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Mar 26, 2017

सिर्फ 10 कॉरपोरेट 5 लाख करोड़ के कर्जदार और 9 करोड़ किसानों का कर्ज 12 लाख करोड़

बैंकों से लेकर नीति आयोग तक किसानों को कर्ज देने के मसले पर नाक—भौं सिकोड़ रहे हैं, पर सरकार और रिजर्व बैंक 70 हजार करोड़ से अधिक डकार जाने वाले डिफॉल्टरों का नाम बताने की हिम्मत नहीं कर पा रहे...

राजेश रपरिया 

भारतीय स्टेट बैंक की प्रमुख अरूंधति भट्टाचार्य के किसानों की कर्जमाफी से वित्तीय अनुशासन बिगड़ने के बयान से तूफान आ गया है। उन्होंने कहा कि चुनावों के वक्त किसानों का कर्ज माफ करना सही नहीं है। अगर ऐसा होता है तो हर चुनाव में कर्ज माफी की उम्मीद की जाएगी। इस बयान ने किसानों के गहरे जख्मों पर नमक तो छिड़का ही है, बल्कि बैंकिंग उद्योग को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। 

बैंको की बढ़ती अनर्जक आस्तियों (नॉन परफार्मिंग एसेट्स —एनसीए) से अर्थव्यवस्था और केंद्र सरकार की परेशानियां बढ़ गयी हैं, जबकि प्रमुख सरकारी बैंक की मुखिया अपने बयानों में ऐसे पेश आ रही हैं मानो देश की बढ़ती आर्थिक मुश्किलों का मुख्य कारण किसान ही हों। मार्च 2016 तक बैंकों की कुल कर्जराशि 70 लाख करोड़ रुपए थी, जिसमें उद्योग की हिस्सेदारी 41.71 फीसदी और कृषि कर्ज 13.49 फीसदी थी।



जाहिर है बड़े लोगों और कारोबारियों पर ही बैंकों का सबसे ज्यादा कर्ज फंसा हुआ है। पिछले 15 महीनों में बैंकों का एनपीए दोगुने से ज्यादा हो गया है। सितंबर 2015 में एनपीए 3 लाख 49 हजार 556 करोड़ रुपए के थे, जो सितंबर 2016 में बढ़कर 6 लाख 68 हजार 825 करोड़ रुपए के हो गए। विश्वविख्यात अंतरराष्ट्रीय वित्त कंपनी 'स्टैंडर्ड एंड पुअर्स' का अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में एनपीए बढ़कर 9 लाख करोड़ रुपए के पार कर जाएंगे। रिजर्व बैंक का तर्क है कि आर्थिक हालात खराब होने से कर्ई बार कर्जदार समय से कर्ज नहीं चुका पाता है। पर आर्थिक विकास दर में सुधार आने से एनपीए में कमी आएगी और रिकवरी बढ़ जाएगी। 

लेकिन विडंबना यह है कि रिजर्व बैंक और अन्य बैंक इस तरह के लाभ किसानों को देने को तैयार नहीं हैं। फिर विलफुल डिफॉल्टरों (जो कर्जदाता जानबूझ कर कर्ज वापस नहीं करते, जबकि कर्ज वापस करने की उनकी हैसियत होती है) का आंकड़ा और नाम क्यों छुपाया जाता है, इसका कोई वाजिब तर्क न रिजर्व बैंक के पास है और न ही केंद्र सरकार के पास। यह कर्जदार गलत हथकंडों और सांठगांठ से भारी मात्रा में बैंकों से कर्ज पाते हैं, जो बैंकों, बड़े लोगों और राजनेताओं के कारनामों का जीता—जागता पुराण है। जनता के पैसों पर यह डिफॉल्टर बेनामी संपत्तियां बनाते हैं और विलासिता में करोड़ों—करोड़ रुपए उड़ा देते हैं। गौरतलब है कि 10 बड़े कॉरपोरेट समूहों पर 5 लाख 73 हजार 682 करोड़ रुपए का कर्ज है। यह जानकारी राज्य सभा में वित्त राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने दी है। 

