Jun 14, 2011

सुलगती हुई ज़मीन


सरकार के सामने जब क्योतो प्रोटोकॉल के नियमों के कारण अड़चन पैदा हुई तो उसने जन सुनवाई का रास्ता अख्तियार किया, ताकि सहदेव विहार में जिंदल ग्रुप के कचरा बिजली उत्पादन केंद्र को लगवाने का रास्ता साफ हो सके...

अजय प्रकाश

जमीन अधिग्रहण के खिलाफ देश में व्यापक होते विरोध को देखते हुए अब सरकार संसद के अगले मानसून सत्र में सन् 1894 से चले आ रहे अंग्रेजों के जमाने के भूमि अधिग्रहण विधेयक को नया प्रारूप देने जा रही है। नये प्रारूप को लेकर सोनिया गांधी के अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) की ओर से कई सुझाव केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख को लगातार पहुंच रहे हैं, जिससे उन्हें लोक कल्याणकारी भूमि अधिग्रहण कानून बनाने में सहूलियत हो। इन सुझावों में जमीन मालिकों को नीलामी दर से छह गुना कीमत दिये जाने, ग्राम सभा को निर्णायक अधिकार देने और 75 फीसद प्रभावितों की सहमति के बाद ही अधिग्रहण की अनुमति जैसे मुद्दों को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भूमि अधिग्रहण मामलों में एनएसी कार्यसमूह के संयोजक हर्ष मंदर के शब्दों में कहें तो "सरकार ने अधिग्रहण में अगर उपर्युक्त तीनों प्रावधान शामिल कर लिये तो इस कानून में एक गुणात्मक परिवर्तन होगा।' सरकार और उसके सहयोगी अधिग्रहण कानून को किस रूप में लागू करेंगे, यह तो आने वाले सत्र में पता चलेगा, लेकिन पहले से मौजूद कानूनों में जनता की भागीदारी कितनी हो पा रही है, उसे देखने पर कुछ और ही कहानी सामने आती है।


 
ताजा मामला झारखंड के सिंहभूमि जिले का है, जहां 26 मई को जादूगोड़ा इलाके में भाटिन यूरेनियम माइंस के बीस साल पूरे होने पर एक्सटेंसन के लिए एक जन सुनवाई हुई। यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआइएल) के अधिकारियों ने क्षेत्र में माइक से प्रचार किया कि सुनवाई स्थानीय फुटबाल मैदान में होगी, लेकिन जन सुनवाई कॉरपोरशन कर्मचारियों के कॉलोनी में हुई।


सुनवाई के दौरान ग्रामीणों, मीडिया और जनांदोलनों से जुड़े लोगों ने जाने का प्रयास किया तो सुरक्षा बलों और निजी गार्डों ने उन्हें रोक दिया। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जन सुनवाई पूरी हो गयी। साथ ही 29 वर्ष और कंपनी के लीज को बढ़ाने का फैसला बगैर प्रभावितों की सहमति के ले लिया गया।

गौरतलब है कि यह एकतरफा फैसला एजेंसी क्षेत्र में लिया गया जो पहले से ही पेसा ऐक्ट के तहत आता है, जहां ग्राम सभा और लोगों की सहमति से ही अधिग्रहण या कंपनी चलाने का अंतिम निर्णय होता है। झारखंड आर्गेनाइजेशन अगेंस्ट यूरेनियम के संयोजक जगत मांडी कहते हैं, "यह बर्ताव तब किया गया जब इस क्षेत्र में नयी कंपनी नहीं बनानी थी बल्कि एक्सटेंशन लेना था। अधिग्रहण और विस्थापन तो पहले ही हो चुका था।'

यह अंधेरगर्दी सिर्फ आदिवासी इलाकों में ही नहीं है, बल्कि इसकी चपेट में दिल्ली जैसे शहर भी हैं। दिल्ली में कचरे से बिजली पैदा करने पर तुली सरकार के सामने जब क्योतो प्रोटोकॉल के नियमों के कारण अड़चन पैदा हुई तो उसने जनसुनवाई का रास्ता अख्तियार किया ताकि सहदेव विहार में जिंदल ग्रुप के कचरा बिजली उत्पादन केंद्र को लगवाने का रास्ता साफ हो सके।

टॉक्सिक वाच संस्था के गोपाल कृष्ण कहते हैं, "कचरा से बिजली पैदा करने के दिल्ली में हो चुके असफल प्रयोगों के बावजूद सरकार नहीं मानी तो उसने केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड को इस काम में लगाया, जिसने सिर्फ दो कर्मचारियों के हस्ताक्षर वाली जनसुनवाई करके संयंत्र लगाने की मंजूरी दे दी। सरकार की इस धूर्तता की जानकारी हमें सूचना अधिकार कानून की मदद से मिली।'

देश के दो हिस्सों के ये दो उदाहरण यह बताने के लिए काफी हैं कि पहले से बने कानूनों पर अमल की क्या स्थिति है। हालांकि एनएपीएम से जुड़े भूमि अधिग्रहण प्रतिरोध आंदोलन के संयोजक रूपेश वर्मा को अधिग्रहण कानून में हो रहे बदलावों में किसानों के लिए कुछ राहत दिखती है। उनके मुताबिक, "जो अधिकार अबतक जिलाधिकारी के हाथ में बंद थे, वे ग्रामसभा को मिलेंगे तो जमीनों की अबाध लूट की रफ्तार थमेगी।'

एनएपीएम से जुड़ी मेधा पाटकर भी अधिग्रहण कानून में होने जा रहे बदलावों को सकारात्मक रूप में देखती हैं। एनएसी की अरुणा राय के अनुसार, "सरकार अगर सार्वजनिक क्षेत्र के लिए जमीन लेगी तो व्यापक विचार विमर्श होगा और निजी अधिग्रहण के लिए 75 फीसद प्रभावितों की लिखित मंजूरी अनिवार्य होगी।'

सरकार अपनी जरूरतों के लिए किस तरह जमीन अधिग्रहण कर रही है, इसका एक उदाहरण न्यूक्लीयर पॉवर कॉरपोरशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनसीपीआइएल) की ओर से हरियाणा के फतेहाबाद जिले के कुम्हारिया न्यूक्लियर पॉवर प्रोजेक्ट के खातिर अधिगृहित की जा रही जमीन का मामला है। फतेहाबाद कलेक्ट्रट पर पिछले एक वर्ष से किसान संघर्ष समिति जमीन होने वाले कब्जे के विरोध में धरना दे रही है। अबतक धरना स्थल पर आने वाले दो किसानों की मौत भी हो चुकी है।

समिति के अध्यक्ष हंसराज सिवाच कहते हैं, "हम लोग हस्ताक्षर करके कितनी बार प्लांट के लिए जमीन नहीं देने की बात कह चुके हैं। जापान में आई सूनामी के बाद परमाणु संयंत्रों से रिसाव की घटना के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। फिर भी सरकार जिद पर कायम है।' हरियाणा की इस छवि के उलट फिक्की ने भूमि अधिग्रहण को लेकर हरियाणा को मॉडल के रूप में पेश किया है।

फिक्की के नवनियुक्त महासचिव ने भूमि अधिग्रहण के बारे में राय है कि "हम प्राकृतिक संसाधनों की ऑनलाइन नीलामी और अधिग्रहण के हरियाणा मॉडल अपनाने के पक्ष में हैं।' महासचिव के मुताबिक, हरियाणा में परियोजनाओं के लिए कंपनियां सीधे किसानों से 70 फीसद जमीन खरीदती हैं और सरकार मात्र 25 प्रतिशत जमीन पर कब्जा कर परियोजना के लिए कंपनी को हस्तांरित करती है। इसके अलावा हरियाणा के उन जिलों में जो एनसीआर जोन में आते हैं वहां 33 साल तक प्रति एकड़ 15 हजार रुपये के हिसाब से जमीन मालिक को देने और प्रभावित परिवारों को नौकरी देने का प्रावधान है।

इस बारे में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख का कहना है कि "नये अधिग्रहण कानून में निजी मालिकान और सरकार की जमीन मालिक से सीधी खरीद का औसत 70 20 का रखें या 80 20, का अभी इस पर सहमति बननी बाकी है।' फिक्की महासचिव के दावे के बरक्स किसानों के पक्ष को देखें तो दोनों मेल नहीं खाते। हरियाणा के अंबाला जिले में बन रहे "मॉडर्न इंडस्ट्रियल टाउनशिप' के लिए अधिग्रहीत की जा रही 280 एकड़ जमीन को लेकर मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा का दावा है कि इसकी मंजूरी एक लाख किसानों ने हस्ताक्षर के जरिये दी है, लेकिन किसान संघर्ष समिति बाखालसा ने इसे फर्जीवाड़ा करार दिया है।

