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Jun 21, 2017
Apr 27, 2017
रमेश लोधी की हत्या में आपकी पुलिस किसे बचा रही है योगी जी!
लाश लावारिश थी तो उसकी शिनाख्त करने के लिए उन पर इतना जोर क्यों था. शवदाह की जल्दी क्यों थी. लाश को घर ले जाने में पुलिस को क्या और कैसी हिचक थी. गांव स्थित श्मशान में शवदाह क्यों नहीं हो सकता था.....
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| रमेश लोधी की संदिग्ध हालात में हुई मौत पर परिजनों से पूछताछ करता जांच दल |
नन्हे पहलवान नहीं रहे. वह लखनऊ के इंदिरा नगर इलाके के गांव मजरे फतहापुरवा के निवासी थे. वह मामूली आदमी थे लेकिन उनकी मौत की खबर इसलिए ख़ास है क्योंकि वह उस रमेश लोधी के चाचा थे जिसकी पिछली 7 अप्रैल को रहस्यमय तरीके से मौत हुई थी। वही इस मामले के प्रमुख पैरोकार भी थे. नन्हे स्वाभाविक मौत नहीं मरे. पुलिस ने पहले उनका भतीजा छीना और फिर इंसाफ मांगने पर उनका जीना मुहाल कर दिया। ख़ास बात यह भी कि उन्होंने उन चार लोगों को बेकसूर माना था जिन्हें पुलिस ने उनके भतीजे रमेश की हत्या के मामले के आरोपी के बतौर जेल भिजवा दिया.
यह मामला मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की कानून व्यवस्था दुरुस्त करने की घोषणा को भी ठेंगा दिखाती है, क्योंकि योगी ने इसे अपनी सरकारी की प्राथमिकताओं में शुमार किया है। यह उल्लेख भी ज़रूरी है कि नन्हे पहलवान ने अपने भतीजे की हत्या के मामले में एसएसपी समेत मुख्यमंत्री के जनता दरबार में भी इंसाफ की गुहार लगायी थी, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला।
इंसानी बिरादरी, रिहाई मंच और इंसाफ अभियान संगठनों से जुड़े लोगों ने इस पूरे मामले की छानबीन एक जांच दल के जरिए की, जिसके नतीजे पुलिस को ही कटघरे में खड़ा करते हैं. जांच दल के मुताबिक भतीजे की पुलिस हिरासत में हुई मौत ने नन्हे पहलवान को बुरी तरह झकझोर दिया था. घरवालों की मर्जी के खिलाफ पुलिस उसका शव पोस्टमार्टम हाउस से सीधे भैंसाकुंड ले गयी थी, जहां विद्युत शव गृह में उसे फूंक दिया गया. घरवाले चाहते थे कि शव पहले उनके गांव ले जाया जाये लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी.
रमेश लोधी की मौत शक के घेरे में है. उसकी हत्या के आरोप में जेल में बंद लोगों के परिजनों और पड़ोसियों के मुताबिक़ 6-7 अप्रैल की रात कोई सवा बजे इंदिरा नगर के दायरे में शामिल हो चुके चांदन गांव के सुनसान कोने में स्थित कय्यूम के घर चोर घुसा था. आहट से घरवालों की नींद टूट गयी, शोर से पड़ोसी भी जाग गये और रमेश लोधी पकड़ा गया. उसकी थोड़ी बहुत पिटाई हुई और 100 नंबर पर उसके पकड़े जाने की सूचना दे दी गयी.
पुलिस घटनास्थल पर पहुंची, लेकिन उसने पानी-मिट्टी से सने चोर को अपने वाहन में बिठाने से परहेज किया और चोर को गोमती नगर थाना पहुंचाने की जिम्मेदारी कय्यूम और उसके पड़ोसी अकील पर लाद दी. मोटरसाइकिल पर दोनों के बीच चोर बैठा. पड़ोसी होने के नाते दूसरी मोटरसाइकिल से इरफान और बबलू भी साथ हो लिये. रात ढाई बजे तक चारों अपने घर वापस भी लौट आये. यही चारों बाद में रमेश के हत्यारोपी बना दिये गये. चारों गरीब परिवार से हैं और अपने घरों के मुखिया भी हैं. उनके जेल चले जाने के चलते उनके परिवार भीषण तंगी से गुजर रहे हैं.
