं ‘बेनजीरों’ के

जालिब की कविता में उनके दर्शन और जिंदगी की करीबी सच्चाइयों को साफ-साफ पढ़ा जा सकता है। वे कभी अपने रास्ते से नहीं डिगे। वे इंसान से प्यार करते थे,मजलूमों के लिए उनके दिल में हमदर्दी थी और यह उनके हर एक लिखे,बोले हर्फ में दिखाई देती है। हबीब अपने समय के उन दुर्लभ कवियों में शामिल हैं,जिनका अन्याय और क्रूरता के खिलाफ गुस्सा ताजिंदगी रचनात्मक ऊर्जा के साथ एक राजनीतिक हस्तक्षेप भी मुहैया कराता रहा। जालिम हमारे दौर के क्रूर सामाजिक ढांचे के भुक्तभोगी भी हैं। उन्हें कई बार ऐसे अपराधों में फंसाकर जेल भेजा गया, जो उन्होंने किए ही नहीं थे।

अपने आखिरी वक्त तक जालिब पाकिस्तान की कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे। उनकी मौत के बाद 1994 में कम्यूनिस्ट पार्टी का मजदूर किसान पार्टी में विलय हो गया, अब इसे कम्यूनिस्ट मजदूर किसान पार्टी के नाम से जाना जाता है। कम्यूनिस्ट मजदूर किसान पार्टी के दो सदस्यों शहराम अजहर और तैमूर रहमान ने उनकी याद में एक म्यूजिक वीडियो लांच किया था। जालिब के संघर्ष के रूपक को इस्तेमाल करते पाकिस्तान बैंड ‘लाल’ ने भी काफी काम किया है। 2009 में इस बैंड ने ‘उम्मीद ए सहर’ नाम से भी एक अलबम निकाला। 2009 में 23 मार्च को पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने हबीब जालिब को मरणोपरांत सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दिया।

जालिब के बारे में लिखने-पढ़ने-कहने-सुनने को इतना कुछ है कि उसे एक बार में याद नहीं किया जा सकता। फिलवक्त उनकी चंद नज्मों,गजलों का लुत्फ उठाएं। और इजाजत दें। फिर वक्त मिला तो किसी और फनकार के साथ हाजिर होउंगा। शब्बा खैर।




मेरठ से प्रकाशित दैनिक जनवाणी में फीचर संभाल रहे सचिन पत्रकारिता के साथ साहित्य में दखल रखते हैं. उनसे   chefromindia@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.


 
 

 

लीबिया के विद्रोह पर साम्राज्यवादियों की गिद्ध दृष्टि


अमेरिका अगर लीबिया में लोकतंत्र स्थापितकरने का हिमायती है तो उससे   मधुर संबंध रखने  वाले कई  देशों में राजशाही -तानाशाही है। कई देश अमेरिका के मित्र हैं जहां लीबिया से अधिक भूख,बेरोज़गारी, मंहगाई व भ्रष्टाचार है...

तनवीर जाफरी

ट्यूनीशिया तथा मिस्र के जनविद्रोह के बाद लीबिया में उपजे जनाक्रोश से ऐसा लगने लगा था कि  कर्नल मोअमार गद्दाफी भी उन  देशों के राष्ट्र प्रमुखों की ही तरह पद को त्याग कर देश छोड़ अन्यत्र चले जाऐंगे। ईरान सहित कई उन यूरोपिय देशों के नाम भी सामने आने शुरू हो गए थे जहां गद्दाफी को पनाह मिल सकती है। ऐसी ख़बरें भी आयीं   कि गद्दाफी देश छोड़ कर जाने को तैयार हैं बशर्ते   उनके परिवार के किसी भी व्यक्ति को कोई शारीरिक नुकसान न पहुंचाया जाए तथा उनकी धन संपत्ति तथा सोना- आभूषण आदि को उनके पास सुरक्षित रहने दिया जाए।

लेकिन इन खबरों की विश्वसनीयता तब संदिग्ध हो जाती है जब कभी कर्नल गद्दाफी तो कभी उनके पुत्र किसी टीवी चैनल को साक्षात्कार देते समय यह कहते सुनाई देते हैं कि -'मैं लीबिया का हूं और लीबिया में ही जिऊंगा और यहीं मरूंगा।' गद्दाफी का दावा है कि लीबिया में रह रहे तमाम अलग अलग क़बीलों के लोगों को संगठित कर एकजुट रखना केवल उन्हीं जैसे नेता के वश की बात है। बकौल गद्दाफी अगर उनकी पकड़ ढीली हुई तो देश टूट जाएगा तथा इसका हश्र बोसनिया जैसा होगा।


