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Jun 23, 2017

सवा सौ करोड़ की आबादी में सिर्फ 40 लाख लोगों की पहुंच महंगे सिनेमा हालों तक

याद नहीं पड़ता कि पिछली ऐसी कौन—सी फिल्म थी, जिसने बिना भारी भरकम मार्केटिंग के बस अपनी कहानी के दम पर दर्शकों को सिनेमा की खिड़की की तरफ खींचा हो। महीनों उस फिल्म की गली—मोहल्लों, स्कूल—कॉलेजों में चर्चा रही हो.....
तैश पोठवारी

पिछले एक दशक में सिनेमा उद्योग में बहुत भारी अंतर आया है। एक तरफ सस्ते परम्परागत सिनेमाहाल जहां देश की आम मेहनतकश जनता फ़िल्में देखने जाती थी, टूटकर माल या ब्रांडेड मल्टीप्लेक्स सिनेमा हाल में बदल गया, वहीँ दूसरी तरफ आम आदमी व उसका जीवन सिनेमा की कहानी से पूरी तरह गायब हो गया और हर फिल्म की कहानी धनाढ्य युवा वर्ग की अराजक जीवनशैली के इर्द गिर्द घूमने लगी।
फिल्म का कथानक मैनेजमेंट और मार्केटिंग विशेषज्ञ तय करते हैं कि कैसे एक निश्चित वर्ग को टारगेट करके बस 2—4 दिन के लिए सिनेमा तक खींच लिया जाएं। कुछ एक अपवाद को छोड़कर याद नहीं पड़ता कि पिछली ऐसी कौन—सी फिल्म थी, जिसने बिना भारी भरकम मार्केटिंग के बस अपनी कहानी के दम पर दर्शकों को सिनेमा की खिड़की की तरफ खींचा हो। महीनों उस फिल्म की गली—मोहल्लों, स्कूल—कॉलेजों में चर्चा रही हो।
हो भी कैसे सिनेमा के बाजार के लिए देश की 80 फीसदी जनता जो 250 रुपए का टिकट नहीं खरीद सकती, न बाजार उसे अपना ग्राहक मानता है और न ही उसके लिए सिनेमा बनाता है। आजकल फिल्म के सुपरहिट होने का मतलब उसकी आम जनता में लोकप्रियता नहीं, बल्कि मल्टीप्लेक्स में हुआ कलेक्शन है।
अगर किसी फिल्म का टिकट 250 रुपए है और 125 करोड़ की आबादी वाले देश में सिर्फ 40 लाख लोग ही सिनेमा में किसी फिल्म को देखते हैं, तो उसका कलेक्शन 100 करोड़ हो जाता है। उस पर कई फिल्म निर्माता फिल्मों के टिकट इससे कहीं ज्यादा दुगने, तिगुने दामों पर भी रखने लगे हैं।
देश के उच्च मध्यम वर्ग को सिनेमा तक खींचने के लिए भारी भरकम मार्केटिंग की जाती है। मीडिया खरीदा जाता है। उसके नायक—नायिकाएं टीवी के तमाम लोकप्रिय कार्यक्रमों में जा पहुंचते हैं।
औपनिवेशिक संस्कृति के खुमार में डूबे तमाम युवा रिपोर्टर बिना फिल्म देखे फिल्म की रिलीज से पहले एक ऐसा कृत्रिम माहौल तैयार करते हैं कि दर्शक सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि चलो फिल्म को देख लिया जाए और दूसरे दिन ही पेड मीडिया जो सिनेमा के लिए एक सेल्समैन बन चुका है उसके कलेक्शन के रिकॉर्ड के साथ फिल्म के सुपरहिट होने की घोषणा कर देता है।
देश की बहुसंख्यक जनता को बाजार ने देखते ही देखते सिनेमा से बाहर कर दिया और भांड मीडिया इसकी आलोचना करने की बजाए उसका भोंपू बना हुआ है। फिल्मों का सिनेमाघरों में बस 2—4 दिन चलना और उस पर सिर्फ 2—4 लोगों का इसके निर्माण और वितरण पर अधिकार क्या यह दर्शकों का संकट है या सिनेमा का। न तो यह सिनेमा का संकट है, न ही दर्शकों का, असल में यह पूंजीवाद का संकट है। जहां फ़िल्में और हीरो हीरोइनें एक सीमित वर्ग के लिए खाली पड़े मल्टीप्लेक्स में बाजार में अन्य चीजों की तरह जबरदस्ती बिकने वाले प्रोडक्ट हैं।
भूमंडलीकरण के बाद हर देश में पूंजी का सकेंद्रीयकरण हुआ है और इस पूंजी ने सिनेमा के साथ हर छोटे बड़े व्यवसाय पर अपने ब्रांड के साथ एकाधिकार कर लिया है, जिसमें बड़े निवेश के साथ बने मल्टीप्लेक्स को मुनाफे में रखने के लिए बस एलीट सिनेमा बन रहा है, वहीँ फिल्म का अराजक, बाजारू खाओ—पियो ऐश करो का कथानक दिन—ब—दिन संकट में जा रहे कृत्रिम बाजार के लिए खरीदारी का माहौल तैयार कर रहा है।

Jun 22, 2017

पतंजलि के 6 उत्पादों पर लगा प्रतिबंध, रामदेव नहीं कर पाए मीडिया मैनेज

मेडिकल जांच में फेल होने पर लगा प्रतिबंध, पहले भी 4 दवाएं हो चुकी हैं प्रतिबंधित। सवाल यह कि जो दवा नेपाल के लोगों के लिए नुकसानदायक, वह भारत में लाभदायक कैसे...

काठमांडू, जनज्वार। नेपाल सरकार ने मेडिकल जांच में गडबड़ी पाए जाने पर बाबा रामदेव और योगी बालकृष्ण के मालिकाने वाले पतंजलि के 6 उत्पादों को 21 जून से नेपाल में प्रतिबंधित कर दिया है। नेपाल के मीडिया के मुताबिक इससे पहले पतंजलि के 4 और उत्पाद माइक्रोबॉलॉजिकल जांच में असफल पाए जाने पर प्रतिबंधित हो चुके हैं।


ये सभी उत्पाद पतंजलि आयूर्वेद लिमिटेड और आयूर्वेदिक मेडिसिन कंपनी द्वारा नेपाल में उपलब्ध कराए जा रहे थे। पतंजलि के जिन उत्पादों को सरकार ने प्रतिबंधित किया है, वे हैं आमला चूर्ण, दिव्य गशर चूर्ण, बकूची चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, अश्वंगंधा चूर्ण और अदिवा चूर्ण।

नेपाल सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए जांच में अधिकारियों ने पाया कि दवा के तौर प्रचारित ये उत्पाद तय मानकों से बहुत अलग हैं और इनके इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। ये सभी उत्पाद माइक्रोबॉयलॉजिकल टेस्ट में फेल हुए हैं।

इसी के मद्देजनर कल 21 जून को प्रतिबंधित किए जाने बाद विभाग ने तत्काल उत्पादों को बाजार से वापस मंगाने का आदेश संबंधित अधिकारियों को दे दिया है।

पतंजलि के खिलाफ नेपाल सरकार ने यह कार्यवाही '1978 ड्रग एक्ट की धारा 14' के तहत किया है।

वहीं भारत में इन दवाओं की धूम मची हुई है। रामदेव इन दवाओं के प्रचार पर हर महीने करोड़ों रुपए विज्ञापन पर खर्च कर रहे हैं। मीडिया का बड़ा हिस्सा इनके सही—गलत दावों को खूब प्रचारित कर रहा है, क्योंकि विज्ञापन का दबाव है।

यही कारण है कि रामदेव के अपनी कंपनी के उत्पादों से संबंधित तमाम अविश्वनीय दावों पर भी मीडिया समवेत स्वर में कोई सवाल नहीं उठा पाता। भारत में वह मीडिया मैनेज कर लेते हैं।

भारत में हाल ही सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी से पता चला है कि आयूर्वेद के 40 फीसदी उत्पाद मानकों से नीचे हैं, जिसमें पतंजलि के उत्पाद भी है।

भारत में वर्ष 2013 से 2016 के बीच 82 आयूर्वेदिक उत्पादों की जांच हुई, जिसमें मानकों की जांच में 32 फेल हुए। फेल होने वालों में पतंजलि दिव्य आंवला जूस और शिवलिंगी बीज दोनों ही शामिल थे।

पर भारत में असल समस्या सरकार की है। सरकार योग गुरु रामदेव की अंधसमर्थन करती है। वह उनका इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में करती है, जबकि रामदेव अपने सही—गलत दावों पर सरकार का इस्तेमाल उसकी चुप्पी के रूप में करते हैं। खुद प्रधानमंत्री मोदी और पूरा मंत्रिमंडल रामदेव के योग, दवाओं और उनके आर्थिक उभार के आगे नमस्तक है।

ऐसे में सवाल ये है कि जो दवा नेपाल के लोगों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है, वह भारत के लोगों को स्वास्थ्य लाभ कैसे दे सकती है।

एक बार जांच की मांग तो की ही जानी चाहिए क्योंकि मुनाफे की हवस न किसी सरकार की वफादार होती है न जनता की।

Jun 13, 2017

पेशाब-पाखाने की छुट्टी मांगने पर जाती है नौकरी, यूनियन बनाने की कोशिश हुई तो भेज दिया जेल

मजदूरों के यूनियन बनाने के बुनियादी हक़ के संघर्ष को विफल बनाने में पुलिस और न्यायपालिका भी अपना पूरा योगदान दे रही है .... 

आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में पिछले कुछ महीनों से मजदूर अपनी यूनियन पंजीकृत करवाने के लिए और मैनेजमेंट से अपने काम की परिस्थितियों से सम्बंधित मांगों को लेकर संघर्षरत हैं. 31 मई 2017 को कंपनी के गेट पर बीते कई दिनों से शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों पर पुलिस ने मैनेजमेंट की शिकायत पर पहले लाठीचार्ज किया और फिर उन्हें हिरासत में ले लिया. इन सभी के ख़िलाफ़ रोहतक के संपला थाने में एफ़आईआर दर्ज की गई है, जिनमें यूनियन लीडरों को मुख्य आरोपी नामित किया गया है.

फ़ाइल फोटो  
आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा प्राइवेट लिमिटेड एक जापानी कम्पनी है, जो 2011 से आई.एम.टी. रोहतक में स्थित अपनी फैक्ट्री में टोयोटा, मारुती, होण्डा आदि नामी गाड़ी बनाने वाली कंपनियों के लिए 'डोर लॉक' एवं 'इनसाइड-आउटसाइड हैंडल' जैसे पार्ट्स बनाती है. इस फैक्ट्री में करीब 450 मज़दूर काम करते हैं. इन्हें 8000—10000 रुपए मासिक वेतन मिलता है. 

आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा मज़दूर यूनियन के अनुसार, काम के दौरान मजदूरों को पानी व पेशाब के लिए मना किया जाता है, उनके साथ गाली—गलौज की जाती है और महिला मज़दूरों के साथ भी दुर्व्यवहार किया जाता है.

कम वेतन और काम की बुरी परिस्थितियों के चलते मज़दूरों ने फैसला किया कि वे अपनी यूनियन को पंजीकृत करेंगे और अपनी मांगों को मैनेजमेंट के सामने रखेंगे. 20 मार्च 2017 को उन्होंने यूनियन के पंजीकरण के लिए श्रम विभाग में अर्जी दी. 26 मार्च को मजदूरों ने अपना मांगपत्र कंपनी को दिया. पर न तो कंपनी मैनेजमेंट और न ही प्रशासन की तरफ से मजदूरों की कोई खबर ली गई या सुनवाई की गई. 

उल्टा 25 अप्रैल को कंपनी ने रोहतक सिविल कोर्ट में मुकदमा दाखिल कर दिया और यूनियन लीडरों और सदस्यों को फैक्ट्री गेट के अन्दर आने से रोकने और फैक्ट्री परिसर के 1000 मीटर तक कोई धरना या शामियाना लगाने से रोकने के निर्देश मांगे. 

26 अप्रैल को सिविल जज ने अंतरिम आदेश दिए की फैक्ट्री परिसर के अन्दर और फैक्ट्री गेट से 400 मीटर दूरी तक मजदूर धरने पर भी नहीं बैठ सकते. 3 मई को कंपनी ने मोर्चे की अगुवाई कर रहे 20 मज़दूरों को काम से निकाल दिया. बाकि मज़दूरों ने जब इसका विरोध किया तो कंपनी ने उन्हें एक "अंडरटेकिंग" थमा दी और यह शर्त रख दी कि इस पर हस्ताक्षर करके ही वे काम पर वापस आ सकते हैं. कंपनी के मनमाने बर्ताव के विरोध में मज़दूर 3 मई से कंपनी के गेट के बाहर बैठकर शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे हैं .

इस बीच 12 मई को मजदूरों की यूनियन पंजीकरण की अर्जी खारिज हो गई. यूनियन लीडरों का कहना है कि अर्जी को बेबुनियाद कारणों से खारिज किया गया है. जहां कारण बताया गया है कि यूनियन के चार सदस्य कानूनी परिभाषा में अनुसार “मजदूर” नहीं हैं, वहां लीडरों का कहना है की ये बात उनके वेतन रसीद से झूठ साबित होती है. जहाँ कारण बताया गया है कि यूनियन के कुल सदस्य कंपनी के कुल मजदूर संख्या के 10 प्रतिशत से भी कम है, वहां लीडरों का कहना है की कंपनी ने यह संख्या षड्यंत्र के तहत बढ़ाकर बताई है.
  
30 मई को चल रहे सिविल मुक़दमे में जज ने एक और निर्देश दिया की यूनियन के सदस्य फैक्ट्री परिसर में न तो घुसेंगे, न उसके 200 मीटर के दायरे में कोई धरना करेंगे, न नारे लगाएंगे, न घेराव करेंगे, न रास्ता रोकेंगे. कंपनी द्वारा दिए गए तथ्यों जैसे मजदूरों द्वारा फैक्ट्री संपत्ति को नुक्सान पहुँचाया गया और उत्पादन धीमा किया गया, की पड़ताल किये बिना और संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने के बुनियादी हकों को नकारते हुए फैसला कंपनी के पक्ष में सुना दिया गया. 