अपनी रिपोर्टों के लिए चर्चित न्यूज वेबसाइट न्यूज लॉन्ड्री ने इन डिफॉल्टरों के नाम उजागर किए। समाचार साइट फर्स्ट पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार 7129 बैंक खातों को डिफॉल्टर घोषित किया गया है, जिन पर 70 हजार 540 करोड़ का कर्ज है। इस साइट पर 18 बड़े कर्जदारों के नाम भी हैं। मोटा अनुमान है कि तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए ये डकार गए हैं। इनमें विजय माल्या का नाम जगजाहिर है। पर उषा इस्पात समूह के 17 हजार करोड़ रुपए के कर्ज डकारने की पूरी दास्तान जानकर न केवल किसी के होश उड़ जाएंगे, बल्कि गुस्सा भी आएगा कि एक छोटा—सा कर्ज देने के लिए बैंक कितने चक्कर लगवाता है, दस्तावेज मांगता है। पर इन डिफॉल्टरों को कर्ज पर कर्ज देने में इन्हें कोई परेशानी नहीं आती है। सच तो यह है कि इन बड़े आदमी के आगे बैंकों की बोलती बंद हो जाती है। ऐसा तब है जबकि रिजर्व बैंक बताता है कि कृषि कर्ज में किसान कर्ज ही नहीं कृषि कारोबार कर्ज भी शामिल रहता है । 

नवंबर 2016 में वित्त राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने राज्यसभा में बताया कि सितंबर 2016 तक कुल कृषि कर्ज 12 लाख 60 करोड़ रुपए थे। इनमें से 7.75 लाख करोड़ के कृषि ऋ़ण थे और 4.84 लाख करोड़ रुपए के दीर्घकालिक कर्ज। उन्होंने यह भी साफ किया कि कृषि कल्याण कोष में किसानों की कर्ज अदायगी का कोई इरादा सरकार का नहीं है। कागज पर पिछले 15 सालों में कृषि कर्ज 8 गुना से ज्यादा बढ़े हैं, लेकिन उस अनुपात में किसानों खासकर छोटे, लघु और सीमांत किसानों के कर्ज नहीं बढ़े हैं। 

बजट भाषण में किसान 
किसानों के लिए 10 लाख करोड़ के कृषि कर्ज का लक्ष्य रखा गया है, जो लगभग बैंकों के संभावित कुल एनपीए के बराबर है। 

रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर मूलत: आधारित आर. राम कुमार और पल्लवी चौहान का शोधपत्र साफ बताता है कि बैंकिंग सेवा के भारी विस्तार और लक्ष्यों के बावजूद सीमांत किसानों की कर्ज निर्भरता सूदखोरों पर बढ़ी है। देश में 95 फीसदी सीमांत, लघु और छोटे किसान हैं जिनके पास एक, दो या पांच हेक्टेयर या उससे कम खेत हैं। देश की कुल कृषियोग्य भूमि का 68.7 फीसदी हिस्सा इन किसानों के पास है। इन किसानों के लिए अरसे से किसानी घाटे का सौदा बन गयी है। बाजार और मौसम की मार से उन्हें कोई कारगर सुरक्षा प्राप्त नहीं है। 


सरकार नहीं जानती किन पूंजीपतियों के कर्ज माफ हुए 
बैंकों ने बड़े कर्जदारों के 1.14 करोड़ रुपए के कर्ज तीन सालों 2013—2015 के कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिए। राजनीतिक बयानबाजी में इसे कर्जमाफी कहा जाता है। वित्त राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने राज्य सभा में बताया है कि 2015—2016 में भी 59 हजार 547 करोड़ रुपए बैंकों ने बट्टे खाते में डाले हैं। पर आश्चचर्य यह है कि जिन बड़े कर्जदारों के कर्ज बट्टे खाते में डाले गए हैं, इसकी जानकारी न रिजर्व बैंक के पास है न ही केंद्र सरकार के पास है। 

