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Jun 15, 2017

अब आप के भरोसे राज्यसभा नहीं जा पाएंगे कुमार विश्वास

कुमार की ठसक को पार्टी और उसके नेता बर्दाश्त नहीं करते। कुमार की इस कमजोरी का भी पार्टी को पता है कि वो भाजपा को लेकर इतने कटु कभी नहीं रहते, जितने कांग्रेस को लेकर....

जनज्वार दिल्ली। आम आदमी पार्टी में एक बात कही जाती है कि यहां कोई भी बयान यूं ही नहीं दे देता, जब तक ऊपर से अनुमति या सहमति न हो। कल दिल्ली के पूर्व संयोजक रहे दिलीप पांडेय का कुमार विश्वास पर ट्वीट करके किया गया हमला स्पष्ट करता है कि अब कुमार पर पार्टी को कितना अविश्वास है।


पर दिलीप पांडेय के ट्वीट ने कुमार को बैकफुट पर ला दिया है। कल से कुमार भाजपा के खिलाफ ट्वीट ओर रिट्वीट कर रहे हैं। कुमार के ट्वीटर हैंडल को देखकर समझ आ जायेगा कि दिलीप का तीर निशाने पर लगा है। यह लड़ाई पंजाब के विधानसभा चुनाव के नतीज़ों के समय से चली आ रही है जो कभी स्पष्ट तो कभी अस्पष्ट रूप से बाहर आ जाती है। 

अब एक बात तो तय है कि कुमार आम आदमी पार्टी में अकेले पड़ते नज़र आ रहे हैं। इसका जिक्र वो खुद 2 दिन पहले एनडीटीवी 24/7 को दिए अपने इंटरव्यू में भी कर चुके हैं। इस इंटरव्यू में कुमार खुद को अभिमन्यु की उपाधि दे रहे थे, जो महाभारत में घेरकर मार दिया जाता है। इंटरव्यू लेने वाली पत्रकार भी खुद ये बोल रही थी कि आपके खिलाफ पार्टी के ऊपरी स्तर पर साजिश रची जा रही है। कुमार ने खुद कहा कि उन्हें भी इस बात का इल्म है। आखिर क्या वजह है कि पार्टी के बड़े नेता कुमार को किनारे लगाने में लगे हुए हैं।

दरअसल दिल्ली से राज्यसभा के लिए 3 सांसद जाने हैं। पार्टी के एमएलए के हिसाब से तीनों आप के सांसद राज्यसभा जाएंगे। इसमें से एक सीट के लिए खुले तौर पर कुमार अपनी दावेदारी जताते रहे हैं। और पार्टी तक ये बात पहुंचाते रहे हैं कि उनको राजयसभा के लिए दूसरी पार्टी से भी आॅफर है। कुमार की इसी ठसक को पार्टी और उसके नेता बर्दाश्त नहीं करते। कुमार की इस कमजोरी का भी पार्टी को पता है कि वो भाजपा को लेकर इतने कटु कभी नहीं रहते, जितने कांग्रेस को लेकर। 

पार्टी के नेताओं को भी पता है उन्हें राज्यसभा के लिए कहां से आॅफर है। इसी को ध्यान में रखते हुए कल सोच—समझ कर दिलीप पांडेय ने अपने ट्वीट में कुमार पर हमला करते हुए कहा कि क्या बात है भैया आप कांग्रेस को तो खूब गाली देते हो पर कहते हो वसुंधरा के खिलाफ नही बोलेंगे। ऐसा क्यों?

कुमार ने अपने इंटरव्यू में साफ—साफ बोल दिया था कि मुझे पता है पार्टी में कौन—कौन उनके खिलाफ षड्यंत्र रच रहे हैं कुछ तो वो हैं, जो इस घर में रहे हैं (इस घर से मतलब कुमार के घर में) और यहीं रोटी खाई है। कुमार को भी अब ये समझ आ रहा है कि इस लड़ाई में उनकी हार निश्चित है इसलिए वो खुद को अभिमन्यु घोषित कर रहे हैं। 

इस लड़ाई में किसी को कुछ हासिल हो या न हो पर राजनीति के चलते दो दोस्तों की दोस्ती में जरूर दरार आ गई है। कुमार और मनीष सिसोदिया दोनों गाज़ियाबाद ज़िले के पिलखुआ कस्बे रहने वाले बचपन के दोस्त थे। पर अब दोस्ती  में पहले जैसी बात नहीं रह गई है। इसका सबूत रविवार को राजस्थान की पार्टी की वहां के वालंटियर्स की मीटिंग की कुमार और मनीष की फ़ोटो देखकर पता चल जाता है। दोनों एक मंच पर बैठे हैं, पर ऐसा लगता है जैसे दोनों बस एक खानापूर्ति कर रहे हैं। कवि कुमार विश्वास का चेहरा देख साफ पता चल रहा है कि अब उन्हें अपने घनिष्ठ मित्र मनीष से भी कोई उम्मीद नहीं कि वे पार्टी में उनका सपोर्ट करेंगे। कुमार के चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा है।

इस लड़ाई में एक और अहम किरदार है संजय राघव। ये जनाब मनीष सिसोदिया जी के साले साहब हैं। मनीष भले ही खुद कुमार पर कोई कटाक्ष करने से बचते रहे हों, लेकिन उनका साला संजय राघव जो खुद कुमार के घर के पास रहता है वो कोई भी दिन नहीं छोड़ता जब अपने ट्वीट से कुमार पर आक्रमण न करता हो। इसे मनीष की मौन सहमति कहा जाए या कुछ और। लेकिन इतना तो तय है कि मनीष और कुमार की दोस्ती एक किनारे पर आ गई है, जो कभी भी टूट सकती है।

पार्टी नेताओं को ये आपसी लड़ाई आने वाले दिनों में सोशल मीडिया से निकलकर सड़क पर भी आयेगी। बस इंतज़ार कीजिये कुछ दिनों का।

Jun 10, 2017

दिल्ली में डिस्टेंस एजूकेशन के केवल 1 प्रतिशत विद्यार्थी हुए पास

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने पहले 62000 बच्चों को स्कूल सिस्टम से निकाला और फिर पत्राचार से दसवीं  की परीक्षा दिलाई, जिसके कारण 99 फीसदी बच्चे फेल हो गए ...