31 मई को सुबह से ही मज़दूर अपने परिजनों के साथ अपनी अनसुनी मांगों को उठाने हेतु फैक्ट्री के बाहर धरने पर बैठे थे. मैनेजमेंट की शिकायत पर हरियाणा पुलिस वहां एकत्रित हो गई, प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, उन्हें हिरासत में ले लिया और उन पर सांपला थाने में मुकदमा दर्ज़ कर दिया. एफ़.आई.आर. के अनुसार मज़दूरों पर आरोप है कि वे गैरकानूनी रूप से खतरनाक हथियार (यानी झंडे) लेकर एकत्रित हुए, रास्ता रोका, कंपनी के गेट को जाम कर दिया, कंपनी के स्टाफ को धमकी दी और चोट पहुंचाई. 425 लोगों को, जिनमें मजदूर, उनके परिजन और कुछ कार्यकर्ता भी शामिल थे, रोहतक के सुनारियन जेल में बंद कर दिया और मजिस्ट्रेट को अर्जी देने पर ही 6 जून तक सभी को बेल पर छोड़ा गया.

मज़दूरों के काम की परिस्थितियों से सम्बंधित मांगों को लेकर कंपनी प्रबंधन और श्रम विभाग की उदासीनता उनके रवैये से स्पष्ट है. मजदूरों के यूनियन बनाने के बुनियादी हक़ के संघर्ष को विफल बनाने में पुलिस और न्यायपालिका भी अपना पूरा योगदान दे रही है . एक तरफ मज़दूरों को संगठित होने से रोकने के लिए प्रबंधन ने 20 मज़दूरों को सीधा निष्कासित कर दिया और बाकियों से अंडरटेकिंग देने की शर्त रख दी। उनकी मांगों के बारे में कोई पहल न कर गेट पर बाउन्सरों को तैनात किया गया. सिविल कोर्ट में यूनियन के सदस्यों को बाहर निकालने के लिए मुकदमा कर दिया और फिर 31 मई को उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई. 

दूसरी तरफ प्रशासन, ख़ास तौर से श्रम विभाग की तरफ से मज़दूरों की मांगों के लिए प्रबंधन पर कोई दबाव नहीं बनाया गया है. प्रबंधन का मनोबल बढाते हुए पुलिस ने मजदूरों पर लाठीचार्ज किया, उन पर मुकदमा दर्ज किया और कई दिनों तक गिरफ्तार करके रखा. साथ ही सिविल कोर्ट ने मजदूरों को फैक्ट्री के आसपास प्रदर्शन करने से भी रोक दिया है.

हरियाणा में आईसीन, होण्डा, मारुती, ओमाक्स आदि कंपनियों के संघर्षों से स्पष्ट पता चलता है की आज भी मजदूरों के लिए संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए संगठित होने के मूलभूत अधिकार को हासिल करना कितना मुश्किल है. 

पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) ने संघर्षरत मज़दूरों के खिलाफ दर्ज मुक़दमे एवं गिरफ्तारी की निंदा करते हुए मांग है मजदूरों पर दर्ज झूठे मुकदमे वापस लिए जाएँ. मजदूरों की यूनियन को तुरंत पंजीकृत किया जाये। साथ ही श्रम विभाग मैनेजमेंट से मजदूरों की मांगें मनवाने के लिए उचित कार्यवाही करे.

Jun 10, 2017

दिल्ली में डिस्टेंस एजूकेशन के केवल 1 प्रतिशत विद्यार्थी हुए पास

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने पहले 62000 बच्चों को स्कूल सिस्टम से निकाला और फिर पत्राचार से दसवीं  की परीक्षा दिलाई, जिसके कारण 99 फीसदी बच्चे फेल हो गए ...

दिल्ली में इस बार पत्राचार से दसवीं की परीक्षा देने वाले 62000 विद्यार्थियों में से 60750 विद्यार्थी फेल हो गए हैं। आॅल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन ने इस परीक्षा परिणाम को केजरीवाल सरकार की गलत शिक्षा नीति का नतीजा बताया है। इसके खिलाफ रविवार, 11 जून, 2017 को जंतर मंतर पर विद्यार्थी अपने माता—पिता और रिश्तेदारों के साथ धरना प्रदर्शन करेंगे। 

आॅल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन का कहना है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने पहले 62000 बच्चों को स्कूल सिस्टम से निकाला और फिर पत्राचार से दसवीं  की परीक्षा दिलाई, जिसके कारण 60750 बच्चे असफल हुए। गलत शिक्षा नीति के चलते इतने सारे विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है। इन नीतियों के खिलाफ ही विद्यार्थियों ने धरना प्रदर्शन करने का फैसला किया है।
  
आल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन ने केजरीवाल सरकार से मांग की है कि सभी फेल विद्यार्थियों को री-टेस्ट का मौका दिया जाए। री-टेस्ट में पास होने वाले विद्यार्थियों को स्कूल में ग्यारहवीं में एडमिशन दिया जाए साथ ही री-टेस्ट में फेल होने वाले विद्यार्थियों को स्कूल में दसवीं कक्षा में एडमिशन दिया जाए।

आल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट अशोक अग्रवाल ने सभी असफल विद्यार्थियों और उनके माता—पिता से अपील की है वे ज्यादा से ज्यादा तादाद में आकर इस धरने को सफल बनाएं जिससे केजरीवाल सरकार की आंखें खुलें और वो अपनी गलत शिक्षा नीति की तरफ ध्यान दे।

देखें वीडियो :


Jun 5, 2017

औरत के गुप्तांग की शक्ल वाली ऐशट्रे के विज्ञापन का हो रहा विरोध

अमेज़ॉन डॉट कॉम के इस वाहियात विज्ञापन का हो रहा जमकर विरोध, कंपनियां सामान बेचने के नाम पर हमारे नौजवानों बना रही हैं असंवेदनशील, कंपनी की निगाह में औरतों की नहीं कोई इज़्ज़त। सोशल मीडिया पर हो रही मांग, अमेजॉन तत्काल हटाए ये विज्ञापन।

इस मसले को सबसे पहले सोशल मीडिया में लेकर आयीं अनामिका चक्रवर्ती अनु लिखती हैं, 

स्त्री के गुप्तांग में सिगरेट बुझाना यानि पुरूष की सोच कहाँ तक जा चुकी है। अब तक बलात्कारी — डंडा, राॅड, बाँस और न जाने क्या क्या डाल चुके हैं पीड़िताआं के गुप्तांगों में। अब एक दुनिया की सबसे बड़ी आॅनलाइन अमेजॉन लेकर लेकर आयी है ऐश ट्रे स्त्री के गुप्तांग के रूप में।

अनामिका लिखती हैं, 'किसी न किसी बहाने औरत को नंगा कर उसे बेइज्जत करना एक शौक बन गया है। रचनात्मकता का आधुनिकरण इस चरम पर पहुँच गया है कि
अब एक सिगरेट बुझाने वाले ऐश ट्रे के डिजाइन को स्त्री के गुप्तांग के रूप में बनाना पड़ गया।'

और ये महान घिनौना काम किया है सबसे बड़ी Online Company #amazon ने।

लेखिका सवाल करती हैं कि इन्हें पूरी दुनियाँ में, पूरी पृथ्वी में कोई और डिजाइन नहीं मिला एक अदने से ऐश ट्रे को डिजाइन करने के लिये।'

आखिर ये कम्पनी आज किसी बलात्कारी से कम नजर नहीं आ रही है। इस कम्पनी ने इससे पहले भी ऐसी ही शर्मनाक काम किया था जूतों पर तिरंगे का डिजाइन करके ।

अनामिका अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए सवाल करती हैं, 'क्या स्त्री केवल भोग संभोग की वस्तु है?
क्या स्त्री केवल एक सेक्स का प्रतिरूप है ?
कहाँ हैं वे लोग जो स्त्री के मान सम्मान उसकी सुरक्षा पर बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेख, कहानी, उपन्यास और क्रांतिकारी कविताएं लिखते हैं।

वह अपील करते हुए कहती हैं, 'कम्पनी की इस वाहियात हरकत पर आवाज उठाएं और तुरन्त बंद करवाएं इस प्रोडक्ट को। और इतना ही नहीं इस पर एक केस दर्ज होना चाहिये जिससे भविष्य में फिर कभी ये ऐसी बेशर्मी वाली हरकतें न करें ।
ये सिर्फ ऐश ट्रे नहीं अपनी माँ बहन को बाजारू वस्तु बना रहे हैं ऐश ट्रे के रूप में।

इस कम्पनी का पूरी दुनियाँ में बहिष्कार किया जाना चाहिये।

May 29, 2017

तुम इतने कट्टर क्यों हो भक्तो!

कौन हैं ये भक्त और क्या वे रातोंरात कट्टर भक्ति लिये पैदा हो गए? अमेरिका के नस्ली गोरे और भारत के सवर्ण दावेदार! वे जो इतिहास को नकारना चाहते हैं और क्रमशः ट्रम्प और मोदी में अपने मुक्तिदाता को देखते हैं...

अमेरिका से जनज्वार के लिए विकास नारायण राय 

अमेरिका और भारत दुनिया में लोकतंत्र के मानक कहे जाते हैं। प्रधानमत्रंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के पूर्ववर्तियों, मनमोहन सिंह और बराक ओबामा को सारी दुनिया सार्वजनिक जीवन में शिष्टता का प्रतीक मानती रही है। इस सन्दर्भ में मोदी का पिछले वर्ष का अमेरिकी दौरा याद कीजिये। सैन फ्रांसिस्को में फेसबुक मुख्यालय पर भारतीयों से मुलाकात के दौरान स्वयं होस्ट मार्क जुकरबर्ग को मोदी ने कैमरे की जद से धक्का मारकर किनारे कर दिया था। 

ऐसी ही सड़कछाप उजड्डता ट्रम्प ने भी हालिया पहले विदेशी दौरे में सहयोगी नाटो राष्ट्राध्यक्षों के जमावड़े में दिखायी, जब वे मोंटेनीग्रो के प्रधानमंत्री को धकियाते हुए कैमरे के केंद्र में पहुँच गए। क्या दोनों भक्त समूहों के लिए यह विचलन की घड़ी हो सकती थी? नहीं, जरा भी नहीं। उनके लिए तो यह उनके नायकों की सहज चेष्टा ही रही।

उत्तर पश्चिमी अमेरिका के बारिश भरे प्रान्त ऑरेगोन की सबवे ट्रेन में नस्ली गुरूर में डूबे एक व्हाइट अमेरिकी ने हिजाब पहनी हुयी दो अमेरिकी मुस्लिम औरतों को अनाप-शनाप दुत्कारना शुरू कर दिया। टोकने पर उसने एक के बाद एक तीन व्हाइट सहयात्रियों को चाकू मार दिया, जिनमें दो की मृत्यु हो गयी। 

उत्तर पश्चिमी भारत के पशु बहुल राजस्थान प्रान्त में मुस्लिम गाय व्यापारियों के एक समूह पर स्वयंभू गौ-रक्षक को सरेआम लाठियों से ताबड़तोड़ हमला कर हत्या करने में रत्ती भर भी संकोच नहीं हुआ। अमेरिका का राष्ट्रपति संभावित आतंकवाद रोकने के नाम पर अपने ही देश के मुस्लिम नागरिकों को देश में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा देता है। भारत का सेनाध्यक्ष पत्थर फेंकते कश्मीरी मुस्लिम युवकों को देश के ‘दुश्मन’ की संज्ञा से संबोधित करता है। ट्रम्प और मोदी समर्थकों के लिए यह सब राष्ट्रीय शर्म का नहीं, अपने नायकों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने का अवसर सरीखा है।

कौन हैं ये भक्त और क्या वे रातोंरात कट्टर भक्ति लिये पैदा हो गए? अमेरिका के नस्ली गोरे और भारत के सवर्ण दावेदार! वे जो इतिहास को नकारना चाहते हैं और क्रमशः ट्रम्प और मोदी में अपने मुक्तिदाता को देखते हैं। इसे विसंगति मत समझिये कि अमेरिकी गृहयुद्ध के नायक और दास प्रथा को समाप्त करने वाले अब्राहम लिंकन नहीं, कॉर्पोरेट एनपीए में अमेरिका को डुबाने वाले रोनाल्ड रीगन हैं ट्रम्प के आदर्श।।

नस्ली गोरों का एजेंडा रहा है काले और लातीनी समुदाय को अमेरिका से खदेड़ना, जो उनके हिसाब से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बोझ हैं। उन्हें भावी अप्रवासियों को भी अमेरिका में आने से रोकना है जो उनके ख्याल से उनका रोजगार खा रहे हैं। आखिर ट्रम्प की राजनीति भी इसी तरह अमेरिका को महान बनाने की ही तो है।

भक्तों के लिए उस मोदी में भी कोई विसंगति नहीं है जो गाँधी को तो राष्ट्रपिता कहता है पर गाँधी के घोषित उत्तराधिकारी और आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू को कोसने और गाँधी के वैचारिक हत्यारे सावरकर को महिमामंडित करने में पूरी ऊर्जा लगा देता है। सोचिये, स्वतंत्र भारत में सवर्ण सपने क्या रहे हैं? मुसलमानों और ईसाइयों का दमन, पाकिस्तान की पिटाई, दलित शोषण, आरक्षण की समाप्ति, कम्युनिस्ट दमन, मर्द अधीन स्त्री, मनुवाद और परलोकवाद की स्थापना! उसके हिसाब से भारत की सनातनी श्रेष्ठता के लिए आवश्यक तत्व यही हैं। क्या मोदी शासन उसके सपनों को ही हवा नहीं देता! 

