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Aug 5, 2011

भ्रष्टाचार के आगे घुटने मत टेको लोगों

आम जनता जिस सीबीआई को सबसे विश्वसनीय जांच एजेंसी मानती है,उसी सीबीआई के 55अधिकारी भ्रष्टाचार और आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति के व अन्य आरोपों का सामना कर रहे हैं...

संजय स्वदेश

सरकार के चतुर मंत्री पहले से ही किसी न किसी तरह से लोकपाल को कमजोर करने जुगत में थे। प्रधानमंत्री और जजों के इसके दायरे में नहीं आने के बाद भी यदि यह ईमानदारी से लागू हो तो कई बड़ी मछलियां पकड़ी जाएंगी। पर महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या लोकपाल की व्यवस्था से देश से भ्रष्टाचार मिट जाएगा। देश में और भी कई एजेंसियां इस कार्य के लिए सक्रिय हैं।

एक इकाई पुलिस की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा भी है। जरा इसकी कार्यप्रणाली पर गौर करें। महीने में तीस कार्रवाई भी नहीं होती। इस विभाग में आने वाले अधिकारी आराम फरमाते हैं। यदि कोई शिकायत लेकर आ भी जाए तो पहले उससे पुलिसिया अंदाज में पूछताछ की जाती है। पूरे ठोस प्रमाण प्रार्थी के पास हो तो कार्रवाई होती है। नहीं तो शिकायत पर,यह विभाग कई बार भ्रष्टाचारी से मिल जाता है। उससे कुछ ले-देकर मामला रफा-दफा कर देता है।

ऐसी शिकायतें लेकर इक्के-दुक्के लोग ही आते हैं। कई मामलों में ऐसा पाया गया है कि जब कोई कोई भ्रष्टाचार पीड़ित दुखिया एसीबी के द्वार पर जाता है तो उसकी शिकायत ले कर चुपके-चुपके संबंधित विभाग से सांठगांठ कर ली गई। कई प्रकरणों में रंगे हाथ पकड़े जाने के महीनों बाद तक भी कोर्ट में चालान पेश नहीं किया गया।

इसी तरह भ्रष्टाचार पर नकेल के लिए सतर्कता आयोग भी है। पर थॉमन प्रकरण ने जाहिर कर दिया कि इस आयोग के मुखिया भ्रष्टाचार के आरोपी भी हो सकते हैं। तक क्या खाक ईमानदारी से कार्य होने की अपेक्षा होगी।

एक और बात सुनिये। आम जनता जिस सीबीआई को सबसे विश्वसनीय जांच एजेंसी मानती है, उसी सीबीआई के 55अधिकारी भ्रष्टाचार और आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति के व अन्य आरोपों का सामना कर रहे हैं। यह कहने वाला कोई विपक्षी या सामाजिक कार्यकर्ता नहीं है।

इसकी जानकारी कार्मिक,लोक शिकायत और पेंशन मामलों के राज्य मंत्री वी नारायणसामी ने 4 अगस्त को संसद में थी। इन अधिकारियों में 20के खिलाफ रिश्वत और आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति के आरोप हैं। जब जांच एजेंसियों की अंदरुनी हकीकत भ्रष्टाचार है,तो फिर ईमानरी के कायास कहां लगाये जायें।

भ्रष्टाचार के मामले में रंगे हाथ पकड़े जाने के बाद भी लंबी न्यायिक प्रक्रिया और उसमें से बच निकलने की संभावना भ्रष्टाचारियों के इरादे को नहीं डगमगा पाती है। यदि ऐसे मामले में एक साल के अंदर ही दोषी को सजा दे दी जाए तो जनता में विश्वास भी जगे। पर एक दूसरी हकीकत यह है कि जनता बैठे-बिठाये यह चाहती है कि देश से भ्रष्टाचार खत्म हो जाए,जो संभव नहीं है।
 
