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Jun 23, 2017

गोरखालैण्ड की मांग को नेपाल में स​मर्थन

गोरखा भारतीय सेना में आए दिन शहीद होकर भारत की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। ऐसे में गोरखाओं के खिलाफ प्रायोजित कुप्रचार बंद होना चाहिए...
जनज्वार, दिल्ली। दार्जिलिंग में पृथक गोरखालैण्ड की मांग को लेकर गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के अनिश्चितकालीन बंद का आज 11वां दिन है। क्षेत्र में आम जनजीवन अस्त-व्यस्त है। सरकार ने इंटरनेट सेवाओं को स्थगित कर दिया है। दवा दुकानों को छोड़कर अन्य सभी प्रकार की दुकानें, होटल और रेस्त्रां भी बंद हैं। अब तक इस आंदोलन में मरने वालों की संख्या तीन पहुंच चुकी है।

गोरखालैण्ड आंदोलन की आंच अब नेपाल में भी महसूस होने लगी है। नेपाल के विभिन्न दलों और संगठनों ने गोरखा लोगों के आंदोलन को समर्थन की घोषणा की है। साथ ही भारत में प्रवासी नेपालियों के बीच काम करने वाले संगठनों भी गोरखाओं के आंदोलन पर अपना समर्थन जता रहे हैं।
प्रवासी नेपाली जन समाज भारत के अध्यक्ष आजाद सेन थापा ने एक विज्ञप्ति जारी कर राज्य सरकार द्वारा आंदोलनकारियों के दमक की निंदा की है। गोरखा जनता पर जबरन बंगाली भाषा थोपे जाने का विरोध करते हुए थापा ने कहा है कि दार्जिलिंग में रहने वाले नेपाली भाषी लोग भारतीय नागरिक हैं और अपनी भाषायी पहचान और संस्कृति की रक्षा के लिए अलग राष्ट्र की मांग कर रहे है जो संविधान सम्मत है।
प्रवासी नेपालियों के एक दूसरे संगठन नेपाली एकता समाज भारत ने भी गोरखालैण्ड आंदोलन के प्रति अपने समर्थन की घोषणा की है। एकता समाज के अध्यक्ष आनंद थापा ने कहा है कि भाषा का अधिकारा नैसर्गिक है और दूसरी राष्ट्रीयताओं पर बलपूर्वक बहुसंख्यक समुदाय की भाषा और संस्कृति को थोपना लोकतंत्र की मान्यताओं के विपरीत बात है। आनंद थापा ने माग की है कि पश्चिम बंगाल को तुरत भाषा संबंधी अपने फैसले को वापस लेकर आंदोलनरत पक्ष के साथ वार्ता करनी चाहिए।
साथ ही आनंद थापा ने गोरखा जनता को आतंकवादी या उपद्रवी कह कर बदनाम करने को भी निंदनीय बताया और कहा गोरखा जनता ने पिछले 200 सालों से अपनी जान देकर इस देश की सीमाओं की रक्षा की है। आज भी दर्जिंलिंग, धर्मशाला, असम और अन्य स्थानों में रहने वाले गोरखा भारतीय सेना में आए दिन शहीद होकर भारत की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। ऐसे में गोरखाओं के खिलाफ प्रायोजित कुप्रचार बंद होना चाहिए।
उधर नेपाल में मोहन वैद्य किरण के नेतृत्व वाली नेपाल की कम्युनिष्ट पार्टी (क्रान्तिकारी माओवादी) ने गोरखालैण्ड आंदोलन का समर्थन किया है। काठमाण्डू से जारी एक विज्ञप्ति ने पार्टी के अध्यक्ष मोहन वैद्य किरण ने गोरखा आंदोलनकारियों पर पुलिस दमन की घोर निंदा की है। पार्टी ने पश्चिम बंगाल सरकार और केन्द्र सरकार से नेपाली भाषी भारतीय जनता की मांगों को संबोधित करने की अपील की है। साथ ही पार्टी ने आंदोलन के दौरान मरने वालों को शहीद घोषणा करने की भी मांग राज्य सरकार से की है।
इस बीच पुलिस ने हत्या और आपराधिक षड्यंत्र के आरोप में गोरखा जन मुक्ति मोर्चा अध्यक्ष बिमल गुरूंग के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। मोर्चा के तीन समर्थकों की मौत को लेकर ये आरोप लगाये गये हैं। गोरखा मुक्ति मोर्चा ने दावा किया है कि मोर्चा समर्थक पुलिस गोलीबारी में ही मारे गये थे, लेकिन राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने इस बात से इंकार किया है।
दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अनिश्चितकालीन बंद के कारण वहां के मशहूर चाय उद्योग के साथ चाय बागान मालिकों को भारी नुकसान हो रहा है। बंद के कारण दो लाख से ज्यादा बागानकर्मियों की जीविका पर बुरा असर पड़ा है।