समीकरण सीधा है, लोकतंत्र में हर विचारधारा को अपना राजनीतिक प्रतिनिधि चाहिए। नस्ली और सवर्ण श्रेष्ठता के पैरोकारों को भी। अन्यथा,अमेरिका में नस्ली-धार्मिक और भारत में सांप्रदायिक-जातीय घृणा के जब-तब फूटने वाले हालिया उभार में नया कुछ नहीं है, सिवाय इसके कि आज इन दोनों लोकतांत्रिक देशों के शासन पर जो काबिज हैं, ट्रम्प और मोदी, उन्होंने अपनी विजय यात्रा इसी घृणा की लहर पर सवार होकर तय की है।

यानी स्वाभाविक है, जनसंख्या के एक प्रबल हिस्से का घोषित एजेंडा और शासन में बने रहने का ट्रम्प-मोदी का अघोषित एजेंडा परस्पर गड्मड् होकर दोनों देशों की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय धरोहर को बेशक आशंकित करते रहें, भक्तों को तो आश्वस्त ही रखेंगे। स्पष्टतः न मोदी भक्ति 2014 और न ट्रम्प भक्ति 2016 अचानक या जल्दबाजी में संपन्न हुयी परिघटना हैं|

मोदी और ट्रम्प भक्तों में अद्भुत समानता है। मोदी और ट्रम्प कितना भी फिसलें, उनके भक्तों की कट्टर निष्ठा अडिग रहेगी। बेशक ट्रम्प से चिपके तमाम लैंगिक और नस्ली कलंक उदाहरणों में अब राष्ट्रपति चुनाव अभियान में रूस से मिलीभगत के गंभीर आरोप भी शामिल हो गए हों। बेशक,मोदी के सांप्रदायिक और कॉर्पोरेट-यारी वाले चेहरे को इतिहास के सबसे बड़े फेकू होने का दर्जा मिल रहा हो। 

ये सब बातें भक्तों के लिए बेमानी हैं। मजबूत तर्क और अकाट्य तथ्य उनकी भक्ति को हिला नहीं सकते। दरअसल, मोदी और ट्रम्प अपने इन कट्टर समर्थकों के क्रमशः सोलह आना खरे राजनीतिक प्रतिनिधि सिद्ध हुए हैं। इस हद तक और इतने इंतजार के बाद कि उनके लिए वे एकमात्र विकल्प जैसे हैं।

दोनों के भक्तों के अडिग आचरण को समझने के लिए यहाँ एक और पर्दाफाश जरूरी है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी अभियान में माना जाता था कि ट्रम्प ने बड़े आक्रामक अंदाज में रिपब्लिकन पार्टी का नामांकन हथियाया है। लेकिन अब पार्टी का केंद्र और उसका समर्थक मीडिया,ओबामा केयर समाप्त करने और अमीरों को टैक्स छूट देने में ही नहीं, चिर-दुश्मन रूससे मिलीभगत की छानबीन में भी जिस अंदाज में ट्रम्प के साथ खड़े नजर आते हैं, उनके एक दूसरे का पूरक होने में कोई शक नहीं।  

मोदी ने संघ के आशीर्वाद से भाजपा का नेतृत्व हथियाया था। तब भी,उनके कैंप की ओर से,खरीदी मीडिया के माध्यम से, लगातार‘विकास’ के एजेंडे पर इस तरह जोर दिखाया जाता रहा है मानो संघ की हिंदुत्व ध्रुवीकरण की विभाजक पैंतरेबाजियों से मोदी का लेना-देना न हो। जाहिर है,संघ के दलित और मुस्लिम विरोधी एजेंडे पर ही नहीं, किसान और मजदूर की कीमत पर व्यापारियों और पूंजीशाहों के बेशर्म पोषण पर भी, संघ और मोदी की प्रशासनिक एकता इस छद्म प्रचार को अब और अधिक चलने नहीं दे पा रही।

इस आलोक में ट्रम्प और मोदी की चुनावी सफलतायें उतनी आकस्मिक नहीं रह जाती हैं, जितना उनके विरोधी विश्वास करना चाहेंगे। न ही उनके अंधसमर्थकों को ऐसे बरगलाये लोगों का समूह मानना सही होगा, जिन्हें राष्ट्रीय विरासत, लोकतांत्रिक परम्पराओं और संवैधानिक दबावों के रास्ते पर लाने की बात जब-तब बौद्धिक आकलनों में उठाई जाती है। 

दरअसल,समर्थकों की तिरस्कृत पड़ी आकांक्षाओं को मोदी और ट्रम्प ने राष्ट्रीय राजनीति में जैसे प्रतिष्ठित किया है, वे चिर ऋणी क्यों न रहें? समझे, भला भक्त इतने कट्टर क्यों?

May 10, 2017

जुड़वा दिमाग जैसे हैं मोदी और ट्रंप

पूर्व आइपीएस विकास नारायण राय इन दिनों अमेरिका में हैं। वे लगातार भारतीय समाज, सुरक्षा और राजनीति पर लिखते रहते हैं। अबकी उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी की अचंभित करने वाली समानताओं, मसखरेपन, इतिहास ज्ञान और समाजदृष्टि पर बहुत ही तथ्यात्मक और दिलचस्प टिप्पणी की है,  पढ़िए पूरा लेख विस्तार से...

अमेरिका से जनज्वार के लिए  विकास नारायण राय 

 
जरूरी नहीं जो राष्ट्र नेता इतिहास बनाने निकलते हैं, उन्हें इतिहास की समझ भी हो| ऐसे में उनके हाथों घोर अनर्थ होने या भारी भ्रान्ति फ़ैलने की संभावना बनी रहती है| नेपोलियन, हिटलर, मुसोलिनी, तोजो, याह्या खान, सद्दाम हुसैन जैसों के आत्मघाती उदाहरण साक्षात हैं|

मोदी और ट्रम्प फिलहाल उन्हीं पद चिन्हों पर न भी चलते दिख रहे हों पर उनकी इतिहास शून्यता गंभीर राजनीतिक आशंकाओं को हवा दे रही है और साथ ही उन्हें मखौल का पात्र भी बना रही है| लगता है, जैसे राजनीतिक शिखर छूने की जल्दी में ये दोनों महानुभाव इतिहास बनाने नहीं स्वयं इतिहास बनने के कगार पर हों|

मोदी और ट्रम्प को एक खाने में रखने वालों को भी आज शायद ही उनके समर्थकों की एक जैसी हताशा भरी नियति से हैरानी हो| फ़िलहाल दोनों के भक्त उनके चुनाव प्रचार के दौर का थूका हुआ चाटने को मजबूर नजर आते हैं| ट्रम्प में रूस की सामरिक दिलचस्पी की छाया उनके राष्ट्रपति अभियान पर लगातार बनी रही थी, और अब अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करते पहलुओं की छानबीन अमेरिकी सेनेट की न्यायिक समिति कर रही है|

इस प्रकरण का आपराधिक पक्ष एफबीआई की जाँच का विषय है| चुनाव के दौरान रूस में अपनी व्यावसायिक स्थिति को लेकर ट्रम्प ने जो झूठे-सच्चे पैंतरे बदले, उन्हें सही ठहरा पाना उत्तरोत्तर कठिन होता जा रहा है| यहाँ तक कि ट्रम्प ने, अमेरिकी इतिहास में पहली बार, राष्ट्रपति की जांच कर रही एफबीआई के डायरेक्टर को ही बरखास्त कर दिया|

मोदी ने अपने चुनाव अभियान में पाकिस्तान के विरुद्ध युद्धोन्माद खड़ा करने में ‘छप्पन इंच के सीने’ से लेकर ‘एक के बदले सौ सर’ जैसी अव्यावहारिक डींगें जम कर हांकी थीं| तीन वर्षों के उनके इतिहास-दृष्टि रहित शासन में काश्मीर की उत्तरोत्तर बिगड़ती स्थित ने उनके समर्थकों की बोलती बंद कर दी है|

वे समझ नहीं पा रहे हैं कि अपने ‘नरेंद्रबली’ की पिलपिलाती छवि को कैसे फ़िल्मी ‘महाबली’ के रूप में दुरुस्त करें| मोदी का रास्ता सीमित होते-होते एकमात्र पाकिस्तान से युद्ध के विकल्प की ओर बढ़ रहा है| दो परमाणु शक्तियों के बीच यह एक मिलीभगत का युद्ध ही होगा, जिसके लिए अमेरिका का रजामंद होना जरूरी है| लगता नहीं कि ट्रम्प के अमेरिका के पास इसके लिए अभी समय है|

क्या वे अपने कार्य भार में इतिहास बोध के महत्व को कभी समझ पायेंगे- मोदी और ट्रम्प? डेढ़ दशक भी नहीं हुये, मोदी की साख इतनी कम होती थी कि उनको प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के हेलिकॉप्टर में घुसने नहीं दिया जाता था| आज वे स्वयं धाकड़ प्रधानमन्त्री बने बैठे हैं|

ट्रम्प को भी शायद ही किसी ने गंभीरता से लिया हो जब वे अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार बनने की दौड़ में उतरे| न सिर्फ वे भारी बहुमत से उम्मीदवार बने बल्कि उन्होंने बेहद करीबी मुकाबले में हिलेरी क्लिंटन को हराकर राष्ट्रपति पद भी हथिया लिया|

दोनों, ट्रम्प और मोदी, अपनी-अपनी तरह से अनुभव के धनी कहे जायेंगे और ट्रम्प के शब्दों में ‘डील’ करने में माहिर भी| तब भी, उनकी अभूतपूर्व राजनीतिक सफलताओं के बावजूद, उनकी राष्ट्रीय स्वीकार्यता पर बढ़ते प्रश्न चिन्ह की मुख्य वजह रही है उनकी कार्यशैली से ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का नदारद होना|

ट्रम्प को अपने नव-नियुक्त एनएसए जनरल फ्लिन को उनके रूस से संबंधों के सार्वजनिक होने पर बरखास्त करना पड़ा| जबकि मोदी की हालिया चुनावी सफलताओं पर इवीएम जालसाजी के आरोप चिपकने लगे हैं| ट्रम्प के सत्ता संभालते ही अमेरिका में मुस्लिम प्रवेश पर रोक वहां की अदालतों में एक दिन भी नहीं ठहर सकी| भारत में नियमित मुस्लिम वर्जना मोदी की विकास यात्रा में असहनीय बोझ हो चली है| जाहिर है, ऐतिहासिकता से मुंह मोड़ कर राष्ट्रीय नेतृत्व देने के अपने खतरे हैं|
  
किसी को बताने की जरूरत नहीं कि ‘पप्पू’ कहने पर भारतीय राजनीति का कौन सा चेहरा याद आता है| अमेरिकी राजनीति में लगता है ट्रम्प भी उसी स्थिति की ओर बढ़ रहे है| और मोदी? याद कीजिये, बिहार चुनाव में मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान से लगे तक्षशिला को बिहार का हिस्सा घोषित कर डाला था| यहाँ तक कि विज्ञान कांग्रेस में, गणेश के धड़ से हाथी का सर जोड़ने की दन्त कथा को उन्होंने प्राचीन भारत में अति विकसित सर्जरी के ‘इतिहास’ से जोड़ दिया| खासी किरकिरी के बाद अब वे अपना इतिहास बोध सुरक्षित स्तरों पर ही व्यक्त करते हैं|

मसलन, ‘साठ साल बनाम साठ महीनों’ जैसी प्रचार चर्चाओं में| या विदेशी दौरों में शेखी मारकर कि उनसे कितने दशक पहले तक कोई भारतीय प्रधानमन्त्री उस देश में नहीं पहुंचा| मानना पड़ेगा, इन सब के लिए भारतीय मीडिया की मेहरबानी कैसे हासिल करनी है, मोदी बखूबी समझते हैं| ट्रम्प ने अमेरिका में ‘फेक मीडिया’ शब्द ईजाद किया जबकि मोदी ने उसे भारत में कार्यान्वित भी कर दिखाया|

काश! उन्हें भारत-पाक के बीच बार-बार असफल रही क्रिकेट डिप्लोमेसी या वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा को व्यर्थ करने वाली पाकिस्तानी फ़ौज की कारगिल पैंतरेबाजी में निहित ऐतिहासिक सन्देश की समझ भी होती| तो वे नवाज शरीफ के जन्म दिन पर लाहौर बिना बुलाये धमकने जैसे सतही कूटनीति में भारत-पाक तनावों का हल ढूंढने के बजाय, कश्मीर में कोई सार्थक राजनीतिक-सामरिक पहल कर रहे मिलते|

काश! नक्सल आयाम के आर्थिक-सामाजिक पहलू का इतिहास भी मोदी के सामरिक परिप्रेक्ष्य का हिस्सा हो सकता! तब वे इस समस्या का महज सैनिक हल हासिल करने की एक आयामी जिद में देश का समय और ऊर्जा न गँवा रहे होते| इतिहास बोध से संपन्न मोदी ने, उत्तर-पूर्व में शांति लाने के कांग्रेसी मॉडल की असफलता को ही दोहराते रहने के बजाय, दशकों तक अशांत रहे त्रिपुरा राज्य की, कम्युनिस्ट शासन में हासिल, ऐतिहासिक स्थिरता से सबक लिया होता|

इतिहास किसी को माफ़ नहीं करता| देश के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू तो स्वयं किसी प्रबुद्ध इतिहासकार से कम न थे| उनकी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’, जो उन्होंने 1942-46 में ‘भारत छोड़ो’ के दौरान अहमदनगर किले में बंदी रहते हुये लिखी थी, को इतिहास क्रम में भारत की उदार संस्कृति और दर्शन से परिचय की खान कहा जा सकता है|

यह नेहरू के इतिहास बोध का ही करिश्मा था कि उन्होंने विश्व युद्धों से जर्जर दो ध्रुवीय विश्व में भारत के नेतृत्व में एक तीसरे तटस्थ ध्रुव की नींव रखी, और दो सदी की औपनिवेशिक दासता से बाहर निकले गरीब देश को आधुनिकता के प्रकाश से आलोकित रखा| पर चीन के महाशक्ति मंसूबों की ऐतिहासिक समझ की चूक ने उनसे भारी सामरिक भूल कराई, जिसकी कीमत देश को 1962 के युद्ध में मनोबल तोड़ने वाली पराजय के रूप में चुकानी पड़ी| 
     