लोकतंत्र के नस-नस में भ्रष्टाचार घुलमिल गया है। सरकारी महकमे में जिनका भी काम पड़ता है, वे भ्रष्टाचार से संघर्ष के बिना सीधे घुटने टेक देते हैं। इस हार को जनता बुद्धिमानी कहती है। यह व्यवहारिक है। कौन बाबू से लड़ने झगड़ने जाए। इस सोच ने भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत कर दिया है।
 
यदि कोई लड़ने भी जाए तो उसके कागजों में तरह-तरह के नुस्क निकाल कर इतना प्रताड़ित किया जाता है कि वह घुटने टेकना मजबूरी हो जाती है। लिहाजा,जनता के लिए भ्रष्टाचार के सामने नतमस्तक की बेहतर विकल्प अच्छा लगता है। इस सोच के रहते भ्रष्टाचार के खत्म और सुशासन की कल्पना, कल्पना भर है। हकीकत में भ्रष्टाचार मिटाना है तो जनता के मन से भ्रष्टाचार को नमन की प्रवृत्ति मिटानी ही पड़ेगी।
 
भ्रष्टाचार के विरूद्ध परिवर्तन   की बात करने वालों को पहले जनता के मन से इस सोच को मिटाने के लिए आंदोलन चलाना चाहिए। जब तक यह सोच खत्म नहीं होगी,भ्रष्टाचार की जड़ कमजोर नहीं होगी। यदि यह बात गलत होती तो देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध परिवर्तन के तमाम कारण होने के बावजूद भी किसी परिवर्तन  की सुगबुगाहट नहीं है।
 

Aug 2, 2011

कायर सत्याग्रही और दमनकारी सरकार

अन्ना हजारे द्वारा  भ्रष्टाचारियों के मांस को गिद्धों -कुत्तों को खिलाने के आह्नान से लेकर बाबा रामदेव के ऊलजलूल बयानों और राजघाट पर भाजपाइयों के नाच तक,सत्याग्रह के विचार और तरीके के अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखने को मिलती है...

प्रेम सिंह

पक्ष चाहे सरकार का हो या सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का, भ्रष्टाचार-विरोध को लेकर दिल्ली में पिछले कुछ महीनों से जो दृश्य जारी है उसमें संगति कम और बेतुकापन ज्यादा दिखाई देता है। उससे भ्रष्टाचार मिटने वाला नहीं है। बात-बात पर और पहले ही दिन से आमरण अनशन पर बैठ जाने और सरकार या सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के कानून बन जाने से भ्रष्टाचार पर लगाम भी नहीं कसी जा सकेगी। इस हकीकत के कई उदाहरण भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दौरान ही देखने को मिलते हैं।

उनमें एक उदाहरण राष्ट्रमंडल खेलों में हुए भ्रष्टाचार का है। राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन पूरी तरह से भ्रष्टाचार का खेल बन जाने पर भी देश के प्रधानमन्त्री  से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री तक चुप्पी मारे रहे। जब घड़ा खेल होने से पहले ही पफूट गया तो प्रधनमंत्री ने डेमेज कंट्रोल के लिए आनन-फानन में जांच के लिए शुंगलु समिति नियुक्त की। शुंगलु समिति की रपट में दिल्ली की मुख्यमंत्री और राज्यपाल की भूमिका पर सीधे सवाल उठाए गए हैं। वैसे भी इतना बड़ा और खुला घोटाला मुख्यमंत्री और राज्यपाल की आंख बचा कर हो ही नहीं सकता था।

लेकिन दिल्ली मुख्यमंत्री ने शुंगलु समिति की रपट की ही जांच करा डाली है। होना तो यह चाहिए था कि शुंगलु समिति का गठन करने वाले प्रधनमंत्री को रपट आने के तुरंत बाद मुख्यमंत्राी और राज्यपाल की भूमिका पर जांच बिठानी चाहिए थी। आप गौर कर लें, भ्रष्टाचार का यह खेल  इंडिया अंगेस्ट करप्शन की नाक नीचे हुआ है, लेकिन इंडिया अंगेस्ट करप्शन के बांकुरे विरोध् के किसी भी मंच अथवा स्थल पर नहीं पहुंचे। न ही अपने मंच से कोई विरोध् किया। क्या वे बता सकते हैं उनका लोकपाल इस मामले में क्या करेगा?

