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Jun 27, 2017

आखिर आपातकाल की संभावनाओं से इनकार क्यों नहीं कर पाए आडवाणी

देश में बढ़ती हिंसा और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग की बढ़ती खबरों के बीच फिर से एक बार यह बहस चल पड़ी है कि देश क्या अघोषित आपातकाल की नाकाबंदी के दौर में ढकेला जा रहा है...
वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन का विश्लेषण
कल की रात 25 जून, 1975 आजाद भारत के इतिहास की वह तारीख है जब तत्कालीन हुकूमत ने देश में आपातकाल लागू कर लोकतंत्र और नागरिक आजादी को बंधक बना लिया था। पूरे बयालीस साल हो गए हैं उस दौर को, लेकिन उसकी काली यादें अब भी लोगों के जेहन में अक्सर ताजा हो उठती हैं। उन यादों को जिंदा रखने का काफी कुछ श्रेय उन लोगों को जाता है जो आज देश की हुकूमत चला रहे हैं। उनका अंदाज-ए-हुकूमत लोगों में आशंका पैदा करता रहता है कि देश एक बार फिर आपातकाल की ओर बढ रहा है।

दो साल पहले आपातकाल के चार दशक पूरे होने के मौके पर उस पूरे कालखंड को शिद्दत से याद करते हुए भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी देश में फिर से आपातकाल जैसे हालात पैदा होने का अंदेशा जताया था।
आडवाणी ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में देश को आगाह किया था कि लोकतंत्र को कुचलने में सक्षम ताकतें आज पहले से अधिक ताकतवर है और पूरे विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि आपातकाल जैसी घटना फिर दोहराई नहीं जा सकतीं। बकौल आडवाणी, 'भारत का राजनीतिक तंत्र अभी भी आपातकाल की घटना के मायने पूरी तरह से समझ नहीं सका है और मैं इस बात की संभावना से इनकार नहीं करता कि भविष्य में भी इसी तरह से आपातकालीन परिस्थितियां पैदा कर नागरिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है।
आज मीडिया पहले से अधिक सतर्क है, लेकिन क्या वह लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध भी है? कहा नहीं जा सकता। सिविल सोसायटी ने भी जो उम्मीदें जगाई थीं, उन्हें वह पूरी नहीं कर सकी हैं। लोकतंत्र के सुचारु संचालन में जिन संस्थाओं की भूमिका होती है, आज भारत में उनमें से केवल न्यायपालिका को ही अन्य संस्थाओं से अधिक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।' 

आपातकाल कैसा था और उसके मायने क्या हैं? दरअसल यह उस पीढी को नहीं मालूम जो सत्तर के दशक में या उसके बाद पैदा हुई है और आज या तो जवान है या प्रौढ हो चुकी है। लेकिन उस पीढी को यह जानना जरूरी है और उसे जानना ही चाहिए कि आपातकाल क्या था?
साठ और सत्तर के दशक में विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं खासकर समाजवादियों के बीच सरकार विरोधी दो नारे खूब प्रचलित थे। एक था- 'लाठी-गोली-सेंट्रल जेल, जालिमों का अंतिम खेल' और दूसरा था- 'दम है कितना दमन में तेरे, देखा है और देखेंगे-कितनी ऊंची जेल तुम्हारी, देखी है और देखेंगे।' दोनों ही नारे आपातकाल के दौर में खूब चरितार्थ हुए। विपक्षी दलों के तमाम नेता-कार्यकर्ता, सरकार से असहमति रखने वाले बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार, पत्रकार आदि जेलों में ठूंस दिए गए थे। यही नहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की रीति-नीति का विरोध करने वाले सत्तारूढ़ कांग्रेस के भी कुछ दिग्गज नेता जेल के सींखचों के पीछे भेज दिए गए थे।
दरअसल, बिहार और गुजरात के छात्र आंदोलनों ने इंदिरा गांधी की हुकूमत की चूलें हिला दी थीं और उसी दौरान समाजवादी नेता राजनारायण की चुनाव याचिका पर आए इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले ने आग में घी काम किया था। इसी सबसे घबराकर इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए देश पर आपातकाल थोपा था। इंदिरा गांधी इतनी सशंकित और भयाक्रांत हो चुकी थी कि आपातकाल लागू करने से कुछ घंटे पहले ही उन्होंने अपने विश्वस्त और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर रे से मंत्रणा के दौरान आशंका जताई थी कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की 'हेट लिस्ट' में हैं और कहीं ऐसा तो नहीं कि निक्सन उनकी सरकार का भी उसी तरह तख्ता पलट करवा दे, जैसा कि उन्होंने चिली के राष्ट्रपति सल्वादोर अलेंदे का किया है।
उन्हें इस बात की भी शंका थी कि उनके मंत्रिमंडल में शामिल कुछ लोग सीआईए के एजेंट हो सकते हैं। उनके शक और डर का आलम यह था कि उन्होंने उस समय के उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बंगले पर भी जासूसी के लिए आईबी का डीएसपी रैंक का अधिकारी तैनात कर दिया था।
आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। अभिव्यक्ति का ही नहीं, लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं रह गया। 25 जून की रात से ही देश भर में विपक्षी नेताओं-कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का दौर शुरू हो गया। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरणसिंह, मधु लिमए, अटलबिहारी वाजपेयी, बीजू पटनायक, लालकृष्ण आडवाणी, मधु दंडवते आदि तमाम विपक्षी नेता मीसा यानी आंतरिक सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर लिए। जो लोग पुलिस से बचकर भूमिगत हो गए, पुलिस ने उनके परिजनों को परेशान करना शुरू कर दिया। किसी के पिता को, तो किसी की पत्नी या भाई को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी का आधार तैयार करने के लिए तरह-तरह के मनगढ़ंत और अविश्सनीय हास्यास्पद आरोप लगाए गए।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रघुवंश को रेल की पटरियां उखाड़ने का आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया। जबकि हकीकत यह थी कि उनके दोनों हाथ भी ठीक से काम नहीं करते थे। इसी तरह मध्य प्रदेश के एक बुजुर्ग समाजवादी कार्यकर्ता पर आरोप लगाया गया कि वे टेलीफोन के खंभे पर चढ़कर तार काट रहे थे। प्रख्यात कवयित्री महादेवी वर्मा को उनकी लिखी बहुत पुरानी एक कविता का मनमाना अर्थ लगाकर गिरफ्तार करने की तैयारी इलाहबाद के जिला प्रशासन ने कर ली थी। लेकिन जब श्रीमती गांधी को उनके करीबी एक पत्रकार ने यह जानकारी देने के साथ ही याद दिलाया कि महादेवी जी पंडित नेहरू को अपने भाई समान मानती थीं, तब कहीं जाकर श्रीमती गांधी के हस्तक्षेप से उनकी गिरफ्तारी रुकी। 

