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Jul 1, 2017

ऐसे 'बहादुर’, 'चरित्रवान’ और 'देशभक्त’ थे गांधी के हत्यारे



नाथूराम एक टपोरी किस्म का व्यक्ति था जिसे कतिपय हिंदू उग्रवादियों ने गांधी की हत्या के लिए भाडे पर रखा हुआ था। जेल में उसकी चिकित्सा रपटों से पता चलता है कि उसका मस्तिष्क अधसीसी के रोग से ग्रस्त था...
अनिल जैन, वरिष्ठ पत्रकार
महात्मा गांधी के हत्यारे गिरोह के सरगना नाथूराम गोडसे को महिमामंडित करने के जो प्रयास इन दिनों किए जा रहे हैं, वे नए नहीं हैं। गोडसे का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बताया जाता रहा है और इसीलिए गांधीजी की हत्या के बाद देश के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था।

हालांकि संघ गोडसे से अपने संबंधों को हमेशा नकारता रहा है और अपनी इस सफाई को पुख्ता करने के लिए वह गोडसे को गांधी का हत्यारा भी मानता है और उसके कृत्य को निंदनीय करार भी देता है। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के सत्तारूढ होने के बाद ही गोडसे को महिमामंडित करने का सिलसिला तेज हो गया?
इस सिलसिले में एकाएक उसका मंदिर बनाने के प्रयास शुरू हो गए। उसकी 'जयंती’ और 'पुण्यतिथि’ मनाई जाने लगी। उसे 'चिंतक’ और यहां तक कि 'स्वतंत्रता सेनानी’ और 'शहीद’ भी बताया जाने लगा। सवाल है कि तीन साल पहले केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के साथ ही गोडसे भक्तों के इस पूरे उपक्रम के शुरू होने को क्या महज संयोग माना जाए या कि यह सबकुछ किसी सुविचारित योजना के तहत हो रहा है?
गांधी के जिस हत्यारे को इस तरह महिमामंडित किया जा रहा है, उसके बारे में यह जानना दिलचस्प है कि वह गांधी की हत्या से पहले तक क्या था? क्या वह चिंतक था, ख्याति प्राप्त राजनेता था, हिंदू महासभा का जिम्मेदार पदाधिकारी या स्वतंत्रता सेनानी था?
दरअसल नाथूराम गोडसे कभी भी इतनी ऊचाइयों के दूर-दूर तक भी नहीं पहुंच पाया था। पुणे शहर के उसके मोहल्ले सदाशिव पेठ के बाहर उसे कोई नहीं जानता था, जबकि तब वह चालीस वर्ष की आयु के समीप था। नाथूराम स्कूल से भागा हुआ छात्र था। नूतन मराठी विद्यालय में मिडिल की परीक्षा में फेल हो जाने पर उसने पढ़ाई छोड दी थी। उसका मराठी भाषा का ज्ञान कामचलाऊ था। अंग्रेजी का ज्ञान होने का तो सवाल ही नहीं उठता।
उसके पिता विनायक गोडसे डाकखाने में बाबू थे, जिनकी मासिक आय पांच रुपए थी। नाथूराम अपने पिता का लाडला था क्योंकि उसके पहले जन्मे उनके सभी पुत्र मर गए थे। इसीलिए अंधविश्वास के वशीभूत होकर मां ने नाथूराम की परवरिश बेटी की तरह की। उसे नाक में नथ पहनाई जिससे उसका नाम नाथूराम हो गया। उसकी आदतें और हरकतें भी लडकियों जैसी हो गई।
नाथूराम के बाद उसके माता-पिता को तीन और पुत्र पैदा हुए थे जिनमें एक था गोपाल, जो नाथूराम के साथ गांधी-हत्या में सह अभियुक्त था। नाथूराम की युवावस्था किसी खास घटना अथवा विचार के लिए नहीं जानी जाती। उस समय उसके हमउम्र लोग भारत में क्रांति का अलख जगा रहे थे, जेल जा रहे थे, शहीद हो रहे थे। स्वाधीनता संग्राम की इस हलचल से नाथूराम का जरा भी सरोकार नहीं था।
अपने नगर पुणे में वह रोजी-रोटी के ही जुगाड में लगा रहता था। इस सिलसिले में उसने सांगली शहर में दर्जी की दुकान खोल ली थी। उसके पहले वह बढ़ई का काम भी कर चुका था और फलों का ठेला भी लगा चुका था।
पुणे में मई 191० में जन्मे नाथूराम के जीवन की पहली खास घटना थी सितम्बर 1944 में जब हिंदू महासभा के नेता लक्ष्मण गणेश थट्टे ने सेवाग्राम में धरना दिया था। उस समय महात्मा गांधी भारत के विभाजन को रोकने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना से वार्ता करने मुंबई जाने वाले थे। चौतीस वर्षीय नाथूराम थट्टे के सहयोगी प्रदर्शनकारियों में शरीक था। उसका इरादा खंजर से बापू पर हमला करने का था, लेकिन आश्रमवासियों ने उसे पकड लिया था।
उसके जीवन की दूसरी बडी घटना थी एक वर्ष बाद यानी 1945 की, जब ब्रिटिश वायसराय ने भारत की स्वतंत्रता पर चर्चा के लिए राजनेताओं को शिमला आमंत्रित किया था। तब नाथूराम पुणे की किसी अनजान पत्रिका के संवाददाता के रूप मे वहां उपस्थित था।
गांधीजी की हत्या के बाद जब नाथूराम के पुणे स्थित आवास तथा मुंबई में उसके के घर पर छापे पडे थे तो मारक अस्त्रों का भंडार पकडा गया था जिसे उसने हैदराबाद के निजाम पर हमला करने के नाम पर बटोरा था। यह अलग बात है कि इन असलहों का उपयोग कभी नहीं किया गया। मुंबई और पुणे के व्यापारियों से अपने हिंदू राष्ट्र संगठन के नाम पर नाथूराम ने बेशुमार पैसा जुटाया था जिसका उसने कभी कोई लेखा-जोखा किसी को नहीं दिया।
उपरोक्त सभी तथ्यों का बारीकी से परीक्षण करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि अत्यंत कम पढा-लिखा नाथूराम एक टपोरी किस्म का व्यक्ति था जिसे कतिपय हिंदू उग्रवादियों ने गांधी की हत्या के लिए भाडे पर रखा हुआ था। जेल में उसकी चिकित्सा रपटों से पता चलता है कि उसका मस्तिष्क अधसीसी के रोग से ग्रस्त था। यह अडतीस वर्षीय बेरोजगार, अविवाहित और दिमागी बीमारी से त्रस्त नाथूराम किसी भी मायने में सामान्य मन:स्थिति वाला व्यक्ति नहीं था।
उसने गांधीजी की हत्या का पहला प्रयास 2०जनवरी, 1948 को किया था। अपने सहयोगी मदनलाल पाहवा के साथ मिलकर नई दिल्ली के बिडला भवन पर बम फेंका था, जहां गांधीजी दैनिक प्रार्थना सभा कर रहे थे। बम का निशाना चूक गया था। पाहवा पकड़ा गया था, मगर नाथूराम भागने में सफल होकर मुंबई में छिप गया था।
दस दिन बाद वह अपने अधूरे काम को पूरा करने करने के लिए फिर दिल्ली आया था। नाथूराम को उसके प्रशंसक एक धर्मनिष्ठ हिंदू के तौर पर भी प्रचारित करते रहे हैं लेकिन तीस जनवरी की ही शाम की एक घटना से साबित होता कि नाथूराम कैसा और कितना धर्मनिष्ठ था। गांधीजी पर पर तीन गोलियां दागने के पूर्व वह उनका रास्ता रोककर खडा हो गया था।
पोती मनु ने नाथूराम से एक तरफ हटने का आग्रह किया था क्योंकि गांधीजी को प्रार्थना के लिए देरी हो गई थी। धक्का-मुक्की में मनु के हाथ से पूजा वाली माला और आश्रम भजनावाली जमीन पर गिर गई थी। लेकिन नाथूराम उसे रौंदता हुआ ही आगे बढ गया था 2०वीं सदी का जघन्यतम अपराध करने।
जो लोग नाथूराम गोडसे से जरा भी सहानुभूति रखते हैं उन्हें इस निष्ठुर हत्यारे के बारे में एक और प्रमाणित तथ्य पर गौर करना चाहिए। गांधीजी को मारने के दो सप्ताह पहले नाथूराम ने काफी बडी राशि का अपने जीवन के लिए बीमा करवा लिया था ताकि उसके पकडे और मारे जाने पर उसका परिवार आर्थिक रूप से लाभान्वित हो सके।
एक कथित ऐतिहासिक मिशन को लेकर चलने वाला व्यक्ति बीमा कंपनी से हर्जाना कमाना चाहता था। अदालत में मृत्युदंड से बचने के लिए नाथूराम के वकील ने दो चश्मदीद गवाहों के बयानों में विरोधाभास का सहारा लिया था। उनमें से एक ने कहा था कि पिस्तौल से धुआं नहीं निकला था। दूसरे ने कहा था कि गोलियां दगी थी और धुआं निकला था। नाथूराम के वकील ने दलील दी थी कि धुआं नाथूराम की पिस्तौल से नहीं निकला, अत: हत्या किसी और की पिस्तौल से हो सकती है। माजरा कुछ मुंबइयां फिल्मों जैसा रचने का एक भौंडा प्रयास था। मकसद था कि नाथूराम संदेह का लाभ पाकर छूट जाए।
नाथूराम का मकसद कितना पैशाचिक रहा होगा, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि गांधीजी की हत्या के बाद पकडे जाने पर खाकी निकर पहने नाथूराम ने अपने को मुसलमान बताने की कोशिश की थी। इसके पीछे उसका मकसद देशवासियों के रोष का निशाना मुसलमानों को बनाना और उनके खिलाफ हिंसा भडकाना था।
ठीक उसी तरह जैसे इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के साथ हुआ था। पता नहीं किन कारणों से राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हत्यारे के नाम का उल्लेख नहीं किया लेकिन उनके संबोधन के तुरंत बाद गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने आकाशवाणी भवन जाकर रेडियो पर देशवासियों को बताया कि बापू का हत्यारा एक हिंदू है। ऐसा करके सरदार पटेल ने मुसलमानों को अकारण ही देशवासियों का कोपभाजन बनने से बचा लिया।
कोई भी सच्चा क्रांतिकारी या आंदोलनकारी जेल में अपने लिए सुविधाओं की मांग नहीं करता है। लेकिन नाथूराम ने गांधीजी को मारने के बाद अंबाला जेल के भीतर भी अपने लिए सुविधाओं की मांग की थी, जिसका कि वह किसी भी तरह से हकदार नहीं था। वैसे भी उसे स्नातक या पर्याप्त शिक्षित न होने के कारण पंजाब जेल नियमावली के मुताबिक साधारण कैदी की तरह ही रखा जाना था।
नाथूराम और उसके सह अभियुक्तों की देशभक्ति के पाखंड की एक और बानगी देखिए: वह आजाद भारत का बाशिंदा था और उसे भारतीय कानून के तहत ही उसके अपराध के लिए मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। फिर भी उसने अपने मृत्युदंड के फैसले के खिलाफ लंदन की प्रिवी कांउसिल में अपील की थी। उसका अंग्रेज वकील था जान मेगा। अंग्रेज जजों ने उसकी अपील को खारिज कर दिया था। गांधीजी की हत्या का षडयंत्र रचने में नाथूराम का भाई गोपाल गोडसे भी शामिल था, जो अदालत में जिरह के दौरान खुद को गांधी-हत्या की योजना से अनजान और बेगुनाह बताता रहा।
अदालत ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। गोपाल जेल में हर साल गांधी जयंती के कार्यक्रम में बढ-चढकर शिरकत करता था। ऐसा वह प्रायश्चित के तौर पर नहीं बल्कि अपनी सजा की अवधि में छूट पाने के लिए करता था, क्योंकि जेल के नियमों के मुताबिक ऐसा करने पर सजा की अवधि में छूट मिलती है। तो इस तरह गोपाल गोडसे अपनी सजा की पूरी अवधि के पहले ही रिहाई पा गया था।
महात्मा गांधी को मुस्लिम परस्त मानने वाले इस तथाकथित हिंदू ह्दय सम्राट के पुणे में सदाशिव पेठ स्थित घर का नंबर 786 था जिसके मायने होते हैं : बिस्मिल्लाहिर रहमानिर्रहीम। सदाशिव पेठ में वह अक्सर गुर्राता था कि उसका भाई नाथूराम शहीद है। वह खुद को भी एक राष्ट्रभक्त आंदोलनकारी बताता था और बेझिझक कहा करता था कि एक अधनंगे और कमजोर बूढे की हत्या पर उसे कोई पश्चाताप अथवा अफसोस नहीं है।
नाथूराम के साथ जिस दूसरे अभियुक्त को फांसी दी गई थी वह था नारायण आप्टे। नाथूराम का सबसे घनिष्ठ दोस्त और सहधर्मी। ब्रिटिश वायुसेना में नौकरी कर चुका आप्टे पहले पहले गणित का अध्यापक था और उसने अपनी एक ईसाई छात्रा मनोरमा सालवी को कुंवारी माँ बनाने का दुष्कर्म किया था। हालांकि उसकी पत्नी और एक विकलांग पुत्र भी था। शराबप्रेमी आप्टे ने गांधी हत्या से एक दिन पूर्व यानी 29 जनवरी, 1948 की रात पुरानी दिल्ली के एक वेश्यालय में गुजारी थी और उस रात को उसने अपने जीवन की यादगार रात बताया था। यह तथ्य उससे संबंधित अदालती दस्तावेजों में दर्ज है।
गांधी हत्याकांड का चौथा अभियुक्त विष्णु रामकृष्ण करकरे हथियारों का तस्कर था। उसने अनाथालय में परवरिश पाई थी। गोडसे से उसका परिचय हिंदू महासभा के कार्यालय में हुआ था। एक अन्य अभियुक्त दिगम्बर रामचंद्र बडगे जो सरकारी गवाह बना और क्षमा पा गया, पुणे में शस्त्र भण्डार नामक दुकान चलाता था। नाटे, सांवले और भेंगी आंखों बडगे ने अपनी गवाही में विनायक दामोदर सावरकर को हत्या की साजिश का सूत्रधार बताया था लेकिन पर्याप्त सबूतों के अभाव में सावरकर बरी हो गए थे।
इन दिनों कुछ सिरफिरे और अज्ञानी लोग योजनाबद्ध तरीके से नाथूराम गोडसे को उच्चकोटि का चिंतक, देशभक्त और अदम्य नैतिक ऊर्जा से भरा व्यक्ति प्रचारित करने में जुटे हुए हैं। यह प्रचार सोशल मीडिया के माध्यम से चलाया जा रहा है। उनके इस प्रचार का आधार नाथूराम का वह दस पृष्ठीय वक्तव्य है जो बडे ही युक्तिसंगत, भावुक और ओजस्वी शब्दों में तैयार किया गया था और जिसे नाथूराम ने अदालत में पढा था। इस वक्तव्य में उसने बताया था कि उसने गांधीजी को क्यों मारा। कई तरह के झूठ से भरे इस वक्तव्य में दो बडे और हास्यास्पद झूठ थे।
एक यह कि गांधीजी गोहत्या का विरोध नहीं करते थे और दूसरा यह कि वे राष्ट्रभाषा के नहीं, अंग्रेजी के पक्षधर थे। दरअसल, यह वक्तव्य खुद गोडसे का तैयार किया हुआ नहीं था। वह कर भी नहीं सकता था, क्योंकि न तो उसे मराठी का भलीभांति ज्ञान था, न ही हिंदी का, अंग्रेजी का तो बिल्कुल भी नहीं।
अलबत्ता उस समय दिल्ली में ऐसे कई हिंदूवादी थे जिनका हिंदी और अंग्रेजी पर समान अधिकार और प्रवाहमयी शैली का अच्छा अभ्यास था। इसके अलावा वे वैचारिक तार्किकता में भी पारंगत थे। माना जा सकता है कि उनमें से ही किसी ने नाथूराम की ओर से यह वक्तव्य तैयार कर जेल में उसके पास भिजवाया होगा और जिसे नाथूराम ने अदालत में पढा होगा।
आप्टे की फांसी के दिन (15 नवम्बर 1949) अम्बाला जेल के दृश्य का आंखों देखा हाल न्यायमूर्ति जीडी खोसला ने अपने संस्मरणों में लिखा है, जिसके मुताबिक गोडसे तथा आप्टे को उनके हाथ पीछे बांधकर फांसी के तख्ते पर ले जाया जाने लगा तो गोडसे लड़खड़ा रहा था। उसका गला रूधा था और वह भयभीत और विक्षिप्त दिख रहा था। आप्टे उसके पीछे चल रहा था।
उसके भी माथे पर डर और शिकन साफ दिख रही थी। तो ऐसे 'बहादुर’, 'चरित्रवान’ और 'देशभक्त’ थे ये हिंदू राष्ट्र के स्वप्नदृष्टा, जिन्होंने एक निहत्थे बूढे, परम सनातनी हिंदू और राम के अनन्य-आजीवन भक्त का सीना गोलियों से छलनी कर दिया। ऐसे हत्यारों को प्रतिष्ठित करने के प्रयास तो शर्मनाक हैं ही, ऐसे प्रयासों पर सत्ता में बैठे लोगों की चुप्पी भी कम शर्मनाक और खतरनाक नहीं।

