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Aug 14, 2019

तूफान बोला, ' बैठिए रिक्शा पर, आप भी बहुते मजाकिया नू हैं '

ये हैं तूफान
रिक्शा चलाते हैं। बताते हैं कि इनका जिस दिन जन्म हुआ उस दिन भयंकर आंधी-पानी आया था, इसलिए फूफा के बेटे ने इनका नाम तूफान रख दिया।
इनके साथ मैं बिहार के छपरा शहर की गलियां घूमता रहा, जिन गलियों से गुजरते हुए मैं 10वीं तक पढ़ा और बड़ा हुआ।
हम नदी किनारे साधुलाल हाई स्कूल के पास गए। उसकी दीवार से लगे एक प्राइवेट छोटा सा स्कूल है, नाम है लक्ष्मण लाल, उसी में मैं पहली बार अपने गांव से शहर में 6वीं में पढ़ने आया था। वह जैसा तब था अभी भी वैसा ही है, कुछ कमजोर टाइप, दबा - दबा सा।
अलबत्ता स्कूल के दाहिने 10 कदम पर कूड़ेदान बन गया है। बड़ा सा कूड़ेदान।
कूड़ेदान से आगे दर्जनों की संख्या में सुंदर झोपड़ियां दिख रही थीं। मैंने तूफान से कहा चलो उधर चलते हैं, नदी भी दिख रही है करीब में। मैं बचपन में अक्सर बाबूजी के साथ नदी नहाने जाता था, उसकी भी यादें ताजा हो जाएंगी।
तूफान बोला, सर उधर काहेला जाएंगे। सब दारू की भट्टी है, अच्छा नहीं है जाना। सब खतरनाक जगह है, जाने से का फायदा। झोपड़ियों की ओर आते-जाते लोगों को मैं कुछ देर देखता रहा तो ज्यादातर दारू पिये हुए लगे।
स्कूल से 10 कदम पर कूड़ेदान और 150 से 200 कदम पर दर्जनों दारू की भट्टियां, वह भी शहर में, ये कैसा सुशासन है। क्या ये बातें जिला प्रशासन को नहीं पता होंगी या स्कूल प्रशासन कभी कहता न होगा? समझ में नहीं आता कि रातों-दिन हिन्दू - मुसलमान और जाति-धर्म पर बहस करने वालों के लिए ये सब सवाल क्यों नहीं बनते, इन बातों को लोग अपने इलाकों का सबसे बड़ा सवाल क्यों नहीं बनाते ?
तूफान मुझसे बोले, 'ये सब पता करके आप का करेंगे?'
मैंने कहा, लिखेंगे...
तूफान, 'ई सब पढ़ता है कि आप लिखेंगे। कौनो फायदा नहीं होगा, लिखके रख लीजिए। भगाने से भागेगा का कि लिखने से। भगाने के लिए एकता चाहिए, ताकत चाहिए और प्रशासन चाहिए। ये सब कुछ इन्हीं सबों के पास है, आपके - हमारे पास क्या है? आपको भरोसा नहीं हो तो मेरे साथ थाने चलिए, आपको ही`
बिठा लेगा 5 घंटा, हाथ जोड़कर भाग जाएंगे...आदमी का सब सुधार का सोच घुसिएगा जाएगा?
मैंने पूछा, ' कहाँ पर ?'
तूफान बोला, ' बैठिए रिक्शा पर, आप भी बहुते मजाकिया नू हैं।'

Oct 17, 2016

मुस्लिमों से ज्यादा है हिंदुओं में एक से अधिक पत्नी रखने का रिवाज

दिल्ली के मुखर्जी नगर में प्रमोद कुमार झा आईएएस की तैयारी करते हैं। हमारी उनसे मुलाकात दिल्ली के लक्ष्मीनगर में एक मित्र के यहां दावत पर हुई जिसमें कई लोग भागीदार थे। प्रमोद ने बताया कि वह दो बार प्री दे चुके हैं और अबकी उम्मीद है कि वह चुन लिए जाएंगें। चुने जाने को लेकर वह इसलिए भी आश्वस्त हैं कि उन्होंने परीक्षा और साक्षात्कार पास करने के सभी तरीकों को सीख लिया है और उनका सामान्य ज्ञान बहुत दुरुस्त है। वहां मौके पर मौजूद दूसरे मित्र भी बताने लगे कि प्रमोद का सामान्य ज्ञान वाकई कमाल का है।

हमने जानना चाहा कि अगर आप कल को देश के किसी महत्वपूर्ण पद पर काबिज हो जाएंगे तो पहला सुधार क्या करना चाहेंगे? प्रमोद ने तपाक से कहा, 'कल का पता नहीं पर अभी होता तो मुस्लिम धर्म में तीन तलाक का प्रावधान एक झटके में खत्म कर देता।' जब उनसे यह जानने की कोशिश की गयी, ऐसा क्यों, उनका जवाब था, 'ये तीन बार तलाक बोल के दूसरी औरत की जिंदगी बर्बाद करते हैं। एक से अधिक बीवियां ऐसे रखते हैं मानो औरत नहीं बकरी हों।'

बातचीत आगे बढ़ी तो हमने जानना चाहा कि आपके इस दावे का आधार? पहले तो हमारी बात को उन्होंने मजाक में लिया पर हमने आधार जानने पर जोर दिया तो वह कहने लगे कि इस तथ्य से सभी वाकिफ हैं, आधार का क्या मतलब है? मेरे साथ गए सहयोगी मित्र ने कहा कि आपको समुद्र तल की उंचाई जानने के लिए तथ्य की जरूरत पड़ती है पर इतने बड़े सामाजिक दावे के लिए कहते हैं, तथ्य का क्या मतलब है? कहीं तो कोई स्रोत होगा आपकी जानकारी का, कहीं आपने पढ़ा होगा, कहीं लिखा होगा।

वह और उनकी तरफदारी कर रहे मित्र सकते में आ गए। उनके सामान्य ज्ञान का आधार नहीं मिल रहा था। जो जानकारी इस देश के करोड़ों के लिए आम है, उसके पक्ष में वह सबूत नहीं दे पा रहे थे। जिरह होने लगी तो बात निकली कि यह आंकड़ा तो सेंसेक्स से पता चलेगा। फिर वह और उनके मित्र गूगल पर जुट गए। बड़ी देर तक जुटे रहने के बाद उन्होंने जो पाया, वह उनके सामान्य ज्ञान को बदल गया।

आप भी पढ़िए और देश को तथ्यों के साथ खड़ा कीजिए, पूर्वग्रहों के साथ नहीं।

हमारा पूर्वाग्रह इतना तगड़ा है कि हम लोग अपने ही सरकार के आंकड़े को एक बार झांक कर नहीं देखते कि एक से अधिक पत्नी रखने के मामले में मुस्लिम मर्द पांचवे नंबर पर आते हैं। पहले पर आदिवासी, दूसरे पर जैन, तीसरे पायदान पर बौद्ध, चौथे पर हिंदू हैं।

धर्म और समुदाय आधारित शादियों को लेकर भारत सरकार द्वारा आखिरी सर्वे 1961 में हुआ था। उसके बाद कोई सर्वे सरकार कराने का साहस नहीं करा सकी, क्योंकि इन आंकड़ों के परिणाम बहुसंख्यक आबादी को नाराज करने वाले थे। इसके अलावा कोई सर्वे कभी हुआ ही नहीं, इसलिए बहुपत्नी प्रथा को समझने का सबसे आधिकारिक तरीका यही हो सकता है।

आबादी के हिसाब से एक करोड़ हिंदुओं ने एक से अधिक पत्नी रखी तो मुस्लिमों में 12 लाख मर्दों ने। हिंदूवादी आदिवासियों को भी अपना ही मानते हैं। अगर उनको भी साथ ले ​लिया जाए फिर यह अनुपात दुगुना हो जाएगा।

बहुपत्नी प्रथा का चलन जातियों और समुदायों के हिसाब से
आदिवासी - 15.25 प्रतिशत
बौद्ध - 7.9 प्रतिशत
जैन - 6.7 प्रतिशत
हिंदू - 5.8 प्रतिशत
मुस्लिम - 5.7 प्रतिशत 

स्रोत - सेंसस 1961

Oct 7, 2016

देवी से दो बातें

हर 2 मिनट में
अत्चायार होता है म​हिलाओं पर

हर घंटे
26 अपराध होते हैं औरतों पर

हर 10 घंटे में
पति प्र​ताड़ित करता है बीवी को

और पिछले दस साल में
2 लाख 43 हजार 51 का हुआ बलात्कार
3 लाख 15 हजार 74 के साथ हुई अपहरण की वारदात
80 हजार 8 सौ 33 मार दी गयीं कि दहेज कम ले आईं
4 लाख 70 हजार 5 सौ 56 महिलाओं का हुआ यौन उत्पीड़न

चलो मान लिया
हर 2 मिनट में संभव नहीं
हर घंटे भी मुश्किल होगी
10 घंटे में भी नहीं संभल पाएगा देश
पर दस साल में

दस साल में तो
बीस बार आए होंगे नवरात्रे
इतनी ही बार अव​तरित हुई होंगी देवी भी
और संगी रही होंगी अनेकानेक देवियां

फिर
इतने साल क्या कम थे
बलात्कार
हत्या
छेड़खानी
उत्पीड़न और औरत पर अपराध रोकने के लिए
एक दस हाथ वाली देवी के लिए
जो हर दस साल पर अपराध दोगुने से भी ज्यादा होते जाते हैं

इसलिए
मुझसे नहीं अपनी देवी से पूछो
मैं क्यों नहीं रखता नवरात्रे
सुबह उठकर क्यों नहीं करता दुर्गा सप्तसती का पाठ
मैं तो बस इतना जानता हूं
इंसान  अपना काम न करे तो उसे निकम्मा कहते हैं
अगर दिन, महीने, साल और सदी
दस हाथों वाली देवी हाथ पर हाथ धरे बैठी रहें
तो  उन्हें क्या कहेंगे
ये आप ही बता दो 
हम कुछ बालेंगे
आप तलवार खींच लोगे 

Sep 30, 2016

सही जानकारी का हक केवल अंग्रेजी वालों को ?

अक्सर हिंदी के पत्रकारों और पाठकों को अंग्रेजी के मुकाबले अपने दोयम होने का एहसास सालता रहता है। आज उनके लिए इस गुत्थी को समझने का सुनहरा मौका है। 

करना सिर्फ इतना है कि एक बार वे अपने हिंदी के अखबार देखें, फिर अंग्रेजी के। बात फिर भी न समझ में आए तो उदाहरण के तौर पर दैनिक हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स अगल—बगल रख के देख लें।

ये दोनों एक ही मालिक के अखबार हैं। पर भाषा, अभिव्यक्ति, पेशगी और तरीके का फर्क देखिएगा। मेरा भरोसा है आपको आज आत्मज्ञान हो के रहेगा और इतनी बात जरूर समझ में आ जाएगी कि अंग्रेजी में मालिक—संपादक खबरें परोसते हैं और हिंदी में हिस्टीरिया, सनकपन। 

तो आप बताइए हिंदी की गरीब, मेहनतकश और बेकारी की मार झेल रही जनता को अखबार का मालिक और संपादक सनकपन क्यों परोसता है, उसको दंगाई क्यों बनाना चाहता है और वह क्यों नहीं चाहता कि जैसी बातें वह अंग्रेजी के लोगों का परोस रहा है वह हिंदी वालों को भी दे। क्या वह सही और संतुलित बातें सिर्फ अंग्रेजी वालों के लिए सुरक्षित रखना चाहता है?