स्पैक्ट्रम 2घोटाले में फंसे डी राजा ने अदालत में बयान दिया है कि जो हुआ पीएम,एफएम, केबिनेट और टेलकॉम मंत्रालय के आला अधिकारीयों  की जानकारी और सहमति से हुआ। टीम हजारे का लोकपाल किस-किस को फांसी पर चढ़ाएगा?कांग्रेस राजा के बयान को आरोपी का बयान कह कर खारिज कर सकती है,लेकिन कौन नहीं जानता मामला अगर एफडीआई का हो तो सहमति होगी, भले ही उसमें संवैधानिक प्रावधनों का कितना भी उल्लंघन और कितना भी भ्रष्टाचार होता हो। जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति के आने पर भारत की सुरक्षा व्यवस्था निरर्थक हो जाती है,उसी तरह एफडीआई के आने पर भारतीय संविधन निरर्थक हो जाता है। एफडीआई और भ्रष्टाचार नाभि-नाल जुड़े हैं।

सगुण विरोध् की जगह केवल निर्गुण विरोध् निरी हवाबाजी है,और हवाबाजी से भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता। लाख बचाने की कोशिशों के बावजूद किसी डी राजा या किसी कलमाडी के फंस जाने पर जिन भले लोगों को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलती नजर आने लगती है, उन्हें गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा कि अगर भ्रष्टाचार मिटाना है तो उसके लिए वास्तव में क्या करना होगा। वह कर्तव्य नवउदारवादी लूट पर कायम शाइनिंग इंडिया के ‘आदर्श’ पर तय नहीं किया जा सकता। उसके बाहर छूटे भारत के यथार्थ से वह तय होगा। मुक्तिबोध् ने पूछा था, ‘कामरेड आपकी पॉलिटिक्स क्या है?’ तय तो होना चाहिए आप किस जमीन पर खड़े होकर बहस कर रहे हैं।

गाँधी ने हिंसा,विग्रह और शोषण से ग्रस्त अधिनिक  औद्योगिक व्यवस्था में दमन और अत्याचार का प्रतिकार करने और अंततः उसे बदलने के उद्देश्य से दक्षिण अप्रफीका में सत्याग्रह के तरीके का संधन किया था। देश की आजादी के संघर्ष में उन्होंने सत्याग्रह और सिविल नापफरमानी के तरीके का उपयोग कियाऋ गोकि आजादी के संघर्ष में सशस्त्रा और भूमिगत क्रांतिकारी तरीके भी उपयोग में लाए गए थे और बलिदान की कसौटी पर उनकी सार्थकता कम नहीं थी। खुद गाँधी ने 1942में ‘करो या मरो’ का नारा दिया था जिसमें देश के हर नागरिक से उपनिवेशवादी सत्ता के जुझारू प्रतिरोध् का आह्नान था। आजाद भारत में डॉ. राममनोहर लोहिया ने गांध्ी की अन्याय के प्रतिकार की सत्याग्रह और सिविल नापफरमानी की कार्यप्रणाली को दुनिया की अभी तक की सबसे बड़ी क्रांति बताया।

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचारियों के मांस को गिद्धों -कुत्तों को खिलाने के आह्नान से लेकर बाबा रामदेव के ऊलजलूल बयानों और राजघाट पर भाजपाइयों के नाच तक,सत्याग्रह के विचार और तरीके के अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। जिस तरह से अस्सी और नब्बे के दशकों में र्ध्मनिरपेक्षता के पद ने चौतरपफा ठोकरें खाईं और अपना अर्थ गंवा दिया, वही हालत इध्र सत्याग्रह पद की बन गई है।

