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Jun 15, 2017

अब आप के भरोसे राज्यसभा नहीं जा पाएंगे कुमार विश्वास

कुमार की ठसक को पार्टी और उसके नेता बर्दाश्त नहीं करते। कुमार की इस कमजोरी का भी पार्टी को पता है कि वो भाजपा को लेकर इतने कटु कभी नहीं रहते, जितने कांग्रेस को लेकर....

जनज्वार दिल्ली। आम आदमी पार्टी में एक बात कही जाती है कि यहां कोई भी बयान यूं ही नहीं दे देता, जब तक ऊपर से अनुमति या सहमति न हो। कल दिल्ली के पूर्व संयोजक रहे दिलीप पांडेय का कुमार विश्वास पर ट्वीट करके किया गया हमला स्पष्ट करता है कि अब कुमार पर पार्टी को कितना अविश्वास है।


पर दिलीप पांडेय के ट्वीट ने कुमार को बैकफुट पर ला दिया है। कल से कुमार भाजपा के खिलाफ ट्वीट ओर रिट्वीट कर रहे हैं। कुमार के ट्वीटर हैंडल को देखकर समझ आ जायेगा कि दिलीप का तीर निशाने पर लगा है। यह लड़ाई पंजाब के विधानसभा चुनाव के नतीज़ों के समय से चली आ रही है जो कभी स्पष्ट तो कभी अस्पष्ट रूप से बाहर आ जाती है। 

अब एक बात तो तय है कि कुमार आम आदमी पार्टी में अकेले पड़ते नज़र आ रहे हैं। इसका जिक्र वो खुद 2 दिन पहले एनडीटीवी 24/7 को दिए अपने इंटरव्यू में भी कर चुके हैं। इस इंटरव्यू में कुमार खुद को अभिमन्यु की उपाधि दे रहे थे, जो महाभारत में घेरकर मार दिया जाता है। इंटरव्यू लेने वाली पत्रकार भी खुद ये बोल रही थी कि आपके खिलाफ पार्टी के ऊपरी स्तर पर साजिश रची जा रही है। कुमार ने खुद कहा कि उन्हें भी इस बात का इल्म है। आखिर क्या वजह है कि पार्टी के बड़े नेता कुमार को किनारे लगाने में लगे हुए हैं।

दरअसल दिल्ली से राज्यसभा के लिए 3 सांसद जाने हैं। पार्टी के एमएलए के हिसाब से तीनों आप के सांसद राज्यसभा जाएंगे। इसमें से एक सीट के लिए खुले तौर पर कुमार अपनी दावेदारी जताते रहे हैं। और पार्टी तक ये बात पहुंचाते रहे हैं कि उनको राजयसभा के लिए दूसरी पार्टी से भी आॅफर है। कुमार की इसी ठसक को पार्टी और उसके नेता बर्दाश्त नहीं करते। कुमार की इस कमजोरी का भी पार्टी को पता है कि वो भाजपा को लेकर इतने कटु कभी नहीं रहते, जितने कांग्रेस को लेकर। 

पार्टी के नेताओं को भी पता है उन्हें राज्यसभा के लिए कहां से आॅफर है। इसी को ध्यान में रखते हुए कल सोच—समझ कर दिलीप पांडेय ने अपने ट्वीट में कुमार पर हमला करते हुए कहा कि क्या बात है भैया आप कांग्रेस को तो खूब गाली देते हो पर कहते हो वसुंधरा के खिलाफ नही बोलेंगे। ऐसा क्यों?

कुमार ने अपने इंटरव्यू में साफ—साफ बोल दिया था कि मुझे पता है पार्टी में कौन—कौन उनके खिलाफ षड्यंत्र रच रहे हैं कुछ तो वो हैं, जो इस घर में रहे हैं (इस घर से मतलब कुमार के घर में) और यहीं रोटी खाई है। कुमार को भी अब ये समझ आ रहा है कि इस लड़ाई में उनकी हार निश्चित है इसलिए वो खुद को अभिमन्यु घोषित कर रहे हैं। 

