Showing posts with label banda. Show all posts
Showing posts with label banda. Show all posts

Nov 8, 2016

घर में दाना नहीं और आप थाली की पूछते हो

बांदा से आशीष सागर ​दीक्षित की रिपोर्ट  

शोभा देवी : भाजपा जीतने के बाद इन्हें कार देगी !                                              फोटो : आशीष सागर  

शोभा देवी कहती हैं, 'जब घर में अन्न ही नहीं तो थाली—परात का क्या कहूं। हमने सीमेंट के बोरे को ही बर्तन मान लिया है। 10 साल पहले पति की आत्महत्या के बाद बेटियों की शादी के बीच कभी इतना हुआ ही नहीं कि एक परात खरीद सकूं। यह चावल स्कूल वाले दे देते हैं, वह न दें तो हम खाए बिना ही मर जाएं।' 

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के पड़ोई गांव की शोभा देवी के पति किशोरी ने 6 जुलाई 2006 को अवसाद के कारण आत्महत्या कर ली थी। किशोरी साहू की आत्महत्या का कारण तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट नंदन चक्रवती द्वारा किशोरी की बेटी पर बदचलनी का आरोप लगाना था। सिटी मजिस्ट्रेट के इस वाहियात बयान के बाद लोग किशोरी के परिवार पर छींटाकशी करने लगे थे, जिससे वह अवसाद पीड़ित हो गया और निराशा में आत्महत्या कर ली थी।

गांव वाले कहते हैं कि कर्ज और फांकाकशी में मरे किसान किशोरी की हाय ऐसी लगी कि सिटी मजिस्ट्रेट खुद एड्स की बीमारी से मरा। यह अधिकारी किसानों के राहत चेक भी खा जाता था।

शोभा देवी के मुताबिक, 'गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे कई बार कम आते हैं या खाना नहीं खाते हैं। फिर मिड डे मिल में बना खाना बच जाता है तो वे लोग हमें बुला लेते हैं। चावल मेरा परिवार तभी खा पाता है जब मिड डे मिल वाले देते हैं।' 

शोभा के पति किशोरी को मरे दस वर्ष हो चुके हैं पर उनकी पत्नी शोभा की माली हालत में तनिक भी सुधार नहीं आया है. उनकी 6 बेटियां थीं। उनमें से पांच की शादी उन्होंने कर दी है। एक उन्हीं के साथ गांव में ही रहती है।   

उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड में किसान आत्महत्या नई बात नहीं है. ये अंतहीन कहानी अपने स्याह पन्नों से हर रोज एक नया अध्याय लिख रही है. पिछले एक दशक में 5 हजार किसान ख़ुदकुशी कर चुके हैं और ये हालात तब हैं जब सरकारें मुआवजे और पैकेज से बुन्देली किसान को खुशहाल करने का दंभ भरती है. 

12 नवम्बर को लगने वाली लोक अदालत में बैंकों ने लामबंद होकर 13  हजार किसानों को चुनौती देने की रणनीति तैयार कर ली है। अगर इस धमकी आयोजन के बाद कुछ किसान डरके,या  निराश हो के आत्महत्या कर लें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इन किसानों पर 22 करोड़ रुपया कर्जा बकाया है। 

Jul 30, 2011

घोटालेबाज गुरुजी


जनज्वार.तीन दशकों से भी अधिक समय का सफर तय कर चुके उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद के एक मात्र प्रतिष्ठित महाविद्यालय जेएनपीजी की शाख पर बट्टा लगने को है। शिक्षा के गुरूकुल में भ्रष्टाचार को पनाह दी जा रही है। यूं तो साल दर साल महाविद्यालय में प्राचार्य आते और जाते रहे मगर वर्ष 2003 से 31 जुलाई 2011 तक के कार्यकाल में रहे प्राचार्य ने जिस तरह से यूजीसी ग्रान्ट कमीशन,विधायक सांसद निधि से प्राप्त बजट को कौड़ियों के भाव कागज के आंकड़ों में गर्त कर दिया है। इसके खिलाफ महाविद्यालय से जुड़े रहे कई पूर्व छात्र संघ नेता भी भ्रष्टाचार के मामले को लेकर अनशन और धरना प्रदर्शन कर चुके हैं।