रूह कंपा देने वाली है पिता और चाचा की यह अमानवीयता




एक के बाद एक प्रकाश में आ रही अमानवीयता की घटनाओं के बीच एक पिता और चाचा द्वारा किया गया यह अपराध अक्षम्य तो है ही, औरत के प्रति असंवेदनशीलता का चरम भी है...
पंजाब के लुधियाना जिले के जान्डी में 28 जून को तीन महीने की एक गर्भवती महिला का उसके देवर और पति ने जबर्दस्ती पेट दबाकर भ्रूण गिरा दिया, क्योंकि उसके पेट में एक कन्या भ्रूण पल रहा है। महिला के साथ जबरन पेट दबाकर किए गए गर्भपात में महिला की जान चली गई। महिला को पहले से एक बेटी थी।
इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक लुधियाना के जान्डी में रहने वाले इरविंदर सिंह की पत्नी मनजीत कौर गर्भवती थी। यह बात जानने पर उसने भ्रूण का लिंग जानने के लिए मनजीत के न चाहने के बावजूद टेस्ट करवाया। जब उसे पता चला कि मनजीत के पित इरविंदर को पता चला कि गर्भ में लड़की पल रही है तो वो गुस्से में पागल हो गया।
उसने पहले तो पत्नी को गर्भपात के लिए गोलियां खिलाईं, पर जब गोलियों से भी मनजीत का गर्भपात नहीं हुआ तो इरविंदर ने अपने भाई निर्मल सिंह के साथ मिलकर उसका पेट इतनी तेजी से दबाया कि भ्रूण बाहर आ गया। जोर—जबर्दस्ती से हुई इस घटना में मनजीत की जान चली गई।
एक महिला जो यह जानने के बाद कि वह गर्भ से है, अपनी आने वाली औलाद को लेकर हजारों सपने देखने लगती है। मनजीत की आंखों में भी कुछ ऐसे ही सपने पल रहे थे। इसीलिए वह लिंग परीक्षण टेस्ट भी नहीं करवाना चाहती थी, क्योंकि वह जानती थी कि अगर गर्भ में पल रहा भ्रूण कन्या होगा तो ये लोग उसे इस दुनिया में आने ही नहीं देंगे। और हुआ भी कुछ ऐसा ही।
2011 में इरविंदर सिंह के साथ मनजीत की शादी हुई थी। पोस्ट ग्रेजुएट मनजीत के पिता के मुताबिक उनकी बेटी घरेलू हिंसा की शिकार थी। जब से मनजीत ने एक बेटी को जन्म दिया था इरविंदर उसके साथ खराब व्यवहार करने लगा था। पति—पत्नी के बीच काफी तनाव रहता था। ये जानने के बाद कि कोख में आया दूसरा भ्रूण भी लड़की है, वो पागल हो गया था, इसलिए उसने अपने भाई के साथ मिलकर मनजीत का पेट जबरन दबाया जिसमें गर्भपात के साथ—साथ मनजीत की भी मौत हो गई।
वहीं मनजीत के ससुरालियों ने उसके पिता के आरोपों को खारिज करते हुए पुलिस को बताया कि भ्रूण का टेस्ट हमने नहीं उसके पिता ने करवाया था। अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि भ्रूण परीक्षण किसने करवाया था।
सवाल ये नहीं है कि भ्रूण का टेस्ट किसने करवाया, सवाल यह भी है कि प्रतिबंधित होने के बावजूद यह सब इतने धड़ल्ले से चल रहा है। अगर यह प्रतिबंधित होता, तो एक अजन्मे बच्चे और उसकी मां को इतनी दर्दनाक मौत नहीं मिलती।
पुलिस ने दोनों आरोपियों इरविंदर सिंह और निर्मल सिंह को गिरफ्तार कर लिया है। एसएसपी सुरजीत सिंह ने बताया कि आरोपी इरविंदर सिंह ने यह बात कबूल कर ली है कि उसने गर्भपात के लिए गोलियां खरीदी थीं। पर उनका कहना है कि भ्रूण की जांच तब हुई जब वह अपने मायके गयी थी।

