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Jun 21, 2017

जांच टीम को नहीं मिला गांव में कोई रोगी, जबकि रोज अस्पताल पहुंच रहे मलेरिया मरीज

स्वास्थ्य महकमे की टीम ने अपनी नौकरी बचाने के लिये सर्वे रिपोर्ट को तोड़ मरोड़ के ही पेश किया है..............

उत्तराखंड, हल्द्वानी। भीमताल ब्लॉक के रौसिला व भौरसा गांव में मलेरिया का प्रकोप बरकरार है। स्वास्थ्य महकमे की टीम ने दावा किया था कि यहां किसी मरीज में भी मलेरिया के लक्षण नहीं हैं। इसके बावजूद यहां से मलेरिया रोगियों का हल्द्वानी के अस्पतालों में आना जारी है। इससे स्वास्थ्य विभाग की टीम का गांव में मलेरिया न फैलने का दावा झूठा साबित हो रहा है।

रौसिला व भौरसा गांव में पिछले दिनों मलेरिया के मरीजों होने की बात सामने आयी थी। हल्द्वानी के सरकारी व निजी अस्पतालों में यहां से कई लोग इलाज कराने पहुंचे। इसके बाद स्वास्थ्य महकमे की टीम गयी थी। टीम ने 52 रोगियों के ब्लड सैंपल लिये थे। जिला मलेरिया रोग अधिकारी अर्जुन सिंह राणा ने उच्चाधिकारियों को सौंपी रिपोर्ट में कहा था कि उक्त 52 रोगियों में से किसी में भी मलेरिया के लक्षण नहीं पाये गये हैं, जबकि रौसिला व भौरसा गांव से मलेरिया रोगियों का उपचार कराने के लिए यहां के अस्पतालों में आना जारी है।
जगदीश पांडे, मंजू पलडिय़ा, देवकी गोस्वामी, भवानी देवी साल का भी इलाज हल्द्वानी के सोबन सिंह जीना अस्पताल में चला। यह सभी मलेरिया से पीडि़त हैं। इससे पहले रौसिला गांव के कुछ मरीजों में पिछले दिनों में मलेरिया होने की पुष्टि हो गयी है। ऐसे में स्वास्थ्य महकमे की टीम द्वारा मलेरिया को लेकर इन गांवों में किये गये सर्वे की रिपोर्ट संदिग्ध नजर आती है, वहीं नैनीताल जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी ने कहा है कि रौसिला गांव क्षेत्र में स्वास्थ्य महकमे की टीम ने सर्वे किया था।
रिपोर्ट में कहा गया था कि लोगों को बुखार आने की बड़ी वजह वायरल है। अगर यहां से अभी भी मलेरिया रोगियों का अस्पताल आना जारी है तो मामले की जांच करवायी जायेगी। देखा जाये तो स्वास्थ्य महकमे की टीम ने अपनी नौकरी बचाने के लिये सर्वे रिपोर्ट को तोड़ मरोड़ के ही पेश किया है।
रौसिला-भौरसा गांव जमरानी क्षेत्र के आसपास हैं। यहां जमरानी बांध बनाया जाना प्रस्तावित है। फिलहाल तो यहां अवैध खनन का काम जोरों पर होता है। गांव वालों का कहना है कि खनन करके गौला नदी में बड़े बड़े गड्ढे बना दिये जाते हैं। हल्की बारिश में इन गड्ढों में पानी भर जाता है जिससे यहां बीमारी पनपती है। इसके अलावा खनन कार्य में लगने वाले मजदूरों के शौच की भी कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिये वह नदी किनारे खुले में ही शौच करते हैं।

Jan 18, 2017

मित्रों! एनडी तिवारी प्ले व्वाय नहीं, नेता हैं

आप फेसबुक को एक तरफ से खंगाल लीजिए। बारी—बारी से सबकी वॉल देख लीजिए। आपको गिनती के लोग नहीं मिलेंगे जो एनडी तिवारी की भाजपा में जाने पर राजनीतिक आलोचना कर रहे हों और पूछ रहे हों कि राष्ट्रवादी यजमानी खाये बिना कब्र में शांति नहीं मिलेगी क्या पंडीजी? 