इस लड़ाई में किसी को कुछ हासिल हो या न हो पर राजनीति के चलते दो दोस्तों की दोस्ती में जरूर दरार आ गई है। कुमार और मनीष सिसोदिया दोनों गाज़ियाबाद ज़िले के पिलखुआ कस्बे रहने वाले बचपन के दोस्त थे। पर अब दोस्ती  में पहले जैसी बात नहीं रह गई है। इसका सबूत रविवार को राजस्थान की पार्टी की वहां के वालंटियर्स की मीटिंग की कुमार और मनीष की फ़ोटो देखकर पता चल जाता है। दोनों एक मंच पर बैठे हैं, पर ऐसा लगता है जैसे दोनों बस एक खानापूर्ति कर रहे हैं। कवि कुमार विश्वास का चेहरा देख साफ पता चल रहा है कि अब उन्हें अपने घनिष्ठ मित्र मनीष से भी कोई उम्मीद नहीं कि वे पार्टी में उनका सपोर्ट करेंगे। कुमार के चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा है।

इस लड़ाई में एक और अहम किरदार है संजय राघव। ये जनाब मनीष सिसोदिया जी के साले साहब हैं। मनीष भले ही खुद कुमार पर कोई कटाक्ष करने से बचते रहे हों, लेकिन उनका साला संजय राघव जो खुद कुमार के घर के पास रहता है वो कोई भी दिन नहीं छोड़ता जब अपने ट्वीट से कुमार पर आक्रमण न करता हो। इसे मनीष की मौन सहमति कहा जाए या कुछ और। लेकिन इतना तो तय है कि मनीष और कुमार की दोस्ती एक किनारे पर आ गई है, जो कभी भी टूट सकती है।

पार्टी नेताओं को ये आपसी लड़ाई आने वाले दिनों में सोशल मीडिया से निकलकर सड़क पर भी आयेगी। बस इंतज़ार कीजिये कुछ दिनों का।

Apr 27, 2017

रमेश लोधी की हत्या में आपकी पुलिस किसे बचा रही है योगी जी!

लाश लावारिश थी तो उसकी शिनाख्त करने के लिए उन पर इतना जोर क्यों था. शवदाह की जल्दी क्यों थी. लाश को घर ले जाने में पुलिस को क्या और कैसी हिचक थी. गांव स्थित श्मशान में शवदाह क्यों नहीं हो सकता था.....

रमेश लोधी की संदिग्ध हालात में हुई मौत पर परिजनों से पूछताछ करता जांच दल
नन्हे पहलवान नहीं रहे. वह लखनऊ के इंदिरा नगर इलाके के गांव मजरे फतहापुरवा के निवासी थे. वह मामूली आदमी थे लेकिन उनकी मौत की खबर इसलिए ख़ास है क्योंकि वह उस रमेश लोधी के चाचा थे जिसकी पिछली 7 अप्रैल को रहस्यमय तरीके से मौत हुई थी। वही इस मामले के प्रमुख पैरोकार भी थे. नन्हे स्वाभाविक मौत नहीं मरे. पुलिस ने पहले उनका भतीजा छीना और फिर इंसाफ मांगने पर उनका जीना मुहाल कर दिया। ख़ास बात यह भी कि उन्होंने उन चार लोगों को बेकसूर माना था जिन्हें पुलिस ने उनके भतीजे रमेश की हत्या के मामले के आरोपी के बतौर जेल भिजवा दिया.  

यह मामला मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की कानून व्यवस्था दुरुस्त करने की घोषणा को भी ठेंगा दिखाती है, क्योंकि योगी ने इसे अपनी सरकारी की प्राथमिकताओं में शुमार किया है। यह उल्लेख भी ज़रूरी है कि नन्हे पहलवान ने अपने भतीजे की हत्या के मामले में एसएसपी समेत मुख्यमंत्री के जनता दरबार में भी इंसाफ की गुहार लगायी थी, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला।    
         
इंसानी बिरादरी, रिहाई मंच और इंसाफ अभियान संगठनों से जुड़े लोगों ने इस पूरे मामले की छानबीन एक जांच दल के जरिए की, जिसके नतीजे पुलिस को ही कटघरे में खड़ा करते हैं. जांच दल के मु​ताबिक भतीजे की पुलिस हिरासत में हुई मौत ने नन्हे पहलवान को बुरी तरह झकझोर दिया था. घरवालों की मर्जी के खिलाफ पुलिस उसका शव पोस्टमार्टम हाउस से सीधे भैंसाकुंड ले गयी थी, जहां विद्युत शव गृह में उसे फूंक दिया गया. घरवाले चाहते थे कि शव पहले उनके गांव ले जाया जाये लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी. 