पुलिस कहती है कि उसने चोर को अपने कब्जे में लिया था, लेकिन वह उसकी पकड़ से भाग निकला. उसे बहुत खोजा गया लेकिन वह हाथ न आया. दूसरे दिन सुबह तकरोही से सटी मायावती कालोनी के पास लावारिस लाश मिली. 100 नंबर पर इसकी सूचना मिलने पर पुलिस आयी और उसे मेडिकल कालेज ले कर चली गयी. उसे लावारिश घोषित कर दिया गया.
नन्हे पहलवान कहते रहे कि रात कोई 3.30 बजे पुलिस उनके घर आयी थी और उनसे रमेश लोधी के बारे में पूछताछ की थी. लेकिन यह नहीं बताया कि आखिर इतनी रात में की जा रही पूछताछ के पीछे माजरा क्या है. अगले दिन यानी 7 अप्रैल को कोई 11.30 बजे पुलिस फिर गांव आयी और उनसे मोबाइल पर एक धुंधली सी तसवीर पहचानने को कहा. नन्हे पहलवान और फिर रमेश की मां सताना समेत घर के दूसरे सदस्यों और पड़ोसियों ने भी उस तसवीर को नहीं पहचाना, तो भी पुलिस ने नन्हे पहलवान पर पोस्टमार्टम हाउस चलकर लाश की पहचान करने का दबाव बनाया.
नन्हे पहलवान ने लाश को देखते ही उसकी पहचान अपने भतीजे के तौर पर कर दी. इसके बाद पुलिस ने रहस्यमयी मुस्तैदी दिखायी और लाश को फ़टाफ़ट फुंकवा दिया. इस बीच सूचना पाकर रमेश की बहन बिंदेश्वरी सीधे भैंसाकुंड पहुंची थी और उसने लाश को गांव ले जाने की ज़िद पकड़ी। उसने पुलिस की इस जल्दबाजी के पीछे किसी साजिश की आशंका भी जतायी, लेकिन उनकी आवाज अनसुनी कर दी गयी.
शवदाह के समय मौजूद लोगों ने कुछेक पुलिसवालों को फोन पर किसी को कुछ ऐसा भरोसा दिलाते हुए सुना कि सब ठीक हो जायेगा सर, कि काम पूरा हो गया सर. शव दाह के फ़ौरन बाद पुलिस नन्हे पहलवान को थाने पर पहुंचने का आदेश देकर चलती बनी. थाने में समझौते की बात चल रही थी और उनसे किसी कागज़ पर अंगूठे का निशान लिया जाना था. इस बीच वह दवा लेने बाहर निकले. इस बहाने उन्होंने किसी वकील से संपर्क साधा और उसकी सलाह पर वापस थाने जाने के बजाय सीधे अपने घर चले गये.
इसके बाद पुलिस कैलाश लोधी के पीछे पड़ गयी जो नन्हे थाने से मेडिकल की दुकान तक ले गये थे. पुलिस को लगा कि नन्हे पहलवान के थाना वापस न लौटने के पीछे कैलाश लोधी का हाथ है. पुलिस ने उन्हें धमकाया, लगातार उनका फोन घनघनाया और रिस्पांस न मिलने पर उनके घर भी धमक गयी. उन्हें भी डर है कि पुलिस उन्हें कभी भी फंसा सकती है.
इस डर की छाया नन्हे पहलवान की अंतिम यात्रा के दौरान भी दिखी. इस मामले पर सबने जैसे खामोशी ओढ़ रखी थी. एक नौजवान के मुताबिक सुबह नन्हे पहलवान बहुत उदास थे और कह रहे थे कि अब कुछ नहीं होनेवाला. पुलिस बच निकलेगी और चार लोग पुलिस के गुनाह की सजा भुगतेंगे, उन बेचारों के घर बर्बाद हो जायेंगे.