पिछले कुछ सालों में सवा 2 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। 2015 में 8 हजार 7 किसानों ने आत्महत्या की। यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे साफ जाहिर है कि देश में किसानों की आर्थिक हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। तमिलनाडु में सदी का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है। वहां के किसान 60 फीसदी सूद पर कर्ज लेने को मजबूर हैं, जबकि केंद्र सरकार का निर्देश किसानों को 7 फीसदी पर कर्ज देने का है। वहीं केरल में 115 साल बाद का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है, जिसके लिए केंद्र सरकार से 1000 करोड़ रुपए की मदद चाहिए। बैंकों ने पिछले 10—15 सालों में सवा 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा बट्टे खाते में डाल दिए हैं तो किसानों का कर्ज क्यों नहीं माफ किया जा सकता है। केंद्र सरकार को छोटे, सीमांत और लघु किसानों की कर्ज अदायगी के बारे में संजीदगी से सोचने का वक्त है। उत्तर प्रदेश में फसली ऋणों की घोषणा अपने भाषणों में कर सकते हैं, तो बाकि देश के किसानों ने क्या गुनाह किया है। 

एनपीए का नुकसान छोटे कर्जदारों और किसानों को 
बैंकों के एनपीए पिछले कुछ सालों से बेहिसाब बढ़े हैं। बढ़ते एनपीए से बैंकों की कर्ज देने की क्षमता कम होती है और कर्ज की ब्याज दरें अनावश्यक रूप से ज्यादा बनी रहती हैं। इसका असली खामियाजा छोटे बचतकर्ताओं और कर्जदारों को भुगतना पड़ता है। बैंक की भाषा में छोटे कर्जदारों को 'स्मॉल ब़रोअर' कहा जाता है। 1991 में शुरू हुए उदारीकृत अर्थव्यवस्था के दौर से छोटे कर्जदारों की हिस्सेदारी 63 फीसदी से घटकर 32 फीसदी रह गयी है। टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज के आर रामकुमार और पल्लवी चौहान के शोधपत्र में पुख्ता ढंग से यह बात सामने आयी है कि बैंकिंग उद्योग किसानों से दूर केवल बड़े लोगों और कारोबारियों का बन कर रह गया है। 

(राजेश रपरिया वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार हैं। यह लेख दैनिक भास्कर से साभार।)

Jun 14, 2011

सुलगती हुई ज़मीन


सरकार के सामने जब क्योतो प्रोटोकॉल के नियमों के कारण अड़चन पैदा हुई तो उसने जन सुनवाई का रास्ता अख्तियार किया, ताकि सहदेव विहार में जिंदल ग्रुप के कचरा बिजली उत्पादन केंद्र को लगवाने का रास्ता साफ हो सके...

अजय प्रकाश

जमीन अधिग्रहण के खिलाफ देश में व्यापक होते विरोध को देखते हुए अब सरकार संसद के अगले मानसून सत्र में सन् 1894 से चले आ रहे अंग्रेजों के जमाने के भूमि अधिग्रहण विधेयक को नया प्रारूप देने जा रही है। नये प्रारूप को लेकर सोनिया गांधी के अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) की ओर से कई सुझाव केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख को लगातार पहुंच रहे हैं, जिससे उन्हें लोक कल्याणकारी भूमि अधिग्रहण कानून बनाने में सहूलियत हो। इन सुझावों में जमीन मालिकों को नीलामी दर से छह गुना कीमत दिये जाने, ग्राम सभा को निर्णायक अधिकार देने और 75 फीसद प्रभावितों की सहमति के बाद ही अधिग्रहण की अनुमति जैसे मुद्दों को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भूमि अधिग्रहण मामलों में एनएसी कार्यसमूह के संयोजक हर्ष मंदर के शब्दों में कहें तो "सरकार ने अधिग्रहण में अगर उपर्युक्त तीनों प्रावधान शामिल कर लिये तो इस कानून में एक गुणात्मक परिवर्तन होगा।' सरकार और उसके सहयोगी अधिग्रहण कानून को किस रूप में लागू करेंगे, यह तो आने वाले सत्र में पता चलेगा, लेकिन पहले से मौजूद कानूनों में जनता की भागीदारी कितनी हो पा रही है, उसे देखने पर कुछ और ही कहानी सामने आती है।


