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Aug 11, 2011

प्रधानमंत्री धृतराष्ट्र तो नहीं



सरकार पर दवाब बनाया जाता है तो प्रधानमंत्री महोदय को जनता की मांग गैर-संवैधानिक नज़र आने लगती है और जनता का प्रयास समानांतर सरकार चलाने की उद्दंडता...

पीयूष पन्त
 

हमारे प्रधानमंत्री महोदय को सवालिया संस्कृति नहीं भाती. तभी तो जब भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी यूपीए सरकार के मंत्रियों के भ्रष्ट  आचरण को लेकर मीडिया में सवाल उठाये जाते हैं या फिर नागरिक समाज द्वारा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने  के लिए जनता के सरोकारों को समाहित करने वाले जन लोकपाल विधेयक को संसद द्वारा शीघ्र पास कराने की खातिर सरकार पर दवाब बनाया जाता है तो प्रधानमंत्री महोदय को जनता की मांग गैर-संवैधानिक नज़र आने  लगती है और जनता का प्रयास समानांतर सरकार चलाने की उद्दंडता .

जब सरकार शासन चला पाने में असमर्थ दिखाई दे रही हो तो मीडिया और जनता द्वारा उसकी खिंचाई करना और सरकार पर सुसाशन का दबाव डालना पूरी तरह से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है. अब प्रधानमंत्रीजी की समझ का क्या किया जाये कि उन्हें लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ पुलिसिया राज का आगाज़ करती दिखाई देती हैं. जबकि सच तो यह है की उनकी अपनी सरकार की यूआईडी कार्ड बनाना, जनता से धरना-प्रदर्शन स्थलों को लगातार छीनते चले जाना, आदिवासी-किसानों द्वारा अपने जंगल-ज़मीन बचाने की खातिर आन्दोलन करने को देशद्रोह बता उन पर लाठी-गोली बरसाना और उनके मुद्दों को उठाने वाले पत्रकारों को माओवादी करार दे फर्जी मुठभेड़ में मार देना सरीखी कारगुजारियां देश को पुलिस राज में तब्दील कर चुकी हैं. 

धृतराष्ट्र तो वाकई अंधे थे, लेकिन हमारे  प्रधान मंत्री जान-बूझ कर अंधे होने का नाटक क्यों कर रहे हैं, या फिर देशी-विदेशी कर्पोरेटेस  ने उन्हें ऐसा चश्मा पहना दिया है जिसके चलते उन्हें कोर्पोरेट हितों के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं देता है. जन कवि बाबा नागार्जुन की निम्न पंक्तियाँ आज रह-रह कर याद आती हैं...

 
                        खड़ी हो गयी चांपकर कंकालों की हूक  
                        नभ में विपुल विराट-सी शासन की बन्दूक 
                        उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
                        जिसमें कानी हो गयी शासन की बन्दूक
                        बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक
                        धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बन्दूक
                        सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक 
                        जहां तहां दगने लगी शासन की बन्दूक
                        जली ठूंठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक
                        बाल न बांका कर सकी शासन की बन्दूक                                                           

Aug 2, 2011

कायर सत्याग्रही और दमनकारी सरकार

अन्ना हजारे द्वारा  भ्रष्टाचारियों के मांस को गिद्धों -कुत्तों को खिलाने के आह्नान से लेकर बाबा रामदेव के ऊलजलूल बयानों और राजघाट पर भाजपाइयों के नाच तक,सत्याग्रह के विचार और तरीके के अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखने को मिलती है...