भाजपा विधायक की गुंडागर्दी से सहमे मुसलमान

विधायक के बेटे से हुआ झगड़ा, सब्जी व्यापारी के बेटे को उठाकर ले गए विधायक के लोग

लखीमपुर खीरी, जनज्वार। उत्तर प्रदेश के जिला लखीमपुर खीरी के गोला विधायक अरविंद गिरी के बेटे और भाजपा समर्थकों ने आज दिन में गोला मंडी में खुलकर गुंडागर्दी का प्रदर्शन किया और योगी की मुस्तैद पुलिस उन गुंडों का मुंह ताकती रह गई। मंडी के व्यापारी इस उम्मीद में थे कि पुलिस इन पर कोई कार्रवाई करेगी, मगर पुलिस विधायक जी के आदेश का इंतजार करती रही।
विधायक के इशारे पर हुई गुंडागर्दी के बाद कुछ ऐसा हाल था मंडी का
करीब दो—तीन दिन पहले भाजपा के गोला विधायक अरविंद गिरी के बेटे अमन गिरी और गोला मंडी व्यापारी इसाक के बेटे अरशद के बीच गोला के अलीगंज रोड पर ओवरटेकिंग को लेकर झगड़ा हो गया। झगड़े के बाद विधायक के बेटे ने अमन गिरी ने भाजपा समर्थकों और अपने जानने वालों के साथ अरशद और उसके दो और साथियों की पिटाई की। इस बात का अरशद के घर वालों को जब पता चला तो वे पुलिस में शिकायत के बजाय इस उम्मीद में चुप हो गए कि विधायक जी आएंगे तो उनसे मिलकर बातचीत होगी। घटना के वक्त विधायक शहर में मौजूद नहीं थे।
लेकिन आज विधायक के आने के बाद गोला मंडी में कोहराम मच गया। करीब दो सौ लोगों की भीड़ ने गोला मंडी में पहुंचकर व्यापारियों के सारे कागजात फाड़ दिए, उनकी सब्जियां बिखेर दीं और उनके साथ मारपीट की। कहा जा रहा है कि यह सबकुछ विधायक अरविंद गिरी के इशारे पर किया गया।
इस घटना से मुसलमान इसलिए सहमे हुए हैं क्योंकि गोला मंडी में ज्यादातर दुकानें मुस्लिम व्यापारियों की हैं और वे किसी भी तरह का बवाल नहीं चाहते।
गोला के पूर्व विधायक विनय तिवारी का कहना है कि भाजपा विधायक ने यह गुंडागर्दी साम्प्रदायिक मंशा से की है, ताकि हिंदुओं—मुस्लिमों में टकराव की स्थिति पैदा कर उसका फायदा उठाया जा सके। पर समाजवादी पार्टी सामाजिक समरसता को किसी भी कीमत पर भंग नहीं होने देगी। साथ ही पूर्व सपा विधायक ने यह भी कहा कि वह प्रशासन से मिलकर मामले को निपटाने की कोशिश करेंगे।
देखें वीडियो : 

Jun 30, 2017

नोट कर लीजिए नोटबंदी जैसा ही बेमतलब साबित होगा जीएसटी

जीएसटी लागू करने के पीछे आम उपभोक्ता को राहत पहुँचाने की मंशा उतनी नहीं है जितना बड़े कारोबारियों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट घरानों का दबाव.....

पीयूष पंत, वरिष्ठ पत्रकार 
आज रात बारह बजते ही प्रधानमंत्री मोदी संसद भवन के सेन्ट्रल हाल में घंटा बजवाएंगे और एक ऐप के माध्यम से देश के अब तक के सबसे बड़े कर सम्बन्धी सुधार का आगाज़ करेंगे। पूरे देश में समान कर व्यवस्था को लागू करने वाले जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर को भारतीय अर्थव्यवस्था और धंधा करने के तरीके में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाले कदम के रूप में पेश किया जा रहा है।

ये कितना क्रांतिकारी होगा यह तो आगामी वर्षों (दिनों में नहीं) में ही पता चलेगा, लेकिन जितने गाजे-बाजे के साथ इसकी शुरुआत की जा रही है उसके पीछे छिपा राजनीतिक मन्तव्य साफ़ नज़र आ रहा है। नोटबंदी की ही तरह जीएसटी को भी प्रधानमंत्री मोदी का एक ऐतिहासिक और साहसी निर्णय बताया जा रहा है।
कोशिश एक बार फिर मोदी की छवि को चमकाने की ही हो रही है। नोटबंदी के समय उत्तर प्रदेश का चुनाव सामने था और अब गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश के चुनाव और 2019 का आम चुनाव सामने हैं। सच्चाई तो ये है कि जीएसटी का निर्णय अकेले मोदी का निर्णय नहीं है। जीएसटी लाने की कवायद तो 2003 से ही चालू है और विभिन्न सरकारों के कार्यकाल के दौरान इसे लाये जाने के प्रयास और घोषणाएं होती रही हैं, फिर चाहे वो वाजपेयी की एनडीए सरकार हो या मनमोहन सिंह की दोनों यूपीए सरकारें।
यह भी आम जानकारी है कि इस नई कर व्यवस्था को लागू करने के पीछे आम उपभोक्ता को राहत पहुँचाने की मंशा उतनी नहीं है जितना कि बड़े कारोबारियों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट घरानों का दबाव।
चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा उठाये गए हर एक महत्वपूर्ण कदम को अपने प्रशस्ति गान में तब्दील करवा लेने में महारथ रखते हैं, इसीलिये मूलतः विज्ञान भवन में संपन्न होने वाले इस कार्यक्रम के स्थल को बदलवा कर उन्होंने इसे संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में स्थानांतरित करवा दिया, ताकि कार्यक्रम के साथ-साथ मोदी को भी अतिरिक्त महत्व मिल सके।
गौरतलब है कि संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में अभी तक केवल तीन कार्यक्रम हुए हैं. जब देश आजाद हुआ तब उस आजादी का उत्सव मनाया गया था। फिर 1972 में जब आजादी की सिल्वर जुबली मनाई गई थी। इसके बाद 1997 में आजादी की गोल्डन जुबली पर आधी रात को कार्यक्रम हुआ था। निसंदेह उन तीनों महान आयोजनों की तुलना कर व्यवस्था में सुधार की योजना से नहीं की जा सकती है। कांग्रेस पार्टी की भी यही आपत्ति है।
कुछ लोग इसे मोदी की नासमझी कह सकते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि यह सब सप्रयास किया जा रहा है। दरअसल मोदी खुद को भारत का सबसे सफ़ल और लोकप्रिय प्रधानमंत्री साबित करने पर तुले हैं। यही कारण है कि वे अक्सर भारत के प्रथम व लोकप्रिय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समकक्ष खड़ा होने की जद्दोजहद में दिखाई देते हैं, बल्कि उनकी नक़ल करने की असफल कोशिश करते हुए भी दिखते हैं।
कोई ताज्जुब नहीं होगा कि आज आधी रात प्रधानमंत्री मोदी संसद से सम्बोधन करते हुए पंडित नेहरू के आज़ादी के बाद दिए गए 'ट्रिस्ट विथ डेस्टनी' वाले भाषण की नक़ल उतारते नज़र आएं। आपको शायद याद हो कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जी ने नेहरू स्टाइल में एक-दो बार अपने कोट की जेब में गुलाब का फूल लगाने का प्रयास किया था, लेकिन बाद में उन्हें कोट की जेब में कमल का फूल कढ़वा कर ही काम चलाना पड़ा।
इसी तरह अक्सर मोदी देश विदेश में बच्चों को दुलारने का विशेष ध्यान रखते हैं ताकि केवल पंडित नेहरू को ही बच्चों के चाचा के रूप में न याद किया जाय। वैसे प्रधानमंत्री मोदी की ये खूबी तो है कि वे सफल लोगों की खूबियों को आत्मसात करने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं।
आपको याद होगा कि 2014 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के जुमले 'येस वी कैन' का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते दिखाई दिए थे। याद रहे कि किसी भी प्रधानमंत्री की लोकप्रियता और सफलता इतिहास खुद दर्ज़ करता है, न कि प्यादे और चाटुकार।
जहां तक जीएसटी से होने वाले फायदे की बात है तो वो तो कई वर्षों बाद ही पता चल पायेगा। फिलहाल तो स्तिथि लखनऊ की भूलभुलैय्या जैसी है। हर कोई इसके नफे- नुक़सान को समझने की कोशिश कर रहा है। खुद सरकार के वित्त मंत्री जेटली और शहरी विकास मंत्री वेंकैय्या नायडू यह कह चुके हैं कि जीएसटी के फायदे दीर्घ काल में ही पता चलेंगे, अल्पकाल में तो इससे महंगाई बढ़ने और जीडीपी कम होने की ही संभावना है।
यानी मोदी जी जब तक अति प्रचारित आपके इस कदम से अर्थव्यवस्था को फायदे मिलने शुरू होंगे तब तक छोटे और मझोले व्यापारी कुछ उसी तरह दम तोड़ चुके होंगे जैसे नोटबंदी के बाद छोटे और मझोले किसान।
खबर है कि कल मोदी जी जीएसटी को लेकर दिल्ली में एक रैली निकालेंगे। उम्मीद है अब आपको मेरी बात समझ में आ रही होगी।

Jun 27, 2017

गन्ना की कीमतें नहीं बढ़ाएंगे योगी, कहा दाम बढ़ाने से मिल मालिकों की टूटती है कमर

जनज्वार, लखनऊ। आपातकाल के 42 साल पूरे होने के मौके कल 25 जून को देश के कई हिस्सों में जब बहुतेरे राजनीतिज्ञ आपातकाल के काले दिनों को याद कर रहे थे, तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ के आम महोत्सव में अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे।

लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में लगे आम महोत्सव का दर्शन लाभ लेते हुए मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि हमारे राज्य में अच्छे आमों की उत्पादकता और बढ़ाई जानी चाहिए। उन्होंने यूपी से आमों के कम निर्यात पर भी चिंता जाहिर की। उन्होंने कई मंत्रियों की गरिमामयी उपस्थिति के बीच महाराष्ट्र के अल्फांसो आम का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे आमों का अभी निर्यात बढ़ाना यानी बहुराष्ट्रीयकरण होना बाकि है।
योगी ने इसी बीच किसानों के प्रति सरोकार जाहिर करते हुए कहा कि गन्ने की कीमत बढ़ाने से मिल मालिकों की कमर टूट जाती है, इसलिए सरकार गन्ने की कीमत बढ़ाने की बजाय किसानों के फसल की उत्पादकता 3 से 4 गुना बढ़ाने पर जोर देगी। योगी के मुताबिक गन्ने की कीमतें बढ़ाना समस्या का समाधान नहीं है।
हालांकि योगी ने अपनी बातों में यह नहीं बताया कि उत्पादकता में 3 से 4 गुना बढ़ोतरी का रहस्य कैसे पूरा होगा? कौन सा बीज, खाद, पानी और नस्लें यह राष्ट्रवादी सरकार किसानों को उपलब्ध कराएगी जिससे किसान एकाएक उत्पादन बढ़ा लेंगे।
गन्ना का कटोरा कहे जाने वाले लखीमपुर खीरी के सपा उपाध्यक्ष क्रांति कुमार सिंह कहते हैं, 'योगी सरकार मिल मालिकों की गोद में बैठकर किसानों को पुचकारने का नाटक कर रही है। सरकार केवल गन्ना के बदले निकलने वाली चीनी की कीमत के आधार पर मिल मालिकों का मुनाफा देखती है पर उससे निकलने वाला सीरा जिससे शराब बनती है, चेपुआ जिससे कागज और बिजनी बनती है, अगर इस मुनाफे को जोड़ दिया जाए तो पता चलेगा कि किसकी कमर टूट रही है और किसका पेट खाली रह जा रहा है।'
अलबत्ता योगी यह बताना नहीं भूले कि प्रदेश सरकार का खजाना खाली होने के बावजूद उनकी सरकार ने किसानों के लिए 36 हजार करोड़ रुपए कि कर्जमाफी की घोषणा की, जिसको मीडिया ने इस रूप में प्रचारित किया था कि किसानों की कर्जमाफी हो गयी है।
जबकि असलियत खुद मुख्यमंत्री जानते हैं कि किसानों की कर्जमाफी की घोषणा के 3 महीने बाद भी बजट का 1 रुपया सरकार ने बैंकों को जारी नहीं किया है और न ही अब तक किसी किसान का एक टका भी माफ हुआ है।
रही बात गन्ना किसानों की चिंता की तो चुनाव में ही भाजपा ने वादा किया था कि किसानों का बकाया 14 दिनों में दे दिया जाएगा, जबकि अभी 30 फीसदी किसानों को सरकार भुगतान नहीं करा सकी है। इसके अलावा सपा सरकार में भाजपा ने कहा था, हमारी सरकार आएगी तब हम गन्ना से कीमत 306 और 315 की बजाए कम से कम 350 कर देंगे।
पर अब सरकार बनने के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ किसानों को समृद्धि और विकास की नयी परिभाषा समझाने लगे हैं। उन्हें अब किसानों के पेट की नहीं पूंजीपतियों की कमर की चिंता सताने लगी है।
और योगी ने आम महोत्सव में दशहरी का स्वाद लेते हुए दो टूक गन्ना किसानों को बता दिया है कि वह गन्ना की कीमतों को नहीं बढ़ाने वाले  हैं।