दिल्ली में इस बार पत्राचार से दसवीं की परीक्षा देने वाले 62000 विद्यार्थियों में से 60750 विद्यार्थी फेल हो गए हैं। आॅल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन ने इस परीक्षा परिणाम को केजरीवाल सरकार की गलत शिक्षा नीति का नतीजा बताया है। इसके खिलाफ रविवार, 11 जून, 2017 को जंतर मंतर पर विद्यार्थी अपने माता—पिता और रिश्तेदारों के साथ धरना प्रदर्शन करेंगे। 

आॅल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन का कहना है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने पहले 62000 बच्चों को स्कूल सिस्टम से निकाला और फिर पत्राचार से दसवीं  की परीक्षा दिलाई, जिसके कारण 60750 बच्चे असफल हुए। गलत शिक्षा नीति के चलते इतने सारे विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है। इन नीतियों के खिलाफ ही विद्यार्थियों ने धरना प्रदर्शन करने का फैसला किया है।
  
आल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन ने केजरीवाल सरकार से मांग की है कि सभी फेल विद्यार्थियों को री-टेस्ट का मौका दिया जाए। री-टेस्ट में पास होने वाले विद्यार्थियों को स्कूल में ग्यारहवीं में एडमिशन दिया जाए साथ ही री-टेस्ट में फेल होने वाले विद्यार्थियों को स्कूल में दसवीं कक्षा में एडमिशन दिया जाए।

आल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट अशोक अग्रवाल ने सभी असफल विद्यार्थियों और उनके माता—पिता से अपील की है वे ज्यादा से ज्यादा तादाद में आकर इस धरने को सफल बनाएं जिससे केजरीवाल सरकार की आंखें खुलें और वो अपनी गलत शिक्षा नीति की तरफ ध्यान दे।

देखें वीडियो :


May 8, 2017

सिर्फ 'एक काबिलियत' ने बनाया कपिल को केजरीवाल का प्रिय मंत्री

देश की जनता को ईमानदारी और नए लोकतंत्र का झुनझुना थमाकर अरविंद केजरीवाल बनने तो सिकंदर चले थे, पर औकात इतनी हो पाई कि वह अपने ही पाले हुए संपोलों को बस में रख सकें। उन्हीं संपोलों में से एक हैं कपिल मिश्रा, जिनको अरविंद ने अपना दूध पिलाकर किंग कोबरा बनाया था। किंग कोबरा अब फुंफकार रहा है और अरविंद हैं कि उनको जादू—मंतर का कोई सम्मोहनी मंत्र सूझ नहीं रहा! 

दिल्ली से भूपेंदर चौधरी की रिपोर्ट 


सम्मोहनी मंत्र के अभाव में पिछले तीन दिनों से अरविंद केजरीवाल सदमे में हैं। 

हालांकि उनको सदमे में होना नहीं चाहिए, क्योंकि केजरीवाल और आरोपों—प्रत्यारोपों का रिश्ता कोई नया नहीं है। बल्कि उनकी छवि है कि वह रोज सुबह उठते ही दो—चार आरोप किसी न किसी नेता—पार्टी, व्यवसायी, पुलिस पर लगा दिया करते हैं, फिर फ्रेश होने जाते हैं। उनके नजदीकी लोग कहते हैं, फ्रेश होने में आरोप उनके लिए वही काम करता है जैसे आम जनों के लिए सिगरेट, चाय, बीड़ी, खैनी या पानी। 

पर सच यही है कि अरविंद केजरीवाल सदमे में हैं। उन पर तानाशाह, झूठा, मक्कार, कुंडलीमार, राजनीतिक काइयांपन का रणनीतिकार और यूज एंड थ्रो वाली पॉलिटिकल स्टाइल का महारथी जैसे आरोप तो लगे थे, लेकिन अभी तक अरविंद केजरीवाल की 'एमएसपी' पर ऐसी चोट किसी ने नहीं की थी कि केजरीवाल कहीं मुंह दिखाने लायक न रह जाएं। 

वह पिछले तीन दिनों से सिर्फ जवाब खोज रहे हैं कि वह अपने ही सरकार में मंत्री रहे 'कपिल भाई' के आरोपों का मीडिया के सामने जवाब देंगे? कैसे बताएंगे कि मेरा सबसे प्रिय मंत्री कपिल  मुझ पर 2 करोड़ रुपए लेने का आरोप लगा रहा है, वह सच नहीं है। वह भी कपिल के आंखों देखी को कैसे झुठलाएंगे, वह भी दूसरे प्रिय मंत्री सत्येंद्र जैन के सामने की बात कह रहा है और सबसे बड़ी बात रिश्तेदार की जमीन डील के मामले में 2 करोड़ कमीशन लिए जाने का आरोप? 

जानकार बता रहे हैं कि केजरीवाल अभी भी कोशिश में हैं कि किसी तरह मामला शांत हो और मीडिया में हीरो बने कपिल मिश्रा को हाशिए पर डाला जा सके। इसीलिए दिल्ली सरकार के मंत्री मनीष सिसोदिया 25 सेकेंड में प्रेस कांफ्रेंस करके कट लेते हैं? कपिल मिश्रा से केजरीवाल नहीं उलझना चाहते क्योंकि वह उनके गहरे राज के साथी हैं? कई गुनाहों में केजरीवाल ने कपिल का इस्तेमाल किया है? बहुत कुछ अनौपचारिक और औपचारिक कपिल केजरीवाल बारे में जानते हैं जो एक पाला हुआ संपोला ही जान सकता है।  

ये वही कपिल मिश्रा हैं जो अरविंद केजरीवाल के इशारे पर आम आदमी पार्टी के सबसे बुजुर्ग संस्थापक शांति भूषण और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को भरी सभा में मारने के लिए दौड़ा लिए थे।  

समय का चक्र भी कितना बलवान होता है। कब किस तरफ घूम जाए किसी को नहीं पता चलता। शायद कभी कपिल मिश्रा ने भी ये नहीं सोचा होगा कि जो खाई उन्होंने प्रशांत भूषण और शांति भूषण जैसे वरिष्ठों के लिए खोदी थी एक दिन वो खुद उसमें गिरेंगे।

यह बात साल 2015 की है। आम आदमी पार्टी दिल्ली में 67 एमएलए के साथ प्रचंड बहुमत के दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई थी। स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव और वकील प्रशांत भूषण की अरविंद केजरीवाल को सलाह थी कि वे संयोजक पद छोड़कर बतौर मुख्यमंत्री दिल्ली पर फोकस करें। 

मगर अरविंद केजरीवाल को उनकी यह बात खटकने लगी थी। कुछ दिन बाद करनाल बाई पास के पास बने आप के एमएलए के रिसोर्ट में पार्टी की नेशनल कौंसिल की मीटिंग रखी गई। योगेंद्र यादव और प्रशांत को निकालने की साज़िश रची जा चुकी थी। जैसे ही मीटिंग शुरू हुई तो प्रशांत ओर शांति भूषण ने कुछ बोलने की कोशिश की। 

तभी केजरीवाल की तय स्क्रीप्ट के अनुसार कपिल मिश्रा भूषण बाप—बेटे को चुप रहने और बाहर निकल जाने को लेकर शोर मचाने लगे। शोर कई लोग मचा रहे थे पर कपिल सबसे आगे थे।  इस पर नेशनल कौंसिल के कुछ मेंबर ने प्रशांत से सहमति जताते हुए उनके समर्थन में बोलने की कोशिश की तो कपिल मिश्रा और एक अन्य एमएलए दोनों बाप और बेटे को मीटिंग हॉल से बाहर करने के लिए उनके पीछे मारने के लिए दौड़ पड़े। 

हालांकि लोगों ने उन्हें शांति बनाए रखने की अपील की, जिसमें मनीष सबसे प्रमुख थे। लेकिन एक बात साफ थी कि वो बस दिखावा था। पीछे से कपिल को केजरीवाल का पूरा समर्थन था। 88 साल के बुजुर्ग शांति भूषण बहुत ही लाचार दिख रहे थे। उनकी आंखों में जैसे लाचारी साफ देखी जा सकती थी। 

नेशनल कौंसिल के कुछ सदस्य इस घटना से इतने आहत थे कि उन्हें खुद अपनी बेबसी पर रोना आ रहा था। इतने बुजुर्ग आदमी को धक्के मार के बाहर निकला जा रहा था और उसकी अगुआई कपिल मिश्रा कर रहे थे। 

कपिल मिश्रा ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन उन्हें भी इस पार्टी से ऐसे ही धक्के मार के मंत्री पद से निकाल दिया जायेगा।

Apr 29, 2017

हार के बाद कार्यकर्ताओं में हीरो बनकर उभरे कुमार विश्वास

कुमार के इस तरह के इंटरव्यू देखकर वालंटियर्स का गुस्सा ठंडा हो जाता है। उन्हें लगने लगता है अभी भी उनकी पार्टी में शुचिता बची है। अभी पार्टी नहीं आंदोलन है आप। अभी आप को नहीं छोड़ना चाहिए.....