 
ताजा मामला झारखंड के सिंहभूमि जिले का है, जहां 26 मई को जादूगोड़ा इलाके में भाटिन यूरेनियम माइंस के बीस साल पूरे होने पर एक्सटेंसन के लिए एक जन सुनवाई हुई। यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआइएल) के अधिकारियों ने क्षेत्र में माइक से प्रचार किया कि सुनवाई स्थानीय फुटबाल मैदान में होगी, लेकिन जन सुनवाई कॉरपोरशन कर्मचारियों के कॉलोनी में हुई।


सुनवाई के दौरान ग्रामीणों, मीडिया और जनांदोलनों से जुड़े लोगों ने जाने का प्रयास किया तो सुरक्षा बलों और निजी गार्डों ने उन्हें रोक दिया। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जन सुनवाई पूरी हो गयी। साथ ही 29 वर्ष और कंपनी के लीज को बढ़ाने का फैसला बगैर प्रभावितों की सहमति के ले लिया गया।

गौरतलब है कि यह एकतरफा फैसला एजेंसी क्षेत्र में लिया गया जो पहले से ही पेसा ऐक्ट के तहत आता है, जहां ग्राम सभा और लोगों की सहमति से ही अधिग्रहण या कंपनी चलाने का अंतिम निर्णय होता है। झारखंड आर्गेनाइजेशन अगेंस्ट यूरेनियम के संयोजक जगत मांडी कहते हैं, "यह बर्ताव तब किया गया जब इस क्षेत्र में नयी कंपनी नहीं बनानी थी बल्कि एक्सटेंशन लेना था। अधिग्रहण और विस्थापन तो पहले ही हो चुका था।'

यह अंधेरगर्दी सिर्फ आदिवासी इलाकों में ही नहीं है, बल्कि इसकी चपेट में दिल्ली जैसे शहर भी हैं। दिल्ली में कचरे से बिजली पैदा करने पर तुली सरकार के सामने जब क्योतो प्रोटोकॉल के नियमों के कारण अड़चन पैदा हुई तो उसने जनसुनवाई का रास्ता अख्तियार किया ताकि सहदेव विहार में जिंदल ग्रुप के कचरा बिजली उत्पादन केंद्र को लगवाने का रास्ता साफ हो सके।

टॉक्सिक वाच संस्था के गोपाल कृष्ण कहते हैं, "कचरा से बिजली पैदा करने के दिल्ली में हो चुके असफल प्रयोगों के बावजूद सरकार नहीं मानी तो उसने केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड को इस काम में लगाया, जिसने सिर्फ दो कर्मचारियों के हस्ताक्षर वाली जनसुनवाई करके संयंत्र लगाने की मंजूरी दे दी। सरकार की इस धूर्तता की जानकारी हमें सूचना अधिकार कानून की मदद से मिली।'

देश के दो हिस्सों के ये दो उदाहरण यह बताने के लिए काफी हैं कि पहले से बने कानूनों पर अमल की क्या स्थिति है। हालांकि एनएपीएम से जुड़े भूमि अधिग्रहण प्रतिरोध आंदोलन के संयोजक रूपेश वर्मा को अधिग्रहण कानून में हो रहे बदलावों में किसानों के लिए कुछ राहत दिखती है। उनके मुताबिक, "जो अधिकार अबतक जिलाधिकारी के हाथ में बंद थे, वे ग्रामसभा को मिलेंगे तो जमीनों की अबाध लूट की रफ्तार थमेगी।'

