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Jun 27, 2017

मनुस्मृति से ज्यादा अन्यायपूर्ण शास्त्र ​खोजना कठिन

कहा जाता है कि मनुस्मृति हिंदुओं का आधार है--उनके सारे कानून,समाज-व्यवस्था का
ओशो, विश्वप्रसिद्ध भारतीय चिंतक और दार्शनिक

अगर एक ब्राह्मण एक शूद्र की लड़की को भगाकर ले जाये तो कुछ भी पाप नहीं है। यह तो सौभाग्य है शूद्र की लड़की का। लेकिन अगर एक शूद्र, ब्राह्मण की लड़की को भगाकर ले जाये तो महापाप है। और हत्या से कम, इस शूद्र की हत्या से कम दंड नहीं। यह न्याय है! और इसको हजारों साल तक लोगों ने माना है।
जरूर मनाने वाले ने बड़ी कुशलता की होगी। कुशलता इतनी गहरी रही होगी, जितनी कि फिर दुनिया में पृथ्वी पर दुबारा कहीं नहीं हुई। ब्राह्मणों ने जैसी व्यवस्था निर्मित की भारत में, ऐसी व्यवस्था पृथ्वी पर कहीं कोई निर्मित नहीं कर पाया, क्योंकि ब्राह्मणों से ज्यादा बुद्धिमान आदमी खोजने कठिन हैं। बुद्धिमानी उनकी परंपरागत वसीयत थी।
इसलिये ब्राह्मण शूद्रों को पढ़ने नहीं देते थे क्योंकि तुमने पढ़ा कि बगावत आई।
स्त्रियों को पढ़ने की मनाही रखी क्योंकि स्त्रियों ने पढ़ा कि बगावत आई।

स्त्रियों को ब्राह्मणों ने समझा रखा था, पति परमात्मा है। लेकिन पत्नी परमात्मा नहीं है! यह किस भांति का प्रेम का ढंग है?कैसा ढांचा है? इसलिये पति मर जाये तो पत्नी को सती होना चाहिये, तो ही वह पतिव्रता थी।
लेकिन कोई शास्त्र नहीं कहता कि पत्नी मर जाये तो पति को उसके साथ मर जाना चाहिये, तो ही वहपत्नीव्रती था। ना, इसका कोई सवाल ही नहीं।
पुरुष के लिये शास्त्र कहता है कि जैसे ही पत्नी मर जाये,जल्दी से दूसरी व्यवस्था विवाह की करें।
उसमें देर न करें। लेकिन स्त्री के लिये विवाह की व्यवस्था नहीं है। इसलिये करोड़ों स्त्रियां या तो जल गईं और या विधवा रहकर उन्होंने जीवन भर कष्ट पाया। और यह बड़े मजे की बात है, एक स्त्री विधवा रहे, पुरुष तो कोई विधुर रहे नहीं; क्योंकि कोई शास्त्र में नियम नहीं है उसके विधुर रहने का।
तो भी विधवा स्त्री सम्मानित नहीं थी, अपमानित थी। होना तो चाहिये सम्मान, क्योंकि अपने पति के मर जाने के बाद उसने अपने जीवन की सारी वासना पति के साथ समाप्त कर दी। और वह संन्यासी की तरह जी रही है। लेकिन वह सम्मानित नहीं थी। घर में अगर कोई उत्सव-पर्व हो तो विधवा को बैठने का हक नहीं था। विवाह हो तो विधवा आगे नहीं आ सकती।
बड़े मजे की बात है; कि जैसे विधवा ने ही पति को मार डाला है! इसका पाप उसके ऊपर है। जब पत्नी मरे तो पाप पति पर नहीं है, लेकिन पति मरे तो पाप पत्नी पर है! अरबों स्त्रियों को यह बात समझा दी गई और उन्होंने मान लिया। लेकिन मानने में एक तरकीब रखनी जरूरी थी कि जिसका भी शोषण करना हो, उसे अनुभव से गुजरने देना खतरनाक है और शिक्षित नहीं होना चाहिये। इसलिये शूद्रों को,स्त्रियों को शिक्षा का कोई अधिकार नहीं।
तुलसी जैसे विचारशील आदमी ने कहा है कि 'शूद्र, पशु, नारी,ये सब ताड़न के अधकारी।' इनको अच्छी तरह दंड देना चाहिये। इनको जितना सताओ, उतना ही ठीक रहते हैं।
'शूद्र, ढोल, पशु,नारी...' ढोल का भी उसी के साथ--जैसे ढोल को जितना पीटो,उतना ही अच्छा बजता है; ऐसे जितना ही उनको पीटो, जितना ही उनको सताओ उतने ही ये ठीक रहते हैं। यही धारा थी। इनको शिक्षित मत करो, इनके मन में बुद्धि न आये, विचार न उठे। अन्यथा विचार आया, बगावत आई। शिक्षा आई, विद्रोह आया।
विद्रोह का अर्थ क्या है? विद्रोह का अर्थ है, कि अब तुम जिसका शोषण करते हो उसके पास भी उतनी ही बुद्धि है, जितनी तुम्हारे पास। इसलिये उसे वंचित रखो।

Jun 21, 2017

गुजरात पुलिस ने बलात्कार पीड़िता को कहा, जाओ पहले कास्ट सर्टिफिकेट लेकर आओ

एक महिला पुलिसकर्मी मामला दर्ज करवाने आई। वह पीड़िता को एक अंधेरे कमरे में ले गई और उसे चांटे मारकर धमकाया कि यदि बलात्कार का मामला दर्ज करवाया तो तुझे और तेरे मां-बाप को जेल में डाल देंगे...

गुजरात से दलित नेता जिग्नेश मेवानी की प्रेस विज्ञप्ति 

गुजरात के बनासकांठा जिले के डिशा तहसील के बुराल गांव की 18 साल की दलित लड़की जब स्वच्छता अभियान के सारे नारों के बावज़ूद घर पर टॉइलेट नहीं होने के चलते खुले में शौच करने गई तब दबंग जाति के एक आदमी ने उसका बलात्कार किया।

10 जून की दोपहर 12 बजे दलित लड़की के साथ यह घटना घटी। पीड़िता ने घर जाकर अपने माँ बाप को यह बात बताई। दोपहर के 2 बजे पीड़िता, उसके माता-पिता और बराल गांव के कुछ लोग डिशा रूरल पुलिस थाने में मामले की एफआईआर दर्ज करवाने गए, तो थाना इंचार्ज मौजूद नहीं थे। डयूटी पर बैठे पुलिस स्टेशन ऑफीसर ने कहा पीड़िता से कहा कि थाना इंचार्ज (पुलिस इंस्पेक्टर) वापस आएंगे तो उसके बाद ही कार्रवाई होगी।
पीड़िता, उसके माता पिता और गांव के लोग पुलिस के सामने मामला दर्ज करने के लिए गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। मजबूरन पीड़िता के माता-पिता ने लोकेल एडवोकेट मघा भाई को थाने बुलाया। वकील ने पुलिस से कहा कि मामला इतना संगीन है, लड़की का बलात्कार हुआ है और आप पुलिस इंस्पेक्टर का इंतजार कर रहे हो, यह कैसे चलेगा? वकील से कहने के बावजूद इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई।
पुलिस स्टेशन ऑफिसर ग़लबा भाई ने कहा कि इंस्पेक्टर साहब आपको धानेरा तहसील के एक चार रास्ते पर मिलेंगे। बलात्कार पीड़िता दलित लड़की अपने मां-बाप और गांव के लोगों के साथ रोती-गिड़गिड़ाती हुई धानेरा हाईवे पर पहुंची और पुलिस इंस्पेक्टर को अपनी आपबीती सुनाई। सुनकर पुलिस इंस्पेक्टर डी. डी. गोहिल ने कहा - बलात्कार हुआ और तू दलित है? तो जाओ जाकर पहले अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट लेकर आओ।
रिपोर्ट दर्ज न किए जाने पर पीड़ित लड़की अपने मां—बाप के साथ 24 किलोमीटर दूर अपने गांव वापस गई और कास्ट सर्टिफिकेट लेकर पुलिस थाने पहुंची। फिर जो हुआ वह और भी भयानक था। बगल के पुलिस थाने की शर्मिला नाम की एक महिला पुलिसकर्मी मामला दर्ज करवाने आई। वह पीड़िता को एक अंधेरे कमरे में ले गई और उसे चांटे मारकर धमकाया कि यदि बलात्कार का मामला दर्ज करवाया तो तुझे और तेरे मां-बाप को जेल में डाल देंगे।
इतना सब होने के बाद भी आईपीसी की धारा 376 (रेप) के बजाय 354 (सेक्सुअल एब्यूस) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। पीड़िता के बार—बार कहने के बावजूद उसकी मेडिकल जांच नहीं करवाई गई।
यानी कुछ भी करके मामले को रफादफा करने की कोशिश की गई। यहाँ उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले ही बीजेपी के कुछ नेता नालिया सैक्स रैकेट में संलिप्त पाये गए थे। इस मामले से गुजरात पुलिस और बीजेपी के नेताओं का वास्तविक चरित्र उजागर हुआ था। यह भी उल्लेखनीय है कि गुजरात में 2004 में 24 दलित महिलाओं का बलात्कार हुआ था, जो आंकड़ा 2014 में 74 तक पहुंच गया है।
पाटीदार समाज की नेता रेशमा पटेल और चिराग पटेल, बनासकांठा के चेतन सोलंकी समेत दलित संगठनों से जुड़े लोगों और समाजसेवियों ने आज एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर कहा कि 25 जून की शाम के 6 बजे तक यदि धारा 376 के तहत मुकदमा दर्ज नहीं किया गया और यदि थाना इंचार्ज के सामने एट्रोसिटी एक्ट की धारा 4 के तहत कार्रवाई नहीं की गई तो 26 जून को सुबह 11 बजे बनासकांठा जिले की बनास नदी के उपर का ब्रिज और हाईवे बंद करवा देंगे।
बलात्कार के मामले में किसी भी लापरवाही को हम सहन नहीं करेंगे। साथ ही ऐलान किया कि गुजरात सरकार तैयारी कर ले हमें रोकने की, हम तैयारी कर लेंगे रास्ता रोकने की।

