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Jun 16, 2017

2 महीने बाद मीडिया तक पहुंची 15 दलितों पर देशद्रोह के मुकदमें की सूचना

राजपूतों के दबाव में की जा रही हरियाणा के दलितों की बेजा गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे छात्र—नौजवान, 24 अप्रैल की दोपहर में सीएम खट्टर से अंबाला में मिले थे युवक और शाम को देशद्रोह समेत कई अन्य धाराओं में उनपर कर दिया गया था मुकदमा दर्ज।  

कैथल से राजेश कापरो की रिपोर्ट 

जी हां। यह सही समाचार है। ​हरियाणा के करनाल जिले के सिविल लाईन पुलिस थाना में 24 अप्रैल को यह मुकदमा दर्ज किया गया है। इस मुकदमा के अनुसार इन 15 नामजद दलित छात्रों—नौजवानों ने देशद्रोह का अपराध किया है । इन 15 आरोपियों में मोनिका नाम की एक दलित छात्रा का नाम भी है जो कुरूक्षेत्र युनीवर्सिटी में पढ़ती है।

 मैंने इस मुकदमे की एफआईआर की कॉपी के साथ पूरी जानकारी 5 जून को अपने फेसबुक शेयर कर दी थी। प्रदर्शनकारियों पर क्या मुकदमा दर्ज हुआ है यह पता करने में ही दसियों दिन लग गए। फिर थाने से कॉपी लेने में समय मुझे समय लगा और मैंने 5 जून को एक पोस्ट जरिए खुलासा किया कि 15 दलित छात्रों—नौजवानों पर हरियाणा पुलिस ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया है। छात्रों—नौजवानों समेत सैकड़ों की संख्या में दलित अंबाला जिला के गांव पतरेहड़ी के दलितों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ राज्य के कई जिलों में प्रदर्शन कर रहे थे। 

कुछ लोगों ने खबर को शेयर भी किया पर देश ने आज तब संज्ञान में लिया, जब अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने मेरे प्रयासों के बाद छाप दिया। हिंदी अखबारों, संपादकों और बुद्धिजीवियों ने तो कोई संज्ञान ही नहीं लिया। शायद हिंदी वालों को हिंदी में लिखने वालों की दी सूचनाओं पर भरोसा नहीं होता या फिर वह अंग्रेजी को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। 

खैर, जो भी हो। दिलचस्प यह है कि 24 अप्रैल को दर्ज हुए इस मुकदमें में पुलिस ने ​अबतक एक भी गिरफ्तारी नहीं की है। पुलिस से जब पीड़ितों के परिजनों ने जानकारी चाही तो उनका कहना था कि अभी गिरफ्तार नहीं करेंगे लेकिन जब यह दूसरी बार प्रदर्शन या किसी आंदोलन में शामिल होंगे तब इन्हें भीतर करेंगे। 

पुलिस के बयान से सवाल यह उठता है कि हरियाणा की पुलिस ने छात्रों—नौजवानों पर देशद्रोह जैसा मुकदमा सिर्फ धमकाने और तफरी लेने के लिए दर्ज कर लिया है या ऐसे गंभीर और रेयर मुकदमें दर्ज कर पुलिस कुछ और संदेश देना चाहती है। एक वकील होने के नाते मैं जानता हूं कि देशद्रोह का मुकदमें में गिरफ्तारी और जमानत ज्यादा बेहतर होती है, बजाय कि आप आरोपियों को यूं ही छोड़ दें। इसका एक ही मकसद हो सकता है कि पुलिस ऐसे आरोपियों को 'न जीने देगी और न मरने देगी' वाली हालत में बनाकर रखना चा​हती है। 

और यही वजह है कि देशद्रोह के मुकदमें से खौफ में हैं सभी दलित छात्र—नौजवान, बयान तक देने से डर रहे हैं कि पुलिस कहीं उन्हें गिरफ्तार न कर ले। 