प्रेम सिंह

पक्ष चाहे सरकार का हो या सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का, भ्रष्टाचार-विरोध को लेकर दिल्ली में पिछले कुछ महीनों से जो दृश्य जारी है उसमें संगति कम और बेतुकापन ज्यादा दिखाई देता है। उससे भ्रष्टाचार मिटने वाला नहीं है। बात-बात पर और पहले ही दिन से आमरण अनशन पर बैठ जाने और सरकार या सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के कानून बन जाने से भ्रष्टाचार पर लगाम भी नहीं कसी जा सकेगी। इस हकीकत के कई उदाहरण भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दौरान ही देखने को मिलते हैं।

उनमें एक उदाहरण राष्ट्रमंडल खेलों में हुए भ्रष्टाचार का है। राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन पूरी तरह से भ्रष्टाचार का खेल बन जाने पर भी देश के प्रधानमन्त्री  से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री तक चुप्पी मारे रहे। जब घड़ा खेल होने से पहले ही पफूट गया तो प्रधनमंत्री ने डेमेज कंट्रोल के लिए आनन-फानन में जांच के लिए शुंगलु समिति नियुक्त की। शुंगलु समिति की रपट में दिल्ली की मुख्यमंत्री और राज्यपाल की भूमिका पर सीधे सवाल उठाए गए हैं। वैसे भी इतना बड़ा और खुला घोटाला मुख्यमंत्री और राज्यपाल की आंख बचा कर हो ही नहीं सकता था।

लेकिन दिल्ली मुख्यमंत्री ने शुंगलु समिति की रपट की ही जांच करा डाली है। होना तो यह चाहिए था कि शुंगलु समिति का गठन करने वाले प्रधनमंत्री को रपट आने के तुरंत बाद मुख्यमंत्राी और राज्यपाल की भूमिका पर जांच बिठानी चाहिए थी। आप गौर कर लें, भ्रष्टाचार का यह खेल  इंडिया अंगेस्ट करप्शन की नाक नीचे हुआ है, लेकिन इंडिया अंगेस्ट करप्शन के बांकुरे विरोध् के किसी भी मंच अथवा स्थल पर नहीं पहुंचे। न ही अपने मंच से कोई विरोध् किया। क्या वे बता सकते हैं उनका लोकपाल इस मामले में क्या करेगा?

स्पैक्ट्रम 2घोटाले में फंसे डी राजा ने अदालत में बयान दिया है कि जो हुआ पीएम,एफएम, केबिनेट और टेलकॉम मंत्रालय के आला अधिकारीयों  की जानकारी और सहमति से हुआ। टीम हजारे का लोकपाल किस-किस को फांसी पर चढ़ाएगा?कांग्रेस राजा के बयान को आरोपी का बयान कह कर खारिज कर सकती है,लेकिन कौन नहीं जानता मामला अगर एफडीआई का हो तो सहमति होगी, भले ही उसमें संवैधानिक प्रावधनों का कितना भी उल्लंघन और कितना भी भ्रष्टाचार होता हो। जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति के आने पर भारत की सुरक्षा व्यवस्था निरर्थक हो जाती है,उसी तरह एफडीआई के आने पर भारतीय संविधन निरर्थक हो जाता है। एफडीआई और भ्रष्टाचार नाभि-नाल जुड़े हैं।

सगुण विरोध् की जगह केवल निर्गुण विरोध् निरी हवाबाजी है,और हवाबाजी से भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता। लाख बचाने की कोशिशों के बावजूद किसी डी राजा या किसी कलमाडी के फंस जाने पर जिन भले लोगों को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलती नजर आने लगती है, उन्हें गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा कि अगर भ्रष्टाचार मिटाना है तो उसके लिए वास्तव में क्या करना होगा। वह कर्तव्य नवउदारवादी लूट पर कायम शाइनिंग इंडिया के ‘आदर्श’ पर तय नहीं किया जा सकता। उसके बाहर छूटे भारत के यथार्थ से वह तय होगा। मुक्तिबोध् ने पूछा था, ‘कामरेड आपकी पॉलिटिक्स क्या है?’ तय तो होना चाहिए आप किस जमीन पर खड़े होकर बहस कर रहे हैं।