सभी उनके 'सेक्स कांड' की चर्चा कर रहे हैं? इस चर्चा में जाति—धर्म—लिंग—संप्रदाय की दीवारों को तोड़कर लोग समवेत स्वर में सेक्स के शॉट्स से लेकर तस्वीरें शेयर कर रहे हैं।

भरे—पुरे चुनावी मौसम में यह सब देख ऐसा लग रहा है मानो एनडी तिवारी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि 'राष्ट्रवादी प्ले ब्वॉय' रहे हों और उन्होंने लखनउ और देहरादून में राज्य की मुखिया की नहीं, बल्कि कोठे के मालिक की भूमिका निभाई हो।

उनकी प्ले ब्वाय की छवि और लोगों का बड़े पैमाने पर फेसबुक पर चल रहा 'पोर्नवादी' आनंद बताता है कि चुनावों में मुद्दा और मुद्दे की राजनीति सामाजिक कार्यकर्ताओं की जुगाली, अखबारों के संपादकीय और टीवी के पकाउ डिबेट्स की चीज बनकर रह गयी है।

अन्यथा जो आदमी उत्तर प्रदेश का तीन बार और उत्तराखंड का एक बार मुख्यमंत्री रह चुका हो उसको लेकर सबसे लोकप्रिय और जनप्रिय सवाल उसका सेक्स कांड ही क्यों बनता? ​वह भी वह सेक्स कांड जिसमें कोई शिकायतकर्ता नहीं है, सिवाय कि किसी ने चोरी से वीडियो बना लिया।

Oct 15, 2016

हत्या के 4 दिन बाद भी नहीं गया कोई सवर्ण झांकने

गांव में पहले भी हो चुकी एक दलित की हत्या 

नरेंद्र देव सिंह की रिपोर्ट

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के करडिय़ा गांव में एक दलित को सवर्ण जाति के एक व्यक्ति ने चक्की छू लेने की सजा उसकी गर्दन काट के दी। मामला सुर्खियों में आ गया। राष्टï्रीय मीडिया ने भी इसे जोर शोर से प्रसारित किया लेकिन अभी भी इस गांव के असली सच सामने नहीं आये हैं।

सोहन राम की पत्नी से बात करते बामसेफ के सदस्य

असल में हुआ क्या था
सोहन राम 5 अक्टूबर को कुंदन सिंह भंडारी की चक्की में गेहूं पिसाने गया था। एक स्कूल टीचर ललित कर्नाटक ने सोहन राम द्वारा चक्की छू लिये जाने पर उसे अपवित्र करने की बात कह कर उस पर जातिसूचक गालियों के साथ चिल्लाने लगा। ललित ने कहा, 'तूने नवरात्र में चक्की को अपवित्र कर दिया।' और इसी बात पर तैश में आकर ललित ने सोहन की दराती से गर्दन काट कर हत्या कर दी।

केस वापस लेने का दबाव
करड़िया का दौरा कर लौटे बामसेफ से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता मनोज कुमार आर्या ने बताया कि पीडि़त परिवार ही नहीं बल्कि यहां रहने वाले अन्य दलित परिवार भी भय में ही जी रहे हैं। कई बार पीडि़त परिवार को केस वापस लेने की धमकी दी गयी है। सबसे अमानवीय पहलू यह सामने आया कि सोहन की हत्या के बाद से चार दिन तक उस परिवार में कोई भी सामान्य जाति का व्यक्ति संवेदना व्यक्त करने के नाम पर झांकने तक नहीं आया।

मनोज आर्या के मुताबिक, 'जब कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा इस घर में पहुंचे तब उस गांव के प्रधान ने पहली बार ​दलित परिवार के घर में कदम रखने की जहमत उठायी।'

मृतक सोहन की गर्भवती पत्नी बीना देवी कहती हैं, 'पति की हत्या के बाद परिवार को केस वापस करने की धमकी दी गयी।' बीना रोते हुए कहती हैं, 'सोहन के मरने पर मेरे घर वाले आए थे और कह रहे थे कि इस गांव के दलितों में जितना खौफ है वो कहीं और नहीं देखा।' आरोपी ललित अपनी भाभी की हत्या के मामले में भी अभियुक्त रह चुका है।