ऐसे हुई आंदोलन की शुरुआत 
अंबाला जिला के गांव पतरेहड़ी के दलितों ने विभिन्न दलित संगठनों के नेतृत्व में अप्रैल 19 से 26 तक कर्ण पार्क करनाल में धरना किया था। प्रदर्शनकारी दलितों की मांग थी कि अंबाला पुलिस दलित नौजवानों को हत्या के एक फर्जी मुकदमे में फंसा रही है उस पर रोक लगाई जाए। सीएम मनोहर लाल खट्टर को अपना दर्द बताने दलित अंबाला से यहां आए थे। मुख्यमंत्री से मिल के जाने के बाद ही पुलिस ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया। जाहिर है पुलिस अमले का यह रवैया बगैर मुख्यमंत्री के इशारे के संभव नहीं रहा होगा। 

हरियाणा के इतिहास में शायद यह पहला मामला है जहां पर इतनी बडी संख्या में दलित समाज के लोगों को नामजद किया गया है। हालांकि इससे पहले भी दलित समाज के अधिकारों की आवाज बुलंद करने वालों पर देशद्रोह के मुकदमे दर्ज किये गए थे। 

देशद्रोह का यह मुकदमा दलित नेता अशोक कुमार, कृष्ण कुटेल, मलखान नंबरदार, राकेश, रवि कुमार इंद्री, अमर मुनक, अमर सगा, मोनिका, मुलखराज, राजकुमार पतरेहड़ी, धर्मसिहं व रविंद्र कुरूक्षेत्र अनिल, संजू ,नरेश पतरेहड़ी पर दर्ज किया गया है।

जिनपर दर्ज हुए मुकदमें 
बावेला यहाँ से खड़ा हुआ  
अंबाला पुलिस के लापरवाही भरे रवैए के कारण मार्च में दलित समुदाय और राजपूतों के बीच तनाव चल रहा था । राजपूत जाति के कुछ बदमाश बार बार दलित समाज के लोगों पर हमला कर रहे थे । पुलिस ने शिकायत के बावजूद दबंग जाति के बदमाशों पर कारवाई नहीं की । दलितों को दबंगों का मूहतोड़ जवाब देने के लिए मजबूर किया गया और दलित अपनी जानमाल की सुरक्षा करने के लिए एकजुट हुए । इस प्रकार से झगड़े की इस घटना में दोनों पक्षों के लोग घायल हुए । पुलिस ने उसी समय दलितों पर 323 आईपीसी तथा दबंग जाति के बदमाशों के खिलाफ एससी एसटी एक्ट सहित 323 आईपीसी आदि धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया।

मुश्किल बनी यह घटना
घटना के चार पांच दिन बाद दबंग जाति के एक घायल की मौत घाव में संक्रमण के कारण हो गई । पुलिस ने दलित समाज के नौजवानों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया । छात्र जवानों को जेलों में ठूंस दिया । झगड़े की जड़ गांव के सरपंच जिस पर एससी एसटी में मुकदमा दर्ज है अभी तक नहीं पकड़ा गया है । पुलिस दलित छात्र नौजवानों को केवल इसी आधार पर उठा रही थी कि वह अंबेडकर संगठन के सदस्य है और दलित उत्पीड़न की घटनाओं का विरोध करता है । करनाल के कर्ण पार्क में पतरेहड़ी के दलित मुख्यमंत्री का ध्यान अंबाला पुलिस की इसी मनमर्जी की तरफ दिलाने आए थे।

इन धाराओं के तहत हुआ है मुकदमा 
इस संबंध में एफआईआर संख्या 298 दिनांक 26/04/2017 धारा 124ए/147/149/186/283/332/341/353 आईपीसी पुलिस थाना सिविल लाईन में दर्ज की गई है।  

कौन हैं जिन पर देशद्राह का मुकदमा हुआ है दर्ज 
15 दलित छात्र नौजवानों पर यह मुकदमा दर्ज किया गया है वे सभी उस प्रतिनिधी मंडल का हिस्सा थे जो 24 अप्रैल  के रोष प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री से मिले थे । यह प्रतिनिधी मंडल मुख्यमंत्री के आश्वासन से सहमत नहीं हुआ और कर्ण पार्क में अपना रोश प्रदर्शन जारी रखने की बात बोलकर वार्ता से उठकर आ गया । 26 अप्रैल को पुलिस ने आंदोलनकारी दलितों को कर्ण पार्क से जबरन खदेड़ दिया । सारा दिन सैंकड़ो दलितों को पुलिस बसों में भरकर घूमाती रही और बाद में अलग अलग स्थानों पर फेंक दिया । पार्क में पानी भर दिया गया । 26 तारीख को गिरफ्तार किए गए इन लोगों में ये सभी 15 लोग भी थे उनको भी बाकि पब्लिक के साथ छोड़ दिया । हालांकि इन सब के खिलाफ 26 अप्रैल को ही देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जा चुका था । यदि उसी समय पुलिस इनको गिरफ्तार कर लेती तो आंदोलन और ज्यादा भड़क उठता, इसलिए पुलिस ने गिरफ्तारी नहीं की । 