अधिग्रहण को लेकर दूसरा विवाद सोनीपत राजीव गांधी एजुकेशन सिटी को लेकर है। 2006 में अधिग्रहीत की गयी इस इलाके की भूमि के बारे में सरपंच ओम सिंह कहते हैं, "सरकार को हमने पूरी जमीन देने का वायदा कभी नहीं किया था, इसलिए एक भी किसान ने अधिग्रहण के बदले आज तक मुआवजा नहीं लिया है।' जमीन अधिग्रहण के विशाल क्षेत्रों में खनन के वे क्षेत्र भी हैं जहां लोग लगातार अपने जल, जंगल और जमीन से उजड़ने को मजबूर हैं। उजड़ने का खौफ और पूंजीपतियों को सुविधा देने वाले अधिग्रहण कानूनों की वजह के किसान-आदिवासी विद्रोह कर रहे हैं और माओवादी प्रभाव क्षेत्रों को मजबूती दे रहे हैं। इसके बावजूद सरकार अधिग्रहण नीतियों को बदलने को तैयार नहीं दिखती है।

हाल ही में योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया ने खनन क्षेत्रों की रॉयल्टी बढ़ाये जाने के सवाल पर कहा है कि "खनन का धंधा बड़े निवेश और जोखिम का है। खनन कंपनियों के मुनाफे में स्थानीय लोगों की भागीदारी से विदेशी निवेशक बिदक जायेंगे और निवेश के भविष्य पर भी खतरा उत्पन्न हो जायेगा।' खनन के लिए विशेष जोन के रूप में ख्यात छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नया अतिक्रमण भारतीय सेना अपना ट्रेनिंग कैंप खोलकर करने जा रही है। एजेंसी एरिया का यह क्षेत्र, जो कि पेसा कानून के तहत आता है, अब तक हुए इस अधिग्रहण की जरूरतों से बेमेल है। सेना ट्रेनिंग स्कूल के लिए सरकार अबूझमाड़ में 4 हजार वर्ग मीटर जमीन का अधिग्रहण करने जा रही है हालांकि इसके लिये स्थानीय आदिवासियों से कोई सहमति नहीं ली गयी।

अबूझमाड़ क्षेत्र में सेना के कैंप बनाये जाने का कारण यह है कि माओवादी इलाका है, जहां सरकारी तंत्र काम नहीं करता। माओवादियों से निपटने के इस नये तरीके पर इस क्षेत्र के जानकार और पूर्व कमीश्नर बीडी शर्मा दो स्तरों पर चिंता जाहिर करते हैं। पहली बात यह कि "जो आदिवासी भाषा ही नहीं समझेंगे, उनके जमीन का अधिग्रहण सरकार कैसे करेगी? दूसरी बात यह कि अंडमान के उदाहरण को देखें तो अंग्रेजों के समय की अठारह जनजातियों में से वे ज्यादातर जनतातियां खत्म हो गयीं जो बाहरियों के संपर्क में आयीं।'

गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं, "अगर सेना अबूझमाड़ के क्षेत्र में अधिग्रहण कानूनों को ताक पर रखकर प्रशिक्षण केंद्र बनाने में सफल हो भी जाती है तो यह एक ऐसा आत्मघाती कदम होगा जिसमें सुरक्षा बलों और आदिवासियों की पीढ़ियां एक दूसरे का खून बहाती रहेंगी।'

मानसून सत्र में पेश होने जा रहे अधिग्रहण कानून के विचार से किसी को ऐतराज नहीं होगा क्योंकि अंग्रेजी शासन काल से चले आ रहे अधिग्रहण कानून में लोकतंत्र की मूल भावना के मुताबिक बदलाव जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि किसानों- आदिवासियों के प्रतिनिधियों के भागीदारी के बगैर जो प्रस्ताव तैयार हुआ है उससे कोई ऐसा जमीन अधिग्रहण कानून कैसे बना सकता है, जिसके के बाद इन तबकों में रोष न हो।



द पब्लिक एजेंडा से साभार.



थाने में नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार


जनज्वार : दस जून 2011 को लखीमपुर (खीरी) के थाना निघासन में चौदह वर्षीय नाबालिग लड़की सोनम के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा सामूहिक बलात्कार और उसके बाद उसकी हत्या की घटना को संज्ञान में लेते हुए मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) का पांच सदस्यीय जांच दल ने 11 जून 2011 को घटनास्थल का दौरा किया।

इस टीम में पीयूसीएल के उत्तर प्रदेश संगठन सचिव शाहनवाज आलम, राजीव यादव, मानवाधिकार कार्यकर्ता रवि शेखर, स्वतंत्र पत्रकार और जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी के संयोजक विजय प्रताप तथा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा के  प्राध्यापक शरद जायसवाल शामिल थे।

टीम ने जांच के दौरान पीड़ित पक्ष के परिजनों और आसपास के लोगों से मुलाकात कर घटना के बारे में जानकारी हासिल की। पुलिस अधिकारियों से मिलकर मामले के बारे में पूछताछ करने की कोशिश की गयी, लेकिन उनका रवैया असहयोगात्मक रहा।

मृतक सोनम की मां तरन्नुम ने बताया कि शुक्रवार को दिन में करीब ग्यारह बजे उनकी चौदह वर्षीय बेटी सोनम और पांच वर्षीय पुत्र अरमान भैस चराने गए थे। उनकी भैंस थाने के अंदर घुस गई, जिसको लेने सोनम थाने के अंदर गई। वहां पुलिस वाले उसे मेस के अंदर घसीटते हुए ले गए। उसके बाद सोनम के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसे थाने के पीछे भिलोर के पेड़ पर लटका दिया।

सोनम की मां ने जांच दल को बताया कि अरमान ने यह बात जब उसे बतायी तो वह दौड़ती हुई सोनम की लाश के पास पहुंची। वहां सोनम की लाश पेड़ से लटक रही थी। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे। उसके शरीर पर चोटों के कई निशान और जाँघों के बीच से बहता खून बलात्कार की पुष्टि कर रहे थे।

मृतक सोनम के शोक संतृप्त परिजन
 सोनम की हालत देखकर उसकी माँ चिल्लाने लगी, तो पुलिस वालों ने उसे गाली देते हुए कहा कि यहां क्यों शोर मचा रही हो, तुम्हारी लड़की ने आत्महत्या की है। लाश लेके यहां से भाग जाओ, नहीं तो तुमको बहुत मार मारेंगे। सोनम की मां तरन्नुम ने आगे बताया-‘मैं अपनी बेटी की लाश लेकर रोती-चिल्लाती अपने घर पहुंची, जहां काफी भीड़ इकट्ठा हो गई। इसी दौरान एसओ निघासन, एसडीएम तथा सादी वर्दी में सीओ साहब पहुंचे। मैंने और वहां मौजूद बाकी लोगों ने जब दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग की तो पुलिसवाले मुझे धमकाने लगे और कहने लगे कि तुम्हारी लड़की ने आत्महत्या की है, इसलिए कोई मुकदमा दर्ज नहीं होगा।’

पुलिसवाले घर पर ही लाश का पंचनामा भरने लगे, जिसका लोगों ने जमकर विरोध किया और पुलिस प्रशासन के विरुद्ध नारे लगाने लगे। लोगों का बढ़ता गुस्सा देखकर पुलिस वाले मुकदमा दर्ज करने के लिए तैयार हो गए। तरन्नुम के मुताबिक उसके घर पर जो पंचनामा भरा गया था, उसे पुलिस वालों ने फाड़ दिया। उसने अपने बेटे अरमान के बताए गए हुलिए के अनुसार दरोगा वीके सिंह, सिपाही एसके सिंह तथा फालोवर रामचंद्र के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज करने के लिए तहरीर दी, लेकिन पुलिस वालों ने उसकी तहरीर लेने से मना कर दिया। उससे कहा गया कि मुकदमा अज्ञात में दर्ज करवाना हो तो करवा लो, नहीं तो मामला यहीं खत्म कर देंगे। सोनम की मां के मुताबिक उसने दबाव में मजबूरन पुलिसवालों के कहे अनुसार लिखी तहरीर पर अंगूठा लगा दिया।

जांच दल ने जब सोनम के भाई पांच वर्षीय अरमान से बातचीत की तो उसने बताया, ‘मैं अपनी दीदी के साथ भैस चरा रहा था तो भैंस थाना परिसर में चली गई। हम लोग उसे लेने गए, तभी कुछ पुलिसवाले आए जिनमें से एक ने मेरे सिर पर बंदूक तानकर चुप रहने को कहा और दीदी को अंदर कमरे में घसीटते हुए ले गए। काफी देर बाद पुलिस वालों ने दीदी को पेड़ से लटका दिया और मुझे वहां से भगा दिया।’ वह वहां से भागकर घर आया और अपनी मां से सारी बात बतायी। 

सोनम के पिता इन्तजाम अली कहते हैं, ‘अरमान ने जिन पुलिस वालों के बारे में बताया उसके मुताबिक वे तीन लोग दरोगा वीके सिंह, सिपाही एसके सिंह और फालोवर रामचंद्र हैं।