अगर हां तो क्यों? इसका जवाब भी आपको ही ढुंढना है। इस बारे में मैं बस इतना कह सकता हूं कि अंग्रेजी सिर्फ भाषा के रूप में हिंदी की मालिक नहीं है, बल्कि हम जिन दफ्तरों में काम करते है और जो उनके अधिकारी—मालिक हैं, उनकी भी भाषा अंग्रेजी है। यानी मालिक वो हैं जिनकी भाषा अंग्रेजी है, मालिक वो हैं जिनकी जानकारी सही और संतुलित है।

इसलिए दोस्तों हमारी भाषा कमजोर नहीं है और हम इस वजह से दोयम नहीं हैं, बल्कि हमें अपनी भाषा को सही और संतुलित जानकारी देने वाली भाषा बनानी है। हमें तथ्यहीन, पर्वूग्रहित और मनगढ़ंत खबरों की हिंदी पत्रकारिता से बाहर निकलने की तैयारी करनी है, हिंदी से नहीं। यही जिद हमें बराबरी का सम्मान दिलाएगी, अंग्रेजी वालों के राज का अंत करेगी।

Jul 12, 2016

गोला देने में बीजेपी वालों की कोई सानी नहीं

गोला देने में बीजेपी वालों की कोई सानी नहीं है। तीन दिन हो गए लेकिन जाकिर के खिलाफ एक एफआइआर तक दर्ज नहीं हो पाई। जाहिर है अबतक एफआइआर लायक भी अपराध साबित नहीं हो पाया। पर माहौल ऐसा बना दिया कि जाकिर मिल जाए या उसकी शक्लो—सूरत वाला कोई और भी मिल जाए तो लोग उसे मौके पर मार डालेंगे। सरेराह, सरेबाजार चौराहे पर फैसला सुना देंगे।

सोचिए, राजनीति की यह कैसी खतरनाक रवायत शुरू हो रही है। अबतक यह प्रैक्टिस आतंकवाद मामले में पकड़े गए लोगों को लेकर थी। धमाके हुए नहीं कि बिना सोचे—समझे जो मिले उसे उठा लो, आतंकी बना दो और जब झूठ बेपर्द हो जाए तो 10—20 साल बाद उस शख्स की जिंदगी जहन्नुम बनाकर बाइज्जत रिहा कर दो। बाद में अदालतें या खुद जांच एजेंसियां थोड़ी सख्त हुईं तो इस पर हल्की से रोक लग पाई है पर बीजेपी ने इसका दायरा बढ़ा दिया है।

कांग्रेस के काल में धमाकों में या विद्रोहियों को बिना सबूत अपराधी करार दिया जाता था पर अब बोलने वालों के खिलाफ भी वही बर्ताव होने लगा है। बीजेपी ने दो साल में इसे सरकार चलाने की परंपरा के तौर पर स्थापित किया है। लव जेहाद, घर वापसी से शुरू हुआ सफर अब नाइक तक पहुंचा है।

आप याद कीजिए तीन—चार महीने पहले जेएनयू में क्या हुआ? उससे पहले दादरी कांड में क्या हुआ। मतलब टेप आया नहीं, भाषण क्या हुआ पता नहीं, मांस की जांच हुई नहीं पर घर—घर में छात्रों के देशद्रोही होने के ​सर्टिफिकेट पहुंचा दिए गए और जन—जन जान गया​ कि अखलाक के घर में गाय का मांस ही था।

जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के मामले में इस कदर दुष्प्रचार कर नफरत फैलाई गयी कि वह आसानी से आज भी खुला नहीं घूमते, उनपर कोई सांप्रदायिक सनकी कभी भी हमला कर सकता है। बावजूद कि सभी रिपोर्ट्स में उनका कोई कसूर  किसी भी तरह से साबित नहीं हो पाया है।

सवाल है कि पुलिस, जांच, अदालत या सरकार से पहले ये कौन सी नई ताकत है जो आपकी जुबान को अपने दिमाग का गुलाम बनाकर सांप्रदायिकों की एक ऐसी भीड़ खड़ी कर रही है जहां बहस—मुबाहिसा का कोई चांस ही नहीं है। आरोप लगता है और अपराधी करार दिया जाता है। तानाशाही विरोधी शब्दों लेकिन, किंतु, परंतु का स्पेस ही खत्म हुआ जा रहा है।

भाजपा के इस खास तरीके को समझना होगा। उसे लगता है कि वैचारिक स्तर पर हो या सांस्थानिक रूप से देश पर कब्जा करने का यही तरीका है— भले ही देश, देश ही न रह जाए,  दंगाईयों और रक्त पिपासुओं की सनकी भीड़ ही क्यों न बन जाए। भाजपा और मोदी सरकार की इन जनविरोधी आदतों को ताकतपूर्वक रोकना होगा, अन्यथा देश की तबाही में ये हमें गवाह बनाके छोड़ेंगे। 

Jul 11, 2016

तुम मेरी वाली लिखो

दो—तीन दिन पहले मेरे बेटे ने पूछा, 'क्या कर रहे हो पापा?
मैंने कहा, कुछ लिख रहा हूं।
'क्या लिख रहे हो'
एक स्टोरी।
'कौन सी'
है एक, उसे ही।
'तो तुम मेरी वाली लिखो। मेरी वाली तुम लिखते ही नहीं।'
अपनी कहानी खुद लिखनी होती है मेरे बच्चे।
'पर मैं अभी छोटा हूं और केजी में हूं। कैसे लिखुंगा। तुम्हें मालुम तो है?'
तो तुम जाओ पेंटिंग करो।
'मुझे नहीं करनी। मेरी कहानी लिखो। मम्मा भी नहीं लिखती।'
तुमने मम्मा को बताया?
'हां, पर वह सुनती ही नहीं। बस हंस देती है।'
अच्छा मुझे सुनाओ अपनी कहानी।
'शेर—चूहे वाली है'
ओह! वही वाली जिसमें चूहा जाल काट कर शेर को बचाता है। उसे क्या लिखना, सब जानते हैं। तुम्हारी किताब में भी है।
'अरे नहीं। दूसरी है। इसमें चूहा शेर को मार देता है।'
चूहा, शेर को मार देता है। गज्जब! वह कैसे?
'शेर, चूहे को खाता है इसलिए मर जाता है'
शेर, चूहा खाता है। हा...हा। ऐसा क्यों, मेरे बच्चे!!!
'क्योंकि शेर को चूहे पर बहुत तेज गुुस्सा आता है।'
ओह! पर शेर को चूहे पर गुस्सा क्यों आता है? वो भी इतना कि वह चूहे को खा ही जाए।
'शेर को चूहे पर गुस्सा इसलिए आता है कि जब भी शेर शिकार करने जाता है, उससे पहले ही चूहा वहां पहुंचकर सब जानवरों को बता देता है कि शेर तुम्हें खाने के लिए आ रहा है और जानवर भाग जाते हैं।'
हा...हा। अबे, ऐसी कहानी तुमने कब बनायी। मैंने तो सुनी नहीं ये वाली।
'यही तो है मेरी वाली।'
अच्छा ये बताओ, शेर मर क्यों जाता है चूहा खाकर?
'इसलिए मर जाता है क्योंकि चूहा तो कुछ भी काट सकता है न। शेर जैसे ही चूहे को खाता है, चूहा शेर का गला काटकर बाहर निकल आता है और शेर मर जाता है। सुन ली न कहानी...चलो अब लिखो।'

Jun 1, 2016

एक पहेली सुनिए और सुलझाइए...

करीब पंद्रह दिन पहले की बात है। एक स्कूल होता है। उसमें लड़का—लड़की दोनों पढ़ते हैं। जैसा कि पढ़ाई के दौरान कई बार होता है, वो यहां भी होता है। 16—17 साल के एक ही गांव के एक जोड़े में मोहब्बत हो जाती है। पर मोहब्बत भी इतनी आसान चीज कहां। निगोड़ी हर बार जाति—धर्म के साथ आती है, सो इस बार भी आई है। 

लौंडिया हिंदू है और लौंडा मुसलमान। प्रेम परवान चढ़ता है। दुनिया खूबसूरत लगने लगती है। जोड़े एक बार इस दुनिया को जिंदगी में घुली खूबसूरती के साथ निहारते हैं। वह खूबसूरती की खुशी को सबमें बांटना चाहते हैं। वे अपनों से चहक—चहक के 'जिंदगी में पहली बार हुआ है' कहना चाहते हैं। पर कहां ये खाम ख्याली। उनकी आंखें सूख जाती हैंं। हृदय कहता है यहां अब और नहीं, कहीं और चलो। वे प्लान बनाते हैं। 

लौंडे के पास थोड़ा पैसा है, कुछ घर से दाएं—बाएं करता है। एक बाइक जुगाड़ता है और निकल पड़ते हैं दोनों कि जहां तक आसमां चले। पर बाइक और पेट से दिल का क्या। यह तो रोकड़े से चलता है और रोकड़े की नियती खत्म होने की है। सो खत्म हो जाता है और जोड़ा अपने घर लौट आता है। 

अब कहानी रोकड़ा खत्म होने के बाद की
जोड़ा शादी कर चुका है। लड़की ससुराल जाती है। मायके वालों को पता चल जाता है। बेटी को वह घसीट लाते हैं। थोड़े दिन सब चुप रहते हैं। फिर बेटी की शादी अपनी जाति में कहीं और कर दी जाती है। लड़की थोड़े दिन नए पति के साथ रहती है। फिर एक दिन वह लौटकर मायके आती है। देर रात में वह अकेले मायके से निकल पड़ती है। अपने प्रेमी के घर जाती है। लड़का मिलता है। वह अपने कमरे में होता है। शायद लड़की के इंतजार में। लड़की उसके कमरे में जाती है और थोड़ी देर बाद कमरे से धुआं उठता है। मोहल्ले को पता चलता है। लोग जुटते हैं। दरवाजा टूटता है। दो लाशें गिरती हैं।

आखिरी बयान
विक्षिप्त सा हो रहा लड़के का पिता कहता है, 'उस पानी में ही क्यों उतरना जिसको पार करना न आता हो।'

पहेली में जो सुलझाना है
आपको गुनहगार बताना है। ध्यान रहे जब आप गुनहगार चिन्हित कर लें तो यह पहेली आप औरों को सुनाएं और उनसे कहें वह किसी और को सुनाएं। बहुत जरूरी पहेली है सर। हल्के में मत लेना। हल्के में लेंगे तो फिर एक बार पुलिस इसे आत्महत्या का सीधा मामला और समाज 'जैसी करनी वैसी भरनी' की परिपाटी बताकर आपको चलता कर देगा।

May 31, 2016

इस धंधे में नौकरी मिलने का एक मात्र पैमाना संपर्क, जाति और जुगाड़ है...

कई सारे पत्रकार सोशल मीडिया पर बता रहे हैं कि आज पत्रकारिता दिवस है। लोग एक दूसरे को बधाइयां दे रहे हैं। मैं भी इस मौके पर कुछ कहना चाहता हूँ। मगर कहने से पहले एक सफाई । मैं वर्तमान के बारे अपने अनुभव शेयर करूँगा क्योंकि इतिहास का गर्व मैं कभी महसूस नहीं कर पाया...
● पत्रकारिता एक मात्र धंधा है जहाँ आप पत्रकारिता करने के आलावा जो भी करें उसके लिए प्रोत्साहित किये जाते हैं, आपको तवज्जो मिलती है..लाइजनिंग, सेटिंग, बारगेनिंग, क्रिमिनल एक्टिविटी ...दूसरे किसी धंधे में ऐसा नहीं होता। गौर करें यह सभी अंग्रेजी के शब्द हैं पर हिंदी पत्रकारिता इसे सर्वाधिक अपने व्यवहार में उतारती है, वरिष्ठ इसे परंपरा की तरह नए में रोपते हैं। 
●सभी धंधों की मांग होती है उच्च गुणवत्ता। पर इस धंधे में उच्च गुणवत्ता लाने वालों की नौकरी हमेशा बोरिया-बिस्तर समेटने की मुद्रा में होती है। कहा जाता है- नोटिस तुम्हें खुद झेलनी होगी, मानहानी के मामले में नौकरी जायेगी, तेज न बनो, पॉलिसी समझो, नौकरी जायेगी, नहीं चलेगी एक्टिविस्ट टाइप पत्रकारिता।

● उदाहरण के लिए आप स्टील के धंधे को लें। इसकी गुणवत्ता इंजिनियरिंग विभाग तय करता होगा क्योंकि वही इसके काबिल है। पर पत्रकारिता की गुणवत्ता का मापदंड संपादकीय विभाग को छोड़कर दूसरे सभी विभाग तय करते हैं। मोटा सच ये है कि संपादकीय सिर्फ अंगूठा लगाता है।

● यह एक मात्र धंधा है जहाँ प्रोडक्ट प्रोड्यूस यानि अख़बार निकालने वालों की सैलरी सभी अन्य विभागों मार्केटिंग, सेल्स, प्रोडक्शन, प्रिंटिंग, सर्कुलेशन से कम होती है।

● अगर कोई सर्वे हो और उन्हें दूसरे काम का विकल्प दिया जाय तो मीडिया हाउसों में काम करने वाले 80 फिसदी कर्मचारी-पत्रकार नौकरी छोड़ना पसंद करेंगे।

● जिस धंधे का बहुतायत किसी आनंद, संतुष्टि, महत्वाकांक्षा या फितरत के कारण काम नहीं कर रहा, बल्कि पेट, परिवार और ईएमआई की मज़बूरी में ख़ट रहा है उसकी गुणवत्ता की बात करना टाइम पास है।

● अख़बारों और टीवी चैनलों की सबसे बड़ी वर्कफोर्स स्ट्रिंगर हैं, किसी मीडिया हॉउस को राष्ट्रीय बनाने की वह धुरी हैं पर उनकी औसत सैलरी 500 रुपये प्रतिमाह भी नहीं है।