दिल्ली से भूपेंदर चौधरी की रिपोर्ट


आप मुखिया अरविंद केजरीवाल द्वारा पार्टी में हाशिए पर डाले गए कवि कुमार विश्वाश आम आदमी पार्टी के भीतर कूटनीतिक राजनीति में माहिर होते जा रहे हैं। पंजाब, गोवा और दिल्ली एमसीडी चुनाव के बाद कार्यकर्ताओं का उन पर भरोसा बढ़ता जा रहा है। 

दिल्ली एमसीडी चुनाव में मिली आम आदमी पार्टी को मिली अकल्पनीय हार के बाद सभी मीडिया घराने इस आस में बैठे थे कि पहले से ही पार्टी में हाशिए पर पड़े कुमार विश्वास अब तो पक्के तौर पर पार्टी छोड़ देंगे। पर हार के बाद कुमार विश्वास पार्टी के भीतर बिल्कुल नए अवतार में उभरे हैं।

कल शाम जब वह एक सनसनीखेज छवि वाले टीवी चैनल को साक्षात्कार दे रहे थे तो सभी पत्रकारों को यही आस थी कि आप में फूट ही आज की सबसे बड़ी खबर होगी। पर कीबोर्ड पर बैठे डेस्क पत्रकारिता के माहिरों को निराशा हाथ लगी। और इसके उलट कुमार विश्वास फिर एक बार पार्टी कार्यकर्ताओं में नया विश्वास कायम करने में कामयाब हुए। हालांकि अरविंद केजरीवाल पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं, मगर विश्वास कार्यकर्ताओं की पहली पसंद बन गए हैं।

गौरतलब है कि लगातार तीसरी हार पंजाब, गोवा और अब दिल्ली एमसीडी में मिली करारी शिकस्त के बाद कार्यकर्ता बेहद निराश, हताश और राजनीतिक संबल खो देने की स्थिति में पड़े हुए थे। ऐसे में कुमार कार्यकर्ताओं में एकता के प्रतीक बनकर उभरे हैं। कार्यकर्ता स्वीकार कर रहे हैं कि जब भी पार्टी पर संकट आता है, जब भी पार्टी हारती है तो कुमार पार्टी से अलग लाइन लेकर कार्यकर्ताओं के साथ खड़े दिखाई देते हैं। 

दरअसल कुमार की सारी कवायद पार्टी के वालंटियर्स को जोड़े रखने की है। पार्टी से जुड़े वालंटियर्स अक्सर अपने बड़े नेताओं के फैसले से नाराज़ लगते हैं और मानते हैं कि अरविंद केजरीवाल उनको शह देने का काम करते हैं। ऐसे में कुमार पार्टी के पालनहार—खेवनहार बनकर प्रकट हो जाते हैं। 

कुमार का एमसीडी से पहले आया वीडियो हो या कल उनका टीवी पर चल रहे इंटरव्यू को देखकर विपक्षी दल ये सोचकर खुश हुए जा रहे थे कि पार्टी में फूट पड़ रही है, पर उन्हें ये समझ नहीं आ रहा कि कुमार की इस पार्टी विरोधी दिखती लाइन से पार्टी का वालंटियर्स अपने को कुमार से कनेक्ट देखता है। कुमार की बात को अपनी बात समझता है, क्योंकि कुमार पार्टी के वालंटियर्स की नब्ज पकड़ते हैं। 

कुमार की खरी—खरी बातें सुनकर पार्टी के वालंटियर्स राहत महसूस करते हैं कि कोई तो है जो उनकी बोली बोलता है। जो वो बोलना चाहते हैं वो कुमार विश्वास बोल रहे हैं। कुमार को पार्टी के अधिकतर वालंटियर्स भैया ही कहकर संबोधित करते हैं। 

कुमार के इस तरह के इंटरव्यू देखकर वालंटियर्स का गुस्सा ठंडा हो जाता है। उन्हें लगने लगता है अभी भी उनकी पार्टी में शुचिता बची है। अभी पार्टी नही आंदोलन है आप। अभी आप को नहीं छोड़ना चाहिए। 

इस तरह पार्टी के खिलाफ बोलकर कुमार पार्टी को कमजोर नहीं करते, बल्कि उसकी नींव को मजबूत ही करते हैं क्योंकि पार्टी की नींव उसके वालंटियर्स ही हैं। इस बात को पार्टी के सूत्र भी बताते हैं कि एक तरफ कुमार वीडियो निकाल कर पार्टी और पार्टी के बड़े नेता अरविंद पर हमला करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुमार अरविंद के घर में बैठ कर चाय पीते हैं। 

जो चैनल चला रहे हैं कि कुमार आप मुखिया केजरीवाल का संयोजक पद ​छीनने का सपना देख रहे हैं, वो शायद ये भूल गए कि कुमार अपनी कविता का बिज़नेस छोड़कर  इस तरह पार्टी मे नहीं आ रहे। 

कुमार खुलेआम बोलते भी आये हैं कि वो बिज़नेस क्लास से चलते हैं। ऐशो आराम से रहते है  और ऐशो आराम नहीं छोड़ना चाहते। ऐसे में उनके पार्टी संयोजक बनने की खबर निराधार है।

Mar 31, 2017

आप में कुमार विश्वास की हालत क्या हो गयी भगवान!

कभी अरविंद की आत्मा हुआ करते थे विश्वास, लेकिन अब वह आहत मन से बस एक ही धुन गुनगुना रहे हैं....कौन सुनेगा किसको सुनाएं इसलिए चुप रहते हैं...

जनज्वार। लंबे समय से आम आदमी पार्टी में हाशिए पर पड़े कुमार विश्वास का ट्वीट ही इन दिनों उनका भरोसेमंद साथी साबित हो रहा है। पार्टी में उनकी कोई पूछ नहीं दिख रही। पंजाब चुनाव इसका सबसे माकूल उदाहरण है जहां उनको पार्टी द्वारा पूछा ही नहीं गया। और दिल्ली के एमसीडी चुनाव में उनकी राजनीतिक हैसियत इस कदर प्रभावहीन हो गयी है कि टिकट चाहने वाले भी उनके दरवाजे की ओर रुख नहीं कर रहे। 

ऐसे में विश्वास कभी खुद की, कभी उधार की तो कभी किसी और की गजलें—नज्में ट्वीट कर अपना दुख जगसाया कर रहे हैं। पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तवज्जो पाने की हर कोशिश को कुछ यों इनकार कर रहे हैं मानो उनका विश्वास को लेकर स्थायी भाव बन गया हो कि तुम रहो या जाओ हमें क्या, तुम सुनो और सुनाओ हमें क्या?  