एनएपीएम से जुड़ी मेधा पाटकर भी अधिग्रहण कानून में होने जा रहे बदलावों को सकारात्मक रूप में देखती हैं। एनएसी की अरुणा राय के अनुसार, "सरकार अगर सार्वजनिक क्षेत्र के लिए जमीन लेगी तो व्यापक विचार विमर्श होगा और निजी अधिग्रहण के लिए 75 फीसद प्रभावितों की लिखित मंजूरी अनिवार्य होगी।'

सरकार अपनी जरूरतों के लिए किस तरह जमीन अधिग्रहण कर रही है, इसका एक उदाहरण न्यूक्लीयर पॉवर कॉरपोरशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनसीपीआइएल) की ओर से हरियाणा के फतेहाबाद जिले के कुम्हारिया न्यूक्लियर पॉवर प्रोजेक्ट के खातिर अधिगृहित की जा रही जमीन का मामला है। फतेहाबाद कलेक्ट्रट पर पिछले एक वर्ष से किसान संघर्ष समिति जमीन होने वाले कब्जे के विरोध में धरना दे रही है। अबतक धरना स्थल पर आने वाले दो किसानों की मौत भी हो चुकी है।

समिति के अध्यक्ष हंसराज सिवाच कहते हैं, "हम लोग हस्ताक्षर करके कितनी बार प्लांट के लिए जमीन नहीं देने की बात कह चुके हैं। जापान में आई सूनामी के बाद परमाणु संयंत्रों से रिसाव की घटना के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। फिर भी सरकार जिद पर कायम है।' हरियाणा की इस छवि के उलट फिक्की ने भूमि अधिग्रहण को लेकर हरियाणा को मॉडल के रूप में पेश किया है।

फिक्की के नवनियुक्त महासचिव ने भूमि अधिग्रहण के बारे में राय है कि "हम प्राकृतिक संसाधनों की ऑनलाइन नीलामी और अधिग्रहण के हरियाणा मॉडल अपनाने के पक्ष में हैं।' महासचिव के मुताबिक, हरियाणा में परियोजनाओं के लिए कंपनियां सीधे किसानों से 70 फीसद जमीन खरीदती हैं और सरकार मात्र 25 प्रतिशत जमीन पर कब्जा कर परियोजना के लिए कंपनी को हस्तांरित करती है। इसके अलावा हरियाणा के उन जिलों में जो एनसीआर जोन में आते हैं वहां 33 साल तक प्रति एकड़ 15 हजार रुपये के हिसाब से जमीन मालिक को देने और प्रभावित परिवारों को नौकरी देने का प्रावधान है।

इस बारे में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख का कहना है कि "नये अधिग्रहण कानून में निजी मालिकान और सरकार की जमीन मालिक से सीधी खरीद का औसत 70 20 का रखें या 80 20, का अभी इस पर सहमति बननी बाकी है।' फिक्की महासचिव के दावे के बरक्स किसानों के पक्ष को देखें तो दोनों मेल नहीं खाते। हरियाणा के अंबाला जिले में बन रहे "मॉडर्न इंडस्ट्रियल टाउनशिप' के लिए अधिग्रहीत की जा रही 280 एकड़ जमीन को लेकर मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा का दावा है कि इसकी मंजूरी एक लाख किसानों ने हस्ताक्षर के जरिये दी है, लेकिन किसान संघर्ष समिति बाखालसा ने इसे फर्जीवाड़ा करार दिया है।