ढेरों सवाल हैं. लोगों का बयान है कि चोर को थाने ले जाया गया था. क्यों न माना जाये कि थाने में उसकी बेरहम पिटाई हुई जिससे वह लाश में बदल गया. खुद को बचाने के लिए पुलिस ने उसकी लाश सड़क किनारे फेंक दी और फिर लावारिश लाश की बरामदगी दिखा दी. तो फिर पुलिस देर रात नन्हे पहलवान के घर रमेश लोधी के बारे में पूछताछ करने क्यों और किस आधार पर गयी थी.
सवाल यह भी कि लाश लावारिश थी तो उसकी शिनाख्त करने के लिए उन पर इतना जोर क्यों था. शवदाह की जल्दी क्यों थी. लाश को घर ले जाने में पुलिस को क्या और कैसी हिचक थी. गांव स्थित श्मशान में शवदाह क्यों नहीं हो सकता था. यह झूठी बात क्यों फैलायी गयी कि रमेश शादीशुदा था, कि उसकी पत्नी उसकी इन्हीं आदतों के चलते छह माह पहले उसे छोड़कर जा चुकी थी. जबकि रमेश अविवाहित था और हिंदू समाज में अविवाहित को जलाने की नहीं, दफनाये जाने की परंपरा रही है. तो क्या शवदाह और उसमें जल्दबाजी के पीछे पुलिस की मंशा अपने गुनाहों के सबूत मिटाने की थी. पुलिस किस बात का समझौता कराना चाहती थी और क्यों. नन्हे पहलवान के हमदर्दों के खिलाफ पुलिस ने निशाना क्यों साधा. ऐसा माहौल क्यों बनाया कि लोग चुप रहें, कि इसी में अपनी भलाई समझें.
जांच दल ने मांग की है कि मुख्यमंत्री और एसएसपी को भेजी गयी नन्हे पहलवान की अर्जी के मुताबिक़ फ़ौरन कार्रवाई हो और पुलिस की भूमिका की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए जाएं. जांच दल में इंसानी बिरादरी के आदियोग और वीरेंद्र कुमार गुप्ता, रिहाई मंच के अध्यक्ष शोएब मोहम्मद, महासचिव राजीव यादव और अनिल यादव, इंसाफ अभियान की गुंजन सिंह, विनोद यादव और परवेज सिद्दीकी शामिल थे।
Mar 10, 2017
सैफुल्ला के पिता ने की जांच की मांग
भाई ने उठाए पुलिसिया दावे पर सवाल
लखनऊ के ठाकुरगंज में आतंकी होने के आरोप में मारे गए सैफुल्ला के पिता सरताज ने बेटे के इनकाउंटर के जांच की मांग की है। उनका कहना है कि बेटे के आतंकी होने की खबर मीडिया से मिली। सच्चाई क्या है, यह तो जांच से ही पता चल सकता है.....