जांच दल ने घटना के बारे में पूछताछ कर मामले के बारे में पुलिस का पक्ष तथा पोस्टमार्टम रिपोर्ट और प्रथम सूचना रिपोर्ट की नकल प्राप्त करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस वालों का व्यवहार असहयोगात्मक और अभद्रतापूर्ण रहा।

इस वीभत्स घटना के बारे में स्थानीय लोगों से भी बातचीत की गयी। सबसे चौंकाने वाली बात सोनम के साथ हुए बलात्कार और हत्या की घटना में पुलिस की संलिप्तता को स्पष्ट करती है कि पुलिस इस पूरे मामले को आत्महत्या के रुप में प्रचारित करने में जुटी हुई है। इसके लिए वह तथ्यों को छुपाने, तोड़ने-मरोड़ने में लगी हुई है। यहां तक कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी जारी नहीं किया गया है।

इस तथ्य की पुष्टि बारह जून 2012 के अमर उजाला की यह खबर भी करती है जिसमें लिखा है ‘देर शाम साढ़े सात बजे शव का अंतिम संस्कार निघासन कस्बे में कर दिया गया। इसके बाद भी पुलिस मुखिया ने पोस्टमार्टम न मिलने की बात कही है। वहीं सीएमएस डॉक्टर एचटी हुसैन ने अमर उजाला को बताया कि रिपोर्ट पोस्टमार्टम के कुछ देर बाद भेज दी गई थी। इसकी कापी एसपी कार्यालय को भेजी गई।' 
लखीमपुर पुलिस स्टेशन

वहीं दूसरी ओर दैनिक समाचार पत्र हिन्दुस्तान में बारह जून 2011को ‘पीएम रिपोर्ट से उलझी गुत्थी रेप की पुष्टि नहीं’ शीर्षक से छपी खबर में लिखा है कि ‘‘दिनभर हुए बवाल के बाद देर शाम जब डॉक्टरों ने पीएम रिपोर्ट पुलिस को सौंपी तो उस रिपोर्ट में बालिका के साथ रेप करने की कहीं पुष्टि नहीं हुई। पीएम रिपोर्ट आने के बाद अब ये मामला और उलझ गया है।’’

समाचार पत्रों के अवलोकन से यह भी पता चलता है कि सोनम की मां तरन्नुम की तहरीर पर अज्ञात लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज हुआ है। साथ ही पुलिस अधीक्षक लखीमपुर (खीरी) ने घटना के समय ड्यूटी पर तैनात ग्यारह पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है।

गौरतलब है कि  सोनम के पिता इन्तजाम अली फेरी लगाकर अपना और अपने परिजनों का भरण-पोषण करते हैं। इस दौरान वे निर्माणाधीन निघासन थाने में बतौर मजदूर काम करने लगे थे, जिसमें उन्हें रोजाना मजदूरी मिल जाती थी। इंतजाम अली का घर थाने से लगा हुआ था, इसलिए ठेकेदार ने उन्हें सामान की रात में रखवाली के लिए चौकीदार के रुप में भी काम दे रखा था। घटना वाले दिन इंतजाम अली घर पर नहीं थे, वे अपनी बड़ी बेटी रुक्सार की शादी के कार्ड बांटने अपने ससुराल गए थे।

जांच दल के निष्कर्ष

  • नाबालिग सोनम के साथ बलात्कार और हत्या पुलिसकर्मियों ने थाना परिसर निघासन में की।
  • बलात्कार और हत्या को छिपाने के लिए दोषी पुलिसकर्मियों ने आत्महत्या का केस बनाने के लिए शव को पेड़ से लटका दिया।
  • बलात्कार और हत्या की घटना को छिपाने और विधिक प्रक्रिया से बचने के लिए थाने के परिसर में पेड़ से लटके सोनम के शव को पुलिस कस्टडी में न लेकर दोषी पुलिसकर्मियों ने सोनम की मां को डरा-धमकाकर शव के साथ भगा दिया।
  • दोषी पुलिसकर्मियों को बचाने के लिए एसओ निघासन, एसडीएम निघासन और सीओ निघासन ने सोनम की मां को डराया-धमकाया तथा नामजद प्रथम सूचना रिपोर्ट न दर्ज कर अज्ञात लोगों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट कराने के लिए मजबूर किया।
  • दोषी पुलिसकर्मियों को बचाने के लिए पोस्टमार्टम का निष्कर्ष आने के बावजूद उसे जारी नहीं किया गया, जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट की सत्यता पर संदेह पैदा करता है।

जांच दल की संस्तुति

  • थाना परिसर में बलात्कार के बाद सोनम की हत्या की निष्पक्ष जांच किसी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या जनपद न्यायाधीश से करायी जाय।
  • सोनम के परिजनों को उचित मुआवजा तथा सुरक्षा राज्य सरकार से मुहैया कराय जाये।
  • सोनम के बलात्कार और हत्या में लिप्त दोषी पुलिसकर्मियों को तत्काल गिरफ्तार किया जाये।
  • राज्य सरकार को निर्देशित किया जाय कि मानवाधिकार आयोग तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डीके बसु केस में जारी किए गए निर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाना सुनिश्चित कराए। 


Jun 13, 2011

कैसे रुकेगा इन रजनियों का शोषण!


कुछ समय तक तो रजनी के करनाल निवासी ससुरालियों ने भरपूर मान-सम्मान दिया। पति भी उससे प्यार करता था। इस बीच रजनी के दो बच्चे हो गए। फिर अचानक न जाने क्यों रजनी से परिवार वालों का मन भर गया और ससुराली वाले आए दिन मारपीट करने लगे...


जगमोहन रौतेला

उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के सपने लगातार दरकते जा रहे हैं। राज्य से रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले लोगों की संख्या पहले के मुकाबले लगातार बढ़ती जा रही है। राज्य के पानी और जवानी का उपयोग राज्य हित में करने की रणनीति आज भी नहीं बन पायी है। इस सबके बीच एक दु:खद और शर्मनाक बात यह है कि महिला सशक्तीकरण के नारों के बीच यहां की बेटियां भी सुरक्षित नहीं हैं।

एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग दो हजार लड़कियां ऐसी हैं जिन्हें गृहस्थ जीवन की खुशहाल जिंदगी के नाम पर आज भी दूसरे राज्यों में बदहाल और जिल्लत भरी जिंदगी जीने को मजबूर किया जा रहा है। इनमें से अधिकतर लड़कियों को हरियाणा, मुजफ्फरनगर,  मेरठ और गाजियाबाद आदि स्थानों में ब्याह कर ले जाया जा रहा है।

कुछ को शादी के बहाने ले जाकर जिस्म के धंधे में धकेला जा रहा है, तो कुछ जो थोड़ी किस्मत वाली होती हैं किसी की रखैल बनकर रह जाती हैं। यह सिलसिला पिछले कई दशकों से जारी है। राज्य बनने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि महिला सशक्तीकरण के चलते यहां की स्थिति में सुधार होगा, मगर हालात जस के तस बने हुए हैं।

राज्य में ताजा मामला उत्तरकाशी जिले के नौगांव का सामने आया है। इस गांव की रजनी को लगभग चार साल पहले ब्याह कर करनाल (हरियाणा) ले जाया गया। कुछ समय तक तो रजनी के करनाल निवासी ससुरालियों ने भरपूर मान-सम्मान दिया। पति भी उससे प्यार करता था। इस बीच रजनी के दो बच्चे हो गए। फिर अचानक न जाने क्यों रजनी से परिवार वालों का मन भर गया और ससुराली वाले आए दिन मारपीट करने लगे। पांच अप्रैल 2011  का दिन रजनी के जीवन में तूफान लेकर आया, जब उसके ससुरालियों ने रात के अंधेरे में उसे मारपीट कर घर से बाहर निकाल दिया।

अपने सात माह के मासूम बच्चे के साथ रजनी ने काली अंधेरी रात खुले आसमान के नीचे बितायी। दो साल के बड़े लडक़े को ससुरालियों ने अपने ही पास रख लिया। अपने साथ हुए अन्याय की शिकायत रजनी ने करनाल के जिला लघु सचिवालय के अधिकारियों से की, जिन्होंने उसे जिला महिला संरक्षण अधिकारी सविता राणा के पास भेजा, जिन्होंने रजनी को सुरक्षा के लिहाज से एम.डी.डी. अनाथ आश्रम में भेज दिया और उसके ससुरालियों को सम्मन जारी किया।

करनाल के शिव कॉलोनी निवासी सत्यपाल सिंह ने अपने पुत्र पवन कुमार का विवाह चार साल पहले रजनी से किया था। ससुराल में कुछ दिन की इज्जत के बाद जब रजनी से मारपीट होने लगी तो एक दिन गुस्से में उसके ससुर सतपाल सिंह ने उसे एक ऐसी कड़वी सच्चाई से अवगत कराया, जिसे सुन कर रजनी के पैरों तले की जमीन खिसक गई।