Jun 19, 2017

राष्ट्रपति बनाने की रबर स्टांप परंपरा कायम

मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में....
बिहार के राज्यपाल और कानपुर वासी रामनाथ कोविंद होंगे एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कौन हैं रामनाथ कोविंद, कहां से लाए गए यह रबर स्टांप।
पूर्व आइएएस अधिकारी कोविंद का राष्ट्रपति बनना लगभग तय। राष्ट्रपति पद के लिए कोविंद का नाम आते ही लोग खोजने लगे गूगल पर उनकी कोविंद की जाति।

अगर बने तो कोविंद होंगे देश के दूसरे दलित राष्ट्रपति। इससे पहले दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले के आर नारायणन रह चुके राष्ट्रपति।
उपराष्ट्रपति के नाम पर अभी कोई चर्चा नहीं है। पर संभावना है कि दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद भाजपा उपराष्ट्रपति के लिए महिला सवर्ण नाम को प्राथमिकता देगी। माना जा रहा है दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद मोदी सरकार ने राष्ट्रपति पद के दूसरे दावेदारों के मुंह पर जाबी लगा दी है।
मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में। मीडिया ने मेट्रो मैन श्रीधरण के नाम पर भी लगाई थीं अटकलें।
बीजेपी ने एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का सोमवार को ऐलान कर दिया। दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बिहार के गवर्नर रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया गया है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कोविंद के नाम का ऐलान करते हुए कहा कि कोविंद को हमने इसलिए चुना है कि पार्टी गरीब समाज से ताल्लुक रखने वाले शख्स को राष्ट्रपति बनाने की तैयारी में थी।
कानपुर देहात में पैदा हुए कोविंद बीजेपी दलित मोर्चा के अध्यक्ष रह चुके हैं। यूपी से दो बार राज्यसभा गए हैं। पेशे से वकील कोविंद ऑल इंडिया कोली समाज के अध्यक्ष भी रहे हैं।

May 25, 2017

पुलिस अधिकारियों से पत्रकार पहले लेते हैं डिक्टेशन, फिर करते हैं सहारनपुर हिंसा की रिपोर्टिंग

शब्बीरपुर में घटित जातीय हिंसा की रिपोर्टिंग चाहे प्रिंट हो या इलैक्ट्रॉनिक या फिर डिजिटल मीडिया में ऐसे की गई, जैसे यह जातीय संहार नहीं बल्कि व्यक्तिगत रंजिश में की गई हत्याएं हों.....

जनज्वार सहारनपुर। सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में 5 मई, 2017 को दलितों पर हुए हमले की पहली रिपोर्टिंग जब जनज्वार में छपी तो लोगों को लगा कि क्या ऐसा भी हो सकता है? यह सिर्फ इसलिए नहीं लगा कि सबसे पहले जनज्वार में वीडियो, फोटो और सिलसिलेवार घटनाक्रम में यह रिपोर्ट छपी थी, बल्कि इसलिए भी लगा कि जब शब्बीरपुर गांव में दलितों के घर जलाए जा रहे थे और राजपूत जातियों के लपंट तत्व पूरे गांव में हाहाकार मचाए हुए थे, उस वक्त मौके पर जिले के सभी उच्चाधिकारी मौजूद थे। 


उच्चाधिकारियों डीएम, एसपी, एसएसपी की मौजूदगी में दलितों के घर फूंके गए, उन पर हमले हुए, उनकी गाड़ियां, मोटरसाइकिलें, साइकिलें स्वाहा कर दी गयीं और अनाज के ढेर जला दिए गए। कई मीडियाकर्मियोंं ने इन घटनाओं को अपने कैमरे में कैद भी किया और उच्चाधिकारियों के साथ खड़े रहकर घटनाक्रम के साक्षी भी रहे, पर 5 मई की इस घटना का अगले 5 दिनों तक ठीक से तब तक मीडिया कवरेज नहीं आया, जब तक कि जनज्वार जैसी तमाम दूसरी जनपक्षधर वेबसाइटस और सोशल मीडिया ने इसे एक बड़ा और राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बना लिया।

इसी तरह बसपा प्रमुख मायावती के शब्बीरपुर जाने से पहले और उनके जाने के बाद शब्बीरपुर समेत दूसरे तमाम गांवों में हिंसक वारदातें हुईंं, दलितों और राजपूतों में टकराहट हुई, दर्जन भर दलित गंंभीर रूप से घायल हुए, जिसमें से तीन की अब तक मौत हो चुकी है, मगर इस बड़ी घटना की भी रिपोर्टिंग चाहे प्रिंट हो या इलैक्ट्रॉनिक या फिर डिजिटल मीडिया में ऐसे की गई, जैसे यह जातीय संहार नहीं बल्कि व्यक्तिगत रंजिश में की गई हत्याएं हों। शब्बीरपुर में अब तक आधा दर्जन लोग इस जातीय नरसंहार की भेंट चढ़ चुके हैं।

इन दोनों घटनाओं और सहारनपुर में लगातार बने हुए तनाव के बीच जिस तरह की रिपोर्टिंग की जा रही है, उसको समझने के लिए पत्रकार, पत्रकार और अधिकारियों के रिश्ते, स्थानीय स्तर पर पत्रकारों और माफियाओ के रिश्ते और पत्रका​रों की जातीय संरचना को समझना बहुत जरूरी है। बगैर इन चारों चीजों को समझे देश को यह नहीं समझ में आ सकता कि मीडिया चाहे वह राष्ट्रीय हो या स्थानीय, इस खबर को प्राथमिकता और घटनाक्रम की बारीकियों के साथ क्यों नहीं पेश कर रहा।

एक बात और कि जिस तरह मुजफ्फरनगर दंगे की घटना को वृहत रूप देने में ठीक से रिपोर्टिंग न होना भी एक बड़ा कारण रहा, अब ऐसा ही कुछ शब्बीरपुर में हो रहा है। एक दूसरा कारण यह भी माना जा रहा है कि मुजफ्फरपुर दंगे में आजम खां जिस तरह से पहुंचे और शब्बीरपुर में मायावती, उसने दंगे को भड़काने और जातीय हिंसा को बढ़ाने का ही काम किया है। 

5 मई को जब शब्बीरपुर गांव जब रहा था, दलितों पर हमले हो रहे थे तो इस घटनाक्रम की रिपोर्टिंग करने से पहले डीएम, एसएसपी, एसपी ने गांव में पत्रकारों को डिक्टेशन दी। मौके पर आज तक, न्यूज नेशन, जीटीवी, ईटीवी, न्यूज 24, टीवी 100 समेत तमाम न्यूज चैनलों और सभी दैनिकों के पत्रकार डिक्टेशन लेने वालों में मौजूद थे। 


एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे, डीएम एनपी सिंह और एसपी देहात ने पत्रकारों को निर्देशित किया कि फलां फलां फुटेज दिखाइये और फलां फलां फुटेज मत दिखाइये। पत्रकार भी उच्चाधिकारियों की बात से सहमत थे इसलिए फुटेज और फैक्ट होने के बावजूद खबर सामने नहीं आई। कुछेक ईमानदार पत्रकारों ने आॅनलाइन मीडिया का सहारा लिया, जिसकी वजह से इस घटनाकम का सच सबके सामने आ पाया। इन्ही पत्रकारों में कुछेक ने जब आपस में कहा कि यह तो गलत है हमें खबर दिखानी चाहिए, कुछेक ने दिल्ली में अपने हैडआॅफिस वीडियो फुटेज भेजी भी, मगर खबर वहां से भी प्रसारित नहीं हो पायी।

गौरतलब है कि सहारनपुर जिले में छोटे—बड़े मीडिया घरानों के तकरीबन 210 पत्रकार काम करते हैं। इन पत्रकारों का बहुतायत बाह्मण, राजपूत और जाट है। 10 प्रतिशत के करीब पत्रकार मुस्लिम भी हैं। ऐसे में घटना मुजफ्फरपुर की हो या शब्बीरपुर की, पत्रकार आमतौर पर अपनी जातिवादी और साम्प्रदायिक समझदारी को ही पत्रकारिता का मूल्य बना लेते हैं। और ये तब और भी आसान हो जाता है जब ​तमाम उच्चाधिकारी भी साम्प्रदायिक और जातिवादी हों। ऐसे में अधिकारियों और पत्रकारों दोनों का गठजोड़ यह मान लेता है कि मुसलमानों और दलितों पर जो जातिवादी और साम्प्रदायिक अत्याचार हुआ है, वह वाजिब है और इसको लेकर खामखां का हल्ला मचाने की कोई जरूरत नहीं है। 

शब्बीरपुर मामले में भी हू—ब—हू यही हुआ। ज्यादातर स्थानीय पत्रकार किसान हैं और उन्होंने शब्बीरपुर और आसपास के दूसरे गांवों में दलितों पर हुए हमलों और अत्याचार को इसलिए वाजिब ठहरा दिया कि दलितों की महिलाएं उनके खेतों में जाने वाले पाइपों पर दरारी/​हसुआ मार देती हैं।

सहारनपुर से दूर बैठे और यहां की सामाजिकी, आर्थिकी से अनभिज्ञ व्यक्ति को पत्रकारों और पत्रकारिता के संदर्भ में यह बात मजाकिया लग सकती है, मगर सच यही है। दलित महिलाओं का खेत में जा रही पाइपों पर दराती मार देना, दलितों का राजपूतों के आगे पहले की तरह दंंडवत न होना, कुछेक दलितों की आर्थिक स्थिति मजबूत होना और उनका पढ़ा—लिखा होना भी उन पत्रकारों को गड़ता है या उन्हें सही रिपोर्टिंग नहीं करने देता, जो सहारनपुर की स्थानीय पत्रकारिता के टायकून हैं। 

अधिकारियों की डिक्टेशन और पत्रकारों की जातीय और सामाजिक हैसियत से इतर एक सच और भी है, जहां माफियाओं के आगे पत्रकार जाति—धर्म से परे हटकर सरेंडर किए हुए हैं। सहारनपुर के खनन माफिया मोहम्मद इकबाल जोकि बसपा के पूर्व एमएलसी भी रह चुके हैं और बसपा से ही तत्कालीन एमएलसी और उनके छोटे भाई महमूद अली सहारनपुर की पत्रकारिता को पालते—पोसते हैं। यहां के लोगों में यह सामान्य जानकारी है कि अवैध खनन पर रिपोर्टिंग न करने के बदले कुछेक पत्रकारों को छोड़ दें तो बहुतायत को एमएलसी परिवार से मासिक भत्ता जाता है। हालांकि अब सरकार ने औपचारिक तौर पर खनन बंद करवा दिया है, फिर भी यह जारी है।

देखें वीडियो :



May 10, 2017

जुड़वा दिमाग जैसे हैं मोदी और ट्रंप

पूर्व आइपीएस विकास नारायण राय इन दिनों अमेरिका में हैं। वे लगातार भारतीय समाज, सुरक्षा और राजनीति पर लिखते रहते हैं। अबकी उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी की अचंभित करने वाली समानताओं, मसखरेपन, इतिहास ज्ञान और समाजदृष्टि पर बहुत ही तथ्यात्मक और दिलचस्प टिप्पणी की है,  पढ़िए पूरा लेख विस्तार से...

अमेरिका से जनज्वार के लिए  विकास नारायण राय 

 
रूरी नहीं जो राष्ट्र नेता इतिहास बनाने निकलते हैं, उन्हें इतिहास की समझ भी हो| ऐसे में उनके हाथों घोर अनर्थ होने या भारी भ्रान्ति फ़ैलने की संभावना बनी रहती है| नेपोलियन, हिटलर, मुसोलिनी, तोजो, याह्या खान, सद्दाम हुसैन जैसों के आत्मघाती उदाहरण साक्षात हैं|

मोदी और ट्रम्प फिलहाल उन्हीं पद चिन्हों पर न भी चलते दिख रहे हों पर उनकी इतिहास शून्यता गंभीर राजनीतिक आशंकाओं को हवा दे रही है और साथ ही उन्हें मखौल का पात्र भी बना रही है| लगता है, जैसे राजनीतिक शिखर छूने की जल्दी में ये दोनों महानुभाव इतिहास बनाने नहीं स्वयं इतिहास बनने के कगार पर हों|

मोदी और ट्रम्प को एक खाने में रखने वालों को भी आज शायद ही उनके समर्थकों की एक जैसी हताशा भरी नियति से हैरानी हो| फ़िलहाल दोनों के भक्त उनके चुनाव प्रचार के दौर का थूका हुआ चाटने को मजबूर नजर आते हैं| ट्रम्प में रूस की सामरिक दिलचस्पी की छाया उनके राष्ट्रपति अभियान पर लगातार बनी रही थी, और अब अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करते पहलुओं की छानबीन अमेरिकी सेनेट की न्यायिक समिति कर रही है|

स प्रकरण का आपराधिक पक्ष एफबीआई की जाँच का विषय है| चुनाव के दौरान रूस में अपनी व्यावसायिक स्थिति को लेकर ट्रम्प ने जो झूठे-सच्चे पैंतरे बदले, उन्हें सही ठहरा पाना उत्तरोत्तर कठिन होता जा रहा है| यहाँ तक कि ट्रम्प ने, अमेरिकी इतिहास में पहली बार, राष्ट्रपति की जांच कर रही एफबीआई के डायरेक्टर को ही बरखास्त कर दिया|

मोदी ने अपने चुनाव अभियान में पाकिस्तान के विरुद्ध युद्धोन्माद खड़ा करने में ‘छप्पन इंच के सीने’ से लेकर ‘एक के बदले सौ सर’ जैसी अव्यावहारिक डींगें जम कर हांकी थीं| तीन वर्षों के उनके इतिहास-दृष्टि रहित शासन में काश्मीर की उत्तरोत्तर बिगड़ती स्थित ने उनके समर्थकों की बोलती बंद कर दी है|

वे समझ नहीं पा रहे हैं कि अपने ‘नरेंद्रबली’ की पिलपिलाती छवि को कैसे फ़िल्मी ‘महाबली’ के रूप में दुरुस्त करें| मोदी का रास्ता सीमित होते-होते एकमात्र पाकिस्तान से युद्ध के विकल्प की ओर बढ़ रहा है| दो परमाणु शक्तियों के बीच यह एक मिलीभगत का युद्ध ही होगा, जिसके लिए अमेरिका का रजामंद होना जरूरी है| लगता नहीं कि ट्रम्प के अमेरिका के पास इसके लिए अभी समय है|