अमेरिका में 1961 के क्यूबा मिसाइल संकट को टालने का श्रेय आसानी से राष्ट्रपति केनेडी की इतिहास मर्मज्ञता को दिया जाता रहा है| वही अमेरिका आज अपने पैंतालीसवें राष्ट्रपति ट्रम्प को इतिहास का अनिच्छुक पाठ पढ़ते देखना चाहता है| हुआ यूँ कि ‘डील’ में माहिर ट्रम्प ने एक साक्षात्कार में खुद की तुलना अमेरिका के सातवें राष्ट्रपति एंड्रू जैक्सन से कर डाली| यहाँ तक भी गनीमत थी क्योंकि इतने भर से उनका जाना-पहचाना बड़बोलापन ही झलकता|

बशर्ते, उसी झोंक में आगे वे यह न जोड़ देते कि एंड्रू जैक्सन होते तो अमेरिका का गृह युद्ध न हुआ होता, उसका समाधान निकाल लिया जाता| अमेरिका के इस सातवें राष्ट्रपति (1829-37) का निधन दास प्रथा को लेकर हुए गृह युद्ध से सोलह वर्ष पूर्व हो गया था और इतिहास में उन जैसे दास मालिक को गृह युद्ध से कभी जोड़ा भी नहीं गया|

जैक्सन को 1812 में न्यू ओरलेंस के युद्ध में ब्रिटिश फ़ौज को हराने वाली सेना का नेतृत्व करने पर राष्ट्रीय नायक की ख्याति मिली थी| 1824 में उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की और राजनीतिक जीवन में धनाढ्य वर्ग के विपरीत सामान्य लोगों के लिए काम किया| उनके कार्यकाल में अमेरिकी आदिवासियों का नियत बस्तियों में दारुण विस्थापन उनके नाम पर एक काला धब्बा माना जाता है|

ट्रम्प ने जैक्सन को एक दृढ़ व्यक्ति और बड़े दिलवाला कहा| 1830 के दशक में साउथ कैरोलिना अमेरिका से अलग होना चाहता था और तब जैक्सन ने उसे युद्ध की धमकी देकर यह इरादा छोड़ने पर बाध्य किया| उस समय समीकरण था एक राज्य बनाम शेष राष्ट्र का| दो दशक बाद, दक्षिण के ग्यारह राज्य एक साथ अलग होने को बजिद थे| उनके साथ युद्ध का मतलब गृह युद्ध ही था|

इतिहासकार एकमत हैं कि जिस युद्ध को अब्राहम लिंकन जैसा दूरदर्शी राष्ट्रपति नहीं रोक सका, उसे जैक्सन की सैन्यवादी रणनीति कैसे भी नहीं रोक सकती थी| हाँ, इतिहास शून्य ट्रम्प को जरूर लगता है कि जैक्सन से तुलना कर वे स्वयं को एक दृढ़ और बड़े दिलवाला राष्ट्रपति कहलवा लेंगे, और आम व्हाइट अमेरिकी का हितैषी भी|
  
मोदी के एंड्रू जैक्सन सरदार पटेल हैं, ट्रम्प की तर्ज पर बिना उनके ऐतिहासिक अवदान को समझे ही| पटेल रियासतों के भारत में विलय के लिए जाते हैं, जबकि मोदी के राजनीतिक नेतृत्व में, देश के आधा दर्जन प्रांतों में सशस्त्र अराजकता बद से बदतर होती गयी है| पटेल ने लोकतांत्रिक संविधान और नौकरशाही के इस्पाती ढांचे को मजबूत किया, मोदी ने संविधान में पलीता लगाने और नौकरशाही को पिछलग्गू बनाने का काम किया है|

ऐसे में मोदी की इस समझ को क्या कहें कि पटेल की विश्व में सबसे ऊंची लौह मूर्ति लगाकर वे स्वयं को सरदार कहलवा लेंगे| देश का मुख्य राजनीतिक कार्यकारी इतिहास की समझ से शून्य हो तो उस देश को कब अपमान के दौर से गुजरना पड़ जाये, कहना मुश्किल है| ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की गंभीर कमी को वह ‘जोश’ से पूरी करता है और नाजुक भूलें करता है|

हमने मोदी को, नोटबंदी से काला धन, आतंकवाद और भ्रष्टाचार ख़त्म करने का दावा करते देखा| हमने ट्रम्प को, मेक्सिको सीमा पर दीवार से अमेरिकियों के आर्थिक संकट के हल का सपना बेचते देखा| क्या हम उनमें इतिहास बुद्धि की कामना कर सकते हैं!  

Apr 28, 2017

सरकारी दिवसों के बूते न पुस्‍तकें बचेंगी, न भारतीय भाषाएं

बिखरती पुस्‍तकों की दुनिया

जिस हिन्‍दी के गाने, संगीत, शब्‍द हर सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में दुनियाभर के लोगों का मन मोह लेते  हों, घर—बाहर, बाजार, केरल से लेकर आसाम, अरुणाचल, कश्‍मीर तक जिस भाषा के बूते लोग जुड़ते हों, वह सरकारी दरवाजों पर पहुंचते ही भिखारी, दयनीय बना दी जाती है... 

प्रेमपाल शर्मा


23 अप्रैल दुनियाभर में पुस्‍तक दिवस के रूप में घोषित है। संयुक्‍त राष्‍ट्र की विश्‍व संस्‍था ने सारी दुनिया में किताबों की महत्‍ता को मानते हुए एक दिन किताबों के लिए रखा है जिससे दुनियाभर के नागरिक किताबों के महत्‍व को समझ सकें। पढ़े, लिखें और उसमें अपना योगदान करें। पुस्‍तक दिवस में कापी राइट आदि भी शामिल है। 

दुनियाभर के मनीषियों के इन कदमों का मानव जाति की सुख समृद्धि शांति के लिए बडे़ दूरगामी प्रभाव हैं। अपनी अपनी मातृभाओं के लिए 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस, योग दिवस, जल, वातावरण जैसे कई दिवस इसीलिए मनाए जाते हैं।

संयुक्‍त राष्ट्र के चार्टर से बंधे होने के कारण मनाते तो हम भी हैं, कई संस्‍थान, सरकारें आयोजन भी करती हैं लेकिन यह एक रीति से ऊपर क्‍यों नहीं उठ पाता? किताबों की महत्‍ता जितनी भारत जैसे अविकसित, अर्धशिक्षित देश के लिए है उतनी तो अमेरिका, यूरोप की भी नहीं। कहने की जरूरत नहीं शिक्षा, ज्ञान को जन जन तक पुस्‍तकें तो ही पहुंचायेंगी। यह तो सभ्‍यता का वाहन है। इसलिए पुस्‍तकों की दुनिया का सबसे बड़ा आविष्‍कार कहा जाता है। क्‍या रामायण, कुरान, बाईबिल आज जिंदा रह पाते यदि इन्‍हें पुस्‍तकों के रूप में संरक्षित नहीं किया होता? 

हमारी भारतीय मनीषा, ग्रंथ भी बार बार पुस्‍तकों, विद्या को पूज्‍य रूप में स्‍वीकार करते हैं। कई त्‍यौहारों पर्व पर पुस्‍तकों को पूजा भी जाता है लेकिन मौजूदा समाज क्‍या वाकई उनके महत्‍व को समझ पा रहा है? मैं एक–दो उदाहरणों से बात को रखूंगा। 

फरवरी मार्च के महीने ज्‍यादातर विश्‍वविद्यालयों, सरकारी संस्‍थानों में कुछ-कुछ बजट को ठिकाने लगाने, कुछ अकादमिक सरगर्मी के होते हैं। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के एक कॉलिज में शिक्षा संस्‍कृति के आसपास के विषय का सेमिनार था। अच्‍छी बात यह भी कि उन दिनों पूरा कॉलिज सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों, नाटक, नृत्‍य, पेन्टिग्‍स, कविता, भांगड़ा से लेकर खेल के कार्यक्रमों में तरबतर था। 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस था। मैंने सुझाव दिया कि अच्‍छा हो अपनी भाषा- हिन्‍दी पंजावी-उर्दू की किताबों का एक स्‍टॉल भी लगा दिया जाए और उसकी महत्‍ता भी बताई जाए। यूएन का घोषित दिवस है अच्‍छी तरह मनाया जा सकता है। 

विशेषकर जब कॉलिज में हजार-पांच सौ विद्यार्थी हों तो और भी बड़ी बात है वरना आजकल ऐसे दिवस मनाने के लिए राजभाषा सप्‍ताह की तरह लोगों को पकड़—पकड़कर लालच देकर शामिल किया जाता है। प्राचार्य हिन्‍दी की थीं उन्‍होंने लगभग अनसुना कर दिया। फिर समझाया तो बोली जो प्रकाशक किताबें लगायेगा, यहां बेचेगा वो हमारे लिए क्‍या करेगा-बदले में। 

इस सौदेबाजी से कोई भी चौंक सकता है। उन्‍होंने खुद ही कहा-वे हमारे बच्‍चों के आई कार्ड बनवा दें या कोई और मदद कर दें तो किताबों की स्‍टॉल लगा सकते हैं। मुझे कहना पड़ा कि मेरा कोई प्रकाशक जानने वाला नहीं है आप जिसे चाहे बुलायें। मैं तो बस मातृभाषा की सार्थकता के बारे में कह रहा हूं। आखिर मातृभाषा दिवस यूं ही चला गया। 

ऐसा ही एक अनुभव एक मंत्रालय का। कुछ वर्ष पहले सोचा कि पुस्‍तक दिवस पर कुछ अच्‍छी किताबें कर्मचारियों को दी जाएं। राजभाषा विभाग तुरंत तैयार, लेकिन जब बांटते वक्‍त किताबों का बंडल खोला तो न उसमें प्रेमचंद थे न टैगौर न, गांधी, नेहरू। कुछ कुंजीनुमा किताबें उन्‍होंने अपने किसी कमीशन के तहत मंगा ली थी। 

सैकड़ों उदाहरण बिखरे पड़े हैं रोजाना की जिंदगी में यानि की वही पुराना जुमला-आप घोड़े को तालाब के किनारे खींच तक ला सकते हो, पानी नहीं पिला सकते। यू एन घोषित करे या भारत सरकार, हमारे सारे दिवसों की यही नियति बन चुकी है। जरूरत है तो समाज को चेताने की कि किताबें क्‍यों जरूरी हैं? क्‍यों शिक्षा में सिर्फ पाठयक्रम की चंद किताबों से काम नहीं चलने वाला? 

हर मां-बाप और शिक्षक को किताबों का महत्‍व बताने की जरूरत है। पुस्‍तकालय को समृद्ध करने की कि इनके बिना शिक्षा ज्ञान के किनारों तक भी नहीं पहुंच सकते। लेकिन सबसे मुश्किल यही काम है। विशेषकर पढ़े लिखे मध्‍यम वर्ग को समझाना क्‍योंकि उन्‍हें भ्रम है कि वे सब समझते हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइस्‍टाइन ने इन्‍हीं को इशारा करके कहा है कि किसी भी नए ज्ञान की वाधा ऐसे ही लोगों का पूर्व ज्ञान और अभिमान है।


पुस्‍तक दिवस के बहाने बार बार इसी भूमिका को पहचानने, जानने और परखने की जरूरत है। लेकिन वक्‍त के साथ बदलने की जरूरत भी है। अब केवल पिछले पांच सात सौ साल से चली आ रही जिल्‍द को ही पुस्‍तक न माना जाए। अब उसके अनेकों रूप हैं। कम्‍पयूटर पर, किंडल पर। नाम पुस्‍तक ही है। प्रयोजन भी वही तो सिर्फ कागज पर छपी पुस्‍तक हठ का  क्‍यों?दुनिया भर में इस नए रूप का स्‍वागत हो रहा है। इसी उपयोगिता के कारण एक मुटठी में बंद उपकरण और उसमें चार-छ: सौ किताबें। अनेकों भाषाओं की। 

आप विदेश यात्रा पर हैं या पहाड़ की सैर या किसी सेमिनार में इतना बोझ न लाद सकते, न जरूरत। पूरी नयी पीढी़ इसका आनंद ले रही है। कभी हाथ से लिखी किताब होती थी, फिर छपाई शुरू हुई। हर रूप में किताब ने दुनिया को बदला है। वस एक ही शर्त कि किताबों के बिना काम नहीं चलने वाला और पश्चिमी सभ्यता ने इसे समझ लिया है। अब बारी हमारे जैसे पूर्व उपनिवेश देशों की है।

इसी से एक बड़ा प्रश्‍न और जन्‍म लेता है। कौन सी किताबें? किस भाषा में? किस विषय की। यहां सबसे महत्‍वपूर्ण पक्ष अपनी भाषा का है। शिक्षा का बुनियादी शब्‍द। पढ़ने का जो आनंद अपनी भाषा में होता है वह परायी में नहीं। इसलिए विदेशी भाषा यदि जरूरत हो तो हम सीखें, सिखायें लेकिन मातृभाषा की कीमत पर नहीं। दुर्भाग्‍य से हिन्‍दुस्‍तान जैसे पूर्व गुलाम देशों में आज यही हो रहा है और इसलिए पूरी नयी पीढ़ी किताबों से दूर भाग रही है। हर स्‍कूल, कॉलिज में बच्‍चों, छात्रों पर अंग्रेजी माध्‍यम लाद दिया गया है। लादने की यह प्रक्रिया पिछले 20 वर्षों में शिक्षा के निजीकरण और ग्‍लोलाइजेशन की आड़ में और तेज हुई है और उसी अनुपात में पुस्‍तक पढ़ने की संस्‍कृति में कमी आई है।

