Jun 17, 2017

भाजपा को वध से प्रेम है, फिर वह अस्वच्छता ही क्यों न हो

वध की क्रिया को उत्सव की तरह हत्यारे ही देख सकते हैं। अस्वच्छता दूर करना उत्सवता की भावना पैदा करता है, पर वध उसके उलट भावना है......... 

कुमार

पिछले साल अक्तूबर में गांधी मार्ग चौराहा, जयपुर पर एक बड़े से बोर्ड पर लिखा था 'आइए अस्वच्छता का वध करें।' इस स्लोगन को पढ़ते हुए तब कई विचार आये थे। 


जैसे -
—क्या यह वधिकों की सरकार है।
—वध से बहे खून से क्या खुशबू फैलेगी।
—तीर-धनुष से अस्वच्छता का वध कैसे होता है।
—अस्वच्छता का मतलब गंदगी में जीने को मजबूर गरीबों से तो नहीं।
—क्या यह हिमालयी मूर्खताओं का समय है।

यूं भी वध शब्द का प्रयोग अस्वच्छता के साथ गलत है। यह खुद एक अस्वच्छ भाषा है। वध की क्रिया को उत्सव की तरह हत्यारे ही देख सकते हैं। अस्वच्छता दूर करना उत्सवता की भावना पैदा करता है, पर वध उसके उलट भावना है।

अब आज की तारीख में 'अस्‍वच्‍छता का वध' के निहितार्थ सामने आने लगे हैं और वो भी राजस्‍थान में ही। पिछले शुक्रवार 9 जून को प्रतापगढ़ की कच्ची बस्ती में महिलाएं शौच करने जा रही थीं। तब नगर परिषद के लोगों ने उनकी तस्‍वीर लेने की कोशिश की। श्रमिक संगठन के एक नेता ने इस तरह तस्‍वीर लेने का विरोध किया। इससे नाराज लोगों ने उन महोदय की जमकर पिटाई की जिससे उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। अब कच्ची बस्तियों के लोग अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए धरने पर हैं।

इसी तरह हरियाणा के एक अधिकारी अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में स्वच्छता अभियान की आड़ में अरे-तरे पर उतारू हैं। लोगों ने जब उनकी पोस्‍ट पर आपत्ति जतायी तो उनका जवाब है - आपत्ति करने वालों ने मेरी भाषा अभी सुनी ही कहां है। मेरी भाषा में दस शब्दों वाले वाक्य में आठ शब्द गाली ही होते हैं। वही मेरी ऑरिजनल भाषा है और मुझे अपनी भाषा से बहुत प्यार है। आप लोगों को जाकर UPSC में शिकायत अवश्य करनी चाहिए, जिन्होंने एक बार नहीं, दो बार नहीं; बल्कि तीन बार मुझे IAS सिलेक्ट किया और वह भी बिना किसी रिज़र्वेशन के।"

आखिर क्‍या कारण हैं कि जि‍स स्‍वच्‍छता अभियान की गांधी ने एक मिसाल खड़ी कर दी थी उसी के नाम पर चला मोदी जी का अभियान मानसिक गंदगी का पर्याय हो जा रहा।

Jun 16, 2017

2 महीने बाद मीडिया तक पहुंची 15 दलितों पर देशद्रोह के मुकदमें की सूचना

राजपूतों के दबाव में की जा रही हरियाणा के दलितों की बेजा गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे छात्र—नौजवान, 24 अप्रैल की दोपहर में सीएम खट्टर से अंबाला में मिले थे युवक और शाम को देशद्रोह समेत कई अन्य धाराओं में उनपर कर दिया गया था मुकदमा दर्ज।  

कैथल से राजेश कापरो की रिपोर्ट 

जी हां। यह सही समाचार है। ​हरियाणा के करनाल जिले के सिविल लाईन पुलिस थाना में 24 अप्रैल को यह मुकदमा दर्ज किया गया है। इस मुकदमा के अनुसार इन 15 नामजद दलित छात्रों—नौजवानों ने देशद्रोह का अपराध किया है । इन 15 आरोपियों में मोनिका नाम की एक दलित छात्रा का नाम भी है जो कुरूक्षेत्र युनीवर्सिटी में पढ़ती है।

 मैंने इस मुकदमे की एफआईआर की कॉपी के साथ पूरी जानकारी 5 जून को अपने फेसबुक शेयर कर दी थी। प्रदर्शनकारियों पर क्या मुकदमा दर्ज हुआ है यह पता करने में ही दसियों दिन लग गए। फिर थाने से कॉपी लेने में समय मुझे समय लगा और मैंने 5 जून को एक पोस्ट जरिए खुलासा किया कि 15 दलित छात्रों—नौजवानों पर हरियाणा पुलिस ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया है। छात्रों—नौजवानों समेत सैकड़ों की संख्या में दलित अंबाला जिला के गांव पतरेहड़ी के दलितों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ राज्य के कई जिलों में प्रदर्शन कर रहे थे। 

कुछ लोगों ने खबर को शेयर भी किया पर देश ने आज तब संज्ञान में लिया, जब अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने मेरे प्रयासों के बाद छाप दिया। हिंदी अखबारों, संपादकों और बुद्धिजीवियों ने तो कोई संज्ञान ही नहीं लिया। शायद हिंदी वालों को हिंदी में लिखने वालों की दी सूचनाओं पर भरोसा नहीं होता या फिर वह अंग्रेजी को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। 

खैर, जो भी हो। दिलचस्प यह है कि 24 अप्रैल को दर्ज हुए इस मुकदमें में पुलिस ने ​अबतक एक भी गिरफ्तारी नहीं की है। पुलिस से जब पीड़ितों के परिजनों ने जानकारी चाही तो उनका कहना था कि अभी गिरफ्तार नहीं करेंगे लेकिन जब यह दूसरी बार प्रदर्शन या किसी आंदोलन में शामिल होंगे तब इन्हें भीतर करेंगे। 