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| रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बातचीत करते सैफुल्ला के भाई और पिता |
उन्होंने यह भी कहा, 'अत्यधिक दबाव के चलते मैंने बेटे की लाश लेने से मना कर दिया, पर मैं मीडिया के सामने बार-बार पूरे मामले की जांच की मांग करता रहा। मीडिया ने उसे प्रसारित नहीं किया।'
रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बात करते हुए सैफुल्ला के पिता ने बार—बार कहा कि मैं अभी भी बहुत दबाव महसूस कर रहा हूं। हालांकि आतंक के मामले में फर्जी ढंग से फंसाए गए लोगों की कानूनी मदद करने वाले संगठन 'रिहाई मंच' ने सैफुल्ला के परिजनों से मुलाकात कर उन्हें किसी के भी दबाव में न आने की बात कही। रिहाई मंच की ओर से मंच के अध्यक्ष एडवोकेट मो0 शुऐब, महासचिव राजीव यादव, शबरोज मोहम्मदी, प्रियंका शुक्ला, शरद जायसवाल, गुंजन सिंह, सेराज बाबा, फिरदौस सिद्दीकी, एखलाक चिश्ती, रजीउद्दीन और परवेज सिद्दीकी कानपुर गए थे।
कानपुर में सैफुल्ला के घर दौरे पर गए रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बातचीत में सैफुल्ला के भाई खालिद ने बताया कि किसी ने उन्हें फोन करके अपने को पुलिस अधिकारी बताया और कहा, तुम अपने भाई को समझाओ। हम तुम्हारी उससे बात करवाते हैं वो सरेंडर नहीं कर रहा है और शहादत देने की बात कर रहा है। इसके बाद खालिद ने बदहवासी में अपने भाई से जोर-जोर से सरेंडर कर देने की बात करता रहा, लेकिन उधर से कोई आवाज नहीं आ रही थी, जिसके बाद फोन कट गया।'
रिहाई मंच के पूछने पर कि उसे आपको भाई की आवाज सुनाई दे रही थी तो सैफुल्ला के भाई खालिद का जवाब था, 'भाई की आवाज नहीं सुनाई दे रही थी। सिर्फ गोलियों की आवाज ही सुनाई दे रही थी।'
रिहाई मंच के अध्यक्ष और लखनऊ हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील मोहम्मद शोएब कहते हैं, 'सैफुल्ला के कानपुर स्थित घर जाने से पहले हमारी टीम ने लखनऊ के ठाकुरगंज स्थित कथित मुठभेड़ स्थल का दौरा कर स्थानीय लोगों से बातचीत की।'
मोहम्मद शोएब के अनुसार, 'पुलिस ने लाउडस्पीकर पर सैफुल्ला के आत्मसमर्पण करने की बात कहने का दावा किया है। लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। सवाल उठता है कि तब पुलिस यह दावा क्यों कर रही है? क्या ऐसा करके वो इस कथित मुठभेड़ में हुई हत्या को विधिपूवर्क पूरा किए गए अपने कथित काउंटर अटैक का तार्किक परिणाम बताना चाहती है?'
Nov 2, 2016
राजीव यादव पर हमले का वीडियो आया सामने, देखिए पुलिसिया गुंडई का नंगा नाच
आतंकवाद के नाम पर फर्जी गिरफ्तारियों और मुठभेड़ों को लेकर करीब 5 वर्षों से सक्रिय रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव और शकील कुरैशी इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते रहे और पुलिस लात—घूसे और लाठियां बरसाती रही।
इस संगठन के अध्यक्ष और लखनऊ हाईकोर्ट के वकील मोहम्मद सोएब ने पिछले वर्षों में दर्जनों ऐसे बेगुनाह युवाओं को जेलों से बाहर निकाला और बाइज्जत बरी कराया है, जिनको पुलिस ने फर्जी तरीके से आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार किया था।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर उत्तर प्रदेश पुलिस का बर्बर हमला
राजीव यादव पर पुलिस द्वारा किए जानलेवा हमले में दर्ज हुई एफआईआर
दोपहर 3 बजे लखनउ के हजरतगंज चौराहे पर स्थित गांधी प्रतिमा पर धरना देने पहुंचे रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव और शकील कुरैशी पर पुलिस द्वारा जो जानलेवा हमला किया गया, उस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है। मुकदमा धारा 323 के तहत दर्ज हुआ है जबकि पुलिस की मार में राजीव यादव बुरी तरह जख्मी हैं, उनका सिर फट गया है और उन्हें ट्रामा सेंटर में भरती कराया गया है।