लीबिया में मची उथल पुथल पर नज़र डाली जाए  तो  कोई शक नहीं कि पूरे लीबिया में गद्दाफी के विरुद्ध भारी जनाक्रोश है। कारण वही हैं  भूख,बेरोज़गारी,भ्रष्टाचार,गरीबी तथा मंहगाई जो मिस्र व ट्यूनीशिया में  थे। इतना ज़रूर है कि एक प्रमुख तेल उत्पादक देश होने के कारण लीबिया की आर्थिक स्थिति अन्य इस्लामिक देशों की तुलना में काफी सुदृढ़ ज़रूर है।

 मगर  मिस्र तथा लीबिया  में एक  बड़ा अंतर है.जहां मिस्र के शासक हुस्नी मुबारक को अमेरिका का समर्थन प्राप्त था वहीं कर्नल गद्दाफी दुनिया के उन कुछेक  शासकों में हैं जो अमेरिका के विरुद्ध मुखर हैं. ऐसे में लीबिया जैसा तेल उत्पादक देश और उस देश का गद्दाफी जैसा मुखिया जो कि अमेरिका विरोधी विचारधारा रखता हो, आखिर  अमेरिका ज्य़ादा समय तक यह स्थिति कैसे बर्दाश्त कर सकता है? 
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा इस बात को लेकर चिंतित नज़र आ रहे हैं कि कर्नल गद्दाफी अपने विद्रोहियों को कुचलने के लिए सेना के साथ-साथ हवाई हमलों का सहारा भी ले रहे हैं। अमेरिका गद्दाफी द्वारा चलाए जा रहे इस दमनचक्र को रोकने हेतु जहां लीबियाई आकाश को उड़ान निषिध क्षेत्र अर्थात् (नो फलाई ज़ोन ) बनाना चाह रहा है वहीं अमेरिका यह भी चाहता है कि लीबिया में नॉटो सेना दखल अंदाज़ी करे।

ओबामा ने स्वयं पिछले दिनों यह कहा भी कि-'ब्रसेल्स में नॉटो कई विकल्पों पर विचार कर रहा है जिसमें संभावित सैन्य कार्रवाई भी एक विकल्प है। यह लीबिया में जारी हिंसा के जवाब में किया जा रहा है। हम लीबिया की जनता को स्पष्ट संदेश देते हैं कि इस अनचाही हिंसा के सामने हम उनके साथ खड़े होंगे। हम लोकतांत्रिक आदर्शों के जवाब में दमनचक्र देख रहे हैं। उधर लीबिया को नो फ्लाई   ज़ोन बनाने की बात भी  अमेरिका ने  शुरु की थी परंतु बाद में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के ऊपर यह निर्णय छोड़ दिया।

गौरतलब है गद्दाफी की सेना विद्रोहियों पर हवाई हमला भी कर रही है. विद्रोहियों व सैनिकों के बीच के इस टकराव में अब तक एक हज़ार से अधिक लोगों के मारे जाने का भी समाचार है। ऐसे में यदि लीबिया को उड़ान निषिध क्षेत्र घोषित कर दिया जाता है फिर किसी भी विमान को लीबियाई आकाश पर उडऩे की इजाज़त नहीं होगी। कोई विमान लीबिया पर उड़ता नज़र आया तो अंतर्राष्ट्रीय सेना उस जहाज़ के विरुद्ध कोई भी कार्रवाई कर सकती है।

लीबिया में नॉटो की दखलअंदाज़ी के विषय में भी फैसला सुरक्षा परिषद् को ही लेना है। सवाल यह है कि लीबिया को लेकर अमेरिका की नीति कितनी स्पष्ट व पारदर्शी है। यदि अमेरिका लोकतंत्र स्थापित करने तथा विद्रोहियों द्वारा राजनैतिक सुधार लागू करने का हिमायती है तो अमेरिका के मधुर संबंध और भी तमाम ऐसे देशों से हैं जहां या तो राजशाही है या तानाशाही है। कई देश अमेरिका के मित्र हैं जहां लीबिया से कहीं अधिक भूख, बेरोज़गारी, मंहगाई व भ्रष्टाचार है।

ऐसे में अमेरिका द्वारा गद्दाफी का हटाने की जि़द क्यों?क्या सिर्फ इसलिए कि कर्नल गद्दाफी अमेरिका की कठपुतली बनकर नहीं रहते?या वास्तव में अमेरिका लीबिया के विद्रोहियों के प्रति हमदर्दी का भाव रखता है?इस मुद्दे पर स्वयं गद्दाफी का यह कहना कि पश्चिमी देशों तथा कई यूरोपीय देशों की नज़रों में लीबिया के तेल भंडार खटक रहे हैं। और इसी जन विद्रोह के बहाने यह देश लीबिया में प्रवेश करना चाह रहे हैं।
गद्दाफी की इस बात को सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि 1990 से 2003 में इराक में प्रवेश करने तक अरब व मध्य-पूर्व क्षेत्र को लेकर अमेरिकी नीति को दुनिया बहुत गौर से देख रही है। इराक पर हमले के बाद तो पूरी दुनिया में अमेरिका को इसी नज़र से देखा जाने लगा है कि उसकी गिद्ध दृष्टि प्राय: तेल के भंडारों पर ही रहती है। ऐसे में गद्दाफी द्वारा अमेरिका को संदेह की नज़रों से देखना भी बिल्कुल गलत नहीं आंका जा सकता।