रजनी के ससुर ने बताया कि उसे ब्याह कर नहीं, बल्कि बीस हजार रुपये में उसके मां-बाप से खरीद कर लाया गया था। रजनी को अपने ससुर की बातों पर यकीन नहीं हुआ। जब उसने अपने पति पवन कुमार से सच्चाई जाननी चाही तो अपने पिता की बात के विपरीत पवन ने कहा कि उसे ब्याह कर ही लाया गया है, लेकिन जिस तरह रजनी को अकारण घर से मारपीट कर निकाल दिया गया, उससे इस बात को बल मिलता है कि रजनी को खरीदकर ही ले जाया गया था।

यह एक कटु सत्य है कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नवजात लड़कियों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। इसका एक बड़ा और शर्मनाक कारण कन्या भ्रूण हत्या भी है। लड़कियों को जन्म देने से रोकने वाला यहां का समाज अपने परिवार के तथाकथित वंश को चलाने के लिए उत्तराखण्ड, पश्चिमी बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और बिहार से गरीब परिवारों की गरीब लड़कियों को कथित शादी करके ले जाता है। इन लड़कियों से शादी करने के एवज में वह लडक़ी के मां-बाप और बातचीत करवाने वाले परिवार के नजदीकी लोगों को पैसा भी देता है, ताकि भविष्य में कोई कानूनी अड़चन आने पर वह अपना मुंह बंद रखें।

अपना कथित वंश चलाने के लिए तथाकथित शादी करके लायी जाने वाली लड़कियों में से अधिकांश को लडक़े पैदा और उसके कुछ बड़ा होने पर रजनी की तरह ही ठोकर खाने को घर से बाहर कर दिया जाता है। ये लड़कियां आर्थिक तंगी और अपने मायके के रास्तों के बारे में अनजान होने से मायके भी नहीं लौट पाती हैं। कुछ मायके लौट भी गयी तो गरीब मां-बाप उसके कथित ससुरालियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं कर पाते।

लड़कियों को कथित ब्याह के लिए खरीदने में मदद करने वाले कई गिरोह भी सक्रिय हैं। ऐसे ही कुछ गिरोहों के लोगों को पिछले दिनों टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा और चम्पावत में पकड़ा भी जा चुका है, लेकिन रजनी जैसे शर्मनाक घटनाक्रम रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं।



पाक्षिक पत्रिका 'जनपक्ष आजकल' से साभार.  



‘ऐन्टीक’ वस्तुओं के नाम पर हो रहा ठगी का कारोबार

मोबाईल व इंटरनेट के माध्यम से ठगी करने वाला नेटवर्क तो इतना शातिर है कि किसी व्यक्ति से मिले बिना केवल फोन या ई-मेल के माध्यम से ही उसे केवल अपनी बातों से या अपनी झूठी कथा-कहानी सुनाकर अपने बैंक खाते में पैसे तक जमा करवा लेता है...

निर्मल रानी

ठगों द्वारा आम लोगों की जेब से पैसे निकलवाने के तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। कभी कोई ठग ज़मीन में दबे सोने और चांदी के प्राचीन सिक्के या अशरफी सस्ते दामों में बेचे जाने के नाम पर किसी लालची व्यक्ति को ठग लेता है तो कभी नोट दुगने करने की लालच में कोई व्यक्ति ठगी का शिकार हो जाता है। कभी कोई ठग लोगों के घरों में जाकर सोने-चांदी के ज़ेवरों की सफाई के बहाने किसी का ज़ेवर उड़ा ले जाते हैं तो कभी कोई तांत्रिक के वेष में किसी के घर के भीतर ज़मीन में दबा हुआ धन निकालने के बहाने किसी परिवार को ठग ले है।


आमतौर पर ठग उनको ही अपना निशाना बनाते हैं जो या तो अधिक लालची होते हैं या फिर बहुत जल्दी धनवान बनना चाहते हैं या कम से कम समय में अधिक से अधिक धन कमाने की इच्छा पाले होते हैं। ऐसे ही लोग आजकल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मोबाईल फोन के माध्यम से चल रही ठगी का शिकार हो जाते हैं या फिर इंटरनेट व ई-मेल के माध्यम से ठगों द्वारा दी गई पुरस्कार तथा लाटरी का ईनाम निकलने जैसी झूठी सूचना के झांसे में आ जाते हैं।

मोबाईलऔर इंटरनेट के माध्यम से ठगी करने वाला नेटवर्क तो इतना शातिर है कि किसी व्यक्ति से मिले बिना केवल फोन या ई-मेल के माध्यम से ही उसे केवल अपनी बातों से या अपनी झूठी कहानी सुनाकर अपने बैंक खाते में पैसे तक जमा करवा लेता है!

हमारे देश में पिछले कई वर्षों से इसी प्रकार के ठगों का एक बहुत सक्रिय नेटवर्क विशेष रूप से हरियाणापंजाब,चंडीगढ़दिल्ली तथा राजस्थान के क्षेत्रों में काम कर रहा है। इससे जुड़े लोग कुछ गिनी-चुनी (ऐंटीक) वस्तुओं के नाम पर लोगों को ठगने का प्रयास करते हैं। प्राचीन वस्तुओं या एंटीक के नाम पर जिन वस्तुओं को खरीदने-बेचने के जाल में लोगों को फंसाया जाता है उनमें कई वस्तुएं तो ऐसी हैं जिनका जि़क्र या तो हमारे प्राचीन ग्रंथों या शास्त्रों में कहीं मिलता है या फिर उन वस्तुओं का कोई धार्मिक महत्व होता है।

वहीं ठगों द्वारा अपने शिकारको कुछ प्राचीन वस्तुएं ऐसी भी बताई जाती हैं जिनका जिक्र इतिहास में भी मिलता है। ठगों के यह नेटवर्क इन वस्तुओं को बहुमूल्य वस्तु बताकर इनकी कीमत करोड़ों में बताते हैं। तथाकथित ऐंटीक वस्तुओं के इस कारोबार में अधिकतर तो ऐसा सुना गया है कि ठगों द्वारा किसी शरीफ और भोले-भाले परंतु लालची व्यक्ति से किसी ऐंटीक वस्तु को दिखाए बिना ही पैसे ऐंठ लिए जाते हैं। यानी जिस प्राचीन वस्तु के नाम पर सौदे की बात की जाती है उसका कहीं दर्शन ही नहीं होते। सारी कहानी अगर और मगरमें उलझाकर शिकार व्यक्ति से पैसे ठग लिए जाते हैं।

आइएआपको कुछ ऐसी ही वस्तुओं से परिचित कराते हैं जिनके नाम पर आजकल ठग रोज़ नए मुर्गों की तलाश में फिर रहे हैं। भगवान कृष्ण का काल्पनिक चित्र तो सभी ने देखा है। यह भी भगवान श्री कृष्ण के उस चित्र में दिखाई देता है कि उनके मुकुट में एक मोरपंखी लगी हुई है। बस इसी मोरपंखी के नाम पर ठगों का एक बड़ा नेटवर्क इन दिनों लोगों से पैसे वसूल रहा है।

इस मोरपंखी नेटवर्क से जुड़े ठगों द्वारा यह बताया जा रहा है कि कृष्ण के मुकुट में जो पंख लगा था वही वास्तविक तथा एकमात्र पंख अमुक व्यक्ति के पास है। उसे देखने तथा उसका सौदा करने-कराने के नाम पर शुरुआती दौर में दस-बीस हज़ार या ठगी का शिकार होने वाले व्यक्ति की हैसियत के अनुसार इससे भी अधिक पैसे ऐंठ लिए जाते हैं।

इसके पश्चात उसे खरीदने वाले लोग भी, जो इसी नेटवर्क का हिस्सा हैं, बीच के व्यक्ति को करोड़ों में वही मोरपंखी खरीदने का आश्वासन दे देते हैं। अब बिचौलिए के रूप में सौदे में शरीक किए गए व्यक्ति को यह नज़र आने लगता है कि वह जल्दी ही दलाली के रूप में मोटी रकम कमाने वाला है। खरीददार पार्टी इस प्राचीन वस्तु को खरीदने के लिए कीमत तो करोड़ों में ज़रूर लगाती है लेकिन इसे खरीदने में जानबूझ कर आनाकानी करती है और केवल समय गुज़ारती है।

दूसरी तरफ इस तथाकथित प्राचीन वस्तु को बेचने वाला इसे जल्दी बेचने का दबाव डाल कर बिचौलिए बने व्यक्ति से बार-बार मनचाही रकम वसूलता रहता है। इस दौरान वह बिचौलिया बने व्यक्ति को यह भी धमकाता है कि यदि तुम्हारे ग्राहक ने इसे नहीं खरीदा तो हमारे पास और भी कई ग्राहक हैं जिनके हाथों हम इसे बेच देंगे। और तुम्हारे साथ चल रहा सौदा निरस्त हो जाएगा। इसी बहाने वह बिचौलिया बना कर फंसाए गए शिकार से यथासंभव रकम वसूल लेता है। और आखिरकार इसे खरीदने वाला अपनी ज़ुबान से मुकर जाता है। उधर बेचने वाला भी सौदे की समय सीमा पूरी हो जाने का बहाना बना कर अग्रिम भुगतान के रूप में आए पैसों को हज़म कर जाता है।