27 मार्च को कुमार विश्वास ने एक ट्वीट किया, 

'वो जिनके पास हुकुमत भी है, हुजूम भी है,
वो इस फकीर से क्यों पूछें रास्ता क्या है।' 



कुमार विश्वास के इस ट्वीट पर हमेशा की तरह पाठकों की प्रतिकियाएं आईं। कुछ ने समझा, कुछ समझकर आप के राजनीतिक गलियारों में संदेश लेकर पहुंचे और कुछ ने सीधे विश्वास से मोर्चा लिया।

दिलचस्प यह था कि इस बार मोर्चा किसी और ने नहीं अरविंद केजरीवाल के बहुत नजदीकी और पीएस वैभव ने लिया। बिना किसी लाग—लपेट और छिपाव के वैभव ने सीधे अपने ​ट्वीट में लिखा, 

पिछले चार चुनावों ने सिखाया: 
जब—जब जीते वो पहले फ्रेम में दिखे 'क्रेडिट लेते' 
हारते ही फकीर बन गए, शायद बड़े कलाकार ऐसे ही होते हैं।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बहुत खास माने जाने वाले वैभव के इस ट्वीट के बाद पार्टी के बहुत से कार्यकर्ता कुमार विश्वास के खिलाफ पिल पड़े। 'आम आदमी सेना' के सोशल मीडिया पेज पर विश्वास के खिलाफ तेजी से लिखा जाने लगा। 

देखते ही देखते गालियों, फब्तियों और कुमार विश्वास की आत्मा 'भाजपाई' होने के दावे आम आदमी सेना के पेज पर होने लगे। लोग कहने लगे इतने रोते क्यों हो, जहां आंसू पोछे जाएँ वहां चले जाओ।

वहीं कुमार विश्वास के भी ट्ववीट पर पाठकों ने खूब कहा—सुना। कुछ ने दुख में दुख जताया तो कुछ ने चुटकियां लीं। कई पाठकों ने कुछ इस भाव में कहा कि अरविंद केजरीवाल नहीं पूछ रहे तो यहां कविता लिखने से कुछ न होगा। कुछ ने सुझाव दिया गलत रास्ता चुनोगे तो यही होगा। 

खैर, बात बढ़े और मीडिया की खबर बने उससे पहले ही समझदारी दिखाते हुए अरविंद केजरीवाल के खास और उनके पीएस की भूमिका निभाने वाले विभव ने अपना ट्वीट हटा दिया। अब उनका ट्वीटर अकाउंट 'ट्वीट्स आर प्रोटेक्टेड' श्रेणी में डाल दिया गया है। जो कुछ इस तरह दिख रहा है,




पर कुमार विश्वास को अरविंद केजरीवाल और पार्टी का यह रवैया लगातार दुखित किए हुए है। राज्यसभा की कुल तीन सीटें दिल्ली से आम आदमी पार्टी के हिस्से हैं। एक समय में विश्वास को एक सीट का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, पर ऐसा अब हो पाएगा इस पर खुद विश्वास भी विश्वास नहीं करते।

ऐसे में देखना यह है कि विश्वास का ट्ववीटर आंदोलन कितना साथ दे पाता है, खासकर तब जबकि कार्यकर्ताओं और स​​मर्थकों में उनकी छवि कभी खुद के कारण तो कभी साजिशों के कारण लगातार क्षरित हुई है। 

बहरहाल, विश्वास का एक नया ट्वीट -

Mar 27, 2017

कमाई ​कला के दलालों के हिस्से और बेगारी आर्टिस्टों के

विश्व थियेटर दिवस पर विशेष 

कुछेक अपवादों को छोड़ दिया जाये तो सार्थक और मूल्यवान रंगमंच कभी भी अनुदान पर निर्भर होकर नहीं हुआ है। इन अपवादों की भी छानबीन करें तो हमें पता चलता है कि जिन रंगकर्मियों ने अनुदान लेकर बेहतर नाटक किये वे अनुदान के बिना भी बेहतर थियेटर करने की क़ाबिलियत रखते रहे हैं...

राजेश चंद्र

हबीब तनवीर अनुदान लेते थे, पर उनका थियेटर अनुदान की वजह से नहीं था। पोंगा पंडित जैसे नाटक अनुदान के बग़ैर भी उसी प्रभावशीलता के साथ हो सकते हैं, जिस तरह अनुदान लेकर। पर ज़्यादातर अनुदानकर्मी रंगकर्मी करते क्या हैं? 5-5 लाख लेकर दो कौड़ी के नाटक नहीं करते। 


कुछ ठेके पर नाटक का मंचन करवा लेते हैं। कुछ पुराने नाटक को दुहरा कर काम चला लेते हैं। कुछ नाटक ही नहीं करते, पूरा हजम कर जाते हैं। कुछ बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं। यानी कुछ नाटक में भी लगा दो और कुछ अपने लिये भी रख लो। यह अनुपात रंगकर्मी में बचे ज़मीर का समानुपाती हुआ करता है, जो वैसे भी सैकड़ों में से किसी एक में मिलता है।

यह हाल तो प्रस्तुति अनुदान का है, पर अगर सैलरी ग्रांट या वेतन अनुदान की बात करें, जिसके अंतर्गत देश में सैकड़ों निर्देशकों को प्रतिवर्ष 10 से 25 लाख रुपये सरकार देती है, उसकी लूट का पैमाना व्यापम जैसे किसी भी महाघोटाले से छोटा नहीं होगा। यह अनुदान अभिनेताओं के वेतन के लिये है, पर उसका 60-70 फीसदी, और कहीं-कहीं तो 90 फीसदी हिस्सा रंगमंडल संचालक या निर्देशक हजम कर जाते हैं।

अभिनेताओं की हैसियत ज़्यादातर रंगमंडलों में दास या बेग़ार खटने वाले मज़दूर से अधिक नहीं होती। देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उग आने वाले इन  रंगमंडलों का, जिनमें से ज्यादातर केवल काग़ज पर हैं, आपसी नेटवर्क इतना मज़बूत है कि इस गोरखधंधे का विरोध करने वाले अभिनेता को फिर कभी किसी रंगमंडल में काम नहीं मिलता। सी.ए. से फर्जी प्रमाणपत्र बनवा कर, तस्वीरें भेज कर और मंत्रालय के बाबुओं को खुश कर अनुदान हड़प लिये जाते हैं। 

मंत्रालयों में पैठ रखने वाले ताक़तवर रंगकर्मियों ने अलग-अलग लोगों के नाम से कई-कई रंगमंडल बना रखे हैं और वे नये रंगमंडलों के लिये ग्रांट पास करवाने के बदले भरपूर कमीशन भी खा रहे हैं। ऐसे सफेदपोश रंगकर्मी आज सभी राज्यों में कमीशन एजेन्ट का काम कर रहे हैं।

