Showing posts with label suicide. Show all posts
Showing posts with label suicide. Show all posts

Mar 28, 2017

सेना ने दर्ज कराया स्टिंग करने वाली पत्रकार पर मुकदमा

जनज्वार। देश सेवा की भावना से सेना में भर्ती होने वाले सैनिकों का इस्तेमाल सैन्य अधिकारी घरेलू नौकर के रूप में करते हैं, इस बात को स्टिंग के जरिए उजागर करने वाली पत्रकार पूनम अग्रवाल पर सेना ने नासिक में मुकदमा दर्ज कराया है।

 पत्रकार द्वारा सैनिकों के किए स्टिंग के बाद एक सैनिक लांस नायक रॉय मैथ्यू ने आत्महत्या कर ली थी। 

लांस नायक मैथ्यू केरल के कोलम जिले के एझुकोन के रहने वाले थे। उनकी तैनाती  महाराष्ट्र के नासिक जिले के देओलाली छावनी में थी। छावनी में ही सैनिक मैथ्यू का शव खाली बैरक की छत से 4 मार्च को लटकता मिला था। पुलिस बयानों के मुताबिक जवान की मौत करीब 3 दिन पहले हो चुकी थी। 

स्टिंग वीडियो वायरल होने के बाद 25 फरवरी से ही मैथ्यू देओलाली में आर्टिलरी सेंटर से लापता थे। 

मैथ्यू ने भी अन्य सैनिकों की तरह पत्रकार से कहा था कि 'सहायक' के रूप में सैन्य अधिकारी हमारा इस्तेमाल व्यक्तिगत नौकर की तरह करते हैं। पत्रकार के स्टिंग में भी सैनिक अधिकारियों के कुत्ते टहलाते और सब्जी लाते देखे जा सकते हैं।

गौरतलब है कि सेना ने स्टिंग ऑपरेशन करने वाली वेबसाइट 'द क्वींट' की भूमिका पर उसी समय सवाल उठाए थे। कहा था कि सेना के ​ठीकानों पर गुप्त कैमरों से स्टिंग करना और उसे सार्वजनकि करना प्रतिबंधित है। इस मामले में रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने मैथ्यू की रहस्यमय मौत संसद में बयान देना पड़ा था। वहीं तत्कालीन गृहमंत्री मनमोहन पर्रिकर ने सैनिक की आत्महत्या को 'छिटफुट घटना' बताकर सरकार की किरकिरी करा दी थी। 

नासिक में सेना ने पत्रकार पूनम अग्रवाल के खिलाफ विभागीय गुप्त मामलों का खुलासा करने और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में मुकदमा दर्ज कराया है। यह सेना के उस पत्र के बाद हुआ था जिसमें पुलिस को कहा गया था कि पत्रकार पर उचित धाराओं के तहत मुकदमा कर कार्यवाही करे। 

पत्रकार पूनम अग्रवाल ने इंडियन एक्सप्रेस मुकदमा दर्ज होने के बाद हुई बातचीत में बताया, 'इस मामले में मेरी सैन्य अधिकारियों से मुलाकात हुई। स्टिंग का जरिया और बातचीत दिखा दिया था। पर उस दौरान अधिकारियों ने यह नहीं ​कहा कि यह सब प्रतिबंधित है।' 

Jun 1, 2016

एक पहेली सुनिए और सुलझाइए...

करीब पंद्रह दिन पहले की बात है। एक स्कूल होता है। उसमें लड़का—लड़की दोनों पढ़ते हैं। जैसा कि पढ़ाई के दौरान कई बार होता है, वो यहां भी होता है। 16—17 साल के एक ही गांव के एक जोड़े में मोहब्बत हो जाती है। पर मोहब्बत भी इतनी आसान चीज कहां। निगोड़ी हर बार जाति—धर्म के साथ आती है, सो इस बार भी आई है। 