अधिग्रहण को लेकर दूसरा विवाद सोनीपत राजीव गांधी एजुकेशन सिटी को लेकर है। 2006 में अधिग्रहीत की गयी इस इलाके की भूमि के बारे में सरपंच ओम सिंह कहते हैं, "सरकार को हमने पूरी जमीन देने का वायदा कभी नहीं किया था, इसलिए एक भी किसान ने अधिग्रहण के बदले आज तक मुआवजा नहीं लिया है।' जमीन अधिग्रहण के विशाल क्षेत्रों में खनन के वे क्षेत्र भी हैं जहां लोग लगातार अपने जल, जंगल और जमीन से उजड़ने को मजबूर हैं। उजड़ने का खौफ और पूंजीपतियों को सुविधा देने वाले अधिग्रहण कानूनों की वजह के किसान-आदिवासी विद्रोह कर रहे हैं और माओवादी प्रभाव क्षेत्रों को मजबूती दे रहे हैं। इसके बावजूद सरकार अधिग्रहण नीतियों को बदलने को तैयार नहीं दिखती है।

हाल ही में योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया ने खनन क्षेत्रों की रॉयल्टी बढ़ाये जाने के सवाल पर कहा है कि "खनन का धंधा बड़े निवेश और जोखिम का है। खनन कंपनियों के मुनाफे में स्थानीय लोगों की भागीदारी से विदेशी निवेशक बिदक जायेंगे और निवेश के भविष्य पर भी खतरा उत्पन्न हो जायेगा।' खनन के लिए विशेष जोन के रूप में ख्यात छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नया अतिक्रमण भारतीय सेना अपना ट्रेनिंग कैंप खोलकर करने जा रही है। एजेंसी एरिया का यह क्षेत्र, जो कि पेसा कानून के तहत आता है, अब तक हुए इस अधिग्रहण की जरूरतों से बेमेल है। सेना ट्रेनिंग स्कूल के लिए सरकार अबूझमाड़ में 4 हजार वर्ग मीटर जमीन का अधिग्रहण करने जा रही है हालांकि इसके लिये स्थानीय आदिवासियों से कोई सहमति नहीं ली गयी।

अबूझमाड़ क्षेत्र में सेना के कैंप बनाये जाने का कारण यह है कि माओवादी इलाका है, जहां सरकारी तंत्र काम नहीं करता। माओवादियों से निपटने के इस नये तरीके पर इस क्षेत्र के जानकार और पूर्व कमीश्नर बीडी शर्मा दो स्तरों पर चिंता जाहिर करते हैं। पहली बात यह कि "जो आदिवासी भाषा ही नहीं समझेंगे, उनके जमीन का अधिग्रहण सरकार कैसे करेगी? दूसरी बात यह कि अंडमान के उदाहरण को देखें तो अंग्रेजों के समय की अठारह जनजातियों में से वे ज्यादातर जनतातियां खत्म हो गयीं जो बाहरियों के संपर्क में आयीं।'

गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं, "अगर सेना अबूझमाड़ के क्षेत्र में अधिग्रहण कानूनों को ताक पर रखकर प्रशिक्षण केंद्र बनाने में सफल हो भी जाती है तो यह एक ऐसा आत्मघाती कदम होगा जिसमें सुरक्षा बलों और आदिवासियों की पीढ़ियां एक दूसरे का खून बहाती रहेंगी।'

मानसून सत्र में पेश होने जा रहे अधिग्रहण कानून के विचार से किसी को ऐतराज नहीं होगा क्योंकि अंग्रेजी शासन काल से चले आ रहे अधिग्रहण कानून में लोकतंत्र की मूल भावना के मुताबिक बदलाव जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि किसानों- आदिवासियों के प्रतिनिधियों के भागीदारी के बगैर जो प्रस्ताव तैयार हुआ है उससे कोई ऐसा जमीन अधिग्रहण कानून कैसे बना सकता है, जिसके के बाद इन तबकों में रोष न हो।



द पब्लिक एजेंडा से साभार.