Showing posts with label narendra modi. Show all posts
Showing posts with label narendra modi. Show all posts

Jun 27, 2017

आखिर आपातकाल की संभावनाओं से इनकार क्यों नहीं कर पाए आडवाणी

देश में बढ़ती हिंसा और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग की बढ़ती खबरों के बीच फिर से एक बार यह बहस चल पड़ी है कि देश क्या अघोषित आपातकाल की नाकाबंदी के दौर में ढकेला जा रहा है...
वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन का विश्लेषण
कल की रात 25 जून, 1975 आजाद भारत के इतिहास की वह तारीख है जब तत्कालीन हुकूमत ने देश में आपातकाल लागू कर लोकतंत्र और नागरिक आजादी को बंधक बना लिया था। पूरे बयालीस साल हो गए हैं उस दौर को, लेकिन उसकी काली यादें अब भी लोगों के जेहन में अक्सर ताजा हो उठती हैं। उन यादों को जिंदा रखने का काफी कुछ श्रेय उन लोगों को जाता है जो आज देश की हुकूमत चला रहे हैं। उनका अंदाज-ए-हुकूमत लोगों में आशंका पैदा करता रहता है कि देश एक बार फिर आपातकाल की ओर बढ रहा है।

दो साल पहले आपातकाल के चार दशक पूरे होने के मौके पर उस पूरे कालखंड को शिद्दत से याद करते हुए भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी देश में फिर से आपातकाल जैसे हालात पैदा होने का अंदेशा जताया था।
आडवाणी ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में देश को आगाह किया था कि लोकतंत्र को कुचलने में सक्षम ताकतें आज पहले से अधिक ताकतवर है और पूरे विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि आपातकाल जैसी घटना फिर दोहराई नहीं जा सकतीं। बकौल आडवाणी, 'भारत का राजनीतिक तंत्र अभी भी आपातकाल की घटना के मायने पूरी तरह से समझ नहीं सका है और मैं इस बात की संभावना से इनकार नहीं करता कि भविष्य में भी इसी तरह से आपातकालीन परिस्थितियां पैदा कर नागरिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है।
आज मीडिया पहले से अधिक सतर्क है, लेकिन क्या वह लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध भी है? कहा नहीं जा सकता। सिविल सोसायटी ने भी जो उम्मीदें जगाई थीं, उन्हें वह पूरी नहीं कर सकी हैं। लोकतंत्र के सुचारु संचालन में जिन संस्थाओं की भूमिका होती है, आज भारत में उनमें से केवल न्यायपालिका को ही अन्य संस्थाओं से अधिक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।' 

आपातकाल कैसा था और उसके मायने क्या हैं? दरअसल यह उस पीढी को नहीं मालूम जो सत्तर के दशक में या उसके बाद पैदा हुई है और आज या तो जवान है या प्रौढ हो चुकी है। लेकिन उस पीढी को यह जानना जरूरी है और उसे जानना ही चाहिए कि आपातकाल क्या था?
साठ और सत्तर के दशक में विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं खासकर समाजवादियों के बीच सरकार विरोधी दो नारे खूब प्रचलित थे। एक था- 'लाठी-गोली-सेंट्रल जेल, जालिमों का अंतिम खेल' और दूसरा था- 'दम है कितना दमन में तेरे, देखा है और देखेंगे-कितनी ऊंची जेल तुम्हारी, देखी है और देखेंगे।' दोनों ही नारे आपातकाल के दौर में खूब चरितार्थ हुए। विपक्षी दलों के तमाम नेता-कार्यकर्ता, सरकार से असहमति रखने वाले बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार, पत्रकार आदि जेलों में ठूंस दिए गए थे। यही नहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की रीति-नीति का विरोध करने वाले सत्तारूढ़ कांग्रेस के भी कुछ दिग्गज नेता जेल के सींखचों के पीछे भेज दिए गए थे।
दरअसल, बिहार और गुजरात के छात्र आंदोलनों ने इंदिरा गांधी की हुकूमत की चूलें हिला दी थीं और उसी दौरान समाजवादी नेता राजनारायण की चुनाव याचिका पर आए इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले ने आग में घी काम किया था। इसी सबसे घबराकर इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए देश पर आपातकाल थोपा था। इंदिरा गांधी इतनी सशंकित और भयाक्रांत हो चुकी थी कि आपातकाल लागू करने से कुछ घंटे पहले ही उन्होंने अपने विश्वस्त और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर रे से मंत्रणा के दौरान आशंका जताई थी कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की 'हेट लिस्ट' में हैं और कहीं ऐसा तो नहीं कि निक्सन उनकी सरकार का भी उसी तरह तख्ता पलट करवा दे, जैसा कि उन्होंने चिली के राष्ट्रपति सल्वादोर अलेंदे का किया है।
उन्हें इस बात की भी शंका थी कि उनके मंत्रिमंडल में शामिल कुछ लोग सीआईए के एजेंट हो सकते हैं। उनके शक और डर का आलम यह था कि उन्होंने उस समय के उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बंगले पर भी जासूसी के लिए आईबी का डीएसपी रैंक का अधिकारी तैनात कर दिया था।
आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। अभिव्यक्ति का ही नहीं, लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं रह गया। 25 जून की रात से ही देश भर में विपक्षी नेताओं-कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का दौर शुरू हो गया। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरणसिंह, मधु लिमए, अटलबिहारी वाजपेयी, बीजू पटनायक, लालकृष्ण आडवाणी, मधु दंडवते आदि तमाम विपक्षी नेता मीसा यानी आंतरिक सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर लिए। जो लोग पुलिस से बचकर भूमिगत हो गए, पुलिस ने उनके परिजनों को परेशान करना शुरू कर दिया। किसी के पिता को, तो किसी की पत्नी या भाई को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी का आधार तैयार करने के लिए तरह-तरह के मनगढ़ंत और अविश्सनीय हास्यास्पद आरोप लगाए गए।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रघुवंश को रेल की पटरियां उखाड़ने का आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया। जबकि हकीकत यह थी कि उनके दोनों हाथ भी ठीक से काम नहीं करते थे। इसी तरह मध्य प्रदेश के एक बुजुर्ग समाजवादी कार्यकर्ता पर आरोप लगाया गया कि वे टेलीफोन के खंभे पर चढ़कर तार काट रहे थे। प्रख्यात कवयित्री महादेवी वर्मा को उनकी लिखी बहुत पुरानी एक कविता का मनमाना अर्थ लगाकर गिरफ्तार करने की तैयारी इलाहबाद के जिला प्रशासन ने कर ली थी। लेकिन जब श्रीमती गांधी को उनके करीबी एक पत्रकार ने यह जानकारी देने के साथ ही याद दिलाया कि महादेवी जी पंडित नेहरू को अपने भाई समान मानती थीं, तब कहीं जाकर श्रीमती गांधी के हस्तक्षेप से उनकी गिरफ्तारी रुकी। 

बात गिरफ्तारी तक ही सीमित नहीं थी, जेलों में बंद कार्यकर्ताओं को तरह-तरह से शारीरिक और मानसिक यातनाएं देने का सिलसिला भी शुरू हो गया। कहीं-कहीं तो निर्वस्त्र कर पिटाई करने, पेशाब पिलाने, उन्हें खूंखार अपराधी और मानसिक रुप से विक्षिप्त कैदियों के साथ रखने और उनकी बैरकों सांप-बिच्छू और पागल कुत्ते छोड़ने जैसे हथकंडे भी अपनाए गए। ऐसी ही यातनाओं के परिणामस्वरुप कई लोगों की जेलों में ही मौत हो गई, तो कई लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हो गए।
सोशलिस्ट पार्टी की कार्यकर्ता रहीं कन्नड़ फिल्मों की अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी का नाम ऐसे ही लोगों में शुमार है, जिनकी मौत जेल में हो गई थी। समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडिस आपातकाल की घोषणा होते ही भूमिगत हो गए थे और उन्होंने अपने कुछ अन्य भूमिगत सहयोगियों की मदद से तानाशाही का मुकाबला करने का कार्यक्रम बनाया था। सरकार उनके इस अभियान को लेकर बुरी तरह आतंकित थी, लिहाजा जार्ज की गिरफ्तारी के लिए दबाव बनाने के मकसद से उनके भाई लॉरेंस और माइकल फर्नांडिस को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उनसे जार्ज का सुराग लगाने के लिए उन्हें जेल में बुरी तरह से यातनाएं दी गईं।
कई मीसा बंदियों ने अपने-अपने राज्यों के हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी, लेकिन सभी स्थानों पर सरकार ने एक जैसा जवाब दिया कि आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निलंबित है और इसलिए किसी भी बंदी को ऐसी याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है। जिन हाईकोर्टों ने सरकारी आपत्ति को रद्द करते हुए याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय दिए, सरकार ने उनके विरुद्ध न केवल सुप्रीम कोर्ट में अपील की बल्कि उसने इन याचिकाओं के पक्ष में फैसला देने वाले न्यायाधीशों को दंडित भी किया।
असुरक्षा बोध से बुरी तरह ग्रस्त श्रीमती गांधी को उस दौर में अगर सर्वाधिक विश्वास किसी पर था तो वह थे उनके छोटे बेटे संजय गांधी। संविधानेत्तर सत्ता केंद्र के तौर उभरे संजय गांधी आपातकाल के पूरे दौर में सरकारी आतंक के पर्याय बन गए थे। सबसे पहले उन्होंने दिल्ली को सुंदर बनाने का बीड़ा उठाया। इस सिलसिले में उनके बदमिजाज आवारा दोस्तों की सलाह पर दिल्ली को सुंदर बनाने के नाम पर लालकिला और जामा मस्जिद के नजदीक तुर्कमान गेट के आसपास की बस्तियों को बुलडोजरों की मदद से उजाड़ दिया गया, जिससे बड़ी तादाद में लोग बेघर हो गए। कुछ लोगों ने प्रतिरोध करने की कोशिश की तो उन्हें गोलियों से भून दिया गया।
अपनी प्रगतिशील छवि बनाने के लिए संजय गांधी ने उस दौर में इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय कार्यक्रम से इतर पांच सूत्रीय कार्यक्रम पेश किया था, जिसके प्रचार-प्रसार में पूरी सरकारी मशीनरी झोंक दी गई थी। उस बहुचर्चित पांच सूत्रीय कार्यक्रम में सबसे ज्यादा जोर परिवार नियोजन पर था। इस कार्यक्रम पर अमल के लिए पुरुषों और महिलाओं की नसबंदी के लिए पूरा सरकारी अमला झोंक दिया गया था अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए जिला कलेक्टरों और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों पर ज्यादा से ज्यादा लोगों की नसबंदी करने का ऐसा जुनून सवार हुआ कि वे पुलिस की मदद से रात में गांव के गांव घिरवाकर लोगों की बलात नसबंदी कराने लगे। आंकड़े बढ़ाने की होड़ के चलते इस सिलसिले में बूढ़ों-बच्चों, अविवाहित युवक-युवतियों तक की जबरन नसबंदी करा दी गई। सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई थी, लेकिन कहीं से भी प्रतिरोध की कोई आवाज नहीं उठ रही थी।
उस कालखंड की ऐसी हजारों दारुण कथाएं हैं। कुल मिलाकर उस दौर में हर तरफ आतंक, अत्याचार और दमन का बोलबाला था। सर्वाधिक परेशानी का सामना उन परिवारों की महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को करना पड़ा, जिनके घर के कमाने वाले सदस्य बगैर किसी अपराध के जेलों मे ठूंस दिए गए थे। आखिरकार पूरे 21 महीने बाद जब चुनाव हुए तो जनता ने अपने मताधिकार के जरिए इस तानाशाही के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से ऐतिहासिक बगावत की और देश को आपातकाल के अभिशाप से मुक्ति मिली। लेकिन उन 21 महीनों में जो जख्म देश के लोकतंत्र को मिले उनमें से कई जख्म आज भी हरे हैं।
यह सच है कि आपातकाल के बाद से अब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था तो चली आ रही है। हालांकि सरकारों की जनविरोधी विरोधी नीतियों के प्रतिरोध का दमन करने की प्रवृत्ति अभी भी कायम है, लेकिन किसी भी सरकार ने नागरिक अधिकारों के हनन का वैसा दुस्साहस नहीं किया है, जैसा आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी और उनकी सरकार ने किया था।