वर्ष 1964 से महाविद्यालय में छात्र-छात्राओं से ली जाने वाली काशनमनी नियमित जमा होती रही है और महाविद्यालय के छात्रों को डिग्री लेने के बाद टीसी कटवाने के समय वापस कर दी जाती थी। वर्ष 2003से मई 2011के बीच छात्रों से वसूली गई लाखों रूपये की काशनमनी को न तो छात्र-छात्राओं को वापस किया गया और न ही इस धनराशि को महाविद्यालय के कोष मे जमा किया गया है। नाम नहीं लिखने की शर्त पर महाविद्यालय के एक लिपिक ने बताया कि नये भवन के खेल मैदान में जो इलाहाबाद ग्रामीण बैंक को किराये पर जो भवन और हाल दिया गया है,उससे मिलने वाले हजारों रूपये का किराया भी प्राचार्य के निजी खर्चा में चला जाता है।

वहीं करोड़ों रूपयों की लागत से महाविद्यालय में बने हुये टीटी हॉल, बाउण्ड्रीवाल, छात्र संघ अध्यक्ष भवन, क्रीड़ा विभाग की बिल्डिंगों और पुराने भवन के निर्माण कार्य में बड़े स्तर पर धांधली हुई है। निजी सूत्रों की माने तो महाविद्यालय के साईकिल स्टैण्ड से ही हर साल तकरीबन 20 से 25 लाख रूपये की वसूली की जाती है। साइकिल स्टैण्ड की फीस देने वालों में सभी छात्र छात्रायें शामिल होते हैं फिर चाहें वह विकलांग हो या आंख से अन्धा।

इधर महाविद्यालय के पुस्तकालय भवन के पीछे लगाये गये पूर्व प्राचार्यों द्वारा पुराने वृक्षों को तत्कालिक प्राचार्य ने वन विभाग की सांठ-गांठ से जिस तरह रातों रात ठिकाने लगा दिया उसकी ही एक बानगी महाविद्यालय के मैदान में लगाये गये 82 हजार के पौधे जो आज बीएड आवासीय भवन की बिल्डिंग की भेंट चढ़ चुके हैं।

महाविद्यालय के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष सुशील त्रिवेदी ने प्राचार्य नन्दलाल शुक्ला के खिलाफ कम्प्यूटर शुल्क के नाम पर कम्प्यूटर संचालक द्वारा की गयी तकरीबन 52लाख की वसूली पर मोर्चा खोल दिया है और कई दिनों से राजनीतिक दलों के साथ अनशन और धरना प्रदर्शन पर थे। इधर हाईकोर्ट इलाहाबाद के शासनादेश के बाद से पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के शासन में शिक्षा निदेशक द्वारा नियुक्त किये गये प्रदेश में 13महाविद्यालयों के प्राचार्यों को उच्च न्यायालय ने अवैध नियुक्ति करार देते हुये महाविद्यालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

मगर जेएनपीजी कालेज के प्राचार्य और अन्य प्राचार्यों ने उच्चतम न्यायालय की शरण में जाकर बड़ी ही साफगोई से जिला प्रशासन और महाविद्यालय स्टाफ की आंखों में धूल झोंकने   की तैयारी कर दी है। मिली जानकारी के अनुसार में 11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिये एक अहम आदेश में 11 जुलाई को कार्य कर रहे प्राचार्य के मुताबिक ही महाविद्यालय की गतविधियां संचालित करने के आदेश दिये हैं। इस आदेश के मुताबिक प्राचार्य नन्दलाल शुक्ला के हटाये जाने के बाद प्राचार्य नियुक्त हुये डॉ0 एपी सक्सेना को ही उच्चतम न्यायालय के शासनादेश के मुताबिक प्राचार्य की कुर्सी पर होना चाहिए।

लेकिन सत्ता की दबंगई और अपने क्षेत्र प्रभाव के बल पर निलम्बित हुये प्राचार्य ने महाविद्यालय में  न ही पूर्व में हाईकोर्ट से निलम्बन के बाद प्राचार्य की कुर्सी छोड़ी और न ही अपना चार्ज किसी अन्य को लिखित रूप में हस्तांरित किया था,इसी बात का लाभ लेते हुये उन्होनें एक बार फिर जिला प्रशासन की शार्गिदी में प्राचार्य पद नही छोड़ने का पूरा प्रबन्ध कर लिया है।