● अभिव्यक्ति के इस धंधे में जो सबसे कम अभिव्यक्ति करता है, सबकुछ सह लेता है, वह आसमान में उड़ता है और जो बोलता है वह इस पेज से उस पेज पर गरई पकड़ता है।

● जिनको लिखने नहीं आता वह संपादक बनते हैं और जो लिखना जानते हैं उनकी सबसे बड़ी उपयोगिता संपादकीय के 3 सौ शब्द लिखने में साबित होती है।

● इस धंधे में नौकरी मिलने का एक मात्र पैमाना संपर्क, जाति और जुगाड़ है। संघी-वामपंथी-समाजवादी होना अतिरिक्त योग्यता है। साक्षात्कार संस्थान के मानक को बनाये रखने का जरिया भर है जिससे कंपनी के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय वैल्यू में कमी न आये। यह ठीक वैसे ही है जैसे आप हर साल अपरेजल फार्म भरते हैं पर उससे पहले ही तय हो चुका होता है कि सबकी सालाना सैलरी कितनी बढ़नी है।

अब आप कह सकते हैं कि जब इतना कुछ नकारात्मक है तो आप क्यों हैं पत्रकारिता में, छोड़ क्यों नहीं देते। हो सकता है कुछ मित्र फोन करें कि नौकरी चली जायेगी भाई।

इसपर मेरा बस कहना है दोस्तों मैं पत्रकारिता को जीता हूँ, इसलिये लिख रहा हूँ। आप भी लिखिए। डंके की चोट पर 'हम कह कर लेंगे' तो सूरत बदलेगी।

बाजार सक्षम और विवेकवान लोगों को भी कम स्पेस नहीं देता। जरुरत है तो पत्रकारिता की काई को साफ़ करने की, क्योंकि हमने काई देखते - देखते पानी के अस्तित्व को ही भुला दिया है। ‪#‎hamtobolenge‬

May 12, 2016

शादियों में सबके अपने कोने होते हैं

शादियों में सबके अपने कोने होते हैं और हर कोई अपने परिचितों—दोस्तों के साथ किसी न किसी टॉपिक पर लगा रहता है। मुझे भी एक कोने में जगह मिली और कुछ लोग वहां एक हॉट सामाजिक सवाल पर लगे हुए थे। सवाल बिल्कुल समय से था और वास्ता उसका सबसे था।
टॉपिक था मोबाइल में पासवर्ड डालना सही है या गलत, नैतिक है या अनैतिक। और क्या जो लोग अपनी मोबाइल में पासवर्ड डालते हैं उन्हें संदेहास्पद माना जाए, अनैतिक कहा जाए। क्या मोबाइल पासवर्ड को डिजिटल चरित्र प्रमाण पत्र के तौर पर लिया जाए!
देर तक इस मसले पर बहस होती रही। सबने अपने अनुभव और समझदारी की बातें कीं। बहस कर रहे लोगों ने एक स्वर में माना भी कि जो पासवर्ड डालते हैं, वह संदेहास्पद होते हैं।
बहस कर रहे ये लोग ईमानदार किस्म के थे कि इन्होंने उदाहरण के तौर पर खुद को भी शामिल करने से गुरेज नहीं किया। माना कि वे सभी खुद भी पासवर्ड डालते हैं और सबको भाई, बाप, दोस्त , पति , पत्नी, प्रेमी, प्रेमिका से कुछ न कुछ छुपाना होता है। एक ने तो यह भी कहा कि वह इसलिए पासवर्ड डालता है क्योंकि उसका बॉस इधर—उधर टहलते हुए किसी का फोन उठाकर देखने लगता है।
हमारी सरकार और पार्टियां भले ही जनता को किसी और सामाजिक मसले की ओर खींचकर ले जाएं लेकिन आप भी मानेंगे कि आजकल मोबाइल में पासवर्ड का सवाल एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक विमर्श का विषय बना हुआ है। कोई ऐसी सार्वजनिक जगह नहीं जहां युवा आपको ऐसी बातें करते न दिख जाएं।
लेकिन आप इस सवाल पर सोचें और कुछ राय दें उससे पहले बात यह कि पासवर्ड डालना ही क्यों है? यह समस्या बनी ही क्यों? किसी और कि मोबाइल, कोई और छूता ही क्यों है, किस नैतिक साहस के साथ देखता है, उसे चेक करता है। थोड़ी भी शर्म नहीं आती ऐसे लोगों को। फिर वह क्यों रहते हैं एक साथ, एक छत के नीचे या क्यों खाते हैं कसमें एक—दूसरे के संग होने की, जीने की। इतना न्यूनतम विश्वास एक दूसरे के लिए हमारे में नहीं बचा है फिर हम बराबरी और भरोेसे का समाज बना कैसे सकते हैं।
पर इन सबके बीच सबसे घातक तो यह है कि जिसकी मोबाइल चेक हो रही है वह भी और जो चेक कर रहा है वह भी, इस घटिया हरकत को महान भारतीय परंपरा की मान रहा है। वह प्राइवेसी जैसे किसी मानवाधिकार या अधिकार को समझता ही नहीं है। वह इस खेल में खुद को भागीदार बना रहा है पर इस वाहियात हरकत पर नफरत या विरोध में दो शब्द नहीं दर्ज करा पा रहा। हालत यह है कि जब जिसको मौका मिलता है, वह चेक कर लेता है। इस मामले में सभी आरोपी हैं और सभी पीड़ित। कभी जो आरोपी है वह पीड़ित बन जाता है और कभी पीड़ित, आरोपी।
हमारे भीतर इतनी जनतांत्रिक चेतना और भरोसा का बोध नहीं है कि हम बुलंद हो बोल सकें कि प्राइवेसी भी कोई चीज होती है भाई।
मैं डिजिटल होते समाज का इसे एक बड़ा सवाल मानता हूं क्योंकि इससे समाज तकनीकी से तो आधुनिक हो रहा है पर चेतना के स्तर पर हमारी समझ पुरानी, दकियानूस और डिक्टेट करने वाली बनी हुई है। इस समझदारी के रहते चाहे हम इंसान ही डिजिटल क्यों न बना लें पर हम अपने देश और समाज को बराबरी, सहजता और सम्मान वाला कभी न बना पाएंगे। ‪#‎hamtobolenge‬

मर्दो का बहुमत औरतों के बारे में जनमत कैसे बनाता है...

मर्दो का बहुमत औरतों के बारे में जनमत कैसे बनाता है, उसका एक मजमून देखिए।

दिल्ली के राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर यात्रियों के चढ़ने के साथ चटाक की आवाज आई। साफ था कि किसी के गाल पर जोर का तमाचा लगा है। देखा तो पता चला कि तमाचा एक लड़की ने एक लड़के के गाल पर मारा है। तमाचा मारने वाली लड़की, लड़के को डांट रही थी। बदतमीज और बेशर्म बोल रही थी। लड़का भौचक था जबकि भीड़ तत्पर निगाहों से दोनों को देख रही थी।

लड़का अकबकाते हुए बोला, 'मैंने क्या किया, मैंने क्या किया। इतनी भीड़ में धक्का लग गया तो मैं क्या करूं।'
लड़की, 'धक्का लगा है। बताउं मैं तुम्हें। एक और जोर की लगाउंगी तो सब याद आ जाएगा।'

भीड़ और भी तत्परता से कभी लड़के की तरफ तो कभी लड़की ओर ताके जा रही थी। लड़का वहीं गेट पर खड़ा रहा और गुस्से में तमतमाई लड़की दूसरे बोगी की ओर बढ़ गयी। थोड़ी देर में लड़का भी दूसरी ओर खिसक लिया।

तबतक ट्रेन मंडी हाउस से आगे बढ़ चुकी थी और मौन भीड़ विमर्श की मुद्रा में आ चुकी थी। विमर्श की शुरुआत करते हुए एक दक्षिण भारतीय हिंदी बोलने वाले सज्जन ने कहा, 'मैंने देखा नहीं कि लड़के ने क्या किया, लेकिन जब इतनी परेशानी रहती तो इन लोगों को लेडिज बोगी में जाना चाहिए। बताइए, मारने का क्या? पलट कर वह भी मार दे फिर हम ही लोग कहेंगे कि लेडिज पर हाथ उठाता है।'

बात को आगे बढ़ाते हुए एक दूसरे अधेड़ ने कहा, 'मैंने भी नहीं देखा कि लड़के ने क्या किया पर इन लड़कियों के साथ अपराध इसीलिए हो रहे हैं कि मर्दों का यह कोर्इ् वैल्यू ही नहीं समझतीं। जब कोई लड़की ऐसे सरेआम मर्द को बेइज्जत करेगी तो क्या होगा। अगर वह लड़का अपने पर आ जाए और कुछ कर दे तो। वैसे भी तेजाब फेंकने की कितनी घटना होने लगी हैं आजकल।'

तीसरी राय एक नौजवान की ओर से आई, 'ऐसी लड़कियों के ही बलात्कार होते हैं। कैसे ठुमक के चली गयी। अरे क्या किया होगा लड़के ने। भीड़ में धक्का ही लगा होगा न। क्यों चलती है मेट्रो से। इतने ही नखरे हैं तो गाड़ी से चला करे, बोल दे बाप को।'

चौथी राय उस आदमी की ओर से आई जिसके गले में मिनिस्ट्री आॅफ होम अफेयर्स का आईकार्ड गले में लटका था। उनके विचार में, 'पता नहीं लड़के ने लड़की के साथ किया क्या पर इसमें मैं लड़की से ज्यादा मां—बाप को दोषी मानता हूं। वह बेटियों को पारिवारिक मूल्य सिखा नहीं रहे। मेरी भी बेटियां हैं, हमलोग भी परिवार वाले हैं, कभी कोई संस्कारी लड़की ऐसा करेगी नहीं। वह सह लेगी चुपचाप। आखिर क्या मिला उस लड़की को। जो बात छुपी हुई थी वह सबके बीच आ गई, क्या इज्जत रह गयी।'

ऐसी घटनाओं के एकाध किस्से आपके पास भी होंगे। पर इस घटना में आपने गौर किया होगा कि राय बनाने वालों में से किसी को पता नहीं कि लड़के ने लड़की के साथ क्या किया, किस रूप में छेड़खानी की, क्योें लड़की ने चाटा मारा। पर राय बना ली, अगल—बगल वालों को प्रभावित किया। इतना ही नहीं राय बनाने वाले ये लोग जहां काम करते होंगे, पढ़ते होंगे या रहते होंगे, वहां भी कल को औरतों—लड़कियों की बात आने पर आंखों देखी इस साक्ष्य को कुर्सी पर मुक्का मारकर दावे के साथ पेश करेंगे।

पर आप सब जोकि इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी नहीं है, सिर्फ इस वाकये के एक पाठक भर हैं, क्या प्रत्यक्षदर्शियों के जनमत बनाने की इस प्रक्रिया के साथ आप खड़े होना जायज मानते हैं। नहीं न। फिर इसे रोकिए, चुप मत बैठिए क्योंकि बहुमत द्वारा जनमत बनाने का यह तरीका बहुत ही खतरनाक है। सिर्फ औरतों के लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए, एक सक्षम मुल्क के लिए।' ‪#‎metrodairy‬

Feb 9, 2016

निदा फाजली में कबीर की झंकार है!