हत्या का एफआईआर 15 साल बाद भी नहीं
मृतक सोहन के परिवार के एक रिश्तेदार की भी हत्या हो चुकी है। ग्रामीणों ने बताया कि ​सोहन के रिश्तेदार इसी गांव में रहते थे और उसकी भी हत्या पन्द्रह साल पहले सवर्ण जाति के लोगों ने कर दी थी। इस मामले की आज तक एफआईआर तक दर्ज नहीं हुयी है। ऐसा बिलकुल नहीं है कि जातिवाद की ये नृशंस घटना इस गांव में हाल फिलहाल की घटना है। यह यहां का चलन है और ये हत्या उसकी पराकाष्ठा।

पंद्रह परिवार के पास दो नाली जमीन
यहां शादी ब्याहों के निमंत्रण में सवर्णों और दलितों में दूरी रहती है। अंर्तजातिय विवाह तो सोचना भी पाप है। यहां दलितों के पन्द्रह परिवार के पास केवल दो नाली (लगभग आधा बीघा) जमीन है। ये लोग सवर्णों की जमीन पर ही मजदूरी करते हैं। यहां रहने वाले दलितों का साफ कहना है कि उन्हें दिन भर मजदूरी के बाद भी कभी पचास तो कभी सौ रूपये ही थमा दिये जाते हैं। जहां तक पुलिस व्यवस्था की बात है तो वो कितनी लचर या कहें सवर्णों की गोद में बैठी है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि इस परिवार को सुरक्षा दिये जाने का दावे पुलिस महकमा कर रहा है लेकिन पुलिस तभी आती है जब कोई नेता उस घर तक जाता है। इस गांव में लगभग जितने परिवार सवर्णों के हैं उतने ही परिवार दलितों के भी हैं। मतलब संख्याबल में दलित कम नहीं हैं लेकिन सदियों से किये जा रहे जाति प्रथा के जुल्मों ने इन्हें इतना खोखला कर दिया है कि लोग सही से मुंह तक नहीं खोल पा रहे हैं।

सीएम की मदद की हकीकत
सीएम हरीश रावत ने यहां आकर पीडि़त परिवार को 12 लाख 62 हजार रूपये की मदद देने की घोषणा की। लेकिन इसमें से 5 लाख 62 हजार रूपये समाज कल्याण विभाग इस तरह के मामले में ही पहले से ही देता है। सरकार ने इस रकम को भी सीएम की मदद में जोड़ लिया।

Aug 3, 2011

स्कूलों में भूत भगाते तांत्रिक


विशेष खबर
छात्राओं के चीखने-चिल्लाने और हाथ-पैर पटकने पर जब उनके अभिवावकों ने उन्हें संभालना चाहा तो वे छात्राएं बेकाबू होने लगीं। इस दौरान नौवी-दसवीं की छात्राओं ने नाचना भी शुरू कर दिया और ओझा -सोखा ने इलाज...

सलीम मलिक

उत्तराखण्ड के सरकारी स्कूलों में इन दिनों विद्यार्थियों  में अजीबोगरीब हरकतों की चर्चा जोरों पर है। यह विद्यार्थी स्कूल में अचानक अपने हाथ-पैर पटकते हुये चीखना-चिल्लाना आरम्भ कर रहे है। इस हरकत को ग्रामीण जादू-टोने से जोड़ते हुये प्रभावित विद्यार्थियों पर देवता आने की बात कर रहे हैं। प्रशासन भी इसके हटकर किसी उपचार में कोई मदद नहीं कर पा रहा है जिसके चलते ज्ञान के यह मन्दिर अंधविश्वास की पाठशाला बनने को अभिशप्त हो गये हैं।

समुद्र तल से 1373 मीटर की ऊंचाई पर स्थित नैनीताल जिले के कोटाबाग ब्लॉक में अति दुर्गम क्षेत्र डोला में स्थित राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में छात्रायें बीते एक सप्ताह से विद्यालय परिसर में ही अचानक बेहोश हो जाने, चीखने-चिल्लाने, बदहवासी में हाथ-पैर पटकने जैसी हरकतें कर रही थी। इन हरकतों को छात्रों के अभिवावकों ने दैवीय प्रकोप मानकर इसका उपचार जागर में तलाशते हुये स्कूल में ही जागर का आयोजन किया।