Jun 19, 2011
शिक्षा के व्यावसायीकरण पर गोष्ठी
लखनऊ . ‘शिक्षा के व्यावसायीकरण के प्रभाव’ विषय पर बीते 14 जुलाई को लखनऊ के बली प्रेक्षागृह में रीगल मावन सृजन संस्थान की ओर से सेमिनार का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता शिक्षाविद अरुणेश मिश्र ने की तथा संचालन किया संस्थान की महासचिव मंजू शुक्ला ने।इस मौके पर बोलते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने कहा कि शिक्षा का जिस तरह से बाजारीकरण हुआ है, उससे न सिर्फ शिक्षा की गुणवता प्रभावित हुई है बल्कि शिक्षित बेरोजगारों की बड़ी फौज खड़ी हो गई है। शिक्षा की सर्वग्राहिता ही समाप्त होती जा रही है। मौजूदा समय में शिक्षा एक खास वर्ग की जागीर बनती जा रही है। निजी स्कूलों की बाढ़ आ गई है, जहाँ न तो फीस का मानक तय है और न ही शिक्षण कार्य का। अच्छे स्कूल का मानक लम्बी फीस है। इसकी वजह से समाज का बड़ा हिस्सा शिक्षा से दूर होता जा रहा है। शिक्षा माफिया पैदा हो गये हैं जिनका मकसद मात्र धन उपार्जन है।
वरिष्ठ पत्रकार प्रभात रंजन दीन ने कहा कि आजादी के बाद से शिक्षा पर किसी ने घ्यान नहीं दिया। देश का निर्माण तभी संभव है जब सर्वग्राही स्कूलिंग की व्यवस्था की जाती और कारगर योजना बनाई जाती। 1952 में डॉ0 राममनोहर लोहिया ने इस ओर इशारा किया था और कहा था कि जो आजादी हमें मिली है, वह विखण्डित है। अब तो हर चीज के लिए हम अमरीका के मुखापेक्षी हो चुके हैं। मैकडोनल्ड की संस्कृति चारो तरफ फैल रही है, शिक्षा के क्षेत्र में भी इसने हाथ-पैर फैला दिये हैं।
कवि और जन संस्कृति मंच, लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि लोकतांत्रिक समाज में नागरिको को शिक्षा और चिकित्सा प्रदान करना राज्य की जिम्मेदारी है। आजादी के बाद हमारे यहाँ कल्याणकारी राज्य की घोषणा हुई और इस दिशा में कुछ कदम जरूर उठाये गये जो जरूरत को देखते हुए अपर्याप्त थे। पर आज तो वैश्वीकरण के इस दौर में उससे भी सरकार ने अपना हाथ खींच लिया है।
शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे मानव संस्कृति के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र को अमीरों व धन्नासेठों के हवाले कर दिया गया है। तथ्य तो यह है कि हमारी सरकार का रक्षा बजट दिन.दिन बढ़ता जा रहा है, वहीं शिक्षा व स्वास्थ्य पर बजट घटता जा रहा है। इन क्षेत्रों का सेवा, ज्ञान व संस्कृति के संवर्द्धन की जगह व्यवसाय में बदल जाना सरकार की उन अमीर परस्त. साम्राज्यपरस्त नीतियों की देन है। इसीलिए शिक्षा के व्यवसायीकरण के विरोध का मतलब इन नीतियों के विरुद्ध संघर्ष है। इस संदर्भ में रीगल मानव सृजन संस्थान का संघर्ष महत्वपूर्ण है। ऐसे संघर्ष को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
सेमिनार को एसके पाण्डेय, विश्वकांत मिश्रा, एससी यादव आदि शिक्षाविदों ने भी सम्बोधित किया। इस अवसर पर रीगल मानव सृजन संस्थान के बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया गया। यह संस्थान का चौथा वार्षिकोत्सव भी था। बच्चों ने ‘हम होंगे कामयाब’ पेश कर यह संदेश दिया कि संघर्ष और आशाएँ कभी खत्म नहीं होती हैं। मानव के अन्दर सृजन की अकूत संभावनाएँ हैं जिन्हें समझने और आगे बढ़ाने की जरूरत है। इस संदर्भ में संस्थान का चार साल का यह सफर मील के पत्थर की तरह है। विभिन्न प्रतियोगिताओं में विजयी बच्चों को पुरस्कृत भी किया गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम का संचालन सुधा राजपूत ने किया और अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन संस्थान की महासचिव मंजू शुक्ला ने दिया।
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