लौंडिया हिंदू है और लौंडा मुसलमान। प्रेम परवान चढ़ता है। दुनिया खूबसूरत लगने लगती है। जोड़े एक बार इस दुनिया को जिंदगी में घुली खूबसूरती के साथ निहारते हैं। वह खूबसूरती की खुशी को सबमें बांटना चाहते हैं। वे अपनों से चहक—चहक के 'जिंदगी में पहली बार हुआ है' कहना चाहते हैं। पर कहां ये खाम ख्याली। उनकी आंखें सूख जाती हैंं। हृदय कहता है यहां अब और नहीं, कहीं और चलो। वे प्लान बनाते हैं। 

लौंडे के पास थोड़ा पैसा है, कुछ घर से दाएं—बाएं करता है। एक बाइक जुगाड़ता है और निकल पड़ते हैं दोनों कि जहां तक आसमां चले। पर बाइक और पेट से दिल का क्या। यह तो रोकड़े से चलता है और रोकड़े की नियती खत्म होने की है। सो खत्म हो जाता है और जोड़ा अपने घर लौट आता है। 

अब कहानी रोकड़ा खत्म होने के बाद की
जोड़ा शादी कर चुका है। लड़की ससुराल जाती है। मायके वालों को पता चल जाता है। बेटी को वह घसीट लाते हैं। थोड़े दिन सब चुप रहते हैं। फिर बेटी की शादी अपनी जाति में कहीं और कर दी जाती है। लड़की थोड़े दिन नए पति के साथ रहती है। फिर एक दिन वह लौटकर मायके आती है। देर रात में वह अकेले मायके से निकल पड़ती है। अपने प्रेमी के घर जाती है। लड़का मिलता है। वह अपने कमरे में होता है। शायद लड़की के इंतजार में। लड़की उसके कमरे में जाती है और थोड़ी देर बाद कमरे से धुआं उठता है। मोहल्ले को पता चलता है। लोग जुटते हैं। दरवाजा टूटता है। दो लाशें गिरती हैं।

आखिरी बयान
विक्षिप्त सा हो रहा लड़के का पिता कहता है, 'उस पानी में ही क्यों उतरना जिसको पार करना न आता हो।'

पहेली में जो सुलझाना है
आपको गुनहगार बताना है। ध्यान रहे जब आप गुनहगार चिन्हित कर लें तो यह पहेली आप औरों को सुनाएं और उनसे कहें वह किसी और को सुनाएं। बहुत जरूरी पहेली है सर। हल्के में मत लेना। हल्के में लेंगे तो फिर एक बार पुलिस इसे आत्महत्या का सीधा मामला और समाज 'जैसी करनी वैसी भरनी' की परिपाटी बताकर आपको चलता कर देगा।

Feb 6, 2016

'आलोचना के नाम पर गालियां दी जाती हैं आरसीएलआई में'

वामपंथ के नाम पर ठगी, शोषण और मुनाफे का धंधा चलाने वाले शशिप्रकाश और उनकी पत्नी कात्यायिनी के परिवार के मालिकाने वाले कम्यूनिस्ट संगठन आरसीएलआई की धंधेबाजी के खिलाफ उठी  आवाज पर मौन साधने वालों में तीन तरह के लोग अव्वल हैं। पहले हैं कात्यायिनी के स्वजातीय बुद्धिजीवी,  दूसरे हैं उनके यहां क्रांति के भ्रम में फंसे युवा और तीसरे हैं शशिप्रकाश के परिवार से जुड़े समाजवादी खेमे के दो कम्यूनिस्ट संगठन। हां, चुप रहने वालों में उन वामपंथियों की भी एक संख्या है जो खुद के संगठनों की सड़ाध को ढांपे रखना चाहते हैं। पर इसके मुकाबले सच को उजागर करने वालों की तादाद इतनी बड़ी, व्यापक और साहसी है कि इनकी हर जनविरोधी कार्रवाई को हर कीमत पर समाज में सरेआम करती है। इनकी गालियों, तोहमतों और धमकियों के मुकाबले तनकर खड़ी होती है और डंके की चोट पर इनके ठगी और शोषण को तथ्यजनक रूप से सबके सामने लाती है।

इसी कड़ी में पंजाब  से मनप्रीत मीत का पत्र

साथियो, मैं इस पत्र को अपने आखिरी स्‍टेटमेंट के तौर पर रख रही हूं, इसके बाद मैं इस पर और कुछ नहीं कहूंगी। ध्‍यान रहे, आपकी चुप्‍पी भविष्‍य में अन्‍याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को निकलने से पहले ही रोक देगी, क्‍योंकि जब जन-पक्षधर लोग ही चुप लगाकर ऐसी बातें होते हुए देखेंगे, तो भला अन्‍याय का प्रतिकार करने वाले लोग कहां जाएंगे?