मंगलेश डबराल
वरिष्ठ कवि

निदा फाजली का जाना हिंदी-उर्दू कविता का बड़ा नुकसान है। वे उर्दू के ऐसे शायर थे जिन्होंने उर्दू कविता को संभ्रातता और शहरीपने से बाहर कर भक्तिकाल के विद्रोही कवियों कबीर, मीरा के साथ एकरूप किया, किसानों और आम आदमी तक ले गए। उन्होंने उर्दू शायरी को सरल बनाया और इतना सरल कि जितनी पहले कभी नहीं थी। जैसे उनका दोहा देखिए,

बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलिशान, अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान।

निदा से मेरी पहली मुलाकात 1971-72 में हुई थी। मैं एक शायर मित्र शाहिद माहुली के साथ दिल्ली में किराए के कमरे में रहता था। वह माउली के दोस्त थे और वहां उनका अक्सर आना जाना था। वहीं से उनसे मेरी दोस्ती हुई। वह बहुत ही फक्कड़ और मजाकिया किस्म के आदमी थे।

एक बार भोपाल आकाशवाणी ने कुछ लोगों को बुलाया। सुबह हम पटरी पर चाय पीने गए। वह मुस्लिम बस्ती थी। चाय वाले लड़के ने कहा, ‘पहले पैसा दोगे तो चाय पिलाउंगा।’ निदा तैयार हो गए। चाय पीकर हम उठे तो निदा का कुर्ता चाय वाले के फट्टे की कांटी में फंसकर फट गया। तभी निदा की निगाह एक वकील के बोर्ड पर पड़ी।

सुबह-सुबह मुवक्किलों को देख खुश होते हुए वकील बोले, ‘कहिए जनाब, मैं आपलोगों की क्या खिदमत कर सकता हूं।’ कुर्ते के कोने को दिखाते हुए निदा पूछे, ‘जनाब, यह फट गया है, क्या कोई मामला बनता है। मैं चाहता हूं चाय की दुकान वाला इसका हर्जाना भरे।’ वकील गंभीर होते हुए बोला,‘मामला बनता तो है। आइए बैठकर बात करते हैं।’ बाद में आने की बात कहकर हमलोग पीछे मुडे़ और उसके बाद जो हंसी का दौर चला वह जीवन भर हर मुलाकात पर जारी रहा।

ख्यात शायर शहरयार और निदा दोनों उस दौर में उभरे जब प्रधानमंत्री नेहरू के दिखाए सुंदर सपनों से देश दूर हो रहा था। पर शहरयार के मुकाबले उनकी नज्मों में उम्मीद, जिंदगी की एक आस हमेशा बनी रही। वह कभी आखिरी तौर पर निराश नहीं हुए। उन्होंने कभी नहीं माना कि हिंदुस्तान से गंगा-जमुनी संस्कृति को खत्म किया जा सकता है। शायद यही आस थी कि ग्वालियर दंगों के बाद जब निदा के मां-बाप पाकिस्तान चले गए तो उन्होंने हिंदुस्तान में ही रहना मुनासिब समझा। उन्होंने अपनी जीवनी का पहला भाग ‘दीवारों के बीच’ सबसे पहले हिंदी में लिखा, जिसमें एक किशोर के रूप में विभाजन और ग्वालियर से जुड़ी मार्मिक यादें हैं। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हिंदी और उर्दू के बीच बढ़ते फासलों को कम करने का निदा ने सजग प्रयास किया, अपनी गजलों में बिल्कुल नया प्रयोग किया। उनका एक मर्मस्पर्शी दोहा है,

‘मैं रोया परदेस में भींगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्टी बिन तार।’

यह सरलता और पहुंच आप उर्दू शायरी में बहुत कम पाएंगे, इसीलिए कई बार निदा कबीर को प्रतिध्वनित करते हैं। पारसी में एक कहावत है, ‘नज्म वह है जिसका कोई नस्र यानी गद्य नहीं हो सके’। निदा की शायरी इसका उदाहरण है।

निदा फाजली ग्वालियर से जाने के बाद मुंबई में रहे, लेकिन उनपर कभी फिल्मी रंग नहीं चढ़ा। प्रतिरोध के प्रति उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता कभी नहीं छोड़ी। वह देश में बढ़ती असहिष्णुता, हिंसा के सवाल पर मुखर रहे। साहस, उम्मीद और जिंदगी जीने की जिद उनमें कितनी भरपूर थी, उनकी यह नज्म बड़ी साफ कर देती है,

‘उठ के कपड़े बदल, घर से बाहर निकल... जो हुआ सो हुआ
रख के कांधे पर हल खेत की ओर चल... जो हुआ सो हुआ....

(अजय प्रकाश से बातचीत पर आधारित)

Jun 14, 2011

सुलगती हुई ज़मीन


सरकार के सामने जब क्योतो प्रोटोकॉल के नियमों के कारण अड़चन पैदा हुई तो उसने जन सुनवाई का रास्ता अख्तियार किया, ताकि सहदेव विहार में जिंदल ग्रुप के कचरा बिजली उत्पादन केंद्र को लगवाने का रास्ता साफ हो सके...

अजय प्रकाश

जमीन अधिग्रहण के खिलाफ देश में व्यापक होते विरोध को देखते हुए अब सरकार संसद के अगले मानसून सत्र में सन् 1894 से चले आ रहे अंग्रेजों के जमाने के भूमि अधिग्रहण विधेयक को नया प्रारूप देने जा रही है। नये प्रारूप को लेकर सोनिया गांधी के अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) की ओर से कई सुझाव केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख को लगातार पहुंच रहे हैं, जिससे उन्हें लोक कल्याणकारी भूमि अधिग्रहण कानून बनाने में सहूलियत हो। इन सुझावों में जमीन मालिकों को नीलामी दर से छह गुना कीमत दिये जाने, ग्राम सभा को निर्णायक अधिकार देने और 75 फीसद प्रभावितों की सहमति के बाद ही अधिग्रहण की अनुमति जैसे मुद्दों को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भूमि अधिग्रहण मामलों में एनएसी कार्यसमूह के संयोजक हर्ष मंदर के शब्दों में कहें तो "सरकार ने अधिग्रहण में अगर उपर्युक्त तीनों प्रावधान शामिल कर लिये तो इस कानून में एक गुणात्मक परिवर्तन होगा।' सरकार और उसके सहयोगी अधिग्रहण कानून को किस रूप में लागू करेंगे, यह तो आने वाले सत्र में पता चलेगा, लेकिन पहले से मौजूद कानूनों में जनता की भागीदारी कितनी हो पा रही है, उसे देखने पर कुछ और ही कहानी सामने आती है।


 
ताजा मामला झारखंड के सिंहभूमि जिले का है, जहां 26 मई को जादूगोड़ा इलाके में भाटिन यूरेनियम माइंस के बीस साल पूरे होने पर एक्सटेंसन के लिए एक जन सुनवाई हुई। यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआइएल) के अधिकारियों ने क्षेत्र में माइक से प्रचार किया कि सुनवाई स्थानीय फुटबाल मैदान में होगी, लेकिन जन सुनवाई कॉरपोरशन कर्मचारियों के कॉलोनी में हुई।


सुनवाई के दौरान ग्रामीणों, मीडिया और जनांदोलनों से जुड़े लोगों ने जाने का प्रयास किया तो सुरक्षा बलों और निजी गार्डों ने उन्हें रोक दिया। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जन सुनवाई पूरी हो गयी। साथ ही 29 वर्ष और कंपनी के लीज को बढ़ाने का फैसला बगैर प्रभावितों की सहमति के ले लिया गया।

गौरतलब है कि यह एकतरफा फैसला एजेंसी क्षेत्र में लिया गया जो पहले से ही पेसा ऐक्ट के तहत आता है, जहां ग्राम सभा और लोगों की सहमति से ही अधिग्रहण या कंपनी चलाने का अंतिम निर्णय होता है। झारखंड आर्गेनाइजेशन अगेंस्ट यूरेनियम के संयोजक जगत मांडी कहते हैं, "यह बर्ताव तब किया गया जब इस क्षेत्र में नयी कंपनी नहीं बनानी थी बल्कि एक्सटेंशन लेना था। अधिग्रहण और विस्थापन तो पहले ही हो चुका था।'

यह अंधेरगर्दी सिर्फ आदिवासी इलाकों में ही नहीं है, बल्कि इसकी चपेट में दिल्ली जैसे शहर भी हैं। दिल्ली में कचरे से बिजली पैदा करने पर तुली सरकार के सामने जब क्योतो प्रोटोकॉल के नियमों के कारण अड़चन पैदा हुई तो उसने जनसुनवाई का रास्ता अख्तियार किया ताकि सहदेव विहार में जिंदल ग्रुप के कचरा बिजली उत्पादन केंद्र को लगवाने का रास्ता साफ हो सके।

टॉक्सिक वाच संस्था के गोपाल कृष्ण कहते हैं, "कचरा से बिजली पैदा करने के दिल्ली में हो चुके असफल प्रयोगों के बावजूद सरकार नहीं मानी तो उसने केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड को इस काम में लगाया, जिसने सिर्फ दो कर्मचारियों के हस्ताक्षर वाली जनसुनवाई करके संयंत्र लगाने की मंजूरी दे दी। सरकार की इस धूर्तता की जानकारी हमें सूचना अधिकार कानून की मदद से मिली।'

देश के दो हिस्सों के ये दो उदाहरण यह बताने के लिए काफी हैं कि पहले से बने कानूनों पर अमल की क्या स्थिति है। हालांकि एनएपीएम से जुड़े भूमि अधिग्रहण प्रतिरोध आंदोलन के संयोजक रूपेश वर्मा को अधिग्रहण कानून में हो रहे बदलावों में किसानों के लिए कुछ राहत दिखती है। उनके मुताबिक, "जो अधिकार अबतक जिलाधिकारी के हाथ में बंद थे, वे ग्रामसभा को मिलेंगे तो जमीनों की अबाध लूट की रफ्तार थमेगी।'

एनएपीएम से जुड़ी मेधा पाटकर भी अधिग्रहण कानून में होने जा रहे बदलावों को सकारात्मक रूप में देखती हैं। एनएसी की अरुणा राय के अनुसार, "सरकार अगर सार्वजनिक क्षेत्र के लिए जमीन लेगी तो व्यापक विचार विमर्श होगा और निजी अधिग्रहण के लिए 75 फीसद प्रभावितों की लिखित मंजूरी अनिवार्य होगी।'

सरकार अपनी जरूरतों के लिए किस तरह जमीन अधिग्रहण कर रही है, इसका एक उदाहरण न्यूक्लीयर पॉवर कॉरपोरशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनसीपीआइएल) की ओर से हरियाणा के फतेहाबाद जिले के कुम्हारिया न्यूक्लियर पॉवर प्रोजेक्ट के खातिर अधिगृहित की जा रही जमीन का मामला है। फतेहाबाद कलेक्ट्रट पर पिछले एक वर्ष से किसान संघर्ष समिति जमीन होने वाले कब्जे के विरोध में धरना दे रही है। अबतक धरना स्थल पर आने वाले दो किसानों की मौत भी हो चुकी है।

समिति के अध्यक्ष हंसराज सिवाच कहते हैं, "हम लोग हस्ताक्षर करके कितनी बार प्लांट के लिए जमीन नहीं देने की बात कह चुके हैं। जापान में आई सूनामी के बाद परमाणु संयंत्रों से रिसाव की घटना के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। फिर भी सरकार जिद पर कायम है।' हरियाणा की इस छवि के उलट फिक्की ने भूमि अधिग्रहण को लेकर हरियाणा को मॉडल के रूप में पेश किया है।

फिक्की के नवनियुक्त महासचिव ने भूमि अधिग्रहण के बारे में राय है कि "हम प्राकृतिक संसाधनों की ऑनलाइन नीलामी और अधिग्रहण के हरियाणा मॉडल अपनाने के पक्ष में हैं।' महासचिव के मुताबिक, हरियाणा में परियोजनाओं के लिए कंपनियां सीधे किसानों से 70 फीसद जमीन खरीदती हैं और सरकार मात्र 25 प्रतिशत जमीन पर कब्जा कर परियोजना के लिए कंपनी को हस्तांरित करती है। इसके अलावा हरियाणा के उन जिलों में जो एनसीआर जोन में आते हैं वहां 33 साल तक प्रति एकड़ 15 हजार रुपये के हिसाब से जमीन मालिक को देने और प्रभावित परिवारों को नौकरी देने का प्रावधान है।

इस बारे में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख का कहना है कि "नये अधिग्रहण कानून में निजी मालिकान और सरकार की जमीन मालिक से सीधी खरीद का औसत 70 20 का रखें या 80 20, का अभी इस पर सहमति बननी बाकी है।' फिक्की महासचिव के दावे के बरक्स किसानों के पक्ष को देखें तो दोनों मेल नहीं खाते। हरियाणा के अंबाला जिले में बन रहे "मॉडर्न इंडस्ट्रियल टाउनशिप' के लिए अधिग्रहीत की जा रही 280 एकड़ जमीन को लेकर मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा का दावा है कि इसकी मंजूरी एक लाख किसानों ने हस्ताक्षर के जरिये दी है, लेकिन किसान संघर्ष समिति बाखालसा ने इसे फर्जीवाड़ा करार दिया है।

अधिग्रहण को लेकर दूसरा विवाद सोनीपत राजीव गांधी एजुकेशन सिटी को लेकर है। 2006 में अधिग्रहीत की गयी इस इलाके की भूमि के बारे में सरपंच ओम सिंह कहते हैं, "सरकार को हमने पूरी जमीन देने का वायदा कभी नहीं किया था, इसलिए एक भी किसान ने अधिग्रहण के बदले आज तक मुआवजा नहीं लिया है।' जमीन अधिग्रहण के विशाल क्षेत्रों में खनन के वे क्षेत्र भी हैं जहां लोग लगातार अपने जल, जंगल और जमीन से उजड़ने को मजबूर हैं। उजड़ने का खौफ और पूंजीपतियों को सुविधा देने वाले अधिग्रहण कानूनों की वजह के किसान-आदिवासी विद्रोह कर रहे हैं और माओवादी प्रभाव क्षेत्रों को मजबूती दे रहे हैं। इसके बावजूद सरकार अधिग्रहण नीतियों को बदलने को तैयार नहीं दिखती है।