रमेश लोधी की मौत शक के घेरे में है. उसकी हत्या के आरोप में जेल में बंद लोगों के परिजनों और पड़ोसियों के मुताबिक़ 6-7 अप्रैल की रात कोई सवा बजे इंदिरा नगर के दायरे में शामिल हो चुके चांदन गांव के सुनसान कोने में स्थित कय्यूम के घर चोर घुसा था. आहट से घरवालों की नींद टूट गयी, शोर से पड़ोसी भी जाग गये और रमेश लोधी पकड़ा गया. उसकी थोड़ी बहुत पिटाई हुई और 100 नंबर पर उसके पकड़े जाने की सूचना दे दी गयी.

पुलिस घटनास्थल पर पहुंची, लेकिन उसने पानी-मिट्टी से सने चोर को अपने वाहन में बिठाने से परहेज किया और चोर को गोमती नगर थाना पहुंचाने की जिम्मेदारी कय्यूम और उसके पड़ोसी अकील पर लाद दी. मोटरसाइकिल पर दोनों के बीच चोर बैठा. पड़ोसी होने के नाते दूसरी मोटरसाइकिल से इरफान और बबलू भी साथ हो लिये. रात ढाई बजे तक चारों अपने घर वापस भी लौट आये. यही चारों बाद में रमेश के हत्यारोपी बना दिये गये. चारों गरीब परिवार से हैं और अपने घरों के मुखिया भी हैं. उनके जेल चले जाने के चलते उनके परिवार भीषण तंगी से गुजर रहे हैं.

पुलिस कहती है कि उसने चोर को अपने कब्जे में लिया था, लेकिन वह उसकी पकड़ से भाग निकला. उसे बहुत खोजा गया लेकिन वह हाथ न आया. दूसरे दिन सुबह तकरोही से सटी मायावती कालोनी के पास लावारिस लाश मिली. 100 नंबर पर इसकी सूचना मिलने पर पुलिस आयी और उसे मेडिकल कालेज ले कर चली गयी. उसे लावारिश घोषित कर दिया गया.

नन्हे पहलवान कहते रहे कि रात कोई 3.30 बजे पुलिस उनके घर आयी थी और उनसे रमेश लोधी के बारे में पूछताछ की थी. लेकिन यह नहीं बताया कि आखिर इतनी रात में की जा रही पूछताछ के पीछे माजरा क्या है. अगले दिन यानी 7 अप्रैल को कोई 11.30 बजे पुलिस फिर गांव आयी और उनसे मोबाइल पर एक धुंधली सी तसवीर पहचानने को कहा. नन्हे पहलवान और फिर रमेश की मां सताना समेत घर के दूसरे सदस्यों और पड़ोसियों ने भी उस तसवीर को नहीं पहचाना, तो भी पुलिस ने नन्हे पहलवान पर पोस्टमार्टम हाउस चलकर लाश की पहचान करने का दबाव बनाया.

नन्हे पहलवान ने लाश को देखते ही उसकी पहचान अपने भतीजे के तौर पर कर दी. इसके बाद पुलिस ने रहस्यमयी मुस्तैदी दिखायी और लाश को फ़टाफ़ट फुंकवा दिया. इस बीच सूचना पाकर रमेश की बहन बिंदेश्वरी सीधे भैंसाकुंड पहुंची थी और उसने लाश को गांव ले जाने की ज़िद पकड़ी। उसने पुलिस की इस जल्दबाजी के पीछे किसी साजिश की आशंका भी जतायी, लेकिन उनकी आवाज अनसुनी कर दी गयी. 

