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Feb 16, 2017

कन्हैया कुमार की राह तकते यूपी के कॉमरेड

वामपंथी गर्भगृह में पिछले फरवरी में जो युवा तुर्क कन्हैया कुमार पैदा हुए थे, वे अपना 'राजनीतिक बचपना' इन दिनों कहां गुजार रहे हैं,  कोई बताएगा? दरअसल यूपी वाले उनको याद कर रहे हैं ...

इस बार मुझे यूपी में उनके बंधु—बांधव मिले थे। बताए कि सीपीएम, सीपीआई, सीपीआईएमएल और अन्य वामपंथी मिलाकर 50 से अधिक सीटों पर पर लड़ रहे हैं? पर कहीं अपेक्षित भीड़ नहीं जुट पा रही, वे लोग 403 में से किसी एक विधानसभा में भी दूसरे—तीसरे स्थान पर नहीं हैं। उम्मीदवारों और उनके समर्थकों के मुताबिक चुनावों में जिस तरह पैसे का जोर बढ़ा है उसके कारण मामूली माहौल भी नहीं बन पा रहा. उतना भी नहीं जिससे क्षेत्र के जनता हमें याद रख सके कि वामपंथी चुनाव लड़ रहे हैं. 
 
पूर्वी उत्तर प्रदेश में मिले वामपंथी समर्थकों को  लग रहा है कि उन्हें इस बार 2017 के विधानसभा में जो वोट मिलेगा, वह  2012 विधानसभा से भी नीचे चला जायेगा। उनका कहना है कि दिल्ली, पटना, इलाहाबाद और देश के दूसरे हिस्सों से आने वाले छात्र संगठनों के नौजवान भी नहीं पहुंच रहे, नाटक वाली टीम भी नहीं आई, जिनको देखने के लिए ही सही थोड़ी भीड़ पहले जुट जाया करती है. 

उम्मीदवारों और उनके समर्थकों का कहना है, अब तो एक ही आसरा है कन्हैया कुमार। जेएनयू वाला कन्हैया कुमार। अगर वह किसी उम्मीदवार के प्रचार में आ जाए तो भीड़ जुट जाए और हमलोगों की भी चर्चा अखबारों, टीवी में हो जाए, माहौल बन जाए। हमलोग कार्यकर्ताओं के चाय—पानी का पैसा नहीं जुट पा रहा फिर अखबार—मीडिया वालों को पैसा देकर कहां से खबर छपवाएं। इसलिए आप हमारा यह संदेश कन्हैया कुमार को पहुंचा दीजिएगा कि वह एक—दो यूपी जनसभाएं कर दें। 
 
मैंने पूछा, 'लेकिन कन्हैया कुमार तो पार्टी महासचिव नहीं हैं,  कोई नामित नेता भी नहीं है. आपलोग लिबरेशन, सीपीआई और सीपीएम के महासचिवों दीपंकर भट्टाचार्य, सुधाकर रेड्डी और सीताराम येचुरी को क्यों नहीं बुलाते, वे लोग भी भीड़ जुटा सकते हैं. क्या ये लोग आपलोगों के इस चुनाव में प्रचारक नहीं हैं?'  
 
मेरे इस सवाल पर कोई मुकम्मल जवाब नहीं आया, अलबत्ता किसी ने दबे  स्वर में कहा, ' बुलाने का किराया-भाड़ा भी बेकार जायेगा। वैसे ई सुधाकर रेड्डी कौन पार्टी के हैं'

आखिर में एक कार्यकर्ता ने कहा, 'सुने हैं कि कॉमरेड कन्हैया कुमार अपनी पीएचडी पूरी कर रहे हैं। उनसे एक बात कह दीजिएगा कि पार्टी पीएचडी से नहीं वोट से चलती है, जनसमर्थन जनता के बीच जाने से मिलता है, चाय की प्याली में तूफान पैदा करने से नहीं।'
 
गौरतलब है कि जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार पिछले दिनों तब चर्चा में आए थे जब उनकी किताब 'बिहार से तिहाड़ तक' आई थी और खबर थी कि किताब से उन्हें लाखों की रॉयल्टी मिली है। 

Jul 12, 2016

गोला देने में बीजेपी वालों की कोई सानी नहीं

गोला देने में बीजेपी वालों की कोई सानी नहीं है। तीन दिन हो गए लेकिन जाकिर के खिलाफ एक एफआइआर तक दर्ज नहीं हो पाई। जाहिर है अबतक एफआइआर लायक भी अपराध साबित नहीं हो पाया। पर माहौल ऐसा बना दिया कि जाकिर मिल जाए या उसकी शक्लो—सूरत वाला कोई और भी मिल जाए तो लोग उसे मौके पर मार डालेंगे। सरेराह, सरेबाजार चौराहे पर फैसला सुना देंगे।