इधर सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर ने जनसूचना अधिकार 2005के तहत महाविद्यालय में वर्ष 2003 से 31 जुलाई 2011 तक प्राचार्य के कार्यकाल में किये गये तमाम तरह के कामों और निर्माण कार्यों की सूचना मांगी थी। उनके अनुसार तीस दिवस गुजर जाने के बाद भी जनसूचना अधिकारी ने सूचना उपलब्ध नहीं करायी। उन्होनें जिला उपभोक्ता फोरम जनसूचना अधिकारी,प्राचार्य पर 90 हजार रू0 का मुकदमा दायर किया है।


Jul 16, 2011

और वह मरा अपने ही खेत में !


बच्चे सुबह जागे और पिता को पास में नहीं पाया तो बाहर निकलकर चिल्लाने लगे। गांव वालों के सहयोग से जब सुरेश को ढूंढ़ा गया तो उसकी लाश अपने ही दो बीघा बन्धक बने बंजर खेत में पायी गयी...

आशीष सागर

बांदा जिला के फतेहगंज थाना के बघेला बारी गांव में 18 जून को 42 वर्षीय किसान सुरेश यादव की कई दिनों से भूखे रहने और टीबी की लंबी बीमारी के कारण मौत हो गयी। उनकी मौत के बाद अब उनके तीन बच्चे अनाथों की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। बच्चों की सबसे बड़ी आसरा कही जाने वाली मां का साया तीन साल पहले 2008 में ही उठ गया था, जब सुरेश अपनी पत्नी सरस्वती के केंसर का ईलाज दो बीघा जमीन बेचकर भी नहीं करा सके थे और उनकी की मौत हो गयी थी।

छिन गया बचपन : जीवन की कठिन डगर


पत्नी की असामयिक मौत ने सुरेश की समस्याएं और बढ़ा दीं,जिसके कारण वह लंबे समय से निराश थे और बच्चों पर खुद को भार मान रहे थे। बिटिया संगीता की बढ़ती हुयी उम्र के साथ उसके ब्याह की चिन्ता और विकास, अन्तिमा के भविष्य की ऊहा-पोह में पिसते हुए 18 जून को अपने ही खेत पर खून की उल्टियों के साथ सुरेश इस दुनिया से चले गये। जब बच्चे सुबह जागे और पिता को पास में नहीं पाया तो बाहर निकलकर चिल्लाने लगे। गांव वालों के सहयोग से जब सुरेश को ढूंढ़ा गया तो उसकी लाश अपने ही दो बीघा बन्धक बने बंजर खेत में पायी गयी।

अब परिवार का सारा जिम्मा सुरेश यादव के सबसे बड़े बेटे 14वर्षीय नाबालिग विकास यादव पर है, जिसने इसी साल दसवीं की परीक्षा पास की है। विकास बताता है कि पिता के बीमार होने के कारण उनके जीते जी भी परिवार का खर्च चलाने के लिए उसे मजदूरी करने जाना पड़ता था, जिसके कारण परीक्षा में मात्र 54 फीसदी अंक प्राप्त हुए हैं। परिवार में तंगहाली के कारण विकास की सबसे छोटी बहन अंतिमा पिछले वर्ष स्कूल छोड़ चुकी है तो बड़ी बहन संगीता मां के मरने के बाद से ही घर में चौका-बर्तन की पूरी जिम्मेदारी निभा रही है और स्कूल नहीं जाती।

पहले मां और अब पिता की मौत ने विकास से खिलंदड़ी बचपन को छीन लिया है और वह अपने हम उम्र बच्चों से बड़ा दिखता है। कुछ भी पूछने पर उसकी आंखे भर आती हैं, लेकिन वह पिता की मौत को अपने उपर हावी होने देने से लगातार जूझता है और गमछे से आंखों को पोछ कहता है, ‘घर और पढ़ने की व्यवस्था हो जाये तो बाकी का मैं संभाल लुंगा।’ एक जिम्मेदार नागरिक के गहरे अहसासों भरा विकास बताता है कि ‘मां के मरने के बाद जो बाकी दो बीघा जमीन बची थी उसे पिता ने त्रिवेणी ग्रामीण बैंक, बदौसा में 21 हजार रूपये के किसान क्रेडिट कार्ड के बदले गिरवी रख छोड़ा है।’