गाँधी ने हिंसा,विग्रह और शोषण से ग्रस्त अधिनिक  औद्योगिक व्यवस्था में दमन और अत्याचार का प्रतिकार करने और अंततः उसे बदलने के उद्देश्य से दक्षिण अप्रफीका में सत्याग्रह के तरीके का संधन किया था। देश की आजादी के संघर्ष में उन्होंने सत्याग्रह और सिविल नापफरमानी के तरीके का उपयोग कियाऋ गोकि आजादी के संघर्ष में सशस्त्रा और भूमिगत क्रांतिकारी तरीके भी उपयोग में लाए गए थे और बलिदान की कसौटी पर उनकी सार्थकता कम नहीं थी। खुद गाँधी ने 1942में ‘करो या मरो’ का नारा दिया था जिसमें देश के हर नागरिक से उपनिवेशवादी सत्ता के जुझारू प्रतिरोध् का आह्नान था। आजाद भारत में डॉ. राममनोहर लोहिया ने गांध्ी की अन्याय के प्रतिकार की सत्याग्रह और सिविल नापफरमानी की कार्यप्रणाली को दुनिया की अभी तक की सबसे बड़ी क्रांति बताया।

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचारियों के मांस को गिद्धों -कुत्तों को खिलाने के आह्नान से लेकर बाबा रामदेव के ऊलजलूल बयानों और राजघाट पर भाजपाइयों के नाच तक,सत्याग्रह के विचार और तरीके के अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। जिस तरह से अस्सी और नब्बे के दशकों में र्ध्मनिरपेक्षता के पद ने चौतरपफा ठोकरें खाईं और अपना अर्थ गंवा दिया, वही हालत इध्र सत्याग्रह पद की बन गई है।

अगर आजादी के संघर्ष के नेताओं की अपनी और उनके बारे में उपनिवेशवादी सत्ता की लिखतें हमारे सामने नहीं होतीं तो नई पीढ़ियों को यही लगता कि भारत में शुरू से ही बकवादियों का बोलबाला रहा है। लोग यही मानते कि गांध्ी और उनका सत्याग्रह भी वैसा ही तमाशा थे जैसा जंतर-मंतर,रामलीला मैदान और राजघाट पर देखने को मिलता है। जिसमें कोई हिंसक ललकार दे रहा है,कोई जनाना कपड़ों में रात के अंध्ेरे में छिप कर भाग रहा है,कोई सत्ता की सूंघ से मतवाला होकर नाच रहा है।

हम यह नहीं कहते कि पूर्व प्रचलित पदों-अवधरणाओं और तरीकों का मौजूदा संदर्भों में नवोन्मेषकारी अर्थ व प्रयोग नहीं हो सकताऋ बल्कि वह होना चाहिए। लेकिन अपने स्वार्थवश या अपनी कमजोरियों पर परदा डालने के लिए उनका रूप बिगाड़ देना उनके आविष्कर्ताओं को लांछित करने के साथ संघर्ष की परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति द्रोह है। नवउदारवाद के हमाम में जो हालत र्ध्मनिरपेक्षता की हो चुकी है,वही गांध्ी और सत्याग्रह की होने जा रही है।

दिल्ली से खदेड़े जाने के अगले दिन जब रामदेव का टीवी पर हरिद्वार से प्रसारण आया तो मेरे 14 साल के बेटे ने कहा कि बाबा तो बुरी तरह डर गया है। दुनिया को स्वास्थ्य और शक्ति के नुस्खे बांटने वाले रामदेव चार दिन के अनशन में बेहाल हो गए। नुस्खे वे आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के भी बांटते हैं। लेकिन भोगियों के इस योगी में न आध्यात्मिक शक्ति का लेश निकला न शारीरिक शक्ति का। वह दरअसल उनमें कभी थी ही नहीं। आपको याद होगा,कुछ साल पहले उनके कारखाने में बनने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता और काम करने वाले मजदूरों के शोषण पर सवाल उठे थे। बाबा हल्की पेंदी के तवे की तरह गरम हो गया था और अनर्गल प्रलाप करने लगा था। नवउदारवाद की प्रयोगशाला में ऐसे ही योगी ढलते हैं।


दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक और राजनितिक -सामाजिक मसलों के लेखक.
 