थियेटर में ग्रांट के वितरण और प्रबंध के लिये सरकार ने एनएसडी को नोडल एजेन्सी बना रखा है। थियेटर में बहने वाली भ्रष्टाचार और लूट की महागंगा की गंगोत्री यही ब्राह्मणवादी संस्था है।एनएसडी आज नाटक करने की, कथ्य समझने की तमीज़ नहीं सिखाती, वह उन्हें कुछ ट्रिक्स और फारमूले सिखा देती है, पांच लाख-दस लाख के अनुदान को खपाना सिखाती है, गलत-सही बिल बनाना और प्रोजेक्ट प्रपोज़ल बनाना सिखाती है, ताकि अनुदान के लिये फ़ाइट करने लायक नाटक उसके प्रशिक्षित लोग किसी प्रकार कर लें। एनएसडी प्रशिक्षण के नाम पर आज देश को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं करती। इस पर कभी और बात होगी।

आज थियेटर में अनुदान बंद हो जाये तो 80 फीसदी रंगकर्मी रंगकर्म छोड़ देंगे। अनुदान अपने साथ एक संस्कृति भी लेकर आता है, भ्रष्टाचार, समझौतापरस्ती, अवसरवाद और लोलुपता की! रंगकर्मी एक बार समझौतापरस्त और बेईमान हो गया तो फिर वह रंगकर्मी कहां रह गया! जब आप अनुदान की पात्रता के हिसाब से अपने रंगकर्म का स्वरूप निर्धारित करते हैं, कथ्य और शैली चुनते हैं, तो फिर कथ्य और नीयत और क्वालिटी तो पहले ही संदिग्ध हो जाती है। अगली बार के अनुदान की फिक़्र तो और जानलेवा होती है।

विकास परियोजनाओं के नाम पर देश भर के आदिवासी और दलित विस्थापित हो रहे हैं, उजाड़े जा रहे हैं, उनके जल, जंगल, ज़मीन और संस्कृति की जैसी भयावह तबाही रची जा रही है, वह रंगमंच से क्यों गायब है? बस्तर और दन्तेवाड़ा जैसी जगहों पर, मणिपुर में, असम में, कश्मीर में मानव अधिकारों को बर्बर तरीके से कुचला जा रहा है, वह हमारे नाटकों का विषय क्यों नहीं है? कभी अखलाक, कभी पानसरे, कभी कलबुर्गी और कभी किरवले। रोज़ समाज के सोचने समझने वाले, हाशिये पर जीने वाले लोग मारे जा रहे हैं, दलितों की बस्तियां जलायी जा रहीं हैं, उनको आत्महत्या के लिये मजबूर किया जा रहा है, नंगा कर घुमाया जा रहा है, ये हमारे नाटकों में क्यों नहीं आता? किसानों की इतने बड़े पैमाने पर हो रही आत्महत्याएं रंगमंच में क्यों जगह नहीं पातीं?

इन सवालों का अकेला जवाब यही है कि अनुदान लेकर आप इन मुद्दों पर सवाल नहीं उठा सकते। आपको अनुदान और पुरस्कार मिलता ही इसीलिये है कि आप यह सब नाटक और रंगमंच में नहीं आने दें। जनता के सामने व्यवस्था को कठघरे में खड़ा नहीं कर सकते आप अनुदान लेकर। अनुदान सरकार इसी मकसद से देती है। लोग यह मकसद आगे बढ़ कर पूरा कर रहे हैं।

अनुदान-विमर्श आज रंगमंच का सबसे अपरिहार्य और प्राथमिक सरोकार बन गया है! सारी मेधा और प्रतिबद्धता इसी जोड़-तोड़ और बचाव में चुक रही है! इससे पता चलता है कि हम जिसे रंगकर्म मान रहे हैं उस मान्यता और समझ में ही बहुत भारी लोचा उत्पन्न हो गया है! अगर रंगमंच को, उसकी सामाजिक-राजनीतिक भूमिका को, उसके गौरवशाली इतिहास को बचाना है तो रंगकर्म को सरकारी बैसाखी से मुक्त करना अपरिहार्य हो गया है। इस दिशा में संगठित होना आज एक बड़ा कार्यभार है।

एनएसडी आज तमाम संसाधनों पर वर्चस्व और एकाधिकार की वजह से केन्द्र में नहीं है! वह श्रेष्ठ और विशिष्ट थी,  तभी रंगमंच के सारे संसाधन और शक्तियां उसके पास हैं! एनएसडी के स्नातक श्रेष्ठ और विशिष्ट होते हैं, इसीलिये उनका सारे संसाधनों और अवसरों पर पहला और नैसर्गिक अधिकार है! यह सोच क्या वैसी नहीं है कि ब्राह्मण जन्म से ही श्रेष्ठ होते हैं, इसलिये उन्हें शेष समाज पर वर्चस्व और नियंत्रण का नैसर्गिक और दैवीय अधिकार है! जैसे अंग्रेज हमसे श्रेष्ठ और महान थे, इसलिये हम पर अपना शासन और अन्याय-उत्पीड़न थोपना उनका विशेष और नैसर्गिक अधिकार था! 

जिस प्रकार हिटलर के जन्मजात महान और श्रेष्ठ लोग दुनिया पर शासन करने निकल पड़े, उसी प्रकार जन्म से ही श्रेष्ठ और विशिष्ट संस्थान एनएसडी के श्रेष्ठ और विशिष्ट स्नातक भारतीय रंगमंच को विजित करने निकल पड़े! सारे संसाधनों पर, सारे ग्रांट पर, सारी कमिटियों पर, सारे पुरस्कारों पर, सारे महोत्सवों पर, सभी संस्थानों पर एकाधिकार करने और थियेटर को अपने अनुसार हांकने का उन्हें महान, विशिष्ट, जन्मजात और दैवीय अधिकार प्राप्त है! 

राजेश चंद्र वरिष्ठ रंग समीक्षक। कई नाटक लिख और निर्देशित कर चुके हैं। 

Oct 27, 2016

जिन्हें खोजे नहीं मिल रहे तीन तलाक के मामले, यह रिपोर्ट सिर्फ उनके लिए

कोई जज है, कोई मैनेजर, कोई शिक्षक तो कोई बिजनेसमैन है, पर तीन तलाक बोलकर औरतों के अधिकारों की धज्जियां उड़ाने में कोई किसी से कम नहीं है। अजय प्रकाश की रिपोर्ट

तलाक बोला और घर से भगा दिया जज साहब ने
उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद की आफ्सा 45 वर्ष की हो गयीं थीं पर इस डर से शादी नहीं कर रही थीं कि शादी के बाद जब कभी पति की इच्छा होगी, वह तलाक बोल घर से बेदखल कर देगा। वह बीए की पढ़ाई करने के बाद पास के ही एक स्कूल में पढ़ा रही थीं। पर घर वालों के दबाव में 2014 में बड़ी दवाब में उन्होंने अलीगढ़ के 59 वर्षीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश मोहम्मद ज​हीरूद्दीन सिद्दीकी से शादी की। जज साहब की पहली पत्नी की मौत के बाद उनके दो बच्चों के पालन—पोषण की शर्त के साथ आफ्सा उनकी दूसरी पत्नी बनी। जिंदगी कुछ महीनों तक सामान्य चली फिर फरवरी में जज साहब ने पत्नी को घर बेदखल ​कर दिया। पत्नी गिड़गिड़ाती रहीं कि कहां जाउंगी तो उन्होंने कह दिया, अभी जाओ फिर बुला लुंगा। मायके वाले भी मान गए कि चलो नोंक—झोंक के बाद सब ठीक हो जाएगा। पर जब साहब ने पत्नी को वापस बुलाने से मना कर दिया और कह दिया कि मैं तलाक दे चुका हूं। आफ्सा कोर्ट नहीं जाना चाहतीं और उनके भाइयों को लगता है कि बीरादरी वाले निपटा देंगे।

