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Jun 23, 2017

गोरखालैण्ड की मांग को नेपाल में स​मर्थन

गोरखा भारतीय सेना में आए दिन शहीद होकर भारत की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। ऐसे में गोरखाओं के खिलाफ प्रायोजित कुप्रचार बंद होना चाहिए...
जनज्वार, दिल्ली। दार्जिलिंग में पृथक गोरखालैण्ड की मांग को लेकर गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के अनिश्चितकालीन बंद का आज 11वां दिन है। क्षेत्र में आम जनजीवन अस्त-व्यस्त है। सरकार ने इंटरनेट सेवाओं को स्थगित कर दिया है। दवा दुकानों को छोड़कर अन्य सभी प्रकार की दुकानें, होटल और रेस्त्रां भी बंद हैं। अब तक इस आंदोलन में मरने वालों की संख्या तीन पहुंच चुकी है।

गोरखालैण्ड आंदोलन की आंच अब नेपाल में भी महसूस होने लगी है। नेपाल के विभिन्न दलों और संगठनों ने गोरखा लोगों के आंदोलन को समर्थन की घोषणा की है। साथ ही भारत में प्रवासी नेपालियों के बीच काम करने वाले संगठनों भी गोरखाओं के आंदोलन पर अपना समर्थन जता रहे हैं।
प्रवासी नेपाली जन समाज भारत के अध्यक्ष आजाद सेन थापा ने एक विज्ञप्ति जारी कर राज्य सरकार द्वारा आंदोलनकारियों के दमक की निंदा की है। गोरखा जनता पर जबरन बंगाली भाषा थोपे जाने का विरोध करते हुए थापा ने कहा है कि दार्जिलिंग में रहने वाले नेपाली भाषी लोग भारतीय नागरिक हैं और अपनी भाषायी पहचान और संस्कृति की रक्षा के लिए अलग राष्ट्र की मांग कर रहे है जो संविधान सम्मत है।
प्रवासी नेपालियों के एक दूसरे संगठन नेपाली एकता समाज भारत ने भी गोरखालैण्ड आंदोलन के प्रति अपने समर्थन की घोषणा की है। एकता समाज के अध्यक्ष आनंद थापा ने कहा है कि भाषा का अधिकारा नैसर्गिक है और दूसरी राष्ट्रीयताओं पर बलपूर्वक बहुसंख्यक समुदाय की भाषा और संस्कृति को थोपना लोकतंत्र की मान्यताओं के विपरीत बात है। आनंद थापा ने माग की है कि पश्चिम बंगाल को तुरत भाषा संबंधी अपने फैसले को वापस लेकर आंदोलनरत पक्ष के साथ वार्ता करनी चाहिए।
साथ ही आनंद थापा ने गोरखा जनता को आतंकवादी या उपद्रवी कह कर बदनाम करने को भी निंदनीय बताया और कहा गोरखा जनता ने पिछले 200 सालों से अपनी जान देकर इस देश की सीमाओं की रक्षा की है। आज भी दर्जिंलिंग, धर्मशाला, असम और अन्य स्थानों में रहने वाले गोरखा भारतीय सेना में आए दिन शहीद होकर भारत की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। ऐसे में गोरखाओं के खिलाफ प्रायोजित कुप्रचार बंद होना चाहिए।
उधर नेपाल में मोहन वैद्य किरण के नेतृत्व वाली नेपाल की कम्युनिष्ट पार्टी (क्रान्तिकारी माओवादी) ने गोरखालैण्ड आंदोलन का समर्थन किया है। काठमाण्डू से जारी एक विज्ञप्ति ने पार्टी के अध्यक्ष मोहन वैद्य किरण ने गोरखा आंदोलनकारियों पर पुलिस दमन की घोर निंदा की है। पार्टी ने पश्चिम बंगाल सरकार और केन्द्र सरकार से नेपाली भाषी भारतीय जनता की मांगों को संबोधित करने की अपील की है। साथ ही पार्टी ने आंदोलन के दौरान मरने वालों को शहीद घोषणा करने की भी मांग राज्य सरकार से की है।
इस बीच पुलिस ने हत्या और आपराधिक षड्यंत्र के आरोप में गोरखा जन मुक्ति मोर्चा अध्यक्ष बिमल गुरूंग के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। मोर्चा के तीन समर्थकों की मौत को लेकर ये आरोप लगाये गये हैं। गोरखा मुक्ति मोर्चा ने दावा किया है कि मोर्चा समर्थक पुलिस गोलीबारी में ही मारे गये थे, लेकिन राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने इस बात से इंकार किया है।
दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अनिश्चितकालीन बंद के कारण वहां के मशहूर चाय उद्योग के साथ चाय बागान मालिकों को भारी नुकसान हो रहा है। बंद के कारण दो लाख से ज्यादा बागानकर्मियों की जीविका पर बुरा असर पड़ा है।