दलितों पर बढ़ रहे हैं हमले 
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अत्याचारों के रूप में 2016 में दलितों पर हमलों के 47000 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए । इन आंकड़ो के अनुसार रोजाना 2 दलित मारे जाते हैं और पांच दलित औरतों के साथ बलात्कार की घटना होती है । एक अन्य अनुमान के अनुसार प्रत्येक 18वें मिनट में दलित के खिलाफ एक अपराध होता है हर सप्ताह 13 दलितों को मौत की नींद सूला दिया जाता है हर सप्ताह 6 दलितों का आपराधिक अपहरण किया जाता है हररोज दलित उत्पीड़न की 27 घटनाएं दर्ज होती है । उतर प्रदेश के सहारनपुर की घटनाओं में भाजपा की योगी सरकार ने जो रवैया अपनाया हुआ है हरियाणा की खट्टर सरकार भी उसी राह पर है । ऐसे में दलित समाज के सामने संघर्ष की राह पर अग्रसर होने के अलावा कोई चारा नहीं है ।

पहले भी हुए दलितों पर देशद्रोह के मुकदमें दर्ज 
भगाना के दलितों पर कांग्रेस की हुड्डा सरकार ने देशद्रोह बनाया था। उससे पहले 2007 में हरियाणा सरकार ने प्राईवेट युनीवर्सिटी बिल का विरोध करने वाले जागरूक छात्र मोर्चा के छात्रों पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था। इनमें भी ज्यादातर छात्र दलित या पिछड़ी जातियों संबंधित थे। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के ईस्मालईबाद इलाके में भी पुलिस ने आवासीय प्लाटों की मांग करने वाले दलितों पर देशद्रोह का केस दर्ज किया था। 

Feb 16, 2016

'कन्हैया की मां कहती हैं, मेरी आत्मा बेटे के साथ जेल में बंद है'

गोरे अंग्रेजों ने भगत सिंह को देशद्रोही कहा, काले अंग्रेज कन्हैया को कह रहे- कन्हैया के पिता 

कन्हैया के गांव बीहट से लौटकर पुष्पराज की रिपोर्ट

भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह जवाहरलाल नेहरू विश्चविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया को देश के लिए खतरा मान रहे हैं। एक तथाकथित देशद्रोही की पृष्ठभूमि को जानने के लिए मैं बेगूसराय के बीहट गांव में खड़ा हूँ।

बेगूसराय मीडिया डाॅट काॅम के संपादक प्रवीण कुमार इस समय मेरे मार्गदर्शक हैं। प्रवीण हमें बताते हैं कि यह बीहट का मसनदपुर मुहल्ला है। बिहार के पहले मुख्यमंत्री डाॅ. श्रीकृष्ण सिंह के मंत्रालय में सबसे विश्वस्त मंत्री रहे रामचरित्र सिंह के पुत्र चन्द्रशेखर सिंह ने पिता से बगावत कर कम्युनिस्ट पार्टी का झंडा उठाया था। कामरेड चन्द्रशेखर को बिहार का लाल सितारा कहा गया। कन्हैया का घर काॅमरेड चन्द्रशेखर के घर के पास ही है। कन्हैया काॅमरेड चन्द्रशेखर के गोतिया यानी पड़ोसी हैं।
कन्हैया के माता-पिता                                                                       फोटो - पुष्पराज      
सप्ताह का सबसे चर्चित युवा
पिछले एक सप्ताह में दुनिया का सबसे चर्चित युवा बन चुके कन्हैया के घर पर स्थानीय मीडिया और समर्थकों का आना-जाना लगा है। बुजुर्ग काॅमरेड राजेन्द्र सिंह ने बताया कि आधे घंटे पहले पूर्व विधायक राजेन्द्र राजन कन्हैया के परिवारजन से मिलकर गये हैं। पूर्व सांसद शत्रुघ्न सिंह कल आये थे। आज जदयू के जिलाध्यक्ष भूमिपाल राय घर आये थे। उन्होंने जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह से कन्हैया के पिता जयशंकर सिंह से फोन से बात करायी है। वशिष्ट नारायण सिंह ने कहा कि ‘आप चिंता ना करें, कन्हैया के साथ पूरा देष है।’