हाल ही में योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया ने खनन क्षेत्रों की रॉयल्टी बढ़ाये जाने के सवाल पर कहा है कि "खनन का धंधा बड़े निवेश और जोखिम का है। खनन कंपनियों के मुनाफे में स्थानीय लोगों की भागीदारी से विदेशी निवेशक बिदक जायेंगे और निवेश के भविष्य पर भी खतरा उत्पन्न हो जायेगा।' खनन के लिए विशेष जोन के रूप में ख्यात छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नया अतिक्रमण भारतीय सेना अपना ट्रेनिंग कैंप खोलकर करने जा रही है। एजेंसी एरिया का यह क्षेत्र, जो कि पेसा कानून के तहत आता है, अब तक हुए इस अधिग्रहण की जरूरतों से बेमेल है। सेना ट्रेनिंग स्कूल के लिए सरकार अबूझमाड़ में 4 हजार वर्ग मीटर जमीन का अधिग्रहण करने जा रही है हालांकि इसके लिये स्थानीय आदिवासियों से कोई सहमति नहीं ली गयी।

अबूझमाड़ क्षेत्र में सेना के कैंप बनाये जाने का कारण यह है कि माओवादी इलाका है, जहां सरकारी तंत्र काम नहीं करता। माओवादियों से निपटने के इस नये तरीके पर इस क्षेत्र के जानकार और पूर्व कमीश्नर बीडी शर्मा दो स्तरों पर चिंता जाहिर करते हैं। पहली बात यह कि "जो आदिवासी भाषा ही नहीं समझेंगे, उनके जमीन का अधिग्रहण सरकार कैसे करेगी? दूसरी बात यह कि अंडमान के उदाहरण को देखें तो अंग्रेजों के समय की अठारह जनजातियों में से वे ज्यादातर जनतातियां खत्म हो गयीं जो बाहरियों के संपर्क में आयीं।'

गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं, "अगर सेना अबूझमाड़ के क्षेत्र में अधिग्रहण कानूनों को ताक पर रखकर प्रशिक्षण केंद्र बनाने में सफल हो भी जाती है तो यह एक ऐसा आत्मघाती कदम होगा जिसमें सुरक्षा बलों और आदिवासियों की पीढ़ियां एक दूसरे का खून बहाती रहेंगी।'

मानसून सत्र में पेश होने जा रहे अधिग्रहण कानून के विचार से किसी को ऐतराज नहीं होगा क्योंकि अंग्रेजी शासन काल से चले आ रहे अधिग्रहण कानून में लोकतंत्र की मूल भावना के मुताबिक बदलाव जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि किसानों- आदिवासियों के प्रतिनिधियों के भागीदारी के बगैर जो प्रस्ताव तैयार हुआ है उससे कोई ऐसा जमीन अधिग्रहण कानून कैसे बना सकता है, जिसके के बाद इन तबकों में रोष न हो।



द पब्लिक एजेंडा से साभार.



May 3, 2010

काम पर परिवार


खुदाई  के  लिए  अभिसप्त  शहर दिल्ली का  यह आम दृश्य है.सरकार के मुताबिक ये सब  विकास के लिए हो रहा है और   विकास राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के लिए.शहर की सहूलियत और सुविधाओं के मार्फ़त खेलों के आयोजन का तो इतिहास रहा है,मगर दिल्ली को पहले ऐसे शहर कि ख्याति मिलेगी जो खेलों के मार्फ़त बदली  है, विकसित हुई  है.हो यह रहा है कि यहाँ  नागरिकों का ख्याल कर खेल और आयोजन के इंतजामात नहीं किये जा रहे बल्कि खेलों के हिसाब से लोगों के नागरिक अधिकार तय हो रहे हैं.


इस बारे में समाजशात्री आशीष नंदी ने एक साक्षात्कार  में कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं -'हमारे यहां एक तरफ राष्ट्र मंडल खेलों की तैयारियां चल रही हैं और दूसरी तरफ उतनी ही तेजी से झोपड़पट्टियों और गरीब बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है या पहले ही उजाड़ दिया गया है। मेरे लिए ये सब झकझोर देने वाली घटनाएं भी हैं। मैं सोचता हूं,यह कैसा देश है जहां दूसरों के स्वागत के लिए अपने लोगों को तबाह किया जा रहा है। न्यूयार्क, लंदन, शिकागो जैसी जगहों में भी स्लम हैं और हार्लेम तो दुनिया की मुख्य स्लम बस्तियों में से एक है। गौर करने वाली बात है कि अभी हाल ही में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का दफ्तर स्लम की तरफ बनाया गया है। लेकिन क्या हमारा कोई अदना-सा सांसद भी ऐसी किसी बस्ती की तरफ रहना पसंद करेगा। जाहिर है,हमारा शासक वर्ग सिर्फ स्लम को ही नहीं ऐसी हर समस्या को,जिसको वह नहीं चाहता है,भुला देना चाहता है नहीं तो ढंक देना चाहता है। यह हिंदुस्तानी शासक वर्ग की कार्यशैली की सामान्य आदत है कि जिसे वह नहीं चाहता है,मुख्य सामाजिक दायरे से उठाकर फेंक देता है।


आइये इस हालात को हम  फोटोग्राफर आरबी यादव की नज़रों से देखें -




नज़र न लगे लल्ला को : विकास की  नज़र से कैसे बचाओगी माई

का फोटो खींचत हौ चचा : रीअल्टी शो होगा का




काम पर परिवार : विकास के लिए जरूरी कहती सरकार



तापमान साक्षरता का विषय है : और काम कामगारों का



May 1, 2010

स्वदेश वापसी का रास्ता बंद है

राजशाही के खिलाफ लोकतंत्र की स्थापना के लिए लड़े नेपाली भाषी भूटानी नागरिकों को भूटान की राजशाही ने खदेड़ दिया था. ये  लोग  पिछले 18  वर्षों  से नेपाल के सात कैम्पों में शरणार्थियों का जीवन बीता रहे हैं. 

संयुक्त राष्ट्र संघ समेत अन्य  दानदाता एजेंसियों के सहारे गुजर-बसर कर रहे शरणार्थियों की आबादी भूटान की कुल जनसंख्या का पांचवां हिस्सा है.पराये देश में इनकी तीसरी पीढी नौजवान हो रही है. शरणार्थियों ने भूटान जाने का जब भी प्रयास किया तो भारतीय फौजों ने दखलंदाजी की.कारण कि नेपाल से भूटान जाने का रास्ता भारत (पश्चिम बंगाल)  होकर ही जाता है. ऐसे में सवाल है कि क्या भूटान में हो रहे दक्षेस देशों के 16वें शिखर सम्मेलन में 'शरणार्थियों',जिनकी संख्या डेढ़ लाख से अधिक है, उनपर भी कोई बात होगी.


टेकनाथ रिजाल नेपाल में रहने वाले भूटानी शरणार्थियों के लोकप्रिय नेता हैं. भूटानी राजशाही ने १९८९ में लोकतांत्रिक आंदोलन खडा करने के आरोप में रिज़ाल को १० साल  कैद की सज़ा दे डाली थी. १८ दिसम्बर १९९९ को जेल से रिहा  होने के बाद से वह नेपाल में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं
राजशाही की देखरेख में लोकतन्त्र की स्थापना की कवायद से शणार्थियों को क्या उम्मीदें हैं, भारत से वे क्या चाहते हैं जैसे मसलों पर काठमांडू में हुई टेकनाथ रिज़ाल से अजय प्रकाश  की  बातचीत

टेकनाथ रिजाल : दक्षेश सम्मलेन से उम्मीद नहीं

भूटानी नागरिक भारतीयों के साथ कैसा रिश्ता महसूस करते हैं

भारत के आजादी से पहले का कहें या बाद का दक्षिणी भूटान के नेपाली भाषी लोंगों से भारतीयों का गहरा आत्मीय रिश्ता है. भारतीय फौजों में हमारे इतने लोग थे कि जब राजा ने देश निकाला किया तो उसमें सैकडों वीर चक्रों को हमसे छीन लिया.ये वीर चक्र हमारे लोगों को भारतीय सेना में काम करते हुये दिये गये थे.इतना ही नहीं भारत की आजादी की लडाई में शामिल हुये तीन-चार भूटानी नागरिक तो बहुत बाद तक पटना जेल में बंद रहे. मगर हमें अफ़सोस है कि जिस देश के साथ हम लोगों का इस तरह का रिश्ता रहा था वही देश आज हमें अपने देश जाने के लिए रास्ता नहीं दे रहा है.

भूटान-भारत के साथ मौजूदा और पूर्ववर्त्ती संबंधों के बीच आप लोग क्या फर्क देखते हैं .

१९६० के बाद भूटान में जिस स्तर पर नागरिक सुविधायें लागू कि गयीं उसमें भारत का अहम योगदान हैं
भूटान को इससे पहले एट्टियों यानी जंगली लोगों का देश कहा जाता था. किन योजनाओं में कितना खर्च होगा के हिसाब से लेकर मलेरिया तक के ईलाज का भार भारत ही उठाता था.मौजू़दा दौर में भारत सरकार का झुकाव और पक्षधरता भूटानी नागरिकों के प्रति होने के बजाय राजा के प्रति है.दक्षिण एशिया का सबसे ताकतवर और जनतांत्रिक देश होने के नाते न सिर्फ भूटान बल्कि इस क्षेत्र के हर देश की जनता बहुत उम्मीद से भारत की तरफ देखती हैं.हमारा स्पष्ट मानना भारत सरकार की मदद के बगैर न तो नेपाल में शांति प्रक्रिया को स्थिरता मिल सकती है और न भूटानी शरणार्थी सम्मानपूर्वक स्वदेश वापसी कर सकते हैं

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक नेपाल के शिविरों में रहने वाले भूटानी युवा आतंकवादी  गतिविधियों में संलिप्त है?

यह तथ्यजनक नहीं है.यह राजा प्रायोजित प्रचार है,जिसे हिन्दुस्तानी मीडिया हवा देता रहता है. जाहिर है कि राजा तथा उसकी मददगार शक्तियां नेपाल के कैम्पों में रह रहे डेढ लाख शरणार्थियों पर किसी बहाने तोहमत लगाती रहेंगी जिससे स्वदेश वापसी संभव न हो

दक्षिणी भूटान के नेपाली भाषियों को भूटानी राजा ने देशनिकाला क्यों किया?

उसके दो मुख्य कारण थे.एक तो यह कि भारत के साथ दक्षिणी भूटान के नागरिकों की नजदीकी बढती जा रही थी
दूसरा यह कि भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को देखकर भूटानियों ने भी जनतांत्रिक हकों के लिए पहल करना शुरू किया.लेकिन राजा को यह मंजूर नहीं था. प्रतिक्रिया में उसने नेपाली भाषी लोगों की संस्कृति, भाषा तथा जीवन जीने के तरीके तक पर हमले शुरू कर दिये
राजशाही के जुल्म इस कदर बढे कि राज्य की तथाकथित संसद में बैठे सांसदों,अदालत के जजों तक को राज्य निकाला कर दिया गया.फरवरी १९८५ में जब राजा ने हमारी नागरिकता को रद्द कर दिया तो हमें भरोसा था कि पडोसी देश भारत राजशाही की तानाशाही के खिलाफ ऐतराज करेगा. मगर यहां उल्टा हुआ. आज हम न भारत में हैं न भूटान में, हमें तीसरे देश की शरण लेनी पडी.
भारत,राजा के साथ अपने हित साध रहा है.कौन नहीं जानता कि भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मरीं तो राजा ने देश में जश्न मनाये.भारत की अखण्डता के लिये खतरा बन चुके उल्फा और बोडो उग्रवादियों की प्रमुख शरणस्थली तथा ट्रेनिंग कैम्प आज भी भूटान में है.
हमारे ऊपर आतंकवादी गतिविधियों के संचालित करने का आरोप लगाने वाली भारतीय मीडिया  को ये तथ्य क्यों नहीं दिखते?साथ ही भारतीय सरकार भूटान में भारत के लिए काम करने वाली स्थानीय खुफिया एजेंसियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं करती कि तैनात अधिकारी भारत के प्रति कितने ईमानदार हैं

शरणार्थियों की तीसरी पीढ़ी : नेपाल में चोरी-छुपे मिलता है काम

क्या यह सच है कि शिविर के युवाओं में भारत के खिलाफ नफरत बढ रही ?