Jun 13, 2011

‘ऐन्टीक’ वस्तुओं के नाम पर हो रहा ठगी का कारोबार

मोबाईल व इंटरनेट के माध्यम से ठगी करने वाला नेटवर्क तो इतना शातिर है कि किसी व्यक्ति से मिले बिना केवल फोन या ई-मेल के माध्यम से ही उसे केवल अपनी बातों से या अपनी झूठी कथा-कहानी सुनाकर अपने बैंक खाते में पैसे तक जमा करवा लेता है...

निर्मल रानी

ठगों द्वारा आम लोगों की जेब से पैसे निकलवाने के तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। कभी कोई ठग ज़मीन में दबे सोने और चांदी के प्राचीन सिक्के या अशरफी सस्ते दामों में बेचे जाने के नाम पर किसी लालची व्यक्ति को ठग लेता है तो कभी नोट दुगने करने की लालच में कोई व्यक्ति ठगी का शिकार हो जाता है। कभी कोई ठग लोगों के घरों में जाकर सोने-चांदी के ज़ेवरों की सफाई के बहाने किसी का ज़ेवर उड़ा ले जाते हैं तो कभी कोई तांत्रिक के वेष में किसी के घर के भीतर ज़मीन में दबा हुआ धन निकालने के बहाने किसी परिवार को ठग ले है।


आमतौर पर ठग उनको ही अपना निशाना बनाते हैं जो या तो अधिक लालची होते हैं या फिर बहुत जल्दी धनवान बनना चाहते हैं या कम से कम समय में अधिक से अधिक धन कमाने की इच्छा पाले होते हैं। ऐसे ही लोग आजकल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मोबाईल फोन के माध्यम से चल रही ठगी का शिकार हो जाते हैं या फिर इंटरनेट व ई-मेल के माध्यम से ठगों द्वारा दी गई पुरस्कार तथा लाटरी का ईनाम निकलने जैसी झूठी सूचना के झांसे में आ जाते हैं।

मोबाईलऔर इंटरनेट के माध्यम से ठगी करने वाला नेटवर्क तो इतना शातिर है कि किसी व्यक्ति से मिले बिना केवल फोन या ई-मेल के माध्यम से ही उसे केवल अपनी बातों से या अपनी झूठी कहानी सुनाकर अपने बैंक खाते में पैसे तक जमा करवा लेता है!

हमारे देश में पिछले कई वर्षों से इसी प्रकार के ठगों का एक बहुत सक्रिय नेटवर्क विशेष रूप से हरियाणापंजाब,चंडीगढ़दिल्ली तथा राजस्थान के क्षेत्रों में काम कर रहा है। इससे जुड़े लोग कुछ गिनी-चुनी (ऐंटीक) वस्तुओं के नाम पर लोगों को ठगने का प्रयास करते हैं। प्राचीन वस्तुओं या एंटीक के नाम पर जिन वस्तुओं को खरीदने-बेचने के जाल में लोगों को फंसाया जाता है उनमें कई वस्तुएं तो ऐसी हैं जिनका जि़क्र या तो हमारे प्राचीन ग्रंथों या शास्त्रों में कहीं मिलता है या फिर उन वस्तुओं का कोई धार्मिक महत्व होता है।

वहीं ठगों द्वारा अपने शिकारको कुछ प्राचीन वस्तुएं ऐसी भी बताई जाती हैं जिनका जिक्र इतिहास में भी मिलता है। ठगों के यह नेटवर्क इन वस्तुओं को बहुमूल्य वस्तु बताकर इनकी कीमत करोड़ों में बताते हैं। तथाकथित ऐंटीक वस्तुओं के इस कारोबार में अधिकतर तो ऐसा सुना गया है कि ठगों द्वारा किसी शरीफ और भोले-भाले परंतु लालची व्यक्ति से किसी ऐंटीक वस्तु को दिखाए बिना ही पैसे ऐंठ लिए जाते हैं। यानी जिस प्राचीन वस्तु के नाम पर सौदे की बात की जाती है उसका कहीं दर्शन ही नहीं होते। सारी कहानी अगर और मगरमें उलझाकर शिकार व्यक्ति से पैसे ठग लिए जाते हैं।