'फखरूद्दीन' जैसा राष्ट्रपति चाहते हैं मोदी, जिसमें न कैबिनेट का हो झामा न अधिका​रियों का हस्तक्षेप

25 जून 1975 को देश पर आपातकाल थोपने वाली कांग्रेसी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दूसरे रूप माने जाने वाले मोदी कई मामलों में उनकी राह पर आगे बढ़ रहे हैं....

संविधान के नियमों को ताक पर रख इमरजेंसी लगाने के लिए इंदिरा ने एक ऐसे रबर स्टांप राष्ट्रपति फखरूद्दीन अहमद का इस्तेमाल किया था, जो देश पर बेवजह आपातकाल थोपते वक्त राष्ट्रपति कम, प्रधानमंत्री के भक्त अधिक नजर आए थे। मोदी के समक्ष सार्वजनिक तस्वीरों में झुके नजर आ रहे आगामी राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार रामनाथ कोविंद को देख विश्लेषकों और राजनीतिक टिप्पणीकारों की आम समझदारी बन रही है कि आने वाले समय में मोदी के लिए कोविंद, 'फखरूद्दीन' साबित होंगे।
आपातकाल की पूर्व संध्या पर पढ़िए, समकालीन तीसरी दुनिया के जून 2011 अंक से राष्ट्रपति के नाम प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का अत्यंत गोपनीय पत्र जो राष्ट्रपति कार्यालय की फाइल में मिला था। यह गोपनीय पत्र और शाह आयोग की रिपोर्ट आपको समझने में मदद देगी कि कहीं मोदी के नेतृत्व में चल रही राजनीति और देश को आतापकाल के काले रास्तों की ओर तो नहीं ले जाया जा रहा है?
आदरणीय राष्ट्रपति जी,
जैसा कि कुछ देर पहले आपको बताया गया है कि हमारे पास जो सूचना आयी है उससे संकेत मिलता है कि आंतरिक गड़बड़ी की वजह से भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है। यह मामला बेहद जरूरी है। 
मैं निश्चय ही इस मसले को कैबिनेट के समक्ष ले जाती लेकिन दुर्भाग्यवश यह आज रात में संभव नहीं है। इसलिए मैं आप से इस बात की अनुमति चाहती हूं कि भारत सरकार (कार्य संपादन) अधिनियम 1961 संशोधित नियम 12 के अंतर्गत कैबिनेट तक मामले को ले जाने की व्यवस्था से छूट मिल जाय। सुबह होते ही कल मैं इस मामले को सबसे पहले कैबिनेट में ले जाऊंगी। 
इन परिस्थितियों में और अगर आप इससे संतुष्ट हों तो धारा 352-1 के अंतर्गत एक घोषणा किया जाना बहुत जरूरी हो गया है। मैं उस घोषणा का मसौदा आपके पास भेज रही हूं। जैसा कि आपको पता है धरा-353 (3) के अंतर्गत इस तरह के खतरे के संभावित रूप लेने की स्थिति में, जिसका मैंने उल्लेख किया है, धारा-352 (1) के अंतर्गत आवश्यक घोषणा जारी की जा सकती है। 
मैं इस बात की संस्तुति करती हूं कि यह घोषणा आज रात में ही की जानी चाहिए भले ही कितनी भी देर क्यों न हो गयी हो और इस बात की सारी व्यवस्था की जाएगी कि इसे जितनी जल्दी संभव हो सार्वजनिक किया जाएगा। 
आदर सहित
भवदीय
(इंदिरा गांधी)
प्रधानमंत्री, भारत सरकार 
नयी दिल्ली, 25 जून 1975
राष्ट्रपति अहमद द्वारा आपातकाल की घोषणा
संविधान के अनुच्छेद 352 के खंड 1 के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए मैं, फखरूद्दीन अली अहमद, भारत का राष्ट्रपति इस घोषणा के जरिए ऐलान करता हूँ कि गंभीर संकट की स्थिति पैदा हो गयी है जिसमें आंतरिक गड़बड़ी की वजह से भारत की सुरक्षा के सामने खतरा पैदा हो गया है। 
नयी दिल्ली, राष्ट्रपति / 25 जून 1975
कैबिनेट से कोई सलाह नहीं, खुफिया विभाग का खुला दुरुपयोग किया था इंदिरा ने 
कैबिनेट सचिव बी.डी. पांडेय को 25-26 जून की रात में लगभग साढ़े चार बजे प्रधानमंत्री निवास से फोन आया जिसमें कहा गया कि सवेरे छह बजे मंत्रिमंडल की एक बैठक होनी है। उन्हें इस बात की हैरानी थी कि 25 और 26 की रात में इतने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी का आदेश किसने और कैसे जारी किया। सामान्य तौर पर इस तरह के सभी निर्देश गृहमंत्रालय के जरिए जारी होते थे और उनके संचार के अपने चैनल थे। 
बी.डी.पांडेय के अनुसार 26 जनवरी 1975 से पहले कैबिनेट की किसी भी बैठक में इसका जिक्र नहीं हुआ था कि देश के हालात इस कदर खराब हो गए हैं कि इमरजेंसी लगाने की जरूरत पड़ रही है। 
इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर आत्मा जयराम ने अपने बयान में बताया कि देश में इमरजेंसी लगा दी गयी है। इसकी जानकारी उन्हें 26 जून को अपने दफ्तर जाने के बाद ही हुई। 
भारत सरकार के गृह सचिव एस.एल.खुराना को इसकी जानकारी 26 जून को सवेरे छह बजे उस समय हुई जब उन्हें कैबिनेट मीटिंग की सूचना मिली। वह लगभग साढ़े छह बजे पहुंचे तो उन्होंने देखा कि कैबिनेट की बैठक चल रही थी। 
पूर्व कानून और न्यायमंत्री एच.आर.गोखले को इमरजेंसी लगने की जानकारी पहली बार तब हुई जब 26 जून 1975 को सबेरे वह मंत्रिमंडल की बैठक में भाग लेने पहुंचे। आपातकाल की घोषणा के बारे में न तो उनसे और न उनके मंत्रालय से किसी तरह का सलाह मशविरा किया गया। 
शाह कमीशन की रिपोर्ट ने पाया कि भारत में उस समय कहीं भी ऐसी कोई असाधारण स्थिति नहीं पैदा हुई थी जिसकी वजह से सामाजिक, आर्थिक अथवा कानून की ऐसी समस्या पैदा हुई हो जो आंतरिक इमरजेंसी की घोषणा के लिए बाध्य करे। सरकारी दस्तावेजों से आयोग ने निम्नांकित तथ्यों को जुटाया, 
1. आर्थिक मोर्चे पर किसी भी तरह का खतरा नहीं था। 
2. कानून और व्यवस्था के बारे में हर पखवाड़े आने वाली रपटों से पता चलता है कि सारे देश में स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में थी। 
3. इमरजेंसी की घोषणा से एकदम पहले की अवधि पर ध्यान दें तो राज्य सरकारों की ओर से गृहमंत्रालय को कोई भी ऐसी रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई थी जिसमें कानून और व्यवस्था के बिगड़ने का संकेत मिलता हो। 
4. आंतरिक इमरजेंसी लगाने के सिलसिले में 25 जून 1975 से पूर्व गृहमंत्रालय ने किसी भी तरह की योजना नहीं तैयार की थी। 
5. इंटेलिजेंस ब्यूरो ने 12 जून 1975 से लेकर 25 जून 1975 के बीच की अवधि की कोई भी ऐसी रिपोर्ट गृहमंत्रालय को नहीं दी थी जिससे यह आभास हो कि देश की आंतरिक स्थिति इमरजेंसी लगाने की मांग करती है। 
6. गृहमंत्रालय ने प्रधानमंत्री के पास ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं दी जिसमें उसने देश की आंतरिक स्थिति पर चिंता प्रकट की हो। 
7. गृह सचिव, कैबिनेट सचिव और प्रधानमंत्री के सचिव जैसे वरिष्ठ अधिकारियों को इमरजेंसी की घोषणा के मुद्दे पर विश्वास में नहीं लिया गया लेकिन प्रधानमंत्री के तत्कालीन अतिरिक्त निजी सचिव आर.के.धवन शुरू से ही इमरजेंसी की घोषणा की तैयारियों में लगे रहे। 
8. गृहमंत्री ब्रह्मानंद रेड्डी की बजाय गृह राज्यमंत्री ओम मेहता को काफी पहले से इस मुद्दे पर विश्वास में लिया गया। केवल कुछ मुख्यमंत्रियों और दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर को इमरजेंसी लगाने के बारे में विश्वास में लिया गया। 
9. दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर और हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री द्वारा आंतरिक आपातकाल के अंतर्गत संभावित कार्रवाई की अग्रिम जानकारी दी गयी लेकिन इस तरह की कोई अग्रिम जानकारी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, जम्मू कश्मीर, त्रिपुरा, उड़ीसा, केरल, मेघालय और केन्द्र शासित प्रदेशों की सरकारों को नहीं दी गयी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने बताया कि आपातकाल की घोषणा के बारे में उनको 26 जून की सुबह उस समय जानकारी मिली जब वह केंद्रीय मंत्रियों उमाशंकर दीक्षित और केशव देव मालवीय के साथ नाश्ते की मेज पर थे और इस खबर से उन लोगों को भी उतनी ही हैरानी हुई। 
इमरजेंसी का आदेश गृहमंत्रालय से और मंत्रिमंडल सचिवालय के जरिए आना चाहिए 
जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति को भेजे गए अपने ‘अत्यंत गोपनीय’ पत्र में बताया था कि भारत सरकार (कार्य निष्पादन) अधिनियम 1961 के नियम 12 के अंतर्गत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने इस निर्णय की सूचना कैबिनेट को नहीं दी है और वह इसका उल्लेख सुबह होते ही सबसे पहले कैबिनेट में करेंगी।
शाह आयोग की सिफारिशें 
खुफिया विभाग का दुरुपयोग
आयोग ने सिफारिश की कि इस बात की पूरी सावधानी बरती जाय और हर तरह के उपाय किए जाएं ताकि खुफिया विभाग को सरकार अथवा सरकार में शामिल किसी व्यक्ति द्वारा अपने निजी हित के लिए राजनीतिक जासूसी के उपकरण के रूप में इस्तेमाल न किया जा सके। इस मुद्दे पर अगर जरूरी हो तो सार्वजनिक बहस चलायी जाए।