ग्रामीण बताते हैं,पत्नी सरस्वती की मौत के बाद से सुरेश यादव मानसिक रूप से तन्हा,अवसाद ग्रस्त और क्षय रोग से पीड़ित हो गया था। कुल चार बीघा जमीन में से दो बीघा जमीन उसने पहले ही पत्नी के इलाज में बेच दी थी और इधर बच्चों के पालन पोषण व खेती को करने के लिये सुरेश ने त्रिवेणी ग्रामीण बैंक बदौसा से 21 हजार रूपये, साहूकार से 50 हजार रूपये बतौर कर्ज ऋण लिया था। गांव वालों के मुताबिक टीबी के रोग से पीड़ित सुरेश को नरैनी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, जिला अस्पताल बांदा से नियमित रूप से डाट्स की दवायें भी उपलब्ध नहीं होती थी। परिवार की माली हालत ऐसी थी कि सुरेश के मरने के बाद विकास के पास इतना भी पैसा नहीं था कि वह अपने पिता को धर्म मुताबिक फूंकने की व्यवस्था कर पाता। गांव वालों ने आनन-फानन में सुरेश की लाश को एक चादर में लपेटकर रसिन बांध में प्रवाहित कर दिया।

मीडिया ने जब इस मुद्दे को तूल देना शुरू किया तो जनपद के तत्कालिक जिलाधिकारी कैप्टन एके द्विवेदी अपने लाव लश्कर के साथ मौके पर पहुंचे और पीड़ित परिवार के तीन अनाथ बच्चों से बातचीत की। प्रदेश की मुखिया के दिशा निर्देश के अनुसार भूख से कोई मौत न होने पाये और कोई किसान कर्ज और मर्ज से आत्महत्या न करे इस फतवे के डर से जिलाधिकारी ने तुरन्त ही विकास को बरगलाना शुरू किया और सुरेश के क्षय रोग कार्ड को मीडिया के सामने दिखाते हुये कहा कि सुरेश की मौत कर्ज से नहीं बल्कि टीबी के रोग से हुयी है।


विकास की छोटी बहनें  अंतिमा और संगीता

जिलाधिकारी के साथ मौजूद अधिकारियों ने जब मृतक के घर जाने की जहमत उठायी तो मीडिया के सामने घर की हालत देख उनके भी होश फाख्ता हो गये। सबके मूंह से एक ही आवाज आयी, ऐसे में भला कैसे जलता और कैसे चलता घर का चूल्हा ?मौके नजाकत को भांपते हुए जिलाधिकारी ने तुरंत इन्दिरा आवास, पारिवारिक लाभ योजना, एक लाख रूपये मुआवजा कृषक बीमा योजना से और बीपीएल कार्ड द्वारा मुफ्त राशन का निर्देश कोटेदार को देते हुए बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी जिला प्रशासन द्वारा वहन करने की घोषणा कर दी।

इस बीच इलाके के कुछ सामाजिक सहयोगी भी विकास की मदद के लिए सामने आये हैं,जिनमें सन्त मेरी सीनियर सेकण्डरी स्कूल के डॉ फेड्रिक डिसूजा,फादर रोनाल्ड डिसूजा, शिवप्रसाद पाठक शामिल हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि सरकार और स्वंय सेवी समूहों के विस्तृत जाल के बावजूद सुरेश यादव और उन जैसे हजारों किसानों आत्महत्याओं,भूख और बीमारियों के जबड़े में क्यों स्वाहा होते चले जा रहे हैं। क्यों विकास जैसे बच्चे अनाथ हो रहे हैं और उनका बचपन उनसे छिनता चला जा रहा है,जबकि अरबों के पैकेज की लूट में न जाने कितने लूटेरों की पीढ़ियों के लिए अकूत धन जमा होता जा रहा है। आखिरकार इन सवालों का जवाब कौन देगा ?



बुन्देलखंड के प्रमुख सूचना अधिकार कार्यकर्ता और स्वयं सेवी संगठन 'प्रवास' के प्रमुख.