क्या वे अपने कार्य भार में इतिहास बोध के महत्व को कभी समझ पायेंगे- मोदी और ट्रम्प? डेढ़ दशक भी नहीं हुये, मोदी की साख इतनी कम होती थी कि उनको प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के हेलिकॉप्टर में घुसने नहीं दिया जाता था| आज वे स्वयं धाकड़ प्रधानमन्त्री बने बैठे हैं|

ट्रम्प को भी शायद ही किसी ने गंभीरता से लिया हो जब वे अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार बनने की दौड़ में उतरे| न सिर्फ वे भारी बहुमत से उम्मीदवार बने बल्कि उन्होंने बेहद करीबी मुकाबले में हिलेरी क्लिंटन को हराकर राष्ट्रपति पद भी हथिया लिया|

दोनों, ट्रम्प और मोदी, अपनी-अपनी तरह से अनुभव के धनी कहे जायेंगे और ट्रम्प के शब्दों में ‘डील’ करने में माहिर भी| तब भी, उनकी अभूतपूर्व राजनीतिक सफलताओं के बावजूद, उनकी राष्ट्रीय स्वीकार्यता पर बढ़ते प्रश्न चिन्ह की मुख्य वजह रही है उनकी कार्यशैली से ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का नदारद होना|

ट्रम्प को अपने नव-नियुक्त एनएसए जनरल फ्लिन को उनके रूस से संबंधों के सार्वजनिक होने पर बरखास्त करना पड़ा| जबकि मोदी की हालिया चुनावी सफलताओं पर इवीएम जालसाजी के आरोप चिपकने लगे हैं| ट्रम्प के सत्ता संभालते ही अमेरिका में मुस्लिम प्रवेश पर रोक वहां की अदालतों में एक दिन भी नहीं ठहर सकी| भारत में नियमित मुस्लिम वर्जना मोदी की विकास यात्रा में असहनीय बोझ हो चली है| जाहिर है, ऐतिहासिकता से मुंह मोड़ कर राष्ट्रीय नेतृत्व देने के अपने खतरे हैं|
  
किसी को बताने की जरूरत नहीं कि ‘पप्पू’ कहने पर भारतीय राजनीति का कौन सा चेहरा याद आता है| अमेरिकी राजनीति में लगता है ट्रम्प भी उसी स्थिति की ओर बढ़ रहे है| और मोदी? याद कीजिये, बिहार चुनाव में मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान से लगे तक्षशिला को बिहार का हिस्सा घोषित कर डाला था| यहाँ तक कि विज्ञान कांग्रेस में, गणेश के धड़ से हाथी का सर जोड़ने की दन्त कथा को उन्होंने प्राचीन भारत में अति विकसित सर्जरी के ‘इतिहास’ से जोड़ दिया| खासी किरकिरी के बाद अब वे अपना इतिहास बोध सुरक्षित स्तरों पर ही व्यक्त करते हैं|

सलन, ‘साठ साल बनाम साठ महीनों’ जैसी प्रचार चर्चाओं में| या विदेशी दौरों में शेखी मारकर कि उनसे कितने दशक पहले तक कोई भारतीय प्रधानमन्त्री उस देश में नहीं पहुंचा| मानना पड़ेगा, इन सब के लिए भारतीय मीडिया की मेहरबानी कैसे हासिल करनी है, मोदी बखूबी समझते हैं| ट्रम्प ने अमेरिका में ‘फेक मीडिया’ शब्द ईजाद किया जबकि मोदी ने उसे भारत में कार्यान्वित भी कर दिखाया|

काश! उन्हें भारत-पाक के बीच बार-बार असफल रही क्रिकेट डिप्लोमेसी या वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा को व्यर्थ करने वाली पाकिस्तानी फ़ौज की कारगिल पैंतरेबाजी में निहित ऐतिहासिक सन्देश की समझ भी होती| तो वे नवाज शरीफ के जन्म दिन पर लाहौर बिना बुलाये धमकने जैसे सतही कूटनीति में भारत-पाक तनावों का हल ढूंढने के बजाय, कश्मीर में कोई सार्थक राजनीतिक-सामरिक पहल कर रहे मिलते|

काश! नक्सल आयाम के आर्थिक-सामाजिक पहलू का इतिहास भी मोदी के सामरिक परिप्रेक्ष्य का हिस्सा हो सकता! तब वे इस समस्या का महज सैनिक हल हासिल करने की एक आयामी जिद में देश का समय और ऊर्जा न गँवा रहे होते| इतिहास बोध से संपन्न मोदी ने, उत्तर-पूर्व में शांति लाने के कांग्रेसी मॉडल की असफलता को ही दोहराते रहने के बजाय, दशकों तक अशांत रहे त्रिपुरा राज्य की, कम्युनिस्ट शासन में हासिल, ऐतिहासिक स्थिरता से सबक लिया होता|

तिहास किसी को माफ़ नहीं करता| देश के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू तो स्वयं किसी प्रबुद्ध इतिहासकार से कम न थे| उनकी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’, जो उन्होंने 1942-46 में ‘भारत छोड़ो’ के दौरान अहमदनगर किले में बंदी रहते हुये लिखी थी, को इतिहास क्रम में भारत की उदार संस्कृति और दर्शन से परिचय की खान कहा जा सकता है|

ह नेहरू के इतिहास बोध का ही करिश्मा था कि उन्होंने विश्व युद्धों से जर्जर दो ध्रुवीय विश्व में भारत के नेतृत्व में एक तीसरे तटस्थ ध्रुव की नींव रखी, और दो सदी की औपनिवेशिक दासता से बाहर निकले गरीब देश को आधुनिकता के प्रकाश से आलोकित रखा| पर चीन के महाशक्ति मंसूबों की ऐतिहासिक समझ की चूक ने उनसे भारी सामरिक भूल कराई, जिसकी कीमत देश को 1962 के युद्ध में मनोबल तोड़ने वाली पराजय के रूप में चुकानी पड़ी| 
     
मेरिका में 1961 के क्यूबा मिसाइल संकट को टालने का श्रेय आसानी से राष्ट्रपति केनेडी की इतिहास मर्मज्ञता को दिया जाता रहा है| वही अमेरिका आज अपने पैंतालीसवें राष्ट्रपति ट्रम्प को इतिहास का अनिच्छुक पाठ पढ़ते देखना चाहता है| हुआ यूँ कि ‘डील’ में माहिर ट्रम्प ने एक साक्षात्कार में खुद की तुलना अमेरिका के सातवें राष्ट्रपति एंड्रू जैक्सन से कर डाली| यहाँ तक भी गनीमत थी क्योंकि इतने भर से उनका जाना-पहचाना बड़बोलापन ही झलकता|

शर्ते, उसी झोंक में आगे वे यह न जोड़ देते कि एंड्रू जैक्सन होते तो अमेरिका का गृह युद्ध न हुआ होता, उसका समाधान निकाल लिया जाता| अमेरिका के इस सातवें राष्ट्रपति (1829-37) का निधन दास प्रथा को लेकर हुए गृह युद्ध से सोलह वर्ष पूर्व हो गया था और इतिहास में उन जैसे दास मालिक को गृह युद्ध से कभी जोड़ा भी नहीं गया|

जैक्सन को 1812 में न्यू ओरलेंस के युद्ध में ब्रिटिश फ़ौज को हराने वाली सेना का नेतृत्व करने पर राष्ट्रीय नायक की ख्याति मिली थी| 1824 में उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की और राजनीतिक जीवन में धनाढ्य वर्ग के विपरीत सामान्य लोगों के लिए काम किया| उनके कार्यकाल में अमेरिकी आदिवासियों का नियत बस्तियों में दारुण विस्थापन उनके नाम पर एक काला धब्बा माना जाता है|

ट्रम्प ने जैक्सन को एक दृढ़ व्यक्ति और बड़े दिलवाला कहा| 1830 के दशक में साउथ कैरोलिना अमेरिका से अलग होना चाहता था और तब जैक्सन ने उसे युद्ध की धमकी देकर यह इरादा छोड़ने पर बाध्य किया| उस समय समीकरण था एक राज्य बनाम शेष राष्ट्र का| दो दशक बाद, दक्षिण के ग्यारह राज्य एक साथ अलग होने को बजिद थे| उनके साथ युद्ध का मतलब गृह युद्ध ही था|