Jun 13, 2017

पेशाब-पाखाने की छुट्टी मांगने पर जाती है नौकरी, यूनियन बनाने की कोशिश हुई तो भेज दिया जेल

मजदूरों के यूनियन बनाने के बुनियादी हक़ के संघर्ष को विफल बनाने में पुलिस और न्यायपालिका भी अपना पूरा योगदान दे रही है .... 

आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में पिछले कुछ महीनों से मजदूर अपनी यूनियन पंजीकृत करवाने के लिए और मैनेजमेंट से अपने काम की परिस्थितियों से सम्बंधित मांगों को लेकर संघर्षरत हैं. 31 मई 2017 को कंपनी के गेट पर बीते कई दिनों से शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों पर पुलिस ने मैनेजमेंट की शिकायत पर पहले लाठीचार्ज किया और फिर उन्हें हिरासत में ले लिया. इन सभी के ख़िलाफ़ रोहतक के संपला थाने में एफ़आईआर दर्ज की गई है, जिनमें यूनियन लीडरों को मुख्य आरोपी नामित किया गया है.

फ़ाइल फोटो  
आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा प्राइवेट लिमिटेड एक जापानी कम्पनी है, जो 2011 से आई.एम.टी. रोहतक में स्थित अपनी फैक्ट्री में टोयोटा, मारुती, होण्डा आदि नामी गाड़ी बनाने वाली कंपनियों के लिए 'डोर लॉक' एवं 'इनसाइड-आउटसाइड हैंडल' जैसे पार्ट्स बनाती है. इस फैक्ट्री में करीब 450 मज़दूर काम करते हैं. इन्हें 8000—10000 रुपए मासिक वेतन मिलता है. 

आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा मज़दूर यूनियन के अनुसार, काम के दौरान मजदूरों को पानी व पेशाब के लिए मना किया जाता है, उनके साथ गाली—गलौज की जाती है और महिला मज़दूरों के साथ भी दुर्व्यवहार किया जाता है.

कम वेतन और काम की बुरी परिस्थितियों के चलते मज़दूरों ने फैसला किया कि वे अपनी यूनियन को पंजीकृत करेंगे और अपनी मांगों को मैनेजमेंट के सामने रखेंगे. 20 मार्च 2017 को उन्होंने यूनियन के पंजीकरण के लिए श्रम विभाग में अर्जी दी. 26 मार्च को मजदूरों ने अपना मांगपत्र कंपनी को दिया. पर न तो कंपनी मैनेजमेंट और न ही प्रशासन की तरफ से मजदूरों की कोई खबर ली गई या सुनवाई की गई. 

उल्टा 25 अप्रैल को कंपनी ने रोहतक सिविल कोर्ट में मुकदमा दाखिल कर दिया और यूनियन लीडरों और सदस्यों को फैक्ट्री गेट के अन्दर आने से रोकने और फैक्ट्री परिसर के 1000 मीटर तक कोई धरना या शामियाना लगाने से रोकने के निर्देश मांगे. 