दूसरी तरफ समय बीतने के साथ-साथ लीबिया में गद्दाफी समर्थक सैनिकों तथा विद्रोहियों के बीच लगातार उतार-चढ़ाव तथा एक-दूसरे पर बढ़त लेने की भी खबरें प्राप्त हो रही हैं । ऐसा नहीं है कि लीबिया की शत-प्रतिशत जनता ही गद्दाफी के विरुद्ध हो। तमाम जगहों पर भारी तादाद में आम जनता भी गद्दाफी समर्थक सेना का साथ दे रही है। कई जगहों पर सेना, विद्रोहियों के कब्ज़े से कई कस्बों व शहरों को छुड़ा चुकी है। ज़ाबिया तथा रास लानुफ जैसे प्रमुख तेल उत्पादक शहर जिन पर कि पहले विद्रोहियों का कब्ज़ा था अब पुन:गद्दाफी समर्थकों व सेना के कब्ज़े में वापस आ गये हैं।

इससे यह साफ लगने लगा है कि गद्दाफी को सत्ता से हटाना उतना आसान नहीं है जितना कि दुनिया समझ रही है। परंतु साथ-साथ ऐसा भी महसूस किया जा रहा है कि शायद गद्दाफी को सत्ता मुक्त करने की जितनी जल्दी विद्रोही संगठन अर्थात् नेशनल लीबियन कौंसिल को है उससे भी कहीं ज्य़ादा जल्दी में फ्रांस जैसे देश दिखाई दे रहे हैं। संभवत:यही वजह है कि फ्रांस दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है जिसने कि एनएलसी अर्थात् नेशनल लीबियन कौंसिल को यह मान्यता दे दी है कि एनएलसी ही लीबिया वासियों का वैध प्रतिनिधित्व कर रही है।

 यह फैसला गत् दिनों फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोज़ी तथा एन एल सी के प्रतिनिधि मंडल के मध्य हुई एक बैठक में लिया गया। हालांकि यूरोपीय संघ सरकोज़ी की इस जल्दबाज़ी के पक्ष में नहीं है। यूरोपीय संघ का मानना है कि अभी लीबिया पर नज़रें रखने की ज़रूरत है तथा यह देखना ज़रूरी है कि विद्रोही कौन हैं, क्या चाहते हैं और यह वास्तव में सच्चे लीबियाई प्रतिनिधि हैं भी या नहीं। यूरोपियन यूनियन इस बात की भी पक्षधर है कि लीबिया के विषय पर अरब लीग के साथ मिलजुल कर काम किया जाए तथा उसकी सहमति से ही कोई निर्णय लिया जाए।

उपरोक्त सभी परिस्थितियों के मध्य लीबिया के ताज़ातरीन हालात यही हैं कि वहां गृह युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। इन्हीं हालात के परिणामस्वरूप तीन लाख से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ 6लाख विस्थापितों हेतु सोलह करोड़ बीस लाख डॉलर जुटाने की अपील भी कर चुका है। इन सब के बावजूद लीबिया पर लगभग 42वर्षों तक सत्ता पर काबिज़ रहने वाले कर्नल गद्दाफी की पकड़ देश पर अभी भी उतनी कमज़ोर नहीं हुई है जितना कि गद्दाफी विरोधी शासक या देश उम्मीद कर रहे हैं।

वैसे भी राष्ट्रपति ओबामा चाहे लीबिया में नॉटो कार्रवाई के पक्षधर हों या वहां नो फ्लाई  ज़ोन बनाने के। परंतु राष्ट्रपति ओबामा के प्रमुख ख़ुफ़िया  सलाहकार जनरल जेम्स क्लेपर का आखिरकार  यही मानना है कि लीबिया में विद्रोहियों की जीत बहुत मुश्किल है। क्लेपर मानते हैं कि आखिरकार  जीत गद्दाफी की ही होगी। क्योंकि उनके सैनिक ज़्यादा अच्छी तरह से प्रशिक्षित हैं और उनके पास बेहतर हथियार भी हैं। साथ ही साथ न केवल गद्दाफी समर्थकों बल्कि गद्दाफी विरोधियों के मन में भी कहीं न कहीं यह बात समाई हुई है कि कहीं ऐसा न हो कि गद्दाफी को अपदस्थ करने के बहाने तथा विद्रोहियों को समर्थन देने की आड़ में अमेरिकी सेना लीबिया में प्रवेश कर जाए।

ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने से पूर्व ईरान भी अमेरिका को चेतावनी भरे लहज़े में अपना संदेश दे चुका है। कुल मिलाकर यही हालात कर्नल गद्दाफी को उर्जा प्रदान कर रहे हैं ऐसे में आसान नहीं है कर्नल गद्दाफी की बिदाई।




लेखक  हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय  मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafari1@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.




