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Jun 22, 2017

पतंजलि के 6 उत्पादों पर लगा प्रतिबंध, रामदेव नहीं कर पाए मीडिया मैनेज

मेडिकल जांच में फेल होने पर लगा प्रतिबंध, पहले भी 4 दवाएं हो चुकी हैं प्रतिबंधित। सवाल यह कि जो दवा नेपाल के लोगों के लिए नुकसानदायक, वह भारत में लाभदायक कैसे...

काठमांडू, जनज्वार। नेपाल सरकार ने मेडिकल जांच में गडबड़ी पाए जाने पर बाबा रामदेव और योगी बालकृष्ण के मालिकाने वाले पतंजलि के 6 उत्पादों को 21 जून से नेपाल में प्रतिबंधित कर दिया है। नेपाल के मीडिया के मुताबिक इससे पहले पतंजलि के 4 और उत्पाद माइक्रोबॉलॉजिकल जांच में असफल पाए जाने पर प्रतिबंधित हो चुके हैं।


ये सभी उत्पाद पतंजलि आयूर्वेद लिमिटेड और आयूर्वेदिक मेडिसिन कंपनी द्वारा नेपाल में उपलब्ध कराए जा रहे थे। पतंजलि के जिन उत्पादों को सरकार ने प्रतिबंधित किया है, वे हैं आमला चूर्ण, दिव्य गशर चूर्ण, बकूची चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, अश्वंगंधा चूर्ण और अदिवा चूर्ण।

नेपाल सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए जांच में अधिकारियों ने पाया कि दवा के तौर प्रचारित ये उत्पाद तय मानकों से बहुत अलग हैं और इनके इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। ये सभी उत्पाद माइक्रोबॉयलॉजिकल टेस्ट में फेल हुए हैं।

इसी के मद्देजनर कल 21 जून को प्रतिबंधित किए जाने बाद विभाग ने तत्काल उत्पादों को बाजार से वापस मंगाने का आदेश संबंधित अधिकारियों को दे दिया है।

पतंजलि के खिलाफ नेपाल सरकार ने यह कार्यवाही '1978 ड्रग एक्ट की धारा 14' के तहत किया है।

वहीं भारत में इन दवाओं की धूम मची हुई है। रामदेव इन दवाओं के प्रचार पर हर महीने करोड़ों रुपए विज्ञापन पर खर्च कर रहे हैं। मीडिया का बड़ा हिस्सा इनके सही—गलत दावों को खूब प्रचारित कर रहा है, क्योंकि विज्ञापन का दबाव है।

यही कारण है कि रामदेव के अपनी कंपनी के उत्पादों से संबंधित तमाम अविश्वनीय दावों पर भी मीडिया समवेत स्वर में कोई सवाल नहीं उठा पाता। भारत में वह मीडिया मैनेज कर लेते हैं।

भारत में हाल ही सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी से पता चला है कि आयूर्वेद के 40 फीसदी उत्पाद मानकों से नीचे हैं, जिसमें पतंजलि के उत्पाद भी है।

भारत में वर्ष 2013 से 2016 के बीच 82 आयूर्वेदिक उत्पादों की जांच हुई, जिसमें मानकों की जांच में 32 फेल हुए। फेल होने वालों में पतंजलि दिव्य आंवला जूस और शिवलिंगी बीज दोनों ही शामिल थे।

पर भारत में असल समस्या सरकार की है। सरकार योग गुरु रामदेव की अंधसमर्थन करती है। वह उनका इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में करती है, जबकि रामदेव अपने सही—गलत दावों पर सरकार का इस्तेमाल उसकी चुप्पी के रूप में करते हैं। खुद प्रधानमंत्री मोदी और पूरा मंत्रिमंडल रामदेव के योग, दवाओं और उनके आर्थिक उभार के आगे नमस्तक है।

ऐसे में सवाल ये है कि जो दवा नेपाल के लोगों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है, वह भारत के लोगों को स्वास्थ्य लाभ कैसे दे सकती है।