May 10, 2017

जुड़वा दिमाग जैसे हैं मोदी और ट्रंप

पूर्व आइपीएस विकास नारायण राय इन दिनों अमेरिका में हैं। वे लगातार भारतीय समाज, सुरक्षा और राजनीति पर लिखते रहते हैं। अबकी उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी की अचंभित करने वाली समानताओं, मसखरेपन, इतिहास ज्ञान और समाजदृष्टि पर बहुत ही तथ्यात्मक और दिलचस्प टिप्पणी की है,  पढ़िए पूरा लेख विस्तार से...

अमेरिका से जनज्वार के लिए  विकास नारायण राय 

 
रूरी नहीं जो राष्ट्र नेता इतिहास बनाने निकलते हैं, उन्हें इतिहास की समझ भी हो| ऐसे में उनके हाथों घोर अनर्थ होने या भारी भ्रान्ति फ़ैलने की संभावना बनी रहती है| नेपोलियन, हिटलर, मुसोलिनी, तोजो, याह्या खान, सद्दाम हुसैन जैसों के आत्मघाती उदाहरण साक्षात हैं|

मोदी और ट्रम्प फिलहाल उन्हीं पद चिन्हों पर न भी चलते दिख रहे हों पर उनकी इतिहास शून्यता गंभीर राजनीतिक आशंकाओं को हवा दे रही है और साथ ही उन्हें मखौल का पात्र भी बना रही है| लगता है, जैसे राजनीतिक शिखर छूने की जल्दी में ये दोनों महानुभाव इतिहास बनाने नहीं स्वयं इतिहास बनने के कगार पर हों|

मोदी और ट्रम्प को एक खाने में रखने वालों को भी आज शायद ही उनके समर्थकों की एक जैसी हताशा भरी नियति से हैरानी हो| फ़िलहाल दोनों के भक्त उनके चुनाव प्रचार के दौर का थूका हुआ चाटने को मजबूर नजर आते हैं| ट्रम्प में रूस की सामरिक दिलचस्पी की छाया उनके राष्ट्रपति अभियान पर लगातार बनी रही थी, और अब अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करते पहलुओं की छानबीन अमेरिकी सेनेट की न्यायिक समिति कर रही है|

स प्रकरण का आपराधिक पक्ष एफबीआई की जाँच का विषय है| चुनाव के दौरान रूस में अपनी व्यावसायिक स्थिति को लेकर ट्रम्प ने जो झूठे-सच्चे पैंतरे बदले, उन्हें सही ठहरा पाना उत्तरोत्तर कठिन होता जा रहा है| यहाँ तक कि ट्रम्प ने, अमेरिकी इतिहास में पहली बार, राष्ट्रपति की जांच कर रही एफबीआई के डायरेक्टर को ही बरखास्त कर दिया|

मोदी ने अपने चुनाव अभियान में पाकिस्तान के विरुद्ध युद्धोन्माद खड़ा करने में ‘छप्पन इंच के सीने’ से लेकर ‘एक के बदले सौ सर’ जैसी अव्यावहारिक डींगें जम कर हांकी थीं| तीन वर्षों के उनके इतिहास-दृष्टि रहित शासन में काश्मीर की उत्तरोत्तर बिगड़ती स्थित ने उनके समर्थकों की बोलती बंद कर दी है|

वे समझ नहीं पा रहे हैं कि अपने ‘नरेंद्रबली’ की पिलपिलाती छवि को कैसे फ़िल्मी ‘महाबली’ के रूप में दुरुस्त करें| मोदी का रास्ता सीमित होते-होते एकमात्र पाकिस्तान से युद्ध के विकल्प की ओर बढ़ रहा है| दो परमाणु शक्तियों के बीच यह एक मिलीभगत का युद्ध ही होगा, जिसके लिए अमेरिका का रजामंद होना जरूरी है| लगता नहीं कि ट्रम्प के अमेरिका के पास इसके लिए अभी समय है|

क्या वे अपने कार्य भार में इतिहास बोध के महत्व को कभी समझ पायेंगे- मोदी और ट्रम्प? डेढ़ दशक भी नहीं हुये, मोदी की साख इतनी कम होती थी कि उनको प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के हेलिकॉप्टर में घुसने नहीं दिया जाता था| आज वे स्वयं धाकड़ प्रधानमन्त्री बने बैठे हैं|

ट्रम्प को भी शायद ही किसी ने गंभीरता से लिया हो जब वे अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार बनने की दौड़ में उतरे| न सिर्फ वे भारी बहुमत से उम्मीदवार बने बल्कि उन्होंने बेहद करीबी मुकाबले में हिलेरी क्लिंटन को हराकर राष्ट्रपति पद भी हथिया लिया|

दोनों, ट्रम्प और मोदी, अपनी-अपनी तरह से अनुभव के धनी कहे जायेंगे और ट्रम्प के शब्दों में ‘डील’ करने में माहिर भी| तब भी, उनकी अभूतपूर्व राजनीतिक सफलताओं के बावजूद, उनकी राष्ट्रीय स्वीकार्यता पर बढ़ते प्रश्न चिन्ह की मुख्य वजह रही है उनकी कार्यशैली से ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का नदारद होना|

ट्रम्प को अपने नव-नियुक्त एनएसए जनरल फ्लिन को उनके रूस से संबंधों के सार्वजनिक होने पर बरखास्त करना पड़ा| जबकि मोदी की हालिया चुनावी सफलताओं पर इवीएम जालसाजी के आरोप चिपकने लगे हैं| ट्रम्प के सत्ता संभालते ही अमेरिका में मुस्लिम प्रवेश पर रोक वहां की अदालतों में एक दिन भी नहीं ठहर सकी| भारत में नियमित मुस्लिम वर्जना मोदी की विकास यात्रा में असहनीय बोझ हो चली है| जाहिर है, ऐतिहासिकता से मुंह मोड़ कर राष्ट्रीय नेतृत्व देने के अपने खतरे हैं|
  
किसी को बताने की जरूरत नहीं कि ‘पप्पू’ कहने पर भारतीय राजनीति का कौन सा चेहरा याद आता है| अमेरिकी राजनीति में लगता है ट्रम्प भी उसी स्थिति की ओर बढ़ रहे है| और मोदी? याद कीजिये, बिहार चुनाव में मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान से लगे तक्षशिला को बिहार का हिस्सा घोषित कर डाला था| यहाँ तक कि विज्ञान कांग्रेस में, गणेश के धड़ से हाथी का सर जोड़ने की दन्त कथा को उन्होंने प्राचीन भारत में अति विकसित सर्जरी के ‘इतिहास’ से जोड़ दिया| खासी किरकिरी के बाद अब वे अपना इतिहास बोध सुरक्षित स्तरों पर ही व्यक्त करते हैं|

सलन, ‘साठ साल बनाम साठ महीनों’ जैसी प्रचार चर्चाओं में| या विदेशी दौरों में शेखी मारकर कि उनसे कितने दशक पहले तक कोई भारतीय प्रधानमन्त्री उस देश में नहीं पहुंचा| मानना पड़ेगा, इन सब के लिए भारतीय मीडिया की मेहरबानी कैसे हासिल करनी है, मोदी बखूबी समझते हैं| ट्रम्प ने अमेरिका में ‘फेक मीडिया’ शब्द ईजाद किया जबकि मोदी ने उसे भारत में कार्यान्वित भी कर दिखाया|

काश! उन्हें भारत-पाक के बीच बार-बार असफल रही क्रिकेट डिप्लोमेसी या वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा को व्यर्थ करने वाली पाकिस्तानी फ़ौज की कारगिल पैंतरेबाजी में निहित ऐतिहासिक सन्देश की समझ भी होती| तो वे नवाज शरीफ के जन्म दिन पर लाहौर बिना बुलाये धमकने जैसे सतही कूटनीति में भारत-पाक तनावों का हल ढूंढने के बजाय, कश्मीर में कोई सार्थक राजनीतिक-सामरिक पहल कर रहे मिलते|

काश! नक्सल आयाम के आर्थिक-सामाजिक पहलू का इतिहास भी मोदी के सामरिक परिप्रेक्ष्य का हिस्सा हो सकता! तब वे इस समस्या का महज सैनिक हल हासिल करने की एक आयामी जिद में देश का समय और ऊर्जा न गँवा रहे होते| इतिहास बोध से संपन्न मोदी ने, उत्तर-पूर्व में शांति लाने के कांग्रेसी मॉडल की असफलता को ही दोहराते रहने के बजाय, दशकों तक अशांत रहे त्रिपुरा राज्य की, कम्युनिस्ट शासन में हासिल, ऐतिहासिक स्थिरता से सबक लिया होता|

तिहास किसी को माफ़ नहीं करता| देश के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू तो स्वयं किसी प्रबुद्ध इतिहासकार से कम न थे| उनकी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’, जो उन्होंने 1942-46 में ‘भारत छोड़ो’ के दौरान अहमदनगर किले में बंदी रहते हुये लिखी थी, को इतिहास क्रम में भारत की उदार संस्कृति और दर्शन से परिचय की खान कहा जा सकता है|