Jun 19, 2011

गरीबों का आवास व्यापारियों - पत्रकारों के नाम



जनज्वार टीम. उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में कांशीराम शहरी गरीब आवासीय योजना के तहत निम्नीपार और हरदौली घाट मोहल्ला स्थित कुल 1500 आवास निरीह , असहाय और निराश्रित बी0पी0एल0 कार्ड धारको के लिये बनाये गये थे। कार्यदायी संस्था लोक निर्माण विभाग, जिला विकास अभिकरण ने बिल्डिंग निर्माण का काम झांसी की फर्म मेसर्स ओम शांति बिल्डर्स को दिया था तथा जिला विकास अभिकरण के सहायक अभियंता हरगोविन्द और अवर अभियंता अखिलेश कुमार ने पूरे निर्माण कार्य का मेजरमेंट विगत 14 मई 2009 को किया था।
बान्दा में बन रहा गरीबों का आवास : कब्ज़ा अमीरों का

गौरतलब है कि 23 फरवरी 2011 को मुख्यमंत्री उ0प्र0 मायावती जी द्वारा कांशीराम आवास योजना का लावलश्कर के साथ शिलान्यास यह कहते हुये किया गया कि बुंदेलखंड में अब कोई गरीब सड़को पर नही सोयेगा। बीते 26 मई को मुख्य सचिव अनूप मिश्रा ने भी कांशीराम आवास योजना का मौके पर जाकर मुआयना किया और नजर आयी खामियों को संम्बंधितअधिकारियों से दूर करने को कहा गया।

डूडा विभाग के एपीओ पवन शर्मा और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी शारदा यादव ने अपने परिवारिक रिश्तेदारो के साथ साथ जनपद के दबंग, सरकारी कर्मचारी , व्यापारी और कुछ तथाकथित पत्रकारों के साथ लाईसेस बंदूकधारी व्यक्तियों केा भी बी0पी0एल लोगो के आवास आवंटित कर दिये। साथ ही जिन लोगो को बी.पी.एल कार्ड मे आवास दिये गये उनसे 30000 से 40000 तक की अवैध धन उगाही की गयी। इसके साथ ही इन आवासों  में चालीस प्रतिशत एक जाति विशेष को भी आवास आंवटित किये गये।

सामाजिक कार्यकर्ता एवं सूचनाधिकार एक्टिविस्ट आशीष सागर ने कई मर्तबा सम्बंधित अधिकारियों  से इस बात की लिखित और मौखिक शिकायते की लेकिन वह सब नक्कारखाने में तूती ही बनकर रह गयी। इधर बीते 16.06.2011 को हरदौली घाट के आवासों में एक मंजिला इमारत के बिना आंधी पानी  गिर जाने से कालीचरण 35 निवासी कोहारा बिसंडा और कंधी निवासी अमलाहट , अजयगढ़ अपने बच्चों समेत गंभीर रूप से घायल हो गये है साथ ही बीते दो दिनो से जनपद मे आवंटनो मे की गयी धांधली को लेकर कुछ  गरीबो  द्वारा आमरण अनशन शुरू कर दिया गया है।

अनशन में बैठे लच्छू रैदास, सावित्री, सुनीता रैकवार , रामप्यारी, रामरती, सरोज तिवारी, सुमन वर्मा , लखन रैकवार और तुलसी ने इस भ्रष्टाचार के खुलासे की मांग की है। वहीं भारतीय यग मैन के संपादक बाल कृष्ण पांडेय , चित्रकूट टाइम्स के संपादक राजेश पांडेय सहित दैनिक जागरण के पूर्व ब्यूरो चीफ और वरिष्ठ पत्रकार बिनोद मिश्रा तक के नाम 2 से 3 कालौनियां आवंटित की गयी है।

  • बीपीएल आवास  200 से 300 बीघा के कास्तकारों को बांटे गये गरीबों के आशियाने
  • बीस करोड़ की लागत वाले 1500 आवासों में 940 की खुलने लगी पोल
  • जिला शहरी विकास अधिकरण (डूडा) ने नही दी आरटीआई की सूचना