एक बार जांच की मांग तो की ही जानी चाहिए क्योंकि मुनाफे की हवस न किसी सरकार की वफादार होती है न जनता की।

Jun 21, 2017

प्रिंसिपल खुद ही कर गयी विश्वविद्यालय टॉप, ​अब होगी एफआईआर दर्ज

बिहार से एक कदम आगे निकला यूपी, रिपोर्ट सार्वजनिक होने में लग गए एक साल, पर मामले के असल दोषियों यानी कॉलेज प्रबंधन और विश्वविद्यालय प्रशासन का किया जा रहा बचाव
जनज्वार, गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के बहुचर्चित टॉपर कांड में जांच समिति ने पाया कि इस कांड की सरगना रेशमा देवी महाविद्यालय की प्रिंसिपल नीलम पांडेय ही हैं। प्रिंसिपल नीलम पांडेय अपना नाम बदलकर शिवांगी पांडेय बनीं और अपने ही परीक्षा केंद्र से 2016 में बीए में विश्वविद्यालय टॉप कर गोल्ड मेडलिस्ट बनीं।

टॉपर फर्जीवाड़े कांड में गठित चार सदस्यीय जांच समिति की 20 जून को जारी हुई रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016 की बीए टॉपर शिवांगी पांडेय और रेशमा देवी महाविद्यालय अमवां सोहनरियां, जिला देवरिया की कार्यवाहक प्रिंसिपल और केंद्राध्यक्ष डॉ. नीलम पांडेय एक ही हैं। प्राचार्य ने ही साजिशन अपना नाम बदलकर दोबारा स्नातक की डिग्री लेने के लिए इस कांड को अंजाम दिया था।
प्रो.चितरंजन मिश्र की अध्यक्षता में गठित जांच समिति की सिफारिशों को विश्वविद्यालय की परीक्षा समिति ने मानते हुए फैसला किया है कि रेशमा देवी कॉलेज प्रशासन को एक सप्ताह के भीतर प्राचार्य नीलम पांडेय के विरुद्ध एफआइआर दर्ज करानी होगी और उसकी एक कॉपी हफ्तेभर के भीतर विश्वविद्यालय को सौंपनी होगी। ऐसा न करने पर रेशमा देवी महाविद्यालय को 2019 तक किसी भी परीक्षा के लिए केंद्र नहीं बनाया जाएगा।
इस पूरे प्रकरण पर जांच समिति के अध्यक्ष प्रो. चितरंजन मिश्र कहते हैं कि प्रदेश में जिस तरह से शिक्षा घोटाले सामने आ रहे हैं उन पर लगाम लगना बहुत कठिन है। नीलम पांडे उर्फ शिवांगी प्रकरण में एक प्राचार्य इस घटिया हरकत तक इसलिए उतरीं क्योंकि उन्हें स्नातक में अपने नंबर बढ़ाने थे, क्योंकि नंबर बढ़ने के बाद उनका बीटीसी में एडमिशन हो गया था। अगर वह यूनिवर्सिटी टॉप नहीं करतीं तो शायद यह मामला खुलता भी नहीं। प्रदेशभर में न जाने कितने लोग दूसरों के नाम पर परीक्षा दे रहे हैं।
चितरंजन मिश्र का मानना है कि इस तरह के मामले शिक्षा के लगातार निजीकरण के चलते सामने आ रहे हैं। सरकार शिक्षा को निजी हाथों में सौंप रही है, तो शिक्षा माफिया भी पैर पसार रहा है। जाहिर तौर पर निजी हाथों में जाने के बाद वो वही करेगा जिसमें उसका लाभ होगा।
जांच समिति की रिपोर्ट में देरी की वजह में प्रोफेसर चितरंजन कहते हैं कि पिछले वर्ष सितंबर 2016 में गठित हमारी समिति ने जनवरी 2017 में ही अपनी रिपोर्ट यूनिवर्सिटी को सौंप दी थी, मगर उपकुलपति के रिटायरमेंट के चलते रिपोर्ट खुल नहीं पाई। नए वाइस चांसलर के आने के बाद उन्होंने परीक्षा समिति की मीटिंग रखी और जांच समिति की रिपोर्ट खुली है।
गौरतलब है कि रेशमा देवी महाविद्यालय की शिवांगी पांडेय ने डीडीयू के 2015-16 सत्र में स्नातक के कला संकाय में टॉप किया था, जिसे विश्वविद्यालय के 35वें दीक्षांत समारोह में गोल्ड मेडल देकर सम्मानित किया जाना था, जिसके लिए उनकी खोजबीन की गई। अगर शिवांगी पांडे ने विश्वविद्यालय टॉप नहीं किया होता तो शायद यह मामला भी अन्य मामलों की तरह दबा ही रह जाता और वो आराम से बीटीसी की डिग्री ले चुकी होतीं। 
हालांकि फर्जीवाड़े में संलिप्त प्राचार्य पिछले वर्ष ही कॉलेज से निलंबित कर दी गई थीं और मामले की शुरुआती पड़ताल के बाद शिवांगी पांडेय उर्फ नीलम पांडेय का स्वर्ण पदक भी निरस्त कर दिया गया था।
स्ववित्तपोषित और वित्तविहीन महाविद्यालय एसोसिएशन से जुड़े डॉ. चतुरानन ओझा कहते हैं, शिक्षक नेताओं और समाचार पत्रों द्वारा लगातार इस मुद्दे को उठाया गया, जिस कारण विश्वविद्यालय को मज़बूरनकर जांच कमेटी बिठानी पड़ी। मगर सारा ठीकरा प्राचार्या डॉ नीलम पांडे पर फोड़कर खेल के प्रायोजक प्रबंधक और विश्वविद्यालय प्रशासन को बचाया जा रहा है। सवाल तो यह भी है न कि प्राचार्य को यदि अनुबंध के अनुरूप वेतन भुगतान किया जा रहा होता तो उसे प्राइमरी का मास्टर बनने के लिए गलत काम नहीं करना पड़ता।
हालांकि घटना के बाद आरोपी नीलम पांडेय ने पूरी जांच व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा था कि मेरा नाम जान—बूझकर फर्जीवाड़ा घोटाले में जोड़ा जा रहा है। चूंकि कॉलेज की वेबसाइट पर मुझसे संबंधित सारी जानकारी उपलब्ध है तो किसी ने साजिश के तहत मुझे फंसाया है। मैं बेकसूर हूं और इस मामले की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। आखिर एक प्राचार्य एक समय में दो जगह कैसे मौजूद हो सकता है?  