इसी मोरपंखी की महत्ता को बढ़ाने के लिए ठगों द्वारा स्वयंभू रूप से इसकी तमाम विशेषताएं भी निर्धारित की गई हैं। उदाहरण के तौर पर यह ठग बताते हैं कि इस मोरपंखी का प्रतिबिंब दर्पण में दिखाई नहीं देता। ठगों द्वारा इसकी दूसरी विशेषता यह बताई जाती है कि इस मोरपंखी की जड़ में द्रव्य पदार्थ भी भरा हुआ है जो भगवान कृष्ण के समय से अब तक उस मोरपंखी में कायम है। यह मोरपंखी बुलेटप्रूफ भी बताई जाती है,वग़ैरह-वग़ैरह।

इसी प्रकार की प्राचीन वस्तुओं के नाम पर ठगी करने वाले सौदागर गजमुक्ता नाम की किसी वस्तु का व्यापार करते हुए भी देखे जाते हैं। इसके विषय में भी इन ठगों द्वारा यह बताया जाता है कि गजमुक्ता हज़ारों हाथियों में से किसी एक हाथी के मस्तिष्क के भीतर से निकली हुई कोई विशेष सामग्री है। भगवान कृष्ण के मुकुट की कथित मोरपंखी की ही तरह गजमुक्ता नाम की वस्तु को भी विचित्रचमत्कारिक तथा धार्मिक सरोकारों से जुड़ी वस्तु बताकर तथा इसके नाम पर भी करोड़पति बनने का सपना दिखाकर लालची लोगों को ठगा जा रहा है।

ऐसे ही प्राचीन वस्तु (एंटीक) के नाम पर पिछले दिनों ठगी की एक घटना प्रकाश में आई। इतिहास में इस बात का जि़क्र है कि दारा शिकोह एक धर्मनिरपेक्ष विचारों का शासक था तथा हिंदू संस्कृति और धर्मग्रंथों से वह बहुत प्रभावित था। इतिहास के अनुसार दारा शिकोह ने महाभारत को फारसी लिपि में लिपिबद्ध कराया था। अब यह तो नहीं पता कि दारा शिकोह द्वारा तैयार कराई गई फारसी में लिपिबद्ध महाभारत वास्तव में इस समय किस स्थिति में, कहां और किसके कब्ज़े में है। लेकिन इतिहास में दर्ज इसी प्राचीन बहुमूल्य एवं ऐतिहासिक ग्रंथ के नाम पर ठगों का एक नेटवर्क आम लोगों को ठगता फिर रहा है।

इस तथाकथित प्राचीन ग्रंथ के खरीद-फरोख्त के झांसे में ज़्यादातर वही लोग आते हैं जो या तो इतिहास के उपरोक्त घटनाक्रम से परिचित हैं या साहित्यिक दिलचस्पी रखते हैं। साथ ही साथ उनके पास पैसा भी है व ऐसी प्राचीन पुस्तक को देखने व समझने का शौक़ भी। 

पिछले दिनों इत्तेफाक से मेरी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई, जिससे ठगों ने मात्र 25 हज़ार रुपये ठगने के बहाने उसे उस कथित प्राचीन ग्रंथ के दर्शन’ कराये। फारसी लिपि में हाथों से लिखा गया वह पूरा का पूरा ग्रंथ नि:संदेह किसी भी पढ़े-लिखे व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करने वाला था।

उसकी लिखाई, प्रत्येक पंक्ति के पीछे की विभिन्न रंगों की पृष्ठभूमि तथा उसमें स्वर्णयुक्त स्याही का किया गया प्रयोग निश्चित रूप से एक बार तो किसी भी पारखी व्यक्ति को भी यह सोचने के लिए मजबूर कर सकता है कि हो न हो यह वही महाभारत होगी जो दारा शिकोह ने फारसी में स्वयं लिखी है । लेकिन इस पुस्तक को भी ठगों ने मात्र दर्शनके लिए रखा हुआ है। दर्शनकरने में ही तमाम लोग अपनी आर्थिक गुंजाइश के अनुसार ठग लिए जाते हैं। इस पुस्तक के सौदे का भी अंत में वैसा ही हश्र होता है जैसाकि कथित मोरपंखी के सौदे में होता है। 

देश के पश्चिमी राज्यों में सक्रिय कथित ऐंटीक कारोबार के इस गिरोह से तमाम पढ़े-लिखे बुज़ुर्गज़मींदारराजनीतिज्ञ तथा समाज के तथाकथित प्रतिष्ठित लोग भी जुड़े हुए हैं। आम लोगों को एक बार सम्राट ठग नटवर लाल जी के उस महान एवं अकाट्य कथन को याद रखने की ज़रूरत है कि संसार में जब तक लालच जिन्दा है, तब तक ठग कभी भूखा नहीं मर सकता।लिहाज़ा आम लोग लालच से बचें तथा प्राचीन या एंटीक वस्तुओं के नाम पर फैले इस ठग नेटवर्क के झांसे में हरगिज़  न आएं।  


लेखिका उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ हैं और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी लिखती हैं.

Jun 12, 2011

मीडिया और टीवी चैनलों की सच्चाइयों से रूबरू कराने वाली पुस्तक ढिबरी चैनल



जनज्वारमीडिया और टेलीविजन चैनलों की की अंदुरूनी सच्चाइयों को अधार बना कर लिखी गयी व्यंग्य रचनायें और कहानियां अब ‘ढिबरी चैनल’ के नाम से पुस्तक रूप में उपलब्ध होने वाली है। इस पुस्तक में प्रकाशित कई रचनायें इंटरनेट एवं समाचार पत्रों के माध्यम से लोगों के सामने आ चुकी है। इनमें से कई अत्यंत विवादास्पद एवं अत्यंत चर्चित हुयी। इंडियाईबुक्स ने इस पुस्तक का डिजिटल संस्करण प्रकाशित किया है जिसे इसकी वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है। शीघ्र ही इसका प्रिट संस्करण बाजार में उपलब्ध होने वाला है। इस पुस्तक में 22 रचनायें हैं जिनमें ज्यादातर मीडिया एवं टेलीविजन चैनलों पर आधारित है। 

इस पुस्तक के लेखक विनोद विप्लव ने इस बारे में बताते हैं, ‘आम तौर पर आम लोग मीडिया एवं टेलीविजन चैनलों की अंदुरूनी सच्चाइयों एवं उनमें काम करने वाले लोगों की समस्याओं से कम लोग वाकिफ होते हैं। टेलीविजन चैनलों में काम-काज के माहौल, भीषण प्रतिस्पर्धा, व्यवसाय और बाजार और टीआरपी के दवाब, चैनलों में काम करने वालों में अपनी नौकरी को लेकर असुरक्षा एवं अनिश्चितता की स्थिति, महिला कर्मियों के साथ रोज-ब-रोज होने वाले सलूक आदि ऐसे कई मुद्दे हैं जो आम दर्शकों की आंखों से ओझल रहते हैं या आम लोग इनके बारे में ज्यादा नहीं सोचते। यहां तक कि सरकार, राजनीतिक दल एवं सामाजिक संगठनों का भी ध्यान इस तरफ कम जाता है, जबकि ये ऐसे मुद्दे हैं जिनके कारण टेलीविजन चैनलों से प्रसारित होने वाली समाग्रियों की गुणवत्ता प्रभावित होती है और इसलिये इन मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।’

इस पुस्तक में जो रचनायें शामिल है उनमें कुछ प्रमुख है - भूत चैनल, ढिबरी चैनल का घोषणापत्रए ढिबरी चैनल में भर्ती अभियान, ढिबरी चैनल प्रमुख के लिये अर्जी, मीडिया मंदी कथायें,  सत्यवादी क्रांति, खबरिया पार्टी आदि। 

संवाद समिति यूनीवार्ता में वरिष्ठ संवाददाता के तौर पर काम कर रहे विनोद विप्लव ने कहा कि आज के समय में मीडिया खास तौर पर टेलीविजन चैनल सामाजिक विकास के अत्यंत सशक्त माध्यम बना है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ज्यादातर अखबार और टेलीविजन चैनल आमदनी, प्रसार संख्या और टीआरपी बढ़ाने की अंधी दौड़ में शामिल होकर अपनी भूमिका से भटक गये हैं और ढिबरी चैनल में शामिल रचनायें उसी भटकाव को उजागर करती है।