बंदियों के परिजनों की जेल में पिटाई


जनज्वार. बरेली जेल में बंद आतंकवाद के आरोपियों से मिलने गए परिजनों को पुलिस द्वारा पिटे जाने का विरोध शुरू हो  गया है.सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पाण्डेय ने जारी विज्ञप्ति में इस घटना की निंदा की है और दोषी पुलिकर्मियों पर करवाई की मांग की है. वहीं  मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल ने पुरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हुए दोषी जेल और पुलिस अधिकारियों को तत्काल निलंबित करने की भी मांग की है।

पीयूसीएल के प्रदेश  संगठन सचिव राजीव यादव और शहनवाज आलम ने जारी विज्ञप्ति मे घटना के पीछे गहरी साजिश का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि चुंकि पुलिस रामपुर सीआरपएफ कैम्प पर हुए कथित आतंकी हमले में गिरतार लोंगों के खिलाफ कोई  सुबूत कोर्ट में पेश नही कर पाई है इसलिए उसने निराशा में आरोपियों के परिजनों की, जो उनसे जेल में मिलनें आये थे, आधे घंटे तक बर्बर पिटाई की। जेल में हुई इस आपराधिक घटना के दौरान बच्चों सहित कई महिलाओं को चोट आई है. 

मानवाधिकार नेताओं का आरोप है कि पुलिस आरोपियो के परिजनों को मारपीट कर उनके  मनोबल को तोड़ना चाहती है ताकि वे ठीक से पैरवी ना कर सकें। वहीं,साम्प्रदायिकता के खिलाफ काम करने वाले संगठन डिबेट सोसायटी ने भी इस पुलिसिया कार्यवाही की आलोचना की है। संगठन के नेता रवि षेखर और एकता सिहं नें सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि रामपुर सी0आर0पी0एफ0 कैम्प की घटना की सत्यता  पर शुरू से ही सवाल उठते रहें हैं।

 यहाँ तक कि प्रदेश की कचहरियों में हुए धमाकों पर जब तत्कालीन केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश  जायसवाल नें सीबीआई जांच की मांग की थी तब प्रदेश  की मुख्यमंत्री ने उन्हें पहले रामपुर की घटना की सीबीआई जांच कराने की चुनौती दी थी। इसके बाद जांच का मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

Mar 13, 2011

जनता की फिक्र करे मीडिया

 
मीडिया पर बाजार भारी है और इससे लड़ने की मीडिया के पास ताकत नहीं है.ऐसी स्थिति में जरुरत है कि मीडिया को बाजार के दबाव से मुक्त कराया जाए...


शनिवार की ढलती गुनगुनी दोपहर के बाद दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम का माहौल तल्ख था. देश के दिग्गज पत्रकारों ने मीडिया की वर्तमान भूमिका को जायज भी ठहराया तो उसकी खामियों को इंगित करते हुए आत्ममंथन की जरूरत भी बतायी.मौका था प्लानमैन मीडिया समूह की समाचार पत्रिका द संडे इंडियन और टाइम्स फाउंडेशन द्वारा आयोजित “जनवाणी से जनता की वाणी” विषयक सेमिनार का.

दरअसल ठीक 25साल पहले सरकार नियंत्रित भारतीय दूरदर्शन पर शुरु हुआ था एक कार्यक्रम जनवाणी,जिसके माध्यम से पहली बार भारत में दर्शकों के राजनीतिज्ञों से सीधे सवाल पूछने का मौका मिला. उसके बाद सरकार की ओपन स्काई पॉलिसी आयी और शुरु हुआ निजी समाचार चैनलों का आगमन. और आज 25 साल बाद भारतीय आकाश में 600 से ज्यादा चैनल हैं, जो हर रोज सवाल पूछ रहें हैं. तो क्या 25 सालों में जनवाणी से शुरु हुए इस सफर में आज के चैनल जनता की वाणी बन गये हैं. या कहीं वे उच्छृंखल तो नहीं हो गये. ऐसे ही मौजूं सवालों पर आयोजित था यह विशेष राष्ट्रीय सेमिनार. जिसका उद्घाटन वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने किया.


बाएं से द संडे इंडियन के संपादक अरिंदम  चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला और
दीप प्रज्वलित करते  आज समाज के समूह संपादक राहुल देव

खचाखच भरे कमानी सभागार में आयोजित इस ऐतिहासिक सेमिनार का विषय प्रवर्तन  करते हुए द संडे इंडियन के प्रधान संपादक व मैनेजमेंट गुरु प्रो. अरिंदम चौधरी ने सवाल उठाया कि क्या वास्तव में आज की मीडिया जनता की आवाज है?उन्होंने कहा कि 25साल पहले देश में निजी समाचार चैनल नहीं थे, उस समय पहली बार दूरदर्शन पर “जनवाणी” कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमें केंद्रीय मंत्री जनता के सवालों से रूबरू होते थे.