पहले ठग लिया ​फिर तलाक बोल दिया
वरिष्ठ पत्रकार और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता जावेद आनंद बताते हैं मुंबई में एक तलाक पीड़ित मुस्लिम लड़की ने मुझसे संपर्क किया। वह चाहती थी कि उसके पति और चेन्नई के मुख्य मुफ्ती ने उसके साथ जो धोखाधड़ी की है उसके खिलाफ कोई फतवा जारी हो जिससे मौलवी और ​पति को सबक मिले।' लड़की ने बताया, 'मैं एक मल्टीनेशनल बैंक में ​सीनियर एक्ज्यूक्टिव हूं और मेरा मुस्लिम शौहर चेन्नई में ही एक दूसरे मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर है। हम दोनों ने एमबीए हैं। पति ने इंवेस्टमेंट के नाम पर मुझपर भावनात्मक दबाव बनाया और मेरी सैलरी हर महीने अपने खाते में डालता रहा। बाद में मैं अपनी सैलरी उसके खाते में डालने से मना कर दी तो वह बोला खुला 'लड़कियों का अधिकार जिसके ​जरिए वह तलाक दे सकती हैं' दे दो, जबकि मैं इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। मैंने पैसा मांगा तो वह घर छोड़कर चला गया। मैं उसके घर गई तो कह दिया, मैंने तुम्हें तलाक दे दिया। मुख्य मु्फ्ती के यहां गयी, उसने मुझे डांटकर भगा दिया कि पहले 'खुला' देती हो और अब यहां नाटक करती हो।' जावेद बताते हैं कि फिर मैंने उस लड़की के लिए मुंबई के मुख्य मुफ्ती से मदद मांगी पर वह टाल गए, आख्रिर में पंजाब के मुख्य मुफ्ती फुजैलूर रहमान उस्मानी से गुहार लगाई तो वह फतवा जारी करने को तैयार हुए। उसके बाद कुछ खास हो पाया होगा मुझे नहीं लगता। हां, घरेलू हिंसा कानून के आने के बाद से जरूर मुस्लिम महिलाओं को राहत मिली है।

तीन तलाक के लिए सबसे आसान शब्द 'अवैध संबंध'
तीस हजारी कोर्ट में जज ने जब पूछा कितना पढ़े लिखे हो तो तलाक देने वाले शिक्षक शौहर का जवाब था — एमए, बीएड, एमएड और डायट की डिग्री। दिसंबर 2013 से अदालत में चल रहे इस मामले की शुरुआत उस समय हुई जब शिक्षक पति ने शिक्षिका पत्नी को तीन बार तलाक कह छोड़ गया। पति को संदेह था कि पत्नी का अवैध संबंध है। दो छोटे बच्चों के साथ, पति के मां—बांप को भी पाल रहीं फरहाना बताती हैं कि एक शाम कहीं से वह घूमकर आए। उनके पिता जी ने कोई बात कही। उस पर वह बिगड़े, मैंने हस्तक्षेप किया तो मुझपर आरोप लगाए, कहा तुम्हार अवैध संबंध है और तलाक बोल चलते बने। अब वह सिर्फ तारिखों पर अदालत में आते हैं और सुलह करने की बजाए मुझे बर्बाद करने की धमकी देते हैं।

तलाक वापस नहीं लेंगे चाहे करोड़ों फुंक जाए
कैश 30 लाख रुपए, चार पहिया गाड़ी और दस भर सोना दहेज में देने के बाद दिल्ली के जाफराबाद में हुई एक बिजनेसमैन घराने की शादी तीन महीने भी नहीं चली। शौहर ​साजिद ने लड़की से एक दिन मारपीट कर घर से निकाल दिया। लड़के—लड़की दोनों ने दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की है। मायके वाले उसे वापस ससुराल लेकर आए तो साजिद और उसके घर वालों ने कह दिया कि मैंने तलाक दे दिया है। इस मामले को देख रहीं सुप्रीम कोर्ट की वकील फरहा फैज कहती हैं, 'ऐसे मामलों में तलाक शब्द ही ब्रम्ह है, मनमानी ही रिवाज है।' साजिद अपनी 23 वर्षीय तलाकशुदा पत्नी को कोर्ट के आदेश के बावजूद 10 हजार महीना के हिसाब से भत्ता देने को तैयार नहीं। एक साल के बकाए का आधा उसने तब दिया है जब कोर्ट ने उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया।

Aug 11, 2011

प्रधानमंत्री धृतराष्ट्र तो नहीं



सरकार पर दवाब बनाया जाता है तो प्रधानमंत्री महोदय को जनता की मांग गैर-संवैधानिक नज़र आने लगती है और जनता का प्रयास समानांतर सरकार चलाने की उद्दंडता...

पीयूष पन्त
 

हमारे प्रधानमंत्री महोदय को सवालिया संस्कृति नहीं भाती. तभी तो जब भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी यूपीए सरकार के मंत्रियों के भ्रष्ट  आचरण को लेकर मीडिया में सवाल उठाये जाते हैं या फिर नागरिक समाज द्वारा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने  के लिए जनता के सरोकारों को समाहित करने वाले जन लोकपाल विधेयक को संसद द्वारा शीघ्र पास कराने की खातिर सरकार पर दवाब बनाया जाता है तो प्रधानमंत्री महोदय को जनता की मांग गैर-संवैधानिक नज़र आने  लगती है और जनता का प्रयास समानांतर सरकार चलाने की उद्दंडता .

जब सरकार शासन चला पाने में असमर्थ दिखाई दे रही हो तो मीडिया और जनता द्वारा उसकी खिंचाई करना और सरकार पर सुसाशन का दबाव डालना पूरी तरह से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है. अब प्रधानमंत्रीजी की समझ का क्या किया जाये कि उन्हें लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ पुलिसिया राज का आगाज़ करती दिखाई देती हैं. जबकि सच तो यह है की उनकी अपनी सरकार की यूआईडी कार्ड बनाना, जनता से धरना-प्रदर्शन स्थलों को लगातार छीनते चले जाना, आदिवासी-किसानों द्वारा अपने जंगल-ज़मीन बचाने की खातिर आन्दोलन करने को देशद्रोह बता उन पर लाठी-गोली बरसाना और उनके मुद्दों को उठाने वाले पत्रकारों को माओवादी करार दे फर्जी मुठभेड़ में मार देना सरीखी कारगुजारियां देश को पुलिस राज में तब्दील कर चुकी हैं. 