विनोद कहते हैं कि ढिबरी चैनल में शामिल कुछ व्यंग्य रचनायें एवं कहानियां इंटरनेट के जरिये लोगों के सामने आ चुकी हैं और इन्हें पढ़ने वालों से जो प्रतिक्रियायें मिलीं, वे अभूतपूर्व हैं। इन प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि चैनलों में काम करने वाले लोग बाजारवाद के किस भयानक दवाब में काम करते हैं और उनके मन में इसे लेकर किस तरह का आक्रोश है। यही नहीं खुद टेलीविजन चैनलों में काम करने वाले लोग इस स्थिति से काफी असंतुष्ट हैं और वे चाहते हैं कि स्थिति बदले और टेलीविजन चैनल मुनाफा कमाने का माध्यम बनने के बजाय समाजिक बदलाव का माध्यम बने।

Jun 11, 2011

उनका दुश्मन

मुकुल सरल


कोई दुश्मन न हो तो वह डर जाते हैं
क्योंकि तब
उन्हें देना होता है
दोस्तों से किए गए वादों का हिसाब

इसलिए वह
ढूंढ ही लेते हैं
कोई न कोई दुश्मन
वह चाहे कोई व्यक्ति हो
या महज़ तस्वीर

अभी-अभी टेलीविज़न पर
आई है ख़बर
उन्होंने ढूंढ लिया है
एक नया दुश्मन
जो छिपा बैठा है
किसी आईने में

इसलिए हुक्म हुआ है
सारे आईने तोड़ देने का

जिसके पास भी
बाक़ी होगा आईना
वह दुश्मन में गिना जाएगा
वह चाहे कोई कवि हो
या तुम्हारी आंखें

मुझे फ़िक्र है उस बच्चे की
जिसके पास बची हुई है वह हंसी
जिसमें मैं अक्सर
देखता हूं तुम्हारा चेहरा
एक उम्मीद की तरह...



कवि  और  पत्रकार मुकुल सरल जनसरोकारों के  प्रतिबद्ध रचनाकारों में हैं. उनसे mukulsaral@gmail.com   पर संपर्क किया जा सकता है.


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नया मंच

इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की नई परिभाषा गढ़ रहे ब्लॉग जगत में लोगों को अपार संभावनाएं दिखायी दे रही हैं। ब्लॉगरों के मुताबिक यदि पिछला ब्लॉग के उत्थान का रहा है तो अगले दस साल ब्लॉग में बदलाव के होंगे...


प्रेमा नेगी


विश्व में बोली जाने वाली अनेक भाषाओं में इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति की बात की जाये तो एक ही शब्द जेहन में आता है और वह है ब्लॉग। इस शब्द को 1999 में पीटर मरहेल्ज नाम के शख्स ने ईजाद किया था। सबसे पहले जोर्न बर्जर ने 17 दिसंबर 1997 में वेबलॉग शब्द का इस्तेमाल किया था। इसी को पीटर मरहेल्ज ने मजाक-मजाक में मई 1999 को अपने ब्लॉग पीटरमी डॉट कॉम की साइड बार में ‘वी ब्लॉग’ कर दिया। बाद में ‘वी’ को भी हटा दिया और 1999 में ‘ब्लॉग’ शब्द आया।

इस तरह देखें तो वर्ष 1999 में इस शुरूआत के 10 साल यानी एक दशक और अब बारह साल हो चुके हैं । आज की तारीख में अगर इंटरनेट की बात करें और ब्लॉगिंग का जिक्र न करें तो बात अधूरी सी लगती है। ब्लॉग का मतलब इंटरनेट पर डायरी की तरह व्यक्तिगत वेबसाइटें। हालांकि हिन्दी जगत में इसे ‘चिट्ठा’ नाम से जाना जाने लगा है।

आज का आधुनिक ब्लॉग ऑनलाइन डायरी का ही एक विकसित रूप है, जहां पर लोग अपने विचारों को अभिव्यक्त करते हैं। जस्टिन हॉल ने सन 1994 में स्वार्थमोर कॉलेज में अपने छात्र जीवन के दौरान व्यक्तिगत ब्लॉगिंग की शुरूआत की थी, उन्हें जेरी पोर्नेल्ले की ही तरह आरंभिक ब्लॉगर्स में से माना गया है। डेव वाइनर को भी आरंभिक और लंबे समय तक वेबलॉग चलाने वाला शख्स माना गया है।

वर्ष 1999 जिसे ब्लॉग के शुरु होने का साल माना जाता है, कई मायनों में ब्लॉग जगत के लिए महत्वपूर्ण है। इसी वर्ष सैन फ्रांसिस्को की पियारा लैब्स ने ‘वी ब्लॉग’ से आगे बढ़कर एक से अधिक लोगों को लिखने के लिए सुविधा देनी शुरू की। लोगों को एक सार्वजनिक मंच मिला। जब ‘ब्लॉग’ पर लिखने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी तो मार्च 1999 में ब्रैड फिजपेट्रिक ने ‘लाइव जर्नल’ की शुरुआत  की, जो ब्लॉग का उपयोग करने वालों को ‘होस्टिंग’ की सुविधा देती थी।

इस समयावधि के दौरान ब्लॉग ने लगभग पूरे विश्व के खास से लेकर आम आदमी तक को प्रभावित किया। वर्ष 2003 में जब ब्लॉग चार साल का हुआ तो दो बड़ी घटनाओं ने ब्लॉगिंग को व्यापक विस्तार देने का काम किया। इस बारे में ‘विस्फोट डॉट कॉम’ ने लिखा-‘वर्ष 2003 में ओपन सोर्स ब्लॉगिंग प्लेटफार्म वर्डप्रेस का जन्म हुआ और पियारा लैब्स के ब्लॉगर को गूगल ने खरीद लिया। पियारा लैब्स के ब्लॉगर को खरीदने के बाद ब्लॉगस्पॉट को गूगल ने अपनी सेवाओं का हिस्सा बना लिया। गूगल ने उन सभी भाषाओं को ब्लॉगिंग की सुविधा दी जिसमें वह खोज सेवाएं प्रदान करता है। वर्डप्रेस ने भी ब्लॉगस्पॉट को कड़ी टक्कर दी जो कि ब्लॉगिंग का सबसे बड़ा प्लेटफार्म बन गया।’ 

आज ब्लॉग से दुनियाभर के लोग लगातार बड़ी संख्या में जुड़ते जा रहे हैं। ‘टेक्नारॉटी’ ने वर्ष 2008 में अपने आंकड़े जारी किये जिसमें बताया गया कि पूरी दुनिया में ब्लॉगरों की संख्या 13.3 करोड़ तक पहुंच चुकी है। उसी आंकड़े के मुताबिक भारत में लगभग 32 लाख लोग ब्लॉगिंग करते हैं और इस संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है।

जहां तक हिन्दी ब्लॉग की बात है इसकी शुरूआत लगभग आठ-नौ साल पहले हुई थी। हिन्दी के ब्लॉग की शुरू करना कोई आसान काम नहीं था। शुरूआती दौर के हिन्दी ब्लॉगर  रवि रतलामी के मुताबिक ‘उन दिनों दो सवाल खूब पूछे जाते थे। पहला तो ये कि कम्प्यूटर पर हिन्दी नहीं दिखती, क्या करें? और दूसरा ये कि हिन्दी दिखती तो है मगर हिन्दी में लिखे कैंसे?’ मगर अब ये सवाल कोई मायने नहीं रखते। यूनीफोंट आने के बाद कोई भी हिन्दी जानने वाला हिन्दी ब्लॉग लिख सकता है।

मौजूदा समय में हिन्दी में भी ब्लॉगों की संख्या अच्छी-खासी है। इसका श्रेय वर्डप्रेस और जुमला नामक मुफ्त सॉफ्टवेयर को जाता है जिसके चलते बहुत सारे ब्लॉगरों ने अपनी-अपनी वेबसाइटें तैयार की हैं।

जहां तक ब्लॉगों में प्रकाशित  सामग्री की बात की जाये तो इसका दायरा बहुत बड़ा है। हल्के-फुल्के व्यंग्य से लेकर गंभीर साहित्यिक लेखन तो होता ही है साथ ही इसके माध्यम से कई सामाजिक आंदोलनों को गति देने का काम किया जाता है। यही नहीं कई लोग इसका इस्तेमाल धर्म और आस्था के लिए भी करते हैं। सिनेमा, खेल, समाज, राजनीति जैसे तमाम विषयों पर लोग खुलकर अपनी बात इसके माध्यम से रखते हैं। यही नहीं कई विषयों पर बहसें भी छिड़ती रहती हैं। बॉलीवुड अभिनेताओं के बीच छिड़े ब्लॉग युद्ध को इसकी बानगी के तौर पर देखा जा सकता है। ब्लॉग के जरिये अमिताभ बच्चन से लेकर आमिर खान समेत कई अन्य अभिनेता-अभिनेत्रियां अपने प्रशंसकों तक अपनी बात पहुंचाते हैं तो अपने प्रतिद्धंद्धी पर छींटाकशी  करने से भी नहीं चूकते।