अगर आजादी के संघर्ष के नेताओं की अपनी और उनके बारे में उपनिवेशवादी सत्ता की लिखतें हमारे सामने नहीं होतीं तो नई पीढ़ियों को यही लगता कि भारत में शुरू से ही बकवादियों का बोलबाला रहा है। लोग यही मानते कि गांध्ी और उनका सत्याग्रह भी वैसा ही तमाशा थे जैसा जंतर-मंतर,रामलीला मैदान और राजघाट पर देखने को मिलता है। जिसमें कोई हिंसक ललकार दे रहा है,कोई जनाना कपड़ों में रात के अंध्ेरे में छिप कर भाग रहा है,कोई सत्ता की सूंघ से मतवाला होकर नाच रहा है।

हम यह नहीं कहते कि पूर्व प्रचलित पदों-अवधरणाओं और तरीकों का मौजूदा संदर्भों में नवोन्मेषकारी अर्थ व प्रयोग नहीं हो सकताऋ बल्कि वह होना चाहिए। लेकिन अपने स्वार्थवश या अपनी कमजोरियों पर परदा डालने के लिए उनका रूप बिगाड़ देना उनके आविष्कर्ताओं को लांछित करने के साथ संघर्ष की परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति द्रोह है। नवउदारवाद के हमाम में जो हालत र्ध्मनिरपेक्षता की हो चुकी है,वही गांध्ी और सत्याग्रह की होने जा रही है।

दिल्ली से खदेड़े जाने के अगले दिन जब रामदेव का टीवी पर हरिद्वार से प्रसारण आया तो मेरे 14 साल के बेटे ने कहा कि बाबा तो बुरी तरह डर गया है। दुनिया को स्वास्थ्य और शक्ति के नुस्खे बांटने वाले रामदेव चार दिन के अनशन में बेहाल हो गए। नुस्खे वे आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के भी बांटते हैं। लेकिन भोगियों के इस योगी में न आध्यात्मिक शक्ति का लेश निकला न शारीरिक शक्ति का। वह दरअसल उनमें कभी थी ही नहीं। आपको याद होगा,कुछ साल पहले उनके कारखाने में बनने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता और काम करने वाले मजदूरों के शोषण पर सवाल उठे थे। बाबा हल्की पेंदी के तवे की तरह गरम हो गया था और अनर्गल प्रलाप करने लगा था। नवउदारवाद की प्रयोगशाला में ऐसे ही योगी ढलते हैं।


दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक और राजनितिक -सामाजिक मसलों के लेखक.
 
 
 
 
 
 
नोट : प्रकाशित लेख 'नवउदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्टाचार' का एक हिस्सा है. पुरे लेख को पढने के लिए दाहिनी तरफ ऊपर देखें.

Jul 8, 2011

सांसद निधि में वृद्धि क्यों?


सांसद निधि के दुरुपयोग के कई मामले सामने आए हैं। आंध्र प्रदेश के छह जिलों में तो इस मद में जारी 64करोड़ रुपए बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में रखकर उनसे ब्याज कमाया जा रहा था...

राजेंद्र राठौर

देश के आधे से अधिक सांसदों ने वर्ष 2010-11  में विकास निधि का 35फीसदी हिस्सा खर्च नहीं किया है। देश में 20सांसद ऐसे भी है, जिन्होंने तो अपने क्षेत्र के विकास में फूटी कौड़ी खर्च नहीं की है,जबकि कुछ सांसद विकास निधि बांटने में अव्वल है,उन्होंने कमीशनखोरी कर प्राइवेट संस्थाओं को सांसद निधि की राशि रेवड़ी की तरह बांटी है। ऐसे में सांसद निधि की राशि दो करोड़ से बढ़ाकर पांच करोड़ किए जाने का आखिर औचित्य ही क्या है?
सांसद निधि के सही उपयोग से कई क्षेत्रों की तस्वीर बदल गई है, वहीं कई क्षेत्रों में तो सांसद निधि का जमकर दुरूपयोग हुआ है। अपने प्रतिनिधियों के साथ मिलकर सांसदों ने इस निधि में करोड़ों की हेराफेरी की है, जिससे उस क्षेत्र में विकास कार्य नहीं हो सका है। कुछेक सांसदों को छोड़कर बात करें तो कई राज्यों के ज्यादातर सांसद ऐसे हैं,जिन्होंने अपनी निधि से राशि स्वीकृत करने के एवज में एक निश्चित राशि कमीशन बतौर ली है।