26 अप्रैल को सिविल जज ने अंतरिम आदेश दिए की फैक्ट्री परिसर के अन्दर और फैक्ट्री गेट से 400 मीटर दूरी तक मजदूर धरने पर भी नहीं बैठ सकते. 3 मई को कंपनी ने मोर्चे की अगुवाई कर रहे 20 मज़दूरों को काम से निकाल दिया. बाकि मज़दूरों ने जब इसका विरोध किया तो कंपनी ने उन्हें एक "अंडरटेकिंग" थमा दी और यह शर्त रख दी कि इस पर हस्ताक्षर करके ही वे काम पर वापस आ सकते हैं. कंपनी के मनमाने बर्ताव के विरोध में मज़दूर 3 मई से कंपनी के गेट के बाहर बैठकर शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे हैं .

इस बीच 12 मई को मजदूरों की यूनियन पंजीकरण की अर्जी खारिज हो गई. यूनियन लीडरों का कहना है कि अर्जी को बेबुनियाद कारणों से खारिज किया गया है. जहां कारण बताया गया है कि यूनियन के चार सदस्य कानूनी परिभाषा में अनुसार “मजदूर” नहीं हैं, वहां लीडरों का कहना है की ये बात उनके वेतन रसीद से झूठ साबित होती है. जहाँ कारण बताया गया है कि यूनियन के कुल सदस्य कंपनी के कुल मजदूर संख्या के 10 प्रतिशत से भी कम है, वहां लीडरों का कहना है की कंपनी ने यह संख्या षड्यंत्र के तहत बढ़ाकर बताई है.
  
30 मई को चल रहे सिविल मुक़दमे में जज ने एक और निर्देश दिया की यूनियन के सदस्य फैक्ट्री परिसर में न तो घुसेंगे, न उसके 200 मीटर के दायरे में कोई धरना करेंगे, न नारे लगाएंगे, न घेराव करेंगे, न रास्ता रोकेंगे. कंपनी द्वारा दिए गए तथ्यों जैसे मजदूरों द्वारा फैक्ट्री संपत्ति को नुक्सान पहुँचाया गया और उत्पादन धीमा किया गया, की पड़ताल किये बिना और संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने के बुनियादी हकों को नकारते हुए फैसला कंपनी के पक्ष में सुना दिया गया. 

31 मई को सुबह से ही मज़दूर अपने परिजनों के साथ अपनी अनसुनी मांगों को उठाने हेतु फैक्ट्री के बाहर धरने पर बैठे थे. मैनेजमेंट की शिकायत पर हरियाणा पुलिस वहां एकत्रित हो गई, प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, उन्हें हिरासत में ले लिया और उन पर सांपला थाने में मुकदमा दर्ज़ कर दिया. एफ़.आई.आर. के अनुसार मज़दूरों पर आरोप है कि वे गैरकानूनी रूप से खतरनाक हथियार (यानी झंडे) लेकर एकत्रित हुए, रास्ता रोका, कंपनी के गेट को जाम कर दिया, कंपनी के स्टाफ को धमकी दी और चोट पहुंचाई. 425 लोगों को, जिनमें मजदूर, उनके परिजन और कुछ कार्यकर्ता भी शामिल थे, रोहतक के सुनारियन जेल में बंद कर दिया और मजिस्ट्रेट को अर्जी देने पर ही 6 जून तक सभी को बेल पर छोड़ा गया.

मज़दूरों के काम की परिस्थितियों से सम्बंधित मांगों को लेकर कंपनी प्रबंधन और श्रम विभाग की उदासीनता उनके रवैये से स्पष्ट है. मजदूरों के यूनियन बनाने के बुनियादी हक़ के संघर्ष को विफल बनाने में पुलिस और न्यायपालिका भी अपना पूरा योगदान दे रही है . एक तरफ मज़दूरों को संगठित होने से रोकने के लिए प्रबंधन ने 20 मज़दूरों को सीधा निष्कासित कर दिया और बाकियों से अंडरटेकिंग देने की शर्त रख दी। उनकी मांगों के बारे में कोई पहल न कर गेट पर बाउन्सरों को तैनात किया गया. सिविल कोर्ट में यूनियन के सदस्यों को बाहर निकालने के लिए मुकदमा कर दिया और फिर 31 मई को उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई. 

