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Mar 27, 2017

कमाई ​कला के दलालों के हिस्से और बेगारी आर्टिस्टों के

विश्व थियेटर दिवस पर विशेष 

कुछेक अपवादों को छोड़ दिया जाये तो सार्थक और मूल्यवान रंगमंच कभी भी अनुदान पर निर्भर होकर नहीं हुआ है। इन अपवादों की भी छानबीन करें तो हमें पता चलता है कि जिन रंगकर्मियों ने अनुदान लेकर बेहतर नाटक किये वे अनुदान के बिना भी बेहतर थियेटर करने की क़ाबिलियत रखते रहे हैं...

राजेश चंद्र

हबीब तनवीर अनुदान लेते थे, पर उनका थियेटर अनुदान की वजह से नहीं था। पोंगा पंडित जैसे नाटक अनुदान के बग़ैर भी उसी प्रभावशीलता के साथ हो सकते हैं, जिस तरह अनुदान लेकर। पर ज़्यादातर अनुदानकर्मी रंगकर्मी करते क्या हैं? 5-5 लाख लेकर दो कौड़ी के नाटक नहीं करते। 


कुछ ठेके पर नाटक का मंचन करवा लेते हैं। कुछ पुराने नाटक को दुहरा कर काम चला लेते हैं। कुछ नाटक ही नहीं करते, पूरा हजम कर जाते हैं। कुछ बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं। यानी कुछ नाटक में भी लगा दो और कुछ अपने लिये भी रख लो। यह अनुपात रंगकर्मी में बचे ज़मीर का समानुपाती हुआ करता है, जो वैसे भी सैकड़ों में से किसी एक में मिलता है।

यह हाल तो प्रस्तुति अनुदान का है, पर अगर सैलरी ग्रांट या वेतन अनुदान की बात करें, जिसके अंतर्गत देश में सैकड़ों निर्देशकों को प्रतिवर्ष 10 से 25 लाख रुपये सरकार देती है, उसकी लूट का पैमाना व्यापम जैसे किसी भी महाघोटाले से छोटा नहीं होगा। यह अनुदान अभिनेताओं के वेतन के लिये है, पर उसका 60-70 फीसदी, और कहीं-कहीं तो 90 फीसदी हिस्सा रंगमंडल संचालक या निर्देशक हजम कर जाते हैं।

अभिनेताओं की हैसियत ज़्यादातर रंगमंडलों में दास या बेग़ार खटने वाले मज़दूर से अधिक नहीं होती। देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उग आने वाले इन  रंगमंडलों का, जिनमें से ज्यादातर केवल काग़ज पर हैं, आपसी नेटवर्क इतना मज़बूत है कि इस गोरखधंधे का विरोध करने वाले अभिनेता को फिर कभी किसी रंगमंडल में काम नहीं मिलता। सी.ए. से फर्जी प्रमाणपत्र बनवा कर, तस्वीरें भेज कर और मंत्रालय के बाबुओं को खुश कर अनुदान हड़प लिये जाते हैं। 

मंत्रालयों में पैठ रखने वाले ताक़तवर रंगकर्मियों ने अलग-अलग लोगों के नाम से कई-कई रंगमंडल बना रखे हैं और वे नये रंगमंडलों के लिये ग्रांट पास करवाने के बदले भरपूर कमीशन भी खा रहे हैं। ऐसे सफेदपोश रंगकर्मी आज सभी राज्यों में कमीशन एजेन्ट का काम कर रहे हैं।

थियेटर में ग्रांट के वितरण और प्रबंध के लिये सरकार ने एनएसडी को नोडल एजेन्सी बना रखा है। थियेटर में बहने वाली भ्रष्टाचार और लूट की महागंगा की गंगोत्री यही ब्राह्मणवादी संस्था है।एनएसडी आज नाटक करने की, कथ्य समझने की तमीज़ नहीं सिखाती, वह उन्हें कुछ ट्रिक्स और फारमूले सिखा देती है, पांच लाख-दस लाख के अनुदान को खपाना सिखाती है, गलत-सही बिल बनाना और प्रोजेक्ट प्रपोज़ल बनाना सिखाती है, ताकि अनुदान के लिये फ़ाइट करने लायक नाटक उसके प्रशिक्षित लोग किसी प्रकार कर लें। एनएसडी प्रशिक्षण के नाम पर आज देश को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं करती। इस पर कभी और बात होगी।