काम व राशि के हिसाब से सांसदों ने कमीशन भी तय कर रखा है,जिसे देकर कोई भी व्यक्ति या प्राइवेट संस्था,सांसद निधि से अनुदान प्राप्त कर सकता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण छत्तीसगढ़ राज्य में देखा जा सकता है। यहां जरूरतमंद या सरकारी संस्थाओं को लाभ भले ही न मिले,लेकिन प्राइवेट संस्थाओं को सांसद निधि की राशि आसानी से मिल रही है। भाजपा शासित राज्य होने के बावजूद यहां के ज्यादातर भाजपाई सांसदों ने अपने निधि से सरकारी संस्थाओं के बजाय प्राइवेट स्कूल,कालेज व संगठनों को लाखों रूपए अनुदान दिया है।

कई प्राइवेट संस्था तो ऐसे भी है,जिन पर सांसद भारी मेहरबान है और एक सत्र में ही उन्हें तीन-चार बार अनुदान राशि दी गई है। सांसद निधि स्वीकृत करने के पीछे का खेल बहुत लंबा-चौड़ा है। सांसदों ने अपने चहेतों को अनुदान राशि बिना किसी स्वार्थ के खैरात की तरह नहीं दी है,अनुदान राशि स्वीकृत करने के लिए सांसदों ने कुल राशि में से 20 से 30 फीसदी कमीशन लिया है। अनुदान राशि भी उन्हीं लोगों को दी गई है,जिन्होंने कमीशन पहले दिया है। यही नहीं सांसद निधि स्वीकृत कराने के लिए दलाल एक महत्वपूर्ण कड़ी बने हुए हैं,जो सांसदों को ग्राहक ढूंढ़कर देने में अहम् भूमिका निभा रहे हैं।

सांसद निधि के दुरुपयोग के कई मामले सामने आए हैं। आंध्र प्रदेश के छह जिलों में तो इस मद में जारी 64करोड़ रुपए बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में रखकर उनसे ब्याज कमाया जा रहा था। नियमों के मुताबिक यह राशि राष्ट्रीय बैंकों के बचत खाते में ही रखी जा सकती है,ताकि जरूरत पड़ने पर उसे फौरन उपयोग में लाया जा सके। मामले की शिकायत के बाद छानबीन में पाया गया कि कई राजनेताओं ने अपने रिश्तेदारों के स्कूलों और क्लबों तक में सांसद निधि खर्च करवा दी।

चार साल पहले एक स्टिंग ऑपरेशन में कुछ सांसदों को इस योजना के ठेकों में कमिशन की बात करते पकड़ा गया था। इससे स्पष्ट होता है कि बहुत से सांसद इस निधि से व्यक्तिगत हित ही साधना चाहते हैं। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते हैं,तो वे इसके उपयोग में ही हीलाहवाली करते हैं। इस कारण सांसद निधि खर्च ही नहीं हो पाती। पिछले 16 वर्षों में सरकार द्वारा जारी की गई सांसद निधि के 1053.63 करोड़ रुपए खर्च नहीं किए गए। सांसद निधि योजना तो अच्छी है, लेकिन इस योजना के तहत् राशि स्वीकृत करने के पीछे तमाम तरह की खामियां है।