तिहासकार एकमत हैं कि जिस युद्ध को अब्राहम लिंकन जैसा दूरदर्शी राष्ट्रपति नहीं रोक सका, उसे जैक्सन की सैन्यवादी रणनीति कैसे भी नहीं रोक सकती थी| हाँ, इतिहास शून्य ट्रम्प को जरूर लगता है कि जैक्सन से तुलना कर वे स्वयं को एक दृढ़ और बड़े दिलवाला राष्ट्रपति कहलवा लेंगे, और आम व्हाइट अमेरिकी का हितैषी भी|
  
मोदी के एंड्रू जैक्सन सरदार पटेल हैं, ट्रम्प की तर्ज पर बिना उनके ऐतिहासिक अवदान को समझे ही| पटेल रियासतों के भारत में विलय के लिए जाते हैं, जबकि मोदी के राजनीतिक नेतृत्व में, देश के आधा दर्जन प्रांतों में सशस्त्र अराजकता बद से बदतर होती गयी है| पटेल ने लोकतांत्रिक संविधान और नौकरशाही के इस्पाती ढांचे को मजबूत किया, मोदी ने संविधान में पलीता लगाने और नौकरशाही को पिछलग्गू बनाने का काम किया है|

से में मोदी की इस समझ को क्या कहें कि पटेल की विश्व में सबसे ऊंची लौह मूर्ति लगाकर वे स्वयं को सरदार कहलवा लेंगे| देश का मुख्य राजनीतिक कार्यकारी इतिहास की समझ से शून्य हो तो उस देश को कब अपमान के दौर से गुजरना पड़ जाये, कहना मुश्किल है| ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की गंभीर कमी को वह ‘जोश’ से पूरी करता है और नाजुक भूलें करता है|

मने मोदी को, नोटबंदी से काला धन, आतंकवाद और भ्रष्टाचार ख़त्म करने का दावा करते देखा| हमने ट्रम्प को, मेक्सिको सीमा पर दीवार से अमेरिकियों के आर्थिक संकट के हल का सपना बेचते देखा| क्या हम उनमें इतिहास बुद्धि की कामना कर सकते हैं!  

Apr 1, 2017

दलित युवक को प्रेम करने की मिली सजा, आंखें निकाली फिर लिंग काटा

नृशंस हत्या के मामले में पुलिस ने दर्ज किया आत्महत्या का केस, कल गांव में बहुजन सेना और बहुजन स्टूडेंट फेडरेशन का होगा प्रचंड प्रदर्शन

जनज्वार। आप तस्वीर देख कर विचलित हो सकते हैं पर जनज्वार का मानना है कि आपको नृशंसता के इस वारदात की तस्वीर देखनी चाहिए, क्योंकि मारे गए उस 25 वर्षीय दलित युवक की भावनाएं कम कोमल नहीं रही होंगी, जिसकी मोहब्बत के बदले आंखें निकाल ली गयीं हैं, लिंग काट लिया गया। 


प्रेम करने का खामियाजा कुछ इस तरह चुकाया मधुकर ने : आँखें निकालीं, लिंग काटा और बुरी हालत में मौत के घाट उतार दिया 
एक पिछड़ी जाति की लड़की से प्रेम करने वाले युवक की नृशंस हत्या कर उसका लिंग और दोनों आँखें  निकाल लिए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। उससे भी सनसनीखेज यह है कि पुलिस ने इस मामले में आत्महत्या का मुकदमा दर्ज कर अपना काम पूरा कर लिया है। 
घटना तेलंगाना के करीमनगर जिले के  मंथानी गांव की है। 30 मार्च को नृशंसतापूर्वक मारा गया 25 वर्षीय मधुकर दलित जाति से है। बहुजन सेना के प्रोफेसर कादिर कृ​ष्णा बताते हैं, 'मधुकर गांव के ही पिछड़ी जाति के आदमी के यहां ट्रैक्टर चलाने का काम करता था। काम करने के दौरान ट्रैक्टर मालिक की बेटी से उसे प्यार हो गया। घर वालों  को यह बात पता चली तो उन्होंने उसे न सिर्फ जान से मार दिया, बल्कि दोनों आंखें निकाल लीं और लिंग काट दिया।'

गौरतलब है कि लड़की ने मधुकर से शादी करने के लिए घर वालों पर दबाव डाला और नहीं मानने पर जहर खा लिया। लेकिन लड़की की जान बच गयी. बाद में लड़की को जब पता चला कि उसके घरवालों ने मधुकर के साथ कुछ बुरा किया है तो उसने अपने प्रेमी मधुकर के घरवालों को फोन किया। घरवालों को मधुकर की लाश क्षत—विक्षत हालत में मिली। 
 दलित युवक मधुकर : प्रेम के बदले मिली मौत 
कल सैकड़ों की संख्या में प्रदर्शनकारियों के साथ मंथानी  गांव जा रहे कादिर बताते हैं, 'लड़की पिछड़ी जाति के 'मुनरू कापोस' उपजाति से है जिनकी टाइटिल 'डोरा' है। टीआरएस पार्टी के स्थानीय एमएलए पुट्टा मधु भी लड़की की ही जा​ति से हैं और उनका लड़की के ​परिवार से गहरा ताल्लुक है।' 

प्रोफेसर कादिर के अनुसार, ' मुनरू कापू जाति वाले अपने को रेड्डी सवर्णों के बहुत करीब पाते हैं और दलितों से वह वैसे ही नफरत करते हैं, जैसे दूसरी ताकवर जातियां। उसी नफरत का नतीजा है उनकी लड़की से प्रेम करने वाले युवक की यह नृशंस हत्या है।' 

दलित युवक की हत्या से व्यथित अर्चना सोंटी अपने फेसबुक पर तस्वीर शेयर करते हुए लिखती हैं, 'कहां गए पिछड़ी जातियों के वो ठेकेदार जो खुद को मजबूत बनाने के लिए बहुजन कहते हैं। वह टीवी पर बैठने वाले ब्राह्मण कहां हैं, क्यों चुप हैं जब एक दलित को प्यार के गुनाह में इस तरह से मारा गया।' 

इसी तरह सतीश कुमार कहते हैं, 'यह फिर हुआ है एक जातिवादी समाज में। फिर एक बार एक ​दलित की हत्या की गयी है। पर अबकी हत्यारों की झुंड में सवर्ण जाति कम्मा और रेड्डी नहीं हैं। वेलमा भी नहीं है, ​​बल्कि 'मुनरू कापू' पिछड़ी जाति के लोगों ने हत्या की है,जो धीरे—धीरे एक हत्यारे गैंग में तब्दील होते जा रहे हैं।

वीडियो में देखें मधुकर के भाई और मां क्या कह रहे हैं


Mar 22, 2017

दलित लड़की का गैंगरेप, विरोध करने पर भाई की उंंगलियां काटीं

योगी जी की पुलिस पहले गैंगरेप के सबूत मिटाती है फिर चार दिन बाद ​मुकदमा दर्ज करती है


जनज्वार। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही एक्शन में आए योगी आदित्यनाथ के प्रदेश की स्थिति यह है कि वहां चार ब्राह्मण जाति के लड़के जीतू, बॉबी, रितेश और प्रवीण पहले एक नाबालिग दलित लड़की का गैंगरेप करते हैं, भाई द्वारा विरोध करने पर उसकी उंगलियां काटते हैं, पेट में चाकू से 10 बार से ज्यादा वार करते हैं, मरा हुआ जानकर छोड़ जाते हैं और पिता शिब्बू जब इन घटनाओं को बताने के लिए पुलिस को फोन करते हैं तो इलाके का एसएचओ पीड़िता के बाप को एक रात हवालात की हवा खिलाकर कुटाई करता है कि तुम अपना केस वापस लो, मासूम लड़कों को बलात्कार जैसे संगीन आरोप में न फंसाओ, उनकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। 

और जब पिता ऐसा नहीं करता है तो आरोपियों के परिजन 17 वर्षीय नाबालिग पीड़िता के पिता के घर की छत में छेद करते हैं, उसे बाहर निकालते हैं, दम भर कु​टाई करते हैं और फिर घर लूटकर फूंक देते हैं। जिसमें दो मोटरसाइकिलों समेत सबकुछ जलकर खाक हो जाता है। साथ ही आरोपियों के परिजन धमकाते हैं अब राज बदल गया है. भाजपा विधायक अनिल शर्मा भी हमारा, पुलिस भी  हमारी. इस बीच वाल्मिकी परिवार खेतों—खलिहानों के रास्ते भागते हुए बुलंदशहर जाकर अपनी जान बचाता है। लूटपाट, आगजनी और जान से मारने की कोशिश के मामले में  मनोज, मनोज की घरवाली, पंकज, मुकेश, मनीष, नीतू, सोनू, राधा शर्मा,  शिवदत्त, सत्ता, वीरेंद्र और सोमू पर मुकदमा दर्ज है। पर एक भी गिरफ्तारी अबतक नहीं हुई है।