आज सैकड़ों की तादाद में समाचार चैनल और अखबार हैं,क्या वास्तव में हम जनता की आवाज उठाते हैं. श्री चौधरी ने कहा कि यह आत्ममंथन की घड़ी है, और जब हम अपने भीतर झांकते हैं तो पाते हैं कि वास्तव में हम अपनी दिशा भूल गये हैं. “जनवाणी” भले ही सरकार द्वारा आयोजित अपने प्रचार का माध्यम रहा, लेकिन उसने भारतीय मीडिया को एक नयी अवधारणा दी. उन्होंने कहा कि अब हमें अपनी दिशा तय करनी होगी और देश के आम लोगों की फिक्र करनी होगी,मीडिया में जनसरोकार वाले मुददों को प्रमुखता देनी होगी वरना हम यूं ही हाय-तौबा मचाते रहेंगे और अपने दायित्वों से मुंह छुपाते रहेंगे.

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय निदेशक प्रभु चावला ने कहा कि आज हम जनता की आवाज नहीं उठाते, ये सही है. हम अपनी दिशा भूल गये हैं, यह भी सही है लेकिन मीडिया ही है, जिसने देश को,देश के लोकतंत्र को बचा कर रखा है.हमें अपनी खामियों को दुरुस्त करना होगा.बाजार के ताकतवर होने से हमारी नैतिकता कमजोर हुई है.

हमें अपनी साख को बरकरार रखते हुए जनोन्मुख होना होगा. “जनवाणी” की नियत अच्छी नहीं थी, लेकिन प्रयास बेहतर था. लेकिन हमें अच्छी नीयत के साथ अच्छे प्रयास करने होंगे.उन्होंने कहा कि यह सेमिनार इस मामले में सभी सेमिनारों से इतर है कि यहां प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया के सभी दिग्गज मौजूद हैं,ऐसी उपस्थिति तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा आयोजित संपादकों की बैठक में भी नहीं थी.

सेमिनार की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने की.सेमिनार में दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई,आज समाज के समूह संपादक राहुल देव,अमर उजाला के सलाहकार संपादक अजय उपाध्याय,आईबीएन 7के प्रबंध संपादक आशुतोष,दूरदर्शन के पूर्व डीडीजी एमपी लेले,टाइम्स फाउंडेशन के निदेशक पूरन चंद्र पांडे,जी न्यूज के प्रसिद्ध एंकर व वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी,साधना न्यूज चैनल के प्रमुख व ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसियेशन के महासचिव एन के सिंह,इंडिया न्यूज के प्रबंध संपादक कुर्बान अली,एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक संजय अहिरवाल,न्यूज एक्सप्रेस चैनल के प्रमुख मुकेश कुमार,वरिष्ठ लेखक व चैनल पी 7के प्रोग्रामिंग हेड शरद दत्त,दूरदर्शन के पूर्व चीफ प्रोड्यूसर कुबेर दत्त और लेखिका व मीडिया समीक्षक वर्तिका नंदा भी मौजूद थीं.


पत्रकार और कवि लीलाधर मंडलोई : जनवाणी के पचीस वर्ष पुरे 

अतिथियों का स्वागत करते हुए प्लानमैन मीडिया के प्रबंध संपादक सुतनु गुरु ने कहा कि मीडिया जनता के लिए होती है और वह जनता प्रति जवाबदेह है और वह अपनी जवाबदेही से नहीं मुकर  सकती. वरिष्ठ   पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि भारत में मीडिया अपने सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है. अब इसके साख को बचाने का समय है. किसी लोकतंत्र में मीडिया इतनी मजबूर नहीं होनी चाहिए कि वह बाजार के सामने घुटने टेक दे.इस प्रवृति से बाहर आने की दिशा में कदम उठाने का समय है.

आईबीएन 7 के प्रबंध संपादक आशुतोष ने कहा कि हिंदुस्तान बदल रहा है, इस बदलाव के दौर में मीडिया भी बदल रही है लेकिन यह बदलाव सकारात्मक है.इस पर आंसू बहाने की जरुरत नहीं है. ये बात सच है कि 2004-05 और 2009 में मीडिया के कृत्यों से इसके साख पर बट्टा जरूर लगा. लेकिन इसने फिर खुद को संभाल लिया.दुनिया के जिस कोने में मीडिया स्वतंत्र है वहां मिस्र जैसे हालात पैदा नहीं हो सकते.  मीडिया ही है जिसने भारतीय समाज के मनोबल को ऊंचा रखा है.

आज समाज के समूह संपादक राहुल देव ने कहा कि मीडिया पर बाजार भारी है और इससे लड़ने की मीडिया के पास ताकत नहीं है.ऐसी स्थिति में इससे ज्यादा उम्मीद की कल्पना कैसे की जा सकती है. सबसे पहली जरुरत है कि मीडिया को बाजार के दबाव से मुक्त कराया जाए, हालांकि यह दुरुह कार्य है. लेकिन उम्मीदें बाकी हैं.