आइएआपको कुछ ऐसी ही वस्तुओं से परिचित कराते हैं जिनके नाम पर आजकल ठग रोज़ नए मुर्गों की तलाश में फिर रहे हैं। भगवान कृष्ण का काल्पनिक चित्र तो सभी ने देखा है। यह भी भगवान श्री कृष्ण के उस चित्र में दिखाई देता है कि उनके मुकुट में एक मोरपंखी लगी हुई है। बस इसी मोरपंखी के नाम पर ठगों का एक बड़ा नेटवर्क इन दिनों लोगों से पैसे वसूल रहा है।

इस मोरपंखी नेटवर्क से जुड़े ठगों द्वारा यह बताया जा रहा है कि कृष्ण के मुकुट में जो पंख लगा था वही वास्तविक तथा एकमात्र पंख अमुक व्यक्ति के पास है। उसे देखने तथा उसका सौदा करने-कराने के नाम पर शुरुआती दौर में दस-बीस हज़ार या ठगी का शिकार होने वाले व्यक्ति की हैसियत के अनुसार इससे भी अधिक पैसे ऐंठ लिए जाते हैं।

इसके पश्चात उसे खरीदने वाले लोग भी, जो इसी नेटवर्क का हिस्सा हैं, बीच के व्यक्ति को करोड़ों में वही मोरपंखी खरीदने का आश्वासन दे देते हैं। अब बिचौलिए के रूप में सौदे में शरीक किए गए व्यक्ति को यह नज़र आने लगता है कि वह जल्दी ही दलाली के रूप में मोटी रकम कमाने वाला है। खरीददार पार्टी इस प्राचीन वस्तु को खरीदने के लिए कीमत तो करोड़ों में ज़रूर लगाती है लेकिन इसे खरीदने में जानबूझ कर आनाकानी करती है और केवल समय गुज़ारती है।

दूसरी तरफ इस तथाकथित प्राचीन वस्तु को बेचने वाला इसे जल्दी बेचने का दबाव डाल कर बिचौलिए बने व्यक्ति से बार-बार मनचाही रकम वसूलता रहता है। इस दौरान वह बिचौलिया बने व्यक्ति को यह भी धमकाता है कि यदि तुम्हारे ग्राहक ने इसे नहीं खरीदा तो हमारे पास और भी कई ग्राहक हैं जिनके हाथों हम इसे बेच देंगे। और तुम्हारे साथ चल रहा सौदा निरस्त हो जाएगा। इसी बहाने वह बिचौलिया बना कर फंसाए गए शिकार से यथासंभव रकम वसूल लेता है। और आखिरकार इसे खरीदने वाला अपनी ज़ुबान से मुकर जाता है। उधर बेचने वाला भी सौदे की समय सीमा पूरी हो जाने का बहाना बना कर अग्रिम भुगतान के रूप में आए पैसों को हज़म कर जाता है।

इसी मोरपंखी की महत्ता को बढ़ाने के लिए ठगों द्वारा स्वयंभू रूप से इसकी तमाम विशेषताएं भी निर्धारित की गई हैं। उदाहरण के तौर पर यह ठग बताते हैं कि इस मोरपंखी का प्रतिबिंब दर्पण में दिखाई नहीं देता। ठगों द्वारा इसकी दूसरी विशेषता यह बताई जाती है कि इस मोरपंखी की जड़ में द्रव्य पदार्थ भी भरा हुआ है जो भगवान कृष्ण के समय से अब तक उस मोरपंखी में कायम है। यह मोरपंखी बुलेटप्रूफ भी बताई जाती है,वग़ैरह-वग़ैरह।

इसी प्रकार की प्राचीन वस्तुओं के नाम पर ठगी करने वाले सौदागर गजमुक्ता नाम की किसी वस्तु का व्यापार करते हुए भी देखे जाते हैं। इसके विषय में भी इन ठगों द्वारा यह बताया जाता है कि गजमुक्ता हज़ारों हाथियों में से किसी एक हाथी के मस्तिष्क के भीतर से निकली हुई कोई विशेष सामग्री है। भगवान कृष्ण के मुकुट की कथित मोरपंखी की ही तरह गजमुक्ता नाम की वस्तु को भी विचित्रचमत्कारिक तथा धार्मिक सरोकारों से जुड़ी वस्तु बताकर तथा इसके नाम पर भी करोड़पति बनने का सपना दिखाकर लालची लोगों को ठगा जा रहा है।