चिट्ठाविश्व नाम से पहला हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर पुणे के सॉफ्टवेयर इंजीनियर देवाशीष चक्रवर्ती ने बनाया था। शुरूआत में हिन्दी के महज पांच-छह ब्लॉग थे, तब ब्लॉगर एक-दूसरों के ब्लॉगों पर जाकर ताजा सामग्री पढ़ लिया करते थे। मगर जब इनकी संख्या बढ़ती गयी तो चिट्ठाविश्व की सेवा नाकाफी साबित होने लगी, क्योंकि वह तकनीकी तौर पर लगातार बढ़ रहे ब्लॉगों के लिए तैयार नहीं थी। ऐसे में आपसी सहयोग से देश-विदेश में बसे ब्लॉगरों ने हिन्दी के नाम पर चंदा करके एक हजार डॉलर से भी ज्यादा की रकम जुटायी और इस धनराशी  से जो एग्रीगेटर बना वो नारद नाम से बेहद लोकप्रिय हो चुका है। वैसे अब चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी के साथ-साथ कई एग्रीगेटर सक्रिय हैं।

लगातार बढ़ रहे ब्लॉगों के चलते एग्रीगेटरों के संचालन का खर्च भी बढ़ा है। आज एग्रीगेटरों का व्यावसाय अच्छा-खासा बढ़ चुका है। चिट्ठाजगत की लगातार लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। आज ब्लॉगर अपने चिट्ठों को लोकप्रिय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। इसके लिए परंपरागत लेखन के अलावा इंक ब्लॉगिंग, ऑडियो ब्लॉगिंग और वीडियो ब्लॉगिंग को भी शामिल कर लिया गया है। व्यावसायिकता की दृष्टि से देखें तो जहां पहले सिर्फ अंग्रेजी के ब्लॉगर अच्छी-खासी कमाई कर रहे थे वहीं अब हिंदी चिट्ठा लेखन से भी पर्याप्त कमाई हो रही है। ब्लॉगरों की कमाई का मुख्य श्रोत विज्ञापन और प्रायोजित लेखन है। व्यावसायिकता एक अलग पहलू है, मगर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ब्लॉग सोशल नेटवर्किंग का एक ऐसा मंच है जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निश्चित रूप से मिली है।

इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की नई परिभाषा गढ़ रहे ब्लॉग जगत में लोगों को अपार संभावनाएं दिखायी दे रही हैं। ब्लॉगरों के मुताबिक यदि पिछला ब्लॉग के उत्थान का रहा है तो अगले दस साल ब्लॉग में बदलाव के होंगे।




खनन से बेजार बुंदेलखण्ड का पानी


पिछले कुछ सालों से विंध्य बुंदेलखण्ड के बांदा, चित्रकूट, महोबा, झांसी, ललितपुर में चल रहे अधाधुंध खनन ने यहां के पानी, पहाड़, जंगल, वन्यजीवों के प्रवास,खेती, मजदूरों व रहवासियों की सेहत और पर्यावरण को गहरे अंतरमुखी अकाल की ओर धकेल दिया है...

आशीष सागर

बुन्देलखण्ड का पठार प्रीकेम्बियन युग से ताल्लुकात रखता है। पत्थर ज्वालामुखी पर्तदार और रवेदार चट्टानों से निर्मित हैं, इसमें नीस और ग्रेनाइट की अधिकता पाई जाती है. इस पठार की समुद्र तल से ऊँचाई 150मी0 उत्तर और दक्षिण में 400मी0 तक फैली है. इस क्षेत्र को भोगौलिक दृष्टि से 23 सेन्टीग्रेट, 10 अक्षांश उत्तर और 78 सेंटीग्रेट, चार अक्षांश, 81सेन्टीग्रेट से 34 अक्षांश पश्चिम दिशा की ओर रखा जा सकता है। इसका ढाल  दक्षिण से  और उत्तर पूर्व की ओर है। बुंदेलखण्ड की सीमा मे विंध्य उत्तर प्रदेश के 7 व मध्य प्रदेश की सीमा से लगे 6 जनपदों को आमतौर पर स्वीकृत दी गयी है, लेकिन राजनीतिक द्वन्द में फंसे बुंदेलखण्ड राज्य की मांग इसके 21 से 23 जिले को लेकर आंदोलन की मुहिम समयानुकूल छेड़ती रहती है। 

मध्य प्रदेश का टीकमगढ़, छतरपुर, दतिया, ग्वालियर, शिवपुरी, दमोह, पन्ना और सागर तक विस्तृत है। विंध्य बुंदेलखण्ड के हिस्से में झांसी, ललितपुर, महोबा, चित्रकूट, बांदा प्रमुखता से समाहित है। छतरपुर में खनन के अन्तगर्त पाये जाने पत्थर को लाल फार्च्यून के नाम से जाना जाता है वहीं उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड के क्षेत्र में ग्रेनाइट को झांसी रेड़ कहा गया है। सिद्धबाबा पहाड़ी 1722 मीटर इस क्षेत्र की सबसे ऊंची पर्वत चोटी है। इन दोनो प्रदेशों की सीमा से लगे बुंदेलखण्ड ग्रेनाइट, ब्लैक स्टोन सामग्री का उपयोग पूरे देश में 80प्रतिशत सजावटी समान,भवन निर्माण आदि के लिये किया जाता है। ललितपुर जनपद में पाये जाने वाले ग्रेनाइट को लौह अयस्क, राक फास्फेट के नाम से जाना जाता है।

जल दोहन और विनाश की इबारत है अवैध खनन- पिछली सर्दियों की बात है आम दिनों की तरह उस दिन भी शाम 4 .30 बजे महोबा जनपद के कस्बा कबरई, जवाहर नगर निवासी 8 वर्षीय उत्तम प्रजापति घर के आंगन में खेल रहा था, जब अवैध ब्लास्टिंग से हवा में उड़कर पांच किलो का पत्थर उत्तम प्रजापति के ऊपर गिरा। मौके पर ही उत्तम की मौत हो गई।

मृतक के पिता के साथ गांव के हजारों लोग जब लाश को लेकर स्थानीय पुलिस चौकी पहुंचे तो थाना इंचार्ज ने एकबारगी तो एफआईआर लिखने से मना ही कर दिया, लेकिन जन दबाव को बढ़ता देख उसे स्थिति का अनुमान हो गया, तो खदान मालिक छोटे राजा के ऊपर आई0पी0सी0की धारा 307, 304 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया। एफआईआर की भनक जैसे ही पहाड़ मालिक को लगी, उसने अपनी बिरादरी के लोगों के साथ मृतक के पिता के घर पर एक सप्ताह तक लगातार फायरिंग करवाई जिसके चलते पूरा परिवार गांव से पलायन कर गया। मृतक के पिता के ऊपर मुकदमा वापस लेने की धमकियां और लाश की कीमत बताये जाने का दबाव लगातार बनाया जाता रहा। गरीबी और फांकाकसी के बीच जीवन-यापन कर रहे उत्तम के परिवार ने डेढ़ लाख रूपये में बेटे की लाश का सौदा कर लिया।

दरअसल, यह एकमात्र घटना नहीं है जिससे बुंदेलखण्ड में खनन के नाम पर हो रहे प्राकृतिक तांडव को समझा जा सके, बल्कि इस जनपद की तकरीबन 90 हजार आबादी को इन्ही उड़ते गिरते पत्थरों और 24 घण्टे दम घोंटते स्टोन क्रशरों की उड़ती धूल के बीच रहना पड़ता है। कबरई इलाके की पचपहरा (सिद्ध बाबा) खदान, गंगा मैया खदान इस क्षेत्र की सर्वाधिक जल दोहन करने वाली अवैध खदानें हैं।

इसकी एक बानगी बीते नवंबर 2010में देखने को मिली। जब सर्वे टीम के साथ स्वैच्छिक संगठन प्रवास के कार्यकर्ता मृतक उत्तम के घर से बैठक करने के बाद पचपहरा खदान की तरफ पहुंचे। 200 मीटर ऊंची सिद्ध बाबा पहाड़ी को लगभग 300फिट नीचे तक दबंग माफियाओं ने ग्रेनाइट खनन के नाम पर जमींदोज कर रखा था। वहीं गंगा मैया पहाड़ में खदान के नीचे पंपिग सेट,जनरेटर से मोटर के द्वारा सैकड़ों लीटर पानी बाहर फेंका जा रहा था।

पाताल की सीमा तक खोदी जा चुकी खदानें बुंदेलखण्ड में दिन प्रतिदिन गहराते जा रहे जल संकट का एक बहुत बड़ा कारण है। विंध्याचल पर्वत श्रेणी केन पहाड़ों पर हो रहे खनन के चलते यहां के हालात इतने खराब हो चुके हैं कि लौंड़ा, रमकुंडा, पचपहरा, डहर्रा, मोचीपुरा, गौहारी जैसे दर्जनों पहाड़ तो पहले ही खत्म हो चुके हैं, अब बांदा, चित्रकूट क्षेत्र के पर्यटन स्थल वाले बेशकीमती पहाड़ों को भी तीन-तीन सौ फिट गहरी खाईयों में तब्दील किया जा रहा है।