विद्यालय के प्रधानाचार्य उमेश कुमार यादव ने जागर लगाने की बात सुनकर ग्रामीणों को विद्यालय में जागर न लगाने की सलाह दी थी। जिसके बाद सहमति बनी कि जागर लगाने वाले जागरिये की तैनाती तो की जायेगी, लेकिन जब तक कोई छात्रा हरकत नहीं करेगी, तब तक जागरिये कोई हस्तक्षेप नही करेंगे, लेकिन विद्यालय में छुट्टी होने के बाद स्कूल में जागर का आयोजन किया जायेगा।

छुट्टी के समय तक किसी छात्रा में इस प्रकार के कोई लक्षण नहीं पाये गये तो जागरिये ने विद्यालय में छुट्टी के तुरन्त बाद सभी विद्यार्थियों को स्कूल के बरामदे में बैठाकर मंत्रोच्चारण करते हुये उन पर मंत्र फूंके गये चावल फेंकने आरम्भ कर दिये। इसी के साथ डंगरिये ने गौमूत्र का छिड़काव करना आरम्भ कर दिया। देखते ही देखते अचानक छात्राओं ने चीखना-चिल्लाना आरम्भ कर दिया। इस दौरान पांच छात्राओं ने इस प्रकार की हरकतें कीं।

छात्राओं के चीखने-चिल्लाने और हाथ-पैर पटकने पर जब उनके अभिवावकों ने उन्हें संभालना चाहा तो वे छात्राएं बेकाबू होने लगीं। इस दौरान नौवी-दसवीं की छात्रायें खष्टी, नीरु, तुलसी, गंगाशाही, उमा, सोनम रावत आदि ने नाचना भी आरम्भ कर दिया। घटना के दौरान प्रधानाचार्य सहित विद्यालय का पूरा स्टाफ, अभिवावक जनप्रतिनिधि और चिकित्सक मौजूद थे। बाद में सभी प्रभावित छात्राओं को बामुश्किल एक-एक करके पकड़ते हुये स्कूल परिसर से बाहर लाया गया, जहां वे जमीन पर ही बेहोश होकर गिर पड़ी। 

देर तक प्रभावित छात्राओं को डंगरिये ने भभूति लगायी, जिसके बाद उनके परिजन उन्हें कंधों पर लादकर घर ले गये। इस मामले में प्रधानाचार्य का कहना है कि प्रभावित सभी छात्राओं में मानसिक रोगियों वाले लक्षण लगते हैं, इसलिये प्रभावितों के अभिवावकों को फिलहाल उनका उपचार घर पर ही कराने की सलाह दी गयी है, जिससे विद्यालय का पठन-पाठन प्रभावित न हो।

उपचार के बाद भी ऐसी छात्राओं को समूह में नहीं, एक-एक करके विद्यालय में बुलाया जायेगा। मौके पर मौजूद आयुर्वेदिक चिकित्सालय के चिकित्साधीकारी डॉ. विवेक कुमार ने बताया कि प्रभावित सभी छात्राएं मास हिस्टीरिया की शिकार हो रही हैं। मनोवैज्ञानिक उपचार पद्धति से उनका उपचार संभव है।

यहां बताते चलें कि विद्यालय में छात्राओं का अचानक चीखते हुए बेहोश हो जाना, हाथ-पैर पटकना, बदहवास होकर झूमना, एक छात्रा की हालत को देखकर दूसरी छात्रा को भी इसी प्रकार से असामान्य हो जाना मास हिस्टीरिया के मामूली लक्षण हैं। उत्तराखण्ड के चप्पे-चप्पे पर देवताओं के तथाकथित वास और संस्कृति में आडंबरों की भरमार के चलते बच्चों के दिल और दिमाग पर बचपन से ही देवताओं का भूत अपना कब्जा कर लेता है। दुर्गम स्थानों पर पहाड़ सी जिन्दगी जी रहे यहां के वाशिन्दे आधुनिकता से इतने कटे हैं कि वह चाहकर भी इससे बाहर नहीं निकल पाते। मूलभूत सुविधाओं के अभाव में वह अपने कष्टों का उपचार अध्यात्म की शरण में ही तलाशने को अभिशप्त होते हैं।