ऐसे ही प्राचीन वस्तु (एंटीक) के नाम पर पिछले दिनों ठगी की एक घटना प्रकाश में आई। इतिहास में इस बात का जि़क्र है कि दारा शिकोह एक धर्मनिरपेक्ष विचारों का शासक था तथा हिंदू संस्कृति और धर्मग्रंथों से वह बहुत प्रभावित था। इतिहास के अनुसार दारा शिकोह ने महाभारत को फारसी लिपि में लिपिबद्ध कराया था। अब यह तो नहीं पता कि दारा शिकोह द्वारा तैयार कराई गई फारसी में लिपिबद्ध महाभारत वास्तव में इस समय किस स्थिति में, कहां और किसके कब्ज़े में है। लेकिन इतिहास में दर्ज इसी प्राचीन बहुमूल्य एवं ऐतिहासिक ग्रंथ के नाम पर ठगों का एक नेटवर्क आम लोगों को ठगता फिर रहा है।

इस तथाकथित प्राचीन ग्रंथ के खरीद-फरोख्त के झांसे में ज़्यादातर वही लोग आते हैं जो या तो इतिहास के उपरोक्त घटनाक्रम से परिचित हैं या साहित्यिक दिलचस्पी रखते हैं। साथ ही साथ उनके पास पैसा भी है व ऐसी प्राचीन पुस्तक को देखने व समझने का शौक़ भी। 

पिछले दिनों इत्तेफाक से मेरी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई, जिससे ठगों ने मात्र 25 हज़ार रुपये ठगने के बहाने उसे उस कथित प्राचीन ग्रंथ के दर्शन’ कराये। फारसी लिपि में हाथों से लिखा गया वह पूरा का पूरा ग्रंथ नि:संदेह किसी भी पढ़े-लिखे व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करने वाला था।

उसकी लिखाई, प्रत्येक पंक्ति के पीछे की विभिन्न रंगों की पृष्ठभूमि तथा उसमें स्वर्णयुक्त स्याही का किया गया प्रयोग निश्चित रूप से एक बार तो किसी भी पारखी व्यक्ति को भी यह सोचने के लिए मजबूर कर सकता है कि हो न हो यह वही महाभारत होगी जो दारा शिकोह ने फारसी में स्वयं लिखी है । लेकिन इस पुस्तक को भी ठगों ने मात्र दर्शनके लिए रखा हुआ है। दर्शनकरने में ही तमाम लोग अपनी आर्थिक गुंजाइश के अनुसार ठग लिए जाते हैं। इस पुस्तक के सौदे का भी अंत में वैसा ही हश्र होता है जैसाकि कथित मोरपंखी के सौदे में होता है। 

देश के पश्चिमी राज्यों में सक्रिय कथित ऐंटीक कारोबार के इस गिरोह से तमाम पढ़े-लिखे बुज़ुर्गज़मींदारराजनीतिज्ञ तथा समाज के तथाकथित प्रतिष्ठित लोग भी जुड़े हुए हैं। आम लोगों को एक बार सम्राट ठग नटवर लाल जी के उस महान एवं अकाट्य कथन को याद रखने की ज़रूरत है कि संसार में जब तक लालच जिन्दा है, तब तक ठग कभी भूखा नहीं मर सकता।लिहाज़ा आम लोग लालच से बचें तथा प्राचीन या एंटीक वस्तुओं के नाम पर फैले इस ठग नेटवर्क के झांसे में हरगिज़  न आएं।  


लेखिका उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ हैं और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी लिखती हैं.

Jun 11, 2011

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नया मंच

इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की नई परिभाषा गढ़ रहे ब्लॉग जगत में लोगों को अपार संभावनाएं दिखायी दे रही हैं। ब्लॉगरों के मुताबिक यदि पिछला ब्लॉग के उत्थान का रहा है तो अगले दस साल ब्लॉग में बदलाव के होंगे...