ईंट की दीवार और खपड़ैल की छत वाले चमत्कार विहीन घर को सब गौर से देख रहे हैं। सर गणेशदत्त महाविद्यालय, बेगूसराय में रसायन शास्त्र के अवकाश प्राप्त प्राध्यापक प्रो. परमानंद सिंह जानना चाहते हैं कि पुलिस ने एफआईआर में कौन सी धारायें लगायी हैं। घर के लोगों को कुछ भी नहीं पता कि कन्हैया के विरूद्ध पुलिस और कानून क्या कर रही है? देश की मीडिया जो कुछ बता रही हैं, पड़ोसी देखकर-सुनकर बता रहे हैं।

अभी दुआरे 'दरवाजे' के सामने 25 से ज्यादा लोग बैठे हैं। कुर्सियां कम पड़ रही हैं तो लोग खड़े हैं। गांव और आस-पड़ोस के लोग टीवी पर नजर रख रहे हैं। लोगों जानना चाहते हैं कि कोर्ट क्या फैसला देती है। दिल्ली के पटियाला हाउस में कन्हैया के मामले में सुनवाई होनी है लेकिन भाजपा के विधायक ओपी शर्मा और संघ के स्वयंसेवकों ने पत्रकारों और जेएनयू के शिक्षक-छात्रों पर हमला कर दिया है।

मीडिया को नहीं दी एफआइआर की कॉपी
सब लोग दुखी हैं कि आज कन्हैया को अदालत से जमानत नहीं मिली। पटियाला हाउस में क्या हो गया। कितना सही है कितना झूठ? दिल्ली की मीडिया पर गांव के लोगों को भरोसा नहीं। मैंने एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक मनोरंजन भारती से फोन कर पटियाला हाउस में क्या हुआ इसकी जानकारी ली। मनोरंजन भारती ने जब कहा कि पुलिस राष्ट्रद्रोह के आरोप की पड़ताल कर रही है। पर पुलिस ने अबतक किसी एफआईआर की काॅपी मीडिया को नहीं दी है। संभव है कि अभी तक एफआईआर दर्ज ही नहीं हुआ। घर के लोग डरे हैं कि क्या एफआईआर पुलिस की बजाय गृृहमंत्री खुद ही तैयार करेंगे?
क्रांतिकारियों की जननी बीहट    
बीहट नगर परिषद् की आबादी 70 हजार से ज्यादा है। जब बेगूसराय जिला के सभी विधानसभा क्षेत्रों पर कम्युनिस्ट पार्टी का लाल पताका लहराता था तो बेगूसराय को राष्ट्रीय मीडिया ने ‘लेनिनग्राद’ और बीहट को ‘मिनी मास्को’ की संज्ञा दी थी। कांग्रेस पार्टी की केन्द्रीय सत्ता ने बेगूसराय से कम्युनिस्ट पार्टी के सफाये के लिए बेगूसराय के ही एक तस्कर को राजनीतिक संरक्षण देकर कम्युनिस्टों पर हमला शुरू करवाया था।

राज्यपोषित अंतर्राष्ट्रीय तस्कर के हमलों का जवाब देने के लिए कम्युनिस्टों ने हथियार बंद संघर्ष किया था। उस सशस्त्र संघर्ष में सबसे बड़ी शहादत बीहट के लेागों ने दी थी। बीहट के 30 से ज्यादा क्रांतिकारी कम्युनिस्ट संघर्ष में शहीद हुए। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने कभी बीहट को ‘क्रांतिकारियों की विधवाओं का गांव’ भी कहा था। आज भी शहीदों के स्मारक अतीत की याद दिलाते हैं। तब बीहट को ‘बारदोली’ कहा गया था। लेनिनग्राद के मिनी मास्को-बारदोली का बेटा कन्हैया क्या देशद्रोही हो सकता है?
    