 
 
 
 
 
नोट : प्रकाशित लेख 'नवउदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्टाचार' का एक हिस्सा है. पुरे लेख को पढने के लिए दाहिनी तरफ ऊपर देखें.

Jul 6, 2011

असहमति अन्ना से हो भ्रष्टाचार से नहीं


हमारे यहाँ ऐसे बुद्धिजीवियों की कमी नहीं जो  आन्दोलनों से रहते तो दूर हैं, पर सूँघने की इनकी नाक बड़ी लम्बी होती है। हर ओर इन्हें साजिश ही नजर आती है..

कौशल किशोर

आज अन्ना हजारे और उनके भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को लेकर कई सवाल उठाये जा रहे हैं। साहित्यकार मुद्राराक्षस ने हाल ही में आरोप लगाया है कि अन्ना भाजपा व राष्ट्रीय सेवक संघ का मुखौटा हैं और अन्ना के रूप में इन्हें ‘आसान झंडा’मिल गया है। जन लोकपाल समिति में ऐसे लोग शामिल हैं,जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। अन्ना हजारे की यह माँग कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में ले आया जाय, संविधान के विरुद्ध है।

मुद्राराक्षस ने यहाँ तक सवाल उठाया है कि अन्ना और उनकी सिविल सोसायटी पर संसद और संविधान की अवमानना का मुकदमा क्यों न दर्ज किया जाय?  ऐसे में अन्ना हजारे और भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन की पड़ताल जरूरी है क्योंकि आज यह आन्दोलन अपने अगले चरण की ओर अग्रसर है और जन आंदोलन की शक्तियाँ वैचारिक और सांगठनिक तैयारी में जुटी हैं।

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने देश की मुख्यधारा के राजनीतिक दलों को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है। हमारे संसदीय जनतंत्र में पक्ष और प्रतिपक्ष मिलकर मुख्य राजनीति का निर्माण करते हैं, लेकिन इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि तमाम पार्टियाँ सत्ता की राजनीतिक पार्टिर्यों में बदल गई हैं। उसके अर्थतंत्र का हिस्सा बनकर रह गई हैं aur अन्ना हजारे इसी यथार्थ की उपज हैं।

अन्ना हजारे के व्यक्तित्व और विचार में कमियाँ और कमजोरियाँ मिल सकती हैं। वे गाँधीवादी हैं। खुद गाँधीजी अपने तमाम अन्तर्विरोधों के बावजूद स्वाधीनता आन्दोलन के बड़े नेता रहे हैं। इसी तरह अन्ना हजारे के विचारों और काम करने के तरीकों में अन्तर्विरोध संभव है,लेकिन इसकी वजह से उनके आन्दोलन के महत्व को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता है।

 इस आन्दोलन का सबसे बड़ा महत्व यही है कि इनके द्वारा उठाया गया भ्रष्टाचार का मुद्दा आज केन्दीय मुद्दा बन गया है जिसने समाज के हर तबके को काफी गहरे संवेदित किया है और इसे खत्म करने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे हैं। अन्ना हजारे और उनके आंदोलन की इस उपलब्धि को क्या अनदेखा किया जा सकता है कि 42सालों से सरकार के ठंढ़े बस्ते में पड़ा लोकपाल विधेयक बाहर आया,उसे मजबूत और प्रभावकारी बनाने की चर्चा हो रही है,और इस पर सर्वदलीय बैठक आयोजित हुई।