पुलिस के बयान से सवाल यह उठता है कि हरियाणा की पुलिस ने छात्रों—नौजवानों पर देशद्रोह जैसा मुकदमा सिर्फ धमकाने और तफरी लेने के लिए दर्ज कर लिया है या ऐसे गंभीर और रेयर मुकदमें दर्ज कर पुलिस कुछ और संदेश देना चाहती है। एक वकील होने के नाते मैं जानता हूं कि देशद्रोह का मुकदमें में गिरफ्तारी और जमानत ज्यादा बेहतर होती है, बजाय कि आप आरोपियों को यूं ही छोड़ दें। इसका एक ही मकसद हो सकता है कि पुलिस ऐसे आरोपियों को 'न जीने देगी और न मरने देगी' वाली हालत में बनाकर रखना चा​हती है। 

और यही वजह है कि देशद्रोह के मुकदमें से खौफ में हैं सभी दलित छात्र—नौजवान, बयान तक देने से डर रहे हैं कि पुलिस कहीं उन्हें गिरफ्तार न कर ले। 

ऐसे हुई आंदोलन की शुरुआत 
अंबाला जिला के गांव पतरेहड़ी के दलितों ने विभिन्न दलित संगठनों के नेतृत्व में अप्रैल 19 से 26 तक कर्ण पार्क करनाल में धरना किया था। प्रदर्शनकारी दलितों की मांग थी कि अंबाला पुलिस दलित नौजवानों को हत्या के एक फर्जी मुकदमे में फंसा रही है उस पर रोक लगाई जाए। सीएम मनोहर लाल खट्टर को अपना दर्द बताने दलित अंबाला से यहां आए थे। मुख्यमंत्री से मिल के जाने के बाद ही पुलिस ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया। जाहिर है पुलिस अमले का यह रवैया बगैर मुख्यमंत्री के इशारे के संभव नहीं रहा होगा। 

हरियाणा के इतिहास में शायद यह पहला मामला है जहां पर इतनी बडी संख्या में दलित समाज के लोगों को नामजद किया गया है। हालांकि इससे पहले भी दलित समाज के अधिकारों की आवाज बुलंद करने वालों पर देशद्रोह के मुकदमे दर्ज किये गए थे। 

देशद्रोह का यह मुकदमा दलित नेता अशोक कुमार, कृष्ण कुटेल, मलखान नंबरदार, राकेश, रवि कुमार इंद्री, अमर मुनक, अमर सगा, मोनिका, मुलखराज, राजकुमार पतरेहड़ी, धर्मसिहं व रविंद्र कुरूक्षेत्र अनिल, संजू ,नरेश पतरेहड़ी पर दर्ज किया गया है।

जिनपर दर्ज हुए मुकदमें 
बावेला यहाँ से खड़ा हुआ  
अंबाला पुलिस के लापरवाही भरे रवैए के कारण मार्च में दलित समुदाय और राजपूतों के बीच तनाव चल रहा था । राजपूत जाति के कुछ बदमाश बार बार दलित समाज के लोगों पर हमला कर रहे थे । पुलिस ने शिकायत के बावजूद दबंग जाति के बदमाशों पर कारवाई नहीं की । दलितों को दबंगों का मूहतोड़ जवाब देने के लिए मजबूर किया गया और दलित अपनी जानमाल की सुरक्षा करने के लिए एकजुट हुए । इस प्रकार से झगड़े की इस घटना में दोनों पक्षों के लोग घायल हुए । पुलिस ने उसी समय दलितों पर 323 आईपीसी तथा दबंग जाति के बदमाशों के खिलाफ एससी एसटी एक्ट सहित 323 आईपीसी आदि धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया।

मुश्किल बनी यह घटना
घटना के चार पांच दिन बाद दबंग जाति के एक घायल की मौत घाव में संक्रमण के कारण हो गई । पुलिस ने दलित समाज के नौजवानों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया । छात्र जवानों को जेलों में ठूंस दिया । झगड़े की जड़ गांव के सरपंच जिस पर एससी एसटी में मुकदमा दर्ज है अभी तक नहीं पकड़ा गया है । पुलिस दलित छात्र नौजवानों को केवल इसी आधार पर उठा रही थी कि वह अंबेडकर संगठन के सदस्य है और दलित उत्पीड़न की घटनाओं का विरोध करता है । करनाल के कर्ण पार्क में पतरेहड़ी के दलित मुख्यमंत्री का ध्यान अंबाला पुलिस की इसी मनमर्जी की तरफ दिलाने आए थे।

इन धाराओं के तहत हुआ है मुकदमा 
इस संबंध में एफआईआर संख्या 298 दिनांक 26/04/2017 धारा 124ए/147/149/186/283/332/341/353 आईपीसी पुलिस थाना सिविल लाईन में दर्ज की गई है।  

कौन हैं जिन पर देशद्राह का मुकदमा हुआ है दर्ज 
15 दलित छात्र नौजवानों पर यह मुकदमा दर्ज किया गया है वे सभी उस प्रतिनिधी मंडल का हिस्सा थे जो 24 अप्रैल  के रोष प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री से मिले थे । यह प्रतिनिधी मंडल मुख्यमंत्री के आश्वासन से सहमत नहीं हुआ और कर्ण पार्क में अपना रोश प्रदर्शन जारी रखने की बात बोलकर वार्ता से उठकर आ गया । 26 अप्रैल को पुलिस ने आंदोलनकारी दलितों को कर्ण पार्क से जबरन खदेड़ दिया । सारा दिन सैंकड़ो दलितों को पुलिस बसों में भरकर घूमाती रही और बाद में अलग अलग स्थानों पर फेंक दिया । पार्क में पानी भर दिया गया । 26 तारीख को गिरफ्तार किए गए इन लोगों में ये सभी 15 लोग भी थे उनको भी बाकि पब्लिक के साथ छोड़ दिया । हालांकि इन सब के खिलाफ 26 अप्रैल को ही देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जा चुका था । यदि उसी समय पुलिस इनको गिरफ्तार कर लेती तो आंदोलन और ज्यादा भड़क उठता, इसलिए पुलिस ने गिरफ्तारी नहीं की । 