डूडा विभाग के शारदा यादव की पत्नी के नाम भी तीन कालौनियां आंवटित है यह तो भ्रष्टाचार में की गयी धांधली की एक नजीर बस है। जब कि एपीओ डूडा ने तीस दिवस बीत जाने के बाद भी जन सूचना अधिकार मे मांगी गयी जानकारी उपलब्ध नही करायी है जिसकी प्रथम अपील जिलाधिकारी बांदा को आशीष सागर ने की है। वैसे तो इस मुदद्े को लेकर तमाम राजनीतिक दलो में हलचल शुरू हो गयी है और हो भी क्यों नही आखिर प्रकरण बी0पी0एल0 वोट बैंक का है और बुन्देलखण्ड में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी का मिशन भी विधान सभा चुनाव 2012 को फतह करना है। भ्रष्टाचार के पाटे में तो पूरा देश ही जल रहा है लेकिन बुन्देलखण्ड की कमोवेश स्थिति और भी ज्यादा भी गम्भीर हो रही है। मसलन गरीब लोगो के आवास भी अब अमीरजादो की ऐशगाह बन गये है।



Dec 15, 2009

जंजीर खुलवा दो गुरु, जरा चौराहे से हम भी हो आयें


अजय प्रकाश

जंजीर से बंधा आदमी बुन्देलखंड के मटौंध गाँव का है. गाँव के किसी आदमी को इसके बंधे रहने से कोई ऐतराज नहीं है. लोग कहते हैं जिंदगी व्यहार से चलती है, आदर्श से नहीं. इसलिए बंधे आदमी को खुला क्यों नहीं कर देते, जैसे सवालों को लोग अव्यावहारिकता कहतें हैं और इस पर बहस करने को फ़िज़ूल का आदर्शवाद.

जंजीर में बंधे आदमी के पास घुरिया रहे बच्चे बतातें हैं जबतक यह पागल बंधा रहता है, इसकी पत्नी चैन से काम कर पाती है, गाँव में भी हो हल्ला नहीं होता. जंजीर में बंधे आदमी के घर में पत्नी के सिवा कोई और नहीं है. संयोग से  उस वक्त घर पर वह अकेले था. उसने बताया कि उसकी बीवी खाने का जुगाड़ करने गयी है. फिर उसने नज़दीक बुलाकर कहा, 'जंजीर खुलवा दो गुरु, जरा चौराहे से हम भी हो आयें.'
आसपास खड़े बच्चों से ही पता चला कि मटौंध के दुसरे छोर पर एक और पागल है जो इसी तरह जंजीरों में बंधा रहता है. बच्चों की बात पर गाँव के बड़े भी हामी भरते हैं. लेकिन वे लोग इन पागलों को जंजीरों में बांधे जाने को बेहद जरूरी मानते हैं. परिवार वाले गाँव वालों की तू-तू ,मैं-मैं से बचने के लिए दिमागी रूप से असंतुलित अपने लोगों को जंजीरों में बांधे रखना ही अंतिम माकूल दवा मानते हैं.


इलाज़ के लिए क्या प्रयास हुआ के जवाब में पड़ोसियों में एक ने बताया कि , 'गरीब आदमी है, भरपेट खाना मिल जाये वही बड़ी बात है. ' जबकि दुसरे का कहना था, ' गया था एक बार पागल खाने. मगर वहां से भी भागने लगा तो दरबानों ने इतना मारा कि कई महीनों तक चम्मच से पानी पिया. इसलिए अब इसकी पत्नी बांधने को ही इलाज मान चुकी है. '

मटौंध, गाँव से ऊपर उठकर कई साल पहले नगर पंचायत की श्रेणी में आ चुका है. मटौंध बुन्देलखंड के अन्य गावों की तरह दरिद्र नहीं लगता. हर तरफ सड़कों का जाल फैला हुआ है. यहाँ पुलिस, प्रशासन और नेताओं का आना जाना आम है.

गाँव वाले कहतें हैं, ' इस पागल को किसी के सिफारिश की जरूरत नहीं है. खुद ही फर्राटेदार हिंदी- अंग्रेजी बोलता है, भैया बीएसी पास है. गाँव में जो भी आता है उससे गुटखा के लिए एक रुपया मांगता है और जंजीर खोलने के लिए कहता है. लोग रूपया पकड़ा कर, जंजीर खुलवा देंगे का वादा कर चले जातें हैं. यह आज से तो है नहीं. आप भी एकाध रूपया दे कर निकलिए कि.........................'!