पिछले कुछ सालों में भारत के प्रति नफरत बढी है. 17-18 वर्षों में हमने स्वदेश वापसी का सात-आठ बार शांतिपूर्वक प्रयास किया. मगर जाने में असफल रहे हैं. इन प्रयासों के खिलाफ भारतीय फौजें बार-बार रोडा बनकर खडी हुयी हैं



भूटान से भारत की नजदीकी की वजहें?

भूटान की कुल साढे छह लाख की आबादी में भारतीयों की संख्या ६० हजार है.भूटानी बाजार और व्यापार पर भारतीयों का ही कब्जा है.इसके अलावा भारत सरकार को यह भी डर है कि लोकतंत्र कायम होते ही वह भूटान में अपने कठपुतली राजा का उपयोग नहीं कर सकेगा.मतलब यह कि एक तरफ जहां भारत सीधे आर्थिक लाभ के कारण स्थानीय राजनीति पर अपना दबदबा बनाये रखना चाहता है वहीं विस्तारवादी नीति के मद्देनजर कमजोर देशों में सामंती राजसत्ताओं को बनाये भी रखना चाहता है.

अमेरिका ने प्रस्ताव दिया है वह शरणार्थियों को कनाडा और दूसरे देशों में पुनर्वासित करेगा ?

मीडिया में आयी खबरों के आधार पर हमने नेपाली सरकार से बातचीत की तो पता चला कि अमेरिका की तरफ से इस बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं हैं.हालांकि सांस्कृतिक,भौगोलिक विविधता की वजह से ऐसा होना संभव नही है.हुआ भी तो इसे स्थायी हल नही कहा जा सकता.अगर भूटानी शरणार्थियों का अमेरिका शुभचिंतक है तो भारत पर दबाव डाले कि वह शरणार्थियों को स्वदेश वापसी का रास्ता दे.
दूसरा यह कि भारत के लिये भी यह बेहतर नहीं कि हम अमेरिका में जाकर बसें.कैम्पों में भारत के खिलाफ बढ रही नफरत का कभी भी कोई साम्राज्यवादी देश इस्तेमाल कर सकता है

अमेरिकी प्रस्ताव पर शरणार्थियों का क्या विचार है?

मिला-जुला असर है.शगूफा उठा कि अमेरिका जाने वाले फार्म पर दस्तख्त करने से १७,००० लाख नेपाली रुपये मिलेंगे.इस लालच में तमाम शरणार्थियों ने फार्म भरे लेकिन पिछले दिनों जब स्वदेश वापसी की पहल हुई  तो सभी भारत की सीमाओं की तरफ जुटने लगे.किसी ने नहीं कहा कि वह अमेरिका जायेगा.इसलिये कहा जा सकता है कि शरणार्थी अब इस कदर त्रस्त हो चुके हैं कि वह कहीं भी सम्मान और बराबरी की जिन्दगी चाहते हैं चाहे वह कनाडा हो या भूटान.

पश्चिम बंगाल  की वामपंथी सरकार का रूख कैसा रहा है?

लंबे समय बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्ध्देव भट्टाचार्य ने २००७ के जून माह में आश्वासन दिया कि भूटानियों की समस्या का हल किया जायेगा.हालांकि इस वादे से हफ्ते भर पहले बंगाल पुलिस, असम पुलिस और सीआरपीएफ ने हमारे लोगों को गोलियों से भून डाला था.आखिरकार हम करें तो क्या करें.सच का एक बडा हिस्सा है कि समाधान भी उत्पीडक ही करेगा.

नेपाल का रुख?
सरकार चाहे किसी की रही हो नेपाल ने हमेशा आश्रय दिया है. कहना अतिरेक नहीं होगा कि नेपाली माओवादी
इस मसले को लेकर अन्य पार्टियों से हमेशा गंभीर रहे हैं.


 नोट- यह साक्षात्कार पुराना है, मगर मसले जस के तस बने हुए हैं

Apr 24, 2010

ठगी का सामाजिक अभियान


अजय प्रकाश

बुनियादी सुविधाओं से महरूम जनता की समस्याओं को किस तरह बेचा जा रहा है, इसे देखने और झेलने का मौका मुझे हाल ही में मिला. यह मौका इंफोसिस के पूर्व सह अध्यक्ष और अब यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया के मुखिया नंदन नीलेकणी की पत्नी रोहिणी नीलेकणी के एनजीओ आरघ्यम की दिल्ली स्थित उपशाखा इंडिया वाटर पोर्टल की ओर से पंजाब के भटिण्डा में दो दिवसीय कार्यशाला में मिला.


इंडिया वाटर पोर्टल मुख्य रूप से पानी पर सूचनाओं के प्रसारण का काम करती है.साथ ही वह पानी पर काम करने वाले एनजीओ की दानदाता एजेंसी भी है.पोर्टल की हिंदी वेबसाइट की संचालक मीनाक्षी अरोड़ा और सिराज केसर की तरफ से 26 मार्च को पत्रकारों के लिए एक लिखित निमंत्रण आया. निमंत्रण पंजाब के मालवा क्षेत्र से संबंधित था, जिसमें बताया गया था कि पानी में यूरेनियम की अधिकता से सेरीब्रल पैल्सी रोग हो रहा है. अंत में बताया गया था कि 29 मार्च को दिल्ली से एक गाड़ी जायेगी जिसमें इच्छुक पत्रकार सवार हो सकते हैं.

29 तारीख को मैं भी उस गाड़ी में सवार हो गया. गाड़ी में किसी और पत्रकार को न देख मुझे आश्चर्य हुआ. पूछने पर मेजबानों ने बाजारू पत्रकारिता का हवाला देकर मुझे सामाजिक पत्रकारिता का वीर पुरुष करार दिया. अफसोस भी जताया कि हमने तो मेल कई हजार लोगों को भेजे थे, उनमें आपके अलावा सिर्फ एक और पत्रकार मणिमाला साथ जा रही हैं.मणिमाला से परिचय के बाद जब हमलोग चाय के लिए रूके तो उन्होंने एनजीओ के अनुभवों को साझा किया कि,एक नहीं सभी अपने बजट का 85 फीसदी हिस्सा बड़े पदाधिकारियों के खर्चे और तामझाम में लगा देते हैं.

भटिंडा का सर्किट हाउस : ठगा सा महसूस करते लोग
भटिंडा में पहले दिन का सत्र शुरु होने के बाद भी दूसरे किसी भागीदार पत्रकार को न देख हमें संदेह हुआ. पूछने पर कि हमलोग इलाके में कब चलेंगे, सिराज केसर ने बताया कि पहली पारी की बैठक खत्म हो जाये तो हम सभी क्षेत्र में चलेंगे. एक घंटा फूलों के लेन-देन और स्वागत में लगाने के बाद गुरुनानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर से आये भौतिकी के प्रोफेसर डॉक्टर सुरिंदर सिंह ने यूरेनियम पर 20 साल पहले का एक अध्ययन पेश किया. डेढ़ घंटे के भाषण में वे एक दफा भी नहीं बता पाये कि यूरेनियम की वजह से कोई रोग हो रहा है.

इस पर सवाल उठा तो दिल्ली और भटिंडा के आयोजक हमें यह समझानें में लग गये कि यह जबाव भौतिकी के प्रोफेसर का बनता ही नहीं है. तो जवाब कौन देगा, इस पर आयोजकों ने चुप्पी साध ली. हमारा सवाल था कि तथ्यों की सही जानकारी के बगैर गुमराही का यह काम ‘खेती विरासत’ के इशारे पर ‘आरघ्यम’ और ‘पोर्टल’ ने संयुक्त रूप से कैसे कर लिया?
हमने प्रोफेसर सुरिंदर सिंह से पूछना उचित समझा कि बीस साल पहले किये गये अध्ययन को आज पेश कर आप क्या बताना चाहते हैं.जिन प्रोफेसर सुरिंदर सिंह ने यूरेनियम में पानी पर डेढ़ का लंबा भाषण दिया था, उन बेचारे ने डेढ़ मिनट में जो कुछ बताया वह इस प्रकार से है- मालवा क्षेत्र के कुछ इलाकों में पानी में यूरेनियम ज्यादा है जिसका 90 प्रतिशत स्रोत प्राकृतिक है. रही बात बीस साल पहले के अध्ययन को पेश करने की तो यहां इन्होंने बुलाया था, इसलिए हमने पेश किया. इसकी वजह से कोई बीमारी होती है या किन रोगों की संभावना होती है,ऐसा कोई अध्ययन मैंने क्या, किसी ने नहीं किया है.

दिल्ली से गये दानदाताओं ने बताया कि इस फर्जी जानकारी के सूत्रधार तो स्थानीय संयोजक एनजीओ ‘खेती विरासत’ के सुरिंदर सिंह और उनके सहयोगी शिक्षक चंद्रप्रकाश हैं. हिंदी वाटर पोर्टल के सिराज के मुताबिक,"खेती विरासत ने ही पानी में अधिक यूरेनियम होने की वजह से क्षेत्र में सेरीब्रल पैल्सी रोग हो रहा है, की जानकारी मुहैया करायी थी." लेकिन हमारा सवाल था कि तथ्यों की सही जानकारी के बगैर गुमराही का यह काम ‘खेती विरासत’ के इशारे पर ‘आरघ्यम’ और ‘पोर्टल’ ने संयुक्त रूप से कैसे कर लिया?
प्रो. राजकुमार : सब कहा, बस इतना नहीं बता पाए कि आर्सेनिक से दक्षिण- पश्चिम पंजाब में केंसर  है.

इसमसले पर बहस में जाने केबजाय अब हम फिर क्षेत्र में जाने के कार्यक्रम पर आगये. लेकिन ‘खेतीविरासत’ के संयोजक सुरिंर सिंह पीड़ितोंसे मिलाने ले जाने को अनसुना करते रहे.काफी जद्दोजहद के बाद वह दूसरे दिन सुबह आठ बजे हमें पीड़ितों से मिलाने को तैयार हुए.

दूसरे दिन वे पहुंचे तो सही, मगर नये बहानों के साथ. बहाना था कि साथ जाने वाला कोई नहीं है और आपलोग पंजाबी जानते नहीं हैं, इसलिए वहां बात कैसे कर पायेंगे. यह सब होते-हवाते दिन के ग्यारह बज गये, जबकि हमें वहां लौटकर तीन बजे दिल्ली के लिए रवाना भी होना था. मौके की नजाकत और आयोजकों का टालू रवैया देख पत्रकार मणिमाला ने क्षेत्र में जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया और कहा कि मुझे यहां किताबों का वितरण करना है, सो मैं नहीं जा पाउंगी.

अब मैं जाने वालों में अकेला बचा था. इनकी ठगी पर जितना कोफ्त हो रहा था, उससे कहीं ज्यादा अपनी समझदारी पर कि गर मैंने दिल्ली में मित्रों से राय ले ली होती तो एनजीओ के भरोसे रिपोर्टिंग के मुगालते से बच गये रहते. इस अफसोस के साथ थोड़ी खुशी भी थी. खुशी इसलिए कि पहली दफा की ही मुफ्तखोरी ने अहसास करा दिया था कि देशी-विदेशी दानदाताओं की पेटियों से झरझराते सिक्के हमारे जैसे पत्रकारों के लिए नहीं हैं. तभी ‘खेती विरासत’ के सुरिंदर सिंह ने कहा कि भटिंडा जिले की तलवंडी साबो तहसील में कई ऐसे गांव हैं, जहां पानी में आर्सेनिक की अधिकता की वजह से केंसर और अन्य घातक रोग हो रहे हैं.

यानी अब मामला यूरेनियम से खिसकर आर्सेनिक पर आ गया था. बात को जायज ठहराने के लिए खेती विरासत से जुड़े चंद्र प्रकाश ने कुछ नामचीन अखबारों, रेडियो और टीवी चैनलों का हवाला भी दिया कि वह इस मसले पर कई बड़ी खबरें कर चुके हैं.अपनी तीन दिन की छुट्टी और उर्जा को किसी तरह बचा लेने की अंतिम कोशिश करते हुए मैंने उनके आर्सेनिक वाले प्रस्ताव को स्वीकार लिया. मैंने आयोजकों से कहा कि कुछ गांवो के नाम और दो-चार संपर्क बता दें, जिससे सुविधा हो.