Jun 23, 2017

छात्र संघ के सवाल पर शिक्षा मंत्री का यू—टर्न

धन सिंह रावत ने जब देखा कि उनका बयान छात्रों के गले नहीं उतरा तो वह अपने बयान से पलटी मार गये.....
जनज्वार, देहरादून। 'उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव कराये जाने की पद्धति को बदला जायेगा और यहां भाषण प्रतियोगिता के जरिये छात्र संघ नेताओं का चुनाव होगा।'

यह अजीबोगरीब बयान है उत्तराखंड के उच्च शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. धन सिंह रावत का। उनके इस बयान का यहां पुरजोर तरीके से विरोध हुआ, जिसके बाद वह अपने बयान से पलट गये और अपनी ही कही बात का खंडन करने लगे।
एक दैनिक में छपी खबर के अनुसार मंत्री धन सिंह ने कहा, 'सरकार ने निर्णय लिया है कि महाविद्यालय में छात्र संघ चुनाव में निर्वाचन के स्थान पर उम्मीदवार के छात्र-छात्राओं के सम्मुख 15 मिनट का भाषण होगा। भाषण के आधार पर ही छात्र संघ के पदाधिकारियों का चुनाव होगा।’
यह खबर जैसे ही सामने आयी राज्य में हर तरफ मंत्री रावत के इस बयान का पुरजोर विरोध होने लगा। हल्द्वानी में एनएसयूआई नेता हर्षित जोशी के नेतृत्व में डॉ. रावत का पुतला फूंका गया। हर्षित ने कहा कि उच्च शिक्षा मंत्री अपनी तानाशाही थोप रहे हैं।
जब मंत्री रावत ने देखा कि उनका बयान उनके गले की फांस बनता जा रहा है, तो उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने बयान का खंडन किया। हालांकि जानकारों का कहना है कि मंत्री ने जब देखा कि उनका बयान छात्रों के गले नहीं उतरा है तो वह अपने बयान से पलटी मार गये हैं।
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सवा सौ करोड़ की आबादी में सिर्फ 40 लाख लोगों की पहुंच महंगे सिनेमा हालों तक

याद नहीं पड़ता कि पिछली ऐसी कौन—सी फिल्म थी, जिसने बिना भारी भरकम मार्केटिंग के बस अपनी कहानी के दम पर दर्शकों को सिनेमा की खिड़की की तरफ खींचा हो। महीनों उस फिल्म की गली—मोहल्लों, स्कूल—कॉलेजों में चर्चा रही हो.....
तैश पोठवारी

पिछले एक दशक में सिनेमा उद्योग में बहुत भारी अंतर आया है। एक तरफ सस्ते परम्परागत सिनेमाहाल जहां देश की आम मेहनतकश जनता फ़िल्में देखने जाती थी, टूटकर माल या ब्रांडेड मल्टीप्लेक्स सिनेमा हाल में बदल गया, वहीँ दूसरी तरफ आम आदमी व उसका जीवन सिनेमा की कहानी से पूरी तरह गायब हो गया और हर फिल्म की कहानी धनाढ्य युवा वर्ग की अराजक जीवनशैली के इर्द गिर्द घूमने लगी।
फिल्म का कथानक मैनेजमेंट और मार्केटिंग विशेषज्ञ तय करते हैं कि कैसे एक निश्चित वर्ग को टारगेट करके बस 2—4 दिन के लिए सिनेमा तक खींच लिया जाएं। कुछ एक अपवाद को छोड़कर याद नहीं पड़ता कि पिछली ऐसी कौन—सी फिल्म थी, जिसने बिना भारी भरकम मार्केटिंग के बस अपनी कहानी के दम पर दर्शकों को सिनेमा की खिड़की की तरफ खींचा हो। महीनों उस फिल्म की गली—मोहल्लों, स्कूल—कॉलेजों में चर्चा रही हो।
हो भी कैसे सिनेमा के बाजार के लिए देश की 80 फीसदी जनता जो 250 रुपए का टिकट नहीं खरीद सकती, न बाजार उसे अपना ग्राहक मानता है और न ही उसके लिए सिनेमा बनाता है। आजकल फिल्म के सुपरहिट होने का मतलब उसकी आम जनता में लोकप्रियता नहीं, बल्कि मल्टीप्लेक्स में हुआ कलेक्शन है।
अगर किसी फिल्म का टिकट 250 रुपए है और 125 करोड़ की आबादी वाले देश में सिर्फ 40 लाख लोग ही सिनेमा में किसी फिल्म को देखते हैं, तो उसका कलेक्शन 100 करोड़ हो जाता है। उस पर कई फिल्म निर्माता फिल्मों के टिकट इससे कहीं ज्यादा दुगने, तिगुने दामों पर भी रखने लगे हैं।
देश के उच्च मध्यम वर्ग को सिनेमा तक खींचने के लिए भारी भरकम मार्केटिंग की जाती है। मीडिया खरीदा जाता है। उसके नायक—नायिकाएं टीवी के तमाम लोकप्रिय कार्यक्रमों में जा पहुंचते हैं।
औपनिवेशिक संस्कृति के खुमार में डूबे तमाम युवा रिपोर्टर बिना फिल्म देखे फिल्म की रिलीज से पहले एक ऐसा कृत्रिम माहौल तैयार करते हैं कि दर्शक सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि चलो फिल्म को देख लिया जाए और दूसरे दिन ही पेड मीडिया जो सिनेमा के लिए एक सेल्समैन बन चुका है उसके कलेक्शन के रिकॉर्ड के साथ फिल्म के सुपरहिट होने की घोषणा कर देता है।
देश की बहुसंख्यक जनता को बाजार ने देखते ही देखते सिनेमा से बाहर कर दिया और भांड मीडिया इसकी आलोचना करने की बजाए उसका भोंपू बना हुआ है। फिल्मों का सिनेमाघरों में बस 2—4 दिन चलना और उस पर सिर्फ 2—4 लोगों का इसके निर्माण और वितरण पर अधिकार क्या यह दर्शकों का संकट है या सिनेमा का। न तो यह सिनेमा का संकट है, न ही दर्शकों का, असल में यह पूंजीवाद का संकट है। जहां फ़िल्में और हीरो हीरोइनें एक सीमित वर्ग के लिए खाली पड़े मल्टीप्लेक्स में बाजार में अन्य चीजों की तरह जबरदस्ती बिकने वाले प्रोडक्ट हैं।
भूमंडलीकरण के बाद हर देश में पूंजी का सकेंद्रीयकरण हुआ है और इस पूंजी ने सिनेमा के साथ हर छोटे बड़े व्यवसाय पर अपने ब्रांड के साथ एकाधिकार कर लिया है, जिसमें बड़े निवेश के साथ बने मल्टीप्लेक्स को मुनाफे में रखने के लिए बस एलीट सिनेमा बन रहा है, वहीँ फिल्म का अराजक, बाजारू खाओ—पियो ऐश करो का कथानक दिन—ब—दिन संकट में जा रहे कृत्रिम बाजार के लिए खरीदारी का माहौल तैयार कर रहा है।

Jun 22, 2017

मध्य प्रदेश के 15 मुस्लिम युवाओं पर दर्ज देशद्रोह का मुकदमा वापस

18 जून को लंदन में आईसीसी चैंपियंस ट्राॅफी में भारत की हार के बाद मोहद के निवासियों ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि कुछ लोगों ने भारत की हार का जश्न मनाया है...

विष्णु शर्मा की रिपोर्ट 

मध्य प्रदेश के मोहद में पुलिस ने तीन दिन पहले पाकिस्तान समर्थक नारे लगाने के आरोप में जिन 15 मुस्लिम युवाओं को गिरफ्तार किया था उन पर से राजद्रोह का मामला वापस ले लिय है। बुरहानपुर जिले के एसपी आरआर परिहार ने मीडिया को बताया कि गिरफ्तार किए गए युवाओं पर राजद्रोह का आरोप साबित करना मुश्किल है।


आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में भारत की हार पर मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में आतिशबाजी कर पाकिस्तान के समर्थन और भारत के खिलाफ नारे लगाने के आरोप में 15 युवकों को गिरफ्तार किया गया था. सभी के खिलाफ देशद्रोह का प्रकरण भी दर्ज किया गया था.

गौरतलब है कि एक आरोपी के पिता ने राष्ट्रपति, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एवं राष्ट्रीय और राज्य अल्पसंख्यक आयोगों को पत्र लिख कर इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था, जिसके बाद पुलिस ने राजद्रोह की धाराएं हटा लीं।

18 जून को लंदन में आईसीसी चैंपियंस ट्राॅफी में भारत की हार के बाद मोहद के निवासियों ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि कुछ लोगों ने भारत की हार का जश्न मनाया है। रिपोर्ट पर कार्रवाही करते हुए पुलिस ने इन युवाओं को गिरफ्तार किया था।

मध्य प्रदेश में पिछले तीन सालों में साम्प्रदायिक सदभाव कम हुआ है और टकराव की घटनाएं बढ़ी हैं। इसका कारण है कि लगातार तीन बार प्रदेश में सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी को आगामी चुनोवों में अपने प्रदर्शन को लेकर संशय होने लगा है। और इसलिए उसे साम्प्रदायिक तानव का सहारा लेना पड़ रहा है। 

पिछले साल अक्टूबर में राजधानी भोपल के समीप एक जेल से कथित तौर पर फरार होने की कोशिश करने वाले 8 कथित सीमा कार्यकर्ताओं की इंकाउण्टर की पुलिसिया कहानी पर भी सवाल उठे थे। इनकाउंटर के बाद ऐसे वीडियों सामने आए थे जो पुलिस की कहानी पर सवाल उठाते थे। 

आमतौर पर साम्प्रदायिक सदभाव वाली छवि रखने वाले प्रदेश के ‘मामा’ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर जैसे से संकट के बादल घिरते जा रहे हैं उनके चहरे पर से भी ‘मामियत’ का नकाब उठता जा रहा है। 2014 के बाद, शिवराज सिंह चौहान खुद को पार्टी में लगातार अकेला पा रहे हैं। मध्य प्रदेश भाजपा में उनकी पकड़ लगातार कमजोर होती गई है। 

पिछले आम चुनाव के बाद पार्टी का नरेन्द्र मोदी विरोधी खेमा यह आशा कर रहा था कि मोदी-शाह के कमजोर पड़ते ही शिवराज सिंह चौहान एक विकल्प के रूप में उभरेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मोदी-शाह खेमे ने राष्ट्रीय राजनीति को पूरी तरह से अपने कब्जे में कर लिया। और तो और, व्यापमं घोटाले की सीबीआई जांच ने शिवराज की डोर इसी जोड़ी के हाथों में थमा दी है। 