धृतराष्ट्र तो वाकई अंधे थे, लेकिन हमारे  प्रधान मंत्री जान-बूझ कर अंधे होने का नाटक क्यों कर रहे हैं, या फिर देशी-विदेशी कर्पोरेटेस  ने उन्हें ऐसा चश्मा पहना दिया है जिसके चलते उन्हें कोर्पोरेट हितों के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं देता है. जन कवि बाबा नागार्जुन की निम्न पंक्तियाँ आज रह-रह कर याद आती हैं...

 
                        खड़ी हो गयी चांपकर कंकालों की हूक  
                        नभ में विपुल विराट-सी शासन की बन्दूक 
                        उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
                        जिसमें कानी हो गयी शासन की बन्दूक
                        बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक
                        धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बन्दूक
                        सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक 
                        जहां तहां दगने लगी शासन की बन्दूक
                        जली ठूंठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक
                        बाल न बांका कर सकी शासन की बन्दूक                                                           

Jul 31, 2011

मीडिया मंडी का नया माल बन गया ‘बेशर्मी मोर्चा’

मन में सवाल उठ रहा था कि राष्ट्रीय मीडिया के लिए स्लट वॉक कहीं मंडी में आया ताजा माल तो नहीं, जिसको बेचने के लिए एक-एक न्यूज चैनल से तीन-तीन पंसारी पहुंचे हुए हैं...

भूपेंद्र सिंह


महिलाओं के हक और समान अधिकार के लिए दुनिया के कई देशों में निकाली जा चुकी स्लट वॉक आज दिल्ली के जंतर-मंतर में आयोजित हुआ। पिछले कई महीनों से जिस स्लट वॉक या उसके भारतीय रूपांतरण ‘बेशर्मी मोर्चा’ को लेकर मुख्यधारा की मीडिया में खबरें आ रही थीं, आज उस बेशर्मी मोर्चा में शामिल युवक-युवतियों ने जंतर-मंतर पर एकत्रित होकर पार्लियामेंट स्ट्रीट का चक्कर लगाया।

बमुश्किल 300 लोगों के झुंड को कवर करने के लिए 30 से ज्यादा न्यूज चैनलों की ओवी वैन आयोजकों से पहले जंतर-मंतर पहुंच चुकी थीं। भीड़ देखकर ऐसा लगा कि पत्रकारों और फोटोग्राफरों की संख्या भी 300 के आसपास ही रही होगी। मन में बस यही सवाल उठ रहा था कि राष्ट्रीय मीडिया के लिए क्या यह इतना बड़ा आयोजन है कि एक-एक न्यूज चैनल से स्टल वॉक कवर करने के लिए तीन-तीन पत्रकार भेजे गये हैं। कम कपड़े में आयी लड़कियों के शरीर फोकस होते कैमरों को देख लगा कि यह मुद्दा है या मीडिया मंडी में आया ताजा माल, जिसमें मुनाफा बाइडिफाल्ट है।

आयोजक उमंग सबरवाल और एक प्रदर्शनकारी : अधिकार की लड़ाई  

यह बात परेशान करने वाली थी कि जब मीडिया के कैमरे लोगों के झुंड में उन लड़कियों को ढूंढ़ रहे हैं जिन्होंने कम कपड़े पहने हैं, तो हम ऐसे आयोजन करके समाज के लोगों की सोच में कैसे बदलाव की बात कैसे कर सकते हैं कि छोटे कपड़े पहनकर कोई लड़की सड़क पर गुजरेगी तो उसकी ओर कोई मुड़कर नहीं देखेगा या कमेंट नहीं करेगा। ऐसे में समाज में परिवर्तन की बात करना क्या बेमानी नहीं है? एक और बात जो मुझे यहां हैरान कर रही थी वह यह कि इस मोर्चे में भाग लेने के लिए लड़कियों से ज्यादा संख्या लड़कों की थी।

यह स्लट वॉक कई चैनलों के लिए अपनी ब्रांडिंग का जरिया भी था, जो जाहिर कर रहा था इनके लिए मामला तभी मुद्दा है जब वह मंडी के मुनाफे में चार चांद लगाता हो। और यह कूवततो बेशर्मी मोर्चा में है- तेज एंकरों, रिपोर्टरों और संपादकों ने ताड़ लिया है। एक न्यूज चैनल की वरिष्ठ एंकर तो बाकायदा जंतर-मंतर पर टॉक शो आयोजित करने के लिए घंटों से तैयारी में जुटी हुयी थीं और चैनल के नाम का होर्डिंग का एक घेरा बनाकर वॉक के आयोजकों का टाक शो में शामिल होने का इंतजार कर रही थी।

वहीं युवाओं के बीच यूथ चैनल के नाम से लोकप्रिय एक चैनल ने तो इस वाक में शामिल होने वाले युवक-युवतियों को टी-शर्ट पहनायी हुयी थी, जिसके पीछे बेशर्मी मोर्चा और चैनल का नाम लिखा था। एक एफएम चैनल के आरजे भी यहां पहुंचे हुए थे। कहने की जरूरत नहीं कि उनका यहां आने का मकसद अपने-अपने चैनल या एफएम की ब्रांडिंग का अवसर हाथ से न जाने देने वाला अवसर था। अंग्रेजी बोलने वाले और आईफोन इस्तेमाल करने वाले इन युवक-युवतियों ने जब अपनी वाक शुरू की तो न्यूज चैनलों के कैमरे इनकी ओर ऐसे लपके जैसे कोई शिकारी शिकार के लिए झपटता है।

मीडिया ने बेशर्म मोर्चा की रैली को इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया कि दिल्ली पुलिस के साथ-साथ सीआरपीएफ के जवान भी मौके पर तैनात करने पड़े। जिस तरह जंतर-मंतर पर मौजूद न्यूज चैनलों के रिपोर्टर कैमरे के सामने खबरें प्रस्तुत कर रहे थे उन्हें देखकर मैं यह सोचकर हैरान हो रहा था कि घर में बैठा एक आम दर्शक सोच रहा होगा कि पता नहीं कितना हुजूम उमड़ा होगा। लेकिन हकीकत में मुझे यह कुछ बड़े घरों के लड़के-लड़कियों द्वारा पश्चिमी देशों में निकाली गयी स्लट वाक से प्रभावित होकर कुछ अलग करने से ज्यादा नहीं लगा।

अब बात जरा इस मोर्चे की आयोजक की भी कर ली जाये। आयोजक उमंग सब्बरवाल सफेद टी-शर्ट और जींस में दिखीं, जबकि वाक में शामिल कुछ लड़कियां स्कर्ट और शार्ट्स पहनकर पहुंची थीं। कई दंपत्ति भी इस वाक का हिस्सा बनने पहुंचे थे। पूछने पर पता चला कि संडे का दिन था, सोचा कुछ अलग इवेंट हो रहा है तो इसमें शामिल हुआ जाये तो चले आये। दो महीने की जद्दोजहद के बाद मात्र कुछ सौ लोगों को देखकर मैं यह सोचने लगा कि यदि मीडिया ने इसे इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया होता तो शायद इतने लोग भी नहीं जुटते।

Jun 30, 2011

9.30 की डीटीसी बार

रात 9 बजे के बाद  डीटीसी बस 'बियर बार' में बदल जाती है. घर लौटते कई ‘मर्द’ पीछे की सीट में अपनी महफ़िल जमा लेते है और मोबाइल या एमपीथ्री पर गाना बजने लगता है...