हमारे लोकतंत्र में कुछ शासक भी पिछले दिनों ऐसे आये जो आक्‍सफोर्ड, केंब्रिज, वाशिंगटन को ज्‍यादा जानते हैं बजाए इस देश, उसकी भाषा, संस्‍कृति को। इसलिए जब तक अंग्रेजी एक विषय के रूप में छठी के बाद पढ़ाई जाती रही नुकसान नहीं हुआ। माध्‍यम बनाने से शिक्षा भी चौपट हुई, किताबें पढ़ने की रूचि, अभिरूचि भी। बच्‍चे रटते जरूर हैं लेकिन किताबों की तरफ उस आनंद से नहीं देखते जैसा हम सब ने अपने अपने बचपन में प्रेमचंद, रवीन्‍द्र, गोर्की को अपनी अपनी भाषाओं में सारी दोपहरी फिर सूरज छिपने तक या फिर ढिबरी, लालटेन जलाकर पढ़ा था। किताबों की इसी दुनिया ने पूरी दुनिया को हमें इतना मोहक दिखाया, बनाया।

किताबों की संस्‍कृति बढ़ाने के लिए इस बुनियाद पर काम करने की जरूरत है। यह कोई नयी बात नहीं है। आजा़दी के बाद देश के सभी कर्णधारों में अपनी अपनी भाषा, संस्‍कृतियों के लिए यह भावना थी और उसके विकास, संवर्धन के लिए प्रयास भी किए गए। 1964- 1966 में गठित कोठारी आयोग और भारतीय भाषाओं के पक्ष में उनकी सिफारिशों इसी दिशा में बढ़ाने का प्रयास था। समान शिक्षा और अपनी भाषाओं में। 

वर्ष 1968 में संसद ने भी माना इन सिफारिशों को।फिर उल्‍टा क्‍यों हुआ?  बहुलता वाद, बहु भाषावाद के ऊपर अकेली अंग्रेजी क्‍यों हावी होती गयी? कौन सी पार्टी सत्ता में थी? इन सब कारणों से जहां हिन्‍दी के बड़े बड़े पत्र धर्मयुग, दिनमान डूबते गए, बडे़ बड़े लेखक भी सिकुड़ कर तीन सौ के संस्‍करणों तक आ गए। जब अपनी भाषा की किताबें बिकेंगी ही नहीं तो लिखेगा भी कोई क्‍यों? सामाजिक विषयों की किताबें अपनी भाषा में दरिद्रता का एकमात्र यही कारण है। 

इतिहास के पन्‍ने पलटकर देखने पर यह संतोष होता है कि आज़ादी के वक्‍त लगभग हर भारतीय भाषा का साहित्‍य ज्‍यादा समर्थ पठनीय था। जाने माने समाज शास्‍त्री, लेखक, इतिहासकार पार्थो चटर्जी ने एक लेख में लिखा है कि उन्‍नीसवी सदी के अंत में बंगला में समाज विज्ञान, विज्ञान की किताबें मूल बंगला में पहले लिखी गयी हैं, उनका अंग्रेजी में अनुवाद बाद में हुआ और इसके पीछे कोई सरकारी प्रश्रय संरक्षण नहीं था। सब निजी प्रयास थे। ज्ञान को फैलाने की तमन्‍ना थी। कुछ कुछ यही अनुभव हिन्‍दी का है। नागरी प्रचारणी, महावीर प्रसाद द्विवेदी,  प्रेमचंद, रामचंद शुक्‍ल प्रमृति विद्वानों ने अपने अपने बूते भाषा पुस्‍तकों की दुनिया को समृद्ध किया है।

सबक यह भी कि केवल सरकारी आयोजन, ग्रांट, वजीफे से ही संस्‍कृति के स्रोत जिंदा नहीं रहते । कई बार तो बर्बाद ही करते हैं। ऐसा नहीं कि सरकार या स्‍कूल इस गिरावट से अनभिज्ञ हैं। इसे चाहे यूएन के आदेशों का पालन कहिए या दुनियाभर के शिक्षाविदों की बातें, आग्रह कि लाइब्रेरी, पठन—पाठन की दुनिया को बढ़ावा दिए बिना वांछित अकादमिक स्‍तर तक नहीं पहुंचा जा सकता। 

कुछ वर्ष पहले संभवत: एनसीईआरटी या माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड की पहल पर केन्‍द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने कुछ पहल भी की थी जिसमें देशभर में  6000 पुस्‍तकालय खोलना आदि भी शामिल था। सीबीएसई के स्‍कूलों में पाठयक्रम में भी साहित्‍य की किताबें –प्रेमचंद, मंटो, रवीन्‍द्र शेक्‍सपियर को पढ़ने  की छूट दी थी ओर उसका आकलन यानि नंबर भी। बड़ज्ञ अच्‍छा लगा जानकर लेकिन स्‍कूलों में वह कभी उस रूप में लागू नहीं हुआ। कुछ स्‍कूलों ने इसी आड़ में अंग्रेजी की कुछ और नीरस किताबें बच्‍चों को थमा दीं। पैसे भी कमाए। लेकिन बच्‍चों ने उन्‍हें नहीं पढ़ा। 

गलती स्‍कूलों की भी उतनी नहीं है जितनी अंग्रेजी की तरफ लालच से देखते अभिभावकों की। वे खुद अंग्रेजी की किताबों की मांग करते हैं। अंग्रेजी ठीक करने का ऐस दौरा पड़ा हुआ है कि मैट्रो, एयरपोर्ट, रेलवे स्‍टेशन पर न हिन्‍दी की किताबें दिखती न कोई पढ़ता हुआ। क्‍या अस्‍सी के आसपास हमें गुलशन नंदा, इब्‍ने सफी कोई पढ़ने देता था? लेकिन आज ऐसी ही प्रेमकथा की किताब हॉफ गर्ल फ्रेंड-चेतन भगत मां बाप बच्‍चों को खरीद कर पढ़ने के लिए इसलिए ला रहे हैं कि अंग्रेजी तो ठीक हो जाए। सारी नैतिकता चली गई चूल्‍हे में। इसलिए पुस्‍तक संस्‍कृति पर बात करते हुए भाषा के इस प्रश्‍न को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अब जिस पीढी़ ने पहली क्‍लास से कॉलिज, इंजीनियरिंग कॉलिज, मेडिकल, लॉ या किसी भी पाठयक्रम में अंग्रेजी माध्‍यम से पढ़ाई की है अपनी अंग्रेजी को विदेशी विश्‍वविद्यालयों में दाखिले की खातिर, अंग्रेजी नावेल, फिल्‍में, सेमिनार सुन सुनकर मांजा है, उसे क्‍या भारतीय संस्‍कृति, अपनी भाषा, संस्‍कृत की विरासत के एकाध इंजेक्‍शन से बदला जा सकता है? यह सूखे पेड़ की पत्तियों पर पानी छिड़कने से ज्‍यादा नहीं है। पानी की जरूरत जमीन और उनकी जड़ों को है और यह जड़ है स्‍कूली, माध्‍यमिक और उच्‍च शिक्षा में अपनी भाषा। अंग्रेजी या दूसरी भाषाएं भी हों, लेकिन उच्‍च शिक्षा में पहुंचने पर। उससे पहले नहीं।

आश्‍चर्य की बात है कि जिस हिन्‍दी के गाने, संगीत, शब्‍द हर सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में दुनियाभर के लोगों का मन मोह लेते  हों, घर बाहर बाजार केरल से लेकर आसाम, अरूणाचल, कश्‍मीर तक जिस भाषा के बूते लोग जुड़ते हों, वह भाषा सरकारी दरवाजों पर पहुंचते ही कैसे भिखारी, दयनीय बना दी जाती है। संकेत साफ है- सरकारी दिवसों के बूते न पुस्‍तकें बच सकती, न भारतीय भाषाएं। 

मंडी हाउस के मैट्रो के अंदर आक्‍सफोर्ड बुक्‍स ने लगभग बीस किताबों के सुदंर विज्ञापन लगा रखे हैं। सभी अंग्रेजी में। लेकिन कई उनमें से हिन्‍दी, बांगला, मलयालम की किताबों के अनुवाद भी हैं। अच्‍छा संकेत है पुस्‍तकों को पढ़ने को प्रेरित करने का लेकिन क्‍या हिन्‍दी का भी कोई प्रकाशक या लेखक ऐसा करने की पहल करेगा?  

ऐसा नहीं कि भारतीय भाषाओं में  अच्‍छा नहीं लिखा जा रहा, कारण वे सब हैं जो पूरी शिक्षा संस्‍कृति और सरकार पर हावी है। पुस्‍तक संस्‍कृति को यदि बदलना है तो लेखक, प्रकाशक, अभिभावक, शिक्षक सभी को अपनी अपनी भूमिकाओं पर पुर्नविचार करना होगा। 

Apr 24, 2017

अनाथालय ने किया एचआईवी पीड़ित बच्ची को मेनहोल साफ करने को मजबूर

गैर सरकारी संगठन एजीएपीई संचालित कर रहा था एड्स पीड़ितों के इस अनाथालय को

सीवर से गन्दगी बाहर निकालती एचआईवी पॉजिटिव बच्ची
एचआईवी पॉजीटिव लोगों के साथ हमारा समाज किस हद तक निर्मम हो सकता है, इसका जीता—जागता उदाहरण मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में दिखा। समाज में तो उनके साथ भेदभाव और उत्पीड़न की घटनाएं देखने को मिलती ही हैं, उनके संरक्षण के लिए बनी जगहों पर भी उनके साथ कम दुर्व्यहार नहीं किया जाता। वीडियो में दिखा कि हैदराबाद के एक अनाथालय के सुपरवाइजर और वॉर्डन ने एचआईवी पॉजीटिव बच्ची को किस तरह सीवर साफ करने के लिए मजबूर किया।

हिन्दुस्तान टाइम्स के हवाले से छपी एक खबर के मुताबिक इस घटना के सोशल मीडिया पर छा जाने के बाद हैदराबाद पुलिस ने अनाथालय के सुपरवाइजर और वार्डन को गिरफ्तार किया। वीडियो में दिखा कि एक एचआईवी पीड़ित बच्ची मेनहोल साफ करने के बाद किस तरह गंदगी से भरे एक डिब्बे के साथ अपने हाथ बाहर निकाल रही है। उससे जल्दी से गंदगी साफ करने का निर्देश दिया जा रहा है, साथ ही मेनहोल के पास उसकी मदद के लिए चार—पांच अन्य बच्चियां भी दस्ताने पहने दिखाई दे रही हैं। इस घटना के बाद आरोपों—प्रत्यारोपों का दौर—दौरा शुरू हो चुका है। बाल अधिकार कार्यकर्ता और राजनीतिक पार्टियां गैर सरकारी संगठन एम्बेसडर आॅफ गुडविल फॉर एड्स पेसेंट एवरीवेयल (एजीएपीई),जिसके संरक्षण में गायत्रीनगर के पास यह अनाथालय चल रहा था, पर कठोर कार्रवाई की मांग करने लगे हैं। 


हमारे देश में ऐसी शर्मसार करने वाली घटनाएं तब दिखाई दे रही हैं, जबकि देश में पहले से हाथ से गंदगी साफ न करने को लेकर कई कानून पारित कर दिए गए हैं और मैनुअल स्केन्विंगिंग को प्रतिबंधित किया गया है, जिससे कि ऐसी घटनाएं न दिखाई—सुनाई दें और न ही इस तरह कोई किसी को गंदगी साफ करने के लिए मजबूर कर सके। 

आंध्र प्रदेश बाल अधिकार संघ ने इस घटना के खिलाफ नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) के साथ मिलकर एक याचिका दायर की है, जिसमें एक एचआईवी पॉजिटिव लड़की को मैनहोल साफ करने के लिए मजबूर करने के लिए अनाथालय के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की गई है।

चाइल्ड राइट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पी आचुता राव के मुताबिक अनाथालय में मौजूद 235 अनाथ बच्चों, जो कि सभी एचआईवी पॉजिटिव हैं, और छात्रावास के अधिकारियों ने बच्चों को मज़दूरी, सफाई कार्यों के अलावा घर के अन्य काम करने के लिए मजबूर किया हुआ था।

Mar 10, 2017

सैफुल्ला के पिता ने की जांच की मांग

भाई ने उठाए पुलिसिया दावे पर सवाल

लखनऊ के ठाकुरगंज में आतंकी होने के आरोप में मारे गए सैफुल्ला के पिता सरताज ने बेटे के इनकाउंटर के जांच की मांग की है। उनका कहना है कि बेटे के आतंकी होने की खबर मीडिया से मिली। सच्चाई क्या है, यह तो जांच से ही पता चल सकता है..... 

रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बातचीत करते सैफुल्ला के भाई और पिता
उन्होंने यह भी कहा, 'अत्यधिक दबाव के चलते मैंने बेटे की लाश लेने से मना कर दिया, पर मैं मीडिया के सामने बार-बार पूरे मामले की जांच की मांग करता रहा। मीडिया ने उसे प्रसारित नहीं किया।'

रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बात करते हुए सैफुल्ला के पिता ने बार—बार कहा कि मैं अभी भी बहुत दबाव महसूस कर रहा हूं। हालांकि आतंक के मामले में फर्जी ढंग से फंसाए गए लोगों की कानूनी मदद करने वाले संगठन 'रिहाई मंच' ने सैफुल्ला के परिजनों से मुलाकात कर उन्हें किसी के भी दबाव में न आने की बात कही। रिहाई मंच की ओर से मंच के अध्यक्ष एडवोकेट मो0 शुऐब, महासचिव राजीव यादव, शबरोज मोहम्मदी, प्रियंका शुक्ला, शरद जायसवाल, गुंजन सिंह, सेराज बाबा, फिरदौस सिद्दीकी, एखलाक चिश्ती, रजीउद्दीन और परवेज सिद्दीकी कानपुर गए थे। 

कानपुर में सैफुल्ला के घर दौरे पर गए रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बातचीत में सैफुल्ला के भाई खालिद ने बताया कि किसी ने उन्हें फोन करके अपने को पुलिस अधिकारी बताया और कहा,  तुम अपने भाई को समझाओ। हम तुम्हारी उससे बात करवाते हैं वो सरेंडर नहीं कर रहा है और शहादत देने की बात कर रहा है। इसके बाद खालिद ने बदहवासी में अपने भाई से जोर-जोर से सरेंडर कर देने की बात करता रहा, लेकिन उधर से कोई आवाज नहीं आ रही थी, जिसके बाद फोन कट गया।'

रिहाई मंच के पूछने पर कि उसे आपको भाई की आवाज सुनाई दे रही थी तो सैफुल्ला के भाई खालिद का जवाब था, 'भाई की आवाज नहीं सुनाई दे रही थी। सिर्फ गोलियों की आवाज ही सुनाई दे रही थी।' 

रिहाई मंच के अध्यक्ष और लखनऊ हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील मोहम्मद शोएब कहते हैं, 'सैफुल्ला के कानपुर​ स्थित घर जाने से पहले हमारी टीम ने लखनऊ के ठाकुरगंज स्थित कथित मुठभेड़ स्थल का दौरा कर स्थानीय लोगों से बातचीत की।' 

मोहम्मद शोएब के अनुसार, 'पुलिस ने लाउडस्पीकर पर सैफुल्ला के आत्मसमर्पण करने की बात कहने का दावा किया है। लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। सवाल उठता है कि तब पुलिस यह दावा क्यों कर रही है? क्या ऐसा करके वो इस कथित मुठभेड़ में हुई हत्या को विधिपूवर्क पूरा किए गए अपने कथित काउंटर अटैक का तार्किक परिणाम बताना चाहती है?' 

Jan 29, 2017

पंजाब हारेंगे तो केजरीवाल जिम्मेदार


पंजाब में चुनाव प्रचार अपने पूरे चरम पर है । किसी समय इकतरफा आम आदमी पार्टी की झोली में जाते दिख रहे पंजाब में कांग्रेस ने तेजी से ना सिर्फ वापसी की है, बल्कि पंजाब के राजनीतिक हलकों और जनता की  बहस में कांग्रेस की सरकार बनने के भी कयास  लगाए जा रहे हैं।

आप कार्यकर्ताओं की मानें तो पंजाब में आम आदमी पार्टी की इस हालत के लिए अरविन्द केजरीवाल खुद जिम्मेवार हैं। पिछले लोकसभा चुनावों में  जब अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी थी, यहां तक कि दिल्ली में भी उनकी पार्टी बुरी तरह हारी, ऐसे में पंजाब ने अप्रत्याशित रूप से 4 लोकसभा सांसद देकर मरणासन्न पड़ी पार्टी में न सिर्फ  संजीवनी बूटी देकर बचाने का काम किया, बल्कि कांग्रेस और अकाली में से किसी एक को हर बार चुनने को मजबूर जनता के सामने एक नया विकल्प पेश किया.

जनता ने आप को हाथोंहाथ लिया। हजारों की संख्या में नए कार्यकर्ता बने, जिन्होंने पंजाब में अपने स्थानीय नेतृत्व में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए काम करना शुरू किया। इनमें से जस्सी जसराज , भगवंत मान ,एच एस फुलका, डॉ. धर्मवीर गांधी लोकप्रिय नेता बनके उभरे।  वहीं से आगामी मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन होगा, इसको लेकर चर्चाएं और गुटबाजी शुरू हो गई । पार्टी के पिछले लोकसभा चुनावों में प्रत्याशी रहे पार्टी के एक सदस्य ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि कुछ एक हिस्सों को छोड़कर  पंजाब में किसी पार्टी की लहर नहीं है और इस समय पार्टी को कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिल रही है ।

केजरीवाल को पिछले 2 सालों से एक ही चिंता सताए जा रही है कि कहीं ऐसा न हो कि आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद पंजाब का नेतृत्व उन्हें दरकिनार कर दे। उनका सारा ध्यान इसी में लगा रहा कि पंजाब के उभर रहे नेताओं का कद किस तरह कम किया जाए और कैसे चुनावों के बाद पंजाब सरकार हर काम  दिल्ली हाईकमान के निर्देशानुसार करे। इन्हीं सब कारणों से पार्टी को पंजाब में गंभीर नुकसान पहुँचने के कयास लगाए जा रहे हैं।

केजरीवाल की सबसे बड़ी गलती थी पंजाब के स्थानीय नेतृत्व को बड़े कद का होने से रोकना और पंजाब के हर निर्णय को खुद बिना स्थानीय नेतृत्व से सलाह किए बिना पंजाब पर थोपना। इसी से नाराज होकर पंजाब के एक बड़े नेता एच एस फुल्का जिनका नाम उस समय मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में था पार्टी के सभी पदों  व सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। पंजाब के इस समय पार्टी के सबसे बड़े नेता भगवंत मान का एक ऑडियो क्लिप आया था, जिसमें वे पटियाला के सांसद धर्मवीर गांधी को पंजाब और स्थानीय नेतृत्व को लेकर केजरीवाल की जमकर आलोचना कर रहे हैं।

पंजाब को पूरी तरह दिल्ली के नियंत्रण में रखने के लिए पंजाब के आब्जर्वर संजय सिंह और दुर्गेश पाठक को ख़ास निर्देशों के तहत ऐसे नए चेहरों की तलाश करने के लिए कहा गया, जो किसी भी तरह से स्थानीय नेताओं के प्रभाव में न हो। यहां तक कि युवाओं का घोषणापत्र जिसमें स्वर्ण मंदिर पर झाड़ू की तस्वीर थी, पंजाब में बिना किसी को दिखाए बिना पंजाब में  किसी से सलाह मशविरा किए दिल्ली से जारी किया गया और नाराजगी दिखाने पर प्रदेश संयोजक सुचा सिंह छोटेपुर को दिल्ली की टीम ने साजिश के तहत बाहर किया गया । 

आप पंजाब के एक बड़े नेता और भटिंडा से लोकसभा के उम्मीदवार जस्सी जसराज ने इन दोनों पर बड़ा आरोप लगाया। पार्टी के पुराने मेहनतकश कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर सिर्फ पैसे और रसूख के दम पर लोगों को पार्टी में ऊँचे पद देने का इल्जाम लगाया. उन्होंने टिकट वितरण में भी इन दोनों नेताओं पर बड़े पैमाने पर भ्र्ष्टाचार करने और पैसे के बदले टिकट देने का आरोप लगाया ।

उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में  पुराने कांग्रेस और अकाली नेताओं जिन्होंने  पूरी उम्र भ्र्ष्टाचार करके पैसा कमाया है और जिनका जनसंघर्षों से दूर दूर तक कोई नाता नहीं रहा जो चुनाव से थोड़ा वक़्त पहले ही टिकट के लिए आए हैं और जिन्होंने लोकसभा चुनावों में पार्टी को वोट देना तो दूर आम आदमी पार्टी के खिलाफ जनता में जमकर जहर उगला था वे कैसे ईमानदार हो गए । पार्टी में 50 से ज्यादा ऐसे लोगों को टिकट दिया गया है जो या तो लंबे समय तक  अकाली या कांग्रेस पार्टी और सरकार में मलाईदार पदों पर रहे हैं या बस अपने पैसे और रसूख के दम पर टिकट के आश्वासन पर चुनावों से कुछ समय  पहले पार्टी में आए हैं ।

पार्टी के अन्य  नेताओं का कहना है केजरीवाल से इस तरह की बेवकूफियों और गलतियों  की उम्मीद नहीं थी. पंजाब में नियुक्त 52 ओबजरवेर्स में से 50 को पंजाबी न बोलनी आती है ,न वे समझ सकते हैं, न ही उन्हें पंजाब की राजनीति के बारे में कुछ पता है। जिस कारण यहां के कार्यकर्ताओं और दिल्ली से भेजे गए आब्जर्वर के बीच एक बड़ी संवादहीनता रही है और वो कार्यकर्ताओं व आम जनता में काम करने की बजाए चमचों के साथ सैर सपाटा और अय्याशी करते रहे।

 यही नहीं जो भी कार्यकर्ता दिल्ली फ़ोन करके अपनी समस्या बताते रहे या दिल्ली अपनी बात रखने के लिए गए, पार्टी के उदासीन और दिल्ली के सरकारी नौकरशाही जैसे रवैये से वो नाराज होकर घर बैठ गए.  अभी भी पार्टी के कार्यकर्ताओं में संजय सिंह और दुर्गेश पाठक के प्रति जमकर गुस्सा है, जिनके  कार्यकर्ताओं के लिए दर्शन हमेशा दूभर रहे।  अपने पूरे प्रवास के दौरान पांच सितारा सुविधाओं वाली जगह पर ही रुकते थे। दोनों में से शायद ही किसी ने दलित बस्ती या आम गरीब जनता के बीच रात बिताई हो। खबर ये भी है चुनावों के बाद इन दोनों को पंजाब की राजनीति से अलग कर दिया जाएगा।

पर केजरीवाल के लिए इस समय  सबसे बड़ी चिंता भगवंत मान हैं, जो केजरीवाल की लाख कोशिशों के बाद भी कार्यकर्ताओं में मुख्यमंत्री का सबसे बड़ा और लोकप्रिय चेहरा हैं। चुनाव कुछ दिन दूर हैं, पर अभी भी मुख्यमंत्री कौन होगा, ये आम आदमी पार्टी की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल है। पार्टी के सूत्रों का कहना है केजरीवाल या तो खुद मुख्यमंत्री बनेंगे या दिल्ली के अपने किसी ऐसे कृपापात्र को बनाएंगे, जिसके जरिए वो स्थानीय नेतृत्व को हमेशा अपने नियंत्रण में रख सकें, ताकि पार्टी व पंजाब के वही सुप्रीमो बने रहें।


वैसे उनका दिल्ली के विधायक जरनैल सिंह को पंजाब में चुनाव लड़वाना इसी ओर इशारा करता है । आम आदमी पार्टी पंजाब जीते या हारे, दोनों स्थितियों में पंजाब का स्थानीय नेतृत्व केजरीवाल से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है । 

Dec 4, 2016

न नौ न छह सिर्फ तीन महीने

भारतीय डॉक्टर ने टीबी रोगियों के लिए ढूंढ़ा नया इलाज

यक्ष्मा, तपेदिक, क्षयरोग, एमटीबी या टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो माइक्रोबैक्टीरिया से होती है। दुनिया की आबादी का एक तिहाई तपेदिक से संक्रमित है। नये संक्रमण प्रति सेकंड एक व्यक्ति की दर से बढ़ रहे हैं...

प्रदीप श्रीवास्तव

भारत से पढ़ाई करने वाली डॉक्टर अस्वीन मारको अमेरिका में टीबी के मरीजों के लिए काम कर रही हैं। उन्होंने जीआईएस तकनीकी का विकास किया है, जो अमेरिका में बेघर लोगों में टीबी की बीमारी को ट्रैस करता है। साथ ही इस तकनीक से वे मरीजों का पूरा रिकार्ड रखती हैं, जिससे टीबी के मरीजों को दवा व इलाज मुहैया कराया जा सके। उनके काम को न सिर्फ अमेरिकी सरकार सराह रही है, बल्कि भारत में भी उनके काम की तारीफ हो रही है।

अस्वीन ने हिमाचल प्रदेश से बीडीएस की डिग्री लेने के बाद कुछ समय तक दिल्ली में काम किया। बाद में अमेरिका के बोस्टन यूनिवसर्सिटी से पब्लिक हेल्थ का कोर्स किया। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के बेघर लोगों की भलाई के लिए स्वास्थ्य सेवाओं पर काम करना शुरू किया। इस दौरान उन्हें बेघर लोगों के बीच व्याप्त टीबी की बीमारी का पता चला। इस बीमारी से हर साल हजारों लोगों की मौत हो जाती है। यह तेजी से फैलने के कारण अमेरिका में भी टीबी के मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। ऐसे में उन्होंने टीबी को जड़ से समाप्त करने के लिए कुछ नए प्रयोग किए हैं, जो काफी कारगर है।

टीबी रोकने के नए प्रयोग
डॉ. अस्वीन ने टीबी रोगियों के लिए कुछ अनोखे प्रयोग किए हैं। उन्होंने टीबी के दवा-इलाज समय को कम कर दिया है। अभी तक पूरी दुनिया में टीबी के सबसे कारगर इलाज को डाट्स प्रणाली माना जाता है। इसके तहत छह से नौ माह तक मरीज को दवा दी जाती है। इस प्रणाली में एक सबसे बड़ी खामी यह है कि अगर मरीज बीच में इलाज छोड़ देता है तो उसे टीबी की सबसे जटिलतम बीमारी से जूझना पड़ता है। उसे एमडीआर टीबी हो जाती है, जिसका इलाज न सिर्फ बहुत महंगा है, बल्कि उसे दो साल से ज्यादा समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ सकता है। ऐसे में डॉ. अस्वीन ने नौ माह के कोर्स को छोटा करके तीन माह का कर दिया। इससे बेघर मरीजों का इलाज जल्दी होने लगा है। 

इसके अलावा डॉ. अस्वीन ने जीनएक्सपर्ट टेक्नोलाॅजी का प्रयोग भी शुरू किया है, जो क्षय रोग का पता लगाने की कारगर प्रणाली है। डॉ. अस्वीन ने सबसे महत्वपूर्ण कार्य जियोग्राॅफिकल इंफारमेशन सिस्टम को तैयार कर किया है। इसके तहत बेघर मरीजों का पूरा ब्यौरा कंप्यूटर में रियल टाइम में एकत्रित किया जाता है, जिससे वह अमेरिका में कहीं भी हो तो उसे ट्रैस किया जा सके। पूर्व में अमेरिका में यह व्यवस्था नहीं होने के कारण इन बेघरों की पहचान बहुत मुश्किल होती थी, जिस कारण से अगर इलाज बीच में छूट जाता था तो वह उन्हें पुनः इलाज की सुविधा नहीं मिल पाता थी। और इन्हें एमडीआर टीबी का इलाज कराना पड़ता था।
  