सोचिए, राजनीति की यह कैसी खतरनाक रवायत शुरू हो रही है। अबतक यह प्रैक्टिस आतंकवाद मामले में पकड़े गए लोगों को लेकर थी। धमाके हुए नहीं कि बिना सोचे—समझे जो मिले उसे उठा लो, आतंकी बना दो और जब झूठ बेपर्द हो जाए तो 10—20 साल बाद उस शख्स की जिंदगी जहन्नुम बनाकर बाइज्जत रिहा कर दो। बाद में अदालतें या खुद जांच एजेंसियां थोड़ी सख्त हुईं तो इस पर हल्की से रोक लग पाई है पर बीजेपी ने इसका दायरा बढ़ा दिया है।

कांग्रेस के काल में धमाकों में या विद्रोहियों को बिना सबूत अपराधी करार दिया जाता था पर अब बोलने वालों के खिलाफ भी वही बर्ताव होने लगा है। बीजेपी ने दो साल में इसे सरकार चलाने की परंपरा के तौर पर स्थापित किया है। लव जेहाद, घर वापसी से शुरू हुआ सफर अब नाइक तक पहुंचा है।

आप याद कीजिए तीन—चार महीने पहले जेएनयू में क्या हुआ? उससे पहले दादरी कांड में क्या हुआ। मतलब टेप आया नहीं, भाषण क्या हुआ पता नहीं, मांस की जांच हुई नहीं पर घर—घर में छात्रों के देशद्रोही होने के ​सर्टिफिकेट पहुंचा दिए गए और जन—जन जान गया​ कि अखलाक के घर में गाय का मांस ही था।

जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के मामले में इस कदर दुष्प्रचार कर नफरत फैलाई गयी कि वह आसानी से आज भी खुला नहीं घूमते, उनपर कोई सांप्रदायिक सनकी कभी भी हमला कर सकता है। बावजूद कि सभी रिपोर्ट्स में उनका कोई कसूर  किसी भी तरह से साबित नहीं हो पाया है।

सवाल है कि पुलिस, जांच, अदालत या सरकार से पहले ये कौन सी नई ताकत है जो आपकी जुबान को अपने दिमाग का गुलाम बनाकर सांप्रदायिकों की एक ऐसी भीड़ खड़ी कर रही है जहां बहस—मुबाहिसा का कोई चांस ही नहीं है। आरोप लगता है और अपराधी करार दिया जाता है। तानाशाही विरोधी शब्दों लेकिन, किंतु, परंतु का स्पेस ही खत्म हुआ जा रहा है।

भाजपा के इस खास तरीके को समझना होगा। उसे लगता है कि वैचारिक स्तर पर हो या सांस्थानिक रूप से देश पर कब्जा करने का यही तरीका है— भले ही देश, देश ही न रह जाए,  दंगाईयों और रक्त पिपासुओं की सनकी भीड़ ही क्यों न बन जाए। भाजपा और मोदी सरकार की इन जनविरोधी आदतों को ताकतपूर्वक रोकना होगा, अन्यथा देश की तबाही में ये हमें गवाह बनाके छोड़ेंगे। 

Feb 13, 2016

'जेएनयू में एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने लगाए थे पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे'

सामने आया नया वीडियो, तय करें कौन है देशद्रोही

कुछ घंटे पहले यह ​वीडियो सामने आया है जिसमें दिखाया गया है कि दिल्ली के जेएनयू में भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी से जुड़े छात्र 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगा रहे हैं। ​वीडियो 9 फरवरी की रात जेएनयू का बताया जा रहा है। यह वही वीडियो है जिसके आधार पर जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पुलिस ने 12 फरवरी को गिरफ्तारी की है। पुलिस ने गिरफ्तारी केंद्रीय गृहमंत्री, ​शिक्षामंत्री के कड़ी कार्यवाई वाले बयान और भाजपा सांसद मेहश गिरी की शिकायत के बाद की थी। 

गौरतलब है कि यह फूटेज भाजपा के सबसे प्रबल समर्थक माने जाने वाले न्यूज चैनल 'जी न्यूज' का है। 'द कंस्पीरेसी' नाम से यूट्यूब पर जारी किया गया यह फूटेज एक मिनट 33 सेकंड का है। फूटेज देखकर अनुमान लगता है कि भाजपा के छात्र संगठन विद्यार्थी परिषद के छात्र हैं जो जेएनयू में 9 तारीख की रात आयोजित कार्यक्रम में भारत विरोधी नारे लगा रहे हैंं।

वीडियो में एबीवीपी के छात्रों को पहचान करते हुए सर्किल किया गया है कि जो छात्र किसी मौके पर पाकिस्तान विरोधी नारे लगाते हैं वहीं छात्र अफजल गुरु को लेकर जेएनयू में हो रहे कार्यक्रम में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं। नारा लगाने वालों में लड़के और लड़कियों दोनों शामिल हैं। 

वीडियो 'फ्रीडम फॉर आॅल रोहित्स' की ओर से जारी किया गया है।