दलितों पर बढ़ रहे हैं हमले 
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अत्याचारों के रूप में 2016 में दलितों पर हमलों के 47000 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए । इन आंकड़ो के अनुसार रोजाना 2 दलित मारे जाते हैं और पांच दलित औरतों के साथ बलात्कार की घटना होती है । एक अन्य अनुमान के अनुसार प्रत्येक 18वें मिनट में दलित के खिलाफ एक अपराध होता है हर सप्ताह 13 दलितों को मौत की नींद सूला दिया जाता है हर सप्ताह 6 दलितों का आपराधिक अपहरण किया जाता है हररोज दलित उत्पीड़न की 27 घटनाएं दर्ज होती है । उतर प्रदेश के सहारनपुर की घटनाओं में भाजपा की योगी सरकार ने जो रवैया अपनाया हुआ है हरियाणा की खट्टर सरकार भी उसी राह पर है । ऐसे में दलित समाज के सामने संघर्ष की राह पर अग्रसर होने के अलावा कोई चारा नहीं है ।

पहले भी हुए दलितों पर देशद्रोह के मुकदमें दर्ज 
भगाना के दलितों पर कांग्रेस की हुड्डा सरकार ने देशद्रोह बनाया था। उससे पहले 2007 में हरियाणा सरकार ने प्राईवेट युनीवर्सिटी बिल का विरोध करने वाले जागरूक छात्र मोर्चा के छात्रों पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था। इनमें भी ज्यादातर छात्र दलित या पिछड़ी जातियों संबंधित थे। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के ईस्मालईबाद इलाके में भी पुलिस ने आवासीय प्लाटों की मांग करने वाले दलितों पर देशद्रोह का केस दर्ज किया था। 

Jun 15, 2017

जिम कार्बेट के होटल मजदूर आंदोलन की राह पर

उत्तराखंड। रामनगर जिले के ढिकुली के मनुमहारानी होटल में काम करने वाले श्रमिकों ने होटल प्रबंधक पर अपना दो माह का बकाया वेतन न दिये जाने का आरोप लगाते हुये प्रशासन से वेतन दिलाये जाने की गुहार लगाई है। 


इस मामले में पीड़ितों ने स्थानीय एसडीएम का दरवाजा खटखटाते हुये उन्हें एक ज्ञापन सौंपते हुये कोतवाली व श्रम प्रवर्तन अधिकारी को शिकायत की है। रिजोर्ट में काम कर रहे श्रमिक भाजपा नेता गणेश रावत की अगुवाई में प्रशासनिक भवन पहुंचे जहां श्रमिकों ने जोरदार नारेबाजी करते हुए प्रदर्शन किया। 

इस दौरान उन्होंने एसडीएम परितोष वर्मा को सौंपे गये ज्ञापन में रिसोर्ट प्रबंधक मनोज कुमार शर्मा पर आरोप लगाते हुये कहा कि उनके द्वारा उन्हें दो माह का वेतन नहीं दिया जा रहा है। जब भी वह प्रबंधक अपने वेतन की बात करते हैं, तो रिसोर्ट प्रबंधक उन्हें नौकरी से निकालने की धमकी देता रहता है। वेतन न मिलने के कारण उनके परिवार का जीवन-यापन मुश्किल भरा हो गया है। 

श्रमिकों का कहना है कि रिसोर्ट स्वामी द्वारा रिसोर्ट जुकासो कम्पनी को लीज पर दिया गया है, जिसकी लीज की अवधि पूरी होने वाली है। ऐसे में उनके सामने वेतन का संकट खड़ा हो गया है। इस मामले में एसडीएम वर्मा ने श्रमिकों को आश्वासन देते हुये कहा कि उनका पूरा वेतन होटल प्रबंधक से दिलाया जायेगा। इसके बाद श्रमिकों ने कोतवाली पुलिस व श्रम प्रवर्तन कार्यालय में भी विधिवत अपनी शिकायत दर्ज कराई। 

इस मामले में भाजपा नेता गणेश रावत का कहना है कि कार्बेट नेशनल पार्क के आस-पास डेढ़ सौ से अधिक रिसोर्ट कार्यरत हैं, लेकिन इन रिसोर्ट में कार्यरत श्रमिकों की कोई भी संगठित यूनियन न होने के चलते इनका लगातार उत्पीड़न किया जा रहा है, जबकि रिसोर्ट स्वामियों ने अपने हितों की रक्षा के लिये अपना स्वयं का संगठन बना रखा है। 

रावत ने श्रम अधिकारी से मांग की है कि क्षेत्र में कार्यरत सभी श्रमिकों की यूनियन बनाकर उनके हितों का संरक्षण किया जाये, अन्यथा श्रम विभाग के खिलाफ भी व्यापक तौर पर आंदोलन छेड़ा जायेगा। 

इस दौरान ज्ञापन देने वालों में वीरेन्द्र रावत, संजय बिष्ट, गणेश रावत, सूरज, छोटेलाल, महेश, मनोज, गुलाब हुसैन, सूरज, किशोर सहित अनेकों लोग मौजूद थे।

अब आप के भरोसे राज्यसभा नहीं जा पाएंगे कुमार विश्वास

कुमार की ठसक को पार्टी और उसके नेता बर्दाश्त नहीं करते। कुमार की इस कमजोरी का भी पार्टी को पता है कि वो भाजपा को लेकर इतने कटु कभी नहीं रहते, जितने कांग्रेस को लेकर....