बात गिरफ्तारी तक ही सीमित नहीं थी, जेलों में बंद कार्यकर्ताओं को तरह-तरह से शारीरिक और मानसिक यातनाएं देने का सिलसिला भी शुरू हो गया। कहीं-कहीं तो निर्वस्त्र कर पिटाई करने, पेशाब पिलाने, उन्हें खूंखार अपराधी और मानसिक रुप से विक्षिप्त कैदियों के साथ रखने और उनकी बैरकों सांप-बिच्छू और पागल कुत्ते छोड़ने जैसे हथकंडे भी अपनाए गए। ऐसी ही यातनाओं के परिणामस्वरुप कई लोगों की जेलों में ही मौत हो गई, तो कई लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हो गए।
सोशलिस्ट पार्टी की कार्यकर्ता रहीं कन्नड़ फिल्मों की अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी का नाम ऐसे ही लोगों में शुमार है, जिनकी मौत जेल में हो गई थी। समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडिस आपातकाल की घोषणा होते ही भूमिगत हो गए थे और उन्होंने अपने कुछ अन्य भूमिगत सहयोगियों की मदद से तानाशाही का मुकाबला करने का कार्यक्रम बनाया था। सरकार उनके इस अभियान को लेकर बुरी तरह आतंकित थी, लिहाजा जार्ज की गिरफ्तारी के लिए दबाव बनाने के मकसद से उनके भाई लॉरेंस और माइकल फर्नांडिस को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उनसे जार्ज का सुराग लगाने के लिए उन्हें जेल में बुरी तरह से यातनाएं दी गईं।
कई मीसा बंदियों ने अपने-अपने राज्यों के हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी, लेकिन सभी स्थानों पर सरकार ने एक जैसा जवाब दिया कि आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निलंबित है और इसलिए किसी भी बंदी को ऐसी याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है। जिन हाईकोर्टों ने सरकारी आपत्ति को रद्द करते हुए याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय दिए, सरकार ने उनके विरुद्ध न केवल सुप्रीम कोर्ट में अपील की बल्कि उसने इन याचिकाओं के पक्ष में फैसला देने वाले न्यायाधीशों को दंडित भी किया।
असुरक्षा बोध से बुरी तरह ग्रस्त श्रीमती गांधी को उस दौर में अगर सर्वाधिक विश्वास किसी पर था तो वह थे उनके छोटे बेटे संजय गांधी। संविधानेत्तर सत्ता केंद्र के तौर उभरे संजय गांधी आपातकाल के पूरे दौर में सरकारी आतंक के पर्याय बन गए थे। सबसे पहले उन्होंने दिल्ली को सुंदर बनाने का बीड़ा उठाया। इस सिलसिले में उनके बदमिजाज आवारा दोस्तों की सलाह पर दिल्ली को सुंदर बनाने के नाम पर लालकिला और जामा मस्जिद के नजदीक तुर्कमान गेट के आसपास की बस्तियों को बुलडोजरों की मदद से उजाड़ दिया गया, जिससे बड़ी तादाद में लोग बेघर हो गए। कुछ लोगों ने प्रतिरोध करने की कोशिश की तो उन्हें गोलियों से भून दिया गया।
अपनी प्रगतिशील छवि बनाने के लिए संजय गांधी ने उस दौर में इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय कार्यक्रम से इतर पांच सूत्रीय कार्यक्रम पेश किया था, जिसके प्रचार-प्रसार में पूरी सरकारी मशीनरी झोंक दी गई थी। उस बहुचर्चित पांच सूत्रीय कार्यक्रम में सबसे ज्यादा जोर परिवार नियोजन पर था। इस कार्यक्रम पर अमल के लिए पुरुषों और महिलाओं की नसबंदी के लिए पूरा सरकारी अमला झोंक दिया गया था अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए जिला कलेक्टरों और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों पर ज्यादा से ज्यादा लोगों की नसबंदी करने का ऐसा जुनून सवार हुआ कि वे पुलिस की मदद से रात में गांव के गांव घिरवाकर लोगों की बलात नसबंदी कराने लगे। आंकड़े बढ़ाने की होड़ के चलते इस सिलसिले में बूढ़ों-बच्चों, अविवाहित युवक-युवतियों तक की जबरन नसबंदी करा दी गई। सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई थी, लेकिन कहीं से भी प्रतिरोध की कोई आवाज नहीं उठ रही थी।
उस कालखंड की ऐसी हजारों दारुण कथाएं हैं। कुल मिलाकर उस दौर में हर तरफ आतंक, अत्याचार और दमन का बोलबाला था। सर्वाधिक परेशानी का सामना उन परिवारों की महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को करना पड़ा, जिनके घर के कमाने वाले सदस्य बगैर किसी अपराध के जेलों मे ठूंस दिए गए थे। आखिरकार पूरे 21 महीने बाद जब चुनाव हुए तो जनता ने अपने मताधिकार के जरिए इस तानाशाही के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से ऐतिहासिक बगावत की और देश को आपातकाल के अभिशाप से मुक्ति मिली। लेकिन उन 21 महीनों में जो जख्म देश के लोकतंत्र को मिले उनमें से कई जख्म आज भी हरे हैं।
यह सच है कि आपातकाल के बाद से अब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था तो चली आ रही है। हालांकि सरकारों की जनविरोधी विरोधी नीतियों के प्रतिरोध का दमन करने की प्रवृत्ति अभी भी कायम है, लेकिन किसी भी सरकार ने नागरिक अधिकारों के हनन का वैसा दुस्साहस नहीं किया है, जैसा आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी और उनकी सरकार ने किया था।

May 17, 2017

अभियुक्त शिवराज को होना था लेकिन फंस रहे दिग्विजय सिंह

एमपी अजब है, एमपी गजब है। घोटाला और कोई करता है और फंसता कोई और नजर आता है। मध्य प्रदेश के भाजपाई पिछले ​कुछ दिनों से ऐसे पेश आ रहे हैं मानो व्यापमं घोटाला भाजपा सरकार में नहीं कांग्रेस सरकार में हुआ है और उसके जिम्मेदार 'बेचारे' दिग्विजय सिंह हैं...
जावेद अनीस

मई का महीना मुख्यमंत्री शिवराज के लिए राहत भरी खबर लाया है। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह व्यापम घोटाले में शिवराज सिंह चौहान के सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप लगाते आ रहे हैं, लेकिन इस मामले में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर करके कहा है कि सबूत के तौर पर जिस सीडी और पेन ड्राइव को पेश किया गया था वे फर्जी पाए गये हैं। 


सीबीआई का कहना है कि इसमें याचिकाकर्ताओं द्वारा  छेड़छाड़ की गयी है, जिसके बाद भाजपा इसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को क्लीनचिट दिए जाने के तौर पर पेश कर रही है। सीबीआई के हलफनामे के बाद सूबे में सियासत गर्माई हुई है और व्यापम घोटाले ने एक बार फिर नया मोड़ लेता जा रहा है। एक तरफ भाजपा कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग कर रही है, वहीं कांग्रेस का कहना है कि क्लीनचिट देने का काम अदालत का है सीबीआई का नहीं।


सूत्रों के मुताबिक व्यापमं घोटाले को लेकर सीबीआई की जांच का ट्रेक बदल सकता है, इससे याचिकाकर्ता दिग्विजय सिंह की मुश्किल में पड़ सकते हैं क्योंकि सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है वह इस मामले में दिग्विजय सिंह और दूसरों के खिलाफ कार्यवाही कर सकती है. 

व्यापमं घोटाले में भाजपा पहली बार इतनी आक्रमक नजर आ रही है। मप्र सरकार के तीन वरिष्ठ  मंत्रियों द्वारा बाकायदा सीबीआई को ज्ञापन सौंपकर दिग्विजिय सिंह और दो व्हिसल ब्लोअर के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की गयी है। कांग्रेस की तरफ से इस मुद्दे पर  पलटवार भी किया गया है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा है कि व्यापम के मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह कभी क्लीन नहीं हो सकते, क्योंकि इस दौरान वही मुख्यमंत्री रहे हैं। जब इस दौरान की सभी उपलब्धियां उनके खाते में हैं, तो व्यापम घोटाले की कालिख से वे कैसे बच सकते हैं? 

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री खुद विधानसभा में 1000 प्रकरणों में गड़बड़ी होना स्वीकार चुके हैं, जिसमें 2500 से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें से 21 सौ से ज्यादा को गिरफ्तार किया गया, वहीं चार सौ से ज्यादा अब भी फरार हैं। इस  मामले से जुड़े 50 से ज्यादा लोगों की मौत भी हो चुकी है,आज भी सैकडों लोग जेल में नही हैं। अजय सिंह ने मांग की है कि  अगर सीबीआई वाकई में सच्चाई सामने लाना चाहती है तो उसे मुख्यमंत्री, उनकी पत्नी और जेल से छूटे पूर्व मंत्रियों का नार्को टेस्ट कराना चाहिए। ज्योतिरादत्यि सिंधिया ने भी उनका बचाव करते हुए कहा है कि, व्यापमं एक बहुत बड़ा घोटाला है सीबीआई ने अपने हलफनामे में शिवराज सिंह को क्लीनचिट दे दी हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना अभी बाकी है।

इससे पूर्व इस साल मार्च के आखिरी दिनों में विधानसभा में कैग की रिपोर्ट सामने आयी थी जिसमें व्यापमं को लेकर शिवराज सिंह की सरकार पर कई गंभीर सवाल उठाये गये थे। इस रिपोर्ट में 2004 से 2014 के बीच के दस सालों की व्यापमं की कार्यप्रणाली को लेकर सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए बताया गया था कि कैसे इसकी पूरी प्रक्रिया अपारदर्शी थी और बहुत ही सुनियोजित तरीके से नियमों को ताक पर रख दिया था।

रिपोर्ट के अनुसार व्यापमं का काम केवल प्रवेश परीक्षाएं आयोजित कराना था, लेकिन वर्ष 2004 के बाद वो भर्ती परीक्षाएं आयोजित करने लगा, इसके लिये व्यापमं के पास ना तो कोई विशेषज्ञता थी और ना ही इसके लिए म.प्र. लोकसेवा आयोग या किसी अन्य एजेंसी से परामर्श लिया गया। यहाँ तक कि इसकी जानकारी तकनीकी शिक्षा विभाग को भी नहीं दी गई और इस तरह से राज्य कर्मचारी चयन आयोग की अनदेखी करके राज्य सरकार ने व्यापमं को सभी सरकारी नियुक्तियों का काम दे दिया और राज्य सेवा में से इसमें शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गयी। 

रिपोर्ट के अनुसार व्यापमं घोटाला सामने आने के बाद भी व्यावसायिक परीक्षा मंडल में परीक्षा लेने के लिए कोई नियामक ढांचा नहीं था। रिपोर्ट में जो सबसे खतरनाक बात बतायी गयी है वो यह है कि प्रदेश सरकार ने कैग को व्यापमं से सम्बंधित दस्तावेजों की जांच की मंजूरी देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि व्यापमं सरकारी संस्था नहीं है, जबकि व्यापमं पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में काम करने वाली संस्था थी।