दूसरी तरफ प्रशासन, ख़ास तौर से श्रम विभाग की तरफ से मज़दूरों की मांगों के लिए प्रबंधन पर कोई दबाव नहीं बनाया गया है. प्रबंधन का मनोबल बढाते हुए पुलिस ने मजदूरों पर लाठीचार्ज किया, उन पर मुकदमा दर्ज किया और कई दिनों तक गिरफ्तार करके रखा. साथ ही सिविल कोर्ट ने मजदूरों को फैक्ट्री के आसपास प्रदर्शन करने से भी रोक दिया है.

हरियाणा में आईसीन, होण्डा, मारुती, ओमाक्स आदि कंपनियों के संघर्षों से स्पष्ट पता चलता है की आज भी मजदूरों के लिए संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए संगठित होने के मूलभूत अधिकार को हासिल करना कितना मुश्किल है. 

पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) ने संघर्षरत मज़दूरों के खिलाफ दर्ज मुक़दमे एवं गिरफ्तारी की निंदा करते हुए मांग है मजदूरों पर दर्ज झूठे मुकदमे वापस लिए जाएँ. मजदूरों की यूनियन को तुरंत पंजीकृत किया जाये। साथ ही श्रम विभाग मैनेजमेंट से मजदूरों की मांगें मनवाने के लिए उचित कार्यवाही करे.

Jul 14, 2016

क्या आप इस खबर को देश की खबर बनाएंगे


देश की सबसे बड़ी इलेक्ट्रानिक कंपनियों में शुमार 'एलजी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड' की नोएडा यूनिट में 11 तारीख से करीब 620 कर्मचारी हड़ताल पर हैं। कर्मचारियों ने हड़ताल प्रबंधन की मनमानी और तानाशाही के खिलाफ की है। 

लेकिन एक लाइन भी किसी मीडिया में कोई खबर नहीं है। हड़ताल में शामिल दर्जनों माएं, बहनें कई दिनों से अपने घर नहीं लौटी हैं, इनमें कई छोटे बच्चों की मांए भी हैं। एलजी कर्मचारी मनोज कुमार से मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने स्थानीय मीडिया को बुलाया भी पर किसी ने कोई एक पंक्ति की खबर नहीं लिखी। 

कर्मचारी और प्रबंधन के बीच टहराहट बहुत मामूली मांगों को लेकर है। कर्मचारियों की मांग है कि उनकी शिफ्ट 8 घंटे की जाए जो कि अभी 12 से 13 घंटे की है। साथ ही कर्मचारी चाहते हैं कि डीए, ट्रांसपोर्ट अलाउंस दिया जाए।

कर्मचारियों का कहना है कि इस मांग को पूरा करने के लिए कर्मचारियों ने एक यूनियन बनाने की कोशिश की। मगर एलजी प्रबंधन ने रजिस्ट्रार को पैसा खिलाकर उनकी यूनियन का रजिट्रेशन रद्द कर दिया।

प्रबंधन यूनियन का रजिस्ट्रेशन रद्द कराने के बाद जो 11 लोग यूनियन के अगुआ थे उनका ट्रांसफर नोएडा से हैदराबाद, जम्मू, मध्यप्रदेश आदि जगहों पर कर दिया। ऐसे में अब कर्मचारियों की पहली मांग है कि पहले उनके नेताओं का ट्रांसफर रद्द हो और फिर उनकी सभी मांगों पर प्रबंधन वार्ता करे और निकाले।

पर प्रबंधन इस पर कान देने को तैयार नहीं। उसे लगता है कि वह विज्ञापन देकर मीडिया को खरीद चुका है। मगर क्या हम आप तो नहीं बिके हैं, इसे आप अपनी खबर बनाईए और कर्मचारियों की आवाज बनिए, उनके आंदोलन का समर्थन कीजिए।