जनज्वार दिल्ली। आम आदमी पार्टी में एक बात कही जाती है कि यहां कोई भी बयान यूं ही नहीं दे देता, जब तक ऊपर से अनुमति या सहमति न हो। कल दिल्ली के पूर्व संयोजक रहे दिलीप पांडेय का कुमार विश्वास पर ट्वीट करके किया गया हमला स्पष्ट करता है कि अब कुमार पर पार्टी को कितना अविश्वास है।


पर दिलीप पांडेय के ट्वीट ने कुमार को बैकफुट पर ला दिया है। कल से कुमार भाजपा के खिलाफ ट्वीट ओर रिट्वीट कर रहे हैं। कुमार के ट्वीटर हैंडल को देखकर समझ आ जायेगा कि दिलीप का तीर निशाने पर लगा है। यह लड़ाई पंजाब के विधानसभा चुनाव के नतीज़ों के समय से चली आ रही है जो कभी स्पष्ट तो कभी अस्पष्ट रूप से बाहर आ जाती है। 

अब एक बात तो तय है कि कुमार आम आदमी पार्टी में अकेले पड़ते नज़र आ रहे हैं। इसका जिक्र वो खुद 2 दिन पहले एनडीटीवी 24/7 को दिए अपने इंटरव्यू में भी कर चुके हैं। इस इंटरव्यू में कुमार खुद को अभिमन्यु की उपाधि दे रहे थे, जो महाभारत में घेरकर मार दिया जाता है। इंटरव्यू लेने वाली पत्रकार भी खुद ये बोल रही थी कि आपके खिलाफ पार्टी के ऊपरी स्तर पर साजिश रची जा रही है। कुमार ने खुद कहा कि उन्हें भी इस बात का इल्म है। आखिर क्या वजह है कि पार्टी के बड़े नेता कुमार को किनारे लगाने में लगे हुए हैं।

दरअसल दिल्ली से राज्यसभा के लिए 3 सांसद जाने हैं। पार्टी के एमएलए के हिसाब से तीनों आप के सांसद राज्यसभा जाएंगे। इसमें से एक सीट के लिए खुले तौर पर कुमार अपनी दावेदारी जताते रहे हैं। और पार्टी तक ये बात पहुंचाते रहे हैं कि उनको राजयसभा के लिए दूसरी पार्टी से भी आॅफर है। कुमार की इसी ठसक को पार्टी और उसके नेता बर्दाश्त नहीं करते। कुमार की इस कमजोरी का भी पार्टी को पता है कि वो भाजपा को लेकर इतने कटु कभी नहीं रहते, जितने कांग्रेस को लेकर। 

पार्टी के नेताओं को भी पता है उन्हें राज्यसभा के लिए कहां से आॅफर है। इसी को ध्यान में रखते हुए कल सोच—समझ कर दिलीप पांडेय ने अपने ट्वीट में कुमार पर हमला करते हुए कहा कि क्या बात है भैया आप कांग्रेस को तो खूब गाली देते हो पर कहते हो वसुंधरा के खिलाफ नही बोलेंगे। ऐसा क्यों?

कुमार ने अपने इंटरव्यू में साफ—साफ बोल दिया था कि मुझे पता है पार्टी में कौन—कौन उनके खिलाफ षड्यंत्र रच रहे हैं कुछ तो वो हैं, जो इस घर में रहे हैं (इस घर से मतलब कुमार के घर में) और यहीं रोटी खाई है। कुमार को भी अब ये समझ आ रहा है कि इस लड़ाई में उनकी हार निश्चित है इसलिए वो खुद को अभिमन्यु घोषित कर रहे हैं। 

इस लड़ाई में किसी को कुछ हासिल हो या न हो पर राजनीति के चलते दो दोस्तों की दोस्ती में जरूर दरार आ गई है। कुमार और मनीष सिसोदिया दोनों गाज़ियाबाद ज़िले के पिलखुआ कस्बे रहने वाले बचपन के दोस्त थे। पर अब दोस्ती  में पहले जैसी बात नहीं रह गई है। इसका सबूत रविवार को राजस्थान की पार्टी की वहां के वालंटियर्स की मीटिंग की कुमार और मनीष की फ़ोटो देखकर पता चल जाता है। दोनों एक मंच पर बैठे हैं, पर ऐसा लगता है जैसे दोनों बस एक खानापूर्ति कर रहे हैं। कवि कुमार विश्वास का चेहरा देख साफ पता चल रहा है कि अब उन्हें अपने घनिष्ठ मित्र मनीष से भी कोई उम्मीद नहीं कि वे पार्टी में उनका सपोर्ट करेंगे। कुमार के चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा है।

इस लड़ाई में एक और अहम किरदार है संजय राघव। ये जनाब मनीष सिसोदिया जी के साले साहब हैं। मनीष भले ही खुद कुमार पर कोई कटाक्ष करने से बचते रहे हों, लेकिन उनका साला संजय राघव जो खुद कुमार के घर के पास रहता है वो कोई भी दिन नहीं छोड़ता जब अपने ट्वीट से कुमार पर आक्रमण न करता हो। इसे मनीष की मौन सहमति कहा जाए या कुछ और। लेकिन इतना तो तय है कि मनीष और कुमार की दोस्ती एक किनारे पर आ गई है, जो कभी भी टूट सकती है।

पार्टी नेताओं को ये आपसी लड़ाई आने वाले दिनों में सोशल मीडिया से निकलकर सड़क पर भी आयेगी। बस इंतज़ार कीजिये कुछ दिनों का।

फर्जी मुठभेड़ करने वाले जवानों को डीजीपी ने पार्टी करने के लिए दिए 1 लाख रुपए

देश की सुरक्षा—व्यवस्था के इतिहास में यह पहली बार है कि किसी राज्य के डीजीपी ने एक अादिवासी की हत्या करने पर जवानों को मुर्गा—भात खाने और जश्न मनाने के लिए 1 लाख रुपए का ईनाम दिया हो, वह भी फर्जी मुठभेड़ के बदले। 