मजदूरी करते  रहे कन्हैया के पिता
कन्हैया के दादा मंगल सिंह काॅमरेड चन्द्रशेखर के बाल-सखा थे। मंगल सिंह बरौनी खाद कारखाना में फोरमेन थे। हम जिस ईंट-खरपैल घर में कन्हैया के परिवारजन से मिल रहे हैं उसे मंगल सिंह ने 6 दशक पहले बनाया था। इसी घर में जयशंकर सिंह दो भाईयों के संयुक्त परिवार के साथ निवास करते हैं। कन्हैया के पिता जयशंकर सिंह जीरोमाइल में गिट्टी-बालू ढोने की मजदूरी करते थे तो कभी जीप की ड्राइवरी भी करते थे। भूमिहीन मजदूर जयशंकर सिंह ने गरीबी की वजह से हायर सेकेण्डरी से आगे की पढ़ाई नहीं की।

जयशंकर सिंह कठोर श्रम करने वाले एक मेहनतकश थे। मजदूर अगर ज्यादा पैसे कमाने के लिए 8 घंटे से ज्यादा श्रम करे तो अतिश्रम से मजदूर अपनी मानवीय शक्ति का दोहन ही करेगा। जयशंकर सिंह को 2009 में लकवा मार गया। लकवे के मरीज को बेहतरीन इलाज और बेहतरीन पोषण चाहिए। गरीबी और जेहालत में ऐसा मुमकिन नहीं था। जयशंकर सिंह अपने पांव से चल नहीं सकते हैं इसलिए अंधेरे भरे कमरे में ही इनसे मिलना अच्छा?

मैंने पूछा क्या लकवा की कोई दवा इस समय ले रहे हैं? नहीं, भरपेट भोजन और परहेज ही दवा है। हंसते हुए कहा-दवा के लिए नाजायज पैसे कहां से आयेंगे। मैं जीवन में पहली बार ऐसे इंसान से मिल रहा हूँ जो अपने लिए जरूरी दवा को नाजायज मान रहा है। संभव है कि दवा और सही पोषण से जयशंकर सिंह स्वस्थ हो जायें लेकिन दवा के लिए नाजायज पैसा कहां से आये? पत्नी मीणा देवी आंगनबाड़ी सेविका हैं तो 3 हजार रुपये मासिक हर माह घर आते हैं। एक बेटा, कन्हैया का बड़ा भाई मणिकांत असम के बोगाई गांव में एक कारखाने में 6 हजार रुपये मासिक की कमाई करता है।

हम कम्युनिस्ट हैं यही पाप हो गया 
पिता जयशंकर सिंह​ किशोर उम्र से कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर हैं। अभी भी कार्ड होल्डर हैं। माता मीणा देवी भी समर्पित काॅमरेड हैं। कन्हैया के पिता मुझसे पूछते हैं, हम कम्युनिस्ट खानदान से हैं क्या यही पाप हो गया? दूसरे लोग इन्हें मना करते हैं, नहीं ऐसी बात नहीं सोचिए। भगत सिंह को अंग्रेजों ने राष्ट्रद्रोही कहकर ही फांसी पर लटका दिया था। आज आजाद भारत की सरकार मेरे बेटे को राष्ट्रद्रोही कह रही है। हंसते हुए कहते हैं-मेरे बेटे ने जेएनयू पर एबीवीपी को कब्जा नहीं करने दिया तो अब एबीवीपी बदला सधा रही हैं। मैं अपनी कमाई से जीवन में एक ईंट नहीं जोड़ पाया पर आज गर्व है कि मैं भगत सिंह के रास्ते पर खड़े कन्हैया का पिता हूँ।