Jul 20, 2011

अब मुख्यमंत्री के लिए वोट देंगे मुस्लिम

कांग्रेस,सपा और बसपा को मुसलमान यह मानकर वोट देते रहे कि यही पार्टियां उनकी असल रहनुमा है,लेकिन  संकट में साथ नहीं आयीं। वहीं 2007 में मायावती की पूर्ण बहुमत से जीत मुसलमानों के लिए अप्रत्याशित थी और उनके लिए एक नयी सीख भी...

अजय प्रकाश

बात 1970 की है। लखनउ के अमीनाबाद चौराहे से मेहरा सिनेमा हाल की ओर जाने वाली सड़क पर जनसंघ का दफ्तर था और उसके ठीक सामने नाजियाबाद-मोहन मार्केट की ओर जाने वाली सड़क पर कांग्रेस का। मैं उस समय सोशलिस्ट पार्टी में था और पार्टी की जनसंघ से एकता हो चुकी थी। इधर से मैंने जैसे ही बोलने की शुरूआत की,उसी समय कांग्रेस दफ्तर पर लगी माइक से आवाज आयी, ‘यह मोहम्मद शोएब नहीं, घसीटे बोल रहा है।’ तो मैंने जवाब में कहा, ‘हां भाई मैं घसीटे ही हूं।’घसीटे का अर्थ प्यादा है और कांग्रेस को मंजूर नहीं था कि उसके मुकाबले किसी और का मुसलमान प्यादा बने। मुस्लिम उसी घसीटे के विशेषण से बाहर निकलने की अकुलाहट में है, अपना एक नेतृत्व बनाने की कोशिश में है। -उत्तर प्रदेश कचहरी बम धमाकों के आरोपियों का मुकदमा लड़ रहे लखनउ हाईकोर्ट के वकील मोहम्मद शोएब का यह उदाहरण मुस्लिम राजनीति के मौजूदा उभार को समझने का एक प्रस्थान बिंदु हो सकता है, जो 2008 सितंबर के बाटला हाउस कांड के बाद फिर एक बार विमर्श और कोशिश के दायरे में है।