गिरिडीह से रूपेश कुमार सिंह की रिपोर्ट 

मोतीलाल बास्के : जब वह राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू की विधि व्यवस्था में लगे थे 
झारखंड के गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड के मधुबन थाना अंतर्गत जैन तीर्थावलम्बियों के विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थल पारसनाथ पर्वत की तलहटी में स्थित आदिवासी गांव ढोलकट्टा के समीप 9 जून को माओवादियों व सीआरपीएफ कोबरा के बीच मुठभेड़ होती है। मुठभेड़ की ही शाम में पुलिस दावा करती है कि मुठभेड़ में एक दुर्दांत माओवादी को मार गिराया गया। 

मारे गए आदिवासी के पास से पुलिस एक एसएलआर व गोली समेत कई चीजें दिखाती है। 10 जून को झारखंड के डीजीपी डीके पांडेय हवाई मार्ग से मधुबन पहुंचते हैं और ‘भारत माता की जय’ ‘सीआरपीएफ की जय’ के नारे के उद्घोष के बीच गिरिडीह एसपी बी वारियार को एक लाख रूपये मुठभेड़ में शामिल जवानों को बड़ी पार्टी देने के लिए देते हैं और अलग से 15 लाख रूपये इनाम देने की घोषणा भी करते हैं। इस खबर को झारखंड के तमाम अखबारों के तमाम एडिसन में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है।

मुठभेड़ में मारे गए क्या सच में दुर्दांत माओवादी थे?
इस सवाल का जवाब 11 जून को मिल गया, जब मारे गये आदिवासी की पहचान उजागर हुई तो पता चला कि जिसे मारकर प्रशासन अपना पीठ खुद ही थपथपा रहा है और जिसकी हत्या का जश्न भी अब तक प्रशासन मना चुका है, दरअसल वह एक डोली मजदूर था, जो कि तीर्थयात्रियों को डोली पर बिठाकर अपने कंधे पर उठाकर तीर्थस्थल का भ्रमण कराता था और साथ ही पारसनाथ पर्वत पर स्थित चंद्र मंदिर के नीचे एक छोटा सा होटल भी चलाता था, जिसमें डोली मजदूर चावल-दाल व सत्तू खाया करते थे। 

उस डोली मजदूर का नाम मोतीलाल बास्के था। वह धनबाद जिला के तोपचांची प्रखंड अंतर्गत चिरूवाबेड़ा का रहने वाला था, लेकिन कुछ दिन से अपने ससुराल गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड अंतर्गत ढोलकट्टा में ही रहकर प्रखंड से पास किया गया प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपने आवास को बनवा रहा था। 

कौन है मोतीलाल बास्के 
9 जून को वह ढोलकट्टा से पारसनाथ पर्वत स्थित अपनी दुकान ही जा रहा था, लेकिन हमारे देश के ‘बहादुर’ अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ कोबरा ने उसकी हत्या करके उसे दुर्दांत माओवादी घोषित कर दिया और उसकी हत्या का जश्न भी सरकारी खजाने से मनाया। अब जबकि यह बात पूरी तरह से साफ हो चुकी है कि मृतक मोतीलाल बास्के एक डोली मजदूर था और डोली मजदूरों के एकमात्र संगठन मजदूर संगठन समिति का सदस्य भी था, उसकी सदस्यता संख्या 2065 है। 
मारे जाने के बाद छपी यह खबर 


एक आदिवासी होने के नाते वह आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी का भी सदस्य था और 26-27 फरवरी 2017 को मधुबन में आयोजित मारांड. बुरु बाहा पोरोब में विधि व्यवस्था का दायित्व भी संभाला था, जिसमें झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के बतौर शामिल हुई थीं। मृतक मोतीलाल बास्के को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बनाने के पैसे भी मिले हैं, जिससे वे मकान बना रहे थे।

माओवादी बताकर मोतीलाल बास्के की हत्या पुलिस द्वारा कर दिए जाने का सच पारसनाथ पर्वत के अगल-बगल के गांवों में पहुंचते ही आम लोगों में गुस्सा बढ़ने लगा और 11 जून को मधुबन के हटिया मैदान में मजदूर संगठन समिति ने एक बैठक कर मोतीलाल बास्के का सच सबके सामने उजागर किया। इस बैठक में आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी के अलावा स्थानीय जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए और 14 जून को वहीं पर महापंचायत करने का निर्णय लिया गया। 

धीरे-धीरे फर्जी मुठभेड़ का सच बाहर आने लगा। 12 जून को भाकपा (माले) लिबरेशन की एक टीम ने अपने गिरिडीह जिला सचिव के नेतृत्व में मृतक के परिजनों से मुलाकात करते हुए इस फर्जी मुठभेड़ की न्यायिक जांच व दोषी पुलिसकर्मियों को सजा देने की मांग के साथ 15 जून को पूरे जिला में प्रतिवाद दिवस मनाने की घोषणा की, साथ ही मृतक की पत्नी को 5 हजार रुपये की आर्थिक मदद भी की। 

13 जून को झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतागण ढोलकट्टा जाकर मृतक के परिजनों से मुलाकात की व मृतक की पत्नी की बात झारखंड के विपक्ष के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से करायी, जिसमें उन्होंने उनको न्याय दिलाने का वादा किया। 14 जून को मधुबन में आयोजित मजदूर संगठन समिति के महापंचायत में सैकड़ों गांवों के हजारों ग्रामीणों के साथ-साथ झामुमो, झाविमो, भाकपा (माले) लिबरेशन, आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी व स्थानीय तमाम जनप्रतिनिधि- जिला परिषद सदस्य, प्रखंड प्रमुख व कई पंचायत के मुखिया शामिल हुए। 