सभी इंसाफपसंद नागरिकों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम खुला पत्र

मेरा सरोकार इतना ही है कि नव करण के साथ और ऐसे तमाम युवाओं के साथ इंसाफ हो, जो RCLI की पतित व घृणित राजनीति के दुष्‍चक्र में फंसे हुए हैं।

साथियो, कामरेड नव करण की आत्‍महत्‍या के बाद, पिछले तीन-चार दिन में जो हालात हुए हैं उनकी वजह से मैं यह खुला पत्र लिखने को मजबूर हो रही हूं।

सबसे पहले, मैं यह स्‍पष्‍ट कर दूं कि Revolutionary Communist League of India (RCLI) को छोड़ने के बाद मेरा किसी भी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। मैंने उस समय के बाद से कभी RCLI पर कोई टिप्‍पणी नहीं की है। निजी जीवन की परेशानियों व खराब तबियत के कारण मैं आंदोलन में सक्रिय भागीदारी नहीं कर सकी, लेकिन जितना भी हो सका, आंदोलन के जनपक्षधर मामलों का समर्थन करने का प्रयास करती हूं।

मैं किसी मार्क्‍सवादी,स्‍तालिनवादी या त्रात्‍सकीवादी संगठन से नहीं जुड़ी हूं। ऐसे किसी भी संगठन द्वारा किसी भी मार्क्‍सवादी शिक्षक पर की गई छींटाकशी का मैं हिस्‍सा नहीं हूं। मेरा सरोकार इतना ही है कि नव करण के साथ और ऐसे तमाम युवाओं के साथ इंसाफ हो, जो RCLI की पतित व घृणित राजनीति के दुष्‍चक्र में फंसे हुए हैं। साथी नव करण ही आत्‍महत्‍या ने ही यह बेचैनी भी पैदा की कि युवा इस संगठन की सच्‍चाई को जानने का प्रयास करें, आंख बंद करके ज्ञानपूर्ण प्रवचनों के भ्रमजाल में न फंसे और अपनी क्रांतिकारी ऊर्जा को सही दिशा में लगाएं। कोई इंसान सक्रिय क्रांतिकर्म में नहीं लगा है, तो इसका यह मतलब नहीं कि वह अपने आस-पास हो रहे अन्‍याय के बारे में बोलना भी बंद कर दे।

मैं 2010 में RCLI से जुड़ी और पंजाब के नेताओं के बेहद खराब व्‍यवहार के बावजूद लंबे वक्‍त तक यह सोचकर आंदोलन में सक्रिय रही कि क्रांति के बड़े लक्ष्‍यों के सामने मुझे अपने कष्‍टों की अनदेखी करनी चाहिए। मैं अपना घर-परिवार छोड़कर आंदोलन में शामिल हुई थी और सक्रिय रहने के दौरान ही डॉक्‍टर अमृत पाल से मेरी शादी हुई थी। RCLI में अपने सक्रिय दिनों के दौरान, मुझ पर लगातार ताने कसे जाते थे, बीमार हालत में अकेले छोड़ दिया जाता था और अमृत पाल को मेरे खिलाफ भड़काया जाता था।

आलोचना के नाम पर गालियां दी जाती थी। मैं इस सबको अपनी कमजोरी मानकर, चुपचाप किताब बेचने, ट्रेन व बस अभियान में पैसे जमा करने, कार्यालयों की साफ-सफाई करने जैसे काम में लग जाती थी। खैर, इस बारे में अपने कटु अनुभवों का ब्‍योरा फिर कभी। जब मामला हद से गुजर गया, तो अंतत: मैंने RCLI छोड़ दी। संगठन के उकसावे और अपने ढुलमुनपन के कारण अमृत पाल ने तलाक की पेशकश रखी और मैंने इंकार नहीं किया। लेकिन तलाक होने के बाद भी लंबे वक्‍त तक अमृत पाल चंडीगढ़ में मेरे पास आकर रुका करता था।