विष्णु शर्मा

जब भी लाल रंग की डीटीसी की चर्चा होती है दोस्त बताते है कि रात के 9 बजे के बाद अक्सर इसके अंदर बियर बार सा माहौल हो जाता है.

साथियों की इस बात पर पहले तो यकीन नहीं हुआ लेकिन बाद में हमने खुद इस बात की जाँच करने का इरादा बनाया. रात 9 बजे कॉफी हाउस से निकल कर सिन्ध्या हाउस से आंबेडकर नगर जाने वाली 522 नंबर की बस में चढ गए. वहां महफ़िल जैसा कुछ नहीं था पर शराब की महक बस में भरी हुई थी. इधर उधर जांचने से लगा कि कोई दीवाना नशा करके बैठा होगा. हम पीछे जा कर बैठ गए. थोड़ी देर बाद हम देखते है कि एक साहब पेप्सी की बोतल निकाल कर गटक रहे है.लेकिन तेज महक बता रही थी कि मामला कुछ और ही है.जब दोबारा बोतल खुली और पेप्सी गटकी गई तो यकीन हो गया कि ये हरकत उन हज़रत की है.

हमने जब उनसे पुछा कि वे बस में शराब क्यों पी रहे है तो पहले वे बोतल दिखा कर कहने लगे कि पेप्सी है लेकिन जब मामला गरम होने लगा तो माफ़ी मांगने लगे. फिर उठ कर चल दिए. बस से बाहर निकल कर हमे गलियां और उतर कर आने की चुनौती देने लगे. हम नहीं उतरे. हमसे एक सीट आगे बैठी संगीता हमें बताने लगी,  ‘अरे ये तो रोज का मामला है.मेरी छुट्टी रोज 8 बजे खत्म होती है और मैं इस एहसास के साथ बस में चढती  हूँ  कि आज भी कोई शराबी मेरे साथ बतमीज़ी कर सकता है.’
हमने डीटीसी के कंडक्टर से पूछा कि वह क्यों बस में ऐसा होने देता है तो उसने बताया कि दिन में ऐसा करने की हिम्मत कोई नहीं करता क्योंकि टिकट चेक करने वाले बस में कभी भी चढ जाते है लेकिन रात में कभी चेक करने वाले नहीं आते और लोग मनमानी करने लगते है.उसने यह भी कहा कि एक दो बार शुरू में उसने हस्तक्षेप करने की कोशिश की लेकिन जब उसकी पिटाई होने लगी तो कोई बचाने नहीं आया. कंडक्टर फरीदाबाद का रहने वाला है और उसे इस बात अफ़सोस है कि दिल्ली में लोग गलत देखने पर भी उसके खिलाफ नहीं बोलते. रात में वह पिटाई के डर से टिकट भी लोगों से नहीं मांगता.

बातों- बातों में  हमें कई किस्से पता चले. राजेश, जो खानपुर का रहने वाला है, ने बताया कि सबसे ज्यादा ऐसी हरकत पंचशील और जी. के. के रहने वाले करते है. वे लोग बियर पीते है और लड़कियों के साथ बतमीजी करते है. कई बार तो ऐसी गन्दी गाली देते है कि शर्म आ जाती है.

लोग बताते है कि यह ऐसी  बस के आने के बाद बढ़ा है.ऐसा नहीं कि पहले ऐसा नहीं होता था लेकिन तब शीशे सफ़ेद होते थे और हवा के लिए खुले रखने पड़ते थे ऐसे में जब कोई ऐसा करता था तो बाहर आवाज़ लगाकर पुलिस को बुलाना आसान होता था.लेकिन रंगीन  शीशों  के कारण और दरवाज़ा बंद होने के चलते आदमी अंदर कुछ भी करे, मरे, पीटे, गाली  दे बाहर पता नहीं चलता.

संगीता बताती है कि रात में बस का सफर जोखिम भरा होता है.क्योंकि चेक करनेवाले कभी नहीं आते इस लिए लोगों में डर नहीं होता.कई बार उसे लगता है कि उसके साथ बदतमीजी होने वाली है लेकिन भगवन का शुक्र है कि ऐसा अब तक नहीं हुआ.

जब हम खानपुर से लौट रहे थे तब सच में बार जैसा माहौल था.पीछे की सीट में 5शरीफजादे बियर पी रहे थे और बीच की सीट पर नमकीन रखा हुआ था.और जैसा कि साथियों से सुना था संगीत भी बज रहा था. हमने बस के रंगीन शीशे पर नज़र दौडाई, बंद दरवाज़े को परखा फिर सोचा कुछ नहीं बोलते.  


May 3, 2010

काम पर परिवार


खुदाई  के  लिए  अभिसप्त  शहर दिल्ली का  यह आम दृश्य है.सरकार के मुताबिक ये सब  विकास के लिए हो रहा है और   विकास राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के लिए.शहर की सहूलियत और सुविधाओं के मार्फ़त खेलों के आयोजन का तो इतिहास रहा है,मगर दिल्ली को पहले ऐसे शहर कि ख्याति मिलेगी जो खेलों के मार्फ़त बदली  है, विकसित हुई  है.हो यह रहा है कि यहाँ  नागरिकों का ख्याल कर खेल और आयोजन के इंतजामात नहीं किये जा रहे बल्कि खेलों के हिसाब से लोगों के नागरिक अधिकार तय हो रहे हैं.


इस बारे में समाजशात्री आशीष नंदी ने एक साक्षात्कार  में कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं -'हमारे यहां एक तरफ राष्ट्र मंडल खेलों की तैयारियां चल रही हैं और दूसरी तरफ उतनी ही तेजी से झोपड़पट्टियों और गरीब बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है या पहले ही उजाड़ दिया गया है। मेरे लिए ये सब झकझोर देने वाली घटनाएं भी हैं। मैं सोचता हूं,यह कैसा देश है जहां दूसरों के स्वागत के लिए अपने लोगों को तबाह किया जा रहा है। न्यूयार्क, लंदन, शिकागो जैसी जगहों में भी स्लम हैं और हार्लेम तो दुनिया की मुख्य स्लम बस्तियों में से एक है। गौर करने वाली बात है कि अभी हाल ही में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का दफ्तर स्लम की तरफ बनाया गया है। लेकिन क्या हमारा कोई अदना-सा सांसद भी ऐसी किसी बस्ती की तरफ रहना पसंद करेगा। जाहिर है,हमारा शासक वर्ग सिर्फ स्लम को ही नहीं ऐसी हर समस्या को,जिसको वह नहीं चाहता है,भुला देना चाहता है नहीं तो ढंक देना चाहता है। यह हिंदुस्तानी शासक वर्ग की कार्यशैली की सामान्य आदत है कि जिसे वह नहीं चाहता है,मुख्य सामाजिक दायरे से उठाकर फेंक देता है।


आइये इस हालात को हम  फोटोग्राफर आरबी यादव की नज़रों से देखें -




नज़र न लगे लल्ला को : विकास की  नज़र से कैसे बचाओगी माई

का फोटो खींचत हौ चचा : रीअल्टी शो होगा का




काम पर परिवार : विकास के लिए जरूरी कहती सरकार



तापमान साक्षरता का विषय है : और काम कामगारों का