महापंचायत ने इस फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ 17 जून को मधुबन बंद, 21 जून को गिरिडीह में उपायुक्त के समक्ष धरना, 2 जुलाई को पूरे गिरिडीह जिला में मशाल जुलूस व 3 जुलाई को गिरिडीह बंद की घोषणा की। 15 जून के अखबारों में भाकपा (माओवादी) का बयान भी आया कि मोतीलाल बास्के उनके पार्टी या पीएलजीए का सदस्य नहीं है।

सवाल यही कि आदिवासियों के ही राज्य में आदिवासी हत्या पर जश्न  

फर्जी मुठभेड़ के बाद प्रदर्शन करते पार्टियों के लोग और स्थानीय जनता 
उलगुलान के सृजनकार महान छापामार योद्धा बिरसा मुंडा के शहादत दिवस 9 जून को ही फर्जी मुठभेड़ में एक आदिवासी मजदूर की हत्या को माओवादी हत्या के रुप में पूरे झारखंड के तमाम अखबारों ने अपने तमाम एडीसन में मुख्य पृष्ठ पर जगह दी, लेकिन अब जबकि यह साबित हो चुका है कि मृतक मोतीलाल बास्के माओवादी नहीं था, तो सभी अखबारों ने इन तमाम समाचारों को गिरिडीह के पन्नों में ही कैद कर रखा है। 

तमाम अखबारों ने डीजीपी द्वारा एसपी को एक लाख रुपये हत्यारों को पार्टी देने की खबरों को प्रमुखता से छापा था, लेकिन आज कोई अखबार यह सवाल नहीं कर रहा है कि आखिर एक ग्रामीण आदिवासी की हत्या का जश्न क्यों और कब तक?

फर्जी मुठभेड़ की घटना को अब एक सप्ताह होने को हैं, लेकिन देश के मानवाधिकार संगठनों, बुद्धिजीवियों व न्यायपसन्द नागरिकों के कानों पर अब तक जूं भी क्यों नहीं रेंग रही? उनके लिए एक आदिवासी की हत्या और हत्यारे पुलिस अधिकारियों के द्वारा हत्या का जश्न मनाना कोई बेचैनी का सवाल क्यों नहीं बनता?

केजरीवाल के दो चेलों की वाट्सअप चैट, बताएगी कैसी राजनीति हो रही आप में

दोनों नेता अरविंद केजरीवाल के ही बागवानी के दो फूल हैं, जिसे पानी—खाद डालकर अरविंद ने अपने हाथों से सींचा है...

दिल्ली से स्वतंत्र कुमार की रिपोर्ट 



दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी अपनी किसी और नीति पर कायम रहे या न रहे, लेकिन वह शुरुआत से ही अपने ही नेताओं के खिलाफ साजिश रचने, उन्हें निपटाते रहने की परंपरा पर लगातार कायम है। माना जाता है कि केजरीवाल के लिए जो भी नेता चुनौती बनता है, या उन्हें लगता है कि उनकी राजनीतिक सल्तनत पर कोई हक जमा सकता तो उसे नितटा देने में पूरी पार्टी को लगा देते हैं। 

अबकी भी यही हो रहा है। अरविंद केजरीवाल ने दो लोगों को ढंग से निपटाने का ठेका पार्टी पदाधिकारियों को दे रखा है। जिनको निपटा देना है, वे हैं कपिल मिश्रा और कुमार विश्वास। मिश्रा और विश्वास वही लोग हैं जिनका एक समय में इस्तेमाल अरविंद ने स्वराज पार्टी के अध्यक्ष योगेंद्र यादव और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को निपटाने के लिए किया था। गौरतलब है कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण आम आदमी पार्टी के संस्थापकों और बड़े नेताओं में शामिल रहे हैं। 

कपिल मिश्रा के खुलासों को हाशिए पर डालने और कुमार विश्वास की छवि को कार्यकर्ताओं में धुमिल करने की जिम्मेदारी अरविंद केजरीवाल टीम की ओर से ओखला विधायक अमानतुल्लाह खान को दी गयी है। मतलब मोर्चे पर अमानतुल्लाह हैं, जबकि पीछे से दिल्ली आप के पूर्व मुखिया दिलीप पांडेय, पार्टी खजांची दीपक वाजपेयी, मनीष सिसौदिया के साले संजय राघव समेत दर्जनों पार्टी पदाधिकारी परोक्ष—प्रत्यक्ष रूप से जुटे हुए हैं। 

कल हुए एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा आज ओखला क्षेत्र के विधायक अमानतुल्ला खान के खिलाफ ओखला के बाटला हाउस इलाके में धरना देंगे। कपिल मिश्रा के मुताबिक यह धरना बाटला हाउस में रहने वाली एक 70 वर्षीय वृद्ध महिला के घर पर कब्जा किए जाने को लेकर है। मिश्रा का कहना है कि महिला के घर पर विधायक अमानतुल्ला के इशारे पर कब्जा हुआ है। ​कब्जा करने वाले विधायक के लोग हैं। 

पर असल ये बात ये नहीं है, बल्कि बात है कपिल मिश्रा और अमानतुल्लाह के बीच हुई 13 नवंबर की रात वाट्स्अप चैट, जिसे थोड़ी देर के लिए कपिल मिश्रा ने ट्वीटर पर लगाया पर बाद में हटा दिया। 

मगर जनज्वार के पास वह पूरी बातचीत है जिसको पढ़कर आपको पता चल जाएगा कि असल में ये दोनों नेता किस स्तर के हैं और इनका असल मकसद क्या है? साथ ही आपको फैसला करने में भी आसानी होगी कि आम आदमी पार्टी किस राह पर है, क्योंकि दोनों की नेता अरविंद केजरीवाल के ही बागवानी के दो फूल हैं, जिसे पानी—खाद डालकर अरविंद ने अपने हाथों से सींचा है!  