पहाड़ के खत्म होने का मतलब है भू-जल स्तर में गिरावट। अब जबकि लगातार खनन से यहां पहाडि़यों को निशाना बनाया जा रहा उसके देखते हुए बड़ी आसानी से कहा जा सकता है कि बुंदेलखण्ड पानी की कमी की अंतहीन समस्या की तरफ तेजी से कदम बढ़ा चुका है। जनसूचना अधिकार 2005 के तहत भू-गर्भ जल विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बुंदेलखण्ड में तीन मीटर तक जलस्तर नीचे जा चुका है। इसके बाद भी उत्तर प्रदेश की चालीस जनपदीय क्रिटिकल, सेमी क्रिटिकल, सुरक्षित क्षेत्र के अन्तर्गत प्रदेश शासन के द्वारा जारी की गयी सूची में बुंदेलखण्ड क्षेत्र के किसी भी जनपद को स्थान नहीं दिया गया।

प्रदूषण और पर्यावरण संकट- कबरई इलाके के चारों ओर पांच-दस किलोमीटर के क्षेत्र में तेरह गांव बसे हुए हैं। इस तहसील को भी मिला दें तो इनकी कुल आबादी 90 हजार से ज्यादा है इनमें भी करीब 25 हजार खनन मजदूर, दस हजार बाल श्रमिक, चार सैकड़ा बंधुआ मजदूर हैं। उत्तर प्रदेश के इस सबसे पिछड़े और गरीब इलाके में जब खनन उद्योग की शुरूआत हुयी थी तब खेती किसानी जो यहां कभी ज्यादा फायदे का सौदा नहीं रही- उससे ऊबे लोगों में उम्मीद जगी थी कि अब उनके पास आमदनी का एक और जरिया होगा लेकिन वक्त बीतने के साथ साथ यहां खनन का कारोबार मंत्री, विधायकों और प्रशासिनक अधिकारियों के ताकतवर हाथों में आ गया। 


फिलहाल उत्तर प्रदेश सरकार के वर्तमान कैबिनेट मंत्री बादशाह सिंह, पूर्व मंत्री सिद्धगोपाल साहू, शिवनाथ सिंह कुशवाहा, विधायक अशोक सिंह चन्देल, दबंग अरिमर्दन सिंह, पूर्व विधायक कुंवर बहादुर मिश्रा, जयवन्त सिंह, सीरजध्वज सिंह, प्रदेश खनिज मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा जैसे आला माफिया खनन की पैमाइश में दर्ज हैं। इनका शुरू से ही एक ही मक्सद रहा कि किसी भी कीमत पर जल्दी से मोटा मुनाफा कमाना, चूंकि कारोबार की कमान ताकतवर लोगों के हाथ में थी इसलिये सारे नियमों को ताक पर रखकर इलाके में तेजी से पहाड़ों के पट्टे बंटने लगे और क्रशरों की तादाद बढ़ने लगी। इसी के चलते तेजी से पर्यावरण कानून भी धराशायी होती चले गये।


अब तक यहां के लोगों को समझ में आ गया था कि जिस खनन उद्योग से वे अतिरिक्त आमदानी का सपना देख रहे थे वे ही उनके जीवन यापन के बुनियादी संसाधन का सबसे बड़ा खतरा हैं। इस दौरान जब कभी स्थिति बिगड़ी और विरोध की आवाजें उठीं तो दबंगों के द्वारा उन्हें बुलट और बैलेट के नाम पर ठगा गया और उनको जमीन के सबसे अंतिम पायेदान पर खड़े होने का एहसास भी कराया गया। पर्यावरण प्रदूषण से लोगों के स्वास्थ्य और कृषि भूमि पर पड़ते विपरीत प्रभाव के विरोध में कई मरतबा धरने प्रदर्शन भी आयोजित हुए।


वर्ष 2000 में ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के बांदा मण्डल अध्यक्ष दिनेश खरे ने तत्कालीन बांदा मण्डल आयुक्त एस0सी0सक्सेना से शिकायत कर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सभी क्रशरों का निरीक्षण करवाया। निरीक्षण के बाद कुल 57 क्रशर में से 11 को कानूनों के उल्लंघन व मानक के विपरीत काम करने के कारण बंद करने के निर्देश दे दिये गये। महोबा के जिलाधिकारी आलोक कुमार ने जब कबरई के आबोहवा में प्रदूषण की मात्रा की जांच करायी तो जांच के निष्कर्ष भयावह थे।

जिलाधिकारी का कहना था कि सामान्य परिस्थितियों में हवा में छोटे छोटे कणों की मात्रा जहां 200 माइक्रग्राम प्रति घनमीटर होनी चाहिए, वहीं कबरई में यह आंकड़ा 1800 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर था यानि सामान्य से नौ गुना ज्यादा। वर्ष 2000 में महोबा जनपद में कुल 57 क्रशर थे जो अब तीन सौ तीस हो चुके हैं और 2011तक शासन सरकारों ने किसी भी प्रकार से प्रदूषण की जांच नहीं करवायी। हालात बद से बद्तर होते जा रहे हैं। 30 जनवरी 2010 तक पिछले दस सालों में बुंदेलखण्ड क्षेत्र विशेष के अन्तर्गत जनपदवार खनन उद्योग बढ़ोत्तरी को निम्न आंकड़ों से देखा जा सकता है। इस कारोबार से प्रदेश सरकार को सालाना 458करोड़ रूपये राजस्व की आमदनी होती है।

बुंदेलखण्ड के आसपास इलाकों में हो रहे अवैध खनन,माइनिंग कारोबार को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के विपरीत किसी भी क्षेत्र में देखा जा सकता है। हाल ही में लामबंद हुए संगठनों की पहल पर मजदूर किसानों ने जब खान निदेशालय ग्वालियर, गाजियाबाद से मानकों के विपरीत खनन की लिखित शिकायत की तो खनिज डायरेक्टर डॉ, के जैन ने 87 खदानो को बंद करने के आदेश जारी किये हैं लेकिन जिला खनिज अधिकारी मुइनुद्दीन व जिला प्रशासन की मिलीभगत से यह मुनासिब नहीं हो सका है। 


बैरियर पर जिला पंचायत द्वारा निर्गत किये गये ठेकों को यहां के बाहुबली ठेकेदार इस तरह से चलाते हैं कि बीस रूपये से 40 रूपये ट्रक निकासी के नाम पर उनसे 150 रूपये की अवैध वसूली की जाती है और हर ओवर लोडिंग ट्रक से दो हजार रूपये की गुण्डा टैक्स वसूली अलग से रात दिन खनन कारोबार में की जाती है। इन्हीं तमाम ज्वलंत मुद्दो को आधार बनाकर बुंदेलखण्ड स्वैच्छिक संगठन प्रवास ने बीते 2.12.2010 को उच्च न्यायालय इलाहाबाद में जनहित याचिका दाखिल की है जिसकी सुनवाई लगातार की जा रही है और खनन के माफिया दहशत में आकार समाजिक कार्यकताओं के खिलाफ फर्जी मुकदमो की साजिशे रच रहे है।

स्वास्थ्य पर प्रभाव- हालांकि कबरई के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में किसी भी दिन जाकर इस बात की पुष्टि की जा सकती है कि जिला अस्पताल से लोगों की सेहत के बारे मे मिली सूचना कितनी थोथी है, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र कबरई के प्रभारी डाक्टर एसके निगम के मुताबिक अस्पताल की ओपीडी मे हर दिन तकरीबन 100 मरीज आते हैं, जिनमें से ज्यादातर सांस और आंख के रोगी होते हैं, यहां के खनन उद्योगों में काम करने वाले मजदूर के बारे में बात करते हुए डॉ, निगम कहते हैं, ‘कबरई के क्रशर उद्योग में काम कर रहे सारे लोग मौते को गले लगा रहे हैं, इन्हें तो दिहाड़ी के साथ-साथ कफन दिया जाना चाहिए’।


स्टोन क्रशरों से उड़ती धूल के स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव की बात कबरई के एक अन्य डॉ. रामकुमार परमार भी मानते हैं, ‘स्टोन क्रशरों केक कारण हवा में हमेशा ही 4-5 माइक्रान के कण मौजूद रहते हैं, जो श्वास नली की एल्वोलाई में जमकर उसे ब्लाक कर देते हैं, जिससे सांस की बीमारी हो जाती है. इससे रक्तशोधन क्षमता भी कम होती जाती है। लोगों का पाचनतंत्र गड़बड़ा जाता है और वे धीरे-धीरे अस्थमा के मरीज बन जाते हैं। डॉ. परमार बताते हैं कि खनन और क्रशर उद्योग से घिरे नब्बे फीसदी लोग एसबेसटोसिस और सिलिकोसिस जैसी बीमारियों से प्रभावित हैं, और हर दिन ऐसे कम से कम एक दर्जन मरीज उनके अस्पताल में आते हैं।



   लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं.