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Feb 6, 2016

'आलोचना के नाम पर गालियां दी जाती हैं आरसीएलआई में'

वामपंथ के नाम पर ठगी, शोषण और मुनाफे का धंधा चलाने वाले शशिप्रकाश और उनकी पत्नी कात्यायिनी के परिवार के मालिकाने वाले कम्यूनिस्ट संगठन आरसीएलआई की धंधेबाजी के खिलाफ उठी  आवाज पर मौन साधने वालों में तीन तरह के लोग अव्वल हैं। पहले हैं कात्यायिनी के स्वजातीय बुद्धिजीवी,  दूसरे हैं उनके यहां क्रांति के भ्रम में फंसे युवा और तीसरे हैं शशिप्रकाश के परिवार से जुड़े समाजवादी खेमे के दो कम्यूनिस्ट संगठन। हां, चुप रहने वालों में उन वामपंथियों की भी एक संख्या है जो खुद के संगठनों की सड़ाध को ढांपे रखना चाहते हैं। पर इसके मुकाबले सच को उजागर करने वालों की तादाद इतनी बड़ी, व्यापक और साहसी है कि इनकी हर जनविरोधी कार्रवाई को हर कीमत पर समाज में सरेआम करती है। इनकी गालियों, तोहमतों और धमकियों के मुकाबले तनकर खड़ी होती है और डंके की चोट पर इनके ठगी और शोषण को तथ्यजनक रूप से सबके सामने लाती है।

इसी कड़ी में पंजाब  से मनप्रीत मीत का पत्र

साथियो, मैं इस पत्र को अपने आखिरी स्‍टेटमेंट के तौर पर रख रही हूं, इसके बाद मैं इस पर और कुछ नहीं कहूंगी। ध्‍यान रहे, आपकी चुप्‍पी भविष्‍य में अन्‍याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को निकलने से पहले ही रोक देगी, क्‍योंकि जब जन-पक्षधर लोग ही चुप लगाकर ऐसी बातें होते हुए देखेंगे, तो भला अन्‍याय का प्रतिकार करने वाले लोग कहां जाएंगे?

सभी इंसाफपसंद नागरिकों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम खुला पत्र

मेरा सरोकार इतना ही है कि नव करण के साथ और ऐसे तमाम युवाओं के साथ इंसाफ हो, जो RCLI की पतित व घृणित राजनीति के दुष्‍चक्र में फंसे हुए हैं।

साथियो, कामरेड नव करण की आत्‍महत्‍या के बाद, पिछले तीन-चार दिन में जो हालात हुए हैं उनकी वजह से मैं यह खुला पत्र लिखने को मजबूर हो रही हूं।

सबसे पहले, मैं यह स्‍पष्‍ट कर दूं कि Revolutionary Communist League of India (RCLI) को छोड़ने के बाद मेरा किसी भी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। मैंने उस समय के बाद से कभी RCLI पर कोई टिप्‍पणी नहीं की है। निजी जीवन की परेशानियों व खराब तबियत के कारण मैं आंदोलन में सक्रिय भागीदारी नहीं कर सकी, लेकिन जितना भी हो सका, आंदोलन के जनपक्षधर मामलों का समर्थन करने का प्रयास करती हूं।

मैं किसी मार्क्‍सवादी,स्‍तालिनवादी या त्रात्‍सकीवादी संगठन से नहीं जुड़ी हूं। ऐसे किसी भी संगठन द्वारा किसी भी मार्क्‍सवादी शिक्षक पर की गई छींटाकशी का मैं हिस्‍सा नहीं हूं। मेरा सरोकार इतना ही है कि नव करण के साथ और ऐसे तमाम युवाओं के साथ इंसाफ हो, जो RCLI की पतित व घृणित राजनीति के दुष्‍चक्र में फंसे हुए हैं। साथी नव करण ही आत्‍महत्‍या ने ही यह बेचैनी भी पैदा की कि युवा इस संगठन की सच्‍चाई को जानने का प्रयास करें, आंख बंद करके ज्ञानपूर्ण प्रवचनों के भ्रमजाल में न फंसे और अपनी क्रांतिकारी ऊर्जा को सही दिशा में लगाएं। कोई इंसान सक्रिय क्रांतिकर्म में नहीं लगा है, तो इसका यह मतलब नहीं कि वह अपने आस-पास हो रहे अन्‍याय के बारे में बोलना भी बंद कर दे।

मैं 2010 में RCLI से जुड़ी और पंजाब के नेताओं के बेहद खराब व्‍यवहार के बावजूद लंबे वक्‍त तक यह सोचकर आंदोलन में सक्रिय रही कि क्रांति के बड़े लक्ष्‍यों के सामने मुझे अपने कष्‍टों की अनदेखी करनी चाहिए। मैं अपना घर-परिवार छोड़कर आंदोलन में शामिल हुई थी और सक्रिय रहने के दौरान ही डॉक्‍टर अमृत पाल से मेरी शादी हुई थी। RCLI में अपने सक्रिय दिनों के दौरान, मुझ पर लगातार ताने कसे जाते थे, बीमार हालत में अकेले छोड़ दिया जाता था और अमृत पाल को मेरे खिलाफ भड़काया जाता था।

आलोचना के नाम पर गालियां दी जाती थी। मैं इस सबको अपनी कमजोरी मानकर, चुपचाप किताब बेचने, ट्रेन व बस अभियान में पैसे जमा करने, कार्यालयों की साफ-सफाई करने जैसे काम में लग जाती थी। खैर, इस बारे में अपने कटु अनुभवों का ब्‍योरा फिर कभी। जब मामला हद से गुजर गया, तो अंतत: मैंने RCLI छोड़ दी। संगठन के उकसावे और अपने ढुलमुनपन के कारण अमृत पाल ने तलाक की पेशकश रखी और मैंने इंकार नहीं किया। लेकिन तलाक होने के बाद भी लंबे वक्‍त तक अमृत पाल चंडीगढ़ में मेरे पास आकर रुका करता था।

मैंने उसे कई बार संजीदगी से अपने व्‍यवहार पर सोचने को कहा। मेरे पास आकर वह भी संगठन के नकारात्‍मक पक्षों पर मौन सहमति तो जताता था, पर कुछ ठोस करने से मुकर जाता था। आखिर, मैंने उसे अंतिम विदा कह ही दिया। इसके बावजूद वह लगातार फोन करता था, पर धीरे-धीरे उसे समझ आ गया कि अब मुझे बहलाना संभव नहीं है। संक्षेप में यह बातें इसलिए, ताकि सनद रहे कि मेरे चरित्र पर कीचड़ उछालने की हाल की हरकतें निराधार हैं और बदले की कार्रवाई हैं।

साथी नव करण की आत्‍महत्‍या की खबर मुझे 26 जनवरी को हुई, लेकिन पूरी जानकारी के इंतजार में मैंने इस बारे में कोई टिप्‍पणी नहीं की। इस बारे में मैंने पहली बार 30 जनवरी को लिखा और वह भी नव करण की आत्‍महत्‍या के कारणों और RCLI के नेताओं की षडयंत्रकारी चुप्‍पी से मामले को रफा-दफा कर दिए जाने की कोशिश के बाद। याद रहे कि इस बारे में संगठन का बयान भी इसी के बाद आया और तब तक संगठन चुप्‍पी साधे रहा था। यह भी ध्‍यान रहे कि इस पर सामान्‍य तर्कसंगत सवाल उठाने पर साथी अभिषेक श्रीवास्‍तव पर भी कुत्‍सा-प्रचार करने का आरोप लगा दिया गया।

मैंने और दूसरे लोगों ने सिर्फ इतना पूछा था कि आखिर नव करण ने आत्‍महत्‍या क्‍यों की? वह पूरावक्‍ती कार्यकर्ता था और जैसा कि RCLI ने नव करण की श्रद्धांजलि में भी कहा, वह बेहद संवेदनशील और प्रतिभावन कार्यकर्ता था। आखिर ऐसे कार्यकर्ता को अपने सुसाइड नोट में यह क्‍यों लिखना पड़ा कि वह भगोड़ा है, पर गद्दार नहीं और मुझमें उन जैसी अच्‍छाई नहीं और मेरे बारे में रियायत के साथ सोचना? आखिर क्‍यों आत्‍महत्‍या के एक सप्‍ताह बाद तक कोई बयान नहीं आया आखिर क्‍यों 30 जनवरी को साथी नव करण की आत्‍महत्‍या के बाद पूछे सवालों पर तब तक चुप्‍पी रही जब तक कि 31 जनवरी को नौजवान भारत सभा ने देर रात गये एक संवेदनहीन और खोखला स्‍पष्‍टीकरण नहीं दे दिया गया?

इसके बाद, संगठन के नेताओं (कविता, सत्‍यम, कात्‍यायनी आदि) ने जो पोस्‍टें डालीं उनमें तीन तरह की बातें थी : पहली, खोखली श्रद्धांजलि (उसमें भी धैर्य नहीं बरत पाये और सवाल उठाने वालों को कुत्‍सा प्रचार करने वाला कहा गया)। दूसरी, कुछ उद्धरण जिनके जरिए सवाल उठाने वालों को मुर्दाखोर गिद्ध समेत ढेरों उपाधियों से नवाजा गया। तीसरी, विपयर्य का दौर और क्रांतिकारी आंदोलन में होने वाली इस तरह घटनाओं पर झूठी हमदर्दी बटोरने वाली बातें।

इस दौरान, कार्यकर्ताओं को खुला छोड़ दिया गया कि वे सवाल उठाने वालों की सामाजिक हैसियत देखकर, उन्‍हें खुले आम गाली दें (अशोक पांडे को मुत्‍तन पांडे और भगोड़ा-गद्दार कहना, राजेश त्‍यागी व राजिन्‍दर को पतित त्रात्‍सकीपंथी कहना, अभिषेक श्रीवास्‍तव को तनिक नजाकत के साथ कुत्‍सा-प्रचार करने वाला कहना, और प्रदीप और मुझे खुले आम गाली देना, चरित्रहीन कहना)। इसमें मार-पीट की धमकी देना शामिल है।

साथियो, मैं इस पत्र को अपने आखिरी स्‍टेटमेंट के तौर पर रख रही हूं, इसके बाद मैं इस पर और कुछ नहीं कहूंगी। ध्‍यान रहे, आपकी चुप्‍पी भविष्‍य में अन्‍याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को निकलने से पहले ही रोक देगी, क्‍योंकि जब जन-पक्षधर लोग ही चुप लगाकर ऐसी बातें होते हुए देखेंगे, तो भला अन्‍याय का प्रतिकार करने वाले लोग कहां जाएंगे?

इस अंधेरे दौर में, लोग अंधेरे के खिलाफ कैसे उठ खड़े होंगे जबकि अंधेरे के खिलाफ बोलने वाले लोग ही इंसाफ की लड़ाई में चुप्‍पी लगाकर बैठे रहेंगे? क्‍या मार्क्‍सवाद हमें सवाल उठाने या शंका करने से रोकता है? क्‍या मार्क्‍सवादी सवाल उठाने वाले व्‍यक्ति को दक्षिणपंथियों की तरह गालियां देंगे (वे लोगों को पाकिस्‍तान भेजने और मार डालने की धमकी देते हैं, और ये यहीं मारपीट करने, गालियां देने और चरित्रहनन करने जैसी बातें करते हैं)?

साथियो, जब कोई ''वामपंथी'' भगत बन जाता है, तो वह समूचे आंदोलन को कीचड़ में धकेल देता है और लोगों का क्रांतिकारी आंदोलन से ही भरोसा उठ जाता है। दुनिया भर के क्रांतिकारी आंदोलन में लोग नेताओं पर, संगठनों के गलत फैसलों पर, कठमुल्‍लावाद पर, लाइन पर सवाल उठाते रहे हैं, और दुनिया भर में ''सवाल उठाने वालों को किनारे लगा दिए जाने'' की ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती। यह शर्मनाक है। मैं इस आखिरी बात के साथ अपनी बात खत्‍म करती हूं कि आप अगर इस समय अपना पक्ष और राय नहीं देते, तो याद रहे कि भविष्‍य में किसी भी अन्‍याय के खिलाफ आवाज उठाने वाला कोई नहीं बचेगा। (फेसबुक वाल से साभार)

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
मनप्रीत मीत

इससे जुडी अन्य खबरें - एक और दलित छात्र ने की आत्महत्या, पिता ने लगाया आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप

Feb 1, 2016

एक और दलित छात्र ने की आत्महत्या, पिता ने लगाया आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप

कहा, सबूत नहीं पर मेरा दिल कहता है बेटे की हुई है हत्या। 

जनज्वार से हुई बातचीत में पंजाब के संगरूर में रह रहे नवकरण के ​पिता मक्खन सिंह ने कहा कि नवकरण सिर पर कफन बांध कर देश बदलने निकला था, वह आत्महत्या नहीं कर सकता, उसकी हत्या हुई है! वह पंजाब के संगरूर जिले के थॉपर इंस्टीट्यूट से सीविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। मात्र 17 वर्ष की उम्र में वह वामपंथी संगठन नौजवान भारत सभा से जुड़ गया था. 20 वर्ष में ही इस संगठन ने मेरे बेटे की आहूती ले ली।

नौजवान भारत सभा में सक्रिय एक छात्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि नवकरण ने आत्महत्या 21 तारीख को की थी और इसकी जानकारी संगठन के शीर्ष लोगों कात्यायिनी, शशिप्रकाश और सत्यम वर्मा को चंद मिनट में ही हो गयी। छात्र ने बताया कि नवकरण की आत्महत्या से दो दिन पहले संगठन की बैठक हुई थी, जिसमें उसको कायर, भगोड़ा और पतित कहा गया था। वह इससे काफी आहत था। 

गौरतलब है कि पंजाब के लुधियाना और संगरूर में सक्रिय इस संगठन के असली मुखिया शशिप्रकाश, उनकी पत्नी कात्यायिनी, बेटा अभिनव और साढू सत्यम वर्मा हैं। इनकी जड़ें लखनउ और​ दिल्ली से जुड़ी हुई हैं। पर इनकी ठगी और फरेब का सच जब उत्तर भारत के इलाकों में उजागर हो गया तो इन्होंने पंजाब के छात्रों—नौजवानों को निशाना बनाना शुरू किया है।

शशिप्रकाश और उनकी पत्नी ने अपने रिश्तेदारों के सहयोग से दिशा, जनचेतना, राहुल फाउं​डेशन के नाम के कई संगठन खोल रखे हैं, जो इस परिवार की कमाई और संपन्न्ता का जरिया बन चुके हैं। इंटर पास कर कॉलेजों—विश्वविद्यालयों में पहुंचने वाले युवाओं को यह भगत​ सिंह के नाम पर सपना दिखाते हैं और उसको होलटाइमर बनाकर उसका मुफ्त का श्रम लूटते हैं। 

यही वजह है कि कोई भी नौजवान इनके संगठन में बहुत फंस गया हो या मजबूर न हो तो नहीं टिकता, सिवाय इनके परिवार वालों के, जिनका की संगठन के लाभ और नेतृत्व के पदों पर कब्ज़ा है. अकेले पंजाब से पिछले तीन वर्षों में करीब दर्जन भर संगठनकर्ता, होलटाइमर और कार्यकर्ता संगठन छोड़ चुके हैं। उनमें राजिंदर, प्रदीप, कमल, मनप्रीत, अमन, अजय पॉल और परमिंदर प्रमुख हैं। 

खुद को तार्किक और वामपंथी विचारों का वाहक कहने वाले इस संगठन के ​खिलाफ पिछले वर्षों में जब सवाल उठे थे तब इस संगठन ने मानहानी का मुकदमा किया था। मुकदमा करने वालों में शशिप्रकाश की पत्नी कात्यायिनी प्रमुख हैं। जनज्वार हमेशा ही इस संगठन की सचाइयों से समाज के सजग और सरोकारी लोगों का अवगत कराता रहा है। इस संगठन पर चली बहस को अभी भी जनज्वार पर दायीं और ​दिए लिंक में पढ़ा जा सकता है। 

आप, नवकरण के पिता का साक्षात्कार सुनें उससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि नौजवान भारत सभा, पंजाब के प्रभारी और मालिक भी शशिप्रकाश के ही साढ़ू सुखविंदर और उनकी पत्नी नमिता हैं। नमिता कात्यायिनी की बहन हैं। इसी युनिट में काम करते हुए नवकरण ने 21 की रात को आत्महत्या की थी। 

आॅडियो सुनें और जानें कि एक दलित छात्र के पिता क्या कहते हैं बेटे की आत्महत्या पर
https://soundcloud.com/janjwar/navkaran-father-on-suicide

Jul 26, 2010

शशि प्रकाश का पूंजीवादी मंत्र 'यूज एंड थ्रो'



पाठकों,वामपंथी पार्टी कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया(रिवोल्यूशनरी)के सचिव की तानाशाह वाली कार्यशैली और संगठन में पारदर्शिता के अभाव के बारे में अब तक आपने पढ़ा,वे छुपते हैं कि चिलमन से झरता रहे उनका नूर,सांगठनिक क्रूरता ने अरविंद की जान और जनचेतना के मजदूर,बेगार करें भरपूर अब इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए अपने अनुभव साझा कर रहे हैं पार्टी की ओर से मज़दूरों के लिए निकाले जाने वाले अख़बार ‘बिगुल’ के प्रकाशक, संपादक और मुद्रक डॉक्टर दूधनाथ।

डॉक्टर दूधनाथ, संपादक 'बिगुल' 

 काफी समय से हम लोग विचित्र मानसिक स्थिति में थे और पार्टी नेतृत्व का अरहाया (आदेशित)गया काम भार महसूस हो रहा था। पिछले 20वर्षोंसे हम देख रहें हैं कि बड़े जोर-शोर से कोई काम शुरू होता है और अचानक बंद कर दिया जाता है। फिर कोई नया अभियान या काम शुरू होता है और फिर ठप्प हो जाता है।

दूसरी तरफ बेहद बेशकीमती साथी संगठन से समय-समय पर बाहर होते रहे। इस वजह से स्थानीय कार्यकर्ता भी निराश होकर,एकके बाद एक बैठते रहे। लेकिन शशि प्रकाश के नेतृत्व वाले इस संगठन में या कहें पार्टी में तकनीकी जवाब ही हमेशा मिला,कभी कोई राजनीतिक कारण स्पष्ट नहीं हुआ। यह स्थिति हम सबके लिए तकलीफ देह बनी रही।

इस मसले पर जब भी संगठन के नेतृत्वकारी साथी से चर्चा की जाती थी और समझने का हमलोग प्रयास करते थे,तो कभी दूसरी कमेटी का हवाला देकर या निकले या निकाले गये साथियों को भगोड़ा कह कर बात खत्म कर दी जाती थी। अन्त में परेशान होकर हमलोगों ने संगठन के सचिव शशि प्रकाश को प़त्र भेजा। मगर हम जैसे संगठन के पुराने लोगों को भी, जो कि मजदूर, भूमिहीन और सर्वहारा हैं, पार्टी सचिव ने बात करना या जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। इसके उलट गोरखपुर से भेजे गये प्रतिनिधी और स्थानीय संगठनकर्ता तपीश ने कूतर्क करते हुए प्रश्नों को दबा दिया। हमारे सवालों के जवाब में तपीश ने अतिजनवाद की अराजकता कहकर मुंह बंद कराना चाहा।

ऐसी स्थिति में हमें मजबूरन आप सब साथियों,जनपक्षधर बुद्धिजीवियों और सहोदर संगठनों से अपने सवालों को साझा करना पड़ रहा है।

सचीव को भेजे गये पत्र में हम लोंगो ने संगठन में जनवाद की कमी,नेतृत्व की तानाशाह कार्यपद्धति,दो लाइनों का संघर्ष, संगठनिक ढांचा और कमेटी गठन समेत कुछ और सवाल उठाये थे। हमने कहा कि पिछले 20 वर्षों में इनमें से कोई सवाल हल नहीं हुआ, बल्कि चीजें और बुरी स्थिति में गईं।

हमरा दूसरा प्रश्न साथियों को निकाले जाने को लेकर था। पिछले 20 वर्षों में संगठन से एक के बाद एक साथी निकाले तो जाते रहे (जिनकी संख्या पार्टी में मौजूद तादाद से बहुत ज्यादा है),लेकिन उन्हें बाकी सदस्यों के बीच अपनी बात रखने और कतारों को निर्णय लेने का अवसर कभी क्यों नहीं दिया गया?

तीसरे सवाल के तौर हमने रखा कि नेतृत्व यानी शशिप्रकाश और उनके परिवार को बाकी संगठन सदस्यों पर निगरानी रखने का अधिकार है लेकिन सदस्यों को नेतृत्व पर निगरानी का कोई तरीका क्यों नही है? खासकर वैसे में जबकि संगठन सदस्यों के बीच नेतृत्व भूमिगत है और व्यवस्था के लिए पूरी तरह खुला है।

अन्त में हम लोंगो ने यह मांग की थी कि निकले और निकाले गए सभी महत्वपूर्ण साथियों को बुलाकर कार्यकर्ता सम्मेलन करके प्रश्नों को हल किया जाए,नहीं तो हम लोंगो का संगठन में काम करना संभव नहीं है।

इस बीच हम लोंगो को पता चला कि दिल्ली में काम कर रहे दो साथी मानसिक पीड़ा झेल रहे हैं और उनका संगठन से ढेरों सवाल हैं। जब हमने यह सवाल भी उठाया तो शशि प्रकाश के भेजे गये प्रतिनिधि तपीश ने मउ के मर्यादपुर में हमारे साथ एक बैठक की। तपीश ने हमारे प्रश्नों पर टालू रवैया अख्तियार किया और शान्त कराने की कोशिश की। तपीश और नेतृत्व के रवैये से असंतुष्ट हो संगठन के बहुत पुराने मजदूर साथी हरिहर भाई ने तपीश के उत्तर से जब असन्तुष्टता जाहिर की और सोचने का समय मांगा, तो उन्हें संगठन से निकाल दिया गया।

हरिहर भाई का निकाले जाने की प्रक्रिया हमारे लिए आश्चर्यजनक थी। उस समय हमसे थोड़ी दूरी बनाकर तपीश ने सीधे शशि प्रकाश से मोबाइल से बाती की थी और वहां मिले आदेश के आधार पर हरिहर भाई को संगठन से निकाल दिया गया। बुर्जुआ नेताओं की कार्यशैली से दो कदम आगे बढ़कर मालिक और मजदूर की तरह हरिहर भाई के साथ किया गया यह व्यवहार हमारे कई प्रश्नों का जवाब दे रहा था।

अब बारी थी संगठन से दिल्ली में दो असंतुष्ट साथियों जनार्दन और समीक्षा की। मैं और तपीश मर्यादपुर से साथ आए और सत्यम वर्मा के यहां मीटिंग की। सचिव शशि प्रकाश यहां भी गायब रहे। सत्यम और तपीश ने यह मीटिंग ली। यह एक भयावह मीटिंग थी। मीटिंग में जनार्दन और समीक्षा ने जैसे ही अपने सवाल रखे तो यहां भी सवालों को दबाते हुए सत्यम वर्मा ने उनका ही चरित्र चित्रण शुरू कर दिया।

मीटिंग में जनार्दन और समीक्षा ने बताया कि वे काफी दिनों से अपने छोटे बच्चे के साथ आर्थिक, मानसिक व शारिरिक रूप से परेशान चल रहे हैं। कई बार हमने अपनी तरह से इत्तला भी किया मगर संगठन ने कोई खोज खबर नहीं ली। वहीं संगठन के भीतर एक ऐसा पारिवारिक रिश्ता (शशि प्रकाश, कात्यायनी, अभिनव, अभिनव की पत्नी और उसका बेटा) भी है जहां के लोंगो को छींक भी आ जाये तो पूरा संगठन लगा दिया जाता है।

जनार्दन ने दूसरे सवाल के तौर पर सीधे कहा कि आखिर क्यों है कि वामपंथी आंदोलन के ज्यादातर संगठन,हमारी पार्टी और संगठनों को अपराधी और क्रान्ति के नाम धन्धेबाज मानते हैं ?क्या यह सच नहीं है कि संगठन के कार्यकर्ताओं का ज्यादे समय लांक्षित, अपमानित होते हुए चन्दा मांगने में खर्च होता है। संगठन किताबें छापने, बेचने, मकान-दुकान खड़ा करने, ट्रªस्ट-सोसाइटी बनाने में लगा रहता है। यह कैसी माया है कि कोई वेतन भोगी (लेबी पाने वाला) कार्यकर्ता न होने और लाखों का चंदा इक्कठा होने के बावजूद संगठन की संस्थाएं हमेशा घाटे में रहती हैं?

जनार्दन ने इस मसले पर बात रखी कि संगठन में नेतृत्व यानी शशि प्रकाश और उसके कुनबे की परिवरिश तो शाही अन्दाज में होती है,लेकिन कार्यकर्ताओं को वेज तक नहीं दिया जाता और सर्वहाराकरण के नाम पर अमानवीय हालत में जीने को मजबूर कर दिया जाता है?इसे विडंबना कहकर टाल दिया जाता है और कहा जाता है कि समाज में वर्ग हैं तो पार्टी उससे अछूती तो नहीं रहेगी।

क्या कारण है कि संगठन बीस साल में दो पेज का दस्तावेज भी नहीं लिख पाया, जबकि इस बीच सचिव शशि प्रकाश पत्नी को पोथन्ना लिखवाने और पुस्तकों की भूमिका लिखने में व्यस्त रहे। संगठन गोपनीय और अदृश्य कामों में कितना व्यस्त रहता है इसके लिए एक ही उदाहरण काफी है। 2005में तराई क्षेत्र के होंडा मजदूर आन्दोलन में चार साथी सात दिन तक जेल में सामूहिक भूख हड़ताल पर रहे और संगठन का कोई जिम्मेदार साथी उनसे मिलने तक नहीं गया।

इन सवालों के साथ ही दोनों असन्तुष्ट साथियों ने ढेरों उदाहरण देकर यह बात रखी कि कैसे संगठन की जिम्मेदार साथी मीनाक्षी फुटपाथ की चोरी और साथियों की जासूसी करना सीखाती हैं। निकृष्ट हरकत करने वाली इस संगठनकर्ता साथी को महज इसलिये मान मर्यादा मिलती है क्योंकि वे संगठन के सबसे अधिक धन-कमाऊ पूत हैं(मीनाक्षी का गोरखपुर से लेकर दिल्ली तक में सबसे ज्यादा चंदा इकठ्ठा करने का रिकॉर्ड है।) कई वरिष्ठ साथी (कात्यायनी बहनों के अलावा कोई और नहीं है), नये कार्यकर्ताओं से नौकरानी जैसा व्यवहार करती हैं।

यह भी सवाल रखा कि क्यों सारी गलतियों का ठिकरा केवल संगठनकर्ताओं के सर पर ही फोड़ा जाता है और क्या 20 साल में सारे संगठनकर्ता फिसड्डी साबित हुए तो सचिव शशि प्रकाश की रत्ती भर इसमें कोई गड़बड़ी नहीं है? बीस साल में संगठन ऐसा दहन पात्र क्यों नहीं बना सका जिसमें ढलकर इस्पाती कार्यकर्ता पैदा हो सकें? क्यों बार-बार लंबे समय तक काम करने के बाद संगठन पर सवाल उठाने वाले साथी भगोड़े करार दिए जाते रहे? क्या कारण है कि पार्टी कमेटी से लेकर ट्रस्ट सोसाइटी तक रक्त संबंधियों की ही बहुलता है?

साथियों,हमारे एक वरिष्ठ कार्यकर्ता साथी अरविंद सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। अब हमारा संगठन उनके नाम पर एक और ट्रस्ट बनाने जा रहा है। मौत के बाद इतनी तत्परता जबकि साथी छहः महीने से बीमार था,डेढ़ महीने से बहुत तकलीफ के साथ बीमारी में समय बीता रहा था,और लड़ भी रहा था जिसके हम स्थानीय साथी गवाह हैं जबकि शीर्ष नेतृत्व को इसकी जानकारी मौत के बाद होती है, क्या यह नेतृत्व की संवेदनहीनता और कर्तव्यविहिनता नहीं है?

दोनों बैठकों में इनमें से किसी भी सवाल का कोई सही जवाब तो नहीं मिला। उल्टे गाली-गलौज और धमकियां देने का पुराना सिलसिला यहां भी दुहराया जाता रहा। स्थानीय इकाई के सवालों को भी दरकिनार कर दिया गया। सचिव शशि प्रकाश ने हम लोगों से बात करने की जगह स्थानीय इकाई के पास मौजूद किताबों की पैकिंग कर वापसी का फरमान जारी करवा दिया। अन्ततः हमारे पास संगठन से अलग होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।

आज हम लोग काफी सोच विचार के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि हमारा संगठन क्रान्तिकारी नहीं रह गया। बल्कि धन उगाही का केंद्र बन गया है। विचारधारा और संगठन महज आवरण बन कर रह गए हैं। यही कारण है कि जो भी साथी थोड़ा पुराना होता है और जब उसे ये बाते समझ में आने लगती हैं व उसके मन में सवाल उठते हैं और जैसे ही उस पर (संगठन) सवाल खड़ा करता है उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। जैसा कि हम लोग के साथ हुआ। लेकिन तबतक संगठन पुराने साथियों की काफी ऊर्जा निचोड़ चुका होता है और उसके लिए नए युवा साथी क्रान्ति के नाम पर जुगाड़ लिए जाते हैं।

साथियों सोचिए हमारे नेता कब तक इंकलाब से मुंह मोड़ कर नई जनता चुनते रहेंगे।


क्रान्तिकारी अभिवादन के साथ
पूर्वी उत्तर प्रदेश की इकाई और राजधानी क्षेत्र के असंतुष्ट साथियों की ओर से
डॉ दूधनाथ, जनार्दन, इन्द्रदेव, समीक्षा, हरिहर, अशोक कुमार