हमारे यहाँ ऐसे बुद्धिजीवियों की कमी नहीं जो हर आन्दोलनों से रहते तो दूर हैं, पर सूँघने की इनकी नाक बड़ी लम्बी होती है। हर ओर इन्हें साजिश ही नजर आती है। ये अन्ना द्वारा नरेन्द्र मोदी की तारीफ पर तो खूब शोर मचाते हैं,लेकिन इस सम्बन्ध में अन्ना ने जो सफाई दी, ह इन्हें सुनाई नहीं देता है। किसानों की आत्म हत्या,बहुराष्ट्रीय निगमों का शोषण,चालीस करोड़ से ज्यादा लोगों का गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन के लिए बाध्य किया जाना जैसे मुद्दे तो इन्हें संवेदित करते हैं लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जब प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात आती है तो वह उन्हें देश में आजादी के बाद पहली बार अल्पसंख्यक सिख समुदाय के प्रधानमंत्री को अपमानित करने का षडयंत्र नजर आता है।

अपनी बौखलाहट में ये अन्ना और सिविल सोसाइटी पर जाँच बैठा कर मुकदमा चलाने की माँग करते हैं। ये इस सच्चाई को भुला बैठते हैं कि प्रधानमंत्री किसी समुदाय विशेष का न होकर वह सरकार का प्रतिनिधि होता है। हमारे इन बौद्धिकों को अन्ना द्वारा किसान आत्महत्याओं पर भूख हड़ताल न करने पर शिकायत है लेकिन किसान आंदोलनों पर सरकार के दमन पर ये चुप्पी साध लेते हैं।

कहा जा रहा है कि अन्ना हजारे जिस लोकपाल को लाना चाहते हैं,वह संसद और सविधान की अवमानना है। पर सच्चाई क्या है ?हमारी सरकार कहती है कि यहाँ कानून का राज है। लेकिन विडम्बना यह है कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए हमारे यहाँ कोई मजबूत कानून की व्यवस्था नहीं है। मामला चाहे बोफोर्स घोटाले का हो या भोपाल गैस काँड का या पिछले दिनों के तमाम घोटालों का हो,इसने हमारे कानून की सीमाएँ उजागर कर दी हैं। तब तो एक ऐसी संस्था का होना हमारे लोकतंत्र के बने रहने के लिए जरूरी है। यह संस्था जनता का लोकपाल ही हो सकती है जिसके पास पूरा अधिकार व क्षमता हो और वह सरकार के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त व स्वतंत्र हो तथा जिसके दायरे में प्रधानमंत्री से लेकर सारे लोगों को शामिल किया जाय।

प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात को लेकर मतभेद है लेकिन अतीत में प्रधानमंत्री जैसे पद पर जब अंगुली उठती रही है तब तो यह और भी जरूरी हो जाता है। सर्वदलीय बैठक में कई दलों के प्रवक्ता ने प्रधानमंत्री को इस दायरे में लाने की बात कही है और स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी उनसे मिलने गये सम्पादकों से कहा कि वे लोकपाल के दायरे में आने को तैयार हैं। फिर समस्या क्या है ?

अन्त में,भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लम्बी है। मजबूत और प्रभावकारी लोकपाल का गठन इसका पहला चरण हो सकता है। हम अन्ना हजारे से सहमत हो सकते है, असहमत हो सकते हैं या उनके विरोधी हो सकते है लेकिन यदि हम समझते है कि भ्रष्टाचार हमारे राष्ट्र,समाज,जीवन,राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति को दीमक की तरह चाट रहा है तो समय की माँग है कि इस संघर्ष को अन्ना हजारे और उनके चन्द साथियों पर न छोड़कर देश के जगरूक नागरिक,देशभक्त,बुद्धिजीवी, ईमानदार राजनीतिज्ञ लोकतांत्रिक संस्थाएँ,जन संगठन आगे आयें और इसे व्यापक जन आंदोलन का रूप दें।
 
 
जनसंस्कृति मंच लखनऊ के संयोजक और सामाजिक संघर्षों में सक्रिय.