ह नेहरू के इतिहास बोध का ही करिश्मा था कि उन्होंने विश्व युद्धों से जर्जर दो ध्रुवीय विश्व में भारत के नेतृत्व में एक तीसरे तटस्थ ध्रुव की नींव रखी, और दो सदी की औपनिवेशिक दासता से बाहर निकले गरीब देश को आधुनिकता के प्रकाश से आलोकित रखा| पर चीन के महाशक्ति मंसूबों की ऐतिहासिक समझ की चूक ने उनसे भारी सामरिक भूल कराई, जिसकी कीमत देश को 1962 के युद्ध में मनोबल तोड़ने वाली पराजय के रूप में चुकानी पड़ी| 
     
मेरिका में 1961 के क्यूबा मिसाइल संकट को टालने का श्रेय आसानी से राष्ट्रपति केनेडी की इतिहास मर्मज्ञता को दिया जाता रहा है| वही अमेरिका आज अपने पैंतालीसवें राष्ट्रपति ट्रम्प को इतिहास का अनिच्छुक पाठ पढ़ते देखना चाहता है| हुआ यूँ कि ‘डील’ में माहिर ट्रम्प ने एक साक्षात्कार में खुद की तुलना अमेरिका के सातवें राष्ट्रपति एंड्रू जैक्सन से कर डाली| यहाँ तक भी गनीमत थी क्योंकि इतने भर से उनका जाना-पहचाना बड़बोलापन ही झलकता|

शर्ते, उसी झोंक में आगे वे यह न जोड़ देते कि एंड्रू जैक्सन होते तो अमेरिका का गृह युद्ध न हुआ होता, उसका समाधान निकाल लिया जाता| अमेरिका के इस सातवें राष्ट्रपति (1829-37) का निधन दास प्रथा को लेकर हुए गृह युद्ध से सोलह वर्ष पूर्व हो गया था और इतिहास में उन जैसे दास मालिक को गृह युद्ध से कभी जोड़ा भी नहीं गया|

जैक्सन को 1812 में न्यू ओरलेंस के युद्ध में ब्रिटिश फ़ौज को हराने वाली सेना का नेतृत्व करने पर राष्ट्रीय नायक की ख्याति मिली थी| 1824 में उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की और राजनीतिक जीवन में धनाढ्य वर्ग के विपरीत सामान्य लोगों के लिए काम किया| उनके कार्यकाल में अमेरिकी आदिवासियों का नियत बस्तियों में दारुण विस्थापन उनके नाम पर एक काला धब्बा माना जाता है|

ट्रम्प ने जैक्सन को एक दृढ़ व्यक्ति और बड़े दिलवाला कहा| 1830 के दशक में साउथ कैरोलिना अमेरिका से अलग होना चाहता था और तब जैक्सन ने उसे युद्ध की धमकी देकर यह इरादा छोड़ने पर बाध्य किया| उस समय समीकरण था एक राज्य बनाम शेष राष्ट्र का| दो दशक बाद, दक्षिण के ग्यारह राज्य एक साथ अलग होने को बजिद थे| उनके साथ युद्ध का मतलब गृह युद्ध ही था|

तिहासकार एकमत हैं कि जिस युद्ध को अब्राहम लिंकन जैसा दूरदर्शी राष्ट्रपति नहीं रोक सका, उसे जैक्सन की सैन्यवादी रणनीति कैसे भी नहीं रोक सकती थी| हाँ, इतिहास शून्य ट्रम्प को जरूर लगता है कि जैक्सन से तुलना कर वे स्वयं को एक दृढ़ और बड़े दिलवाला राष्ट्रपति कहलवा लेंगे, और आम व्हाइट अमेरिकी का हितैषी भी|
  
मोदी के एंड्रू जैक्सन सरदार पटेल हैं, ट्रम्प की तर्ज पर बिना उनके ऐतिहासिक अवदान को समझे ही| पटेल रियासतों के भारत में विलय के लिए जाते हैं, जबकि मोदी के राजनीतिक नेतृत्व में, देश के आधा दर्जन प्रांतों में सशस्त्र अराजकता बद से बदतर होती गयी है| पटेल ने लोकतांत्रिक संविधान और नौकरशाही के इस्पाती ढांचे को मजबूत किया, मोदी ने संविधान में पलीता लगाने और नौकरशाही को पिछलग्गू बनाने का काम किया है|

से में मोदी की इस समझ को क्या कहें कि पटेल की विश्व में सबसे ऊंची लौह मूर्ति लगाकर वे स्वयं को सरदार कहलवा लेंगे| देश का मुख्य राजनीतिक कार्यकारी इतिहास की समझ से शून्य हो तो उस देश को कब अपमान के दौर से गुजरना पड़ जाये, कहना मुश्किल है| ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की गंभीर कमी को वह ‘जोश’ से पूरी करता है और नाजुक भूलें करता है|

मने मोदी को, नोटबंदी से काला धन, आतंकवाद और भ्रष्टाचार ख़त्म करने का दावा करते देखा| हमने ट्रम्प को, मेक्सिको सीमा पर दीवार से अमेरिकियों के आर्थिक संकट के हल का सपना बेचते देखा| क्या हम उनमें इतिहास बुद्धि की कामना कर सकते हैं!  

Apr 26, 2017

हलाला में इतना मजा क्यों आ रहा है मर्दो!

धार्मिक मान्यताओं, वोटबैंक की राजनीति से उठकर सबको ये मानना होगा कि तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी मान्यताएं और चलन महिलाओं की गरिमा और उनके हक के खिलाफ हैं, इन पर जितनी जल्दी हो सके रोक लग जानी चाहिए.....

मनोरमा


तीन तलाक और हलाला का मसला इन दिनों सुर्खियों में है, खासतौर से हाल ही में इसके विरोध और मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के संदर्भ में दिए गए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान के बाद से। 

मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव मौजूदा सरकार की प्राथमिकताओं में से एक रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के संविधान पीठ द्वारा ग्यारह मई को तलाक, हलाला और बहु-विवाह की संवैधानिक स्थिति पर सुनवाई होने वाली है, ऐसे में इन मसलों पर बहस और चर्चा का बाजार पूरे देश में गर्म है। बहुत संभावना है कि जल्द ही सरकार की ओर से  मुस्लिम पर्सनल लॉ में आवश्यक बदलाव लाकर तीन तलाक को खत्म कर दिया जाएगा। 

लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। देश की पूरी राजनीति का इन दिनों इसके समर्थन और विरोध में ध्रुवीकरण हो चुका है। राजनीतिक दलों के अपने एजेंडे हैं और उनका कोई भी रुख मुस्लिम महिलाओं और समाज की बेहतरी से ज्यादा अपने वोटबैंक की चिंता में है। दूसरी ओर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और ऐसे ही तमाम संगठन जहां अब भी मुस्लिम शरीआ कानूनों में दखलअंदाजी के खिलाफ हैं, वहीं मुसलमान महिलाओं का एक बड़ा तबका तीन तलाक और हलाला जैसे प्रावधानों को खत्म किए जाने के पक्ष में है।

बहरहाल, तीन तलाक और निकाह हलाला पर चल रही बहस ने एक खास मानसिकता के लोगों को धार्मिक आधार पर टिप्पणियां करने, मुस्लिम औरतों का उपहास और भौंडा मजाक करने का भी मौका दे दिया है, क्योंकि हलाला उनके लिए मजा लेने की चीज है। तीन तलाक मसले पर बहस के बाद से सोशल मीडिया पर हलाला को लेकर ऐसी ही उपहास करने वाली हलाला सेवा मुफ्त में देने के प्रस्तावों के साथ ढेरों टिप्पणियां पढ़ी जा सकती हैं। 

गौरतलब है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला से अगर उसका पूर्वपति फिर से शादी करना चाहता है तो उसे निकाह हलाला करना होता है, जिसके तहत महिला को पहले किसी दूसरे पुरुष से निकाह करना होता है,शारीरिक संबंध बनाना होता है और फिर उससे तलाक मिल जाने पर उसका पहला पति उससे दुबारा शादी कर सकता है। बहुत से मामलों में दूसरे पति के तलाक नहीं देने पर मामला बिगड़ भी जाता है इसलिए इसके तोड़ में 'हुल्ला' प्रथा का प्रचलन हुआ है, जिसके तहत मौलवी उसी पुरुष से विवाह करवाते हैं जो निश्चित तौर पर तलाक दे देता है। 

इन दिनों 'हुल्ला' के तहत विवाह करने वाले पुरुष इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं, सोशल मीडिया पर उनके पेज हैं और ये उनकी कमाई का भी जरिया है। दरअसल, निकाह हलाला का प्रावधान इसलिए बनाया गया था ताकि कोई भी पुरुष सोच—समझकर तलाक दे, गुस्से में नहीं, लेकिन ये कबीलाई और पुरुष बर्चस्ववादी मानसिकता के तहत ही था जिसमें औरत और उसका जिस्म पुरुष की संपत्ति और उसकी इज्जत होता है। 

हलाला के तहत किसी की पत्नी का अन्य पुरुष से विवाह और शारीरिक संबंध उनके लिए एक सजा के तौर पर ही था। जाहिर है आधुनिक समाज के मानकों पर इस तरह की प्रथाएं बहुत त्रासद हैं, इन्हें जितनी जल्दी हो सके खत्म किया जाना चाहिए।   

इस मामले में केन्द्र सरकार की काउंसिल माधवी दीवान ने स्पष्ट किया है कि बहुविवाह का किसी विशेष धार्मिक मान्यता से कोई लेना देना नहीं है, यह एक सामाजिक चलन रहा है और सदियों पहले से ग्रीक, रोमन, हिंदू, यहुदियों, पारसी सभी धार्मिक समुदाय में प्रचलित था। तीन तलाक और हलाला प्रथा भी अपने समय का सामाजिक चलन थी और उस समय के सुविधा के अनुसार विकसित व प्रचलित हुई थी। इसलिए संविधान की धारा 25 या धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत इनके संरक्षण का तर्क नहीं दिया जा सकता, ये दोनों अलग बातें हैं।
   
हालांकि कहा जाता है कि इस्लाम में औरतों को बराबरी का दर्जा हासिल है और शादी से लेकर तलाक तक उनके हकों की पूरी तरह से हिफाजत की गई है। मसलन, औरत की रजामंदी के बगैर निकाह नहीं हो सकता, उनकी आर्थिक सुरक्षा के लिए मेहर का प्रावधान है और तलाक के जवाब में औरतों के पास खुला का विकल्प है जिसके तहत वो काजी के पास जाकर तुरंत अपनी शादी से मुक्त हो सकती हैं, खुला में इद्दत जैसी अवधि का भी पालन नहीं करना पड़ता है। 