 कन्हैया के पिता को गर्व है कि हम खानदानी कम्युनिस्ट हैं। मेरा बेटा अगर कम्युनिस्ट नहीं होता तो उसे राष्ट्रद्रोही नहीं कहा जाता। दिल्ली से पुलिस कमिश्नर का फोन आया कि आपके बेटे को राष्ट्रद्रोह में जेल भेजा जा रहा है। मैंने कहा-‘आप गलत कर रहे हैं, मेरा बेटा किसी कीमत पर राष्ट्रद्रोही नहीं हो सकता है।’ मां मीणा देवी कहती हैं, मेरी आत्मा बेटे के साथ जेल में बंद है। हमारी इच्छा होती है कि हम उड़कर बेटे को देखने चले जायें लेकिन मेरी टांग पर ही बीमार पति की जिंदगी है। आजू-बाजू के लोग चर्चा कर रहे हैं कि बिहार में विपक्ष के नेता चन्द्रशेखर को गांधी मैदान की हजारों की सभा में कांग्रेस के मुख्यमंत्री के. बी. सहाय ने गुंडों से पीटवाकर अधमरा कर अस्पताल भेज दिया था। अगर चन्द्रषेखर कम्युनिस्ट पार्टी छोड़कर कांग्रेस में चले गये होते तो वे बिहार के मुख्यमंत्री होते। कम्युनिस्ट राजनीति करोगे तो मार खाओगे, राष्ट्रद्रोही कहलाओगे। कन्हैया के घर पर जुटे कन्हैया को चाहनेवाले कहते हैं-बीहट का यह लाल सितारा लाल किले पर झंडा फहरायेगा।

यह भूमिहीन भूमिहार का परिवार है...
कन्हैया का घर : एक क्रन्तिकारी विरासत                                    फोटो - पुष्पराज
प्रिंस कुमार कन्हैया से 2 वर्ष छोटे हैं। पैसों का जुगाड़ न हो पाने की वजह से पिंस ने पत्राचार पाठ्यक्रम से एम काॅम की पढ़ाई की है। प्रिंस बताते हैं कि कन्हैया हर हाल में पढ़ना चाहता था इसलिए वह हर तरह की तकलीफ झेलता हुआ जेएनयू पहुंच गया। प्रिंस सरकारी नौकरियों की तलाश में प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में लगे हैं पर ये सोचते हैं कि हमारे पूरे परिवार की पहली प्राथमिकता कन्हैया की पढ़ाई ही हैं। मैंने जानना चाहा कि परिवार में जमीन-जायदाद कुल कितनी है। प्रिंस ने बताया कि हमारे परिवार में कभी इतनी जमीन नहीं रही कि बेच सकें या पैदावार से चूल्हा चल सके।

कुछ बीघे जमीन थी, जो गड़हरा यार्ड और फर्टिलाइजर के लिए 1955-1960 में ही अधिग्रहित हो गयी। काॅमरेड राजेन्द्र सिंह कहते हैं-भूमिहीन-मजदूर भूमिहार को सवर्ण मानकर जिस तरह बर्ताव किया जाता है, उससे बेहतर है कि ऐसे दीनहीन भूमिहारों को दलित कहा जाये। गांव के लोग इसलिए भी एकजुट हैं कि बजरंग दल और विहिप ने धमकी दी है कि कन्हैया के घर के सामने कन्हैया का पुतला जलाया जायेगा। पुलिस की नाकेबंदी की वजह से कल वे बीहट नहीं घुस पाये तो जीरोमाइल पर कन्हैया का पुतला जलाकर लौट गये। लोगबाग दुखी हैं कि बीहट के रत्न का पुतला जलानेवाले कितने सिरफिरे हैं। एक काॅमरेड कहते हैं-मार्क्स ने कहा था-धर्म अफीम है। धर्म के आधार पर मुल्क को बांटने वाली नरेन्द्र मोदी की राज्यसत्ता क्या अफीम खाकर देष के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष को राष्ट्रद्रोही कह रही है।

हमारी ताकत मुख्यमंत्री
कन्हैया के घर से छूटते हुए पड़ोसी स्त्रियां टीवी देखकर कन्हैया के घर कर्णप्रिय संदेशा लेकर आयी हैं। मुझसे कन्हैया की माता मीणा देवी बताती है कि बिहार के मुख्यमंत्री मेरे साथ हैं तो मुझे ताकत मिली है। मुख्यमंत्री मेरे साथ हैं, यह गरीब के लिए खुषी और गर्व की बात है। मुझे पक्का भरोसा है कि अब मेरा बेटा जेल से बाहर आ जायेगा और राष्ट्रद्रोह के मुकदमे से मुक्त हो जायेगा। मैं उन सबको धन्यवाद देती हूँ, जो मेरे बेटे के साथ खड़े हैं।
मुल्क के गृहमंत्री राजनाथ सिंह जी आप गरीब के आंसू की कीमत नहीं जानते हैं। गरीब के आंसू पानी नहीं तेजाब होते हैं। आप एक भूमिहीन, लकवाग्रस्त, मजदूर-गरीब के बेटे को देशद्रोही कहते हैं। आप झूठ बोलते हैं तो आपकी जीभ नहीं कटती है, हम झूठ लिखेंगे तो हमारे हाथ कट जायेंगे।