प्रेमा नेगी


विश्व में बोली जाने वाली अनेक भाषाओं में इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति की बात की जाये तो एक ही शब्द जेहन में आता है और वह है ब्लॉग। इस शब्द को 1999 में पीटर मरहेल्ज नाम के शख्स ने ईजाद किया था। सबसे पहले जोर्न बर्जर ने 17 दिसंबर 1997 में वेबलॉग शब्द का इस्तेमाल किया था। इसी को पीटर मरहेल्ज ने मजाक-मजाक में मई 1999 को अपने ब्लॉग पीटरमी डॉट कॉम की साइड बार में ‘वी ब्लॉग’ कर दिया। बाद में ‘वी’ को भी हटा दिया और 1999 में ‘ब्लॉग’ शब्द आया।

इस तरह देखें तो वर्ष 1999 में इस शुरूआत के 10 साल यानी एक दशक और अब बारह साल हो चुके हैं । आज की तारीख में अगर इंटरनेट की बात करें और ब्लॉगिंग का जिक्र न करें तो बात अधूरी सी लगती है। ब्लॉग का मतलब इंटरनेट पर डायरी की तरह व्यक्तिगत वेबसाइटें। हालांकि हिन्दी जगत में इसे ‘चिट्ठा’ नाम से जाना जाने लगा है।

आज का आधुनिक ब्लॉग ऑनलाइन डायरी का ही एक विकसित रूप है, जहां पर लोग अपने विचारों को अभिव्यक्त करते हैं। जस्टिन हॉल ने सन 1994 में स्वार्थमोर कॉलेज में अपने छात्र जीवन के दौरान व्यक्तिगत ब्लॉगिंग की शुरूआत की थी, उन्हें जेरी पोर्नेल्ले की ही तरह आरंभिक ब्लॉगर्स में से माना गया है। डेव वाइनर को भी आरंभिक और लंबे समय तक वेबलॉग चलाने वाला शख्स माना गया है।

वर्ष 1999 जिसे ब्लॉग के शुरु होने का साल माना जाता है, कई मायनों में ब्लॉग जगत के लिए महत्वपूर्ण है। इसी वर्ष सैन फ्रांसिस्को की पियारा लैब्स ने ‘वी ब्लॉग’ से आगे बढ़कर एक से अधिक लोगों को लिखने के लिए सुविधा देनी शुरू की। लोगों को एक सार्वजनिक मंच मिला। जब ‘ब्लॉग’ पर लिखने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी तो मार्च 1999 में ब्रैड फिजपेट्रिक ने ‘लाइव जर्नल’ की शुरुआत  की, जो ब्लॉग का उपयोग करने वालों को ‘होस्टिंग’ की सुविधा देती थी।

इस समयावधि के दौरान ब्लॉग ने लगभग पूरे विश्व के खास से लेकर आम आदमी तक को प्रभावित किया। वर्ष 2003 में जब ब्लॉग चार साल का हुआ तो दो बड़ी घटनाओं ने ब्लॉगिंग को व्यापक विस्तार देने का काम किया। इस बारे में ‘विस्फोट डॉट कॉम’ ने लिखा-‘वर्ष 2003 में ओपन सोर्स ब्लॉगिंग प्लेटफार्म वर्डप्रेस का जन्म हुआ और पियारा लैब्स के ब्लॉगर को गूगल ने खरीद लिया। पियारा लैब्स के ब्लॉगर को खरीदने के बाद ब्लॉगस्पॉट को गूगल ने अपनी सेवाओं का हिस्सा बना लिया। गूगल ने उन सभी भाषाओं को ब्लॉगिंग की सुविधा दी जिसमें वह खोज सेवाएं प्रदान करता है। वर्डप्रेस ने भी ब्लॉगस्पॉट को कड़ी टक्कर दी जो कि ब्लॉगिंग का सबसे बड़ा प्लेटफार्म बन गया।’ 

आज ब्लॉग से दुनियाभर के लोग लगातार बड़ी संख्या में जुड़ते जा रहे हैं। ‘टेक्नारॉटी’ ने वर्ष 2008 में अपने आंकड़े जारी किये जिसमें बताया गया कि पूरी दुनिया में ब्लॉगरों की संख्या 13.3 करोड़ तक पहुंच चुकी है। उसी आंकड़े के मुताबिक भारत में लगभग 32 लाख लोग ब्लॉगिंग करते हैं और इस संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है।

जहां तक हिन्दी ब्लॉग की बात है इसकी शुरूआत लगभग आठ-नौ साल पहले हुई थी। हिन्दी के ब्लॉग की शुरू करना कोई आसान काम नहीं था। शुरूआती दौर के हिन्दी ब्लॉगर  रवि रतलामी के मुताबिक ‘उन दिनों दो सवाल खूब पूछे जाते थे। पहला तो ये कि कम्प्यूटर पर हिन्दी नहीं दिखती, क्या करें? और दूसरा ये कि हिन्दी दिखती तो है मगर हिन्दी में लिखे कैंसे?’ मगर अब ये सवाल कोई मायने नहीं रखते। यूनीफोंट आने के बाद कोई भी हिन्दी जानने वाला हिन्दी ब्लॉग लिख सकता है।