‘कैग’ की रिपोर्ट ने कांग्रेस को हमलावर होने का मौका दे दिया था विपक्ष के नेता अजय सिंह ने शिवराज सिंह का इस्तीफ़ा मांगते हुए कहा था कि, अब यह सवाल नहीं है कि मुख्यमंत्री व्यापमं घोटाले में दोषी हैं या नहीं, लेकिन यह तो स्पष्ट हो चुका है कि यह घोटाला उनके 13 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ है, उनके एक मंत्री सहित भाजपा के पदाधिकारी जेल जा चुके हैं और उनके बड़े नेताओं से लेकर संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी सब जाँच के घेरे में हैं। इसलिए अब उन्हें मुख्यमंत्री चौहान के इस्तीफे से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। 

दूसरी तरफ  भाजपा ने उलटे 'कैग' जैसी संवैधानिक संस्था पर निशाना साधा था और कैग द्वारा मीडिया को जानकारी दिए जाने को ‘सनसनी फैलाने वाला कदम बताते हुए उस पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का आरोप लगाया था। 

व्यापमं घोटाले ने मध्य प्रदेश को देश ही नहीं, पूरी दुनिया में बदनाम किया है। यह भारत के सबसे बड़े और अमानवीय घोटालों में से एक है, जिसने सूबे के लाखों युवाओं के अरमानों और कैरियर के साथ खिलवाड़ करने का काम किया है। इस घोटाले की चपेट में आये ज्यादातर युवा गरीब, किसान, मजदूर और मध्यम वर्गीय परिवारों से हैं जो तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपना पेट काटकर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं जिससे उनके बच्चे अच्छी उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन में स्थायित्व ला सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें।

बहुत ही सुनियोजित तरिके से चलाये गये इस गोरखधंधे में मंत्री से लेकर आला अफसर तक शामिल पाए गये। इसके छीटें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक भी गए। व्यापमं घोटाले की परतें खुलने के बाद इस घोटाले से जुड़े लोगों की असामयिक मौतों का सिलसिला सा चल पड़ा। लेकिन इन सबका शिवराज सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। शुरुआत में तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस घोटाले की जांच एसआईटी से ही कराने पर अड़े रहे, लेकिन एक के बाद एक मौतों और राष्ट्रीय -अंतराष्ट्रीय मीडिया ने जब इस मुद्दे की परतें खोलनी शुरू की तो उन्हें सीबीआई जाँच की अनुशंसा के लिए मजबूर होना पड़ा।

मामला सीबीआई के हाथों में जाने के बाद व्यापमं का मुद्दा शांत पड़ने लगा था, मीडिया द्वारा भी इसकी रिपोर्टिंग लगभग छोड़ दी गयी। उधर एक के बाद एक चुनाव/ उपचुनाव जीतकर शिवराज सिंह चौहान अपनी स्थिति मजबूत करते जा रहे थे। मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा यह दावा किया जाने लगा था कि व्यापमं घोटाले का शिवराज की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं हुआ है। कुल मिलकर मामला लगभग ठंडा पड़ चुका था, विपक्ष थक चुका था और सरकार से लेकर संगठन तक सभी राहत मना रहे थे।

इसे केवल एक घोटाले के रूप में नहीं, बल्कि राज्य समर्थित नकल उद्योग के रूप में देखा जात है, जिसने हजारों नौजवानों का कैरियर खराब कर दिया। व्यापमं घोटाले का खुलासा 2013 में तब हुआ, जब पुलिस ने एमबीबीएस की भर्ती परीक्षा में बैठे कुछ फर्जी छात्रों को गिरफ्तार किया। ये छात्र दूसरे छात्रों के नाम पर परीक्षा दे रहे थे। बाद में पता चला कि प्रदेश में सालों से एक बड़ा रैकेट चल रहा है, जिसके अंतर्गत फर्जीवाड़ा करके सरकारी नौकरियों रेवड़ियों की तरह बांटी गयीं हैं। 

मामला उजागर होने के बाद व्यापमं मामले से जुड़े 50 से ज्यादा अभियुक्तों और गवाहों की रहस्यमय ढंग से मौत हो चुकी है जो इसकी भयावहता को दर्शाता है। इस मामले में 21 सौ से ज्यादा को गिरफ्तारियाँ हुई हैं, लेकिन जो गिरफ्तारियां हुई हैं, उनमें ज्यादातर या तो छात्र शामिल हैं या उनके अभिभावक या बिचौलिये। बड़ी मछलियाँ तो बची ही रह गयी हैं। हालांकि 2014 में मध्य प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा जरूर गिरफ्तार हुए थे जिन पर व्यापमं के मुखिया के तौर पर इस पूरे खेल में सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप था, लेकिन दिसम्बर 2015 में वे रिहा भी हो गये थे. पहले पुलिस फिर विशेष जांच दल और अब सीबीआई द्वारा इस मामले की जांच की जा रही है, लेकिन अभी तक इस महाघोटाले के पीछे के असली ताकतों के बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका है. 

2017 व्यापम के लिए बहुत नाटकीय साबित हो रहा है। पहले तो कैग रिपोर्ट में सीधे तौर पर शिवराज सरकार की मंशा पर सवाल उठाये गये थे, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई का हलफनामा आया है जिसमें आरोप लगाने वाले ही घेरे में नजर आ रहे हैं, ऐसा लगता है पूरा मामला गोल पहिये पर सवार हो चुका है। जाहिर है इस महाघोटाले के पीड़ितों के लिए इंसाफ के दिन अभी दूर हैं।   
edtorjanjwar@gmail.com

Apr 4, 2017

पुलिस और जांच एजेंसियों की ड्यूटी बनती जा रही भाजपा की वफादारी

न पीपी पांडे जैसे पुलिस अफसर आसमान से टपकते हैं और न अमित शाह जैसे उनके राजनीतिक पैरोकार| उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने ठीक ही समाजवादी सरकार पर पुलिस थानों को पार्टी दफ्तरों के रूप में चलाने का आरोप लगाया था...

विकास नारायण राय, पूर्व आइपीएस 

सर्वोच्च न्यायालय में जूलियस रिबेरो की याचिका पर गुजरात के विवादास्पद डीजीपी पीपी पांडे को पद छोड़ना पड़ा और डीजीपी के पद पर सरकार को आनन-फानन में गीता जोहरी को बैठाना पड़ा. ऐसे में सवाल पूछा जा सकता है कि एक बदनाम हत्यारोपी पुलिस अफसर को, योग्यता और वरिष्ठता के मानदंडों को दरकिनार कर, राज्य पुलिस का मुखिया बनाने के पीछे क्या राजनीतिक सन्देश छिपा हुआ था | 

पांडे, अमित शाह के मोदी शासन में गुजरात के गृह राज्य मंत्री दौर में काफी समय तक राजनीतिक पुलिस मुठभेड़ों के लिए कुख्यात पुलिस अफसर वंजारा के वरिष्ठ रहे | बाद में इशरत जहान जैसे फर्जी मुठभेड़ कांडों में वे वंजारा के साथ गिरफ्तार किये गये और लम्बी जद्दोजहद के बाद जमानत मिलने पर कार्यवाहक डीजीपी बना दिए गये | जग जाहिर है कि आज तक भी गुजरात में शीर्ष पदों पर नियुक्तियां अमित शाह की मार्फत होती हैं | यानी प्रधानमंत्री मोदी की सुविधा को ध्यान में रखते हुए | पांडे को भी इस समीकरण के तहत ही डीजीपी बनाकर पुरस्कृत किया गया | 



मोदी-शाह की जोड़ी चाहती तो पांडे की हिंदुत्व के एजेंडे पर जेल जाने की भरपाई और तरह से भी कर सकती थी| पांडे के जमानत पर छूटने तक मोदी देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे और शाह काबिज थे भाजपा के शक्तिमान अध्यक्ष के पद पर| उन्होंने यदि पांडे को तब भी राज्य पुलिस का मुखिया ही बनाना तय किया तो इस तरह वे अपने वफादारों के लिए दो संदेश दे रहे थे| पहला यह कि वे अपने वफादारों की सेवाओं को पुरस्कृत करना कभी नहीं भूलते, हालाँकि यह संदेश पांडे को सूचना आयुक्त या निगरानी आयुक्त या लोक सेवा आयोग में पदस्थापित कर भी दिया जा सकता था| लिहाजा,इस सन्दर्भ में मोदी-शाह का दूसरा सन्देश ज्यादा महत्वपूर्ण था| अंधवफादारी के आगे वरिष्ठता, योग्यता या नेकनामी का कोई महत्व नहीं है।