जी, हां। यही हुआ है यूपी के बुलंदशहर जिला के थाना जहांगिराबाद के ​कटियावली गांव में। गांव में तीन घर वाल्मिकी और पूरा गांव ब्राह्मणों का है। 14 मार्च की शाम 7.30 बजे अपने घेर (घर से अलग थोड़ी दूर पर जहां जानवरों को पालते हैं) पर पीड़िता जानवरों को बांधकर लौटने की ही वाली थी कि चार ब्राह्मण जाति के लड़कों ने उसको दबोच कर गैंगरेप किया। रेप करने वाले चारों आरोपियों की उम्र 20 से 30 साल के बीच है। 

पीड़ित पक्ष के वकील रणवीर सिंह लोधी बताते हैं, '14 मार्च की घटना का मुकदमा 18 मार्च को दर्ज हुआ। जहांगीराबाद थाना प्रभारी श्यामवीर ​सिंह ने मुकदमा दर्ज करने की बजाए पीड़िता के पिता को ही हवालात में डाल दिया और मुकदमा नहीं लिखाने पर दबाव बनाने लगे। दो दिन बाद में जब ये लोग मेरे पास आए तो एसएसपी सोनिया सिंह के हस्तक्षेप पर धारा 376, एसएसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है। हालांकि अब तक चारों में से किसी आरोपी की गिरफ्तारी पुलिस नहीं कर सकी है। पुलिस ने यह जरूर किया है कि आरोपियों के साथ मिलकर ज्यादातर सबूत मिटा दिए हैं।'

मुकदमा दर्ज कराए जाने के बाद पीड़ित परिवार गांव लौटने की हिम्मत नहीं कर पा रहा। मगर सरकार की ओर से अब तक पीड़ित परिवार के लिए न तो रहने की कोई व्यवस्था, न सुरक्षा और न ही कोई आर्थिक मदद मिली है। पीड़िता के भाई को बुलंदशहर जिला अस्पताल से दिल्ली रेफर कर दिया गया है। वहां के डॉक्टरों ने बताया कि पीड़िता के भाई राजा की हालत नाजुक है, उसे बेहतर ईलाज की जरूरत है। 

गौरतलब है कि 14 मार्च की शाम पीड़िता की चीख सुन उसका भाई राजा उसको बचाने के लिए दौड़ा आया। भाई को देख चारों ने लड़की को छोड़ उस पर हमला कर दिया। दरिंदों ने बचाव करते भाई के हाथ की चार उंगलियां काट दीं और 10 बार से ज्यादा बार चाकू से वार किया। इस जघन्य वारदात की सूचना के लिए पीड़िता के पिता ने रात में कई बार पुलिस के 100 नंबर पर फोन किया पर कोई नहीं आया। पीड़िता के पिता शिब्बू अन्य रिेश्तेदारों के साथ बेटे को नजदीकी अस्पताल में ले गए। 

Oct 28, 2016

मैंने पापा को ऐसे रोते कभी नहीं देखा था, वो भयावह मंजर आज भी मैं भूल नहीं पाती

 एक गांव का दफन हो जाना

रिम्मी 
 
कल 17 साल बाद सेनारी हत्याकांड का फैसला आया. 38 आरोपियों में से 15 को अदालत ने दोषी पाया और 23 के रिहा होने का फैसला दिया. आप में से अधिकतम लोगों को पता भी नहीं होगा ये कौन सा हत्याकांड था, कब हुआ था, क्यों हुआ था और मरने वाले कौन थे. जैसा की अमूमन हर घटना के बाद होता है. जब तक वो सुर्खियों मेें रहती है हमें याद रहता है और खबर ठंडी होने के साथ ही हम भी उसे भूल जाते हैं. ये भयावह मंजर अगर किसी को नहीं भूलता तो सिर्फ उनलोगों को जो अपनों को खोते हैं. जिनका घर उजड़ जाता है, संसार तबाह हो जाता है.

ऐसे ही ये बिहार का चर्चित हत्याकांड मेरे जेहन में हमेशा ताजा रहती है क्योंकि मैं इसकी भुक्तभोगीं हूं. इस नरसंहार में मैने अपनों को खोया था वो भी एक- दो नहीं बल्कि छह लोग! जीवन की कभी ना भूलने वाली घटनाओं में से एक थी ये घटना. सबकुछ मेरे दिमाग में ऐसे छपा है जैसे कल की ही बात हो.

वो 18 मार्च 1999 की सुबह थी. मेरे 10वीं के बोर्ड एक्जाम चल रहे थे. तीन पेपर हो चुके थे 20 मार्च को मैथ्स का और 23 मार्च को सोशल साइंस का एक्जाम बचा हुआ था. घर में केबल टीवी नहीं था इसलिए रोजाना हम सुबह सात बजे का दूरदर्शन पर आने वाले समाचार को देख बीती रात में देश-दुनिया की बड़ी खबरों से रु-ब-रु होते थे. हर रोज की तरह उस रोज भी पापा ने टीवी चलाया. टीवी पर हेडलाइन चल रही थी. पहली ही हेडलाइन को एंकर ने पढ़ा- बिहार के जहानाबाद जिले स्थित सेनारी गांव में 35 लोगों की नृशंस हत्या!

हम टीवी देखते नहीं सुनते थे. वो सुबह भी हमारी आम दिनों की ही सुबह थी. मम्मी आंगन में चूल्हे पर नाश्ता बना रही थी. पापा बाहर क्यारियों में पानी दे रहे थे, मैं पढ़ रही थी. सभी अपने काम में मग्न टीवी सुन रहे थे. पर इस हेडलाइन को सिर्फ मैने सुना. मैं पापा के पास भागी, मम्मी आंगन से दौड़ी आई. हम सब अब टीवी के आगे चिपक गए. किसी को भरोसा नहीं हो रहा था कि ये मेरे ही घर आंगन को मीडिया कवर कर रही है. ये बात मेरे ही आंगन की हो रही है. समाचार खत्म हुआ. फोन की कोई सुविधा नहीं थी और दूरदर्शन के उस समाचार से हम ये मान ही नहीं पाए की नरसंहार का गवाह हमारा ही गांव बना है.

पड़ोस में रहमान अंकल के घर केबल लगा था. हम सभी भागे-भागे उनके घर इस न्यूज को कन्फर्म करने पहुंचे. कई बार एक ही खबर को देखने के बाद यकीन हो गया कि 'शायद' ये हमारा ही सेनारी गांव है! हर तरफ कोहराम मच गया. मोहल्ले की आंटियां हमारे घर आकर मम्मी के पास सांत्वना देने बैठ गयीं. पापा आनन-फानन में घर से तीन किलोमीटर दूर के एसटीडी बूथ पर फोन करने गए. किसी को कुछ समझ नहीं आया कि हो क्या रहा है और आखिर ये सब हुआ कैसे.

जैसे तैसे दिन बीता. शाम को फिर पापा एसटीडी बूथ पर गए. उधर से जो खबर आई वो बस दिल को हिला देने के लिए काफी थी, हालांकि हम सभी इस सच्चाई को कहीं ना कहीं मान चुके थे कि खबरों का हिस्सा हम बन चुके हैं. पर फिर भी दिल के किसी कोने में ये आस लगाए बैठे थे कि हमारा सोचना गलत हो जाए. पापा घर आए और उनका रो-रोकर बुरा हाल. मैने पापा को उस तरह से रोते उसके पहले कभी नहीं देखा था. बच्चों की तरह चिंघाड़े मार, छातियां पीट-पीट रोना. जमीन में रोते रोते गिर पड़ना. कभी ना भूलने वाला ये मंजर मेरी आंखों के सामने चल रहा था. मम्मी एक कोने में रो रही थी, मैं और मेरा छोटा भाई कभी मम्मी से लिपटते तो कभी पापा से.

बदहवासी का वो पहला मंजर था मेरी याद में. अगले दिन सुबह पापा पटना निकल गए. वहां जाकर पता चला कि पापा के एक चचेरे भाई इस घटना को सहन ही नहीं कर पाए और गांव में अपनी आंखों के सामने इतनी लाशें उसमें से परिवार के चार लोगों को ढ़ेर देख हार्ट-अटैक के शिकार हो गए. मौके पर उनकी मौत हो गई और हमारे खानदान से एक और नाम मिट गया.

इन मौतों पर राजनीति भी खूब हुई और बाजार भी भरपूर लगा. पर हमने जो खोया वो सिर्फ और सिर्फ राजनीति की ही देन थी. सवर्ण बनाम दलित कार्ड खेलकर सरकारें बनीं, राबड़ी देवी ने कहा सेनारी से हमें वोट नहीं आता इसलिए हम उस गांव का दौरा नहीं करेंगे! सेनारी हत्याकांड का बदला लेने के नाम पर सवर्णों ने पास के ही मियांपुर गांव में कत्लेआम मचाया.

इस खूनी खेल में मुझे नहीं पता किसी को मिला क्या, पर इतना पता है कि खोया बहुतों ने. कई बच्चे अनाथ हो गए. गांव के गांव का भविष्य खत्म हो गया जो आज भी पिछड़ेपन में ही जी रहे हैं. आत्मा की शांति तो आज बहुतों को मिली होगी पर सबसे ज्यादा खुशी मुझे उस दिन होगी जब इस तरह के तमाम कत्लेआम और घटनाओं को करने वाले नहीं बल्कि करवाने वाले सूलियों पर चढ़ाए जाएंगे.

रिम्मी दिल्ली में पत्रकार हैं और सेनारी हत्याकांड में उनके परिवार के लोगों की हत्या हुई थी। वह
गुफ़्तगू नाम से ब्लॉग लिखती हैं। यह संस्मरण उसी ब्लॉग से।

Feb 6, 2016

'आलोचना के नाम पर गालियां दी जाती हैं आरसीएलआई में'

वामपंथ के नाम पर ठगी, शोषण और मुनाफे का धंधा चलाने वाले शशिप्रकाश और उनकी पत्नी कात्यायिनी के परिवार के मालिकाने वाले कम्यूनिस्ट संगठन आरसीएलआई की धंधेबाजी के खिलाफ उठी  आवाज पर मौन साधने वालों में तीन तरह के लोग अव्वल हैं। पहले हैं कात्यायिनी के स्वजातीय बुद्धिजीवी,  दूसरे हैं उनके यहां क्रांति के भ्रम में फंसे युवा और तीसरे हैं शशिप्रकाश के परिवार से जुड़े समाजवादी खेमे के दो कम्यूनिस्ट संगठन। हां, चुप रहने वालों में उन वामपंथियों की भी एक संख्या है जो खुद के संगठनों की सड़ाध को ढांपे रखना चाहते हैं। पर इसके मुकाबले सच को उजागर करने वालों की तादाद इतनी बड़ी, व्यापक और साहसी है कि इनकी हर जनविरोधी कार्रवाई को हर कीमत पर समाज में सरेआम करती है। इनकी गालियों, तोहमतों और धमकियों के मुकाबले तनकर खड़ी होती है और डंके की चोट पर इनके ठगी और शोषण को तथ्यजनक रूप से सबके सामने लाती है।

इसी कड़ी में पंजाब  से मनप्रीत मीत का पत्र

साथियो, मैं इस पत्र को अपने आखिरी स्‍टेटमेंट के तौर पर रख रही हूं, इसके बाद मैं इस पर और कुछ नहीं कहूंगी। ध्‍यान रहे, आपकी चुप्‍पी भविष्‍य में अन्‍याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को निकलने से पहले ही रोक देगी, क्‍योंकि जब जन-पक्षधर लोग ही चुप लगाकर ऐसी बातें होते हुए देखेंगे, तो भला अन्‍याय का प्रतिकार करने वाले लोग कहां जाएंगे?

सभी इंसाफपसंद नागरिकों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम खुला पत्र

मेरा सरोकार इतना ही है कि नव करण के साथ और ऐसे तमाम युवाओं के साथ इंसाफ हो, जो RCLI की पतित व घृणित राजनीति के दुष्‍चक्र में फंसे हुए हैं।

साथियो, कामरेड नव करण की आत्‍महत्‍या के बाद, पिछले तीन-चार दिन में जो हालात हुए हैं उनकी वजह से मैं यह खुला पत्र लिखने को मजबूर हो रही हूं।

सबसे पहले, मैं यह स्‍पष्‍ट कर दूं कि Revolutionary Communist League of India (RCLI) को छोड़ने के बाद मेरा किसी भी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। मैंने उस समय के बाद से कभी RCLI पर कोई टिप्‍पणी नहीं की है। निजी जीवन की परेशानियों व खराब तबियत के कारण मैं आंदोलन में सक्रिय भागीदारी नहीं कर सकी, लेकिन जितना भी हो सका, आंदोलन के जनपक्षधर मामलों का समर्थन करने का प्रयास करती हूं।

मैं किसी मार्क्‍सवादी,स्‍तालिनवादी या त्रात्‍सकीवादी संगठन से नहीं जुड़ी हूं। ऐसे किसी भी संगठन द्वारा किसी भी मार्क्‍सवादी शिक्षक पर की गई छींटाकशी का मैं हिस्‍सा नहीं हूं। मेरा सरोकार इतना ही है कि नव करण के साथ और ऐसे तमाम युवाओं के साथ इंसाफ हो, जो RCLI की पतित व घृणित राजनीति के दुष्‍चक्र में फंसे हुए हैं। साथी नव करण ही आत्‍महत्‍या ने ही यह बेचैनी भी पैदा की कि युवा इस संगठन की सच्‍चाई को जानने का प्रयास करें, आंख बंद करके ज्ञानपूर्ण प्रवचनों के भ्रमजाल में न फंसे और अपनी क्रांतिकारी ऊर्जा को सही दिशा में लगाएं। कोई इंसान सक्रिय क्रांतिकर्म में नहीं लगा है, तो इसका यह मतलब नहीं कि वह अपने आस-पास हो रहे अन्‍याय के बारे में बोलना भी बंद कर दे।

मैं 2010 में RCLI से जुड़ी और पंजाब के नेताओं के बेहद खराब व्‍यवहार के बावजूद लंबे वक्‍त तक यह सोचकर आंदोलन में सक्रिय रही कि क्रांति के बड़े लक्ष्‍यों के सामने मुझे अपने कष्‍टों की अनदेखी करनी चाहिए। मैं अपना घर-परिवार छोड़कर आंदोलन में शामिल हुई थी और सक्रिय रहने के दौरान ही डॉक्‍टर अमृत पाल से मेरी शादी हुई थी। RCLI में अपने सक्रिय दिनों के दौरान, मुझ पर लगातार ताने कसे जाते थे, बीमार हालत में अकेले छोड़ दिया जाता था और अमृत पाल को मेरे खिलाफ भड़काया जाता था।

आलोचना के नाम पर गालियां दी जाती थी। मैं इस सबको अपनी कमजोरी मानकर, चुपचाप किताब बेचने, ट्रेन व बस अभियान में पैसे जमा करने, कार्यालयों की साफ-सफाई करने जैसे काम में लग जाती थी। खैर, इस बारे में अपने कटु अनुभवों का ब्‍योरा फिर कभी। जब मामला हद से गुजर गया, तो अंतत: मैंने RCLI छोड़ दी। संगठन के उकसावे और अपने ढुलमुनपन के कारण अमृत पाल ने तलाक की पेशकश रखी और मैंने इंकार नहीं किया। लेकिन तलाक होने के बाद भी लंबे वक्‍त तक अमृत पाल चंडीगढ़ में मेरे पास आकर रुका करता था।

मैंने उसे कई बार संजीदगी से अपने व्‍यवहार पर सोचने को कहा। मेरे पास आकर वह भी संगठन के नकारात्‍मक पक्षों पर मौन सहमति तो जताता था, पर कुछ ठोस करने से मुकर जाता था। आखिर, मैंने उसे अंतिम विदा कह ही दिया। इसके बावजूद वह लगातार फोन करता था, पर धीरे-धीरे उसे समझ आ गया कि अब मुझे बहलाना संभव नहीं है। संक्षेप में यह बातें इसलिए, ताकि सनद रहे कि मेरे चरित्र पर कीचड़ उछालने की हाल की हरकतें निराधार हैं और बदले की कार्रवाई हैं।