उत्तराखण्ड में जनजीवन तो कठिन है ही, लेकिन महिलाओं पर इसकी दोहरी मार पड़ती है। स्कूलों तक में लड़कियों के लिये शौचालय की कोई सुविधा नहीं है। उनके स्कूल तक पहुंचने के लिये सड़क मुहैया हो जाये, स्कूल के ऊपर ठीक-ठाक छत नसीब हो जाये, यही उनके लिये लक्जरी आइटम से कम नहीं है। इसके अलावा लड़की होने के कुछ अन्य दबाव होते हैं जिनके चलते इन लड़कियों की चेतना मे यह दबाव देवता को लाते हैं।

वैसे यह बात प्रशासन जानता है, लेकिन वह समस्या के छुटकारे के लिये भौतिक और चिकित्सकीय प्रयास नहीं करता। इसी कारण ज्ञान देने वाली पाठशाला अंधविश्वास की पाठशाला में बदल गयी। विशेषज्ञों का भी इस मामले में कहना है कि इस प्रकार की प्रभावित छात्राओं में सभी एक ही आयुवर्ग की हैं। किशोरवय से युवा अवस्था में कदम रखने वाली किशोरियां बेहद नाजुक और भावनाओं के दौर से गुजर रही होती हैं। इसी आयु में स्त्रीसुलभ कारणों के चलते उनमें हारमोन्स भी बदलते हैं। उनके व्यवहार में भी बदलाव आता है।

एक ही आयु वर्ग की होने के चलते आपस की साथियों के साथ भावनात्मक रिश्ता होने के कारण एक छात्रा के प्रभावित होने पर दूसरी छात्रा को भी अपनी भावनाओं पर काबू पाना असंभव हो जाता है, जिससे ऐसी छात्राओं के समूह में बढ़ोतरी हो जाती है। हालांकि इन सभी बातों से विद्यालय प्रशासन सहित चिकित्सक भी सहमत हैं, लेकिन ग्रामीणों में अपने संस्कार इस कदर भरे हैं कि इनसे स्वाभाविक तौर पर उपचार की बात करना खतरे को निमंत्रण देना सरीखा है।


इस क्षेत्र के जनप्रतिनिधि भी इस मामले में ग्रामीणों के सुर में सुर मिला रहे हैं। गौरतलब है कि ऐसी घटना घटने के दो दिन बाद विद्यालय आये चिकित्सकों के दल ने भी अपनी जांच में छात्राओं में मास हिस्टीरिया के लक्षण बताते हुये उनके मनोवैज्ञानिक उपचार की आवश्यकता बताई थी। लेकिन ग्रामीणों के इस समस्या को भूत-प्रेत बाधा से जोड़ देने के कारण विद्यालय प्रशासन प्रभावितों का उपचार कराने मे कतरा गया और अभिवावकों ने समस्या का उपचार जागर के रुप में न केवल देखा, बल्कि किया भी।

कोटाबाग ब्लाक में छात्राओं के अचानक बेहोश हो जाने, चीखें मारकर हाथ पांव पटकने, बदहवासी में झूमने की अनेक घटनायें पूर्व में राजकीय इंटर कालेज बजुनियां हल्दू और राजकीय इंटर कालेज पाटकोट मे घट चुकी हैं । वहां भी इस समस्या से दो-चार होने वालों में इसी उम्र की हाईस्कूल और इण्टर की छात्राएं ही शामिल थी। रामनगर के क्यारी स्कूल में भी एक लड़की इसके प्रभाव में आई। इन सभी घटनाओं में भी भभूत आदि का सहारा लेकर प्रभावितों को उपचार दिया गया था।

वैसे इन मामलों को कवर करने पर मुझे एक ग्रामीण ने यह जरूर कहा कि ‘भाई जी, छोड़ो इस भूत के बारे में लिखना, कभी हमारी इस सड़क के बारे में भी लिख दो तो आपकी मेहरबानी रहेगी।’ सीधे-साधे पहाड़ी आदमी की बेचारगी समझने के लिये शायद इससे ज्यादा की आवश्यकता न हो।


वरिष्ठ पत्रकार और राष्ट्रीय सहारा अखबार में कार्यरत.