Feb 13, 2016

खाप चौधरियों की चौपाल नहीं है जेएनयू


जेएनयू में अफजल गुरु और मकबूल बट्ट पर कार्यक्रम DSU जैसे एक छोटे संगठन ने कराया। DSU हमेशा से अति वामपंथी संगठन रहा है और ऐसा नहीं की ये कल बना है। यह संगठन सालों से है और मैंने दस सालों में उसकी विचारधारा में कोई बदलाव नहीं देखा है। वो हमेशा से माओवाद का समथर्न करते रहे हैं, पर जैसा की बहुतों ने कहा है कि वह जेएनयू की प्रतिनिधि आवाज़ नहीं है| 

जेएनयू में संगठन बनाने पर कोई पाबंदी है। जेएनयम में एक हिन्दू विद्यार्थी सेना भी है। कहने का मतलब ये कोई भी, एक अकेला भी एक संगठन बना सकता है, लेकिन इनमें से कोई भी आवाज़ जेएनयू की एकलौती आवाज़ नहीं है| आप कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों दोनों पर पर कार्यक्रम करा सकते हैं, सरकार समथर्क और विरोधी भी, शायद यही जेएनयू की खूबी है कि यहाँ हर विचार के लिए जगह है|

दूसरी बात कि अफज़ल गुरु पर कोई कार्यक्रम होना चाहिए या नहीं? संसद हमलों में जो लोग पकड़े गए उनमें से दो को निर्दोष पाया गया, एक अफज़ल को फांसी हुयी| मैं जो भी मानूं, पर बहुत से न्यायविदों ने कहा की उसके खिलाफ फांसी लायक सबूत नहीं थे| काटजू ने खुलेआम कहा की यहाँ न्याय में गलती हुई है (आप चाहे तो उन्हें पागल कह सकते है)| 

आप सुप्रीम कोर्ट की बात को ब्रम्ह वाक्य मान सकते हैं, लेकिन दूसरों से ये अधिकार नहीं छीन सकते कि वो इस फैसले पर सवाल खड़े न करें, आप उन्हें ये सवाल पूछने से नहीं रोक सकते की क्यों उसकी लाश उसके घर नहीं जाने दी गयी| बहुत सारे मुसलमान लड़के पिछली सरकार में पकड़े गए ये कहकर कि वो आंतकवादी हैं। 

सालों जेल में रहने के बाद वो निर्दोष पाए गए, ये मानने वाले कि अफज़ल को फंसाया गया था बाहर के नहीं हैं, इसी देश के हैं। अगर उनकी आवाज़ बहुमत की नहीं है, अगर वो “राष्ट्र की सामूहिक चेतना” में शामिल नहीं है, जिसके लिए अफज़ल को फांसी दी गयी तो वो क्या देशद्रोही हो गए? 

और ये sedition का मतलब क्या है राजद्रोह या देशद्रोह? व्यवस्था की आलोचना करने वाले लोग जैसे कबीर कला मंच, असीम त्रिवेदी, अरुंधती, प्रोफेसर साईंबाबा आदि क्या इसलिए देशद्रोही हैं कि वो आपकी हमारी समझ में सहज हो चुकी व्यवस्था पर सवाल कर रहे हैं? पूछ रहे हैं कि आदिवासी का मतलब माओवादी, कश्मीरी मुसलमान का मतलब आतंकवादी कैसे हो गया? 

कार्पोरेट घरानों को ज़मीन न देना, अपने जल, जंगल, ज़मीन की बात करना और सरकार का विरोध करना माओवाद कैसे हो गया, कश्मीर में आधी बेवाओं के शौहरों की बात करना, घरों के बाहर भारतीय सेना की मौजूदगी और AFSPA का विरोध करना आतंकवाद कैसे हो गया?