 
 
 
 

Jul 4, 2011

राजनीतिक महत्वाकांक्षा के शिकार बाबा रामदेव

बाबा अच्छा-भला योग क्रिया के क्षेत्र में मीडिया, विशेष र टीवी चैनल, की कृपा से देश-विदेश में खूब नाम पैदा करने लगे थे। नाम कमाते-कमाते उन्होंने इसी योग के क्षेत्र से दाम’ भी खूब पैदा किया...

तनवीर जाफरी

संतों की भारतीय राजनीति में सक्रियता कल भी थीआज भी है और संभवत: भविष्य में भी रहेगी। भारतीय संविधान जब देश के किसी भी नागरिक को सक्रिय राजनीति में भाग लेनेमतदान रने तथा चुनाव लडऩे की इजाज़त देता है, तो साधु-संत समाज राजनीति से कैसे  दूर रह सकता है। सत्ता सुख, सरकारी धन दौलत पर ऐशपरस्ती तथा सत्ता शक्ति की तात और इसके रिश्मे राजनीति जैसे पेशे से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं इसलिए अन्य कोई पेशा किसी को  अपनी ओर आकर्षित करे या न करे, राजनीति और इसमें पाया जाने वाला 'ग्लैमर' निश्चित रूप से सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है।

भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य है कि उसमें शिक्षा-दीक्षापढ़ाई-लिखाई और किसी प्रकार के प्रशिक्षण की कोई आवश्यकता नहीं होती, इसलिए इसमें तमाम ऐसे लोग भी सक्रिय हो जाते हैं जो अनपढ़ तो होते ही हैं साथ ही कई क्षेत्रों में भाग्य आज़माने के बाद भी असफल रहे होते हैं, मगर राजनीति में ऐसे लोग भी सफल होने की उम्मीद रखते हैं। इस सोच का मुख्य कारण है भारतीय राजनीति का मतों पर आधारित होना। 

राजनीतिज्ञ यह जानता है कि देश में साठ से लेर सत्तर फीसदी आबादी अशिक्षित और भोली-भाली है। इस बहुसंख्यक वर्ग को तरह-तरह के प्रलोभन, वादों, आश्वासनों तथा जाति-धर्म, वर्ग या किसी अन्य ताने-बाने में उलझा कर अपनी ओर आकर्षित किया जा सता है। यह सोच भी तमाम नाकारा किस्म के लोगों को न केवल राजनीति में पर्दापण के अवसर उपलब्ध राती है बल्कि इस प्रवृति के लोग राजनीति के क्षेत्र में दम रखते ही बड़े-बड़े सुनहरे सपने भी सजोने लग जाते हैं। बाबा रामदेव के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। बाबा अच्छा-भला योग क्रिया  के क्षेत्र में मीडिया विशेषर टीवी चैनलस की कृपा से देश-विदेश में खूब नाम पैदा करने लगे थे। नाम कमाते-कमाते उन्होंने इसी योग के क्षेत्र से दाम भी खूब पैदा किया। बताया जाता है कि रामदेव इसी योग के  चमत्कारस्वरूप तथा योगा जगत से सम्पर्क में आने वाले धनपतियों की दान दक्षिणा से लगभग 11 सौ रोड़ की संपत्ति के स्वामी बन चुके हैं।

