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Apr 4, 2017

पुलिस और जांच एजेंसियों की ड्यूटी बनती जा रही भाजपा की वफादारी

न पीपी पांडे जैसे पुलिस अफसर आसमान से टपकते हैं और न अमित शाह जैसे उनके राजनीतिक पैरोकार| उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने ठीक ही समाजवादी सरकार पर पुलिस थानों को पार्टी दफ्तरों के रूप में चलाने का आरोप लगाया था...

विकास नारायण राय, पूर्व आइपीएस 

सर्वोच्च न्यायालय में जूलियस रिबेरो की याचिका पर गुजरात के विवादास्पद डीजीपी पीपी पांडे को पद छोड़ना पड़ा और डीजीपी के पद पर सरकार को आनन-फानन में गीता जोहरी को बैठाना पड़ा. ऐसे में सवाल पूछा जा सकता है कि एक बदनाम हत्यारोपी पुलिस अफसर को, योग्यता और वरिष्ठता के मानदंडों को दरकिनार कर, राज्य पुलिस का मुखिया बनाने के पीछे क्या राजनीतिक सन्देश छिपा हुआ था | 

पांडे, अमित शाह के मोदी शासन में गुजरात के गृह राज्य मंत्री दौर में काफी समय तक राजनीतिक पुलिस मुठभेड़ों के लिए कुख्यात पुलिस अफसर वंजारा के वरिष्ठ रहे | बाद में इशरत जहान जैसे फर्जी मुठभेड़ कांडों में वे वंजारा के साथ गिरफ्तार किये गये और लम्बी जद्दोजहद के बाद जमानत मिलने पर कार्यवाहक डीजीपी बना दिए गये | जग जाहिर है कि आज तक भी गुजरात में शीर्ष पदों पर नियुक्तियां अमित शाह की मार्फत होती हैं | यानी प्रधानमंत्री मोदी की सुविधा को ध्यान में रखते हुए | पांडे को भी इस समीकरण के तहत ही डीजीपी बनाकर पुरस्कृत किया गया | 



मोदी-शाह की जोड़ी चाहती तो पांडे की हिंदुत्व के एजेंडे पर जेल जाने की भरपाई और तरह से भी कर सकती थी| पांडे के जमानत पर छूटने तक मोदी देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे और शाह काबिज थे भाजपा के शक्तिमान अध्यक्ष के पद पर| उन्होंने यदि पांडे को तब भी राज्य पुलिस का मुखिया ही बनाना तय किया तो इस तरह वे अपने वफादारों के लिए दो संदेश दे रहे थे| पहला यह कि वे अपने वफादारों की सेवाओं को पुरस्कृत करना कभी नहीं भूलते, हालाँकि यह संदेश पांडे को सूचना आयुक्त या निगरानी आयुक्त या लोक सेवा आयोग में पदस्थापित कर भी दिया जा सकता था| लिहाजा,इस सन्दर्भ में मोदी-शाह का दूसरा सन्देश ज्यादा महत्वपूर्ण था| अंधवफादारी के आगे वरिष्ठता, योग्यता या नेकनामी का कोई महत्व नहीं है।

केंद्र में सत्ता मिलने के बाद से मोदी-शाह को कहीं बड़े गेम खेलने पड़े हैं| गुजरात प्रकरणों में कांग्रेस ने भी सीबीआई की मार्फत शाह को जेल में रखा था और मोदी के पसीने छुड़ा दिए थे| दरअसल, यूपीए दो के दौर में मनमोहन सरकार को सत्ता में रखने में सीबीआई की बड़ी भूमिका रही- मायावती और मुलायम को जब-तब जेल का डर दिखाकर और अपने शासन के तरह-तरह के स्कैम में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश वाली जांचों को मन मुताबिक निर्देशित कर|

इस दौर में कांग्रेस सरकार ने सीबीआई को एपी सिंह और रंजीत सिन्हा के रूप में सीबीआई इतिहास के दो सर्वाधिक ‘लचीले’ डायरेक्टर दिए। फिलहाल,सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से इन दोनों के भ्रष्ट आचरण की जांच स्वयं सीबीआई को ही करनी पड़ रही है| इसी क्रम में मोदी-शाह ने भी गुजरात के ही एक जूनियर पुलिस अफसर राकेश अस्थाना को सीबीआई का कार्यवाहक डायरेक्टर बनाकर रखा| 

जाहिर है, पांडे जैसे ही इस ‘वफादार’ की मार्फत वे कांग्रेस से भी बढ़कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते रहे हों| सोचिये दांव पर कितना कुछ है कि यह सीनाजोरी तब की गयी जब भारत का मुख्य न्यायाधीश स्वयं सीबीआई का डायरेक्टर चुनने की समिति का हिस्सा होता है| अंततः उनका छद्म बहुत दिनों तक चला नहीं और सर्वोच्च न्यायालय के दखल के बाद वरिष्ठता के आधार पर एक नया डायरेक्टर लगाना पड़ा|

‘वफादारी’ का यह खेल उन्हें बेशक कांग्रेस ने सिखाया हो पर मोदी-शाह के तौर-तरीके कहीं अधिक निरंकुश हैं| उन्होंने सीबीआई के अलावा एकमात्र अन्य केन्द्रीय जांच एजेंसी एनआइए को भी पूरी तरह अपनी जकड़ में ले लिया है| कांग्रेस राज में एनआइएनेमालेगांव,समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद,अजमेर शरीफ जैसे आतंकी मामलों में भगवा आतंक का हाथ सिद्ध किया था और तदनुसार संघ के असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा समेत कई सदस्यों का अदालतों में चालान भी हुआ| 

केंद्र में मोदी सरकार बनते ही इन मुकदमों में अभियोजन के गवाहों को तोड़ने, संघी अभियुक्तों को जमानत दिलाने और उन्हें डिस्चार्ज कराने व बरी कराने का जिम्मा एनआइए के डायरेक्टर शरद कुमार ने उठा लिया| तब से असीमानंद अजमेर शरीफ मामले में बरी हो चुका है और प्रज्ञा को जमानत पर छोड़ने की अभूतपूर्व गुहार,जो स्वयं अभियोजक एजेंसी एनआइए कर चुकी है, अदालत ने ख़ारिज कर दी है| पुरस्कार स्वरूप शरद कुमार का सेवा काल दो वर्ष से लगातार बढ़ाया जा रहा है| 

मोदी-शाह को इसी स्तर की वफादारी चाहिए और इसलिए अपनी राजनीतिक साख की कीमत पर भी वे पीपी पांडे को गुजरात का एंटी करप्शन ब्यूरो के निदेशक बनाने से नहीं रुके| सोचिये, इस तरह उन्होंने शरद कुमार और राकेश अस्थाना जैसे कितने ही भावी ‘वफादारों’ को आश्वस्त किया होगा|

न पांडे जैसे पुलिस अफसर आसमान से टपकते हैं और न अमित शाह जैसे उनके राजनीतिक पैरोकार| उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने ठीक ही समाजवादी सरकार पर पुलिस थानों को पार्टी दफ्तरों के रूप में चलाने का आरोप लगाया था| हालाँकि वे भूल गए कि गुजरात में स्वयं उनकी पार्टी भी पुलिस का व्यापक दुरुपयोग करती रही है| आज स्वयं केंद्र में सीबीआई और एनआइए अमित शाह के इशारे पर चलने वाली जांच एजेंसियां बनी हुयी हैं| गुजरात पुलिस का तो कहना ही क्या!

Mar 10, 2017

सैफुल्ला के पिता ने की जांच की मांग

भाई ने उठाए पुलिसिया दावे पर सवाल

लखनऊ के ठाकुरगंज में आतंकी होने के आरोप में मारे गए सैफुल्ला के पिता सरताज ने बेटे के इनकाउंटर के जांच की मांग की है। उनका कहना है कि बेटे के आतंकी होने की खबर मीडिया से मिली। सच्चाई क्या है, यह तो जांच से ही पता चल सकता है..... 

रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बातचीत करते सैफुल्ला के भाई और पिता
उन्होंने यह भी कहा, 'अत्यधिक दबाव के चलते मैंने बेटे की लाश लेने से मना कर दिया, पर मैं मीडिया के सामने बार-बार पूरे मामले की जांच की मांग करता रहा। मीडिया ने उसे प्रसारित नहीं किया।'

रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बात करते हुए सैफुल्ला के पिता ने बार—बार कहा कि मैं अभी भी बहुत दबाव महसूस कर रहा हूं। हालांकि आतंक के मामले में फर्जी ढंग से फंसाए गए लोगों की कानूनी मदद करने वाले संगठन 'रिहाई मंच' ने सैफुल्ला के परिजनों से मुलाकात कर उन्हें किसी के भी दबाव में न आने की बात कही। रिहाई मंच की ओर से मंच के अध्यक्ष एडवोकेट मो0 शुऐब, महासचिव राजीव यादव, शबरोज मोहम्मदी, प्रियंका शुक्ला, शरद जायसवाल, गुंजन सिंह, सेराज बाबा, फिरदौस सिद्दीकी, एखलाक चिश्ती, रजीउद्दीन और परवेज सिद्दीकी कानपुर गए थे। 

कानपुर में सैफुल्ला के घर दौरे पर गए रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बातचीत में सैफुल्ला के भाई खालिद ने बताया कि किसी ने उन्हें फोन करके अपने को पुलिस अधिकारी बताया और कहा,  तुम अपने भाई को समझाओ। हम तुम्हारी उससे बात करवाते हैं वो सरेंडर नहीं कर रहा है और शहादत देने की बात कर रहा है। इसके बाद खालिद ने बदहवासी में अपने भाई से जोर-जोर से सरेंडर कर देने की बात करता रहा, लेकिन उधर से कोई आवाज नहीं आ रही थी, जिसके बाद फोन कट गया।'

रिहाई मंच के पूछने पर कि उसे आपको भाई की आवाज सुनाई दे रही थी तो सैफुल्ला के भाई खालिद का जवाब था, 'भाई की आवाज नहीं सुनाई दे रही थी। सिर्फ गोलियों की आवाज ही सुनाई दे रही थी।' 

रिहाई मंच के अध्यक्ष और लखनऊ हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील मोहम्मद शोएब कहते हैं, 'सैफुल्ला के कानपुर​ स्थित घर जाने से पहले हमारी टीम ने लखनऊ के ठाकुरगंज स्थित कथित मुठभेड़ स्थल का दौरा कर स्थानीय लोगों से बातचीत की।' 

मोहम्मद शोएब के अनुसार, 'पुलिस ने लाउडस्पीकर पर सैफुल्ला के आत्मसमर्पण करने की बात कहने का दावा किया है। लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। सवाल उठता है कि तब पुलिस यह दावा क्यों कर रही है? क्या ऐसा करके वो इस कथित मुठभेड़ में हुई हत्या को विधिपूवर्क पूरा किए गए अपने कथित काउंटर अटैक का तार्किक परिणाम बताना चाहती है?' 

Apr 17, 2010

जहां गुंडे भी विधायक हैं


अजय प्रकाश

‘चाचा हमार विधायक हउवें ना घबराइब हो, ए डब्बल चोटी वाली तहके टांग ले जाइब हो’- भारतीय राजनीति को जनता किस रूप में समझती है,भोजपुरी भाषी क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय यह गीत इसकी एक बानगी भर है। 

राजनीति में अपराध के बढ़े शेयर का न तो इससे बेहतर विश्लेषण हो सकता है और न ही इससे बड़ा तिरस्कार। अभी हालत यह है कि देश के सबसे बड़ी आबादी और विधानसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश के 40प्रतिशत से अधिक विधायक अपराधी हैं। जिनमें से ज्यादातर हत्या,बलात्कार, गैंगवार, फिरौती, राहजनी, उठाईगीर जैसे कई अपराधों में नामजद, सजायाफ्ता, नहीं तो भगोड़ा घोषित हैं।

कोलसला विधायक अजय राय :  गुंडा एक्ट के तहत गिरफ्तार करने पहुंची पुलिस
                                                                                                 फोटो- वाराणसी व्यू ब्लॉग  
ऐसे जनप्रतिनिधि जनता की भलाई कितना करते हैं, वह तो आंकड़ों में फंसकर फाइलों में दफ्न हो जाता है मगर इनकी गुंडई का असर लोगों में दिन-रात रहता है। सिर्फ मार्च महीने में प्रदेश के 6विधायकों श्रीपति आजाद,दीप नारायण सिंह, सुल्तान बेग, विजय कुमार मिश्रा, अजय राय और यशपाल रावत पर हत्या, हत्या का प्रयास, वाहन चोरी गैंग और अपहरण के मुकदमें दर्ज हुए हैं। समाजवादी पार्टी के महाराजगंज सदर के विधायक श्रीपती आजाद ने रामपुर बुजुर्ग गांव की एक विधवा महिला सावित्री देवी को सिर्फ इसलिए जला दिया कि वह अब उन्हें पसंद नहीं कर रही थी। वहीं संत रविदास नगर जिले के ग्यानपुर के सपा विधायक विजय कुमार मिश्रा वाहन चोर गैंग के नेता निकले तो बरेली जिले के कंवर क्षेत्र के सपा विधायक के खिलाफ चोर गैंग के सरगना होने का मुकदमा दर्ज हुआ।