इस बात को केन्द्र सरकार भी भलीभांति जानती है,फिर भी आंख बंद किए हुए देश की बर्बादी तमाशा देख रही है। सांसद निधि के दुरूपयोग की शिकायतें छत्तीसगढ़ राज्य ही नहीं बल्कि, देश के कई राज्यों से आए दिन सामने आ रही है, लेकिन एक भी मामले में सांसद के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे साफ जाहिर होता है कि सरकार ही नहीं चाहती कि जनता को उनका जायज हक मिले। यही वजह है कि जनता के लिए सरकार से मिलने वाली राशि का ज्यादातर हिस्सा सांसद व उनके चमचे ही हजम कर जा रहे है, फिर भी सांसदों को निधि के तहत् मिल रहा 2 करोड़ रूपए कम लग रहा था।
केन्द्र सरकार से सांसद बार-बार विकास निधि बढ़ाए जाने की मांग कर रहे थे। राशि बढ़ाने के संबंध में सांसदों का तर्क था कि महंगाई के इस दौर में 2 करोड़ रूपए विकास कार्यो के लिए पर्याप्त नहीं है। राशि कम होने की वजह से क्षेत्र में अपेक्षित विकास कार्य नहीं हो पा रहे हैं। सांसद निधि में वृद्धि को लेकर केन्द्र सरकार लंबे समय से विचार कर रही थी। आखिरकार 7 जुलाई को कैबिनेट ने सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि योजना के तहत प्रत्येक सांसद को मिलने वाली दो करोड़ की राशि को बढ़ाकर पांच करोड़ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।

इससे इस योजना के तहत विकास कार्यों के लिए सांसदों को मिलने वाली राशि प्रतिवर्ष 1580से बढ़कर 3950करोड़ रुपए हो जाएगी और सरकारी खजाने पर प्रतिवर्ष 2370करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। कैबिनेट की बैठक में यह भी बताया है कि सांसद विकास निधि योजना के शुरू होने से लेकर 31 मार्च 2011 तक 22490.57 करोड रुपए जारी किए जा चुके हैं। वहीं इस योजना के तहत 31 मार्च 2011 तक 13.87 लाख कार्यों की सिफारिश सांसदों ने की तथा जिला अधिकारियों ने 12.30 लाख कार्यों को मंजूर किया एवं 11.24लाख कार्य पूरे किए गए।

हाल ही में 15 वीं लोकसभा के 2011-11 के कामकाज पर स्वयंसेवी संस्था मास फार अवेयरनेस के वोट फार इंडिया अभियान द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट की बात करें तो देश के आधे से अधिक सांसदों ने सही तरीके से इस निधि का उपयोग नहीं किया है। रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि इस निधि का महज 35 फीसदी हिस्सा ही सांसद खर्च कर पाए हैं। देश में 20 सांसद ऐसे भी हैं, जिन्होंने वर्ष के दौरान निधि से एक पैसा भी खर्च नहीं किया है,जिनमें भारतीय जनता पाटी के सांसद शाहनवाज हुसैन तथा कांग्रेस के सीपी जोशी भी शामिल है,जबकि सांसद निधि का कम उपयोग करने वाले सांसदों में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी, राहुल गांधी, सचिन पायलट, जनता दल यूनाईटेड के शरद यादव, राष्ट्रीय लोक दल के अजीत सिंह के नाम शामिल है। सांसद निधि का मिजोरम के सांसदों ने भरपूर उपयोग किया है।

बहरहाल, अगर इस धन का सही उपयोग हुआ होता, तो इतने वर्षों में ग्रामीण भारत की तस्वीर ही बदल चुकी होती, लेकिन यह निधि सार्वजनिक धन की बर्बादी का ही जरिया बनती जा रही है। ऐसे में सांसद निधि की राशि 2करोड़ से बढ़कर 5करोड़ हो जाए,या फिर 10करोड़, सांसदों के कमीशनखोरी की भूख मिटने वाली नहीं है और न ही देश के पिछले क्षेत्रों में विकास के कोई बड़े कार्य होने की उम्मीद है।

 

छत्तीसगढ़ के जांजगीर के राजेंद्र राठौर पत्रकारिता में 1999से जुड़े हैं.लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए 'जन-वाणी' ब्लॉग लिखते है.