इसके अलावा तलाक के बाद भी औरतों को लगभग तीन महीने की अवधि बगैर किसी अन्य पुरुष के संपर्क में आए बिताना होता है ताकि इस अवधि में उसके गर्भवती होने का पता चला तो संतान को उसका हक मिल सके। लेकिन जमीनी सच कुछ और है और पुरुषों के अनुकूल है उन्हें ‘तलाक-उल-सुन्नत’ और ‘तलाक-ए-बिदात’ का हक हासिल है। पहले प्रावधान के तहत तलाक के बाद तीन महीने इद्दत की अवधि होती है जिसमें पति पत्नी 40 दिन तक साथ ही रहते हैं, सुलह नहीं होने पर फिर तलाक दिया जाता है और फिर 40 दिन साथ रहने की अवधि होती है इसके बाद भी सुलह नहीं होती तो अंतिम तलाक मुकर्रर हो जाता है। जबकि ‘तलाक-ए-बिदात’ के तहत एक मुस्लिम पति अपनी पत्नी को तीन बार ‘तलाक’ शब्द बोलकर तलाक दे सकता है, ज्यादातर मामलों में पुरुषों द्वारा इसी का फायदा उठाया जाता है। 

शायद यही वजह है कि शाहबानो से लेकर अब शायराबानो ने इंसाफ के लिए अदालत के दरवाजे पर दस्तक दी है, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पास नहीं। तीन तलाक कैसे मुस्लिम महिलाओं के जीवन के साथ खिलवाड़ है, इसे हाल के कुछ मामलों से समझा जा सकता है। इसी महीने आगरा में एक महिला को दो बेटियों को जन्म देने के कारण फोन पर तलाक मिल गया और एक ताजा मामले में राष्ट्रीय स्तर की नेटबॉल खिलाड़ी शुमेला जावेद को उसके पति ने फोन पर केवल इसलिए तीन बार 'तलाक' कह दिया क्योंकि उन्होंने एक बच्ची को जन्मक दिया है।

अमरोहा में अपने माता पिता के साथ रह रही शुमेला ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से इस मामले की जांच करने और कार्यवाही करने का अनुरोध किया है। इसी तरह के एक और मामले में  गाजियाबाद की दो बहनों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फोन पर तलाक मिलने के बाद मदद की गुहार की है, सउदी अरब में काम करने वाले उनके पतियों ने भी उन्हें फोन पर ही तलाक दे दिया था। शाहजहांपुर की एक लड़की को पहले फेसबुक पोस्ट पर तीन बार तलाक लिखकर तलाक दिया गया, फिर बाद में बाद में एसएमस के जरिए। 

तलाक का ये तरीका न सिर्फ देश के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि लैंगिक बराबरी के आधुनिक मूल्यों के भी। पूरे विश्व के 25 से ज्यादा इस्लामी देशों में तलाक शरीया कानूनों के तहत मान्य नहीं है, बल्कि इसके लिए अलग से कानून बनाया गया है। भारत में कानूनी बहस के दायरे में यह मुद्दा पिछले साल फरवरी में तब आया जब जब तीन तलाक की एक पीड़िता शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला की प्रथा पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। 

उल्लेखनीय है कि इससे पहले 1985 में शाहबानो मामले ने तीन तलाक के मसले को राष्ट्रीय बहस के दायरे में लाया था, जब बासठ साल की उम्र में पांच बच्चों की मां शाहबानो को उनके वकील पति ने 1978 में तलाक दे दिया था। तीन साल बाद शाहबानो ने सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया, सुप्रीम कोर्ट ने  अप्रैल 1985 में उनके पति को अपनी 69 वर्षीय पत्नी को प्रति माह 179 रुपये 20 पैसे गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। 

तत्कालीन सरकार ने अगर वोटबैंक की राजनीति से हटकर मुस्लिम समाज पर दूरगामी असर करने वाला दूरदर्शी फैसला लिया होता, तो आज ये नौबत ही नहीं आती। सामाजिक और राजनीतिक दोनों लिहाज से वो दौर आज से ज्यादा अनुकूल था ऐसे फैसलों के लिए, लेकिन मुस्लिम समुदाय के यथास्थितिवादियों को अदालत का फैसला मंजूर नहीं था और युवा व आधुनिक विचारों वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी डर गए। उन्होंने आरिफ मोहम्म्द खान जैसे नेताओं की अनदेखी कर कांग्रेस के बाकी हिंदू मुसलमान नेताओं के साथ मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड की बात मानना ज्यादा अनुकूल समझा और 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) अधिनियम पारित करके सु्प्रीम कोर्ट के 23 अप्रैल, 1985 के उस ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत परित्यक्त या तलाकशुदा महिला को पति से गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है, यह मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है क्योंकि सीआरपीसी की धारा 125 और मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों में कोई विरोधाभास नहीं है। 

जाहिर है यह कितनी बड़ी भूल या गलती थी आज तीस साल बाद इसका मूल्यांकन बेहतर किया जा सकता है। कोई आश्चर्य नहीं कि आज देश भर की हजारों मुस्लिम महिलाएं इसके विरोध में सरकार पर दबाव बना रही हैं, इस प्रथा को खत्म करने की मांग पर मुखर होकर बोल रही हैं और देशभर में हस्ताक्षर अभियान चला रही हैं।

दरअसल, धार्मिक स्वतंत्रता की पैरोकारी के बावजूद आधुनिक समाज के लिए नियम कानून आधुनिक समय के तकाजों के अनुसार ही होने चाहिए। मसलन, धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर सती प्रथा, बहुविवाह, बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं को चलते रहने नहीं दिया जा सकता था और अंतरजातीय, अंतरधार्मिक व प्रेमविवाह को अमान्य नहीं किया जा सकता था, इसलिए आजादी से पहले और बाद में भी आवश्यक संशोधन करके हिन्दू विवाह अधिनियम में कुप्रथाओं को हटाकर आधुनिक मूल्यों को शामिल किया गया, जिसमें कानूनी तलाक का प्रावधान भी शामिल है।

शादी के तौर तरीके, रीति रिवाजों किसी भी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं के तहत होना ठीक है, लेकिन तलाक लेने या देने के लिए एक ही जैसा कानून होना चाहिए। साथ ही धार्मिक मान्यताओं, वोटबैंक की राजनीति से उठकर सबको ये मानना होगा कि तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी मान्यताएं और चलन महिलाओं की गरिमा और उनके हक के खिलाफ हैं, इन पर जितनी जल्दी हो सके रोक लग जानी चाहिए।

Apr 11, 2017

महिला नेता के खिलाफ दुष्प्रचार को क्यों नहीं रोक रहे गूगल और फेसबुक

असल सवाल यह है कि क्या भाजपा की किसी महिला या पुरुष नेता के खिलाफ ऐसे ही दुष्प्रचार किया जाता और फेसबुक व गूगल तमाशा देखते रहते...

जनज्वार। गूगल और फेसबुक कई बार सत्ता और सरकार की असलियत उजागर करने वाली वेबसाइट्स की खबरों को तत्काल रोक देते हैं। उनका तकनीकी विंग इतनी सक्रियता दिखाता है कि उसे रोकने में वह कई बार उन्हें कुछ ​मिनट भी नहीं लगते। और तो और वे विज्ञापन अधिकार छीन लेते है, रैंकिंग घटा देते हैं। 

फिर यहां देरी का क्या मतलब है, जबकि खुद पीड़िता कविता कृष्णन ने फेसबुक पर इस न्यूज को रोकने की अपील कर रखी है। बताया है कि मैंने कभी मोदी को न तो नपुंसक कहा और न ही इस भाषा में मैं कोई बात करती हूं।  बावजूद इसके इस फर्जी खबर को शेयर करने वालों संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

 गौरतलब है कि वामपंथी नेता और सामाजिक कार्यकर्ता कविता कृष्णन के खिलाफ पिछले एक सप्ताह से लगातार अपमानजक टिप्पणियां और उनका फर्जी बयान दर्जनों वेबसाइट और ग्रुप में शेयर हो रहा है लेकिन उनको अबतक गूगल और फेसबुक ने रोका नहीं है।  

जनज्वार तथ्य के तौर पर चार वेबसाइट का प्रिंट शॉट दे रहा है जिससे कविता कृष्णन के समर्थक सक्रिय हों और ऐसी गलत खबरों के प्रसारण को रूकवाने की तत्काल कोशिश करें।  

कविता कृष्णन की फेसबुक अपील

'मेरे बारे में एक फेक न्यूज कई वेबसाइट्स पर चलाई जा रही हैं। यह फेक न्यूज़ हिंदी में है और कहता है कि मैंने मोदी को नपुंसक कहा और 'फ्री सेक्स' की वकालत की। इस फेक न्यूज़ को चलाने वाले कुछ साइट तो अन्य अश्लील वीडियो भी चलाते हैं। ऐसा फेक न्यूज़ मेरे खिलाफ यौन उत्पीड़न है, मेरे सम्मान पर हमला है, और इससे मेरे लिये और यौन उत्पीडन का खतरा भी पैदा किया जा रहा है। ये सब सोचे समझे साजिश के तहत हो रहा है। मेरा अपील है कि कृपया ऐसे न्यूज़ को न खोजें और इन लिंक्स पर क्लिक न करें। यहां में सिर्फ इसलिए सबको सचेत कर रही हूं कि कोई मित्र बिना पढ़े गलती से ऐसे न्यूज़ शेयर न कर बैठे ये समझ कर कि मेरा बयान होगा तो ठीक ही होगा। मेरा इन वेबसाइट्स के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने का पूरा इरादा है।'

Mar 26, 2017

सिर्फ 10 कॉरपोरेट 5 लाख करोड़ के कर्जदार और 9 करोड़ किसानों का कर्ज 12 लाख करोड़

बैंकों से लेकर नीति आयोग तक किसानों को कर्ज देने के मसले पर नाक—भौं सिकोड़ रहे हैं, पर सरकार और रिजर्व बैंक 70 हजार करोड़ से अधिक डकार जाने वाले डिफॉल्टरों का नाम बताने की हिम्मत नहीं कर पा रहे...