लोग बताते हैं कि हाल के किसान आंदोलन के दौरान भी मुख्यमंत्री की कार्य क्षमता पर पार्टी के अंदर ढेरों सवाल उठाए गए। इन तमाम वजहों से शिवराज को अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता सताते लगी है। आगामी विधानसभा चुनाव तक वे ऐसा कुछ नहीं करना चाहते जिससे प्रदेश की राजनीति में उनकी दावेदारी कमजोर हो और उनके विरोधियों का स्वर मुखर हो। 

लगता यह भी है कि वे भी सुषमा स्वराज और अन्य नेताओं की तरह ही मोदी-शाह मानकों पर आगे चलने को राजी हो गए हैं। उनके भविष्य का तो पता नहीं लेकिन प्रदेश की राजनीति के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है।

Jun 21, 2017

प्रिंसिपल खुद ही कर गयी विश्वविद्यालय टॉप, ​अब होगी एफआईआर दर्ज

बिहार से एक कदम आगे निकला यूपी, रिपोर्ट सार्वजनिक होने में लग गए एक साल, पर मामले के असल दोषियों यानी कॉलेज प्रबंधन और विश्वविद्यालय प्रशासन का किया जा रहा बचाव
जनज्वार, गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के बहुचर्चित टॉपर कांड में जांच समिति ने पाया कि इस कांड की सरगना रेशमा देवी महाविद्यालय की प्रिंसिपल नीलम पांडेय ही हैं। प्रिंसिपल नीलम पांडेय अपना नाम बदलकर शिवांगी पांडेय बनीं और अपने ही परीक्षा केंद्र से 2016 में बीए में विश्वविद्यालय टॉप कर गोल्ड मेडलिस्ट बनीं।

टॉपर फर्जीवाड़े कांड में गठित चार सदस्यीय जांच समिति की 20 जून को जारी हुई रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016 की बीए टॉपर शिवांगी पांडेय और रेशमा देवी महाविद्यालय अमवां सोहनरियां, जिला देवरिया की कार्यवाहक प्रिंसिपल और केंद्राध्यक्ष डॉ. नीलम पांडेय एक ही हैं। प्राचार्य ने ही साजिशन अपना नाम बदलकर दोबारा स्नातक की डिग्री लेने के लिए इस कांड को अंजाम दिया था।
प्रो.चितरंजन मिश्र की अध्यक्षता में गठित जांच समिति की सिफारिशों को विश्वविद्यालय की परीक्षा समिति ने मानते हुए फैसला किया है कि रेशमा देवी कॉलेज प्रशासन को एक सप्ताह के भीतर प्राचार्य नीलम पांडेय के विरुद्ध एफआइआर दर्ज करानी होगी और उसकी एक कॉपी हफ्तेभर के भीतर विश्वविद्यालय को सौंपनी होगी। ऐसा न करने पर रेशमा देवी महाविद्यालय को 2019 तक किसी भी परीक्षा के लिए केंद्र नहीं बनाया जाएगा।
इस पूरे प्रकरण पर जांच समिति के अध्यक्ष प्रो. चितरंजन मिश्र कहते हैं कि प्रदेश में जिस तरह से शिक्षा घोटाले सामने आ रहे हैं उन पर लगाम लगना बहुत कठिन है। नीलम पांडे उर्फ शिवांगी प्रकरण में एक प्राचार्य इस घटिया हरकत तक इसलिए उतरीं क्योंकि उन्हें स्नातक में अपने नंबर बढ़ाने थे, क्योंकि नंबर बढ़ने के बाद उनका बीटीसी में एडमिशन हो गया था। अगर वह यूनिवर्सिटी टॉप नहीं करतीं तो शायद यह मामला खुलता भी नहीं। प्रदेशभर में न जाने कितने लोग दूसरों के नाम पर परीक्षा दे रहे हैं।
चितरंजन मिश्र का मानना है कि इस तरह के मामले शिक्षा के लगातार निजीकरण के चलते सामने आ रहे हैं। सरकार शिक्षा को निजी हाथों में सौंप रही है, तो शिक्षा माफिया भी पैर पसार रहा है। जाहिर तौर पर निजी हाथों में जाने के बाद वो वही करेगा जिसमें उसका लाभ होगा।
जांच समिति की रिपोर्ट में देरी की वजह में प्रोफेसर चितरंजन कहते हैं कि पिछले वर्ष सितंबर 2016 में गठित हमारी समिति ने जनवरी 2017 में ही अपनी रिपोर्ट यूनिवर्सिटी को सौंप दी थी, मगर उपकुलपति के रिटायरमेंट के चलते रिपोर्ट खुल नहीं पाई। नए वाइस चांसलर के आने के बाद उन्होंने परीक्षा समिति की मीटिंग रखी और जांच समिति की रिपोर्ट खुली है।
गौरतलब है कि रेशमा देवी महाविद्यालय की शिवांगी पांडेय ने डीडीयू के 2015-16 सत्र में स्नातक के कला संकाय में टॉप किया था, जिसे विश्वविद्यालय के 35वें दीक्षांत समारोह में गोल्ड मेडल देकर सम्मानित किया जाना था, जिसके लिए उनकी खोजबीन की गई। अगर शिवांगी पांडे ने विश्वविद्यालय टॉप नहीं किया होता तो शायद यह मामला भी अन्य मामलों की तरह दबा ही रह जाता और वो आराम से बीटीसी की डिग्री ले चुकी होतीं। 
हालांकि फर्जीवाड़े में संलिप्त प्राचार्य पिछले वर्ष ही कॉलेज से निलंबित कर दी गई थीं और मामले की शुरुआती पड़ताल के बाद शिवांगी पांडेय उर्फ नीलम पांडेय का स्वर्ण पदक भी निरस्त कर दिया गया था।
स्ववित्तपोषित और वित्तविहीन महाविद्यालय एसोसिएशन से जुड़े डॉ. चतुरानन ओझा कहते हैं, शिक्षक नेताओं और समाचार पत्रों द्वारा लगातार इस मुद्दे को उठाया गया, जिस कारण विश्वविद्यालय को मज़बूरनकर जांच कमेटी बिठानी पड़ी। मगर सारा ठीकरा प्राचार्या डॉ नीलम पांडे पर फोड़कर खेल के प्रायोजक प्रबंधक और विश्वविद्यालय प्रशासन को बचाया जा रहा है। सवाल तो यह भी है न कि प्राचार्य को यदि अनुबंध के अनुरूप वेतन भुगतान किया जा रहा होता तो उसे प्राइमरी का मास्टर बनने के लिए गलत काम नहीं करना पड़ता।
हालांकि घटना के बाद आरोपी नीलम पांडेय ने पूरी जांच व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा था कि मेरा नाम जान—बूझकर फर्जीवाड़ा घोटाले में जोड़ा जा रहा है। चूंकि कॉलेज की वेबसाइट पर मुझसे संबंधित सारी जानकारी उपलब्ध है तो किसी ने साजिश के तहत मुझे फंसाया है। मैं बेकसूर हूं और इस मामले की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। आखिर एक प्राचार्य एक समय में दो जगह कैसे मौजूद हो सकता है?  

सिनेमा के मोदी युग का स्वागत है

आशा की जानी चाहिए कि मधुर अपने पूर्व के सिने निर्माताओं से आगे निकलेंगे और उनकी यह फिल्म भी पेज थ्री, फैशन, जेल, सत्ता, कोर्पोरेट जैसी फिल्मों की तरह भारतीय समाज के एक ऐसे पक्ष को सामने लाएगी, जिसकी जानकारी अब तक देश के बुद्धिजीवियों के छोटे हिस्से को है...

तसनीम खान

समाज में होने वाले परिवर्तन सबसे पहले उसकी राजनीतिक भाषा में दर्ज होते हैं और फिर उस समाज की संस्कृति अथवा लोकाचार में दिखाई पड़ते हैं।

पिछले 70 सालों से भारतीय सिनेमा भारत के बदलते स्वरूप का सबसे प्रमाणिक दस्तावेज है। 1950-60 के दशक में महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू के आदर्शों से प्रेरित भारतीय समाज हो या 1970 का बागी हिन्दुस्तान या 1990 में परंपरा को तोड़ता भारत, भारतीय सिनेमा में सभी आयामों को दर्ज कर लेने की अनूठी क्षमता है।

आजाद भारत के इतिहास में वर्ष 2014 भारतीय समाज में परिवर्तन के एक चक्र के पूरा होने के रूप में याद किया जाएगा। हम देख सकते हैं कि तीन साल पहले आजादी का बिगबैंग अंततः थम ही गया। बुझी हुई राख में फूंंक मारने से उड़ने वाली धूल को आग मानना एक तरह का बचपना है। लाख कोशिश करने पर भी बीता ज़माना वापस नहीं आने वाला।

मधुर भण्डारकर की आने वाली फिल्म इंदू सरकार सिनेमा के मोदी युग में प्रवेश की खुली घोषणा है। ये फिल्म लोकतंत्र भारत के उस कालखण्ड से संबंधित है, जिसे राजनीति और राजनीतिक विज्ञान की भाषा में आपातकाल कहा जाता है। मधुर भण्डारकर की इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए और आशा की जानी चाहिए कि मधुर अपने पूर्व के सिने निर्माताओं से आगे निकलेंगे और उनकी यह फिल्म भी पेज थ्री, फैशन, जेल, सत्ता, कोर्पोरेट जैसी फिल्मों की तरह भारतीय समाज के एक ऐसे पक्ष को सामने लाएगी, जिसकी जानकारी अब तक देश के बुद्धिजीवियों के छोटे हिस्से को है।

यह छोटा सा बुद्विजीवी वर्ग इसकी याद करता था और असंख्य प्रतीकों का हवाला देकर इस दौर की बुराईंयो को बताता था। कम से कम इस फिल्म के बाद 'अघोषित आपातकाल' जैसे मुहावरों को समझाना आसान होगा।

मोदी युग से पहले के दौर में भी भारतीय इतिहास पर आधारित साहित्य रचा गया है। लेकिन सभी निर्माता इतिहास को सीधे संबोधित करने से डरते रहे। भारत में हिस्टारिकल या ऐतिहासिक कालखण्ड पर आधारित सिनेमा निमार्ण की पुरानी परंपरा है। लेकिन निर्माताओं ने इतिहास को कभी सामने से संबोधित नहीं किया।

1959 की सम्राट पृथ्वीराज चौहान, 1960 की मुगले आजाम, 1965 में शहीद और इन फिल्मों के पहले और बाद में कई फिल्में बनी जिनमें रचनात्मक स्वतंत्रता (आर्टिस्टिक फ्रीडम) के नाम पर इतिहास के साथ हास्यास्पद स्तर तक छेड़छाड़ की गई। पिछले दिनों आई दम लगा के हैशा, बजरंगी भाईजान, बाजीराव मस्तानी, बाहूबली आदि फिल्मों में जहां मोदी युग की एक धुंधली सी झलक दिखाई देती है वहीं मधुर की इंदू सरकार एक स्पष्ट लकीर खींचने का काम करती है। ऐसा इसलिए संभव हुआ है कि इस सरकार की तरह साहित्य रचने वालों के अंदर भी इस सरकार के लंबे समय तक बने रहने का आत्मविश्वास आया है। इस ‘टिके रहने के विश्वास’ को युग कह कर परिभाषित किया जा सकता है।