मौजूदा समय में हिन्दी में भी ब्लॉगों की संख्या अच्छी-खासी है। इसका श्रेय वर्डप्रेस और जुमला नामक मुफ्त सॉफ्टवेयर को जाता है जिसके चलते बहुत सारे ब्लॉगरों ने अपनी-अपनी वेबसाइटें तैयार की हैं।

जहां तक ब्लॉगों में प्रकाशित  सामग्री की बात की जाये तो इसका दायरा बहुत बड़ा है। हल्के-फुल्के व्यंग्य से लेकर गंभीर साहित्यिक लेखन तो होता ही है साथ ही इसके माध्यम से कई सामाजिक आंदोलनों को गति देने का काम किया जाता है। यही नहीं कई लोग इसका इस्तेमाल धर्म और आस्था के लिए भी करते हैं। सिनेमा, खेल, समाज, राजनीति जैसे तमाम विषयों पर लोग खुलकर अपनी बात इसके माध्यम से रखते हैं। यही नहीं कई विषयों पर बहसें भी छिड़ती रहती हैं। बॉलीवुड अभिनेताओं के बीच छिड़े ब्लॉग युद्ध को इसकी बानगी के तौर पर देखा जा सकता है। ब्लॉग के जरिये अमिताभ बच्चन से लेकर आमिर खान समेत कई अन्य अभिनेता-अभिनेत्रियां अपने प्रशंसकों तक अपनी बात पहुंचाते हैं तो अपने प्रतिद्धंद्धी पर छींटाकशी  करने से भी नहीं चूकते।

चिट्ठाविश्व नाम से पहला हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर पुणे के सॉफ्टवेयर इंजीनियर देवाशीष चक्रवर्ती ने बनाया था। शुरूआत में हिन्दी के महज पांच-छह ब्लॉग थे, तब ब्लॉगर एक-दूसरों के ब्लॉगों पर जाकर ताजा सामग्री पढ़ लिया करते थे। मगर जब इनकी संख्या बढ़ती गयी तो चिट्ठाविश्व की सेवा नाकाफी साबित होने लगी, क्योंकि वह तकनीकी तौर पर लगातार बढ़ रहे ब्लॉगों के लिए तैयार नहीं थी। ऐसे में आपसी सहयोग से देश-विदेश में बसे ब्लॉगरों ने हिन्दी के नाम पर चंदा करके एक हजार डॉलर से भी ज्यादा की रकम जुटायी और इस धनराशी  से जो एग्रीगेटर बना वो नारद नाम से बेहद लोकप्रिय हो चुका है। वैसे अब चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी के साथ-साथ कई एग्रीगेटर सक्रिय हैं।

लगातार बढ़ रहे ब्लॉगों के चलते एग्रीगेटरों के संचालन का खर्च भी बढ़ा है। आज एग्रीगेटरों का व्यावसाय अच्छा-खासा बढ़ चुका है। चिट्ठाजगत की लगातार लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। आज ब्लॉगर अपने चिट्ठों को लोकप्रिय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। इसके लिए परंपरागत लेखन के अलावा इंक ब्लॉगिंग, ऑडियो ब्लॉगिंग और वीडियो ब्लॉगिंग को भी शामिल कर लिया गया है। व्यावसायिकता की दृष्टि से देखें तो जहां पहले सिर्फ अंग्रेजी के ब्लॉगर अच्छी-खासी कमाई कर रहे थे वहीं अब हिंदी चिट्ठा लेखन से भी पर्याप्त कमाई हो रही है। ब्लॉगरों की कमाई का मुख्य श्रोत विज्ञापन और प्रायोजित लेखन है। व्यावसायिकता एक अलग पहलू है, मगर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ब्लॉग सोशल नेटवर्किंग का एक ऐसा मंच है जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निश्चित रूप से मिली है।

इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की नई परिभाषा गढ़ रहे ब्लॉग जगत में लोगों को अपार संभावनाएं दिखायी दे रही हैं। ब्लॉगरों के मुताबिक यदि पिछला ब्लॉग के उत्थान का रहा है तो अगले दस साल ब्लॉग में बदलाव के होंगे।