वाराणसी के कोलासला क्षेत्र के विधायक अजय राय ने भानू प्रताप सिंह नाम के बीज व्यापारी को एक संपत्ति विवाद में 25 मार्च को जिंदा जला दिया। पुराने आपराधिक रिकॉर्ड वाले अजय राय 2007 चुनाव से पहले भाजपा में थे,चुनाव के वक्त सपा ने समर्थन दिया और फिलहाल कांगे्रसी कार्यकर्ताओं ने,गुंडा एक्ट में उन्हें गिरफ्तार किये जाने के बाद वाराणसी में खूब हंगामा किया। बाहुबली अजय राय प्रदेश के इकलौते नेता नहीं हैं जो अपराध की राजनीति के बदौलत प्रदेश की हर बड़ी पार्टी में रसूख रखते हैं। इस तरह के नेताओं की भरमार है जो पार्टियों में बेहतर राजनीति की पैरोकारी करने वालों को हाशिये पर डाल देते हैं और शीर्ष  नेताओं की क्षत्रछाया में मलाई मारते हैं। मुख्तार अंसारी, राजा भैया, अमरमणि त्रिपाठी, हरिशंकर तिवारी, अतिक अहमद, गुड्डु पंडित, डीपी यादव, अखिलेश सिंह जैसे नेता इस राजनीति के स्थापित नाम हैं।

उत्तर प्रदेश की मौजूदा विधानसभा में ‘जिसकी जितनी भागीदारी, उनके उतने हैं अपराधी’ वाली बात है। पिछले 2007के विधानसभा चुनावों में दलितों-ब्राम्हणों के गठजोड़ से ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली बसपा के 206 प्रतिनिधि हैं जिनमें से 71 पर आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का मुकदमा दर्ज है। जबकि प्रदेश को संभालने वाले कैबिनेट के मंत्रियों में अपराधिक छवि वाले कितने हैं उसका अंदाजा बुंदेलखंड क्षेत्र से आने वाले उन पांच  मंत्रियों से लगाया जा सकता है जिनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिस पर कि आपराधिक मुकदमा नहीं है। भाजपा से बसपा में आये और मौजुदा सरकार में लघु उद्योग मंत्री बने बादशाह सिंह पर लगभग डेढ़ दर्जन मुकदमें दर्ज हैं।

ऐसा भी नहीं है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपराधियों की भरमार एकाएक हो गयी है। पिछली विधानसभा में तो आधे से अधिक 403 में से 207 जनप्रतिनिधियों पर संगीन मुकदमें दर्ज थे जिसमें सर्वाधिक संख्या 84 सपा विधायकों की थी। वैसे भी सपा के बारे में राजनीतिक विश्लेषकों की आम राय रही है कि जब वह सत्ता में होती है तो अराजकता बढ़ जाती है। याद होगा कि मुलायम सिंह ने राजनीति में अपराधियों की बढ़ती तादाद के मद्देनजर मैनपुरी में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘अपराधियों को राजनीतिक तंत्र से खदेड़ने की जरूरत है और चाहिए कि असमाजिक तत्वों को जगह न दें। इसकी शुरूआत में अपनी पार्टी से करने जा रहा हूं।’प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की यह चिंता काबिले तारिफ थी लेकिन खालिश भाषण साबित हुई। मौजूदा विधानसभा में उनकी पार्टी के 97विधायकों में से 48 यानी आधे असमाजिक और आपरधिक टैग वाले हैं।

राजनीतिक सुचिता और शुद्धता पर सर्वाधिक शोर मचाने वाली पार्टी भाजपा के शाहाहाबाद क्षेत्र के विधायक कांशीराम दिवाकर पर बरेली के एक व्यापारी नरेंद्र सिंह ने हत्या और वसूली का मुकदमा दर्ज कराया है। प्रदेश में लगातार जनाधार खो रही भाजपा को आखिरकार अब आपराधिक राजनीति की वही राह चुननी पड़ी है,जिसका सिद्धांतों में ही सही वह विरोध करती रही है। इस बार विधानसभा में भाजपा के मात्र 50 विधायक ही पहुंच सकें हैं जिसमें से 19 अपराधियों की बिरादरी से आते हैं। अब कांग्रेस को देखें तो उत्तर  प्रदेश में उसके सबसे कम गुंडा विधायक हैं कि  सबसे कम 20 विधायक हैं।

प्रदेश की 403 सीटों वाली विधानसभा में 160 से उपर माफियाओं और अपराधियों की भागीदारी में जनता से जुड़े मुद्दे किस कदर हाशिये पर जाते हैं उसकी एक बानगी मौजूदा विधानसभा के चले सत्र को देखकर समझा जा सकता है। पूरे सत्र में एक सप्ताह भी सदन नहीं चला और न ही जनता से सीधे जुड़े किसी मसले पर चर्चा हो सकी। सवाल है कि जिस सत्र को कमसे कम साल में तीन महीने चलना चाहिए वह एक सप्ताह भी नहीं चलता है और विपक्ष इस पर विरोध की खानापूर्ति कर चुप्पी साध लेता है।