बड़ी मुश्किल से सुरिंदर ने मलकाना गांव के एक सज्जन का नंबर दिया, जिनका भूरा सिंह नाम था. इस गांव के बारे में स्थानीय आयोजकों ने मुझे बताया गया कि यहां न सिर्फ सेरीब्रल पैल्सी बल्कि केंसर, नपुंसकता, दस पंद्रह की उम्र के बाद एकाएक न्यूरो तंत्र का शरीर से नियंत्रण खत्म हो जाने वाला रोग और गर्भपात के रोगियों की एक बड़ी संख्या है.भटिंडा से लगभग पैंतीस किलोमीटर दूर जब इस गांव में पहुंचे तो भूरा सिंह गुरूद्वारे के पास हमारा इंतजार कर रहे थे.
उनके साथ चार-पांच और लोग खड़े थे.भूरा सिंह ने बताया कि यह सभी लोग किसी की तेरही में खाने आये हैं. बातचीत में पता चला कि गांव में सात हजार आबादी और बत्तीस सौ वोट हैं. पीने के पानी की समस्या पर लोगों ने बताया कि अब गांव में सरकार की मदद से पंचायत ने आरओ (पानी शुद्ध करने का यंत्र) लगा दिया है.

पानी में आर्सेनिक की अधिकता की वजह से केंसर के बारे में गांव वालों ने इनकार किया. इनकार तो उस कार्यक्रम में आये गुरूनानक देव विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजकुमार ने भी किया था. श्रोताओं ने जब यह पूछा कि क्या कोई ऐसा अध्ययन है जो बताता है कि पानी में आर्सेनिक की बढ़ी मात्रा की वजह से केंसर हो रहा है तो प्रोफेसर राजकुमार ने हाथ खड़े कर लिये. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पानी में आर्सेनिक के मुख्यतः स्रोत प्राकृतिक हैं.’ तब वहां सवाल भी उठा था कि फिर इस आयोजन का मकसद क्या है और प्रोफेसर साहब चुप हो गये थे.दरअसल प्रोफेसर लगातार यह समझा रहे थे कि जहां पानी में आर्सेनिक अधिक है, वहां केंसर रोगी ज्यादा हैं. मगर जो नक्शा दिखाकर जानकारियां दे रहे थे, वह उनके रिसर्च का हिस्सा नहीं बल्कि पंजाब के एक अंग्रेजी दैनिक का उतरन था.

बहरहाल हम यह सब झेलकर उस जगह पर आ गये थे,जिस गांव के एक डॉक्टर ने बताया कि "चंडीगढ़ पीजीआई की टीम आई थी जिसने कहा कि पानी में आर्सेनिक नहीं बल्कि क्लोरोमिअम ज्यादा है, जिसका कारण भारी मात्रा में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक हैं." बताते चलें कि मालवा क्षेत्र का भटिंडा जिला पंजाब में इस्तेमाल किये जाने वाले कुल कीटनाशकों का एक बड़ा उपभोक्ता है.

फिर पानी में आर्सेनिक की वजह से मलकाना गांव में लोग केंसर पीड़ित हैं,को लेकर हंगामा क्यों है.गांव के नौजवान और क्लब सदस्य रणधीर सिंह ने बताया कि ‘क्षेत्र के किसी गांव में चले जाइये, आमतौर पर 40 से 50 प्रतिशत लोग नशाखोरी की जद से त्रस्त मिल जायेंगे. वहीं कीटनाशकों के इस्तेमाल से पानी की गड़बड़ी की शिकायत आम है.वैसे में एनजीओ वाले आर्सेनिक पर जोर ज्यादा इसलिए देते हैं कि इसमें खतरे कम हैं.अगर नशाखोरी के खिलाफ लड़ना है तो पहली लड़ाई माफियाओं से है. पेस्टीसाइड के खिलाफ लड़ेंगे तो सरकार, कंपनी और माफिया तीनों से भिड़ना है. इन सबसे से उपर यह है कि इन लड़ाईयों और जागरूकता के संसाधन जनता से जुटाने हैं, जबकि एनजीओ उन्हीं पूंजीपति घरानों के दान से चलते हैं जो पहले हमारे पानी को जहरीला करते हैं, फिर हमें आरओ सिस्टम बेच जाते हैं.’

मलकाना गाँव : केंसर रोगी हैं पर आर्सेनिक के नहीं
ग्रामीण गुरूतेज सिंह एक दूसरा मामला भी उजागर करते हैं- ‘मलकाना समेत कई गांवों के बारे में मीडिया और एनजीओ ने मिलकर केंसर का एक ऐसा हौवा खड़ा किया कि अब हमारे गांवों में कोई शादी नहीं करना चाहता.’

ग्राम सदस्य ज्ञानी जगदेव सिंह गांव के उन युवाओं में से एक हैं जिनकी शादी इसी हौवे की वजह से नहीं हो रही है. जगदेव सिंह ने धार्मिक पढ़ाई की है और वे धर्म का वास्ता देते हुए कहते हैं कि "नशाखोरी का चलन इतना ज्यादा है कि आमतौर पर चालीस की उम्र पार करते कोई न कोई रोग नशेड़ियों को हो ही जाता है.ईलाज की कोई व्यवस्था न होने के कारण रोग जब अपने चरम पर होता है और रोगी अंतिम समय में. कुछ अस्पताल आते-जाते मरते हैं तो कुछ पहुंचने से पहले ही. वैसे में जो मरा वही केंसर रोगी हो गया.अभी तो बकायदा भटिंडा से बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन का नाम ही मीडिया ने ‘केंसर ट्रेन’ रख दिया है."

अब हम गांव से लौट रहे थे, जहां किसी एक ने भी नहीं कहा था कि आर्सेनिक की वजह से कैंसर हो रहा है.लेकिन इंडिया वाटर पोर्टल और आरघ्यम को 'खेती विरासत'की आंखों से पानी में आर्सेनिक और यूरेनियम की वजह से केंसर और सेरीब्रल पैल्सी रोग होता क्यों दिख रहा था,यह समझना मुश्किल था. इस सवाल पर दिल्ली रवाना होने से पहले आयोजकों के ही एक सहयोगी ने बताया कि पैसे आने के माध्यम से एनजीओ में समस्याएं और सामाजिक संकट तय होते हैं.
 http://www.raviwar.com/ से साभार


Dec 17, 2009

‘नरसिंह राव की भूमिका संदिग्ध थी’

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पीवी नरसिंह राव सरकार से इस्तीफा देने वाले इकलौते कैबिनेट मंत्री माखनलाल फोतेदार से अजय प्रकाश की बातचीत


बाबरी मस्जिद विध्वंस कांड की जांच कर रहे लिब्रहान आयोग ने कभी आपको गवाह के तौर पर बुलाया ?

सत्रह वर्षों की जांच प्रक्रिया के दौरान आयोग ने अगर एक दफा भी मुझे बुलाया होता तो रिपोर्ट में यह जानकारी सार्वजनिक हुई होती। उन्होंने क्यों नहीं बुलाया यह बताने में मेरी दिलचस्पी नहीं है। मैं इतना भर कह सकता हूं कि अगर कोई बात इस संदर्भ में आयोग ने हमसे की होती तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव का जो सुघड़ चेहरा रिपोर्ट पेश होने के बाद देश के सामने उजागर हुआ है, वह सबसे अधिक दागदार होता।

आप मानते हैं कि संघ और भाजपा विध्वंस के लिए जितने जिम्मेदार हैं उससे कत्तई कम दोषी नरसिंह राव नहीं हैं?

मैं तुलनात्क रूप से विध्वंस की जिम्मेदारी नरसिंह राव पर तो नहीं डालता, लेकिन मानता हूं कि राव चाहते तो वो उस धार्मिक उन्माद को टाल सकते थे जिसकी वजह से मस्जिद टूटी और देश एक बार फिर आजादी के बाद दूसरी बार इतने बड़े स्तर पर सांप्रदायिक धड़ों में बंट गया।

नरसिंह राव कैसे टाल सकते थे?

राव से हमने जून में ही कहा था कि जो लोग इस बलवे का माहौल बना रहे हैं, उनसे आप शीघ्र  बात कीजिए। मेरा जाती तजुर्बा है कि ये मसले कोई भी अदालत तय नहीं कर सकती। यह बात चूंकि मैंने कैबिनेट में कही थी इसलिए उन्होंने मान ली। लेकिन दूसरे ही दिन मेरी अनुपस्थिति में कई दौर की बैठकें चलीं और तय हो गया कि छह दिसंबर तक कुछ भी नहीं करेंगे, जब तक अदालत का फैसला नहीं आ जाता।

क्या नरसिंह राव को स्थिति बेकाबू होने का अंदाजा नहीं था?

अंदाजा क्यों नहीं था। मैं नवंबर में उत्तर प्रदेश  के दौरे पर गया था। साथ में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी भी थे। पूर्वी और पष्चिमी उत्तर प्रदेके पांच जिलों में जलसे किये। गोरखपुर से लेकर गाजियाबाद तक मुस्लिमों के बीच जो भय का माहौल दिखा वह हैरत में डालने वाला था। हमारे साथी और कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी ने एक चर्चा के दौरान मुझे बताया कि कल्याण सिंह का मेरे घर के बगल में एक घर है। वहां जोर-शोर से रंगाई-पुताई का काम चल रहा है और सभी कह रहे हैं कि जैसे ही 6 दिसंबर को मस्जिद टूटेगी, वे इस्तीफा यहीं बैठकर देंगे। नारायण दत्त ने जोर देकर कहा कि मैं कई बार राव साहब से कह चुका, जरा आप भी उनका ध्यान इन तैयारियों की तरफ दिलाइए। सुनने में ये बातें गप्प लग सकती हैं, लेकिन इस तरह की हर जानकारियों समेत वहां हो रहे हर महत्वपूर्ण घटनाक्रमों की जानकारी राव तक हर समय पहुंचायी।

यानी तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के इस्तीफे की तैयारी पहले से थी?

बिल्कुल। हमने यही बात तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव से भी कही कि कल्याण सिंह इस्तीफा लेकर बैठे हुए हैं , वह सिर्फ मस्जिद ढहने के इंतजार में हैं। अगर अपने चाल में वे कामयाब होने के बाद इस्तीफा सौंपते  तो सिवाय अफसोस और दंश  झेलने के हमारे मुल्क के पास क्या बचेगा।

कांग्रेस सरकार को इस तैयारी की जानकारी कितने महीने पहले से थी?

बाकी की तो छोड़िए, 6 दिसंबर को ग्यारह बजे दिन में मेरे पास एक वकील दोस्त का फोन आया कि पहली गुंबद कारसेवकों ने ढहा दी है। उसके ठीक बाद प्रेस ट्रस्ट के विशेष संवाददाता हरिहर स्वरूप का फोन आया कि कारसेवक मस्जिद में घुसने लगे हैं। फिर मैंने तत्काल नरसिंह राव से बात की और कहा कि जो हमने पहले कहा, वह तो हो नहीं पाया लेकिन अब भी समय है कि सरकार को तुरंत बर्खास्त कर हथियारबंद फौंजें तैनात कर दीजिए। अभी सिर्फ एक ही गुंबद टूटा है। हम मस्जिद को बचा ले गये तो भविष्य हमें इस रूप में याद रखेगा कि एक लोकतांत्रिक सरकार ने हर कौम को बचाने की कोशिश की।

शायद आप उस दिन इस सिलसिले में राष्ट्रपति  से भी मिले थे?

जब साफ़ हो गया कि  प्रधानमंत्री कान नहीं दे रहे हैं तो तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा से मैं साढे़ पांच बजे शाम को मिलने गया। मैं उनसे कुछ कहता, उससे पहले ही वे बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगे। बातचीत में उन्होंने बताया कि अभी राज्यपाल आये थे लेकिन वे बता रहे थे कि नरसिंह राव ने उन्हें निर्देश दिया है कि वह तब तक बर्खास्तगी रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को न भेजें जब तक वे नहीं कहते। इसी बीच राष्ट्रपति  के पास संदेश आया कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया।

बहरहाल शाम छह बजे कैबिनेट की आकस्मिक बैठक में मुझे पता चला कि मस्जिद गिरा दिये जाने के अपराध में कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त किया जा रहा है। तब मैंने कहा कि उसने अपना काम पूरा करके सरकार के मुंह पर इस्तीफा फेंक दिया है।


नरसिंह राव कैबिनेट में और कौन मंत्री थे, जिन्होंने आपका बाबरी मस्जिद मसले पर आपका साथ दिया था?

नाम मैं किसी का नहीं ले सकता। मगर इतना तो था ही जब कभी भी मैंने यह मसला कैबिनेट के बीच या मंत्रियों से आपसी बातचीत में लाया तो किसी ने कभी विरोध नहीं किया।

नरसिंह राव की भूमिका का जो सच इतना बेपर्द रहा है, वह जांच करने वाले कमीशन लिब्रहान को क्यों नहीं सूझा?