आज थियेटर में अनुदान बंद हो जाये तो 80 फीसदी रंगकर्मी रंगकर्म छोड़ देंगे। अनुदान अपने साथ एक संस्कृति भी लेकर आता है, भ्रष्टाचार, समझौतापरस्ती, अवसरवाद और लोलुपता की! रंगकर्मी एक बार समझौतापरस्त और बेईमान हो गया तो फिर वह रंगकर्मी कहां रह गया! जब आप अनुदान की पात्रता के हिसाब से अपने रंगकर्म का स्वरूप निर्धारित करते हैं, कथ्य और शैली चुनते हैं, तो फिर कथ्य और नीयत और क्वालिटी तो पहले ही संदिग्ध हो जाती है। अगली बार के अनुदान की फिक़्र तो और जानलेवा होती है।

विकास परियोजनाओं के नाम पर देश भर के आदिवासी और दलित विस्थापित हो रहे हैं, उजाड़े जा रहे हैं, उनके जल, जंगल, ज़मीन और संस्कृति की जैसी भयावह तबाही रची जा रही है, वह रंगमंच से क्यों गायब है? बस्तर और दन्तेवाड़ा जैसी जगहों पर, मणिपुर में, असम में, कश्मीर में मानव अधिकारों को बर्बर तरीके से कुचला जा रहा है, वह हमारे नाटकों का विषय क्यों नहीं है? कभी अखलाक, कभी पानसरे, कभी कलबुर्गी और कभी किरवले। रोज़ समाज के सोचने समझने वाले, हाशिये पर जीने वाले लोग मारे जा रहे हैं, दलितों की बस्तियां जलायी जा रहीं हैं, उनको आत्महत्या के लिये मजबूर किया जा रहा है, नंगा कर घुमाया जा रहा है, ये हमारे नाटकों में क्यों नहीं आता? किसानों की इतने बड़े पैमाने पर हो रही आत्महत्याएं रंगमंच में क्यों जगह नहीं पातीं?

इन सवालों का अकेला जवाब यही है कि अनुदान लेकर आप इन मुद्दों पर सवाल नहीं उठा सकते। आपको अनुदान और पुरस्कार मिलता ही इसीलिये है कि आप यह सब नाटक और रंगमंच में नहीं आने दें। जनता के सामने व्यवस्था को कठघरे में खड़ा नहीं कर सकते आप अनुदान लेकर। अनुदान सरकार इसी मकसद से देती है। लोग यह मकसद आगे बढ़ कर पूरा कर रहे हैं।

अनुदान-विमर्श आज रंगमंच का सबसे अपरिहार्य और प्राथमिक सरोकार बन गया है! सारी मेधा और प्रतिबद्धता इसी जोड़-तोड़ और बचाव में चुक रही है! इससे पता चलता है कि हम जिसे रंगकर्म मान रहे हैं उस मान्यता और समझ में ही बहुत भारी लोचा उत्पन्न हो गया है! अगर रंगमंच को, उसकी सामाजिक-राजनीतिक भूमिका को, उसके गौरवशाली इतिहास को बचाना है तो रंगकर्म को सरकारी बैसाखी से मुक्त करना अपरिहार्य हो गया है। इस दिशा में संगठित होना आज एक बड़ा कार्यभार है।

एनएसडी आज तमाम संसाधनों पर वर्चस्व और एकाधिकार की वजह से केन्द्र में नहीं है! वह श्रेष्ठ और विशिष्ट थी,  तभी रंगमंच के सारे संसाधन और शक्तियां उसके पास हैं! एनएसडी के स्नातक श्रेष्ठ और विशिष्ट होते हैं, इसीलिये उनका सारे संसाधनों और अवसरों पर पहला और नैसर्गिक अधिकार है! यह सोच क्या वैसी नहीं है कि ब्राह्मण जन्म से ही श्रेष्ठ होते हैं, इसलिये उन्हें शेष समाज पर वर्चस्व और नियंत्रण का नैसर्गिक और दैवीय अधिकार है! जैसे अंग्रेज हमसे श्रेष्ठ और महान थे, इसलिये हम पर अपना शासन और अन्याय-उत्पीड़न थोपना उनका विशेष और नैसर्गिक अधिकार था! 

जिस प्रकार हिटलर के जन्मजात महान और श्रेष्ठ लोग दुनिया पर शासन करने निकल पड़े, उसी प्रकार जन्म से ही श्रेष्ठ और विशिष्ट संस्थान एनएसडी के श्रेष्ठ और विशिष्ट स्नातक भारतीय रंगमंच को विजित करने निकल पड़े! सारे संसाधनों पर, सारे ग्रांट पर, सारी कमिटियों पर, सारे पुरस्कारों पर, सारे महोत्सवों पर, सभी संस्थानों पर एकाधिकार करने और थियेटर को अपने अनुसार हांकने का उन्हें महान, विशिष्ट, जन्मजात और दैवीय अधिकार प्राप्त है! 