जेएनयू इसी समाज, इसी देश का है। अपने आप में एक छोटा भारत है। भारत की अच्छाइयाँ और बुराइयाँ दोनों यहाँ हैं| आपको लगता है कि जो कश्मीर के वो लोग जिन्होंने सेना की ज्यादतियां देखी हैं, जिनके घर के किसी आदमी को सेना एक दिन पूछताछ के लिए ले गयी और वो कभी नहीं लौटा, उनके लिए भारत शब्द का मतलब क्या है? 

आप सेना के किसी जवान के फोटो लगा कर देशभक्ति के सबूत के तौर पर लाइक्स माँगते रहते हैं, आपको क्या लगता है उस सेना का मतलब छत्तीसगढ़ के आदिवासी के लिए क्या है? आप बिलकुल नहीं देख पाते की मणिपुर की औरते क्यों निर्वस्त्र होकर कहती हैं Indian army rape us! इरोम शर्मिला क्यों भूख हड़ताल पर हैं? 

जिस सोनी सोरी के गुप्तांग में पत्थर भर दिए गए उसके लिए पुलिस का मतलब “शांति सेवा न्याय” है? नार्थ ईस्ट के लड़के ने सालों पहले जब मुझे Indian Friend कहा तो मुझे भी बुरा और अजीब लगा, पर बहुत बाद में समझ आया की वो ऐसा क्यों कह रहा था| जेएनयू इनसे अछूता नहीं है. 

कश्मीर, नार्थ ईस्ट, छतीसगढ़ के ये लड़के—लडकियां जेएनयम में पढ़ते हैं, वो वही कह रहे हैं, जो उन्हें लगता है| सेना, पुलिस, आपके लिए देशभक्ति का stimulation होगी, उनके लिए नहीं. फर्क सिर्फ इतना है कि दूसरे किसी विश्वविद्यालय में शायद वो सब न कह पाते, जो वो जेएनयू में कह पाते हैं| 

बहुत साल नही हुए, जब तमिलनाडु में भारत के झंडे जलाये जा रहे थे. बहुत साल नहीं हुए जब हमने त्रिभाषा फार्मूले के तहत उन पर हिंदी थोप दी थी, बिना पूछे की वो क्या चाहते हैं? किसी भी घर में कोई अफज़ल नहीं होना चाहिए, पर जो लोग कह रहे हैं कि हर घर से अफज़ल निकलेगा. उन्हें चुप कराने की जगह एक बार रुककर देखिये को वो ऐसा क्यों कह रहे हैं? क्या भारत का मतलब हमारी राज्यसत्ता भर है? ये सवाल मुश्किल है इनके लिए धैर्य चाहिए और हम instant देशभक्ति चाहते हैं, इंस्टेंट क्रांति चाहते हैं| 

आपको बुरा इसलिए भी लग रहा है कि जो आवाज़ें बहुत दूर कश्मीर, नार्थ ईस्ट, छतीसगढ़ में थी, अचानक जेएनयू में सुनायी दे रही है. जेएनयू इसलिए है​ कि वो इस आवाजों को चुप नहीं करता, बल्कि इसने संवाद की कोशिश करता है| हाशिये की आवाज़ें हमेशा खामोश कर दी जाती है, चाहे वो बंगाल हो या गोरखपुर विश्वविद्यालय. जेएनयू यही स्पेस है, जहां आप बिना डरे अपनी बात रख सकते हैं. जैसे टैगोर कहा करते थे where mind is without fear. 

पिछले कुछ दशकों में ये स्पेस तेज़ी से ख़तम हो रहे हैं. विश्वविद्यालय की अवधारणा ही यही है, जहां विचारों पर कोई पाबंदी न हो. आप सोच सकें, देख सकें, अपने विचार चुन सकें और आप भले अकेले हों, लेकिन आपके सोचने कहने की आजादी हो! मेरे लिए JNU एक विश्वविद्यालय नहीं, एक विचार है जहां मैं बिना डरे, अपनी बात कह सकूँ, आलोचना सुन सकूँ...

Where the mind is without fear and the head is held high
Where knowledge is free