मैं सिर्फ इतना कहता हूं कि यह आयोग नरसिंह राव की संदिग्ध भूमिका को झुठला नहीं सकता।

कहा जा रहा है कि कभी कांग्रेस नेतृत्व के साथ बैठने वाले फोतेदार हाशिये पर हैं। इसलिए नरसिंह राव पर आपकी बयानबाजी राजनीतिक लाभ की जुगत भर है?

अगर इस जुगत से समाज के सामने एक सच खुलता है तो हमें कहने वालों की कोई परवाह नहीं है।

Dec 15, 2009

जंजीर खुलवा दो गुरु, जरा चौराहे से हम भी हो आयें


अजय प्रकाश

जंजीर से बंधा आदमी बुन्देलखंड के मटौंध गाँव का है. गाँव के किसी आदमी को इसके बंधे रहने से कोई ऐतराज नहीं है. लोग कहते हैं जिंदगी व्यहार से चलती है, आदर्श से नहीं. इसलिए बंधे आदमी को खुला क्यों नहीं कर देते, जैसे सवालों को लोग अव्यावहारिकता कहतें हैं और इस पर बहस करने को फ़िज़ूल का आदर्शवाद.

जंजीर में बंधे आदमी के पास घुरिया रहे बच्चे बतातें हैं जबतक यह पागल बंधा रहता है, इसकी पत्नी चैन से काम कर पाती है, गाँव में भी हो हल्ला नहीं होता. जंजीर में बंधे आदमी के घर में पत्नी के सिवा कोई और नहीं है. संयोग से  उस वक्त घर पर वह अकेले था. उसने बताया कि उसकी बीवी खाने का जुगाड़ करने गयी है. फिर उसने नज़दीक बुलाकर कहा, 'जंजीर खुलवा दो गुरु, जरा चौराहे से हम भी हो आयें.'
आसपास खड़े बच्चों से ही पता चला कि मटौंध के दुसरे छोर पर एक और पागल है जो इसी तरह जंजीरों में बंधा रहता है. बच्चों की बात पर गाँव के बड़े भी हामी भरते हैं. लेकिन वे लोग इन पागलों को जंजीरों में बांधे जाने को बेहद जरूरी मानते हैं. परिवार वाले गाँव वालों की तू-तू ,मैं-मैं से बचने के लिए दिमागी रूप से असंतुलित अपने लोगों को जंजीरों में बांधे रखना ही अंतिम माकूल दवा मानते हैं.


इलाज़ के लिए क्या प्रयास हुआ के जवाब में पड़ोसियों में एक ने बताया कि , 'गरीब आदमी है, भरपेट खाना मिल जाये वही बड़ी बात है. ' जबकि दुसरे का कहना था, ' गया था एक बार पागल खाने. मगर वहां से भी भागने लगा तो दरबानों ने इतना मारा कि कई महीनों तक चम्मच से पानी पिया. इसलिए अब इसकी पत्नी बांधने को ही इलाज मान चुकी है. '

मटौंध, गाँव से ऊपर उठकर कई साल पहले नगर पंचायत की श्रेणी में आ चुका है. मटौंध बुन्देलखंड के अन्य गावों की तरह दरिद्र नहीं लगता. हर तरफ सड़कों का जाल फैला हुआ है. यहाँ पुलिस, प्रशासन और नेताओं का आना जाना आम है.

गाँव वाले कहतें हैं, ' इस पागल को किसी के सिफारिश की जरूरत नहीं है. खुद ही फर्राटेदार हिंदी- अंग्रेजी बोलता है, भैया बीएसी पास है. गाँव में जो भी आता है उससे गुटखा के लिए एक रुपया मांगता है और जंजीर खोलने के लिए कहता है. लोग रूपया पकड़ा कर, जंजीर खुलवा देंगे का वादा कर चले जातें हैं. यह आज से तो है नहीं. आप भी एकाध रूपया दे कर निकलिए कि.........................'!

Nov 12, 2009

सरकार आदिवासियों से माफी मांगे

हिमांशु कुमार

छत्तीसगढ़ में मजदूर आंदोलन के प्रमुख नेता रहे शंकर गुहा नियोगी कहा करते थे छत्तीसगढ़ के बाद कोमा लगाकर बस्तर के बारे में सोचा करो। मैं भी मानता हूं कि छत्तीसगढ़ और बस्तर दोनों अलग-अलग हैं। यह अंतर मैं व्यक्तिगत तौर पर इसलिए भी मानता हूं कि बस्तर के लोगों ने मुझपर उस समय भरोसा किया है जब सलवा जुडूम की वजह से भाई-भाई दुश्मन बने हुए हैं। एक भाई सलवा जुडूम के कैंप में है तो दूसरा गांव में रह रहा है। सलवा जुडूम वाला यह सोचने के लिए अभिषप्त है कि गांव में रह रहा भाई माओवादियों के साथ मिलकर उसकी हत्या करा देगा तो,गांव वाला इस भय से त्रस्त है कि पता नहीं कब उसका भाई सुरक्षा बलों के साथ आकर गांव में तांडव कर जाये।

मैं बस्तर में 17 साल से रह रहा हूं और इस भूमि पर मेरा अनुभव आत्मीय रहा है। उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर से सर्वोदयी आंदोलन की सोच को लेकर मैं बस्तर उस समय आया जब मेरी शादी के महीने दिन भी ठीक से पूरे नहीं हुए थे। तबसे मैं बस्तर के उसी पवलनार गांव में रह रहा था जिसे छत्तीसगढ़ सरकार ने हाल के महीनों में उजाड़ दिया है। मुझे अच्छी तरह याद है कि जंगलों के बीच मेरी अकेली झोपड़ी थी। कई बार ऐसा होता था कि मैं पांच-छह दिनों के लिए गावों में निकल जाया करता था और पत्नी अकेली उस बियाबान में होती थी। लेकिन हमने जंगलों के बीच जितना खुद को सुरक्षित और आत्मीयता में पाया उतना हमारे समाज ने कभी अनुभव नहीं होने दिया। आज आदिवासियों के बीच इतने साल गुजारने के बाद मैं सहज ही कह सकता हूं कि शहरी और सभ्य कहे जाने वाले नागरिक इनकी बराबरी नहीं कर सकते।
याद है कि हमने पत्नी के सजने-संवरने के डिब्बे को खाली कर थोड़ी दवा के साथ गांवों में जाने की शुरूआत की थी। डाक्टरों से साथ चलने के लिए कहने पर वह इनकार कर जाते थे। हां डॉक्टर हमसे इतना जरूर कहा करते थे कि आपलोग ही हमलोगों से कुछ ईलाज की विधियां सीख लिजिए। आज भी हालात इससे बेहतर नहीं है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद गांवों में सरकारी मशीनरी की सुविधाएं पहुंचाने के बजाए लूट की योजनाएं बनायीं। जो चौराहे के नेता थे वे राज्य के हो गये, छोटे व्यापारी खदानों के बड़े ठेकेदार-व्यापारी बन गये और लूट के अर्थशास्त्र को विकासवाद कहने लगे। छोटा सा उदाहरण भिलाई स्टील प्लांट का है जिसके लिए हमारे देश में कोयला नहीं बचा है, सरकार आस्ट्रेलिया से कोयला आयात कर रही है। जाहिर है लूट पहले से थी लेकिन राज्य के बनने के बाद कू्रर लूट की शुरूआत हुई जिसके पहले पैरोकार राज्य के ही लोग बने जो आज सलवा जुडूम जैसे नरसंहार अभियान को जनअभियान कहते हैं।

छत्तीसगढ़ में जो लूट चल रही है उसने क्रूर रूप ले लिया है। क्रुर इसलिए कि आदिवासी अगर जमीन नहीं दे रहे हैं तो बकायदा फौजें तैनात कर उन्हें खदेडा जा रहा है, कैंपों में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है। सरकार अपने ही बनाये कानूनों को ठेंगे पर रख ओएमयू कर रही है। बंदरबाट के इतिहास में जायें तो भारत सरकार जापान को 400 रूपये प्रति क्विंटल  के भाव से लोहा बेचती है तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के छोटे व्यापारियों को 6000 हजार रूपये प्रति क्विंटल। अब जब आदिवासी राज्य प्रायोजित लूट का सरेआम विरोध कर रहा है तो भारतीय सैनिक उसका घर, फसलें जला रहे हैं, हत्या बलात्कार कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में अशांति नहीं होगी तो क्या होगा।
सरकार बार-बार एक शगुफा छोड़ती है कि माओवादी विकास नहीं होने दे रहे हैं, वह विकास विरोधी हैं। मैंने राज्य सरकार से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी कि वह बताये कि पिछले वर्षों में स्वास्थ कर्मियों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और हैंडपंप लगाने वाले कितनों लोगों की माओवादियों ने हत्याएं की हैं, सरकार का जवाब आया एक भी नहीं। वनवासी चेतना आश्रम बीजापुर और दंतेवाड़ा के जिन गांवों में काम करता है उनमें से गांवों के लोगों ने बार-बार शिकायत किया कि फौजें और एसपीओ उनकी फसलें इसलिए जला रहे हैं कि लोग भूख से तड़प कर कैंपों में आयें। जबकि इसके उलट माओवादियों की ओर से संदेश आया कि 'हिमांशु कुमार 'वनवासी चेतना आश्रम' की ओर से जो अभियान चला रहे हैं हम उसका स्वागत करते हैं।' देश जानता है कि वनवासी चेतना आश्रम सरकार और माओवादी हिंसा दोनों का विरोध करता है क्योंकि इस प्रक्रिया में जनता का सर्वाधिक नुकसान होता है। लेकिन एक सवाल तो है कि सरकार अपने ही बनाये कानूनों को ताक पर रख कर देशी-विदेशी  कंपनियों के साथ मिलकर लूट का विकासवाद कायम करना चाहेगी तो जनता, अंतिम दम तक लड़ेगी।
हमें सरकार इसलिए दुश्मन मानती है कि हमने समाज के व्यापक दायरे में बताया कि सलवा जुडूम नरसंहार है और कैंप आदिवासियों को उजाड़ने वाले यातनागृह। फिलहाल कुल 23 कैंपों में दस से बारह हजार लोग रह रहे हैं। पंद्रह हजार लोगों को हमने कैंपों से निकालकर उनको गांवों में पहुंचा दिया है। इस दौरान राज्य के एक कलेक्टर द्वारा धान के बीज देने के सिवा, सरकार ने कोई और मदद नहीं की है।


अगर सरकार सलवा जुडूम के अनुभवों से कुछ नहीं सिखती है तो मध्य भारत का यह भूभाग कश्मीर और नागालैंड के बाद यह भारत के मानचित्र का तीसरा हिस्सा होगा जहां कई दशकों तक खून-खराबा जारी रहेगा। सरकारी अनुमान है कि सलवा जुडूम शुरू होने के बाद माओवादियों की ताकत और संख्या में 22 गुना की बढ़ोतरी हुई है। अब ऑपरेशन ग्रीन हंट की कार्यवाही उनकी ताकत और समर्थन को और बढ़ायेगी। सरकार के मुताबिक फौजें माओवादियों का सफाया करते हुए पुलिस चौकी स्थापित करते हुए आगे बढ़ेगीं। जाहिर है लाखों की संख्या में लोग वनों में भागेंगे। उनमें से कुछ की हत्या कर तो कुछ को बंदी बनाकर फौजें पुलिस चौकियों के कवच के तौर पर इस्तेमाल करेंगी। हत्या, आगजनी, बलात्कार की अनगिनत वारदातों के बाद थोड़े समय के लिए सरकार अपना पीठ भी थपथपा लेगी। लेकिन उसके बाद अपनी जगह-जमीन और स्वाभिमान से बेदखल हुए लोग फिर एकजुट होंगें, चाहे इस बार उन्हें संगठित करने वाले माओवादी भले न हों।
मैं सिर्फ सरकार को यह बताना चाहता हूं कि अगर वह अपने नरसंहार अभियान ऑपरेशन ग्रीन हंट को लागू करने से बाज नहीं आयी तो हत्याओं-प्रतिहत्याओं का जो सिलसिला शुरू होगा मुल्क की कई पीढ़ियां झेलने के लिए अभिषप्त होंगी। यह सब कुछ रूक सकता है अगर सरकार गलतियां मानने के लिए तैयार हो। सरकार माने और आदिवासियों से माफी मांगे कि उसने बलात्कार किया है, फसलें जलायीं है, हत्याएं की हैं। आदिवासियों की जिंदगी को तहस-नहस किया है। सरकार तत्काल ओएमयू रद्द करे, बाहरी हस्तक्षेप रोके और दोषियों को सजा दे। जबकि इसके उलट सरकार पचास-सौ गुनहगारों को बचाने के लिए लोकतंत्र दाव पर लगा रही है.

(लेखक दंतेवाडा में गाँधीवादी संस्था 'वनवासी चेतना आश्रम' से जुड़े हैं )