राजेश रपरिया 

भारतीय स्टेट बैंक की प्रमुख अरूंधति भट्टाचार्य के किसानों की कर्जमाफी से वित्तीय अनुशासन बिगड़ने के बयान से तूफान आ गया है। उन्होंने कहा कि चुनावों के वक्त किसानों का कर्ज माफ करना सही नहीं है। अगर ऐसा होता है तो हर चुनाव में कर्ज माफी की उम्मीद की जाएगी। इस बयान ने किसानों के गहरे जख्मों पर नमक तो छिड़का ही है, बल्कि बैंकिंग उद्योग को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। 

बैंको की बढ़ती अनर्जक आस्तियों (नॉन परफार्मिंग एसेट्स —एनसीए) से अर्थव्यवस्था और केंद्र सरकार की परेशानियां बढ़ गयी हैं, जबकि प्रमुख सरकारी बैंक की मुखिया अपने बयानों में ऐसे पेश आ रही हैं मानो देश की बढ़ती आर्थिक मुश्किलों का मुख्य कारण किसान ही हों। मार्च 2016 तक बैंकों की कुल कर्जराशि 70 लाख करोड़ रुपए थी, जिसमें उद्योग की हिस्सेदारी 41.71 फीसदी और कृषि कर्ज 13.49 फीसदी थी।



जाहिर है बड़े लोगों और कारोबारियों पर ही बैंकों का सबसे ज्यादा कर्ज फंसा हुआ है। पिछले 15 महीनों में बैंकों का एनपीए दोगुने से ज्यादा हो गया है। सितंबर 2015 में एनपीए 3 लाख 49 हजार 556 करोड़ रुपए के थे, जो सितंबर 2016 में बढ़कर 6 लाख 68 हजार 825 करोड़ रुपए के हो गए। विश्वविख्यात अंतरराष्ट्रीय वित्त कंपनी 'स्टैंडर्ड एंड पुअर्स' का अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में एनपीए बढ़कर 9 लाख करोड़ रुपए के पार कर जाएंगे। रिजर्व बैंक का तर्क है कि आर्थिक हालात खराब होने से कर्ई बार कर्जदार समय से कर्ज नहीं चुका पाता है। पर आर्थिक विकास दर में सुधार आने से एनपीए में कमी आएगी और रिकवरी बढ़ जाएगी। 

लेकिन विडंबना यह है कि रिजर्व बैंक और अन्य बैंक इस तरह के लाभ किसानों को देने को तैयार नहीं हैं। फिर विलफुल डिफॉल्टरों (जो कर्जदाता जानबूझ कर कर्ज वापस नहीं करते, जबकि कर्ज वापस करने की उनकी हैसियत होती है) का आंकड़ा और नाम क्यों छुपाया जाता है, इसका कोई वाजिब तर्क न रिजर्व बैंक के पास है और न ही केंद्र सरकार के पास। यह कर्जदार गलत हथकंडों और सांठगांठ से भारी मात्रा में बैंकों से कर्ज पाते हैं, जो बैंकों, बड़े लोगों और राजनेताओं के कारनामों का जीता—जागता पुराण है। जनता के पैसों पर यह डिफॉल्टर बेनामी संपत्तियां बनाते हैं और विलासिता में करोड़ों—करोड़ रुपए उड़ा देते हैं। गौरतलब है कि 10 बड़े कॉरपोरेट समूहों पर 5 लाख 73 हजार 682 करोड़ रुपए का कर्ज है। यह जानकारी राज्य सभा में वित्त राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने दी है। 

अपनी रिपोर्टों के लिए चर्चित न्यूज वेबसाइट न्यूज लॉन्ड्री ने इन डिफॉल्टरों के नाम उजागर किए। समाचार साइट फर्स्ट पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार 7129 बैंक खातों को डिफॉल्टर घोषित किया गया है, जिन पर 70 हजार 540 करोड़ का कर्ज है। इस साइट पर 18 बड़े कर्जदारों के नाम भी हैं। मोटा अनुमान है कि तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए ये डकार गए हैं। इनमें विजय माल्या का नाम जगजाहिर है। पर उषा इस्पात समूह के 17 हजार करोड़ रुपए के कर्ज डकारने की पूरी दास्तान जानकर न केवल किसी के होश उड़ जाएंगे, बल्कि गुस्सा भी आएगा कि एक छोटा—सा कर्ज देने के लिए बैंक कितने चक्कर लगवाता है, दस्तावेज मांगता है। पर इन डिफॉल्टरों को कर्ज पर कर्ज देने में इन्हें कोई परेशानी नहीं आती है। सच तो यह है कि इन बड़े आदमी के आगे बैंकों की बोलती बंद हो जाती है। ऐसा तब है जबकि रिजर्व बैंक बताता है कि कृषि कर्ज में किसान कर्ज ही नहीं कृषि कारोबार कर्ज भी शामिल रहता है । 

नवंबर 2016 में वित्त राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने राज्यसभा में बताया कि सितंबर 2016 तक कुल कृषि कर्ज 12 लाख 60 करोड़ रुपए थे। इनमें से 7.75 लाख करोड़ के कृषि ऋ़ण थे और 4.84 लाख करोड़ रुपए के दीर्घकालिक कर्ज। उन्होंने यह भी साफ किया कि कृषि कल्याण कोष में किसानों की कर्ज अदायगी का कोई इरादा सरकार का नहीं है। कागज पर पिछले 15 सालों में कृषि कर्ज 8 गुना से ज्यादा बढ़े हैं, लेकिन उस अनुपात में किसानों खासकर छोटे, लघु और सीमांत किसानों के कर्ज नहीं बढ़े हैं। 

बजट भाषण में किसान 
किसानों के लिए 10 लाख करोड़ के कृषि कर्ज का लक्ष्य रखा गया है, जो लगभग बैंकों के संभावित कुल एनपीए के बराबर है। 

रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर मूलत: आधारित आर. राम कुमार और पल्लवी चौहान का शोधपत्र साफ बताता है कि बैंकिंग सेवा के भारी विस्तार और लक्ष्यों के बावजूद सीमांत किसानों की कर्ज निर्भरता सूदखोरों पर बढ़ी है। देश में 95 फीसदी सीमांत, लघु और छोटे किसान हैं जिनके पास एक, दो या पांच हेक्टेयर या उससे कम खेत हैं। देश की कुल कृषियोग्य भूमि का 68.7 फीसदी हिस्सा इन किसानों के पास है। इन किसानों के लिए अरसे से किसानी घाटे का सौदा बन गयी है। बाजार और मौसम की मार से उन्हें कोई कारगर सुरक्षा प्राप्त नहीं है। 


सरकार नहीं जानती किन पूंजीपतियों के कर्ज माफ हुए 
बैंकों ने बड़े कर्जदारों के 1.14 करोड़ रुपए के कर्ज तीन सालों 2013—2015 के कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिए। राजनीतिक बयानबाजी में इसे कर्जमाफी कहा जाता है। वित्त राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने राज्य सभा में बताया है कि 2015—2016 में भी 59 हजार 547 करोड़ रुपए बैंकों ने बट्टे खाते में डाले हैं। पर आश्चचर्य यह है कि जिन बड़े कर्जदारों के कर्ज बट्टे खाते में डाले गए हैं, इसकी जानकारी न रिजर्व बैंक के पास है न ही केंद्र सरकार के पास है। 

पिछले कुछ सालों में सवा 2 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। 2015 में 8 हजार 7 किसानों ने आत्महत्या की। यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे साफ जाहिर है कि देश में किसानों की आर्थिक हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। तमिलनाडु में सदी का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है। वहां के किसान 60 फीसदी सूद पर कर्ज लेने को मजबूर हैं, जबकि केंद्र सरकार का निर्देश किसानों को 7 फीसदी पर कर्ज देने का है। वहीं केरल में 115 साल बाद का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है, जिसके लिए केंद्र सरकार से 1000 करोड़ रुपए की मदद चाहिए। बैंकों ने पिछले 10—15 सालों में सवा 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा बट्टे खाते में डाल दिए हैं तो किसानों का कर्ज क्यों नहीं माफ किया जा सकता है। केंद्र सरकार को छोटे, सीमांत और लघु किसानों की कर्ज अदायगी के बारे में संजीदगी से सोचने का वक्त है। उत्तर प्रदेश में फसली ऋणों की घोषणा अपने भाषणों में कर सकते हैं, तो बाकि देश के किसानों ने क्या गुनाह किया है। 

एनपीए का नुकसान छोटे कर्जदारों और किसानों को 
बैंकों के एनपीए पिछले कुछ सालों से बेहिसाब बढ़े हैं। बढ़ते एनपीए से बैंकों की कर्ज देने की क्षमता कम होती है और कर्ज की ब्याज दरें अनावश्यक रूप से ज्यादा बनी रहती हैं। इसका असली खामियाजा छोटे बचतकर्ताओं और कर्जदारों को भुगतना पड़ता है। बैंक की भाषा में छोटे कर्जदारों को 'स्मॉल ब़रोअर' कहा जाता है। 1991 में शुरू हुए उदारीकृत अर्थव्यवस्था के दौर से छोटे कर्जदारों की हिस्सेदारी 63 फीसदी से घटकर 32 फीसदी रह गयी है। टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज के आर रामकुमार और पल्लवी चौहान के शोधपत्र में पुख्ता ढंग से यह बात सामने आयी है कि बैंकिंग उद्योग किसानों से दूर केवल बड़े लोगों और कारोबारियों का बन कर रह गया है। 

(राजेश रपरिया वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार हैं। यह लेख दैनिक भास्कर से साभार।)

Nov 18, 2016

प्रधानमंत्री मोदी को जो 55 करोड़ मिला, क्या वह कालाधन नहीं है?

सबूत पहुंचा जांच एजेंसियों के पास, पर सरकार समर्थित पत्रकारों ने साधा मौन, एक ही सवाल कि कौन बांधे बिल्ली की गले में घंटी

देश की प्रमुख पांच जांच एजेंसियों को स्वराज अभियान के अध्यक्ष और वकील प्रशांत भूषण ने भेजा पत्र, पर सभी जगह छायी है चुप्पी। सबूतों के आधार पर वकील का दावा कि पार्टी कोषाध्यक्ष और भाजपा मुख्यमंत्रियों को मिला है करोड़ों का कालाधन


प्रधानमंत्री मोदी जब 8 नवंबर को 500 और 1000 रुपए के नोट बंद करने की देश को सूचना दे रहे थे, उससे बहुत पहले सु्प्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण देश की प्रमुख आधा दर्जन से अधिक सरकारी जांच एजेंसियों को लिखकर बता चुके थे कि न सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ने ​बल्कि देश के अन्य तीन और मुख्यमंत्रियों ने करोड़ों का कैश उद्योगपतियों से वसूला है। प्रशांत भूषण ने जिन एजेंसियों को डाक्यूमेंट्स भेजे हैं, उनमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा कालेधन को लेकर बनाई गई दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम, निदेशक सीबीआई, निदेशक ईडी, निदेशक सीबीडीटी और निदेशक सीवीसी शामिल हैं।

मासिक अंग्रेजी पत्रिका कारवां में छपी रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार के इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की ओर से किए गए रेड के जो डाक्यूमेंट्स दिल्ली के पत्रकारों और नौकरशाहों के दायरे में घूम रहे हैं उनके मुताबिक, गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी को सुब्रत राय के सहारा इंडिया ग्रुप से जुड़े किसी 'जायसवाल जी' ने करोडों रुपए कैश में दिए।