अमर उजाला के सलाहकार संपादक अजय उपाध्याय ने कहा कि भारतीय मीडिया अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करती, संतुलित है, लेकिन यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है या नहीं, इस पर नये सिरे से मंथन करना होगा. मीडिया की जनपक्षधरता पर हमेशा से सवाल उठाये जाते रहे हैं. यह कोई नई बात नहीं है लेकिन यह भी सही है कि इन सारी चुनौतियों के बीच मीडिया जनता की आवाज को एक मंच जरुर देती है.

वरिष्ठ टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि आज मीडिया नफा-नुकसान के गणित को ध्यान में रख कर अपनी दिशा तय कर रही है.इसके लिए मीडिया को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता,पूरी व्यवस्था ही जिम्मेदार है. नैतिकता कहने की चीज हो गई है अपनाने की नहीं. वास्तव में वैकल्पिक बहस ही बंद हो गई है.

ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज के चैनल हेड एन के सिंह ने कहा कि जहां ज्यादा पैसा है वहीं टैम मीटर लगे हैं और वही समाचार चैनलों की दिशा तय करते हैं. जब तक टीआरपी के झमेले से चैनल मुक्त नहीं होंगे.जनपक्षधरता हाशिये पर रहेगी. उन्होंने कहा कि जहां तक कंटेंट का सवाल है, तो दो वर्षों में भारतीय मीडिया के कंटेंट का स्तर काफी बेहतर होगा, इसका विश्वास दिलाता हूं.

इंडिया न्यूज के प्रबंध संपादक कुर्बान अली ने कहा कि देश मीडिया पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं है. देश की जनता जागरूक है.एनडीए की फील गुड और शाइनिंग इंडिया को नकार कर अयोध्या मामले के फैसले के दिन देश में अमन रख कर जनता ने अपने जागरुक होने का सबूत दे दिया है.इस उपलब्धि में मीडिया का कोई रोल नहीं था.अब समय आ गया है कि मीडिया अपने साख और दायित्व तय करे.

एनडीटीवी इंडिया के कार्यकारी संपादक संजय अहिरवाल ने कहा कि अब खबरिया चैनलों को अपने कंटेंट पर ध्यान देना होगा,नहीं तो देश की जनता उन्हें नकार देगी और इसके साथ ही वे अपनी साख बरकरार नहीं रख पाएंगे.बाजार के दबाव और अपनी नैतिकता के बीच का कोई रास्ता निकालना होगा.

वरिष्ठ पत्रकार जफर आगा ने कहा कि वर्तमान दौर में टीआरपी ने समाचार चैनलों की दिशा तय कर दी है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पत्रकारिता अब बेमतलब की चीज हो गई है.

मंच संचालन द संडे इंडियन हिंदी व भोजपुरी संस्करण के कार्यकारी संपादक तथा ब्रॉडकास्टर्स क्लब ऑफ इंडिया के कार्यकारी अध्यक्ष ओंकारेश्वर पांडेय ने किया.सेमिनार के समापन से पहले प्रो. अरिंदम चौधरी ने पूरी चर्चा का सार संक्षेप रखा और इस ऐतिहासिक आयोजन में सहभागी बनने के लिए टाइम्स फाउंडेशन के निदेशक पूरन पांडेय तथा सेमिनार में आये मीडिया के दिग्गजों का आभार व्यक्त किया. आखिर में प्रो. अरिंदम चौधरी और श्री पूरन पांडेय ने सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर उन्हें सम्मानित किया.





पिकनिक पार्टी नहीं है महिला दिवस


महिला दिवस पर सौंदर्य प्रसाधन और तरह-तरह के वस्त्राभूषण बनाने वाली कंपनियाँ फैशन शो आयोजित करती हैं।  लेकिन ये समझना जरूरी है कि महिला दिवस सिर्फ औरतों के पहनने-ओढ़ने या सिर्फ पिकनिक-पार्टी का ही दिन नहीं है...


महिला दिवस के कार्यक्रमों की श्रृंखला में भारतीय महिला फेडरेशन और घरेलू कामकाजी महिला संगठन की इंदौर इकाई ने 11 मार्च 2011 को ‘कामकाजी महिलाओं के संघर्ष और उनकी ताकत’ विषय पर व्याख्यान,  नाटक और महिलाओं की रैली का आयोजन किया गया। अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता ने कहा कि एक तरफ सरकार खाद्य सुरक्षा कानून को लगातार टालती जा रही है तो   दूसरी तरफ अनाज को विशाल कंपनियों के चंगुल में फँसाना चाहती है, जिनका मुख्य मकसद गरीब जनता का पेट भरना नहीं बल्कि मुनाफा कमाना है।