शवदाह के समय मौजूद लोगों ने कुछेक पुलिसवालों को फोन पर किसी को कुछ ऐसा भरोसा दिलाते हुए सुना कि सब ठीक हो जायेगा सर, कि काम पूरा हो गया सर. शव दाह के फ़ौरन बाद पुलिस नन्हे पहलवान को थाने पर पहुंचने का आदेश देकर चलती बनी. थाने में समझौते की बात चल रही थी और उनसे किसी कागज़ पर अंगूठे का निशान लिया जाना था. इस बीच वह दवा लेने बाहर निकले. इस बहाने उन्होंने किसी वकील से संपर्क साधा और उसकी सलाह पर वापस थाने जाने के बजाय सीधे अपने घर चले गये.

इसके बाद पुलिस कैलाश लोधी के पीछे पड़ गयी जो नन्हे थाने से मेडिकल की दुकान तक ले गये थे. पुलिस को लगा कि नन्हे पहलवान के थाना वापस न लौटने के पीछे कैलाश लोधी का हाथ है. पुलिस ने उन्हें धमकाया, लगातार उनका फोन घनघनाया और रिस्पांस न मिलने पर उनके घर भी धमक गयी. उन्हें भी डर है कि पुलिस उन्हें कभी भी फंसा सकती है.

इस डर की छाया नन्हे पहलवान की अंतिम यात्रा के दौरान भी दिखी. इस मामले पर सबने जैसे खामोशी ओढ़ रखी थी. एक नौजवान के मुताबिक सुबह नन्हे पहलवान बहुत उदास थे और कह रहे थे कि अब कुछ नहीं होनेवाला. पुलिस बच निकलेगी और चार लोग पुलिस के गुनाह की सजा भुगतेंगे, उन बेचारों के घर बर्बाद हो जायेंगे. 

ढेरों सवाल हैं. लोगों का बयान है कि चोर को थाने ले जाया गया था. क्यों न माना जाये कि थाने में उसकी बेरहम पिटाई हुई जिससे वह लाश में बदल गया. खुद को बचाने के लिए पुलिस ने उसकी लाश सड़क किनारे फेंक दी और फिर लावारिश लाश की बरामदगी दिखा दी. तो फिर पुलिस देर रात नन्हे पहलवान के घर रमेश लोधी के बारे में पूछताछ करने क्यों और किस आधार पर गयी थी. 

सवाल यह भी कि लाश लावारिश थी तो उसकी शिनाख्त करने के लिए उन पर इतना जोर क्यों था. शवदाह की जल्दी क्यों थी. लाश को घर ले जाने में पुलिस को क्या और कैसी हिचक थी. गांव स्थित श्मशान में शवदाह क्यों नहीं हो सकता था. यह झूठी बात क्यों फैलायी गयी कि रमेश शादीशुदा था, कि उसकी पत्नी उसकी इन्हीं आदतों के चलते छह माह पहले उसे छोड़कर जा चुकी थी. जबकि रमेश अविवाहित था और हिंदू समाज में अविवाहित को जलाने की नहीं, दफनाये जाने की परंपरा रही है. तो क्या शवदाह और उसमें जल्दबाजी के पीछे पुलिस की मंशा अपने गुनाहों के सबूत मिटाने की थी. पुलिस किस बात का समझौता कराना चाहती थी और क्यों. नन्हे पहलवान के हमदर्दों के खिलाफ पुलिस ने निशाना क्यों साधा. ऐसा माहौल क्यों बनाया कि लोग चुप रहें, कि इसी में अपनी भलाई समझें.

जांच दल ने मांग की है कि मुख्यमंत्री और एसएसपी को भेजी गयी नन्हे पहलवान की अर्जी के मुताबिक़ फ़ौरन कार्रवाई हो और पुलिस की भूमिका की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए जाएं. जांच दल में इंसानी बिरादरी के आदियोग और वीरेंद्र कुमार गुप्ता, रिहाई मंच के अध्यक्ष शोएब मोहम्मद, महासचिव राजीव यादव और अनिल यादव, इंसाफ अभियान की गुंजन सिंह, विनोद यादव और परवेज सिद्दीकी शामिल थे।