Jun 13, 2017

पेशाब-पाखाने की छुट्टी मांगने पर जाती है नौकरी, यूनियन बनाने की कोशिश हुई तो भेज दिया जेल

मजदूरों के यूनियन बनाने के बुनियादी हक़ के संघर्ष को विफल बनाने में पुलिस और न्यायपालिका भी अपना पूरा योगदान दे रही है .... 

आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में पिछले कुछ महीनों से मजदूर अपनी यूनियन पंजीकृत करवाने के लिए और मैनेजमेंट से अपने काम की परिस्थितियों से सम्बंधित मांगों को लेकर संघर्षरत हैं. 31 मई 2017 को कंपनी के गेट पर बीते कई दिनों से शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों पर पुलिस ने मैनेजमेंट की शिकायत पर पहले लाठीचार्ज किया और फिर उन्हें हिरासत में ले लिया. इन सभी के ख़िलाफ़ रोहतक के संपला थाने में एफ़आईआर दर्ज की गई है, जिनमें यूनियन लीडरों को मुख्य आरोपी नामित किया गया है.

फ़ाइल फोटो  
आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा प्राइवेट लिमिटेड एक जापानी कम्पनी है, जो 2011 से आई.एम.टी. रोहतक में स्थित अपनी फैक्ट्री में टोयोटा, मारुती, होण्डा आदि नामी गाड़ी बनाने वाली कंपनियों के लिए 'डोर लॉक' एवं 'इनसाइड-आउटसाइड हैंडल' जैसे पार्ट्स बनाती है. इस फैक्ट्री में करीब 450 मज़दूर काम करते हैं. इन्हें 8000—10000 रुपए मासिक वेतन मिलता है. 

आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा मज़दूर यूनियन के अनुसार, काम के दौरान मजदूरों को पानी व पेशाब के लिए मना किया जाता है, उनके साथ गाली—गलौज की जाती है और महिला मज़दूरों के साथ भी दुर्व्यवहार किया जाता है.

कम वेतन और काम की बुरी परिस्थितियों के चलते मज़दूरों ने फैसला किया कि वे अपनी यूनियन को पंजीकृत करेंगे और अपनी मांगों को मैनेजमेंट के सामने रखेंगे. 20 मार्च 2017 को उन्होंने यूनियन के पंजीकरण के लिए श्रम विभाग में अर्जी दी. 26 मार्च को मजदूरों ने अपना मांगपत्र कंपनी को दिया. पर न तो कंपनी मैनेजमेंट और न ही प्रशासन की तरफ से मजदूरों की कोई खबर ली गई या सुनवाई की गई. 

उल्टा 25 अप्रैल को कंपनी ने रोहतक सिविल कोर्ट में मुकदमा दाखिल कर दिया और यूनियन लीडरों और सदस्यों को फैक्ट्री गेट के अन्दर आने से रोकने और फैक्ट्री परिसर के 1000 मीटर तक कोई धरना या शामियाना लगाने से रोकने के निर्देश मांगे. 

26 अप्रैल को सिविल जज ने अंतरिम आदेश दिए की फैक्ट्री परिसर के अन्दर और फैक्ट्री गेट से 400 मीटर दूरी तक मजदूर धरने पर भी नहीं बैठ सकते. 3 मई को कंपनी ने मोर्चे की अगुवाई कर रहे 20 मज़दूरों को काम से निकाल दिया. बाकि मज़दूरों ने जब इसका विरोध किया तो कंपनी ने उन्हें एक "अंडरटेकिंग" थमा दी और यह शर्त रख दी कि इस पर हस्ताक्षर करके ही वे काम पर वापस आ सकते हैं. कंपनी के मनमाने बर्ताव के विरोध में मज़दूर 3 मई से कंपनी के गेट के बाहर बैठकर शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे हैं .

इस बीच 12 मई को मजदूरों की यूनियन पंजीकरण की अर्जी खारिज हो गई. यूनियन लीडरों का कहना है कि अर्जी को बेबुनियाद कारणों से खारिज किया गया है. जहां कारण बताया गया है कि यूनियन के चार सदस्य कानूनी परिभाषा में अनुसार “मजदूर” नहीं हैं, वहां लीडरों का कहना है की ये बात उनके वेतन रसीद से झूठ साबित होती है. जहाँ कारण बताया गया है कि यूनियन के कुल सदस्य कंपनी के कुल मजदूर संख्या के 10 प्रतिशत से भी कम है, वहां लीडरों का कहना है की कंपनी ने यह संख्या षड्यंत्र के तहत बढ़ाकर बताई है.
  
30 मई को चल रहे सिविल मुक़दमे में जज ने एक और निर्देश दिया की यूनियन के सदस्य फैक्ट्री परिसर में न तो घुसेंगे, न उसके 200 मीटर के दायरे में कोई धरना करेंगे, न नारे लगाएंगे, न घेराव करेंगे, न रास्ता रोकेंगे. कंपनी द्वारा दिए गए तथ्यों जैसे मजदूरों द्वारा फैक्ट्री संपत्ति को नुक्सान पहुँचाया गया और उत्पादन धीमा किया गया, की पड़ताल किये बिना और संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने के बुनियादी हकों को नकारते हुए फैसला कंपनी के पक्ष में सुना दिया गया. 