आजमगढ़ के संजरपुर में अपनी मुश्किलें बताते लोग

 अपने राजनीतिक नेतृत्व की तलाश मुसलमानों ने 2007 विधानसभा चुनाव के बाद ही शुरू कर दी थी, जब मुख्यमंत्री मायावती 206 (उपचुनावों के बाद 226)विधानसभा सीटों के साथ बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनायीं। बाद में सितंबर 2008 में हुए बाटला हाउस इनकाउंटर में आजमगढ़ के मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी-मुठभेड़,फिर दूसरे तमाम धमाकों में मुस्लिम युवकों की फर्जी गिरफ्तारियों ने मुस्लिमों की इस समझ को और पुख्ता किया।

जिस कांग्रेस,सपा और बसपा को मुसलमान यह मानकर वोट देते रहे कि यही पार्टियां उनकी असल रहनुमा है,इनमें से एक भी संकट में साथ नहीं आयीं। वहीं 2007में मायावती की पूर्ण बहुमत से जीत मुसलमानों के लिए अप्रत्याशित थी और उनके लिए एक नयी सीख की तैयारी भी। अप्रत्याशित इसलिए कि 11-12 फीसदी हरिजनों की रहनुमाई करने वाली मायावती मुख्यमंत्री बन जाती हैं और मुसलमान राजनीति के पेंदे में समा जाते हैं। इस चुनौती के मुकाबले में बड़हलगंज कस्बे के पेशे से सर्जन डॉक्टर अयूब की पीस पार्टी का उभार हुआ। इस पार्टी के उभार का पहला नारा बना, ‘हमारी पार्टी, हमारा मुख्यमंत्री।’ देश की यह पहली पार्टी बनी जिसका सीधा मकसद अपनी जाति का प्रदेश को मुख्यमंत्री देना था।

पीस पार्टी का प्रयोग नया था, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों खासकर पिछड़ी आर्थिक स्थिति वाले मुसलमानों ने इसे हाथों-हाथ लिया और देखते ही देखते 2009 के लोकसभा चुनावों में पीस पार्टी का उम्मीद से अधिक व्यापकता में उभार हुआ। इस पार्टी के साथ मुसलमानों के अलावा ब्राम्हण और अन्य पिछड़ी जातियों के लोग भी जुड़ने लगे। जिसके बाद आरोप लगा कि मुसलमानों की ताकत को कमजोर करने के लिए भाजपा ने पीस पार्टी बनाया है और डाक्टर अयूब उसके मोहरे हैं।

डॉक्टर अयूब पर आरोप लगाने वाले एक मुस्लिम नेता ने कहा कि भाजपा सिर्फ इतना चाहती है कि मुसलमान फैसला करने वाले वोटरों की श्रेणी से बाहर हो जायें। उस नेता ने यह भी बताया कि विधानसभा के उपचुनावों में अयूब ने लखीमपुर खीरी से जिस नामे महाराज को विधानसभा टिकट दिया था वह आरएसएस से जुड़ा रहा है। अयूब पर लग रहा यह आरोप कितना सही है यह तो समय बतायेगा लेकिन इतना तो साफ है कि नेतृत्व के उभार की कोशिश ने मुसलमानों को अगड़े और पिछड़े में बांट दिया है।