पत्रिका को हाथ लगे डाक्यूमेंट्स से साफ है कि 30 अक्टूबर 2013 और 29 नवंबर 2013 को गुजरात सीएम, मोदी जी के नाम से 13 ट्रांजेक्शन हुए। इन ट्रांजेक्शन से पता चलता है कि 13 ट्रांजेक्शन में 55.2 करोड़ रुपए मोदी जी और गुजरात सीएम के नाम से दिए गए। हालांकि पत्रिका का यह भी मानना है कि यह बहुत साफ नहीं हो पा रहा है कि ट्रांजेक्शन 13 हुए या 9 ट्रांजेक्शन में 40.1 करोड़ रुपए जमा किए गए। 

इसके अलावा सहारा ग्रुप से जुड़े जायसवाल ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी करोड़ों के रुपए कैश में दिए। करोड़ों का कैश लेने वालों में भारतीय जनता पार्टी की कोषाध्यक्ष शायना एनसी भी शामिल हैं।

इस रिपार्ट का विस्तृत खुलासा करने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रणोंजॉय गुहा ठाकुरता का कहना है कि कारवां और इकॉ​नॉमिक एंड पॉलिटिकल ​वीकली पत्रिका ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से मिले सबूतों के आधार पर सभी नेताओं को सफाई के लिए ईमेल किया है। पर 17 नवंबर को किए गए ईमेल का जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी कोषाध्यक्ष शायना एनसी, छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री रमन सिंह, मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित में से किसी ने अबतक नहीं दिया है।

प्रधानमंत्री से लेकर तीन—तीन मुख्यमंत्रियों द्वारा कैश में करोडों का कालाधन लेने के इस मामले का खुलासा इनकम टैक्स की डिप्टी डाइरेक्टर अंकिता पांडेय ने किया था। इन कागजातों पर उनके अलावा भारत सरकार के दूसरे अधिकारियों के भी दस्तखत हैं। इस मामले में जब पत्रिका ने 3 नवंबर को संपर्क किया तो अंकिता पांडेय का जवाब था, 'मैं लंबी छुट्टी पर हूं और मैं वह आधिकारित व्यक्ति नहीं हूं जो डाक्यूमेंट्स की सत्यता को लेकर कोई बयान दे।' फिलहाल यह डाक्यूमेंट देश के तमाम पत्रकारों और सरकार अधिकारियों के पास है।


असल में कहानी है क्या

वेबसाइट 'जनता का रिपोर्टर' का दावा है कि अक्टूबर 2013 से नवम्बर 2014 में क्रमशः सहारा और आदित्य बिड़ला के ठिकानों पर इनकम टैक्स के छापे पड़े थे ।

यहां से आयकर अधिकारियों को दो महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले थे । जिनमें सरकारी पदों पर बैठे कई लोगों को पैसे देने का जिक्र था। इसमें प्रधानमंत्री मोदी का नाम भी शामिल था ।

बिड़ला के यहां से जब्त दस्तावेज में सीएम गुजरात के नाम के आगे 25 करोड़ रुपये लिखा गया था। इसमें 12 करोड़ दे दिया गया था । बाकी पैसे दिए जाने थे ।

इसी तरह से सहारा के ठिकानों से हासिल दस्तावेजों में लेनदारों की फेहरिस्त लम्बी थी । जिसमें सीएम एमपी, सीएम छत्तीसगढ़, सीएम दिल्ली और बीजेपी नेता सायना एनसी के अलावा मोदी जी का नाम भी शामिल था ।

मोदी जी को 30 अक्टूबर 2013 से 21 फ़रवरी 2014 के बीच 10 बार में 40.10 करोड़ रुपये की पेमेंट की गई थी । खास बात ये है कि तब तक मोदी जी बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके थे ।

सहारा डायरी की पेज संख्या 89 पर लिखा गया था कि 'मोदी' जी को 'जायसवाल जी' के जरिये अहमदाबाद में 8 पेमेंट किए गए ।

डायरी की पेज संख्या 90 पर भी इसी तरह के पेमेंट के बारे में लिखा गया है । बस अंतर केवल इतना है कि वहां 'मोदी जी' की जगह 'गुजरात सीएम' लिख दिया गया है, जबकि देने वाला शख्स जायसवाल ही थे।

मामला तब एकाएक नाटकीय मोड़ ले लिया जब इसकी जांच करने वाले के बी चौधरी को अचानक सीवीसी यानी सेंट्रल विजिलेंस कमीशन का चेयरमैन बना दिया गया । प्रशांत भूषण ने उनकी नियुक्ति को अदालत में चुनौती दी ।

इस साल 25 अक्टूबर को प्रशांत भूषण ने सीवीसी समेत ब्लैक मनी की जांच करने वाली एसआईटी को सहारा मामले का अपडेट जानने के लिए पत्र लिखा । ख़ास बात यह है कि उसी के दो दिन बाद यानी 27 अक्टूबर को दैनिक जागरण में 500-1000 की करेंसी को बंद कर 2000 के नोटों के छपने की खबर आयी । बताया जाता है कि के बी चौधरी ने वित्तमंत्री अरुण जेटली को इसके बारे में अलर्ट कर दिया था।

उसके बाद सहारा ने इनकम टैक्स विभाग के सेटलमेंट कमीशन में अर्जी देकर मामले के एकमुश्त निपटान की अपील की । जानकारों का कहना है कि कोई भी शख्स इसके जरिये जीवन में एक बार अपने इनकम टैक्स के मामले को हल कर सकता है । और यहां लिए गए फैसले को अदालत में चुनौती भी नहीं दी जा सकती है । साथ ही इससे जुड़े अपने दस्तावेज भी उसे मिल जाते हैं । जिसे वह नष्ट कर सकता है । अदालत या किसी दूसरी जगह जाने पर यह लाभ नहीं मिलता । चूंकि मामला पीएम से जुड़ा था इसलिए सहारा इसको प्राथमिकता के आधार पर ले रहा था ।

बताया जाता है कि सेटलमेंट कमीशन में भी मामला आखिरी दौर में था । भूषण ने 8 नवम्बर को फिर कमीशन को एक पत्र लिखा । जिसमें उन्होंने मामले का अपडेट पूछा था ।

शायद पीएम को आने वाले खतरे की आशंका हो गई थी । जिसमें उनके ऊपर सीधे-सीधे 2 मामलों में पैसे लेने के दस्तावेजी सबूत थे । उनके बाहर आने का मतलब था पूरी साख पर बट्टा । मामले का खुलासा हो उससे पहले ही उन्होंने ऐसा कोई कदम उठाने के बारे में सोचा जिसकी आंधी में यह सब कुछ उड़ जाए । नोटबंदी का फैसला उसी का नतीजा था ।

इसे अगले साल जनवरी-फ़रवरी तक लागू किया जाना था । लेकिन उससे पहले ही कर दिया गया । यही वजह है कि सब कुछ आनन-फानन में किया गया । न कोई तैयारी हुई और न ही उसका मौका मिला । यह भले ही 6 महीने पहले कहा जा रहा हो लेकिन ऐसा लगता है उर्जित पटेल के गवर्नर बनने के बाद ही हुआ है । क्योंकि नोटों पर हस्ताक्षर उन्हीं के हैं । छपाई से लेकर उसकी गुणवत्ता में कमी पूरी जल्दबाजी की तरफ इशारा कर रही है ।

Sep 17, 2016

आतंक के कुख्यात आरोपी के साथ अपने प्रधानमंत्री

जब तस्वीरों की राजनीति शुरू हो ही गयी है और उसी से तय होने लगा है कि कौन गलत है और कौन सही फिर इस बहस को मुकाम मिलना ही चाहिए। उसी मुकाम की ओर बढ़ते हुए जनज्वार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस तस्वीर को खोज लाया है जो आज के दिन बेहद प्रासंगिक है।

समझौता एक्सप्रेस, हैदाराबाद ब्लॉस्ट, मालेगांव व अजमेर दरगाह बम धमाकों के मुख्य आरोपी असीमानंद को कल एनआइए की विशेष अदालत ने जमानत दे दी है। ऐसे ही कुख्यात आतंकवादी के साथ प्रधानमंत्री मोदी की एक पुरानी तस्वीर है जिससे पता चलता है कि वह राजनीतिक जीवन में एक—दूसरे को जानते रहे होंगे। हालांकि असीमानंद की गिरफ्तारी के बाद आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी मनमोहन वैद्य ने प्रेस विज्ञप्ती जारी कर कहा था कि असीमानंद का उनके संगठन का कोई रिश्ता नहीं है।

पर अंग्रेजी पत्रिका कारवां में लीना रघुनाथ ने असीमानंद का जो साक्षात्कार किया था उसमें असीमानंद ने बताया था कि वह आरएसएस से लंबे समय से जुड़े हुए हैं और धमाकों की अनुमति संघ प्रमुख मोहन भागवत ने ही दी थी।

एनआइए अदालत द्वारा असीमानंद की जमानत मिलने के बाद सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि 67 लोगों के हत्या के आरोपी असीमानंद की रिहाई पर मीडिया कोई खबर क्यों नहीं ले रहा, क्या मीडिया के लिए यह खबर महत्वपूर्ण नहीं है।

समझौता बम धमाकों के तत्कालीन मुख्य जांचकर्ता रहे वीएन राय अपने फेसबुुक पर लिखते हैं क्या असीमानंद को जमानत देने वाली अदालत ने इस तथ्य पर गौर किया कि उसकी समझौता ब्लास्ट में वही भूमिका रही थी जो फांसी पर लटकाये गये याकूब मेमन की मुम्बई धमाकों में और अफजल गुरु की संसद हमले में ?

इनपुट — TRUTH OF GUJRAT -  फोटो - लाल घेरे में प्रधानमंत्री मोदी और आतंक का आरोपी असीमानंद

Aug 1, 2011

दारुल उलूम की विरासत और वस्तानवी

दारूल-उलूम की गिनती नि:संदेह देश के उस सर्वप्रमुख इस्लामी संस्थान में की जाती है जिसने कि 1947में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन का विरोध करते हुए अखंड भारत के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया था...