जया मेहता ने जोर देते हुए कहा कि देश के लोगों की आधी आबादी को भरपेट अनाज  नसीब नहीं होता। देश की 45प्रतिशत महिलाएँ रक्ताल्पता यानी एनीमिया से पीड़ित हैं। कमजोर माएं  कमजोर बच्चों को जन्म देती हैं। नतीजा ये है कि हमारे देश में कुपोषित बच्चों की तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा है। इन कमजोर बच्चों का मस्तिष्क भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। जिन्हे भरपेट खाना तक नहीं मिल पाता, वे भला अमीर और मध्यम वर्ग के बच्चों के साथ किस तरह तरक्की की दौड़शामिल हो सकते हैं।

शहीद भवन पर आयोजित इस सभा को संबोधित करते हुए घरेलू कामकाजी महिला संगठन की ओर से सिस्टर रोसेली ने कहा कि महिलाओं को भी ये समझना चाहिए कि उनकी समस्याओं का हल धार्मिक जुलूसों में शामिल होने से नहीं निकलेगा। उन्हें संगठित होकर अपनी लड़ाई लड़नी होगी। हमें उन्हें जोड़ने के और मजबूत उपाय करने चाहिए।

आँगनवाड़ी यूनियन की अनीता  ने कहा कि 21 बरस से लड़ते-लड़ते उन्होंने रु. 275 मासिक से 1500 और अब 3000 का वेतन हासिल हुआ है। ये लड़ाई जारी रखनी होगी नहीं  तो सरकार कुछ नहीं देने वाली। सभा को निर्मला देवरे और मनीषा वोह ने भी संबोधित करते हुए कहा कि हम मजदूर औरतों को एक-दूसरे की मदद के लिए साथ आना चाहिए.



कार्यक्रम की एक अन्य वक्ता  कल्पना मेहताने‘स्वास्थ्य की राजनीति का शिकार बनतीं महिलाएँ’ विषय पर बात रखी .कल्पना ने बताया कि  अमेरिका व अन्य विकसित देश भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों की महिलाओं पर तरह-तरह के गर्भ-निरोधक आजमाते हैं और अशिक्षित व जागरूकताहीन जनता की जिंदगी के साथ नेता,अफसर और कंपनियाँ खिलवाड़ करती हैं।

भारतीय महिला फेडरेशन की सचिव सारिका श्रीवास्तव ने गतिविधियों का ब्यौरा देते हुए पिछले वर्ष  दिवंगत हुए कॉमरेड अनंत लागू और कॉमरेड राजेन्द्र केशरी को सभा की ओर से श्रृद्धांजलि दी। सभा का संचालन पंखुड़ी मिश्रा ने किया।

सभा के अंत में महिला मजदूरों के संघर्षों पर आधारित एक नाटक की प्रस्तुति हुई जिसमें गारमेंट फैक्टरी में काम करने वालीं, बीड़ी बनाने वालीं, भवन निर्माण मजदूरी करने वालीं और जमीन से बेदखली की परेशानियों से लड़ने वाली आम मेहनतकश महिलाओं के जीवट और जोश की कहानियाँ थीं। नाटक का शीर्षक था ‘जब हम चिड़िया की बात करते हैं’। नाटक में पंखुड़ी, रुचिता, सारिका, नेहा, शबाना, रवि और आशीष ने अभिनय किया।




Mar 12, 2011

दोनों निर्दोष आज भी जेल में


गाँव वाले अगले दिन दोनों को चारपाई पर डाल कर सरपंच को साथ में लेकर दंतेवाडा पहुँच गए .हमने पत्रकारों को बुलाया और कहा कि  भाई इनकी भी सुन लो...


हिमांशु कुमार

विनायक तो सरकारी नज़रों में इसलिए नक्सली हो गए क्योंकि उन्होंने 'माओवादी के पत्र किसी को ले जाकर दिए'.  परन्तु सरकार ने एक बार अपना अपराध छिपाने की कोशिश के तहत मुझे भी नक्सलियों का इलाज कराने का इल्ज़ाम लगा कर फंसाने की कोशिश की थी. ऐसी ही एक मज़ेदार घटना बताता हूँ.

एक अख़बार में छपा कि  'बैलाडीला स्थित एस्सार के पाइप लाइन प्लांट के पास पुलिस ने दो नक्सलियों को एक एन्काउन्टर में मार गिराया है.'  परन्तु आस पास के ग्रामीणों का कहना था की पुलिस गप्प मार रही है. नंदनी सुन्दर भी दंतेवाडा आयी हुई थीं !हम दोनों ने घटना की सच्चाई जानने का फैसला किया . और पूछते हुए उनके गाँव पहुंचे . गाँव वालों ने बताया की असली कहानी यह है की खेती का मौसम हो रहा है और इस समय सभी आदिवासी अपने पशुओं को हल चलाने के लिए ढूँढते हैं.
किरंदुल थाने के बाहर इंतजार में परिजन
चार गाँव वाले अपने जानवर ढूंढ कर वापस लौट रहे थे. फ़ोर्स गश्त पर थी पुलिस ने अँधेरे में इन लोगों को देख कर गोली चला दी. दो लोग वही म़र गए. बाकी के दो लोगों में से एक की जांघ में और दूसरे की बाजू में गोली लगी .पुलिस ने फटाफट बयान दे दिया की उसने दो नक्सलियों को मार गिराया है.  बाकी बचे दोनों घायलों को पुलिस ने चुपचाप किरंदुल के सरकारी अस्पताल ले जाकर फर्स्ट ऐड करा कर घर भगा दिया.  