राजेश चंद्र वरिष्ठ रंग समीक्षक। कई नाटक लिख और निर्देशित कर चुके हैं। 

May 11, 2010

प्रेम की कोटियाँ


विस्यारियन ग्रिगोरीयेविच बेलिंस्की.   बेलिंस्की (1811-1848) उन्नीसवीं शताब्दी में जन्में रूस के उन महान लेखकों में से एक रहे जिनकी प्रतिष्ठा जनता के लेखक और जारशाही  की किरकिरी के रूप में  रही. उनके लेखों ने रूसी समाज के सभी प्रगतिशील तत्वों को हमेशा उत्साहित किया. जबकि इसके उलट 'शाही विज्ञान अकादमी' के एक सदस्य फ्योदोरोव ने ओतेचेस्त्वेंनिये जापिस्की में छपे उनके सभी लेखों को काटकर सात टोकरियों में भरा और प्रत्येक पर 'ईश्वर  के विरुद्ध', 'सरकार के विरुद्ध', 'नैतिकता के विरुद्ध' आदि लिखकर ख़ुफ़िया पुलिस में पहुंचा दिया था. 



बेलिंस्की के इस संक्षिप्त परिचय के साथ उनकी  'प्रेम की कोटियाँ'  टिप्पणी पढ़िये.



 प्रेम को आमतौर पर अनेक कोटियों और खानों में विभाजित किया जाता है, लेकिन ये विभाजन अधिकांशतः बेहूदा होते हैं. कारण  कि यह सब कोटियाँ और खाने उन लोगों के बनाये हुए हैं जो प्रेम के सपने देखने या प्रेम के बारे में बातें बघारने में जितने कुशल होते हैं, उतने  प्रेम करने में नहीं.

सर्वप्रथम वे प्रेम को  दुनियावी या वासनाजन्य और आध्यात्मिक  में विभाजित करते हैं. इनमें पहले  -वासनाजन्य से वे घृणा करते हैं और दूसरे -आध्यात्मिक  से प्रेम करते हैं। बिला शक, ऐसे जंगली लोग भी हैं जो प्रेम के केवल पाशविक आनंद पर मरते हैं। न उन्हें सौंदर्य की चिंता होती है, न यौवन की। लेकिन प्रेम का यह रूप-अपने पाशविक रूप के बावजूद-आध्यात्मिक प्रेम से फिर भी अच्छा है। कम से कम यह प्राकृतिक तो है।

 आध्यात्मिक प्रेम  तो केवल पूरबी रनिवासों-हमसाराओं के रक्षकों के लिए ही मौजूं हो सकता है।..... मानव न तो वहशी है और न देवता। उसे न तो पशुवत प्रेम करना चाहिए,न आध्यात्मिक। उसे प्रेम करना चाहिए मानव की तरह। प्रेम का चाहे आप  कितना ही दिव्यीकरण करें, मगर साफ है कि प्रकृति ने मानव को इस अद्भुत भावना में जितना अधिक उसके आनंद के लिए सज्जित किया है, उतना ही अधिक प्रजनन तथा मानव जाति को बनाये रखने के लिए भी। और प्रेम की किस्में- उनकी संख्या उतनी ही है जितने कि इस दुनिया में आदमी हैं। हर आदमी अपने अलग ढंग से- अपने स्वभाव, चरित्र और कल्पना आदि के हिसाब से- प्रेम करता है। हर किस्म का प्रेम, अपने ढंग से सच्चा और सुंदर होता है।



लेकिन रोमांटिस्ट- हमारे चिरंतन प्रेमी-दिमाग से प्रेम करना ज्यादा पसंद करते हैं। पहले वे अपने प्रेम का नक्शा बनाते हैं, फिर उस स्त्री की खोज में निकलते हैं जो उस नक्शे में फिट बैठ सके। जब वह नहीं मिलती तो शार्टकट अपनाते हुए कहीं अस्थायी जुगाड़ लगाते हैं। इस तरह कुछ लगता भी नहीं, कोई दिक्कत भी नहीं होती, क्योंकि उनका  मस्तिष्क ही सब करता है, हृदय नहीं।



वे प्रेम की खोज करते हैं, खुशहाली या आनंद के लिए नहीं, बल्कि प्रेम संबंधी अपनी दिव्य धारणा को अमल में पुष्ट करने के लिए। ऐसे लोग किताबी प्रेम करते हैं,अपने प्रोग्राम से जौ भर भी इधर-उधर नहीं होते। उन्हें एक ही चिंता होती है कि प्रेम में महान दिखाई दें, कोई भी चीज उनमें ऐसी न हो, जिससे साधारण लोगों में उनका शुमार किया जा सके।