जानकार बताते हैं कि दिल्ली के बाटला हाउस मुठभेड़ कांड के बाद आजमगढ़ के मौलवी आमिर रशादी के नेतृत्व में उलेमा काउंसिल के उभार में अगड़े मुसलमान शामिल हैं,जबकि अयूब गरीब और पिछड़े मुसलमानों के अगुवा हैं। काउंसिल 2009लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ और लालगंज सीट पर दूसरे स्थान पर रही तो पीस पार्टी ने कई लोकसभा सीटों पर 50हजार से उपर वोट जुटाकर प्रदेष की बड़ी पार्टियों के पसीने छुड़ा दियें। उसी का असर है कि पीस पार्टी ने राश्ट्रीय लोकदल के साथ संयुक्त मोर्चा बना लिया है।

हालांकि इस नये गठजोड़ के बाद डॉक्टर अयूब के मुख्यमंत्री वाले नारे पर ग्रहण लग गया है कि लोकदल अध्यक्ष अजीत सिंह के होते अयूब कैसे मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं। ऐसे में अयूब इस गठबंधन को तोड़कर सपा या कांग्रेस से एकता बनाने की कोशिश में हैं। जमायते इस्लामी के आमिर अली कहते हैं,‘इन अनुभवों ने साफ कर दिया है कि मुसलमान भी नेतृत्कारी बन सकते हैं और दुम पकड़कर चलने की राजनीति से छुटकारा पा सकते हैं।’

मुस्लिमों द्वारा हुई ऐसी राजनीतिक कोशिशों के इतिहास में जायें तो पहला नाम मुस्लिम मजलिस के संस्थापक डॉक्टर फरीदी का आता है। फरीदी ने मजलिस का गठन कांग्रेस के मुकाबले में किया था। मुस्लिम मजलिस 1980तक सक्रिय रही और मुसलमानों का एक तबका हमेषा कांग्रेस का विरोधी रहा। विश्लेषक मानते हैं कि आज मुसलमानों ने जितनी भी राजनीतिक हैसियत हासिल की है उसमें डॉक्टर फरीदी का एक बड़ा योगदान है। उलेमा हिंद से जुड़े डॉक्टर फैयाज बताते हैं, ‘फरीदी के उभार से पहले तक पांच मुसलमान एक जगह बैठकर कोई बैठक नहीं कर सकते थे। कांग्रेस ने मुसलमानों की हालत उस वक्त अछूतों की कर दी थी। अब फिर एक बार मुसलमान फरीदी की राह चलने की तैयारी में हैं।’

उल्लेखनीय है कि इंदिरा गांधी ने मजलिस को उस समय आरएसएस का संगठन करार दिया था। जनता पार्टी में मजलिस भी शामिल थी,जिसका एक बड़ा घटक हिंदूवादी राजनीति का समर्थक जनसंघ भी था, लेकिन इस चुनाव में मजलिस के तीन सांसद जीते थे। वैसे में सवाल उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश के मुसलमान कभी भाजपा का दामन भी थाम सकते हैं।

इस पर  मुस्लिम नेता इलियास आजमी कहते हैं,‘इस संभावना को एकदम से इनकार नहीं किया जा सकता। नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात में किये गये मुस्लिम नरसंहार को छोड़ दें तो मुसलमानों के खिलाफ सारा अपराध कांग्रेस ने ही किया है। लेकिन लखनउ हाईकोर्ट के वकील मोहम्मद शोएब इन स्थितियों से सावधान करते हैं। वे याद दिलाते हैं कि,‘अच्छी शुरूआतों के बावजूद हर बार मुस्लिम नेतृत्व सांप्रदायिक राजनीति की ओर बहक गया है और फायदा कांग्रेस और भाजपा जैसे सांप्रदायिक ताकतों को ही हुआ है। इसलिए देखना यह है कि यह नया उभार धर्मनिरपेक्ष उसूलों के साथ कैसे आगे बढ़ता है।’