31 मई को सुबह से ही मज़दूर अपने परिजनों के साथ अपनी अनसुनी मांगों को उठाने हेतु फैक्ट्री के बाहर धरने पर बैठे थे. मैनेजमेंट की शिकायत पर हरियाणा पुलिस वहां एकत्रित हो गई, प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, उन्हें हिरासत में ले लिया और उन पर सांपला थाने में मुकदमा दर्ज़ कर दिया. एफ़.आई.आर. के अनुसार मज़दूरों पर आरोप है कि वे गैरकानूनी रूप से खतरनाक हथियार (यानी झंडे) लेकर एकत्रित हुए, रास्ता रोका, कंपनी के गेट को जाम कर दिया, कंपनी के स्टाफ को धमकी दी और चोट पहुंचाई. 425 लोगों को, जिनमें मजदूर, उनके परिजन और कुछ कार्यकर्ता भी शामिल थे, रोहतक के सुनारियन जेल में बंद कर दिया और मजिस्ट्रेट को अर्जी देने पर ही 6 जून तक सभी को बेल पर छोड़ा गया.

मज़दूरों के काम की परिस्थितियों से सम्बंधित मांगों को लेकर कंपनी प्रबंधन और श्रम विभाग की उदासीनता उनके रवैये से स्पष्ट है. मजदूरों के यूनियन बनाने के बुनियादी हक़ के संघर्ष को विफल बनाने में पुलिस और न्यायपालिका भी अपना पूरा योगदान दे रही है . एक तरफ मज़दूरों को संगठित होने से रोकने के लिए प्रबंधन ने 20 मज़दूरों को सीधा निष्कासित कर दिया और बाकियों से अंडरटेकिंग देने की शर्त रख दी। उनकी मांगों के बारे में कोई पहल न कर गेट पर बाउन्सरों को तैनात किया गया. सिविल कोर्ट में यूनियन के सदस्यों को बाहर निकालने के लिए मुकदमा कर दिया और फिर 31 मई को उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई. 

दूसरी तरफ प्रशासन, ख़ास तौर से श्रम विभाग की तरफ से मज़दूरों की मांगों के लिए प्रबंधन पर कोई दबाव नहीं बनाया गया है. प्रबंधन का मनोबल बढाते हुए पुलिस ने मजदूरों पर लाठीचार्ज किया, उन पर मुकदमा दर्ज किया और कई दिनों तक गिरफ्तार करके रखा. साथ ही सिविल कोर्ट ने मजदूरों को फैक्ट्री के आसपास प्रदर्शन करने से भी रोक दिया है.

हरियाणा में आईसीन, होण्डा, मारुती, ओमाक्स आदि कंपनियों के संघर्षों से स्पष्ट पता चलता है की आज भी मजदूरों के लिए संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए संगठित होने के मूलभूत अधिकार को हासिल करना कितना मुश्किल है. 

पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) ने संघर्षरत मज़दूरों के खिलाफ दर्ज मुक़दमे एवं गिरफ्तारी की निंदा करते हुए मांग है मजदूरों पर दर्ज झूठे मुकदमे वापस लिए जाएँ. मजदूरों की यूनियन को तुरंत पंजीकृत किया जाये। साथ ही श्रम विभाग मैनेजमेंट से मजदूरों की मांगें मनवाने के लिए उचित कार्यवाही करे.

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने राज्यपाल और केंद्रीय मंत्री को किया शर्मसार

मुख्यमंत्री जब अपना सम्बोधन कर रहे थे तब केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर व प्रदेश के राज्यमंत्री धनसिंह उन्हें अवाक होकर देख और सुन रहे थे....

जगमोहन रौतेला

उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री त्रिवेन्द्र रावत ने केन्द्रीय मानव संशाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर व प्रदेश के उच्च शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत को उस वक्त आइना दिखा दिया, जब कल 12 जून 2017 को पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में ये लोग गाउन पहनकर कर बैठे थे. 

पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में गाउन पहने केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल और  अन्य 
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत जब समारोह में पहुँचे तो उन्होंने गाउन को फिरंगियों की पोशाक बताते हुए उसे पहनने से इंकार कर दिया. अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी दीक्षांत समारोह के लिए क्यों नहीं भारतीय पोशाक तय कर पाए. गाउन हमारी गुलाम मानसिकता का प्रतीक भी बन गया है. इसे अब उतार दिए जाने का वक्त आ गया है. 

त्रिवेंद्र रावत ने पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी के कुलपति से कहा कि अगली बार जब भी विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह हो तो वह भारतीय पोशाक में हो. मुख्यमंत्री जब अपना सम्बोधन कर रहे थे तब केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर व प्रदेश के राज्यमंत्री धनसिंह उन्हें अवाक होकर देख और सुन रहे थे. दोनों को शायद आभास भी नहीं रहा होगा कि जिस गाउन को पहनकर वे मंच में बैठे हैं, उसके खिलाफ ही मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत इस तरह की टिप्पणी ही नहीं करेंगे, बल्कि गाउन पहनने से इंकार तक कर देंगे. समारोह में राज्यपाल केके पॉल भी गाउन पहने हुए थे.

इस मामले में मुख्यमंत्री रावत अपने राज्यमंत्री के ऊपर भारी पड़ गए. उल्लेखनीय है कि उच्च शिक्षा राज्य मंत्री बनने के बाद से ही डॉ. धनसिंह रावत वन्दे मातरम, विश्वविद्यालयों, डिग्री कॉलेजों में सौ फीट का तिरंगा फहराने व डिग्री कॉलेजों में यूनिफार्म लागू किए जाने जैसे बयान देकर पिछले दिनों बेहद चर्चा में रहे हैं. इन बातों के समर्थन में वह इससे देशभक्ति का जज्बा पैदा होेने, छात्रों के अनुशासित होने और पढ़ाई में गुणवत्ता आने की बात करते रहे हैं. 

मगर विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में गाउन व हैड पहनने की विदेशी परम्परा की ओर उनका ध्यान नहीं गया और इस मामले में मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने बाजी मार ली. मुख्यमंत्री के सम्बोधन के जवाब में विश्वविद्यालय के कुलपति ने भरोसा दिलाया कि अगला दीक्षांत समारोह भारतीय वेशभूषा में ही होगा. समारोह में राज्यपाल केके पॉल भी गाउन पहने हुए थे.