क ओर रामदेव योग के क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए अपना जनाधार बढ़ाते गए, तो दूसरी ओर आम लोगों की ही तरह देश के लगभग सभी दलों के राजनेता भी रामदेव की ओर खिंच कर आने लगे।  इसका कारण यह था कि उनके योग शिविरों में आने वाले सैड़ों लोगों से राजनेता अपनी हॉबी’ के मुताबि रू-ब-रू होना चाहते थे। सर्वविदित है कि हमारे देश में नेताओं का भीड़ से बहुत गहरा रिश्ता है। भीड़ को संबोधित रने, उसे अपना चेहरा दिखाने तथा उससे संवाद स्थापित करने के लिए नेता तमाम प्रकाके हथकंडे अपना सता है। ऐसे में किसी भी नेता को रामदेव के योगशिविर में जाने से आखिर क्या आपत्ति हो सकती थी, वहां तो भीड़ के दर्शन के साथ हेल्थ केयर टिप्सतो बोनस में प्राप्त होने थे।
बाबा रामदेव ने भी राजनीतिज्ञों से अपने संबंधों का भरपूर लाभ उठाते हुए योग और आयुर्वेद संबंधी साम्राज्य का न केवल राष्ट्रीय, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक विस्तार किया। इसी दौरान उन्होंने धीरे-धीरे पतंजलि योगपीठदिव्य योग मंदिर, दिव्य फार्मेसी और आगे चलर भारत स्वाभिमान ट्रस्ट नामक संस्थानों व संगठनों की स्थापना र डाली। पर लगता है कि बाबा को लगभग ग्यारह सौ रोड़ रुपये का विशाल साम्राज्य स्थापित करने के बाद भी तसल्ली नहीं हुई और उन्हें ऐसी गलतफहमी पैदा होने लगी कि क्यों न देश की राजनीति को अपने नियंत्रण में लेकर इस देश की सत्ता पर भी नियंत्रण रखा जाए। उन्हें यह भी मुगालता होने लगा कि उनका खुद का व्यक्तित्व ही कुछ निराला है, तभी तो सत्ता और विपक्ष का बड़ा से बड़ा नेता उनके योग शिविर में उनके निमंत्रण पर खिंचा चला आता है।

इस मुगालते ने धीरे-धीरे अहंकार का वह रूप धारण र लिया, जिसने बाबा रामदेव के मुंह से अहंकामें यह तक निलवा दिया, 'जब देश के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री मेरे चरणों में बैठते हों, फिर आखिर मैं क्यों प्रधानमंत्री बनना चाहूंगा।' इतने अहंकार भरे शब्द शायद ही अब तदेश के किसी प्रमुख व्यक्ति या साधु-संत के मुख से निले हों। शायद योग शिविर के नाम पर लाखों लोगों को इकट्ठा करने वाले इस योगगुरु को यह भ्रम भी हो गया होगा कि जो भीड़ उन्हें विश्वविख्यात योगऋषि बना सती है, उसी के कन्धों पर सवार होर वे देश की लोतांत्रिक-राजनीतिक व्यवस्था पर भी ब्ज़ा जमा सते हैं। हो सकता है इसीलिए बाबा रामदेव ने विदेशों से काला धन वापसी का मुद्दा कुछ इस अंदाज़ में उठाया गोया देश में वही अकेले ऐसे व्यक्ति हों जिन्हें विदेशों से काला धन वापस मंगाने की सबसे अधिचिंता हो या देश की जनता ने उन्हें इस काके लिए अधिकृत कर दिया हो।

दरअसल, रामदेव ने आम लोगों को भावनात्मक रूप से अपने साथ जोडऩे की  गरज़ से मुद्दा तो काले धन की वापसी का उठाया, लेकिन धीरे-धीरे वे देश में अपनी राजनीतिक शक्ति को भी तौलने लगे। पिछले संसदीय चुनावों में स्वाभिमान ट्रस्ट द्वारा शत-प्रतिशत मतदान रने की अपील के साथ पूरे देश में तमाम जगहों पर रैलियां भी निकाली गईं। यह सब कार्रवाई केवल नवगठित भारत स्वाभिमान संगठन’ की ज़मीनी हकीकत को मापने तथा इसे प्रचारित रने के लिए की गई थी। मगर राजनीतिक तिड़मबाजि़यों से अनभिज्ञ रामदेव की भारतीय राजनीति के क्षितिज पर चमने की मनोकामना आखिरकार उस समय धराशायी हो गई जब वे रामलीला मैदान से अपने समर्थकों और अनुयायियों को उनके हाल पर छोड़ र स्वयं पुलिस से डर र किसी महिला के कपड़े पहनर भाग निले। पुलिस ने इसी हालत में उनको गिरफ्तार कार लिया।