तनवीर जाफरी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देवबंद कस्बे में स्थित दारुल-उलूम देवबंद पूरी दुनिया में इस्लामी शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। दारुल-उलूम देवबंद में केवल भारत के ही नहीं बल्कि दुनिया के लगभग सभी देशों के मुसलमानों के वे बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं जिन्हें उच्चस्तरीय एवं गहन इस्लामी शिक्षा प्राप्त करने की ज़रूरत महसूस होती है।

 यहां एक बात पुन:स्पष्ट करना ज़रूरी है कि हालांकि देवबंद एक कस्बे का नाम ज़रूर है। परंतु दारुल उलूम के देवबंद में स्थित होने की वजह से इस मदरसे से शिक्षा प्राप्त कर चुके इस्लामी स्कॉलर्स अथवा इनकी विचारधारा से जुड़े लोगों को भी देवबंदी कहकर संबोधित किया जाने लगा है। अर्थात इस्लाम तथा मुसलमानों के बताए गए कुल 73 फिरक़ों में देवबंदी मुसलमान भी एक वर्ग विशेष से संबंध रखने वाले मुसलमान कहे जाते हैं।

 इसमें कोई शक नहीं कि दारुल-उलूम देवबंद ने भारत सहित पूरी दुनिया के लाखों मुसलमानों को धार्मिक शिक्षा से नवाज़ा है। पूरे विश्व में लाखों इमाम,  पेश इमाम, क़ारी, हाफिज़, धर्मगुरु, धर्म प्रचारक तथा इस्लामी शिक्षक,दारुल-उलूम से शिक्षा पाकर अन्यत्र धार्मिक सेवाएं करते तथा अपने व अपने परिवार का पालन-पोषण करते देखे जा सकते हैं।

दारूल-उलूम की गिनती नि:संदेह देश के उस सर्वप्रमुख इस्लामी संस्थान में की जाती है जिसने कि 1947 में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन का विरोध करते हुए अखंड भारत के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया था।वहीं दूसरी ओर इसी दारूल-उलूम पर कट्टरपंथी व रूढ़ीवादी इस्लामी शिक्षा देने तथा कट्टर इस्लामी स्कॉलर तैयार करने का भी इल्ज़ाम है। कहा तो यहां तक जाता है कि दुनिया में इस्लाम तथा जेहाद के नाम पर फैला आतंकवाद तथा इसमें शामिल गुमराह मुस्लिम युवक भी देवबंदी विचारधारा की धार्मिक शिक्षा से ही प्रभावित हैं।

दारूल-उलूम ने धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ तमाम ऐसे स्कॉलर भी तैयार किए जो देश की प्रशासनिक सेवाओं से लेकर अन्य उच्चस्तरीय सरकारी व गैर सरकारी सेवाओं में अपना योगदान देकर देश की सेवा में भी अपनी अहम भूमिका अदा कर रहे हैं।

कभी-कभी अपने कई विवादित फतवों को लेकर भी दारुल-उलूम सुर्ख़ियों  में छाया रहता है। साथ ही साथ इसी दारुल-उलूम से इस्लाम के नाम पर फैले आतंकवाद के विरुद्ध भी विस्तृत फतवा जारी किया जा चुका है। भले ही पूरे देश व दुनिया के सभी मुसलमान अथवा सभी फिरकों के मुसलमान दारुल-उलूम की विचारधारा तथा उनके द्वारा दी जाने वाली इस्लामी शिक्षा से सहमति न रखते हों।

परंतु दुनिया के विशेषकर भारत के देवबंदी विचारधारा के मुसलमानों की बड़ी संख्या दारूल-उलूम के फतवों, दिशा निर्देशों तथा वहां चलने वाली धर्म संबंधी गतिविधियों से प्रभावित होती है। पिछले दिनों दारुल-उलूम देवबंद एक बार फिर उस समय पूरे देश के मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रहा जबकि इस विश्वविद्यालय की संचालन समिति जिसे शूरा के नाम से जाना जाता है,ने अपने ही वाईस चांसलर मौलाना गुलाम वस्तानवी को उनके पद से हटा दिया।शूरा के कुल 14 सदस्यों में से 9 सदस्यों ने वस्तानवी को हटाए जाने के पक्ष में अपना मत दिया। जबकि 5 सदस्य ऐसे भी थे जिन्होंने गुलाम वस्तानवी को कुलपति के पद पर बने रहने के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया।

 गुजरात मूल के मौलाना गुलाम वस्तानवी को अभी कुछ ही माह पूर्व दारूल-उलूम देवबंद का वाईस चांसलर नियुक्त किया गया था। अपनी नियुक्ति के फौरन बाद ही मौलाना वस्तानवी ने गुजरात के अति विवादित मुख्यमंत्री तथा गुजरात दंगों में हुए भीषण नरसंहार के लिए जि़म्मेदार समझे जाने वाले नरेंद्र मोदी की तारीफ में क़सीदे पढऩे शुरु कर दिए। इतना ही नहीं बल्कि वस्तानवी ने कुछ इस प्रकार का इज़हार-ए-ख्याल भी किया कि मुसलमानों को अब गुजरात दंगों से आगे भी देखना चाहिए।

उनकी बातों से ऐसा अंदाज़ा लगाया जाने लगा था कि मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार के जि़म्मेदार समझे जाने वाले नरेंद्र मोदी को वे क्लीन चिट देना चाह रहे हैं तथा मुसलमानों से भी यह उम्मीद कर रहे हैं कि वे भी गुजरात दंगों को भूलकर गुजरात,देश तथा अपने समुदाय के विकास में शरीक हों। वस्तानवी के इस प्रकार के विवादित वक्तव्य के बाद दारूल-उलूम की मजलिस-ए-शूरा में,देवबंद से जुड़े लोगों में तथा विशेषकर मीडिया में ज़बरदस्त हंगामा खड़ा हो गया और वस्तानवी को फौरन बर्खास्त किए जाने की मांग उठने लगी।

वस्तानवी का मामला शूरा को सौंप दिया गया जिसने गत् दिनों आखिरकार  उन्हें अपदस्थ किए जाने के पक्ष में बहुमत से अपना फैसला सुनाया। मौलाना वस्तानवी के पद छोड़े जाने के बाद अब इस मुद्दे को लेकर देश में कई प्रकार के राजनैतिक समीकरण बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। स्वयं मौलाना वस्तानवी इस मुद्दे को गुजराती व गैर गुजराती मुसलमानों के बीच के विवाद के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। वे आरोप लगा रहे हैं कि दारूल-उलूम पर उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों का दबदबा है और एक गुजराती व्यक्ति को पहली बार दारुल-उलूम का वाईस चांसलर होते हुए नहीं देख सके। 

 शूरा के सभी सदस्य वस्तानवी के इन आरोपों का खंडन कर रहे है. वस्तानवी के यह आरोप वैसे भी निराधर इसलिए प्रतीत होते हैं क्योंकि शूरा के जिन 5सदस्यों ने वस्तानवी के पक्ष में मतदान किया उनमें भी अधिकांश सदस्य उत्तर प्रदेश व बिहार के ही थे। राजनैतिक क्षेत्रों में इस बात की चर्चा है कि वस्तानवी अपने साथ हुए घटनाक्रम को गुजराती मुसलमानों का अपमान उसी तर्ज पर साबित करना चाह रहे हैं जैसे कि नरेंद्र मोदी स्वयं अपने ऊपर लगने वाले किसी आरोप को फौरन गुजराती समाज या गुजरातियों का अपमान बताने लगते हैं।

वस्तानवी वास्तव में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा के भी ज़बरदस्त पैरोकार हैं। वस्तानवी अपने निजी प्रयासों से गुजरात से लेकर महाराष्ट्र तक तमाम स्कूल,कॉलेज,महिला शिक्षा संस्थान,बी एड कॉलेज,आयुर्वैदिक संस्थान,आईटीआई,कई पुस्तकालय तथा जामिया अक्कलकुआ के नाम से एक विश्वविधालय स्तरीय संस्थान संचालित कर रहे हैं। जहां कुरान शरीफ की तालीम देने के लिए मौलाना ने सैकड़ों मदरसे स्थापित किए हैं उन्होंने कई मदरसों की सहायता भी की है। वे स्वयं भी विश्व का सबसे बड़ा कुरानी शिक्षा केंद्र चला रहे हैं।

गुलाम वस्तानवी जैसे शिक्षा उद्योग से जुड़े एक धनपति व्यक्ति के लिए दारूल-उलूम का कुलपति बनना या न बनना अथवा उस पद पर बने रहना या हट जाना कोई खास मायने नहीं रखता। परंतु इस पूरे प्रकरण में जिस प्रकार गुजरात दंगों,नरेंद्र मोदी, गुजरात राज्य के मुसलमानों,उत्तरप्रदेश-बिहार के दारुल-उलूम पर वर्चस्व तथा विशेषकर एक परिवार विशेष के दारूल-उलूम का वर्चस्व होने तथा मुसलमानों से गुजरात से आगे बढऩे की बात करने जैसी जो बातें जोड़ी जा रही हैं उनसे साफ ज़ाहिर हो रहा है कि राजनीति के महारथी लोग वस्तानवी प्रकरण को राजनीति का हथियार बनाना चाह रहे हैं।

जहां तक गुजरात से आगे की सोचने का प्रश्र है तो बेशक वस्तानवी का यह कहना सही है,परंतु इस विषय पर निर्णय करने का अधिकार भी कम से कम उन्हीं लोगों को पहले दिया जाना चाहिए जो स्वयं भुक्तभोगी हैं तथा आज तक गुजरात दंगों का दंश वे व उनके परिजन झेल रहे हैं। वस्तानवी अथवा किसी अन्य मुसलिम रहनुमा अथवा धर्मगुरु के आह्वान मात्र से ऐसा नहीं होने वाला। 


लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के टिप्पणीकार.





                                                                                    

Jun 18, 2011

मीडिया के सुशासन पर सवारी गांठते नीतीश कुमार


नीतीश सरकार ने बिहार के ज़्यादातर मीडिया संस्थानों की आर्थिक नब्ज दबा रखी है। राज्य सरकार से मिले कागज़ के टुकडे यह बताते हैं कि सरकार काम पर कम, विज्ञापन पर ज्यादा ध्यान देती है...

अफरोज आलम 'साहिल'

अख़बारों को देख यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि बिहार खूब तरक़्क़ी कर रहा है। हर दिन विकास की नयी-नयी योजनाओं की घोषणाएं हो रही हैं। विकास कार्यों के विज्ञापन अखबारों में खूब छप रहे हैं। हर दिन किसी न किसी काम का शिलान्यास हो रहा है। इसके लिए बधाई के पात्र हैं हमारे ‘सुशासन बाबू’ यानी नीतीश कुमार जी। लेकिन विकास की जो तस्वीर मीडिया ने बिहार और देश की जनता के सामने पेश की है, वो  ‘सच’ नहीं है। बल्कि नीतीश कुमार का सच तो कुछ और है,जिसे पूरे देश की जनता ने 3 जून को बिहार के अररिया जिले के फारबिसगंज गोलीकांड में देख लिया  है।

फारबिसगंज पुलिस गोलीकांड की घटना को दो सप्ताह से अधिक का समय बीत  चुका है, लेकिन दोषियों पर कोई करवाई नहीं हुई है। प्रदर्शनकारियों का कसूर  इतना भर था कि ये भजनपुर गांव के पास स्टार्च और ग्लूकोज फैक्ट्री स्थापित करने के लिए प्राईवेट कंपनी मैसर्स औरो सुन्दरम इंटरनेशनल के लिए सरकार द्वारा 36.65 एकड़ आवंटित जमीन के रास्ते से होकर आने-जाने का अधिकार मांग रहे थे। जमीन आवंटित किये जाने के पहले लोग यहीं से होकर जाते थे, जो उन्हें  ईदगाह, करबला और बाज़ार तक पहुंचाता था। लेकिन अब इस रास्ते को रोक दिया गया है. सरकार रोक इसलिए लगा रही है क्योंकि  यह कंपनी भाजपा एम.एल.सी.अशोक अग्रवाल के बेटे सौरभ अग्रवाल की है और सौरभ की शादी प्रदेश के  उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की बेटी से होने वाली है.