भारतीय फिल्म जगत में आपातकाल को सीधे कठघरे में खड़ा करने वाली यह पहली फिल्म होगी। पूर्व में ‘समानांतर सिनेमा’ में इस विषय पर काम हुआ लेकिन सीधे तौर पर इस पर सवाल नहीं उठाया गया। शायद इसलिए भी कि समानांतर सिनेमा अक्सर केन्द्रीय फिल्म बोर्ड द्वारा प्रायोजित रहीं। आज भी फिल्म निर्माण क्षेत्र में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है और सरकार का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव बना हुआ है। इसलिए इस महत्वपूर्ण विषय पर फिल्म भी बनाई जा सकी है।

हम तो बस इतनी ही उम्मीद कर सकते हैं कि मधुर भण्डारकर ने अपने से पूर्व के सिने निर्माताओं की गलत परंपरा से सबक लिया होगा और उनकी इंदू सरकार राजनीतिक प्रोपोगेंडा से उपर उठा कर पूर्ववर्ती पेज थ्री या फैशन जैसी कालजयी रचना होगी।

(तसनीम खान लोयड लाॅ कालेज, ग्रेटर नोएडा में सहायक प्राध्यापक और जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली से सिनेमा पर पीएचडी कर रहीं हैं।)

Jun 19, 2017

राष्ट्रपति बनाने की रबर स्टांप परंपरा कायम

मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में....
बिहार के राज्यपाल और कानपुर वासी रामनाथ कोविंद होंगे एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कौन हैं रामनाथ कोविंद, कहां से लाए गए यह रबर स्टांप।
पूर्व आइएएस अधिकारी कोविंद का राष्ट्रपति बनना लगभग तय। राष्ट्रपति पद के लिए कोविंद का नाम आते ही लोग खोजने लगे गूगल पर उनकी कोविंद की जाति।

अगर बने तो कोविंद होंगे देश के दूसरे दलित राष्ट्रपति। इससे पहले दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले के आर नारायणन रह चुके राष्ट्रपति।
उपराष्ट्रपति के नाम पर अभी कोई चर्चा नहीं है। पर संभावना है कि दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद भाजपा उपराष्ट्रपति के लिए महिला सवर्ण नाम को प्राथमिकता देगी। माना जा रहा है दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद मोदी सरकार ने राष्ट्रपति पद के दूसरे दावेदारों के मुंह पर जाबी लगा दी है।
मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में। मीडिया ने मेट्रो मैन श्रीधरण के नाम पर भी लगाई थीं अटकलें।
बीजेपी ने एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का सोमवार को ऐलान कर दिया। दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बिहार के गवर्नर रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया गया है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कोविंद के नाम का ऐलान करते हुए कहा कि कोविंद को हमने इसलिए चुना है कि पार्टी गरीब समाज से ताल्लुक रखने वाले शख्स को राष्ट्रपति बनाने की तैयारी में थी।
कानपुर देहात में पैदा हुए कोविंद बीजेपी दलित मोर्चा के अध्यक्ष रह चुके हैं। यूपी से दो बार राज्यसभा गए हैं। पेशे से वकील कोविंद ऑल इंडिया कोली समाज के अध्यक्ष भी रहे हैं।

Jun 16, 2017

2 महीने बाद मीडिया तक पहुंची 15 दलितों पर देशद्रोह के मुकदमें की सूचना

राजपूतों के दबाव में की जा रही हरियाणा के दलितों की बेजा गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे छात्र—नौजवान, 24 अप्रैल की दोपहर में सीएम खट्टर से अंबाला में मिले थे युवक और शाम को देशद्रोह समेत कई अन्य धाराओं में उनपर कर दिया गया था मुकदमा दर्ज।  

कैथल से राजेश कापरो की रिपोर्ट 

जी हां। यह सही समाचार है। ​हरियाणा के करनाल जिले के सिविल लाईन पुलिस थाना में 24 अप्रैल को यह मुकदमा दर्ज किया गया है। इस मुकदमा के अनुसार इन 15 नामजद दलित छात्रों—नौजवानों ने देशद्रोह का अपराध किया है । इन 15 आरोपियों में मोनिका नाम की एक दलित छात्रा का नाम भी है जो कुरूक्षेत्र युनीवर्सिटी में पढ़ती है।

 मैंने इस मुकदमे की एफआईआर की कॉपी के साथ पूरी जानकारी 5 जून को अपने फेसबुक शेयर कर दी थी। प्रदर्शनकारियों पर क्या मुकदमा दर्ज हुआ है यह पता करने में ही दसियों दिन लग गए। फिर थाने से कॉपी लेने में समय मुझे समय लगा और मैंने 5 जून को एक पोस्ट जरिए खुलासा किया कि 15 दलित छात्रों—नौजवानों पर हरियाणा पुलिस ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया है। छात्रों—नौजवानों समेत सैकड़ों की संख्या में दलित अंबाला जिला के गांव पतरेहड़ी के दलितों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ राज्य के कई जिलों में प्रदर्शन कर रहे थे। 

कुछ लोगों ने खबर को शेयर भी किया पर देश ने आज तब संज्ञान में लिया, जब अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने मेरे प्रयासों के बाद छाप दिया। हिंदी अखबारों, संपादकों और बुद्धिजीवियों ने तो कोई संज्ञान ही नहीं लिया। शायद हिंदी वालों को हिंदी में लिखने वालों की दी सूचनाओं पर भरोसा नहीं होता या फिर वह अंग्रेजी को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। 

खैर, जो भी हो। दिलचस्प यह है कि 24 अप्रैल को दर्ज हुए इस मुकदमें में पुलिस ने ​अबतक एक भी गिरफ्तारी नहीं की है। पुलिस से जब पीड़ितों के परिजनों ने जानकारी चाही तो उनका कहना था कि अभी गिरफ्तार नहीं करेंगे लेकिन जब यह दूसरी बार प्रदर्शन या किसी आंदोलन में शामिल होंगे तब इन्हें भीतर करेंगे। 

पुलिस के बयान से सवाल यह उठता है कि हरियाणा की पुलिस ने छात्रों—नौजवानों पर देशद्रोह जैसा मुकदमा सिर्फ धमकाने और तफरी लेने के लिए दर्ज कर लिया है या ऐसे गंभीर और रेयर मुकदमें दर्ज कर पुलिस कुछ और संदेश देना चाहती है। एक वकील होने के नाते मैं जानता हूं कि देशद्रोह का मुकदमें में गिरफ्तारी और जमानत ज्यादा बेहतर होती है, बजाय कि आप आरोपियों को यूं ही छोड़ दें। इसका एक ही मकसद हो सकता है कि पुलिस ऐसे आरोपियों को 'न जीने देगी और न मरने देगी' वाली हालत में बनाकर रखना चा​हती है। 

और यही वजह है कि देशद्रोह के मुकदमें से खौफ में हैं सभी दलित छात्र—नौजवान, बयान तक देने से डर रहे हैं कि पुलिस कहीं उन्हें गिरफ्तार न कर ले। 

ऐसे हुई आंदोलन की शुरुआत 
अंबाला जिला के गांव पतरेहड़ी के दलितों ने विभिन्न दलित संगठनों के नेतृत्व में अप्रैल 19 से 26 तक कर्ण पार्क करनाल में धरना किया था। प्रदर्शनकारी दलितों की मांग थी कि अंबाला पुलिस दलित नौजवानों को हत्या के एक फर्जी मुकदमे में फंसा रही है उस पर रोक लगाई जाए। सीएम मनोहर लाल खट्टर को अपना दर्द बताने दलित अंबाला से यहां आए थे। मुख्यमंत्री से मिल के जाने के बाद ही पुलिस ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया। जाहिर है पुलिस अमले का यह रवैया बगैर मुख्यमंत्री के इशारे के संभव नहीं रहा होगा। 

हरियाणा के इतिहास में शायद यह पहला मामला है जहां पर इतनी बडी संख्या में दलित समाज के लोगों को नामजद किया गया है। हालांकि इससे पहले भी दलित समाज के अधिकारों की आवाज बुलंद करने वालों पर देशद्रोह के मुकदमे दर्ज किये गए थे। 

देशद्रोह का यह मुकदमा दलित नेता अशोक कुमार, कृष्ण कुटेल, मलखान नंबरदार, राकेश, रवि कुमार इंद्री, अमर मुनक, अमर सगा, मोनिका, मुलखराज, राजकुमार पतरेहड़ी, धर्मसिहं व रविंद्र कुरूक्षेत्र अनिल, संजू ,नरेश पतरेहड़ी पर दर्ज किया गया है।

जिनपर दर्ज हुए मुकदमें 
बावेला यहाँ से खड़ा हुआ  
अंबाला पुलिस के लापरवाही भरे रवैए के कारण मार्च में दलित समुदाय और राजपूतों के बीच तनाव चल रहा था । राजपूत जाति के कुछ बदमाश बार बार दलित समाज के लोगों पर हमला कर रहे थे । पुलिस ने शिकायत के बावजूद दबंग जाति के बदमाशों पर कारवाई नहीं की । दलितों को दबंगों का मूहतोड़ जवाब देने के लिए मजबूर किया गया और दलित अपनी जानमाल की सुरक्षा करने के लिए एकजुट हुए । इस प्रकार से झगड़े की इस घटना में दोनों पक्षों के लोग घायल हुए । पुलिस ने उसी समय दलितों पर 323 आईपीसी तथा दबंग जाति के बदमाशों के खिलाफ एससी एसटी एक्ट सहित 323 आईपीसी आदि धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया।

मुश्किल बनी यह घटना
घटना के चार पांच दिन बाद दबंग जाति के एक घायल की मौत घाव में संक्रमण के कारण हो गई । पुलिस ने दलित समाज के नौजवानों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया । छात्र जवानों को जेलों में ठूंस दिया । झगड़े की जड़ गांव के सरपंच जिस पर एससी एसटी में मुकदमा दर्ज है अभी तक नहीं पकड़ा गया है । पुलिस दलित छात्र नौजवानों को केवल इसी आधार पर उठा रही थी कि वह अंबेडकर संगठन के सदस्य है और दलित उत्पीड़न की घटनाओं का विरोध करता है । करनाल के कर्ण पार्क में पतरेहड़ी के दलित मुख्यमंत्री का ध्यान अंबाला पुलिस की इसी मनमर्जी की तरफ दिलाने आए थे।

इन धाराओं के तहत हुआ है मुकदमा 
इस संबंध में एफआईआर संख्या 298 दिनांक 26/04/2017 धारा 124ए/147/149/186/283/332/341/353 आईपीसी पुलिस थाना सिविल लाईन में दर्ज की गई है।  