केंद्र में सत्ता मिलने के बाद से मोदी-शाह को कहीं बड़े गेम खेलने पड़े हैं| गुजरात प्रकरणों में कांग्रेस ने भी सीबीआई की मार्फत शाह को जेल में रखा था और मोदी के पसीने छुड़ा दिए थे| दरअसल, यूपीए दो के दौर में मनमोहन सरकार को सत्ता में रखने में सीबीआई की बड़ी भूमिका रही- मायावती और मुलायम को जब-तब जेल का डर दिखाकर और अपने शासन के तरह-तरह के स्कैम में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश वाली जांचों को मन मुताबिक निर्देशित कर|

इस दौर में कांग्रेस सरकार ने सीबीआई को एपी सिंह और रंजीत सिन्हा के रूप में सीबीआई इतिहास के दो सर्वाधिक ‘लचीले’ डायरेक्टर दिए। फिलहाल,सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से इन दोनों के भ्रष्ट आचरण की जांच स्वयं सीबीआई को ही करनी पड़ रही है| इसी क्रम में मोदी-शाह ने भी गुजरात के ही एक जूनियर पुलिस अफसर राकेश अस्थाना को सीबीआई का कार्यवाहक डायरेक्टर बनाकर रखा| 

जाहिर है, पांडे जैसे ही इस ‘वफादार’ की मार्फत वे कांग्रेस से भी बढ़कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते रहे हों| सोचिये दांव पर कितना कुछ है कि यह सीनाजोरी तब की गयी जब भारत का मुख्य न्यायाधीश स्वयं सीबीआई का डायरेक्टर चुनने की समिति का हिस्सा होता है| अंततः उनका छद्म बहुत दिनों तक चला नहीं और सर्वोच्च न्यायालय के दखल के बाद वरिष्ठता के आधार पर एक नया डायरेक्टर लगाना पड़ा|

‘वफादारी’ का यह खेल उन्हें बेशक कांग्रेस ने सिखाया हो पर मोदी-शाह के तौर-तरीके कहीं अधिक निरंकुश हैं| उन्होंने सीबीआई के अलावा एकमात्र अन्य केन्द्रीय जांच एजेंसी एनआइए को भी पूरी तरह अपनी जकड़ में ले लिया है| कांग्रेस राज में एनआइएनेमालेगांव,समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद,अजमेर शरीफ जैसे आतंकी मामलों में भगवा आतंक का हाथ सिद्ध किया था और तदनुसार संघ के असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा समेत कई सदस्यों का अदालतों में चालान भी हुआ| 

केंद्र में मोदी सरकार बनते ही इन मुकदमों में अभियोजन के गवाहों को तोड़ने, संघी अभियुक्तों को जमानत दिलाने और उन्हें डिस्चार्ज कराने व बरी कराने का जिम्मा एनआइए के डायरेक्टर शरद कुमार ने उठा लिया| तब से असीमानंद अजमेर शरीफ मामले में बरी हो चुका है और प्रज्ञा को जमानत पर छोड़ने की अभूतपूर्व गुहार,जो स्वयं अभियोजक एजेंसी एनआइए कर चुकी है, अदालत ने ख़ारिज कर दी है| पुरस्कार स्वरूप शरद कुमार का सेवा काल दो वर्ष से लगातार बढ़ाया जा रहा है| 

मोदी-शाह को इसी स्तर की वफादारी चाहिए और इसलिए अपनी राजनीतिक साख की कीमत पर भी वे पीपी पांडे को गुजरात का एंटी करप्शन ब्यूरो के निदेशक बनाने से नहीं रुके| सोचिये, इस तरह उन्होंने शरद कुमार और राकेश अस्थाना जैसे कितने ही भावी ‘वफादारों’ को आश्वस्त किया होगा|

न पांडे जैसे पुलिस अफसर आसमान से टपकते हैं और न अमित शाह जैसे उनके राजनीतिक पैरोकार| उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने ठीक ही समाजवादी सरकार पर पुलिस थानों को पार्टी दफ्तरों के रूप में चलाने का आरोप लगाया था| हालाँकि वे भूल गए कि गुजरात में स्वयं उनकी पार्टी भी पुलिस का व्यापक दुरुपयोग करती रही है| आज स्वयं केंद्र में सीबीआई और एनआइए अमित शाह के इशारे पर चलने वाली जांच एजेंसियां बनी हुयी हैं| गुजरात पुलिस का तो कहना ही क्या!

Jan 29, 2017

पंजाब हारेंगे तो केजरीवाल जिम्मेदार


पंजाब में चुनाव प्रचार अपने पूरे चरम पर है । किसी समय इकतरफा आम आदमी पार्टी की झोली में जाते दिख रहे पंजाब में कांग्रेस ने तेजी से ना सिर्फ वापसी की है, बल्कि पंजाब के राजनीतिक हलकों और जनता की  बहस में कांग्रेस की सरकार बनने के भी कयास  लगाए जा रहे हैं।

आप कार्यकर्ताओं की मानें तो पंजाब में आम आदमी पार्टी की इस हालत के लिए अरविन्द केजरीवाल खुद जिम्मेवार हैं। पिछले लोकसभा चुनावों में  जब अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी थी, यहां तक कि दिल्ली में भी उनकी पार्टी बुरी तरह हारी, ऐसे में पंजाब ने अप्रत्याशित रूप से 4 लोकसभा सांसद देकर मरणासन्न पड़ी पार्टी में न सिर्फ  संजीवनी बूटी देकर बचाने का काम किया, बल्कि कांग्रेस और अकाली में से किसी एक को हर बार चुनने को मजबूर जनता के सामने एक नया विकल्प पेश किया.

जनता ने आप को हाथोंहाथ लिया। हजारों की संख्या में नए कार्यकर्ता बने, जिन्होंने पंजाब में अपने स्थानीय नेतृत्व में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए काम करना शुरू किया। इनमें से जस्सी जसराज भगवंत मान ,एच एस फुलका, डॉ. धर्मवीर गांधी लोकप्रिय नेता बनके उभरे।  वहीं से आगामी मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन होगा, इसको लेकर चर्चाएं और गुटबाजी शुरू हो गई । पार्टी के पिछले लोकसभा चुनावों में प्रत्याशी रहे पार्टी के एक सदस्य ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि कुछ एक हिस्सों को छोड़कर  पंजाब में किसी पार्टी की लहर नहीं है और इस समय पार्टी को कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिल रही है ।

केजरीवाल को पिछले 2 सालों से एक ही चिंता सताए जा रही है कि कहीं ऐसा न हो कि आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद पंजाब का नेतृत्व उन्हें दरकिनार कर दे। उनका सारा ध्यान इसी में लगा रहा कि पंजाब के उभर रहे नेताओं का कद किस तरह कम किया जाए और कैसे चुनावों के बाद पंजाब सरकार हर काम  दिल्ली हाईकमान के निर्देशानुसार करे। इन्हीं सब कारणों से पार्टी को पंजाब में गंभीर नुकसान पहुँचने के कयास लगाए जा रहे हैं।

केजरीवाल की सबसे बड़ी गलती थी पंजाब के स्थानीय नेतृत्व को बड़े कद का होने से रोकना और पंजाब के हर निर्णय को खुद बिना स्थानीय नेतृत्व से सलाह किए बिना पंजाब पर थोपना। इसी से नाराज होकर पंजाब के एक बड़े नेता एच एस फुल्का जिनका नाम उस समय मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में था पार्टी के सभी पदों  व सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। पंजाब के इस समय पार्टी के सबसे बड़े नेता भगवंत मान का एक ऑडियो क्लिप आया था, जिसमें वे पटियाला के सांसद धर्मवीर गांधी को पंजाब और स्थानीय नेतृत्व को लेकर केजरीवाल की जमकर आलोचना कर रहे हैं।

पंजाब को पूरी तरह दिल्ली के नियंत्रण में रखने के लिए पंजाब के आब्जर्वर संजय सिंह और दुर्गेश पाठक को ख़ास निर्देशों के तहत ऐसे नए चेहरों की तलाश करने के लिए कहा गया, जो किसी भी तरह से स्थानीय नेताओं के प्रभाव में न हो। यहां तक कि युवाओं का घोषणापत्र जिसमें स्वर्ण मंदिर पर झाड़ू की तस्वीर थी, पंजाब में बिना किसी को दिखाए बिना पंजाब में  किसी से सलाह मशविरा किए दिल्ली से जारी किया गया और नाराजगी दिखाने पर प्रदेश संयोजक सुचा सिंह छोटेपुर को दिल्ली की टीम ने साजिश के तहत बाहर किया गया । 

आप पंजाब के एक बड़े नेता और भटिंडा से लोकसभा के उम्मीदवार जस्सी जसराज ने इन दोनों पर बड़ा आरोप लगाया। पार्टी के पुराने मेहनतकश कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर सिर्फ पैसे और रसूख के दम पर लोगों को पार्टी में ऊँचे पद देने का इल्जाम लगाया. उन्होंने टिकट वितरण में भी इन दोनों नेताओं पर बड़े पैमाने पर भ्र्ष्टाचार करने और पैसे के बदले टिकट देने का आरोप लगाया ।

उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में  पुराने कांग्रेस और अकाली नेताओं जिन्होंने  पूरी उम्र भ्र्ष्टाचार करके पैसा कमाया है और जिनका जनसंघर्षों से दूर दूर तक कोई नाता नहीं रहा जो चुनाव से थोड़ा वक़्त पहले ही टिकट के लिए आए हैं और जिन्होंने लोकसभा चुनावों में पार्टी को वोट देना तो दूर आम आदमी पार्टी के खिलाफ जनता में जमकर जहर उगला था वे कैसे ईमानदार हो गए । पार्टी में 50 से ज्यादा ऐसे लोगों को टिकट दिया गया है जो या तो लंबे समय तक  अकाली या कांग्रेस पार्टी और सरकार में मलाईदार पदों पर रहे हैं या बस अपने पैसे और रसूख के दम पर टिकट के आश्वासन पर चुनावों से कुछ समय  पहले पार्टी में आए हैं 

पार्टी के अन्य  नेताओं का कहना है केजरीवाल से इस तरह की बेवकूफियों और गलतियों  की उम्मीद नहीं थी. पंजाब में नियुक्त 52 ओबजरवेर्स में से 50 को पंजाबी न बोलनी आती है ,न वे समझ सकते हैं, न ही उन्हें पंजाब की राजनीति के बारे में कुछ पता है। जिस कारण यहां के कार्यकर्ताओं और दिल्ली से भेजे गए आब्जर्वर के बीच एक बड़ी संवादहीनता रही है और वो कार्यकर्ताओं व आम जनता में काम करने की बजाए चमचों के साथ सैर सपाटा और अय्याशी करते रहे।

 यही नहीं जो भी कार्यकर्ता दिल्ली फ़ोन करके अपनी समस्या बताते रहे या दिल्ली अपनी बात रखने के लिए गए, पार्टी के उदासीन और दिल्ली के सरकारी नौकरशाही जैसे रवैये से वो नाराज होकर घर बैठ गए.  अभी भी पार्टी के कार्यकर्ताओं में संजय सिंह और दुर्गेश पाठक के प्रति जमकर गुस्सा है, जिनके  कार्यकर्ताओं के लिए दर्शन हमेशा दूभर रहे।  अपने पूरे प्रवास के दौरान पांच सितारा सुविधाओं वाली जगह पर ही रुकते थे। दोनों में से शायद ही किसी ने दलित बस्ती या आम गरीब जनता के बीच रात बिताई हो। खबर ये भी है चुनावों के बाद इन दोनों को पंजाब की राजनीति से अलग कर दिया जाएगा।

पर केजरीवाल के लिए इस समय  सबसे बड़ी चिंता भगवंत मान हैं, जो केजरीवाल की लाख कोशिशों के बाद भी कार्यकर्ताओं में मुख्यमंत्री का सबसे बड़ा और लोकप्रिय चेहरा हैं। चुनाव कुछ दिन दूर हैं, पर अभी भी मुख्यमंत्री कौन होगा, ये आम आदमी पार्टी की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल है। पार्टी के सूत्रों का कहना है केजरीवाल या तो खुद मुख्यमंत्री बनेंगे या दिल्ली के अपने किसी ऐसे कृपापात्र को बनाएंगे, जिसके जरिए वो स्थानीय नेतृत्व को हमेशा अपने नियंत्रण में रख सकें, ताकि पार्टी व पंजाब के वही सुप्रीमो बने रहें।


वैसे उनका दिल्ली के विधायक जरनैल सिंह को पंजाब में चुनाव लड़वाना इसी ओर इशारा करता है । आम आदमी पार्टी पंजाब जीते या हारे, दोनों स्थितियों में पंजाब का स्थानीय नेतृत्व केजरीवाल से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है । 

Jan 18, 2017

मित्रों! एनडी तिवारी प्ले व्वाय नहीं, नेता हैं

आप फेसबुक को एक तरफ से खंगाल लीजिए। बारी—बारी से सबकी वॉल देख लीजिए। आपको गिनती के लोग नहीं मिलेंगे जो एनडी तिवारी की भाजपा में जाने पर राजनीतिक आलोचना कर रहे हों और पूछ रहे हों कि राष्ट्रवादी यजमानी खाये बिना कब्र में शांति नहीं मिलेगी क्या पंडीजी? 

सभी उनके 'सेक्स कांड' की चर्चा कर रहे हैं? इस चर्चा में जाति—धर्म—लिंग—संप्रदाय की दीवारों को तोड़कर लोग समवेत स्वर में सेक्स के शॉट्स से लेकर तस्वीरें शेयर कर रहे हैं।

भरे—पुरे चुनावी मौसम में यह सब देख ऐसा लग रहा है मानो एनडी तिवारी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि 'राष्ट्रवादी प्ले ब्वॉय' रहे हों और उन्होंने लखनउ और देहरादून में राज्य की मुखिया की नहीं, बल्कि कोठे के मालिक की भूमिका निभाई हो।

उनकी प्ले ब्वाय की छवि और लोगों का बड़े पैमाने पर फेसबुक पर चल रहा 'पोर्नवादी' आनंद बताता है कि चुनावों में मुद्दा और मुद्दे की राजनीति सामाजिक कार्यकर्ताओं की जुगाली, अखबारों के संपादकीय और टीवी के पकाउ डिबेट्स की चीज बनकर रह गयी है।

अन्यथा जो आदमी उत्तर प्रदेश का तीन बार और उत्तराखंड का एक बार मुख्यमंत्री रह चुका हो उसको लेकर सबसे लोकप्रिय और जनप्रिय सवाल उसका सेक्स कांड ही क्यों बनता? ​वह भी वह सेक्स कांड जिसमें कोई शिकायतकर्ता नहीं है, सिवाय कि किसी ने चोरी से वीडियो बना लिया।

Nov 9, 2016

तुगलकी फैसला पर स्वागतयोग्य

बाकि पार्टियों की तरह भ्रष्ट भक्तों और कालाबाजारी के समर्थन वाली बीजेपी के नेता भी अंदरखाने में मोदी को वही कह रहे हैं जो कॉमरेड और कांग्रेसी लोग कह रहे हैं। सब कम समय की दुहाई दे रहे हैं और मोदी को तुगलक बता रहे हैं।


तरुण शर्मा  


मंगलवार की शाम प्रधानमंत्री मोदी जब सेना के तीनों प्रमुखों के साथ बैठे तो एकबारगी लगा कि ये बेमौसम बरसात क्यों? मुल्क पर ऐसी क्या इमरजेंसी आ गयी कि देश के मुखिया को सेना प्रमुखों के साथ बैठना पड़े। ​फिर लगा कि संभव है मोदी सरकार की तमाम मोर्चों पर जारी असफलताओं के मद्देनजर वह पाकिस्तान पर हमले का कोई नया जुमला छोड़ें। 

भक्तों को छोड़ व्यापक जनता में यह पूर्वग्रह इसलिए भी है कि सरकार और भाजपा हर वादे के बाद उसे जुमला, कहानी या ऐवें ही बोल दिया था, कह देती है।

लेकिन इन तमाम अटकलों और आकलनों को परे ढकेलते हुए जब मोदी ने 500 और 1000 के नोट बंद करने की अचानक घोषणा कर दी तो देश हतप्रभ रह गया। यह एक फैसला ऐसा था जिसकी खबर मोदी कैबिनेट तक को नहीं थी, यहां तक कि बैंकों को भी नहीं। यही वजह है कि बीजेपी के छोटे—बड़े नेता अभी भी हैंगओवर में हैं कि ये क्या हुआ कि जिसकी उनको भनक ही नहीं थी। 

बाकि पार्टियों की तरह भ्रष्ट भक्तों और कालाबाजारी के समर्थन वाली बीजेपी के नेता भी अंदरखाने में मोदी को वही कह रहे हैं जो कॉमरेड और कांग्रेसी लोग कह रहे हैं। सब कम समय की दुहाई दे रहे हैं और मोदी को तुगलक बता रहे हैं। 

आप इस फैसले को तुगलकी कह सकते हैं। पर बेहद गोपनीयता और सही समय पर लिए गए इस फैसले के बाद उत्साह और बेहतरी की उम्मीद से जिस तरह देश भर गया वह जरूर 'ऐतिहासिक' था।  ऐसे में किसी के पास कुछ ठोस कहने को नहीं है पर आम आदमी खुश है कि चलो एक फैसला मोदी सरकार ने ऐसा किया है जिसके साथ हमारी भी बराबर की भागीदारी बनती है।

अब बात संशय पर। हो सकता है कि सरकार जैसा अभी कालेधन योजना पर नकेल कसने के जो कसीदे पढ़ रही है, वैसा कल को न हो। यह भी दिखावा मात्र बनकर रह जाए। दूसरी योजनाओं और सुधारों की तरह फेल हो जाए और कागजी साबित हो। पर हमारा सवाल यह है कि अभी से इस नकारात्मक चाह में खुद को पतले क्यों करते जाना है? अभी तो गलत नहीं लग रहा है। हां, गरीबों-मजदूरों की व्यापक आबादी को जरूर कुछ ​दिन मुश्किल के गुजारने होंगे, क्योंकि उनका जीवन कैश पर ही चलता है। 

पर आप यह भी तो देखिए कि कौन-सा ऐसा सुधार होता है जिसमें लोगों को मुश्किल नहीं झेलनी पड़ती है। याद है न आपको दिल्ली मेट्रो। कितनी मुश्किल झेलनी पड़ी दिल्ली वालों को। बहुत लोग अपने घरों से उजड़े, उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट होना पड़ा। पर आज सुविधा कौन उठा रहा है, घंटों की उमस और जाम से भरी दूरियों को मिनटों में कौन पूरा कर रहा है।  

इस फैसले पर तमाम तरह की बहस और चर्चाएं मीडिया और समाज में चल रही है आम आदमी व मध्यमवर्ग इस मुद्दे पर पुरजोर समर्थन के साथ मोदी की पीठ ठोकता नजर आ रहा है वहीं हैरत की बात यह है कि व्यवसाय के तमाम कालेधन के गढ़ शिक्षा व सवास्थ्य माफिया, प्रॉपर्टी व रियल एस्टेट कारोबारी, राजनीति से जुड़े हुए दलाल  इस पर खामोश हैं। वहीं कुछ वामपंथी  जिसके पास कालाधन तो क्या अपना खर्चा उठाने लायक पैसे नहीं है बिना तथ्य व जानकारी के फेसबुक पर मोदी विरोध व आलोचना की अपनी दैनिक दिनचर्या को जारी रखे हुए हैं. 

सरकार के इस फैसले से उम्मीद है प्रॉपर्टी व रियल एस्टेट जिसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कालेधन से गतिमान और संचालित होती है पर नकेल लगेगी और जनता को अपेक्षाकृत सस्ता आवास उपलब्ध होगा। घरेलू व्यापार जिसका एक बड़ा हिस्सा कालेधन से चलता है व्यापार  में नकदी की कमी दूर करने के लिए कीमतें कम करने के लिए मजबूर होगा और कालाबाजारी पर रोक लगेगी। 

इस फैसले के अलग-अलग पहलू हैं जिनकी आलोचनात्मक समीक्षा की जानी चाहिए. इसमें एक बड़ा सवाल है कि कुछ दिनों के लिए आम आदमी को इससे असुविधा होगी. नकदी संकट के चलते उसे दैनिक लेनदेन व रोजमर्रा की जरुरी चीजों की खरीद में परेशानी आएगी। आम आदमी की नकदी समस्या  पर .ध्यान देने के बजाए धैर्य से काम ले।  मीडिया के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह जनता में फ़ालतू की हड़बड़ी और खलबली पैदा करने कि बजाए  कालाधन सफ़ेद करने के तरीके खोज रहे कालाधन सरगनाओं की तिड़कमों का पर्दाफ़ाश करे और ये सुनिश्चित करे कि भ्रष्ट राजनीतिक नेतृत्व और कालेधन के व्यापारी बैंकिंग व्यवस्था में सांठ गाँठ से न दिखने वाला कोई सेफ पैसेज खोज लें।   

Jul 4, 2011

राजनीतिक महत्वाकांक्षा के शिकार बाबा रामदेव

बाबा अच्छा-भला योग क्रिया के क्षेत्र में मीडिया, विशेष र टीवी चैनल, की कृपा से देश-विदेश में खूब नाम पैदा करने लगे थे। नाम कमाते-कमाते उन्होंने इसी योग के क्षेत्र से दाम’ भी खूब पैदा किया...

तनवीर जाफरी

संतों की भारतीय राजनीति में सक्रियता कल भी थीआज भी है और संभवत: भविष्य में भी रहेगी। भारतीय संविधान जब देश के किसी भी नागरिक को सक्रिय राजनीति में भाग लेनेमतदान रने तथा चुनाव लडऩे की इजाज़त देता है, तो साधु-संत समाज राजनीति से कैसे  दूर रह सकता है। सत्ता सुख, सरकारी धन दौलत पर ऐशपरस्ती तथा सत्ता शक्ति की तात और इसके रिश्मे राजनीति जैसे पेशे से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं इसलिए अन्य कोई पेशा किसी को  अपनी ओर आकर्षित करे या न करे, राजनीति और इसमें पाया जाने वाला 'ग्लैमर' निश्चित रूप से सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है।

भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य है कि उसमें शिक्षा-दीक्षापढ़ाई-लिखाई और किसी प्रकार के प्रशिक्षण की कोई आवश्यकता नहीं होती, इसलिए इसमें तमाम ऐसे लोग भी सक्रिय हो जाते हैं जो अनपढ़ तो होते ही हैं साथ ही कई क्षेत्रों में भाग्य आज़माने के बाद भी असफल रहे होते हैं, मगर राजनीति में ऐसे लोग भी सफल होने की उम्मीद रखते हैं। इस सोच का मुख्य कारण है भारतीय राजनीति का मतों पर आधारित होना। 

राजनीतिज्ञ यह जानता है कि देश में साठ से लेर सत्तर फीसदी आबादी अशिक्षित और भोली-भाली है। इस बहुसंख्यक वर्ग को तरह-तरह के प्रलोभन, वादों, आश्वासनों तथा जाति-धर्म, वर्ग या किसी अन्य ताने-बाने में उलझा कर अपनी ओर आकर्षित किया जा सता है। यह सोच भी तमाम नाकारा किस्म के लोगों को न केवल राजनीति में पर्दापण के अवसर उपलब्ध राती है बल्कि इस प्रवृति के लोग राजनीति के क्षेत्र में दम रखते ही बड़े-बड़े सुनहरे सपने भी सजोने लग जाते हैं। बाबा रामदेव के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। बाबा अच्छा-भला योग क्रिया  के क्षेत्र में मीडिया विशेषर टीवी चैनलस की कृपा से देश-विदेश में खूब नाम पैदा करने लगे थे। नाम कमाते-कमाते उन्होंने इसी योग के क्षेत्र से दाम भी खूब पैदा किया। बताया जाता है कि रामदेव इसी योग के  चमत्कारस्वरूप तथा योगा जगत से सम्पर्क में आने वाले धनपतियों की दान दक्षिणा से लगभग 11 सौ रोड़ की संपत्ति के स्वामी बन चुके हैं।

क ओर रामदेव योग के क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए अपना जनाधार बढ़ाते गए, तो दूसरी ओर आम लोगों की ही तरह देश के लगभग सभी दलों के राजनेता भी रामदेव की ओर खिंच कर आने लगे।  इसका कारण यह था कि उनके योग शिविरों में आने वाले सैड़ों लोगों से राजनेता अपनी हॉबी’ के मुताबि रू-ब-रू होना चाहते थे। सर्वविदित है कि हमारे देश में नेताओं का भीड़ से बहुत गहरा रिश्ता है। भीड़ को संबोधित रने, उसे अपना चेहरा दिखाने तथा उससे संवाद स्थापित करने के लिए नेता तमाम प्रकाके हथकंडे अपना सता है। ऐसे में किसी भी नेता को रामदेव के योगशिविर में जाने से आखिर क्या आपत्ति हो सकती थी, वहां तो भीड़ के दर्शन के साथ हेल्थ केयर टिप्सतो बोनस में प्राप्त होने थे।
बाबा रामदेव ने भी राजनीतिज्ञों से अपने संबंधों का भरपूर लाभ उठाते हुए योग और आयुर्वेद संबंधी साम्राज्य का न केवल राष्ट्रीय, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक विस्तार किया। इसी दौरान उन्होंने धीरे-धीरे पतंजलि योगपीठदिव्य योग मंदिर, दिव्य फार्मेसी और आगे चलर भारत स्वाभिमान ट्रस्ट नामक संस्थानों व संगठनों की स्थापना र डाली। पर लगता है कि बाबा को लगभग ग्यारह सौ रोड़ रुपये का विशाल साम्राज्य स्थापित करने के बाद भी तसल्ली नहीं हुई और उन्हें ऐसी गलतफहमी पैदा होने लगी कि क्यों न देश की राजनीति को अपने नियंत्रण में लेकर इस देश की सत्ता पर भी नियंत्रण रखा जाए। उन्हें यह भी मुगालता होने लगा कि उनका खुद का व्यक्तित्व ही कुछ निराला है, तभी तो सत्ता और विपक्ष का बड़ा से बड़ा नेता उनके योग शिविर में उनके निमंत्रण पर खिंचा चला आता है।

इस मुगालते ने धीरे-धीरे अहंकार का वह रूप धारण र लिया, जिसने बाबा रामदेव के मुंह से अहंकामें यह तक निलवा दिया, 'जब देश के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री मेरे चरणों में बैठते हों, फिर आखिर मैं क्यों प्रधानमंत्री बनना चाहूंगा।' इतने अहंकार भरे शब्द शायद ही अब तदेश के किसी प्रमुख व्यक्ति या साधु-संत के मुख से निले हों। शायद योग शिविर के नाम पर लाखों लोगों को इकट्ठा करने वाले इस योगगुरु को यह भ्रम भी हो गया होगा कि जो भीड़ उन्हें विश्वविख्यात योगऋषि बना सती है, उसी के कन्धों पर सवार होर वे देश की लोतांत्रिक-राजनीतिक व्यवस्था पर भी ब्ज़ा जमा सते हैं। हो सकता है इसीलिए बाबा रामदेव ने विदेशों से काला धन वापसी का मुद्दा कुछ इस अंदाज़ में उठाया गोया देश में वही अकेले ऐसे व्यक्ति हों जिन्हें विदेशों से काला धन वापस मंगाने की सबसे अधिचिंता हो या देश की जनता ने उन्हें इस काके लिए अधिकृत कर दिया हो।

दरअसल, रामदेव ने आम लोगों को भावनात्मक रूप से अपने साथ जोडऩे की  गरज़ से मुद्दा तो काले धन की वापसी का उठाया, लेकिन धीरे-धीरे वे देश में अपनी राजनीतिक शक्ति को भी तौलने लगे। पिछले संसदीय चुनावों में स्वाभिमान ट्रस्ट द्वारा शत-प्रतिशत मतदान रने की अपील के साथ पूरे देश में तमाम जगहों पर रैलियां भी निकाली गईं। यह सब कार्रवाई केवल नवगठित भारत स्वाभिमान संगठन’ की ज़मीनी हकीकत को मापने तथा इसे प्रचारित रने के लिए की गई थी। मगर राजनीतिक तिड़मबाजि़यों से अनभिज्ञ रामदेव की भारतीय राजनीति के क्षितिज पर चमने की मनोकामना आखिरकार उस समय धराशायी हो गई जब वे रामलीला मैदान से अपने समर्थकों और अनुयायियों को उनके हाल पर छोड़ र स्वयं पुलिस से डर र किसी महिला के कपड़े पहनर भाग निले। पुलिस ने इसी हालत में उनको गिरफ्तार कार लिया।

उनकी दूसरी बड़ी किरकिरी उस समय हुई जब वे नींबू-पानी व शहद ग्रहण करने के बावजूद स्वयं को अनशनकारीबताते रहे। उन्हें सबसे अधिमुंह की तब खानी पड़ी, जब इस तथाथित अनशन को समाप्त रने के लिए भी केंद्र सरकार का कोई प्रतिनिधि उन्हें मनाने नहीं गया। उन्होंने कुछ संतों की गुज़ारिश पर अपनी कोई मांग पूरी हुए तथा किसी सरकारी आश्वासन के बिना नशन तोड़ दिया। अब यही बाबा रामदेव राजनीति से वास्तविक  साक्षात्कार’ होने के पश्चात काले धन की वापसी पर तो कम बोलते दिखाई दे रहे हैं, मगर अब उन्हें लोगों को यह बताना पड़ रहा है कि वे रामलीला मैदान से क्यों भागे, उन्होंने औरतों के कपड़े किन परिस्थितियों में पहने तथा अपना तथाकथित अनशन उन्हें कैसे  तोडऩा पड़ा।

अब वे अपनी धन-सपत्ति तथा तमाम आरोपित अनियमितताओं का जवाब देते फिर रहे हैं। रामलीला मैदान से उनके भेष बदल कर पलायन करने की घटना को भी संत समाज कायरतापूर्ण कार्रवाई बता रहा है जबकि बाबा रामदेव और उनके समर्थक इसे वक्त की ज़रूरत तथा सूझबूझ भरा दम बता रहे हैं। बहरहाल बाबा रामदेव की मुश्किलें निकट भविष्य में खत्म होती दिखाई नहीं दे रही हैं। प्रत्येक आने वाला दिन उनके लिए विशेषकर उनके महत्वाकांक्षी राजनीतिक अस्तित्व के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है।

ल तक जिस अहंकार से रामदेव ने अन्ना हज़ारे के लिए यह कहा था कि-अन्ना हज़ारे पहले महाराष्ट्र तक सीमित थे उन्हें अपने मंच पर लाकर राष्ट्रीय स्तर पर मैंने उनका परिचय देशवासियों से कराया। जिस अन्ना हज़ारे के जंतर-मंतर पर आयोजित अनशन को बौना करने की गरज़ से उन्होंने अपना रामलीला मैदान का शोआयोजित किया था, अब वही अन्ना अपने भविष्य के कार्यक्रम में रामदेव को अपनी शर्तों के साथ शामिल करने की बात कह रहे हैं। खबर तो यह भी है कि 16 अगस्त के अन्ना हज़ारे प्रस्तावित अनशन में रामदेव से जनता के बीच में बैठ कर अनशन में शरीक होने की बात की जा रही है, न कि मंच सांझा करने की बात। उधर प्रवर्तन निदेशालय बाबा रामदेव द्वारा इकट्ठी की गई 1100 करोड़ की संपत्ति की जांच करने में इस संदेह के कारण लग गया है कि कहीं रामदेव द्वारा फेमा नियमों का उल्लंघन तो नहीं किया गया?

रामदेव के परम सहयोगी बालकृष्ण पर दो पासपार्ट रखने तथा इन पासपोर्ट पर कई विदेशी यात्राएं करने जैसे आरोप लग रहे हैं। कुल मिला कर हम यह कह सकते हैं कि बाबा रामदेव को योग ने तो आसमान पर चढ़ा दिया लेकिन राजनीतिक  महत्वाकांक्षा उन्हें ले डूबी। 

लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.



Jun 27, 2011

छात्र नेता संदीप सिंह को एनएसयूआई के गुंडों ने लातों—जूतों से सरेआम पीटा

जनज्वार. झारखंड की राजधानी रांची में 23 जून को लोकपाल बिल के मौजूदा मसौदे को कारगर बताने पहुंचे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को विरोध का सामना करना पड़ा था। विरोध कर रहे संगठन ‘आइसा’ से जुड़े छात्र मांग कर रहे थे कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री के भ्रश्टाचार की जांच को शामिल किया जाये। लेकिन मंत्री साहब के सामने किया गया आइसा का यह विरोध कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को पच नहीं सका और उससे जुड़े छात्रों ने विरोध कर रहे छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर बुरी तरह पीटा। मारपीट में आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संदीप सिंह समेत कई छात्रों को चोट आयी है।

 गौरतलब है कि लोकपाल बिल के मौजूदा मसौदे को लेकर अन्ना हजारे की टीम और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच उभरे मतभेद के बाद कांग्रेस ने तय किया है कि उसके नेता और मंत्री जनता में अपने अच्छे और सच्चे लोकपाल के बारे में जनता को जानकारी देंगे। उसी अभियान के तहत रांची के अशोक होटल में मीडिया को संबोधित करने सिब्बल पहुंचे थे, जहां कांग्रेस के राजनीतिक भविश्य एनएसयूआइ ने नागरिक समाज द्वारा तैयार लोकपाल को लागू करने की मांग पर लातों-घूसों से अपना पक्ष रखा।

एनएसयूआइ की गुंडई का यह ‘अहिंसात्मक’ प्रदर्शन  संगठन के प्रदेश अध्यक्ष कुमार राजा और महासचिव शाहनवाज के नेतृत्व में रांची के अशोक होटल के सामने हुआ। एनएसयूआइ के लोग संदीप सिंह के इस बात से खफा थे कि उन्होंने पत्रकार के बतौर कपिल सिब्बल से सवाल पूछ दिया था और मंत्री जी असहज हो गये थे। संदीप सिंह के मुताबिक ‘वह आइसा के राश्ट्रीय अध्यक्ष के साथ समकालीन जनमत नाम की पत्रिका के नियमित लेखक है। इसी हैसियत से उन्होंने जानना चाहा कि ‘सरकार प्रतिदिन टैक्सों में कॉरपोरेट समूहों को 240 करोड़ की छूट क्यों देती है।’

उनके इस सवाल का कपिल सिब्बल जवाब देते उससे पहले ही एनएसयूआइ से जुड़े पांच-छह लोगों ने संदीप को धक्का देना और फिर पहचान पत्र मांगना शुरू कर दिया। पहचान पत्र नहीं दिखा पाने की स्थिति में उनलोगों ने संदीप को धक्का मारकर बाहर कर दिया। पहचान के बावत संदीप ने बताया कि ‘समकालीन जनमत पंजीकृत पत्रिका नहीं है, इसलिए पहचान पत्र जारी नहीं करती।’