मैंने और नंदिनी ने ग्रामीणों के इस बयान की तस्दीक करने का फैसला किया और बताया की हम दोनों घायलों से मिलना चाहते हैं .गाँव वाले हमें उनके घर ले गए .गाँव वालों का विवरण बिलकुल सच था सच्चाई हमारे सामने पडी कराह रही थी. दोनों आदिवासियों के घावों से मवाद बह रहा था .

दोनों के पास किरंदुल के सरकारी अस्पताल में इलाज होने के सबूत के तौर पर वहां का परचा भी मौजूद था! हमने दोनों की ओर से दो पत्र बनाये. घटना का विवरण देते हुए जाँच की मांग करते हुए एक एसपी के नाम और दूसरा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नाम पर .शाम होने लगी थी हमने गाँव वालों से दोनों घायलों को अगले दिन दंतेवाडा लाने का आग्रह किया . गाँव वाले अगले दिन दोनों को चारपाई पर डाल कर सरपंच को साथ में लेकर दंतेवाडा पहुँच गए .हमने पत्रकारों को बुलाया और कहा कि  भाई इनकी भी सुन लो. अखबारों ने दोनों घायलों का बोला हुआ भी छाप दिया.

अब पुलिस घबराई . ये घायल आदिवासी हमारे आश्रम में सपरिवार रह रहे थे और हमारे कार्यकर्ता इनको रोज़ अस्पताल ले जाकर मरहम पट्टी करा कर वापिस आश्रम ले आते थे. एक दिन मैं कहीं से लौटा तो आश्रम में सारे कार्यकर्ता एक जगह खड़े होकर कुछ चर्चा कर रहे थे . पता चला थोड़ी देर पहले आदिवासियों की तरह लूंगी पहन कर एक आदमी आश्रम में आया था और दोनों घायल आदिवासी कहाँ हैं पूछ रहा था और कह रहा कि मैं इनका भाई हूँ और इन्हें घर ले जाने आया हूँ .
नंदिनी सुन्दर

परन्तु उनमें से एक की पत्नी वहीं थी उसने गोंडी भाषा में  बताया की ये तो थाने का पुलिस वाला साहब है,हमारा भाई नहीं है. कार्यकर्ताओं ने उससे कहा की अभी हिमांशु जी नहीं हैं आप थोड़ी देर में आना. और एक कार्यकर्ता उसके पीछे गया तो सचमुच थोड़ी दूर पर हथियारबंद लोगों से भरी पुलिस की एक जीप जंगल में छिप कर खड़ी की गयी थी . इसके बाद हमारे एक पत्रकार मित्र ने कहा की वो इन दोनों को वो बिलासपुर हाईकोर्ट तक ले जायेंगे और इनके विषय में एक रिट दायर करेंगे .

मैं तैयार हो गया दोनों आदिवासियों को उन्हें साथ ले जाने दिया . वो रायपुर गए वहां एक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता ने उनसे कहा की इस मामले को वो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने ले जायेंगे और कोर्ट में ले जाने से न्याय मिलने में बहुत समय लग जायेगा .और वो पत्रकार बंधू उन्हें वहीं से वापिस ले आये और सीधे उन्हें उन के गाँव पहुंचा दिया .पुलिस तो सूंघ ही रही थी . उसने दोनों को पूछताछ के बहाने थाने बुलाया और फरार नक्सलियों का फर्जी केस बना कर दोनों को जेल में डाल दिया. दोनों निर्दोष आदिवासी आज भी जेल में हैं.

मेरा आश्रम टूटने के बाद दंतेवाडा के एस पी मुझसे बोले की हिमांशु जी आपका आश्रम तो हमने इसलिए तोडा की आप वहाँ फरार नक्सलियों को रख कर इलाज कराते थे.मैंने कहा आप मुझ पर केस करिए मैं अदालत में किरंदुल अस्पताल की पर्चियां पेश करूंगा,जिसमें आपने उन्हें फर्स्ट ऐड करा कर घर जाने दिया था.

क्या पुलिस नक्सलियों का फर्स्ट ऐड भी कराती है? और फिर उन्हें आराम से घर भी जाने देती है ? एस पी साहब चुप हो गए . और इस मामले में भी हम बाकी सारे मामलों की तरह उन दोनों निर्दोषों को कोई न्याय नहीं दिलवा पाए. अलबत्ता हमने उन बेचारे आदिवासियों की मुसीबतें और भी ज्यादा बढ़ा दीं थी.

 


दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.