अमेरिका में टीबी रोग की स्थिति 
अमेरिका में करीब 5 लाख टीबी के मरीज हैं। इनमें भी अधिकतर मरीज बेघर हैं, जो पूरे देश में घूमते रहते हैं। इलाज नहीं मिलने की दशा में बीस प्रतिशत से ज्यादा प्रतिवर्ष अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं। यक्ष्मा, तपेदिक, क्षयरोग, एमटीबी या टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो माइक्रोबैक्टीरिया से होती है। क्षय रोग आम तौर पर फेफड़ों पर हमला करता है, लेकिन यह शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित कर सकता हैं। यह हवा के माध्यम से फैलता है। दुनिया की आबादी का एक तिहाई तपेदिक से संक्रमित है। नये संक्रमण प्रति सेकंड एक व्यक्ति की दर से बढ़ रहे हैं। 

Nov 5, 2016

सिमी फेक इनकाउंटर मामले में प्रदर्शन करने पर सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिठाया थाने में

विनीत तिवारी
भोपाल एनकाउंटर मामले में इंदौर पुलिस ने निष्पक्ष जांच की मांग करने वाले इंदौर के सामाजिक कार्यकर्ताओं को पुलिस ने थाने में बिठाया। गौरतलब है कि इसी घटना का विरोध करने पर दो दिन पहले रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव पर पुलिस ने हमला किया था।

जानकारी के मुताबिक इंदौर में आज भोपाल एनकाउंटर मामले की निष्पक्ष जांच की मांग लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद मोहन माथुर  के आह्वान पर शाम 5 बजे रीगल चौराहे, इंदौर में मानव श्रृंखला बनाकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जाना था। सुबह से ही पुलिस ने सीपीआई एम के ज़िला सचिव कॉमरेड कैलाश लिम्बोदिया को घर से उठा लिया और थाने ले जाकर समझाइश दी कि ये प्रदर्शन निरस्त कर दो। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्वक हम निष्पक्ष जांच की मांग करना चाहते हैं और करेंगे। उन्हें 3-4 घंटे थाने बिठाये रखा।

इसी तरह आनंद मोहन माथुर के पास भी पुलिस से संदेश आया जिसका उन्होंने भी कॉमरेड कैलाश की ही तरह का जवाब दिया। प्राप्त जानकारी के मुताबिक शाम 5 बजे आनंद मोहन माथुर के घर पर पहुंचे पुलिस वालों ने उन्हें अपने घर से निकलने ही नहीं दिया। जो लोग भी रीगल चौराहे पहुंचे, उन्हें डंडे वर्दी से लैस पुलिस वालों नेे डराया धमकाया और पुलिस की गाड़ी में बिठाकर कहीं ले गए। बड़ी संख्या में महिला पुलिस भी वहां तैनात की गयी थीं। वहाँ पहुंची कल्पना मेहता और जया मेहता को भी महिला पुलिस ने अपने साथ चलने के लिए कहा, जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस डंडे लेकर बड़ी तादाद में मौजूद है और प्रदर्शन के लिए आये हुए लोगों को धमकाकर थाने ले जा रही है। अभी अभी खबर मिली है कि गिरफ्तार किये अनेक लोगों को पुलिस तुकोगंज थाने लेकर गयी है।

न्याय की मांग करना भी मध्य प्रदेश में गुनाह की श्रेणी में आने लगा है और निष्पक्ष जाँच की मांग करने वालों को देशद्रोही कहा जा रहा है।  प्राप्त जानकारी के मुताबिक प्रदर्शन में शरीक होने पहुंचे सीपीआई के ज़िला सचिव कॉमरेड रुद्रपाल यादव, एटक के नेता कॉमरेड सोहनलाल शिंदे, सीपीएम के ज़िला सचिव कॉमरेड कैलाश लिम्बोदिया, कॉमरेड परेश टोकेकर और श्रमिक नेता श्यामसुन्दर यादव को भी पुलिस ने ज़बरदस्ती प्रदर्शन से रोका और उन्हें पुलिस के वाहन में बिठाकर कहीं ले जाया गया। इन लोगों के मोबाइल भी बंद आ रहे हैं।

पता चला है कि पुलिस ने दोपहर से ही बड़ी संख्या में सिविल ड्रेस में अपने लोग रीगल चौराहे पर तैनात कर रखे थे।  आनंद मोहन माथुर जी ने बताया कि उनके घर से निकलने के पहले ही करीब 100 पुलिस प्रशासन के लोग वहां पहिंच गए और उनके ड्राईवर से कार की चाबी ले ली। जब उन्होंने ऑटो से जाने के लिए घर के बाहर से ऑटो रिक्शा रोक तो पुलिस ने उसे भी डपटकर भगा दिया और उन्हें प्रदर्शन के लिए नहीं जाने दिया। यहां ये बताना मुनासिब होगा कि श्री आनंद मोहन माथुर की आयु 90 वर्ष से अधिक है।

Oct 20, 2016

घटिया होती पत्रकारिता का जिन्हें गम है सिर्फ वही पढ़ें

इस लेख को उन पत्रकारों को जरूर पढ़ना चाहिए जो सच को सामने लाने के लिए खुद में हलचल महसूस करते हैं और मानते हैं कि उनमें पत्रकारिता की धारा बदल देने का माद्दा है...

प्रेम से बोलो जय भारत माता की  

शेखर गुप्ता
पाकिस्तानी पत्रकार अौर टिप्पणीकार प्राय: कहते हैं कि जब विदेश और सैन्य नीतियों की बात आती है तो भारतीय मीडिया उनके मीडिया की तुलना में सत्ता के सुर में अधिक सुर मिलाता है। कड़वा सच तो यह है कि कुछ पाकिस्तानी पत्रकार (ज्यादातर अंग्रेजी के) साहसपूर्वक सत्ता प्रतिष्ठानों की नीतियों व दावों पर सवाल उठाते रहे हैं। इनमें कश्मीर नीति में खामी बताना तथा अातंकी गुटों को बढ़ावा देने जैसे मुद्‌दे शामिल हैं। इसके कारण कुछ पत्रकारों को निर्वासित होना पड़ा (रजा रूमी, हुसैन हक्कानी) या जेल जाना पड़ा (नजम सेठी)।

भारतीय पत्रकारों की अपनी दलील है : भारत में कहीं ज्यादा असली लोकतंत्र है व सेना राजनीति से दूर है, इसलिए तुलना अप्रासंगिक है। जहां जरूरत होती है, हम सवाल खड़े करते ही हैं। श्रीलंका सरकार के खिलाफ लिट्‌टे को पहले ट्रेनिंग व हथियार देने में सरकार का अंध समर्थन करने (इंडिया टुडे ने 1984 में मुझे यह स्टोरी ब्रेक करने दी थी। इंदिरा गांधी ने तब मुझे राष्ट्र विरोधी कहा था।) और बाद में भारतीय शांतिरक्षक बल के द्वारा वहां हस्तक्षेप करने के समर्थन का भारतीय मीडिया पर कोई आरोप नहीं लगा सकता।

किंतु यह परिपाटी अब बदल रही है और यह सिर्फ उड़ी हमले के बाद नहीं हुआ जब इंडिया टुडे के करण थापर ही एकमात्र एेसे पत्रकार थे, जिन्होंने सवाल उठाया कि कैसे चार गैर-सैनिक ब्रिगेड मुख्यालय की सारी सुरक्षा को चकमा देने में कामयाब हुए। लेफ्टिनेंट जनरल जेएस ढिल्लौ आलोचनात्मक आकलन करने वाले एकमात्र रिटायर्ड जनरल थे। वे उन पांच ब्रिगेड में से एक के कमांडर थे, जो 1987 के अक्टूबर में सबसे तेज गति से जाफना पहुंची थीं। वह भी न्यूनतम नुकसान के साथ।

मैं स्वीकार करूंगा कि बदलाव करगिल के साथ हुआ। करगिल युद्ध तीन हफ्तों के इनकार के बाद शुरू हुआ। पाकिस्तानियों ने इनकार किया कि वे वहां मौजूद हैं, हमारी सेना ने इतनी गहराई और विस्तार में हुई घुसपैठ से इनकार किया। जनरलों के पहले जर्नलिस्ट वहां पहुंच गए। वहां पत्रकारों और सैन्य इकाइयों में एक-दूसरे के लिए फायदेमंद रिश्ता स्थापित हो गया। अंतिम नतीजा सबके लिए अच्छा रहा : भारत की विश्वसनीयता बढ़ी, क्योंकि इसने स्वतंत्र प्रेस को रणभूमि में बेरोक-टोक पहुंचने की अनुमति दी।

सेना को यह फायदा हुआ कि उसके असाधारण पराक्रम की कहानियां पूरे देश में पहुंचीं। इस सारी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण खबर रह गई : इतने सारे पाकिस्तानी इतने भीतर तक कैसे घुस आए, हमें इसका पता लगने में इतना वक्त क्यों लगा, हमने इसकी आधे-अधूरे मन से (छोटे गश्ती दलों का इस्तेमाल कर) पड़ताल क्यों की या ऐसे विमान क्यों इस्तेमाल किए, जो कंधे से चलाई जा सकने वाली मिसाइलों का निशाना बन सकते थे, जबकि बेहतर विकल्प मौजूद थे।

नतीजा यह हुआ कि किसी की बर्खास्तगी नहीं हुई। स्थानीय ब्रिगेड कमांडर सशस्त्र बल न्यायाधीकरण में भेजे गए और बच गए। युवा अफसरों व सैनिकों की वीरता की खबरें देकर हमने ठीक ही किया, लेकिन राजनीतिक व सैन्य प्रतिष्ठानों को अपना कर्तव्य निभाने में लापरवाही चाहे न भी कहें, बहुत बड़ी अक्षमता के साथ बच निकलने देकर ठीक नहीं किया। सैन्य कमांडरों की नाकामी से बढ़कर खतरनाक कोई नाकामी नहीं होती और यही वजह है कि परम्परागत सेना जवाबदेही पर इतना जोर देती है। इस बीच भारतीय मीडिया को ताकत बढ़ाने वाले तत्व (फोर्स मल्टीप्लायर) के रूप में सराहना मिल रही थी।

हम उस पल में डूब गए, लेकिन गलत छाप भी छोड़ गए : पत्रकार देश के युद्ध प्रयासों के आवश्यक अंग हैं, उसकी सेना की शक्ति बढ़ाने वाले कारक। वे दोनों हो सकते हैं, लेकिन सच खोजने की चाह दिखाकर, सेवानिवृत्त पाकिस्तानी जनरलों पर चीखकर नहीं या चंदमामा शैली के सैंड मॉडल के साथ स्टूडियो को वॉर रूम में बदलकर नहीं। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे यहां सिरिल अलमिडा और आयशा सिद्दीका नहीं हैं, जो ‘शत्रु’ के प्रवक्ता घोषित होने का जोखिम मोल लेकर कड़वा सच बोलने को तैयार हों। भारतीय न्यूज टीवी सितारों (मोटतौर पर) का बड़ा हिस्सा स्वेच्छा से प्रोपेगैंडिस्ट बनकर रह गया है।

जब पत्रकार अपने लिए ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की परिभाषा स्वीकार कर लेते हैं, तो प्रश्नों के लिए कोई गुंजाइश नहीं बचती। बेशक उड़ी और बाद की घटनाएं इस लेख की वजह हैं। इसने मीडिया को दो ध्रुवों में बांट दिया है, एक तरफ अत्यंत प्रभावी पक्ष उनका है, जो न सिर्फ कोई प्रश्न नहीं पूछते बल्कि वे दावे करने में सरकार व सेना से भी आगे निकल जाते हैं। इन दावों को भरोसेमंद बनाने के लिए रात्रिकालीन कमांडो कवायद के ‘सांकेतिक’ फुटेज का इस्तेमाल किया जाता है। साफ कहें तो कोई भी विश्वनीयता के साथ यह बताने की स्थिति में नहीं है कि तीन हफ्ते पहले हुआ क्या था। या तो हमारी सरकार तथ्यों को गोपनीय बनाए रखने में माहिर हो गई है या हम पत्रकारों ने उन्हें खोजना बंद कर दिया है।

दूसरी तरफ बहुत ही छोटा और सिकुड़ता ध्रुव है, खुद को दूसरों से बेहतर समझने वाले संदेहवादियों का। वे सरकार के किसी दावे पर भरोसा नहीं करते, लेकिन कोई तथ्य नहीं रखते, खोजकर कोई बड़ा धमाका नहीं करते। वे बहुत ही मार्मिक ढंग से सरकार से अपने दावों की पुष्टि करने वाले सबूत देने को कहते हैं। पत्रकारिता महाविद्यालय में जाने वाले हर युवा को सिखाया जाता है कि सरकार छिपाती है और पत्रकार को खोजना होता है। यहां हमारे सामने संदेहवादी खेमे में सबसे उदार, श्रेष्ठतम शिक्षा पाए, प्रतिष्ठित, ख्यात सेलेब्रिटी पत्रकार हैं, वे धमाकेदार खबर खोजते नहीं, बल्कि प्रेस कॉन्फ्रेंस की मांग करते हैं।

 वे खबर नहीं प्राप्त कर सकते, लेकिन वे मानक तय कर देते हैं, जिनका दूसरों को पालन करना ही चाहिए। एक समूह कहता है, आप मुझे जितना बता रहे हैं, उससे ज्यादा में भरोसा करता हूं, मुझे सबूत नहीं चाहिए। दूसरा कहता है, आप जो भी कह रहे हैं, उसमें किसी बात पर मुझे भरोसा नहीं है, इसलिए सैन्य अभियान को सार्वजिनक करें वरना मैं मान लूंगा कि आप झूठ बोल रहे हैं। अब यह न पूछें कि मैं क्यों कह रहा हूं कि भारतीय पत्रकारिता आत्म-विनाश के पथ पर है। जब यह नारा लगाने को कहें : ‘प्रेम से बोलो, जय भारत माता की’ तो कौन भारतीय इसमें दिल से शामिल नहीं होना चाहेगा, लेकिन यदि आप आपकी सरकार को मातृभूमि और राष्ट्र मान लें तो आप पत्रकार नहीं, भीड़ में शामिल एक और आवाज भर हैं।
(दैनिक भास्कर से साभार)

Aug 5, 2011

भ्रष्टाचार के आगे घुटने मत टेको लोगों

आम जनता जिस सीबीआई को सबसे विश्वसनीय जांच एजेंसी मानती है,उसी सीबीआई के 55अधिकारी भ्रष्टाचार और आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति के व अन्य आरोपों का सामना कर रहे हैं...