उनकी दूसरी बड़ी किरकिरी उस समय हुई जब वे नींबू-पानी व शहद ग्रहण करने के बावजूद स्वयं को अनशनकारीबताते रहे। उन्हें सबसे अधिमुंह की तब खानी पड़ी, जब इस तथाथित अनशन को समाप्त रने के लिए भी केंद्र सरकार का कोई प्रतिनिधि उन्हें मनाने नहीं गया। उन्होंने कुछ संतों की गुज़ारिश पर अपनी कोई मांग पूरी हुए तथा किसी सरकारी आश्वासन के बिना नशन तोड़ दिया। अब यही बाबा रामदेव राजनीति से वास्तविक  साक्षात्कार’ होने के पश्चात काले धन की वापसी पर तो कम बोलते दिखाई दे रहे हैं, मगर अब उन्हें लोगों को यह बताना पड़ रहा है कि वे रामलीला मैदान से क्यों भागे, उन्होंने औरतों के कपड़े किन परिस्थितियों में पहने तथा अपना तथाकथित अनशन उन्हें कैसे  तोडऩा पड़ा।

अब वे अपनी धन-सपत्ति तथा तमाम आरोपित अनियमितताओं का जवाब देते फिर रहे हैं। रामलीला मैदान से उनके भेष बदल कर पलायन करने की घटना को भी संत समाज कायरतापूर्ण कार्रवाई बता रहा है जबकि बाबा रामदेव और उनके समर्थक इसे वक्त की ज़रूरत तथा सूझबूझ भरा दम बता रहे हैं। बहरहाल बाबा रामदेव की मुश्किलें निकट भविष्य में खत्म होती दिखाई नहीं दे रही हैं। प्रत्येक आने वाला दिन उनके लिए विशेषकर उनके महत्वाकांक्षी राजनीतिक अस्तित्व के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है।

ल तक जिस अहंकार से रामदेव ने अन्ना हज़ारे के लिए यह कहा था कि-अन्ना हज़ारे पहले महाराष्ट्र तक सीमित थे उन्हें अपने मंच पर लाकर राष्ट्रीय स्तर पर मैंने उनका परिचय देशवासियों से कराया। जिस अन्ना हज़ारे के जंतर-मंतर पर आयोजित अनशन को बौना करने की गरज़ से उन्होंने अपना रामलीला मैदान का शोआयोजित किया था, अब वही अन्ना अपने भविष्य के कार्यक्रम में रामदेव को अपनी शर्तों के साथ शामिल करने की बात कह रहे हैं। खबर तो यह भी है कि 16 अगस्त के अन्ना हज़ारे प्रस्तावित अनशन में रामदेव से जनता के बीच में बैठ कर अनशन में शरीक होने की बात की जा रही है, न कि मंच सांझा करने की बात। उधर प्रवर्तन निदेशालय बाबा रामदेव द्वारा इकट्ठी की गई 1100 करोड़ की संपत्ति की जांच करने में इस संदेह के कारण लग गया है कि कहीं रामदेव द्वारा फेमा नियमों का उल्लंघन तो नहीं किया गया?

रामदेव के परम सहयोगी बालकृष्ण पर दो पासपार्ट रखने तथा इन पासपोर्ट पर कई विदेशी यात्राएं करने जैसे आरोप लग रहे हैं। कुल मिला कर हम यह कह सकते हैं कि बाबा रामदेव को योग ने तो आसमान पर चढ़ा दिया लेकिन राजनीतिक  महत्वाकांक्षा उन्हें ले डूबी। 

लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.