उस दिन 3 जून को हुए पुलिसिया जुल्म की दास्तान यह रही कि फारबिसगंज   में जमीन पर बेसुध पड़े एक प्रदर्शनकारी युवक को एक  पुलिसवाला जूतों से कुचलता  रहा और मौके पर मौजूद एसपी गरिमा मलिक तमाशाबीन बनी रहीं । बाद में उस युवक की मौत हो गयी। सिर्फ यह युवक ही नहीं,बल्कि मृतकों में एक गर्भवती महिला और छह महीने की एक बच्ची भी शामिल है। पुलिस ने न केवल प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई,बल्कि उनका उनके घरों तक पीछा करके उन्हें पॉइंट ब्लैंक रेंज में गोली मारी। इस घटना में नौ लोग घायल भी हुए हैं। गौरतलब है की सभी मृतक मुस्लिम समुदाय से हैं।

फारबिसगंज की घटना नीतीश के लिए बहुत बड़ा सवाल है,जिसका जवाब उनको देना ही पड़ेगा। और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार गुजरात की तर्ज पर बिहार का विकास चाहते हैं? अगर हां!  तो नीतीश कुमार कान खोलकर सुन लें बिहार की जनता इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। बिहार की जनता को ऐसा विकास कतई नहीं चाहिए जो मानवअधिकारों के उल्लंघन पर आधारित हो।

ऐसा नहीं है कि फारबिसगंज की घटना बिहार के लिए नई है। पिछले एक साल में ही राज्य में किसान कई बार पुलिस का शिकार बने हैं। पटना जिले के बिहटा,औरंगाबाद के नबीनगर और मुजफ्फरपुर के मड़वन इलाके में फोर-लेन सड़क, थर्मल पावर प्लांट और एस्बेस्टस फैक्ट्री का विरोध करने पर किसानों पर पुलिस का कहर बरपना इसके कुछ उदाहरण भर हैं। औरंगाबाद में तो किसान मारे भी गये थे।

इसके अलावा पिछले छह सालों के दौरान अन्य कई मौकों पर भी पुलिस बर्बर कारवाइयों को अंजाम दे चुकी है। कहलगांव में वर्ष 2008 के जनवरी महीने में नियमित बिजली की मांग कर रहे लोगों में से तीन शहरी पुलिस की गोलियों के शिकार हुए थे। वर्ष 2007में भागलपुर में चोरी के आरोपी औरंगजेब का 'स्पीडी ट्रायल' करते हुए एक पुलिस अधिकारी ने उसे अपने मोटरसाइकिल के पीछे बांधकर घसीटा था। कोसी इलाके में उचित मुआवजा और पुनर्वास की मांग करने वाले बाढ़-प्रभावित भी पुलिस की गोली का निशाना बने।

यह सब कुछ हुआ है नीतीश के 'सुशासन' में बिहार के विकास के नाम पर। जब बात सुशासन और विकास की चल रही है,तो क्यों न उनके विकास की कुछ सच्चाइयों के आंकड़ों को भी प्रस्तुत कर दिया जाए। जिस विकास की गंगा से राज्य को सींचने का दावा नीतीश कुमार कर रहे हैं, उसमें केन्द्र का पानी कितना है और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का कितना? यह जानना दिलचस्प होगा।

यह सरकारी सच है कि नीतीश कुमार को राज्य में विकास और योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए केन्द्र से पिछली सरकारों से ज़्यादा पैसा मिला है। सरकारी कागज़ों में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शासनकाल में वर्ष 2003-04 में राज्य सरकार को 1617.62 करोड़ रुपये मिले थे। इसके बाद सरकार बदली और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए-1 और यूपीए-2 सत्ता में आई। यूपीए सरकार ने वर्ष 2005-06 में बिहार को 3332.72 करोड़ रूपये दिए। यह राशि एनडीए के समय के अनुदान से दोगुनी थी। वित्तीय वर्ष 2006-07 में 5247.10 करोड़, वर्ष 2007-08 में 5831.66 करोड़ और फिर वित्तीय वर्ष 2008-09 के लिए केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को 7962 करोड़ रुपये का अनुदान दिया। यहां स्पष्ट कर दें कि यह सहायता राशि है,इसमें राज्य सरकार को केन्द्र से मिलने वाला कर्ज या अग्रिम अनुदान शामिल नहीं है।

इतना ही नहीं, बिहार सरकार को विश्वबैंक से मिल रहे अनुदान में भी कई गुना की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2006-07 में विश्वबैंक से उसे 92 लाख मिले। इसमें से 60 लाख लाख खर्च भी हुए। वर्ष 2007-08 में यह राशि बढ़कर 464 करोड़ हो गई। जिसमे से खर्च सिर्फ छह करोड़ हो पाए। वर्ष 2008-09 में 18 करोड़, वर्ष 2009-10 में 552 करोड़ रुपये और पिछले वित्तीय वर्ष में 15 अगस्त, 2010 तक नीतीश सरकार को विश्वबैंक 74 करोड़ रुपये दे चुका है।

नीतीश सरकार ने बिहार के ज़्यादातर मीडिया संस्थानों की आर्थिक नब्ज दबा रखी है। इसके लिए जरिया बनाया गया है सरकारी विज्ञापनों को। क्योंकि राज्य सरकार से मिले कागज़ के टुकडे यह बताते हैं कि वर्तमान राज्य सरकार का काम पर कम और विज्ञापन पर ज़्यादा ध्यान रहा है। बिहार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा वर्ष 2005-10 के दौरान 28फरवरी 2010 तक यानी नीतीश के कार्यकाल के चार सालों में लगभग 38हज़ार अलग-अलग कार्यों के विज्ञापन जारी किए गए और इस कार्य के लिए विभाग ने 64.48 करोड़ रुपये खर्च किये। जबकि लालू-राबड़ी सरकार ने अपने कार्यकाल के 6 सालों में सिर्फ 23.90 करोड़ ही खर्च किए थे। सिर्फ वर्ष 2009-10 में नीतीश सरकार ने योजना मद में विज्ञापनों पर 1.69करोड़ रूपये खर्च किए, वहीं गैर-योजना मद में यह राशि 32.90 करोड़ है। पिछले वित्तीय वर्ष यानी 2010-11 के शुरुआती तीन महीनों में ही यानी चुनाव से ठीक पहले राज्य सरकार समेकित रूप से 7.19 करोड़ विज्ञापनों पर खर्च कर चुकी थी।

ज़ाहिर है कि नीतीश के कार्यकाल में सबसे ज़्यादा फायदा यहां के मीडिया उद्योग को हुआ है, इसलिए वो ‘विकास’ के पीछे के सच को जनता के सामने लाना मुनासिब नहीं समझते। मीडिया को इस बात का डर है कि अगर इन सच्चाइयों पर से पर्दा उठा दिया तो सरकारी विज्ञापनों से हाथ धोना पड़ सकता है (क्योंकि राज्य विज्ञापन नीति, स्टेट एडवर्टिजमेंट पॉलिसी- 2008 के तहत अगर किसी मीडिया संस्थान का काम राज्य हित में नहीं है तो उसे दिये जा रहे विज्ञापन रोके जा सकते हैं। उसे स्वीकृत सूची से किसी भी वक़्त बाहर किया जा सकता है।)। ऐसे में न्यूज़ की बात तो छोड़ ही दें,अगर किसी ने एक लेख भी बिहार सरकार के खिलाफ लिखा तो अगले ही दिन उस लेखक को मुख्यमंत्री कार्यालय बुला लिया जाता है।

नीतीश कुमार के झांसे में अल्पसंख्यक भी आये। जिन पैसों को अल्पसंख्यक छात्रों के बीच स्कॉलरशिप के रूप में बांटकर उन्होंने अपनी पीठ थपथपाई,दरअसल वह पैसा केन्द्र की यूपीए सरकार ने अपनी स्कीम के तहत उपलब्ध कराया था। बिहार सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के मुताबिक बिहार में वर्ष 2007-08के दौरान कुल 3,72,81,738 रुपये मेधा-सह-आय आधारित योजना के अन्तर्गत अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं के बीच केन्द्र सरकार ने बांटे, न कि बिहार सरकार ने। 15 अगस्त 2008 को नीतीश कुमार ने मुस्लिम गरीब बच्चों के लिए ‘तालीमी मरकज़’ खोलने का ऐलान किया, लेकिन जब बिहार सरकार से सूचना अधिकार कानून के तहत यह पूछा गया कि अब तक कितने ‘तालीमी मरकज़’पूरे बिहार में खोले गए हैं, तो उसने इस संबंध में कोई जानकारी देना मुनासिब नहीं समझा।

जो नीतीश कुमार मुसलमानों के दम पर दुबारा बहुमत के साथ सत्ता में आए, वही भागलपुर दंगे की जांच को लेकर टालमटोलपूर्ण रवैया अपना रहे हैं। सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के मुताबिक नीतीश सरकार ने जस्टिस एनएन सिंह की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया, जिसे छह माह के भीतर अपनी रिपोर्ट देनी थी, लेकिन यह आयोग छह माह तो क्या, सरकार के पूरे कार्यकाल में भी वह काम नहीं कर सका,जिसके लिए ढोल पीटकर इसका गठन जनवरी 2006 में हुआ था। जबकि इस जांच आयोग के सदस्यों की सैलरी पर ही अक्तूबर 2009 तक 1,44,83,000 रूपये खर्च किए जा चुके हैं।

सूचना के अधिकार से मिले आंकड़े बताते हैं कि नीतीश सरकार को अल्पसंख्यक मद में खूब पैसे मिले,लेकिन अपने को अल्पसंख्यकों का मसीहा कहने वाली इस सरकार ने यह पैसा अल्पसंख्यकों पर खर्च करना मुनासिब नहीं समझा।  



सूचना अधिकार कार्यकर्त्ता से पत्रकारिता तक की यात्रा करने वाले अफरोज अंग्रेजी वेबसाइट www.beyondheadlines.in के संपादक हैं .