मैंने उसे कई बार संजीदगी से अपने व्‍यवहार पर सोचने को कहा। मेरे पास आकर वह भी संगठन के नकारात्‍मक पक्षों पर मौन सहमति तो जताता था, पर कुछ ठोस करने से मुकर जाता था। आखिर, मैंने उसे अंतिम विदा कह ही दिया। इसके बावजूद वह लगातार फोन करता था, पर धीरे-धीरे उसे समझ आ गया कि अब मुझे बहलाना संभव नहीं है। संक्षेप में यह बातें इसलिए, ताकि सनद रहे कि मेरे चरित्र पर कीचड़ उछालने की हाल की हरकतें निराधार हैं और बदले की कार्रवाई हैं।

साथी नव करण की आत्‍महत्‍या की खबर मुझे 26 जनवरी को हुई, लेकिन पूरी जानकारी के इंतजार में मैंने इस बारे में कोई टिप्‍पणी नहीं की। इस बारे में मैंने पहली बार 30 जनवरी को लिखा और वह भी नव करण की आत्‍महत्‍या के कारणों और RCLI के नेताओं की षडयंत्रकारी चुप्‍पी से मामले को रफा-दफा कर दिए जाने की कोशिश के बाद। याद रहे कि इस बारे में संगठन का बयान भी इसी के बाद आया और तब तक संगठन चुप्‍पी साधे रहा था। यह भी ध्‍यान रहे कि इस पर सामान्‍य तर्कसंगत सवाल उठाने पर साथी अभिषेक श्रीवास्‍तव पर भी कुत्‍सा-प्रचार करने का आरोप लगा दिया गया।

मैंने और दूसरे लोगों ने सिर्फ इतना पूछा था कि आखिर नव करण ने आत्‍महत्‍या क्‍यों की? वह पूरावक्‍ती कार्यकर्ता था और जैसा कि RCLI ने नव करण की श्रद्धांजलि में भी कहा, वह बेहद संवेदनशील और प्रतिभावन कार्यकर्ता था। आखिर ऐसे कार्यकर्ता को अपने सुसाइड नोट में यह क्‍यों लिखना पड़ा कि वह भगोड़ा है, पर गद्दार नहीं और मुझमें उन जैसी अच्‍छाई नहीं और मेरे बारे में रियायत के साथ सोचना? आखिर क्‍यों आत्‍महत्‍या के एक सप्‍ताह बाद तक कोई बयान नहीं आया आखिर क्‍यों 30 जनवरी को साथी नव करण की आत्‍महत्‍या के बाद पूछे सवालों पर तब तक चुप्‍पी रही जब तक कि 31 जनवरी को नौजवान भारत सभा ने देर रात गये एक संवेदनहीन और खोखला स्‍पष्‍टीकरण नहीं दे दिया गया?

इसके बाद, संगठन के नेताओं (कविता, सत्‍यम, कात्‍यायनी आदि) ने जो पोस्‍टें डालीं उनमें तीन तरह की बातें थी : पहली, खोखली श्रद्धांजलि (उसमें भी धैर्य नहीं बरत पाये और सवाल उठाने वालों को कुत्‍सा प्रचार करने वाला कहा गया)। दूसरी, कुछ उद्धरण जिनके जरिए सवाल उठाने वालों को मुर्दाखोर गिद्ध समेत ढेरों उपाधियों से नवाजा गया। तीसरी, विपयर्य का दौर और क्रांतिकारी आंदोलन में होने वाली इस तरह घटनाओं पर झूठी हमदर्दी बटोरने वाली बातें।

इस दौरान, कार्यकर्ताओं को खुला छोड़ दिया गया कि वे सवाल उठाने वालों की सामाजिक हैसियत देखकर, उन्‍हें खुले आम गाली दें (अशोक पांडे को मुत्‍तन पांडे और भगोड़ा-गद्दार कहना, राजेश त्‍यागी व राजिन्‍दर को पतित त्रात्‍सकीपंथी कहना, अभिषेक श्रीवास्‍तव को तनिक नजाकत के साथ कुत्‍सा-प्रचार करने वाला कहना, और प्रदीप और मुझे खुले आम गाली देना, चरित्रहीन कहना)। इसमें मार-पीट की धमकी देना शामिल है।

साथियो, मैं इस पत्र को अपने आखिरी स्‍टेटमेंट के तौर पर रख रही हूं, इसके बाद मैं इस पर और कुछ नहीं कहूंगी। ध्‍यान रहे, आपकी चुप्‍पी भविष्‍य में अन्‍याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को निकलने से पहले ही रोक देगी, क्‍योंकि जब जन-पक्षधर लोग ही चुप लगाकर ऐसी बातें होते हुए देखेंगे, तो भला अन्‍याय का प्रतिकार करने वाले लोग कहां जाएंगे?

इस अंधेरे दौर में, लोग अंधेरे के खिलाफ कैसे उठ खड़े होंगे जबकि अंधेरे के खिलाफ बोलने वाले लोग ही इंसाफ की लड़ाई में चुप्‍पी लगाकर बैठे रहेंगे? क्‍या मार्क्‍सवाद हमें सवाल उठाने या शंका करने से रोकता है? क्‍या मार्क्‍सवादी सवाल उठाने वाले व्‍यक्ति को दक्षिणपंथियों की तरह गालियां देंगे (वे लोगों को पाकिस्‍तान भेजने और मार डालने की धमकी देते हैं, और ये यहीं मारपीट करने, गालियां देने और चरित्रहनन करने जैसी बातें करते हैं)?

साथियो, जब कोई ''वामपंथी'' भगत बन जाता है, तो वह समूचे आंदोलन को कीचड़ में धकेल देता है और लोगों का क्रांतिकारी आंदोलन से ही भरोसा उठ जाता है। दुनिया भर के क्रांतिकारी आंदोलन में लोग नेताओं पर, संगठनों के गलत फैसलों पर, कठमुल्‍लावाद पर, लाइन पर सवाल उठाते रहे हैं, और दुनिया भर में ''सवाल उठाने वालों को किनारे लगा दिए जाने'' की ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती। यह शर्मनाक है। मैं इस आखिरी बात के साथ अपनी बात खत्‍म करती हूं कि आप अगर इस समय अपना पक्ष और राय नहीं देते, तो याद रहे कि भविष्‍य में किसी भी अन्‍याय के खिलाफ आवाज उठाने वाला कोई नहीं बचेगा। (फेसबुक वाल से साभार)

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
मनप्रीत मीत

इससे जुडी अन्य खबरें - एक और दलित छात्र ने की आत्महत्या, पिता ने लगाया आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप

Jan 24, 2016

प्रकाश भाई तुम क्या इतनी तकलीफ में थे!

​साहित्यिक मसलों को लेकर सक्रिय रहने वाले अनिल जनविजय के वाल पर अभी थोड़ी देर पहले देखा कि उन्होंने युवा कवि प्रकाश की मौत के बारे में सूचना दी है। लिखा है कि प्रकाश ने नींद की गोलियां खा ली थींं, जिससे उनकी मौत हो गयी।  आत्महत्या का कारण अबतक साफ नहीं हो सका है। 

वह अक्षय उपाध्याय स्मृति शिखर सम्मान से सम्मानित थे और उनका एक कविता संग्रह  'होने की सुगन्ध' भी छप चुका था।

प्रकाश से मैं परिचित था और उनसे दिल्ली के मंडी हाउस, कॉफी हाउस और भगत सिंह पार्क पर कई दफा मुलाकात हुई थी। हम उन दिनों नई सांस्कृतिक मुहिम के पक्षधरों के साथ भगत सिंह पार्क में बैठते थे, जिसमें वह भी शरीक होने आते थे। उन्होंने कई मौकों पर अपनी कविताएं भी सुनाई थीं। 