साथी नव करण की आत्‍महत्‍या की खबर मुझे 26 जनवरी को हुई, लेकिन पूरी जानकारी के इंतजार में मैंने इस बारे में कोई टिप्‍पणी नहीं की। इस बारे में मैंने पहली बार 30 जनवरी को लिखा और वह भी नव करण की आत्‍महत्‍या के कारणों और RCLI के नेताओं की षडयंत्रकारी चुप्‍पी से मामले को रफा-दफा कर दिए जाने की कोशिश के बाद। याद रहे कि इस बारे में संगठन का बयान भी इसी के बाद आया और तब तक संगठन चुप्‍पी साधे रहा था। यह भी ध्‍यान रहे कि इस पर सामान्‍य तर्कसंगत सवाल उठाने पर साथी अभिषेक श्रीवास्‍तव पर भी कुत्‍सा-प्रचार करने का आरोप लगा दिया गया।

मैंने और दूसरे लोगों ने सिर्फ इतना पूछा था कि आखिर नव करण ने आत्‍महत्‍या क्‍यों की? वह पूरावक्‍ती कार्यकर्ता था और जैसा कि RCLI ने नव करण की श्रद्धांजलि में भी कहा, वह बेहद संवेदनशील और प्रतिभावन कार्यकर्ता था। आखिर ऐसे कार्यकर्ता को अपने सुसाइड नोट में यह क्‍यों लिखना पड़ा कि वह भगोड़ा है, पर गद्दार नहीं और मुझमें उन जैसी अच्‍छाई नहीं और मेरे बारे में रियायत के साथ सोचना? आखिर क्‍यों आत्‍महत्‍या के एक सप्‍ताह बाद तक कोई बयान नहीं आया आखिर क्‍यों 30 जनवरी को साथी नव करण की आत्‍महत्‍या के बाद पूछे सवालों पर तब तक चुप्‍पी रही जब तक कि 31 जनवरी को नौजवान भारत सभा ने देर रात गये एक संवेदनहीन और खोखला स्‍पष्‍टीकरण नहीं दे दिया गया?

इसके बाद, संगठन के नेताओं (कविता, सत्‍यम, कात्‍यायनी आदि) ने जो पोस्‍टें डालीं उनमें तीन तरह की बातें थी : पहली, खोखली श्रद्धांजलि (उसमें भी धैर्य नहीं बरत पाये और सवाल उठाने वालों को कुत्‍सा प्रचार करने वाला कहा गया)। दूसरी, कुछ उद्धरण जिनके जरिए सवाल उठाने वालों को मुर्दाखोर गिद्ध समेत ढेरों उपाधियों से नवाजा गया। तीसरी, विपयर्य का दौर और क्रांतिकारी आंदोलन में होने वाली इस तरह घटनाओं पर झूठी हमदर्दी बटोरने वाली बातें।

इस दौरान, कार्यकर्ताओं को खुला छोड़ दिया गया कि वे सवाल उठाने वालों की सामाजिक हैसियत देखकर, उन्‍हें खुले आम गाली दें (अशोक पांडे को मुत्‍तन पांडे और भगोड़ा-गद्दार कहना, राजेश त्‍यागी व राजिन्‍दर को पतित त्रात्‍सकीपंथी कहना, अभिषेक श्रीवास्‍तव को तनिक नजाकत के साथ कुत्‍सा-प्रचार करने वाला कहना, और प्रदीप और मुझे खुले आम गाली देना, चरित्रहीन कहना)। इसमें मार-पीट की धमकी देना शामिल है।

साथियो, मैं इस पत्र को अपने आखिरी स्‍टेटमेंट के तौर पर रख रही हूं, इसके बाद मैं इस पर और कुछ नहीं कहूंगी। ध्‍यान रहे, आपकी चुप्‍पी भविष्‍य में अन्‍याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को निकलने से पहले ही रोक देगी, क्‍योंकि जब जन-पक्षधर लोग ही चुप लगाकर ऐसी बातें होते हुए देखेंगे, तो भला अन्‍याय का प्रतिकार करने वाले लोग कहां जाएंगे?

इस अंधेरे दौर में, लोग अंधेरे के खिलाफ कैसे उठ खड़े होंगे जबकि अंधेरे के खिलाफ बोलने वाले लोग ही इंसाफ की लड़ाई में चुप्‍पी लगाकर बैठे रहेंगे? क्‍या मार्क्‍सवाद हमें सवाल उठाने या शंका करने से रोकता है? क्‍या मार्क्‍सवादी सवाल उठाने वाले व्‍यक्ति को दक्षिणपंथियों की तरह गालियां देंगे (वे लोगों को पाकिस्‍तान भेजने और मार डालने की धमकी देते हैं, और ये यहीं मारपीट करने, गालियां देने और चरित्रहनन करने जैसी बातें करते हैं)?

साथियो, जब कोई ''वामपंथी'' भगत बन जाता है, तो वह समूचे आंदोलन को कीचड़ में धकेल देता है और लोगों का क्रांतिकारी आंदोलन से ही भरोसा उठ जाता है। दुनिया भर के क्रांतिकारी आंदोलन में लोग नेताओं पर, संगठनों के गलत फैसलों पर, कठमुल्‍लावाद पर, लाइन पर सवाल उठाते रहे हैं, और दुनिया भर में ''सवाल उठाने वालों को किनारे लगा दिए जाने'' की ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती। यह शर्मनाक है। मैं इस आखिरी बात के साथ अपनी बात खत्‍म करती हूं कि आप अगर इस समय अपना पक्ष और राय नहीं देते, तो याद रहे कि भविष्‍य में किसी भी अन्‍याय के खिलाफ आवाज उठाने वाला कोई नहीं बचेगा। (फेसबुक वाल से साभार)

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
मनप्रीत मीत

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Jan 24, 2016

आज का एकलव्य होता तो एक बाल नोचकर न देता द्रोणाचार्य को

संघर्ष में विजित, पराजित और सक्रिय रहने वाले दलितों को एकलव्य क्यों कहना है? 

यह उदाहरण अपने आप में ब्राम्हणवाद को मजबूत नहीं करता। 

मैं यह इसलिए पूछ रहा हूं कि रोहित वुमेला के मौत के बाद फिर एक बार यह शब्द तेजी से ट्रेंड करने लगा है। वह भी उसके पक्षधरों द्वारा। 

एक तरफ आप कहते हैं, दलितों का महाकाव्य अभी लिखा जाना है और दूसरी तरफ शोषकों के महाकाव्य में रचित चरित्र को सिर—आंखों पर बैठाते हैं। आप महिषासुर को पुर्नपरिभाषित कर रहे हैं, लेकिन आज के युग में आदर्श बन रहे दलितों को एकलव्य से आगे नहीं जाने दे रहे। 

रही होगी उस समय एकलव्य की कोई मजबूरी जो उसने द्रोणाचार्य को अपना अंगूठा दे दिया, लेकिन आज का दलित एक बाल नोचकर न दे। उल्टे वह सदियों का हिसाब ले ले। क्या वह इतने के बाद भी एकलव्य की तरह ईमोशनल वारफेयर में फंसेगा ? 


आपको लगता है कि अगर किसी दलित ने महाभारत लिखी होती तो अपना धर्म न निभाने वाले द्रोणाचार्य के प्रति वह वैसा ही रवैया बरतता जैसा व्यास ने बरता है। नहीं न। न ही धनुष विद्या में निपुण एकलव्य बकलोल होता, जो अपनी बेइज्जती इस कदर भूल जाता कि वह अपना अस्त्र 'अंगूठा' ही दान कर दे। 


पूरा महाभारत 'कर्म करो फल की चिंता मत करो' के सूत्र वाक्य का समाहार है तो क्या एकलव्य का यही कर्म था। 


एक काबिल दलित का अंगूठा देना ब्राम्हणवाद की उस परंपरावादी समझ को पुष्ट नहीं करता है कि तुम चाहे जितने काबिल हो जाओ, बुद्धि में तुम हमसे पार न पा पाओगे, हम तुम्हें कमतर करके ही छोड़ेंगे। मतलब वे अनंतकाल तक एकलव्य पैदा करते रहेंगे। 


पर आज का दलित इस श्रेष्ठता बोध को क्यों जारी रहने दे और खुद हीनताबोध में क्यों जिए ।