कांफ्रेंस हाल से बाहर कर दिये जाने के बाद संदीप अपने साथियों के साथ मिलकर कपिल सिब्बल और कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ नारेबाजी करने लगे, जिसका जवाब कांग्रेस के छात्र संगठन ने ‘अहिंसात्मक’ लातों-घूसों से दिया। हालांकि हमलावरों और प्रदर्शनकारियों की संख्या बराबर थी, लेकिन प्रदर्शनकारी टकहराहट में नहीं गये और उन्होंने बचाव करना ही लोकतंत्र के लिए जरूरी समझा।

पहले पत्रकार और फिर छात्र संगठन के नेता के रूप में संदीप ने दोहरी भूमिका क्यों निभायी के बारे में उनकी सफाई है, ‘अगर चिदंबरम्-सिब्बल-अभिषेक  मनु कांग्रेस के नेता और पूंजीपति समूहों के वकील हो सकते हैं तो मैं छात्र नेता और पत्रकार क्यों नहीं हो सकता।’

बहरहाल, आइसा के  अध्यक्ष संदीप सिंह ने कुमार राजा और अन्य के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी है, लेकिन अबतक किसी आरोपी की गिरफ्तारी रांची पुलिस नहीं कर सकी है। सीपीआइएमल की राज्य समिति ने भी बयान जारी कर घटना की भर्त्सना की है और दोषियों की गिरफ्तारी मांग की है। पत्रकार संगठन जेयूसीएस की ओर से जारी विज्ञप्ती में इसे पत्रकार बिरादरी पर हमला बताया गया।

Apr 17, 2010

जहां गुंडे भी विधायक हैं


अजय प्रकाश

‘चाचा हमार विधायक हउवें ना घबराइब हो, ए डब्बल चोटी वाली तहके टांग ले जाइब हो’- भारतीय राजनीति को जनता किस रूप में समझती है,भोजपुरी भाषी क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय यह गीत इसकी एक बानगी भर है। 

राजनीति में अपराध के बढ़े शेयर का न तो इससे बेहतर विश्लेषण हो सकता है और न ही इससे बड़ा तिरस्कार। अभी हालत यह है कि देश के सबसे बड़ी आबादी और विधानसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश के 40प्रतिशत से अधिक विधायक अपराधी हैं। जिनमें से ज्यादातर हत्या,बलात्कार, गैंगवार, फिरौती, राहजनी, उठाईगीर जैसे कई अपराधों में नामजद, सजायाफ्ता, नहीं तो भगोड़ा घोषित हैं।

कोलसला विधायक अजय राय :  गुंडा एक्ट के तहत गिरफ्तार करने पहुंची पुलिस
                                                                                                 फोटो- वाराणसी व्यू ब्लॉग  
ऐसे जनप्रतिनिधि जनता की भलाई कितना करते हैं, वह तो आंकड़ों में फंसकर फाइलों में दफ्न हो जाता है मगर इनकी गुंडई का असर लोगों में दिन-रात रहता है। सिर्फ मार्च महीने में प्रदेश के 6विधायकों श्रीपति आजाद,दीप नारायण सिंह, सुल्तान बेग, विजय कुमार मिश्रा, अजय राय और यशपाल रावत पर हत्या, हत्या का प्रयास, वाहन चोरी गैंग और अपहरण के मुकदमें दर्ज हुए हैं। समाजवादी पार्टी के महाराजगंज सदर के विधायक श्रीपती आजाद ने रामपुर बुजुर्ग गांव की एक विधवा महिला सावित्री देवी को सिर्फ इसलिए जला दिया कि वह अब उन्हें पसंद नहीं कर रही थी। वहीं संत रविदास नगर जिले के ग्यानपुर के सपा विधायक विजय कुमार मिश्रा वाहन चोर गैंग के नेता निकले तो बरेली जिले के कंवर क्षेत्र के सपा विधायक के खिलाफ चोर गैंग के सरगना होने का मुकदमा दर्ज हुआ।

वाराणसी के कोलासला क्षेत्र के विधायक अजय राय ने भानू प्रताप सिंह नाम के बीज व्यापारी को एक संपत्ति विवाद में 25 मार्च को जिंदा जला दिया। पुराने आपराधिक रिकॉर्ड वाले अजय राय 2007 चुनाव से पहले भाजपा में थे,चुनाव के वक्त सपा ने समर्थन दिया और फिलहाल कांगे्रसी कार्यकर्ताओं ने,गुंडा एक्ट में उन्हें गिरफ्तार किये जाने के बाद वाराणसी में खूब हंगामा किया। बाहुबली अजय राय प्रदेश के इकलौते नेता नहीं हैं जो अपराध की राजनीति के बदौलत प्रदेश की हर बड़ी पार्टी में रसूख रखते हैं। इस तरह के नेताओं की भरमार है जो पार्टियों में बेहतर राजनीति की पैरोकारी करने वालों को हाशिये पर डाल देते हैं और शीर्ष  नेताओं की क्षत्रछाया में मलाई मारते हैं। मुख्तार अंसारी, राजा भैया, अमरमणि त्रिपाठी, हरिशंकर तिवारी, अतिक अहमद, गुड्डु पंडित, डीपी यादव, अखिलेश सिंह जैसे नेता इस राजनीति के स्थापित नाम हैं।

उत्तर प्रदेश की मौजूदा विधानसभा में ‘जिसकी जितनी भागीदारी, उनके उतने हैं अपराधी’ वाली बात है। पिछले 2007के विधानसभा चुनावों में दलितों-ब्राम्हणों के गठजोड़ से ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली बसपा के 206 प्रतिनिधि हैं जिनमें से 71 पर आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का मुकदमा दर्ज है। जबकि प्रदेश को संभालने वाले कैबिनेट के मंत्रियों में अपराधिक छवि वाले कितने हैं उसका अंदाजा बुंदेलखंड क्षेत्र से आने वाले उन पांच  मंत्रियों से लगाया जा सकता है जिनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिस पर कि आपराधिक मुकदमा नहीं है। भाजपा से बसपा में आये और मौजुदा सरकार में लघु उद्योग मंत्री बने बादशाह सिंह पर लगभग डेढ़ दर्जन मुकदमें दर्ज हैं।

ऐसा भी नहीं है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपराधियों की भरमार एकाएक हो गयी है। पिछली विधानसभा में तो आधे से अधिक 403 में से 207 जनप्रतिनिधियों पर संगीन मुकदमें दर्ज थे जिसमें सर्वाधिक संख्या 84 सपा विधायकों की थी। वैसे भी सपा के बारे में राजनीतिक विश्लेषकों की आम राय रही है कि जब वह सत्ता में होती है तो अराजकता बढ़ जाती है। याद होगा कि मुलायम सिंह ने राजनीति में अपराधियों की बढ़ती तादाद के मद्देनजर मैनपुरी में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘अपराधियों को राजनीतिक तंत्र से खदेड़ने की जरूरत है और चाहिए कि असमाजिक तत्वों को जगह न दें। इसकी शुरूआत में अपनी पार्टी से करने जा रहा हूं।’प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की यह चिंता काबिले तारिफ थी लेकिन खालिश भाषण साबित हुई। मौजूदा विधानसभा में उनकी पार्टी के 97विधायकों में से 48 यानी आधे असमाजिक और आपरधिक टैग वाले हैं।

राजनीतिक सुचिता और शुद्धता पर सर्वाधिक शोर मचाने वाली पार्टी भाजपा के शाहाहाबाद क्षेत्र के विधायक कांशीराम दिवाकर पर बरेली के एक व्यापारी नरेंद्र सिंह ने हत्या और वसूली का मुकदमा दर्ज कराया है। प्रदेश में लगातार जनाधार खो रही भाजपा को आखिरकार अब आपराधिक राजनीति की वही राह चुननी पड़ी है,जिसका सिद्धांतों में ही सही वह विरोध करती रही है। इस बार विधानसभा में भाजपा के मात्र 50 विधायक ही पहुंच सकें हैं जिसमें से 19 अपराधियों की बिरादरी से आते हैं। अब कांग्रेस को देखें तो उत्तर  प्रदेश में उसके सबसे कम गुंडा विधायक हैं कि  सबसे कम 20 विधायक हैं।

प्रदेश की 403 सीटों वाली विधानसभा में 160 से उपर माफियाओं और अपराधियों की भागीदारी में जनता से जुड़े मुद्दे किस कदर हाशिये पर जाते हैं उसकी एक बानगी मौजूदा विधानसभा के चले सत्र को देखकर समझा जा सकता है। पूरे सत्र में एक सप्ताह भी सदन नहीं चला और न ही जनता से सीधे जुड़े किसी मसले पर चर्चा हो सकी। सवाल है कि जिस सत्र को कमसे कम साल में तीन महीने चलना चाहिए वह एक सप्ताह भी नहीं चलता है और विपक्ष इस पर विरोध की खानापूर्ति कर चुप्पी साध लेता है।