उनके साथी कवि और पत्रकार पंकज चौधरी ने हम सब से पहली बार उनसे भेंट कवि के रूप में ही कराई थी। वह अपनी उम्र से अधिक और गंभीर दिखते थे। उन्हें देखकर लगता था कि वह भदेस बॉडी लैग्वेज के आदमी और दिल्ली उनकी कद्र नहीं कर पाएगी। 

दिल्ली पहले चमक देखती है, फिर काबिलियत तौलती है। संभवत: इसीलिए कुछ समय बाद वह उत्तर प्रदेश के आगरा में हिंदी संस्थान से निकलने वाली पत्रिका से जुड़ गए। इस बीच उनका कई दफा दिल्ली आना हुआ और दो—चार बार सार्वजनिक जगहों पर हाय—हैल्लो भी हुई। बातचीत में उन्होंने बताया था कि शादी हो चुकी है। 

मुझे नहीं मालुम कि वह कहां के थे, किस तरह से संघर्ष करते हुए दिल्ली तक आए थे। पर उनके आगरा चले जाने के बाद भी उनके मित्र पंकज चौधरी और अभिनेता राकेश उनकी जीवटता और संघर्ष के किस्से अक्सर सुनाते थे। उनकी बातों को याद करते हुए अब लग रहा है कि वह आदमी हमारे बीच का चार्ली चै​प्लीन था जो मुस्कुराते हुए चला गया। 

फ्रीलांसिंग, मामूली अखबारी लेखन, कम पैसे का अनुवाद और करीब—करीब मुफ्त की प्रूफ​​रीडिंग के जरिए जीने वाले युवा साहित्यकारों की जिंदगी कितनी मुश्किलों भरी होती है, उसके वह जिंदा मिसाल थे। इतनी कठिनाइयां झेलने वाला आदमी क्या इससे भी बड़ी परेशानी में था और अकेला भी कि वह हमारे बीच से चला गया। सच में प्रकाश भाई, तुम क्या इतनी तकलीफ में थे!

संघर्ष के दिनों में मकान मालिकों की भभकियां, होटल वालों की वार्निंग और दोस्तों की बकाएदारी हम सब के जीवन की दैनंदिन रही है और वह उनके जीवन की भी थी। उनके रूम पार्टनर रहे राकेश अक्सर एक किस्सा उनके बारे में सुनाते थे, जिसके बाद सभी लहालोट हो जाते थे। 

वह काम की तलाश में एक बार दरियागंज स्थित किरण प्रकाशन के दफ्तर गए। प्रकाशक ने उन्हें प्रूफरीडिंग या संपादन का काम देने के लिए बुला रखा था। दफ्तर के दरवाजे पर खड़े हुए तो दिखा कि प्रकाशक देवता को अगरबत्ती दिखा रहा है। उन्हें काम की जरूरत इस कदर थी वह हर कीमत पर काम हथिया लेना चाहते थे।

यह सोचते हुए वह एक तरफ दरवाजे से अंदर दाखिल हो रहे थे और दूसरी तरफ प्रकाशक को इंप्रैस करनी की तरकीबें सोच रहे थे। तभी बिजली का तार उनके पैरो से लटपटाकर टूट गया, वह गिरने को हुए और बिजली चली गई। 

कमरा अंधकार से भर गया। अगरबत्ती दिखा रहा प्रकाशक चिढ़ गया। उसने जल्दी से अगरबत्ती धूपदान में खोंसी और गुस्से में पूछा, 'कौन हो बावले।' 

'सर मैं प्रकाश'। 

कमरे में फैले अंधकार के बाद यह हमारे मित्र प्रकाश का जवाब था। इसके बाद हम सभी हंस पड़ते थे। 

मैंने अबतक नौकरी के लिए श्रद्धांजलि लिखी है। मतलब पत्रकारिता के लिए। लेकिन आज एक परिचित का लिख रहा हूं जिसके साथ मैंने कुछ पल बिताएं हैं, कुछ यादें हैं, सार्वजनिक मुलाकातों की सही। 

मन कह रहा है लोग शायद बुरा मानें। बुरा मानने वाले माफ करेंगे पर एक परिचित इंसान की श्रद्धांजलि देवताओं जैसी कैसे लिखी जा सकती है।