कौन हैं जिन पर देशद्राह का मुकदमा हुआ है दर्ज 
15 दलित छात्र नौजवानों पर यह मुकदमा दर्ज किया गया है वे सभी उस प्रतिनिधी मंडल का हिस्सा थे जो 24 अप्रैल  के रोष प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री से मिले थे । यह प्रतिनिधी मंडल मुख्यमंत्री के आश्वासन से सहमत नहीं हुआ और कर्ण पार्क में अपना रोश प्रदर्शन जारी रखने की बात बोलकर वार्ता से उठकर आ गया । 26 अप्रैल को पुलिस ने आंदोलनकारी दलितों को कर्ण पार्क से जबरन खदेड़ दिया । सारा दिन सैंकड़ो दलितों को पुलिस बसों में भरकर घूमाती रही और बाद में अलग अलग स्थानों पर फेंक दिया । पार्क में पानी भर दिया गया । 26 तारीख को गिरफ्तार किए गए इन लोगों में ये सभी 15 लोग भी थे उनको भी बाकि पब्लिक के साथ छोड़ दिया । हालांकि इन सब के खिलाफ 26 अप्रैल को ही देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जा चुका था । यदि उसी समय पुलिस इनको गिरफ्तार कर लेती तो आंदोलन और ज्यादा भड़क उठता, इसलिए पुलिस ने गिरफ्तारी नहीं की । 

दलितों पर बढ़ रहे हैं हमले 
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अत्याचारों के रूप में 2016 में दलितों पर हमलों के 47000 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए । इन आंकड़ो के अनुसार रोजाना 2 दलित मारे जाते हैं और पांच दलित औरतों के साथ बलात्कार की घटना होती है । एक अन्य अनुमान के अनुसार प्रत्येक 18वें मिनट में दलित के खिलाफ एक अपराध होता है हर सप्ताह 13 दलितों को मौत की नींद सूला दिया जाता है हर सप्ताह 6 दलितों का आपराधिक अपहरण किया जाता है हररोज दलित उत्पीड़न की 27 घटनाएं दर्ज होती है । उतर प्रदेश के सहारनपुर की घटनाओं में भाजपा की योगी सरकार ने जो रवैया अपनाया हुआ है हरियाणा की खट्टर सरकार भी उसी राह पर है । ऐसे में दलित समाज के सामने संघर्ष की राह पर अग्रसर होने के अलावा कोई चारा नहीं है ।

पहले भी हुए दलितों पर देशद्रोह के मुकदमें दर्ज 
भगाना के दलितों पर कांग्रेस की हुड्डा सरकार ने देशद्रोह बनाया था। उससे पहले 2007 में हरियाणा सरकार ने प्राईवेट युनीवर्सिटी बिल का विरोध करने वाले जागरूक छात्र मोर्चा के छात्रों पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था। इनमें भी ज्यादातर छात्र दलित या पिछड़ी जातियों संबंधित थे। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के ईस्मालईबाद इलाके में भी पुलिस ने आवासीय प्लाटों की मांग करने वाले दलितों पर देशद्रोह का केस दर्ज किया था। 

Jun 15, 2017

फर्जी मुठभेड़ करने वाले जवानों को डीजीपी ने पार्टी करने के लिए दिए 1 लाख रुपए

देश की सुरक्षा—व्यवस्था के इतिहास में यह पहली बार है कि किसी राज्य के डीजीपी ने एक अादिवासी की हत्या करने पर जवानों को मुर्गा—भात खाने और जश्न मनाने के लिए 1 लाख रुपए का ईनाम दिया हो, वह भी फर्जी मुठभेड़ के बदले। 

गिरिडीह से रूपेश कुमार सिंह की रिपोर्ट 

मोतीलाल बास्के : जब वह राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू की विधि व्यवस्था में लगे थे 
झारखंड के गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड के मधुबन थाना अंतर्गत जैन तीर्थावलम्बियों के विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थल पारसनाथ पर्वत की तलहटी में स्थित आदिवासी गांव ढोलकट्टा के समीप 9 जून को माओवादियों व सीआरपीएफ कोबरा के बीच मुठभेड़ होती है। मुठभेड़ की ही शाम में पुलिस दावा करती है कि मुठभेड़ में एक दुर्दांत माओवादी को मार गिराया गया। 

मारे गए आदिवासी के पास से पुलिस एक एसएलआर व गोली समेत कई चीजें दिखाती है। 10 जून को झारखंड के डीजीपी डीके पांडेय हवाई मार्ग से मधुबन पहुंचते हैं और ‘भारत माता की जय’ ‘सीआरपीएफ की जय’ के नारे के उद्घोष के बीच गिरिडीह एसपी बी वारियार को एक लाख रूपये मुठभेड़ में शामिल जवानों को बड़ी पार्टी देने के लिए देते हैं और अलग से 15 लाख रूपये इनाम देने की घोषणा भी करते हैं। इस खबर को झारखंड के तमाम अखबारों के तमाम एडिसन में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है।

मुठभेड़ में मारे गए क्या सच में दुर्दांत माओवादी थे?
इस सवाल का जवाब 11 जून को मिल गया, जब मारे गये आदिवासी की पहचान उजागर हुई तो पता चला कि जिसे मारकर प्रशासन अपना पीठ खुद ही थपथपा रहा है और जिसकी हत्या का जश्न भी अब तक प्रशासन मना चुका है, दरअसल वह एक डोली मजदूर था, जो कि तीर्थयात्रियों को डोली पर बिठाकर अपने कंधे पर उठाकर तीर्थस्थल का भ्रमण कराता था और साथ ही पारसनाथ पर्वत पर स्थित चंद्र मंदिर के नीचे एक छोटा सा होटल भी चलाता था, जिसमें डोली मजदूर चावल-दाल व सत्तू खाया करते थे। 

उस डोली मजदूर का नाम मोतीलाल बास्के था। वह धनबाद जिला के तोपचांची प्रखंड अंतर्गत चिरूवाबेड़ा का रहने वाला था, लेकिन कुछ दिन से अपने ससुराल गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड अंतर्गत ढोलकट्टा में ही रहकर प्रखंड से पास किया गया प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपने आवास को बनवा रहा था। 

कौन है मोतीलाल बास्के 
9 जून को वह ढोलकट्टा से पारसनाथ पर्वत स्थित अपनी दुकान ही जा रहा था, लेकिन हमारे देश के ‘बहादुर’ अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ कोबरा ने उसकी हत्या करके उसे दुर्दांत माओवादी घोषित कर दिया और उसकी हत्या का जश्न भी सरकारी खजाने से मनाया। अब जबकि यह बात पूरी तरह से साफ हो चुकी है कि मृतक मोतीलाल बास्के एक डोली मजदूर था और डोली मजदूरों के एकमात्र संगठन मजदूर संगठन समिति का सदस्य भी था, उसकी सदस्यता संख्या 2065 है। 
मारे जाने के बाद छपी यह खबर 


एक आदिवासी होने के नाते वह आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी का भी सदस्य था और 26-27 फरवरी 2017 को मधुबन में आयोजित मारांड. बुरु बाहा पोरोब में विधि व्यवस्था का दायित्व भी संभाला था, जिसमें झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के बतौर शामिल हुई थीं। मृतक मोतीलाल बास्के को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बनाने के पैसे भी मिले हैं, जिससे वे मकान बना रहे थे।

माओवादी बताकर मोतीलाल बास्के की हत्या पुलिस द्वारा कर दिए जाने का सच पारसनाथ पर्वत के अगल-बगल के गांवों में पहुंचते ही आम लोगों में गुस्सा बढ़ने लगा और 11 जून को मधुबन के हटिया मैदान में मजदूर संगठन समिति ने एक बैठक कर मोतीलाल बास्के का सच सबके सामने उजागर किया। इस बैठक में आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी के अलावा स्थानीय जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए और 14 जून को वहीं पर महापंचायत करने का निर्णय लिया गया। 

धीरे-धीरे फर्जी मुठभेड़ का सच बाहर आने लगा। 12 जून को भाकपा (माले) लिबरेशन की एक टीम ने अपने गिरिडीह जिला सचिव के नेतृत्व में मृतक के परिजनों से मुलाकात करते हुए इस फर्जी मुठभेड़ की न्यायिक जांच व दोषी पुलिसकर्मियों को सजा देने की मांग के साथ 15 जून को पूरे जिला में प्रतिवाद दिवस मनाने की घोषणा की, साथ ही मृतक की पत्नी को 5 हजार रुपये की आर्थिक मदद भी की। 

13 जून को झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतागण ढोलकट्टा जाकर मृतक के परिजनों से मुलाकात की व मृतक की पत्नी की बात झारखंड के विपक्ष के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से करायी, जिसमें उन्होंने उनको न्याय दिलाने का वादा किया। 14 जून को मधुबन में आयोजित मजदूर संगठन समिति के महापंचायत में सैकड़ों गांवों के हजारों ग्रामीणों के साथ-साथ झामुमो, झाविमो, भाकपा (माले) लिबरेशन, आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी व स्थानीय तमाम जनप्रतिनिधि- जिला परिषद सदस्य, प्रखंड प्रमुख व कई पंचायत के मुखिया शामिल हुए। 

महापंचायत ने इस फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ 17 जून को मधुबन बंद, 21 जून को गिरिडीह में उपायुक्त के समक्ष धरना, 2 जुलाई को पूरे गिरिडीह जिला में मशाल जुलूस व 3 जुलाई को गिरिडीह बंद की घोषणा की। 15 जून के अखबारों में भाकपा (माओवादी) का बयान भी आया कि मोतीलाल बास्के उनके पार्टी या पीएलजीए का सदस्य नहीं है।

सवाल यही कि आदिवासियों के ही राज्य में आदिवासी हत्या पर जश्न  

फर्जी मुठभेड़ के बाद प्रदर्शन करते पार्टियों के लोग और स्थानीय जनता 
उलगुलान के सृजनकार महान छापामार योद्धा बिरसा मुंडा के शहादत दिवस 9 जून को ही फर्जी मुठभेड़ में एक आदिवासी मजदूर की हत्या को माओवादी हत्या के रुप में पूरे झारखंड के तमाम अखबारों ने अपने तमाम एडीसन में मुख्य पृष्ठ पर जगह दी, लेकिन अब जबकि यह साबित हो चुका है कि मृतक मोतीलाल बास्के माओवादी नहीं था, तो सभी अखबारों ने इन तमाम समाचारों को गिरिडीह के पन्नों में ही कैद कर रखा है। 

तमाम अखबारों ने डीजीपी द्वारा एसपी को एक लाख रुपये हत्यारों को पार्टी देने की खबरों को प्रमुखता से छापा था, लेकिन आज कोई अखबार यह सवाल नहीं कर रहा है कि आखिर एक ग्रामीण आदिवासी की हत्या का जश्न क्यों और कब तक?

फर्जी मुठभेड़ की घटना को अब एक सप्ताह होने को हैं, लेकिन देश के मानवाधिकार संगठनों, बुद्धिजीवियों व न्यायपसन्द नागरिकों के कानों पर अब तक जूं भी क्यों नहीं रेंग रही? उनके लिए एक आदिवासी की हत्या और हत्यारे पुलिस अधिकारियों के द्वारा हत्या का जश्न मनाना कोई बेचैनी का सवाल क्यों नहीं बनता?