संजय स्वदेश

सरकार के चतुर मंत्री पहले से ही किसी न किसी तरह से लोकपाल को कमजोर करने जुगत में थे। प्रधानमंत्री और जजों के इसके दायरे में नहीं आने के बाद भी यदि यह ईमानदारी से लागू हो तो कई बड़ी मछलियां पकड़ी जाएंगी। पर महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या लोकपाल की व्यवस्था से देश से भ्रष्टाचार मिट जाएगा। देश में और भी कई एजेंसियां इस कार्य के लिए सक्रिय हैं।

एक इकाई पुलिस की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा भी है। जरा इसकी कार्यप्रणाली पर गौर करें। महीने में तीस कार्रवाई भी नहीं होती। इस विभाग में आने वाले अधिकारी आराम फरमाते हैं। यदि कोई शिकायत लेकर आ भी जाए तो पहले उससे पुलिसिया अंदाज में पूछताछ की जाती है। पूरे ठोस प्रमाण प्रार्थी के पास हो तो कार्रवाई होती है। नहीं तो शिकायत पर,यह विभाग कई बार भ्रष्टाचारी से मिल जाता है। उससे कुछ ले-देकर मामला रफा-दफा कर देता है।

ऐसी शिकायतें लेकर इक्के-दुक्के लोग ही आते हैं। कई मामलों में ऐसा पाया गया है कि जब कोई कोई भ्रष्टाचार पीड़ित दुखिया एसीबी के द्वार पर जाता है तो उसकी शिकायत ले कर चुपके-चुपके संबंधित विभाग से सांठगांठ कर ली गई। कई प्रकरणों में रंगे हाथ पकड़े जाने के महीनों बाद तक भी कोर्ट में चालान पेश नहीं किया गया।

इसी तरह भ्रष्टाचार पर नकेल के लिए सतर्कता आयोग भी है। पर थॉमन प्रकरण ने जाहिर कर दिया कि इस आयोग के मुखिया भ्रष्टाचार के आरोपी भी हो सकते हैं। तक क्या खाक ईमानदारी से कार्य होने की अपेक्षा होगी।

एक और बात सुनिये। आम जनता जिस सीबीआई को सबसे विश्वसनीय जांच एजेंसी मानती है, उसी सीबीआई के 55अधिकारी भ्रष्टाचार और आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति के व अन्य आरोपों का सामना कर रहे हैं। यह कहने वाला कोई विपक्षी या सामाजिक कार्यकर्ता नहीं है।

इसकी जानकारी कार्मिक,लोक शिकायत और पेंशन मामलों के राज्य मंत्री वी नारायणसामी ने 4 अगस्त को संसद में थी। इन अधिकारियों में 20के खिलाफ रिश्वत और आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति के आरोप हैं। जब जांच एजेंसियों की अंदरुनी हकीकत भ्रष्टाचार है,तो फिर ईमानरी के कायास कहां लगाये जायें।

भ्रष्टाचार के मामले में रंगे हाथ पकड़े जाने के बाद भी लंबी न्यायिक प्रक्रिया और उसमें से बच निकलने की संभावना भ्रष्टाचारियों के इरादे को नहीं डगमगा पाती है। यदि ऐसे मामले में एक साल के अंदर ही दोषी को सजा दे दी जाए तो जनता में विश्वास भी जगे। पर एक दूसरी हकीकत यह है कि जनता बैठे-बिठाये यह चाहती है कि देश से भ्रष्टाचार खत्म हो जाए,जो संभव नहीं है।
 
लोकतंत्र के नस-नस में भ्रष्टाचार घुलमिल गया है। सरकारी महकमे में जिनका भी काम पड़ता है, वे भ्रष्टाचार से संघर्ष के बिना सीधे घुटने टेक देते हैं। इस हार को जनता बुद्धिमानी कहती है। यह व्यवहारिक है। कौन बाबू से लड़ने झगड़ने जाए। इस सोच ने भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत कर दिया है।
 
यदि कोई लड़ने भी जाए तो उसके कागजों में तरह-तरह के नुस्क निकाल कर इतना प्रताड़ित किया जाता है कि वह घुटने टेकना मजबूरी हो जाती है। लिहाजा,जनता के लिए भ्रष्टाचार के सामने नतमस्तक की बेहतर विकल्प अच्छा लगता है। इस सोच के रहते भ्रष्टाचार के खत्म और सुशासन की कल्पना, कल्पना भर है। हकीकत में भ्रष्टाचार मिटाना है तो जनता के मन से भ्रष्टाचार को नमन की प्रवृत्ति मिटानी ही पड़ेगी।
 
भ्रष्टाचार के विरूद्ध परिवर्तन   की बात करने वालों को पहले जनता के मन से इस सोच को मिटाने के लिए आंदोलन चलाना चाहिए। जब तक यह सोच खत्म नहीं होगी,भ्रष्टाचार की जड़ कमजोर नहीं होगी। यदि यह बात गलत होती तो देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध परिवर्तन के तमाम कारण होने के बावजूद भी किसी परिवर्तन  की सुगबुगाहट नहीं है।
 

Jul 29, 2011

'दो पेज भी नहीं लिख सकते दलित बुद्धिजीवी'


किसी भी आंदोलन और संघर्ष के बीच बहस में जाति का प्रश्न  हमारे देश  में हमेशा महत्वपूर्ण होकर उभरता है। ज्यादातर संगठन और पार्टियां इसे सामाजिक और आर्थिक बराबरी में बड़ा रोड़ा मानती हैं। इस रोड़े को खत्म करने के लिए सभी संगठनों-पार्टियों के पास अपने तर्क और दर्शन  हैं। उसी तर्क और दर्शन  के आधार पर वह भारत के जाति आधारित समाज को खत्म करने की कोशिश में लगे  हैं। लेकिन इन कोशिशों  के बीच की सच्चाई यह है कि आधुनिक होते भारतीय समाज का जातिगत स्वरूप और संगठित व संस्थागत हुआ है, जहां नये सृजन के मुल्य भी हैं और सामंती-बर्बर सामाजिक संरचनाएं भी। वैसे में सवाल यह उठता है कि इसके मुकाबले नयी सामाजिक संरचना क्या होगी, उसके कार्यभार क्या होंगे और वह वंचित-शोषित  जातियों के मुक्ति के सवालों पर क्या रास्ता अपनायेगी, जिससे ये जाति समूह उन संघर्षों को अपना मानेंगे। ‘जनज्वार’ जाति के इस जटिल मसले पर सभी पक्षों के सरोकारी बहस को आमंत्रित करता है। दिल्ली के गांधी शान्ति  प्रतिष्ठान  में 24 जुलाई को जाति के सवाल पर आयोजित एक सेमीनार में बांटी गयी सर्वहारा प्रकाशन की एक पुस्तिका का पहला हिस्सा छापकर यहां बहस की शुरूआत की जा रही है। यह पुस्तिका वामपंथी समूह क्रांतिकारी लोकअधिकार संगठन और इंकलाबी मजदूर सभा की ओर से वितरित की गयी थी। - मॉडरेटर



आज अपने देश  में बहुत सारे लोग जो खुद को मार्क्सवादी, मार्क्सवाद के समर्थक या मार्क्सवाद की सहानुभूति रखने वाले कहते हैं वे मार्क्सवाद की जड़ खोदने में लगे हुए हैं। इसके अलावा ऐसे लोगों की भारी तादाद है जो खुद को वंचितों-शोषितों  का मसीहा घोषित  करते हुए,मुक्ति के दर्शन  के तौर पर मार्क्सवाद को खारिज करते हैं। इन्होंने खुद का मुक्ति का दर्शन  गढ़ लिया है।

यह उपभोक्तावादी पूंजीवाद का जमाना है। इसमें हर चीज ‘मॉस’ स्वरूप ग्रहण कर लेती है। इसमें हर चीज को सरलीकृत करके ‘मॉस’के उपभोग के अनुरूप ढाल लिया जाता है और इसके परिणाम स्वरूप हर व्यक्ति हर चीज का विशेषज्ञ  बन बैठता है। वह हर चीज चर चाहे वह कितनी विशिष्ट   और तकनीकी क्यों न हो उस पर मंतव्य देना अपना अधिकार समझ लेता है। जिन क्षेत्रों में फरिस्ते  भी पर मारने से घबराते हैं, उसमें यह बेहिचक अपनी राय ही नहीं, अंतिम निर्णय फौरन सुना देते हैं।

स्वनामधन्य बुद्धिजीवी,खासकर दलित बुद्धिजीवी इसी श्रेणी में आते हैं। ये अतीत की हर चीज, हर दर्शन और हर आंदोलन पर फतवा जारी करने में लगे हुए हैं। ये एक बार मूंह खोलते हैं तो चार फतवे जारी हो जाते हैं। और ठीक तुरंत काफिर यानी ब्राम्हणवादी, मनुवादी घोषित  हो जाता है। यहां अतीत से असहमति की सारी गुहार वर्तमान में असहमति को निरस्त करने के लिए लगाई जाती है।

मार्क्सवाद और भारत का कम्युनिस्ट आंदोलन इसके खास निशाने  पर है। बात कहीं की भी हो रही हो ये लपक कर चार लात इनको लगा देते हैं। इनमें से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो भारत के नब्बे साल कम्युनिस्ट  आंदोलन के इतिहास की एक मोटा-मोटी रूपरेखा भी प्रस्तुत कर सके। फिर भी वे इस पर कुछ भी कह देने के लिए खुद को आजाद मानते हैं। हम सारे दलित बुद्धिजीवियों को चुनौती देते हैं कि वे आज के अपने ज्ञान के आधार पर भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास की दो पृष्ठ  की रूपरेखा प्रस्तुत करके दिखायें। चलिये हम अपनी चुनौती को और हल्का कर देते हैं। ये अपने को जाति के मुद्दे पर भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन में जो अलग-अलग सोच मौजूद रही है, वे उसकी ऐतिहासिक रूपरेखा प्रस्तुत करके दिखायें।

हम जानते हैं कि वे ऐसा नहीं कर सकते। लेकिन तब भी वे समूचे मार्क्सवाद को और भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को खारिज करने का दंभ रखते हैं। इसके निश्चित  कारण हैं। पिछले डेढ़ सौ सालों से और खासकर पिछले सौ सालों से मार्क्सवाद शोषित -उत्पीड़ित मानवता की मुक्ति का एकमात्र दर्शन रहा है। इसलिए जब भी कोई नया दर्शन या विचारधारा पैदा हुई है जिसने अपने को मुक्ति के दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया है तब उसे सबसे पहले मार्क्सवाद को गलत या अधूरा घोषित  करना पड़ा है।

यह पिछले सौ सालों में कई बार हो चुका है- मार्क्सवाद के भीतर से भी बाहर से भी। सच तो यह है कि हर दस-बीस साल पर यह षोर उठता ही रहा है कि मार्क्सवाद असफल हो गया है, मार्क्सवाद पुराना पड़ गया है(उत्तर आधुनिकता उसकी आधुनिकतम कड़ी है)। लेकिन हर बार यह पाया गया है कि मार्क्सवाद से आगे जाने के नाम पर जो कुछ प्रस्तुत किया गया वह मार्क्सवाद के पैदा होने से पहले ही कहा जा चुका है। वह सारा कुछ रूप बदला हुआ मार्क्सवाद पूर्व दर्शन है। उत्तर आधुनिकता पर भी यही चीज लागू होती है।

दलित बुद्धिजीवी भी मार्क्सवाद को नकारते हैं। वे इसके सिवा कुछ कर नहीं सकते। वे दलित की मुक्ति का अपना दर्शन प्रस्तुत करना चाहते हैं। दलित की मुक्ति का या ज्यादा ठीक कहें तो सभी सर्वहारा दलित सर्वहारा की मुक्ति का दर्शन मार्क्सवाद के रूप में पहले से ही मौजूद है। ऐसे में यदि दलित बुद्धिजीवियों को अपना दर्शन स्थापित करना है तो खासकर दलित सर्वहारा को मार्क्सवाद के प्रभाव से बचाना है तो मार्क्सवाद को खारिज करना आवश्यक  है। वस्तुतः यह सारा कुछ दलित सर्वहारा के लिए दो दर्षनों के बीच जंग है। एक ओर मार्क्सवाद है तो दूसरी ओर दलित बुद्धिजीवियों का दर्शन।

लेकिन दलित बुद्धिजीवी का दर्शन है क्या? यह दर्शन  है -और यही हमारी इस आलोचना का केंद्रबिंदु- बुर्जुआ दर्शन, पूंजीपति का दर्शन। दलित बुद्धिजीवियों के दर्शन का, उनकी विचारधारा का सारतत्व है पूंजीवादी दर्शन। हां,यह इक्कीसवीं सदी के शुरुआत के भारत के विशिष्ट दलित बुर्जुआ का दर्शन है। इस मायने में यह महान फ्रांसीसी क्रांति के फ्रांसीसी बुर्जुआ दर्शन से सारतः एक होते हुए भी रूप में कई मायनों में भिन्न है।


नोट:यह लेख जिस पुस्तिका 'मायावती-मुलायम परिघटना और उसकी वैचारिक अभिव्यक्तियाँ' का हिस्सा है, उसे दाहिनी तरफ फोटो पर क्लिक करके पूरा पढ़ा जा सकता है.